RBSE Solutions for Class 11 Sociology Chapter 9 पश्चिमी सामाजिक विचारक

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Rajasthan Board RBSE Class 11 Sociology Chapter 9 पश्चिमी सामाजिक विचारक

RBSE Class 11 Sociology Chapter 9 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर  

RBSE Class 11 Sociology Chapter 9 बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अगस्त कॉम्ट ने समाजशास्त्र की स्थापना कब की?
(अ) 1830
(ब) 1838
(स) 1842
(द) 1848
उत्तर:
(ब) 1838

प्रश्न 2.
कॉम्ट के अनुसार चिन्तन की प्राथमिक अवस्था क्या है?
(अ) प्रत्यक्षवादी
(ब) तात्विक
(स) धार्मिक
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(स) धार्मिक

प्रश्न 3.
प्रत्यक्षवादी क्या है?
(अ) समाज की धार्मिक स्थिति
(ब) समाज की तात्विक स्थिति
(स) समाज की परम्परागत स्थिति
(द) समाज की वैज्ञानिक स्थिति।
उत्तर:
(द) समाज की वैज्ञानिक स्थिति।

प्रश्न 4.
वेबर के अनुसार निम्न में से कौनसा कारण प्रत्यक्षवाद के अनुकूल है?
(अ) प्रेतवाद
(ब) बहुदेववाद
(स) एकेश्वरवाद
(द) अवलोकन।
उत्तर:
(द) अवलोकन।

प्रश्न 5.
मार्क्स ने कौन से सन् में डाक्ट्रेट की उपाधि प्राप्त की?
(अ) 1840
(ब) 1841
(स) 1842
(द) 1843
उत्तर:
(द) 1843

प्रश्न 6.
मार्क्स निम्न में से कौनसी विचारधारा के जनक माने जाते हैं?
(अ) प्रजातांत्रिक
(ब) राजतांत्रिक
(स) समाजवादी
(द) साम्यवादी।
उत्तर:
(द) साम्यवादी।

प्रश्न 7.
मार्क्स के अनुसार जिन लोगों के पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व नहीं होता है उसे क्या कहेंगे?
(अ) पूँजीपति
(ब) श्रमिक
(स) राजा
(द) जमींदार।
उत्तर:
(द) जमींदार।

प्रश्न 8.
“दास कैपिटल” पुस्तक के रचयिता हैं
(अ) हीगल
(ब) मार्क्स
(स) वेबर
(द) दुर्थीम।
उत्तर:
(द) दुर्थीम।

प्रश्न 9.
दुर्थीम ने किस पुस्तक पर डाक्ट्रेट की उपाधि प्राप्त की?
(अ) समाज में श्रम विभाजन
(ब) आत्महत्या
(स) नैतिक शिक्षा
(द) समाजवाद।
उत्तर:
(अ) समाज में श्रम विभाजन

प्रश्न 10.
दुर्थीम ने श्रम विभाजन की व्याख्या किस आधार पर की?
(अ) आर्थिक
(ब) सामाजिक
(स) राजनीतिक
(द) औद्योगिक।
उत्तर:
(ब) सामाजिक

प्रश्न 11.
यान्त्रिक एकता है
(अ) समरूपता की एकता
(ब) विभिन्नता की एकता
(स) जटिलता की एकता
(द) आधुनिक एकता।
उत्तर:
(अ) समरूपता की एकता

प्रश्न 12.
प्रकार्यात्मक स्वतंत्रता एवं विशेषीकरण किसका परिणाम है?
(अ) औद्योगीकरण
(ब) पश्चिमीकरण
(स) श्रम विभाजन
(द) नगरीकरण।
उत्तर:
(स) श्रम विभाजन

प्रश्न 13.
मैक्स वेबर किस देश के निवासी थे?
(अ) जर्मनी
(ब) फ्रांस
(स) अमेरिका
(द) इंग्लैण्ड।
उत्तर:
(अ) जर्मनी

प्रश्न 14.
वेबर के अनुसार सामाजिक क्रिया कर्ता के द्वारा किया गया वह व्यवहार है जो है
(अ) अर्थपूर्ण
(ब) उद्देश्यपूर्ण
(स) लक्ष्यपूर्ण
(द) साधनपूर्ण।
उत्तर:
(अ) अर्थपूर्ण

प्रश्न 15.
निम्न में से कौनसी क्रिया भावनात्मक क्रिया कहलायेगी?
(अ) पुल निर्माण
(ब) विवाह करना
(स) चोरी करना
(द) क्रोध में हत्या करना।
उत्तर:
(द) क्रोध में हत्या करना।

RBSE Class 11 Sociology Chapter 9 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अगस्त कॉम्ट का जन्म फ्रांस के किस नगर में हुआ था?
उत्तर:
मॉण्टपेलियर नगर में।

प्रश्न 2.
समाजशास्त्र के जनक कौन थे?
उत्तर:
समाजशास्त्र के जनक अगस्त कॉम्ट हैं।

प्रश्न 3.
पॉजिटिव फिलोसफी का प्रकाशन कब हुआ?
उत्तर:
सन् 1832-42 में।

प्रश्न 4.
धार्मिक व तात्विक अवस्था में किसका अभाव होता है?
उत्तर:
उक्त दोनों अवस्थाओं में निश्चितता का अभाव होता है।

प्रश्न 5.
रेमण्ड ऐरा की पुस्तक का नाम क्या है?
उत्तर:
रेमण्ड ऐरा की पुस्तक का नाम है-‘मेन करेन्ट्स इन सोशियोलॉजिकल थॉट’

प्रश्न 6.
वर्ग संघर्ष क्या है?
उत्तर:
समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स के अनुसार शोषक एवं शोषित वर्ग के संघर्ष को वर्ग संघर्ष कहते हैं।

प्रश्न 7.
मार्क्स के अनुसार वर्ग संघर्ष कब होता है?
उत्तर:
जब शोषक एवं शोषित वर्ग उत्पादन के साधनों पर नियन्त्रण के लिए जद्दोजहद करते हैं तो वर्ग संघर्ष होता है।

प्रश्न 8.
मार्क्स ने कितने प्रकार के समाज बताए हैं?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने चार प्रकार के समाज बताए हैं-आदिम साम्यवादी समाज, दासत्व युग का समाज, सामन्ती समाज व पूँजीवादी समाज।

प्रश्न 9.
दुर्थीम का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
समाजशास्त्री दुर्थीम का जन्म 14 अप्रैल सन् 1858 को फ्रांस के नगर एपीनाल में हुआ था।

प्रश्न 10.
दुीम ने किस विषय पर डाक्ट्रेट की उपाधि प्राप्त की?
उत्तर:
इन्होंने श्रम-विभाजन नामक विषय पर डाक्ट्रेट की उपाधि प्राप्त की।

प्रश्न 11.
सावयवी एकता क्या है?
उत्तर:
आधुनिक, जटिल, विकसित एवं औद्योगिक समाजों में पायी जाने वाली एकता सावयवी एकता कहलाती है।

प्रश्न 12.
दमनकारी कानून कैसे समाजों में पाए जाते हैं?
उत्तर;
उपर्युक्त कानून यान्त्रिक एकता वाले समाजों में पाए जाते हैं।

प्रश्न 13.
मैक्स वेबर का देहान्त कब हुआ?
उत्तर:
14 जून सन् 1920 में।

प्रश्न 14.
सामाजिक क्रिया का गणितीय सूत्र लिखिए।
उत्तर:
सामाजिक क्रिया का गणितीय सूत्र है-सामाजिक क्रिया-व्यवहार (गतिविधि) + कर्ता द्वारा दिया अर्थ।

प्रश्न 15.
मूल्यात्मक क्रिया क्या है?
उत्तर:
जब व्यक्ति समाज के मूल्यों से प्रभावित होकर क्रिया करता है तो ऐसी क्रिया को मूल्यात्मक क्रिया कहते हैं।

RBSE Class 11 Sociology Chapter 9 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अगस्त कॉम्ट के समाजशास्त्र के शाब्दिक अर्थ को समझाइए।
उत्तर:
अगस्त कॉम्ट का समाजशास्त्र जिसे अंग्रेजी में ‘Sociology’ कहा जाता है, दो भिन्न भाषाओं के शब्दों से मिलकर बना है जिसमें पहला शब्द ‘सोशियस’ (Socius) लैटिन तथा दूसरा शब्द ‘लोगिया’ (Logia) ग्रीक भाषा से है। सोशियस का अर्थ समाज होता है तथा लोगिया का अर्थ शास्त्र या विज्ञान होता है। इस प्रकार शाब्दिक रूप में समाजशास्त्र का अर्थ है-समाज का विज्ञान या शास्त्र

प्रश्न 2.
प्रेतवाद क्या है?
उत्तर:
समाजशास्त्री अगस्त कॉम्ट ने मानव के बौद्धिक विकास को तीन स्तरों के नियम द्वारा प्रकट किया। इन तीन स्तरों में पहला स्तर धर्मशास्त्रीय अवस्था है। प्रेतवाद इसी के तहत एक अवयव है। धर्मशास्त्रीय चिन्तनक्रम के तहत सबसे प्रारम्भिक अवस्था को प्रेतवाद कहा जाता है। प्रेतवाद की अवस्था में यह स्वीकार किया जाता है कि प्रत्येक जड़ एवं चेतन वस्तु में एक जीव होता है। सभी अलौकिक शक्तियाँ इस जीव को परिचालित करती हैं।

प्रश्न 3.
अवलोकन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्री अगस्त कॉम्ट के अनुसार समाजशास्त्र को यदि विज्ञान की श्रेणी में लाना है तो समाजशास्त्रियों को वैज्ञानिक पद्धति को अपनाना होगा। अवलोकन वैज्ञानिक पद्धति का एक अवयव है। अवलोकन मानव इन्द्रियों द्वारा किया गया क्रमबद्ध व व्यवस्थित अध्ययन है। अर्थात् किसी भी घटना का मानव इन्द्रियों (आँख, कान, नाक व स्पर्श) द्वारा क्रमबद्ध व व्यवस्थित तरीके से अध्ययन किया जाता है तो वह शास्त्र विज्ञान की श्रेणी में आता है।

प्रश्न 4.
प्रत्यक्षवाद क्या है?
उत्तर:
प्रत्यक्षवाद वह विचारधारा है जिसके अनुसार ज्ञान का विकास निश्चित अवस्था में हुआ। प्रत्यक्षवाद को विज्ञानवाद के नाम से भी जाना जाता है। वस्तुतः अगस्त कॉम्ट समाजशास्त्र को एक विज्ञान के रूप में स्थापित करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने समाजशास्त्र में वैज्ञानिक विधि के प्रयोग पर बल दिया। उनके अनुसार समाजशास्त्र को यदि विज्ञान की श्रेणी में लाना है तो समाजशास्त्रियों को अग्रलिखित चार तरीकों से समाज की घटनाओं का अध्ययन करना चाहिए, अवलोकन पद्धति, परीक्षण पद्धति, तुलनात्मक पद्धति एवं ऐतिहासिक पद्धति।

प्रश्न 5.
मार्क्स ने वर्ग को कैसे परिभाषित किया?
उत्तर:
पूँजीवादी समाज की बहुत बड़ी विशेषता वर्ग को बताते हुए कार्ल मार्क्स ने वर्ग को इस तरह से परिभाषित किया एक ही धन्धे को करने वाले लोग जिनकी आर्थिक अवस्था और काम की दशाएँ और इसी तरह शोषण के तरीके समान होते हैं, वे ही वर्ग नहीं होते हैं वरन् वर्ग के लिए बहुत बड़ी अनिवार्यता वर्ग चेतना और वर्ग संगठन है।

प्रश्न 6.
वर्ग चेतना क्या है?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने वर्ग चेतना को निम्नलिखित तरह से समझाया है :

  1. अपने आप में वर्ग-क्लास इन इट सेल्फ-जब किसी कार्य को करने वाले लोग संगठित हो जाते हैं और उनमें यह चेतना आ जाती है कि हम एक ही तरीके के कार्य या पेशे में हैं तो इस तरह के समूह अपने आप में वर्ग हैं।
  2. अपने लिए वर्ग-क्लास फॉर इट सेल्फ-जब किसी कार्य या व्यवसाय को करने वाले अपने आपको उस वर्ग के लिए समर्पित करते हैं तथा वर्ग के लिए कुछ भी कर सकते हैं तो इसे अपने लिए वर्ग कहा जाता है।

प्रश्न 7.
पूँजीवादी समाज में कौन-से वर्ग हैं?
उत्तर:
समाजशास्त्री कार्लमार्क्स के अनुसार पूँजीवादी समाज में निम्नलिखित दो वर्ग हैं :

  • बुर्जुआ (पूँजीपति) वर्ग :
    इसके पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व होता है। अधिक लाभ अर्जित करने के लिए यह श्रमिकों (सर्वहारा वर्ग) का शोषण करता है। यह शोषक वर्ग है।
  • सर्वहारा (श्रमिक) वर्ग :
    इस वर्ग के पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व नहीं होता। वस्तुतः यह वर्ग उत्पादन का साधन होता है। बुर्जुआ अथवा पूँजीपति वर्ग अधिक लाभ अर्जित करने के लिए इनका शोषण करता है। यह शोषित वर्ग है।

प्रश्न 8.
‘अपने लिए वर्ग’ को समझाइए।
उत्तर:
अपने लिए वर्ग अर्थात् क्लास फॉर इट सेल्फ वर्ग चेतना के सम्बन्ध में समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स द्वारा प्रतिपादित एक अवधारणा है। जब किसी कार्य या व्यवसाय को करने वाले स्वयं को उस वर्ग को समर्पित करते हैं तथा वर्ग के लिए कुछ भी कर सकते हैं तो इस स्थिति को अपने लिए वर्ग कहा जाता है।

प्रश्न 9.
दुर्थीम ने समाज में श्रम विभाजन के कौन-कौन से कारण बताये हैं?
उत्तर:
समाजशास्त्री इमाईल दुर्थीम ने श्रम विभाजन के निम्नलिखित कारण बताए हैं :

  • जनसंख्या के आकार व घनत्व में वृद्धि :
    दुर्थीम श्रम विभाजन का प्राथमिक कारण जनसंख्या का आकार व उसके घनत्व में वृद्धि को मानते हैं अर्थात् जैसे-जैसे समाज की जनसंख्या के आकार व घनत्व में वृद्धि होती है, उसी के अनुरूप श्रम विभाजन में भी वृद्धि होती है। प्राचीन समय में जनसंख्या का आकार व घनत्व कम था इसलिए वहाँ श्रम विभाजन न के बराबर था लेकिन जैसे-जैसे समाज की जनसंख्या के आकार व घनत्व में वृद्धि हुई तद्नुरूप श्रम विभाजन व विशेषीकरण में भी वृद्धि हुई।
  • पैतृकता का घटता प्रभाव :
    समाजशास्त्री दुर्थीम के अनुसार पैतृकता का जितना प्रभाव होता है परिवर्तन के अवसर भी उतने ही कम होते हैं। पैतृकता के आधार पर जब समाज में व्यवसाय अथवा कार्यों का विभाजन किया जाता है तो श्रम विभाजन को विकसित होने में बाधा उत्पन्न होती है लेकिन जब पैतृकता कमजोर होती है तो श्रम विभाजन अधिक होता है।

प्रश्न 10.
यान्त्रिक एकता वाले समाज कौन से समाज को इंगित करते हैं?
उत्तर:
यान्त्रिक एकता वाले समाज सरल, आदिम व प्राचीन समाज को इंगित करते हैं। इस प्रकार की एकता वाले समाजों में लोगों की परिस्थितियों एवं भूमिकाओं में विचारों, विश्वासों और जीवन शैलियों में मानसिकता, सामाजिक और नैतिकता में समानता पायी जाती है। इस प्रकार के समाजों का आकार बहुत छोटा होता है इसलिए लोगों की आवश्यकताएँ सीमित तथा समान होती हैं। उन पर परम्परा जनमत और धर्म का नियन्त्रण और दबाव होता है।

इस प्रकार के समाजों में व्यक्ति का व्यक्तित्व समूह के अस्तित्व में मिल जाता है। वह समूह के साथ यन्त्रवत् सोचता, कार्य करता एवं आज्ञाओं का पालन करता है। ऐसे समाजों में श्रम विभाजन व विरोधीकरण नगण्य होता है इसलिए इस प्रकार के समाजों को ‘यान्त्रिक एकता’ कहा गया है।

प्रश्न 11.
आधुनिक समाजों में कानून का क्या स्वरूप होता है?
उत्तर:
आधुनिक समाजों में कानून का स्वरूप प्रतिकारी होता है, जिसमें व्यक्ति को सुधरने का मौका प्रदान किया जाता है। आधुनिक समाजों के कानून मानवाधिकारों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।

प्रश्न 12.
वेबर ने सामाजिक क्रिया को कैसे परिभाषित किया है?
उत्तर:
सामाजिक क्रिया को परिभाषित करते हुए वेबर लिखते हैं कि “किसी क्रिया को सामाजिक क्रिया तभी कहा जा सकता है जबकि इस क्रिया को करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों के कारण यह क्रिया दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार द्वारा प्रभावित हो और उसी के अनुसार उसकी गतिविधि निर्धारित हो।”

समाजशास्त्री वेबर की दृष्टि में कोई भी व्यवहार या गतिविधि अपने आप में कुछ भी नहीं है, किन्तु यदि व्यवहार या क्रिया को करने में कर्ता किसी अर्थ को जोड़ता है तो वह क्रिया सामाजिक क्रिया बन जाती है।

प्रश्न 13.
सामाजिक क्रिया की कोई तीन विशेषताएँ बतलाइए।
उत्तर:
सामाजिक क्रिया की तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :

  1. सामाजिक क्रिया किसी-न-किसी सामाजिक व्यवहार से प्रभावित होती है। चाहे वह व्यवहार भूतकाल, वर्तमान या भावी किसी भी काल में किया गया हो।
  2. सामाजिक क्रिया की श्रेणी में वही क्रिया आएगी जिसमें एक से अधिक कर्ता एक-दूसरे को अपने कार्य द्वारा प्रभावित करें।
  3. जब व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से सम्पर्क में आने के बाद उसे प्रभावित करे तो वह सामाजिक क्रिया की . श्रेणी में आएगा। यदि ऐसा नहीं होता तो किया गया कार्य सामाजिक क्रिया की श्रेणी में नहीं आएगा।

प्रश्न 14.
तार्किक क्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
‘तार्किक क्रिया’ समाजशास्त्री मैक्स वेबर की अवधारणा है। इसे वे ‘लक्ष्य के प्रति अभिस्थापित’ भी कहते हैं। वेबर के अनुसार तार्किक क्रिया में तर्क तथा विशिष्ट उद्देश्य को महत्वपूर्ण माना जाता है। इस प्रकार की क्रियाओं को करते समय व्यक्ति अपने लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए तर्क के आधार पर क्रिया करता है। इसलिए वेबर इस प्रकार की क्रिया को ‘लक्ष्य के प्रति अभिस्थापित’ कहते हैं। उदाहरणार्थ, जब कोई इन्जीनियर किसी नदी पर पुल बनाता है तो वह तर्क के आधार पर निश्चित करता है कि पुल किस स्थान पर बनाया जाए ताकि उस पुल से अधिक से अधिक लाभ मिल सके तो ऐसी क्रिया तार्किक क्रिया की श्रेणी में आती है।

प्रश्न 15.
पूर्व देशों में वेबर के अनुसार कौन सी क्रियाएँ अधिक होती हैं?
उत्तर:
समाजशास्त्री मैक्स वेबर के अनुसार ‘परम्परात्मक क्रियाएँ’ अधिक होती हैं। ये सामाजिक क्रियाएँ प्रचलित प्रथाओं, परम्पराओं आदि के प्रभाव से निर्देशित होती हैं। मृत्युभोज, जाति में विवाह आदि परम्परात्मक क्रियाओं के ही उदाहरण हैं।

RBSE Class 11 Sociology Chapter 9 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अगस्त कॉम्ट द्वारा दी गई चिन्तन की अवस्थाओं को समझाइए।
उत्तर:
‘समाजशास्त्र के जनक’ कहे जाने वाले समाजशास्त्री अगस्त कॉम्ट ने समाजशास्त्र में विषयवस्तु के अध्ययन के लिए चिन्तन की तीन अवस्थाओं का नियम प्रतिपादित किया। इस नियम के अन्तर्गत सन्निहित अवयव निम्नलिखित हैं

(क) धर्मशास्त्रीय अवस्था :
दुर्थीम के अनुसार इस अवस्था में सभी घटनाओं की व्याख्या धार्मिक आधार पर की जाती है। इस अवस्था में मनुष्य हर एक घटना के पीछे अलौकिक सत्ता को कारण मानता है। कॉम्ट ने धार्मिक अवस्था के निम्नलिखित तीन भेद बताए हैं.

  • प्रेतवाद :
    धर्मशास्त्रीय अवस्था के तहत सबसे प्रारम्भिक अवस्था को प्रेतवाद कहा जाता है। प्रेतवाद की अवस्था में ऐसा माना जाता है कि प्रत्येक जड़ एवं चेतन वस्तु में एक जीव होता है। सभी अलौकिक शक्तियाँ इसको परिचालित करती हैं।
  • बहुदेववाद :
    प्रेतवाद की बाद की अवस्था बहुदेववाद कहलाती है। इस अवस्था में आदिम मानव ने शक्तियों को वर्गीकृत कर लिया और विभिन्न देवताओं की स्थापना भी कर ली। इन देवताओं के अपने-अपने अलग विभाग थे। इस अवस्था में स्थिति पहले से कुछ अधिक व्यवस्थित एवं सुनिश्चित थी।
  • एकेश्वरवाद :
    यह मानव के बौद्धिक विकास का परिणाम है। एकेश्वरवाद का आविष्कार पूर्व की अव्यवस्थित एवं अबौद्धिक धारणाओं को समाप्त करने के लिए हुआ था। इस अवस्था में यह माना जाता है पूरे विश्व का परिपालन केवल एक ही ईश्वर करता है और इस ईश्वर की परम सत्ता और परम शक्ति है।

(ख) तात्विक अवस्था :
समाजशास्त्री अगस्त कॉम्ट के अनुसार चिन्तन की दूसरी अवस्था तात्विक अवस्था है। वस्तुतः चिन्तन एवं बौद्धिकता के विकास के फलस्वरूप मानव की समस्याएँ बढ़ गईं। धर्मशास्त्रीय चिन्तन उन समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त नहीं था। संसार में विरोधी प्रवृत्तियों के साथ दर्शन होने की अवस्था में एकेश्वरवाद मानव को संतुष्ट नहीं कर सकता था। इसलिए तात्विक या अमूर्त या तत्व दार्शनिक चिन्तन को अपनाया गया। इस दर्शन के अन्तर्गत अमूर्त अलौकिक सत्ता को स्वीकार किया जाता है।

(ग) वैज्ञानिक या प्रत्यक्षवादी अवस्था :
धर्मशास्त्रीय एवं तात्विक अवस्था के बाद वैज्ञानिक अथवा प्रत्यक्षवादी अवस्था आती है। धर्मशास्त्रीय एवं तात्विक दर्शन के अन्तर्गत जो भी ज्ञान प्राप्त किया जाता है वह अनुमान तथा कल्पना पर ही आधारित होता है। उपर्युक्त दोनों चिन्तन में निश्चितता के अभाव को समाप्त करने के लिए वैज्ञानिक चिन्तन अपनाया जाता है। वैज्ञानिक चिन्तन तथ्यों एवं प्रमाणों पर आधारित होता है। इसमें कल्पना का महत्व नहीं होता है।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर हम कह सकते हैं कि सामाजिक चिन्तन एवं नए सामाजिक विज्ञान की रचना के क्षेत्र में कॉम्ट द्वारा प्रतिपादित चिन्तन की तीन अवस्थाओं के नियम उनकी महत्वपूर्ण देन हैं।

प्रश्न 2.
कार्ल मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
कार्ल मार्क्स का वर्ग संघर्ष सम्बन्धी सिद्धान्त :
समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स का वर्ग संघर्ष सम्बन्धी सिद्धान्त उनके गहन अध्ययन का परिणाम था। वस्तुतः मार्क्स ने जो कुछ भी लिखा है उसका सम्पूर्ण सन्दर्भ वर्ग व्यवस्था के विश्लेषण पर ही आधारित है। उनकी पुस्तक “दास कैपिटल” का प्रारम्भ ही इस उल्लेख के साथ होता है कि अभी तक अस्तित्व में रहे समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। मनुष्य के अस्तित्व में आने के पश्चात् जितने भी समाज रहे हैं उन सभी समाजों में वर्ग रहे और उन सभी वर्गों में संघर्ष भी रहा है। यह वर्ग मालिक-गुलाम, राजा-प्रजा, जमींदार-कृषक, पूँजीपति-श्रमिक के रूप में विद्यमान रहे हैं।

कार्ल मार्क्स के वर्ग संघर्ष सम्बन्धी सिद्धान्त के वृहद परिप्रेक्ष्य को देखते हुए ही रेमण्ड एवं मार्क्स की विचारधारा पर अपनी पुस्तक ‘मेनकरेन्ट्स इन सोशियोलॉजिकल थॉट’ में लिखा है कि मार्क्स का समाजशास्त्र वास्तव में वर्ग संघर्ष का समाजशास्त्र है। कार्ल मार्क्स के वर्ग संघर्ष सिद्धान्त का केन्द्रीय भाव यह है कि इतिहास के प्रत्येक युग और प्रत्येक समाज में सदैव ही विरोधी वर्ग रहे हैं-शोषक और शोषित वर्ग। ये दोनों वर्ग परस्पर संघर्षरत रहे हैं। इस संघर्ष का मुख्य कारण उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व स्थापित करने की लालसा है।

कार्ल मार्क्स का ऐसा मानना है कि वर्गों के निर्माण से ही संघर्ष प्रारम्भ नहीं होता है बल्कि उसका एक चरण होता है अर्थात् सर्वप्रथम समाज में वर्ग अस्तित्व में आते हैं, उसके उपरान्त वर्ग चेतना आती है। वर्ग चेतना का मुख्य कारण शोषण होता है। जब यह शोषण असहनीय हो जाता है तो वर्ग चेतना में भी तीव्रता से वृद्धि होती है और वर्ग में वर्ग चेतना की भावना के विकास के साथ ही संघर्ष प्रारम्भ होता है। यहाँ संघर्ष अपने-अपने हितों को ध्यान में रखकर किया जाता है। संघर्ष भी पहले वार्तालाप, विरोध का रूप लेते हुए अन्त में खूनी संघर्ष में बदलता है तथा उस खूनी संघर्ष के बाद में ही समाज में नई अवस्था आती है। पुनः नये वर्गों का निर्माण होता है फिर संघर्ष होता है। यह प्रक्रिया मार्क्स के अनुसार अनवरत चलती रहती है।

प्रश्न 3.
इमाईल दुर्शीम की श्रम विभाजन की व्याख्या क्या है? समझाइए।
उत्तर:
समाजशास्त्री इमाईल दुर्थीम पहले विचारक थे जिन्होंने श्रम विभाजन की अवधारणा को आर्थिक आधार पर समझाते हुए उसे सामाजिक आधार पर समझाने का प्रयास किया। दुर्थीम का यह मानना है कि व्यक्ति व समाज के बीच सम्बन्धों के आधार पर ही समाज में श्रम विभाजन होता है। दुर्थीम द्वारा प्रतिपादित श्रम विभाजन की अवधारणा को हम निम्नलिखित तरह से समझ सकते हैं :

(क) दुर्थीम ने सामाजिक एकता के लिए श्रम विभाजन को आधार माना है तथा उसके वैज्ञानिक अध्ययन के लिए कानून के स्वरूप, एकता के स्वरूप, मानवीय सम्बन्धों के स्वरूप, अपराध, दण्ड, सामाजिक उद्विकास आदि अनेक समस्याओं और अवधारणाओं की व्याख्या की है।

(ख) प्रकार्यवादी समाजशास्त्री के रूप में दुर्थीम का श्रम विभाजन से तात्पर्य यह है कि सामाजिक कार्यों का विभाजन होता है अर्थात् समाज में भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य होते हैं, उन कार्यों को भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा किया जाना ही श्रम विभाजन है-भारतीय वर्ण व्यवस्था जिसमें ब्राह्मणों द्वारा अध्ययन-अध्यापन, क्षत्रियों द्वारा देश की आन्तरिक व बाहरी सुरक्षा, वैश्यों द्वारा व्यापार व वाणिज्य तथ शूद्रों द्वारा उपर्युक्त तीनों वर्गों के सेवा सम्बन्धी कार्य करना सामाजिक श्रम विभाजन का उत्तम उदाहरण है।

(ग) दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन में ही सामाजिक एकता छिपी होती है। किसी भी समाज का विकास उसकी एकता में निहित है। जब तक समाज के लोगों में एक-दूसरे के प्रति लगाव नहीं होता है तब तक वे एक-दूसरे के निकट आने की आवश्यकता महसूस नहीं करते किन्तु लगाव केवल समानता में ही नहीं होता। यह भिन्नता व असमानता में भी होता है, जैसे-भारत में जातीय, भाषायी, क्षेत्रीय, धार्मिक, सांस्कृतिक कई प्रकार की भिन्नताएँ होते हुए भी समानता यह है कि हम भारतीय समाज के अंग हैं। यह भिन्नता हमें साथ मिलकर कार्य करने के लिए बाध्य करती है। इस प्रकार दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन में ही सामाजिक एकता छिपी हुई होती है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि समाजशास्त्री इमाईल दुर्थीम ने श्रम विभाजन की व्याख्या सामाजिक आधार पर प्रस्तुत की है।

प्रश्न 4.
मैक्स वेबर के सामाजिक क्रिया सिद्धान्त को समझाइए।
उत्तर:
मैक्स वेबर का सामाजिक क्रिया सिद्धान्त :
मैक्स वेबर ने ‘सामाजिक क्रिया’ को समाजशास्त्र की विषयवस्तु मानते हुए उसे केन्द्रीय अध्ययन की वस्तु माना है। वेबर ने सामाजिक क्रिया की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की है। समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति को दर्शाने के लिए उन्होंने ‘सामाजिक क्रिया सिद्धान्त का सहारा लिया। उनका यह सिद्धान्त आदर्श प्रारूप का एक प्रकार हैं इस सिद्धान्त को मैक्स वेबर ने अपनी पुस्तक ‘सामाजिक और आर्थिक संगठन’ में प्रतिपादित किया।

समाजशास्त्री मैक्स वेबर के अनुसार सामाजिक सम्बन्धों के निर्माण के लिए हमें विभिन्न लोगों से अन्त:क्रिया करनी पड़ती है। इन अन्तः क्रियाओं से ही सामाजिक सम्बन्धों का निर्माण होता है। सामाजिक सम्बन्धों से समाज की क्रिया के लिए चार आवश्यक तत्व हैं। वे हैं

  1. कर्त्ता
  2. लक्ष्य
  3. साधन
  4. परिस्थिति

अर्थात् किसी भी क्रिया को करने के लिए एक से अधिक कर्ता होने चाहिए, उन कर्ताओं का कोई लक्ष्य होना चाहिए। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कर्ता के पास कोई साधन भी होना चाहिए तथा उपर्युक्त सभी के साथ सामाजिक परिस्थिति भी अनुकूल होनी चाहिए, जिसमें कर्ता लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए उचित साधनों का प्रयोग करते हुए किसी कार्य को सम्पन्न कर सके। समाजशास्त्रीय दृष्टि से सभी प्रकार की क्रियाएँ सामाजिक क्रियाएँ नहीं होती हैं वरन् केवल वे क्रियाएँ ही जो अर्थपूर्ण होती हैं और जिनका सम्बन्ध व्यक्ति के भूतकाल; वर्तमान या भविष्य के व्यवहार से होता है, सामाजिक क्रियाएँ कहलाती हैं।

सामाजिक क्रिया को परिभाषित करते हुए मैक्स वेबर लिखते हैं कि “किसी क्रिया को सामाजिक क्रिया तभी कहा जा सकता है जबकि इस क्रिया को करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों के कारण यह क्रिया दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार द्वारा प्रभावित हो और उसी के अनुसार उसकी गतिविधि निर्धारित हो।” इस परिभाषा से स्पष्ट है कि किसी भी क्रिया को सामाजिक क्रिया कहलाने के लिए आवश्ययक है कि हम उसमें व्यक्तियों के वैयक्तिक दृष्टिकोण को समझें। अर्थात् व्यक्ति या कर्ता उस व्यवहार का क्या अर्थ लगाता है। वेबर के अनुसार कोई भी व्यवहार या गतिविधि अपने आप में कुछ भी नहीं है, किन्तु यदि व्यवहार या क्रिया को करने में कर्ता किसी अर्थ को जोड़ता है तो वह क्रिया सामाजिक क्रिया बन जाती है।

सामाजिक क्रिया समाजशास्त्र के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करती है। सामाजिक क्रिया के अध्ययन से हम यह ज्ञात कर सकते हैं कि व्यक्ति कोई भी क्रिया किन कारणों से कर रहा है और उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। अर्थात् सामाजिक क्रिया सिद्धान्त क्रियाओं के बीच कार्य-कारण प्रभाव सम्बन्धों को ज्ञात किया जाता है।

RBSE Class 11 Sociology Chapter 9 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 Sociology Chapter 9 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
समाजशास्त्री अगस्त कॉम्ट ने समाजशास्त्र को सर्वप्रथम जो नाम दिया, वह था
(अ) सामाजिक मनोविज्ञान
(ब) सामाजिक भौतिकी
(स) सामाजिक नीतिशास्त्र
(द) सामाजिक संहिता।
उत्तर:
(ब) सामाजिक भौतिकी

प्रश्न 2.
‘रिलीजन ऑफ ह्यूमिनिटी’ कृति है
(अ) अगस्त कॉम्ट की
(ब) लेनिन की
(स) इमाईल दर्खाम की
(द) कार्ल मार्क्स की।
उत्तर:
(अ) अगस्त कॉम्ट की

प्रश्न 3.
अगस्त कॉम्ट के चिन्तन के नियम में अवस्थाएँ हैं
(अ) दो
(ब) तीन
(स) चार
(द) पाँच।
उत्तर:
(ब) तीन

प्रश्न 4.
धर्मशास्त्रीय अवस्था में सबसे प्रारम्भिक अवस्था है
(अ) एकेश्वरवाद
(ब) बहुदेववाद
(स) प्रेतवाद
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(स) प्रेतवाद

प्रश्न 5.
धर्मशास्त्रीय अवस्था का अन्तिम चरण है
(अ) बहुदेववाद
(ब) प्रेतवाद
(स) आदर्शवाद
(द) एकेश्वरवाद।
उत्तर:
(द) एकेश्वरवाद।

प्रश्न 6.
वैज्ञानिक चिन्तन आधारित होता है
(अ) कल्पनाओं पर
(ब) ऐतिहासिक कहानियों पर
(स) तथ्यों व प्रमाणों पर
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(स) तथ्यों व प्रमाणों पर

प्रश्न 7.
प्रत्यक्षवाद में निम्नलिखित में से कितने तरीके समाहित हैं?
(अ) चार
(ब) पाँच
(स) छः
(द) कोई सीमा नहीं होती।
उत्तर:
(अ) चार

प्रश्न 8.
कार्ल मार्क्स की इच्छा उनको बनाने की थी
(अ) चिकित्सक
(ब) अभियन्ता
(स) अध्यापक
(द) अधिवक्ता।
उत्तर:
(द) अधिवक्ता।

प्रश्न 9.
कार्ल मार्क्स फ्रांस छोड़कर इंग्लैण्ड गए
(अ) सन् 1833 में
(ब) सन् 1845 में
(स) सन् 1855 में
(द) सन् 1847 में।
उत्तर:
(ब) सन् 1845 में

प्रश्न 10.
‘द पावर्टी ऑफ फिलासॉफी’ के लेखक है
(अ) मैक्स वेबर.
(ब) इमाईल दुर्थीम
(स) कार्ल मार्क्स
(द) लेनिन।
उत्तर:
(स) कार्ल मार्क्स

प्रश्न 11.
रेमण्ड ऐरा ने मार्क्स की विचारधारा को कहा है
(अ) वर्ग संघर्ष का समाजशास्त्र
(ब) समन्वय का समाजशास्त्र
(स) सम्प्रभुता का समाजशास्त्र
(द) सहगामी क्रियाओं का समाजशास्त्र।
उत्तर:
(अ) वर्ग संघर्ष का समाजशास्त्र

प्रश्न 12.
Classis शब्द है
(अ) अंग्रेजी भाषा का
(ब) लैटिन भाषा का
(स) फ्रांसीसी भाषा का
(द) पस्तो भाषा का।
उत्तर:
(ब) लैटिन भाषा का

प्रश्न 13.
समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स के अनुसार वर्गों का आधार रहा है
(अ) सामाजिक
(ब) सांस्कृतिक
(स) आर्थिक
(द) राजनैतिक।
उत्तर:
(स) आर्थिक

प्रश्न 14.
‘क्लास फार इट सेल्फ’ का अभिप्राय है
(अ) अपने आप में वर्ग
(ब) वर्ग में उपवर्ग
(स) उपवर्ग में सहवर्ग
(द) अपने लिए वर्ग।
उत्तर:
(द) अपने लिए वर्ग।

प्रश्न 15.
वर्ग चेतना का मुख्य कारण होता है
(अ) प्रोत्साहन
(ब) शोषण
(स) सहयोग
(द) सांत्वना।
उत्तर:
(ब) शोषण

प्रश्न 16.
कार्ल मार्क्स के अनुसार पूँजीवादी व्यवस्था के बाद आएगा
(अ) आधुनिक साम्यवादी युग
(ब) नवागन्तुक सामन्ती युग
(स) नवोन्मेषी आधुनिक युग
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) आधुनिक साम्यवादी युग

प्रश्न 17.
समाजशास्त्री इमाईल दुर्शीम निम्नलिखित में से किनके लेखों से अत्यधिक प्रभावित हुए?
(अ) ग्राहम बेल एवं न्यूटन
(ब) अगस्त कॉम्ट एवं विल्हेमवुन्ट
(स) चार्ल्स वेबैज एवं मैक डोनाल्ड
(द) जेम्स बाण्ड एवं विलियम हार्वे।
उत्तर:
(ब) अगस्त कॉम्ट एवं विल्हेमवुन्ट

प्रश्न 18.
‘डिविजन ऑफ लेवर इन सोसायटी’ का प्रकाशन हुआ..
(अ) 1865 ई. में
(ब) 1875 ई. में
(स) 1893 ई. में
(द) 1899 ई. में।
उत्तर:
(स) 1893 ई. में

प्रश्न 19.
‘आत्महत्या का सिद्धान्त प्रतिपादित किया
(अ) कार्ल मार्क्स ने
(ब) अगस्त कॉम्ट ने
(स) मैक्स वेबर ने
(द) इमाईल दुर्थीम ने।
उत्तर:
(द) इमाईल दुर्थीम ने।

प्रश्न 20.
‘यान्त्रिक एकता’ विशेषता है
(अ) सरल समाजों की
(ब) जटिल समाजों की
(स) पशु समाजों की
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) सरल समाजों की

प्रश्न 21.
‘सावयवी एकता’ पायी जाती है
(अ) प्राचीन समाजों में
(ब) सरल समाजों में
(स) आधुनिक समाजों में
(द) इन सभी में।
उत्तर:
(स) आधुनिक समाजों में

प्रश्न 22.
मैक्स वेबर वियना विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बने
(अ) 1918 ई. में
(ब) 1920 ई. में
(स) 1921 ई. में
(द) 1925 ई. में।
उत्तर:
(अ) 1918 ई. में

प्रश्न 23.
‘दी सिटी’ रचना है
(अ) इमाईल दुर्थीम की
(ब) मैक्स वेबर की
(स) अगस्त कॉम्ट की
(द) कार्ल मार्क्स की।
उत्तर:
(ब) मैक्स वेबर की

RBSE Class 11 Sociology Chapter 9 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र (Sociology) शब्द का निर्माण किस भाषा के किन शब्दों से मिलकर हुआ है?
उत्तर:
समाजशास्त्र (Sociology) शब्द का निर्माण सोशियस (Socius) और लोगिया (Logia) शब्दों से हुआ है। ये शब्द क्रमशः लैटिन एवं ग्रीक भाषा के हैं।

प्रश्न 2.
अगस्त कॉम्ट का पूरा नाम क्या था?
उत्तर:
अगस्त कॉम्ट का पूरा नाम अगस्त मैरी फ्रेकाइज जेवियर कॉम्ट था।

प्रश्न 3.
प्रत्यक्षवाद का प्रतिपादन किस समाजशास्त्री ने किया?
उत्तर:
प्रत्यक्षवाद का प्रतिपादन समाजशास्त्री अगस्त कॉम्ट ने किया।

प्रश्न 4.
अगस्त कॉम्ट के चिन्तन की तीन अवस्थाओं के नियम में कितने उपादान अथवा अंग हैं? प्रत्येक का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अगस्त कॉम्ट के चिन्तन की तीन अवस्थाओं में तीन उपादान अथवा अंग हैं..-धर्मशास्त्रीय अवस्था, तात्विक अवस्था एवं वैज्ञानिक या प्रत्यक्षवादी अवस्था।

प्रश्न 5.
धर्मशास्त्रीय अवस्था में कितने उपस्तर हैं?
उत्तर:
धर्मशास्त्रीय अवस्था में तीन उपस्तर हैं-प्रेतवाद, बहुदेववाद, एकेश्वरवाद।

प्रश्न 6.
तात्विक अवस्था के अनुसार सभी घटनाएँ किसके द्वारा परिचालित होती हैं?
उत्तर:
तात्विक अवस्था के अनुसार संसार की सभी घटनाएँ अमूर्त एवं अवैयक्तिक सत्ता द्वारा परिचालित होती हैं।

प्रश्न 7.
अगस्त कॉम्ट ने समाजशास्त्रियों को किन तरीकों से समाज की घटनाओं का अध्ययन करने का सुझाव दिया है?
उत्तर:
समाजशास्त्री अगस्त कॉम्ट ने अवलोकन पद्धति, परीक्षण पद्धति, तुलनात्मक पद्धति एवं ऐतिहासिक पद्धति के आधार पर समाजशास्त्रियों को समाज की घटनाओं का अध्ययन करने का सुझाव दिया।

प्रश्न 8.
‘अवलोकन’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अवलोकन मानव इन्द्रियों द्वारा किया गया क्रमबद्ध व व्यवस्थित अध्ययन है।

प्रश्न 9.
किस पद्धति को अगस्त कॉम्ट ने वैज्ञानिक नहीं माना किन्तु समाजशास्त्र के अध्ययन में उसे जरूरी बताया?
उत्तर:
ऐतिहासिक पद्धति।

प्रश्न 10.
प्रत्यक्षवाद को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
प्रत्यक्षवाद ‘क्या’ है का अध्ययन है। दूसरे शब्दों में जो घटना जिस रूप में घट रही है उसे उसी रूप में प्रस्तुत करना ही प्रत्यक्षवाद है।

प्रश्न 11.
कार्ल मार्क्स ने किस विश्वविद्यालय से किस विषय पर डॉक्ट्रेट की उपाधि प्राप्त की?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने जेना विश्वविद्यालय से ‘ऐपीक्यूरस तथा डैमोक्राइटस के भौतिकवाद का आलोचनात्मक विवेचन’ विषय पर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। विषय पर डाक्ट की उपाधि प्राप्त की

प्रश्न 12.
‘कम्युनिस्ट सिद्धान्त’ का प्रतिपादन किनके द्वारा किया गया?
उत्तर:
कम्युनिस्ट सिद्धान्त का पतिपादन कार्ल मार्क्स और उनके मित्र फ्रेडरिक एन्जिल्स द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।

प्रश्न 13.
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धान्त किस समाजशास्त्री ने प्रतिपादित किया?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने।

प्रश्न 14.
कार्ल मार्क्स का सम्पूर्ण समाजशास्त्रीय कार्य किस पर आधारित था?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स का सम्पूर्ण समाजशास्त्रीय कार्य वर्ग व्यवस्था के विश्लेषण पर आधारित था।

प्रश्न 15.
“सामाजिक वर्ग ऐतिहासिक परिवर्तन की इकाइयाँ तथा आर्थिक व्यवस्था द्वारा समाज में निर्मित श्रेणियाँ दोनों ही हैं” यह कथन किसका है?
उत्तर:
समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स का।

प्रश्न 16.
कार्ल मार्क्स के अनुसार वर्ग की संरचना कैसे निर्मित होती है?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स के अनुसार वर्ग की संरचना वर्ग चेतना एवं वर्ग संगठन द्वारा निर्मित होती है।

प्रश्न 17.
‘अपने आप में वर्ग’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समाजशास्त्री कार्ल मार्क्स के अनुसार जब किसी कार्य को करने के लिए लोग संगठित हो जाते हैं और उनमें यह चेतना आ जाती है कि हम एक ही तरीके के कार्य या पेशे में हैं तो इस तरह के समूह ‘अपने आप में वर्ग’ कहलाते हैं। कार्ल मार्क्स ने इसे क्लास इन इट सेल्फ भी कहा है।

प्रश्न 18.
कार्ल मार्क्स ने विभिन्न समाजों में वर्ग व्यवस्था का उल्लेख कितने रूपों में किया है?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने विभिन्न समाजों में वर्ग व्यवस्था का उल्लेख चार रूपों में किया है :

  1. आदिम साम्यवादी समाज में वर्ग,
  2. दासत्व युग में वर्ग,
  3. सामन्ती समाज में वर्ग,
  4. पूँजीवादी समाज में वर्ग।

प्रश्न 19.
पूँजीवादी समाज में मार्क्स ने किन दो वर्गों का उल्लेख किया है?
उत्तर:
पूँजीवादी समाज में कार्ल मार्क्स ने दो वर्गों का उल्लेख किया है :

  1. सर्वहारा वर्ग (श्रमिक वर्ग)
  2. बुर्जुआ वर्ग (पूँजीपति वर्ग)।

प्रश्न 20.
मार्क्स ने वर्ग संघर्ष की अवधारणा किससे प्राप्त की थी?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने वर्ग संघर्ष की अवधारणा ऑगस्टिन थोरे से प्राप्त की थी।

प्रश्न 21.
‘द रूल्स ऑफ सोशियोलॉजिकल मेथड्स’ का प्रकाशन कब हुआ? इसके लेखक कौन हैं?
उत्तर:
उपर्युक्त पुस्तक का प्रकाशन सन् 1895 में हुआ। इसके लेखक समाजशास्त्री इमाईल दुर्थीम हैं।

प्रश्न 22.
‘सामूहिक चेतना की अवधारणा’ किस समाजशास्त्री ने प्रस्तुत की?
उत्तर:
समाजशास्त्री इमाईल दुर्थीम ने।

प्रश्न 23.
श्रम विभाजन को सामाजिक आधार पर समझाने का प्रयत्न सर्वप्रथम किस समाजशास्त्री ने किया?
उत्तर:
समाजशास्त्री इमाईल दुर्शीम ने।

प्रश्न 24.
दुर्शीम ने सामाजिक एकता के लिए किस वस्तुस्थिति को आधार माना?
उत्तर:
दुर्थीम ने सामाजिक एकता के लिए श्रम विभाजन को आधार माना।

प्रश्न 25.
श्रम विभाजन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समाज में अलग-अलग प्रकार के कार्य होते हैं। इन कार्यों को भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा किया जाना ही श्रम विभाजन है।

प्रश्न 26.
यान्त्रिक एकता एवं सावयवी एकता की अवधारणा किस समाजशास्त्री ने प्रस्तुत की?
उत्तर:
समाजशास्त्री इमाईल दुर्थीम ने।

प्रश्न 27.
‘सामाजिक तथ्य’ का सम्बन्ध किस समाजशास्त्री से है?
उत्तर:
सामाजिक तथ्य का सम्बन्ध समाजशास्त्री इमाईल दुर्थीम से है।

प्रश्न 28.
समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने किस विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई प्रारम्भ की।
उत्तर:
हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय से।

प्रश्न 29.
समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने किस विषयवस्तु को समाजशास्त्र की केन्द्रीय अध्ययन की वस्तु माना?
उत्तर:
सामाजिक क्रिया को।

प्रश्न 30.
‘दि हिन्दू सोशयल सिस्टम’ किसकी कृति है? यह कब प्रकाशित हुई?
उत्तर:
‘दि हिन्दू सोशयल सिस्टम’ समाजशास्त्री मैक्स वेबर की कृति है। यह सन् 1950 में प्रकाशित हुई।

प्रश्न 31.
‘सामाजिक क्रिया सिद्धान्त’ का प्रतिपादन किस समाजशास्त्री ने किया?
उत्तर:
समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने।

प्रश्न 32.
समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने सामाजिक क्रिया के तहत कितनी प्रकार की क्रियाओं का उल्लेख किया है?
उत्तर:
चार प्रकार की क्रियाओं का उल्लेख किया है :

  1. तार्किक क्रिया,
  2. मूल्यात्मक क्रिया,
  3. भावनात्मक क्रिया,
  4. परम्परात्मक क्रिया।

RBSE Class 11 Sociology Chapter 9 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अगस्त कॉम्ट द्वारा समाजशास्त्र का उद्भव कैसे हुआ? संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
अगस्त कॉम्ट ने मानव समाज के समझने के लिए समाजशास्त्र की स्थापना की। इसीलिए इन्हें ‘समाजशास्त्र का जनक’ कहा जाता है। कॉम्ट समाजशास्त्र को वास्तविक विज्ञान बनाना चाहते थे जो मानव जाति के भूतकालीन विकास तथा भविष्य के बारे में बता सके। कॉम्ट ने पहले अपने इस विज्ञान को सामाजिक भौतिकी नाम दिया किन्तु बाद में इसे बदलकर ‘समाजशास्त्र’ कर दिया। समाजशास्त्र जिसे अंग्रेजी में ‘SOCIOLOGY’ कहा जाता है। इनका पहला शब्द सोशियस (SOCIUS) लैटिन तथा दूसरा शब्द लोगिया (LOGIA) ग्रीक भाषा से है। सोशियस का अर्थ समाज तथा लोगिया का अर्थ शास्त्र या विज्ञान होता है अर्थात् शाब्दिक रूप में समाजशास्त्र का अर्थ है-समाज का विज्ञान या शास्त्र।।

प्रश्न 2.
कॉम्ट की तीन अवस्थाओं के नियम के बारे में आप क्या जानते हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
सामाजिक चिन्तन एवं नए सामाजिक विज्ञान की रचना के दृष्टिकोण से कॉम्ट द्वारा प्रतिपादित चिन्तन की तीन अवस्थाओं का नियम उनकी एक महत्वपूर्ण देन है। सन् 1822 में कॉम्ट में मानव के बौद्धिक विकास को तीन स्तरों के नियम द्वारा प्रकट किया। कॉम्ट के अनुसार प्रत्येक विचारधारा एवं हमारे ज्ञान की प्रत्येक शाखा एक के बाद एक विभिन्न सैद्धान्तिक अवस्थाओं से होकर गुजरती है, जो निम्न प्रकार है :

  1. धर्मशास्त्रीय अवस्था।
  2. तात्त्विक अवस्था।
  3. वैज्ञानिक या प्रत्यक्षवादी अवस्था।

प्रश्न 3.
तात्विक अवस्था से आप क्या समझते हैं? समझाइए।
उत्तर:
तात्विक अवस्था समाजशास्त्री अगस्त कॉम्ट द्वारा प्रस्तुत चिन्तन की तीन अवस्थाओं में दूसरी अवस्था तात्विक अवस्था है। चिन्तन एवं बौद्धिकता के विकास के कारण मानव की समस्याएँ बढ़ गईं। धर्मशास्त्रीय चिन्तन उन समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त नहीं था। विश्व में विरोधी प्रवृत्तियों के साथ दर्शन होने की अवस्था में एकेश्वरवाद मानव को संतुष्ट नहीं कर सकता था। इसीलिए तात्त्विक चिन्तन को अपनाया गया। इस दर्शन के अन्तर्गत अमूर्त अलौकिक सत्ता को स्वीकार किया जाता है। इसके तहत यह माना जाता है कि संसार की सभी घटनाएँ अमूर्त एवं अवैयक्तिक सत्ता द्वारा संचालित होती हैं। चिन्तन की इस अवस्था में यह नहीं माना जाता है कि प्रत्येक जीव एवं वस्तु के पीछे एक मूर्त ईश्वर है।

प्रश्न 4.
वैज्ञानिक या प्रत्यक्षवादी अवस्था को समझाइए।
उत्तर:
वैज्ञानिक या प्रत्यक्षवादी अवस्था :
समाजशास्त्री अगस्त कॉम्ट द्वारा प्रस्तुत चिन्तन की तीन अवस्थाओं में यह अन्तिम अवस्था है। वैज्ञानिक या प्रत्यक्षवादी अवस्था तथ्यों एवं प्रमाणों पर आधारित होती है। इसमें कल्पना का महत्व नहीं होता है। वैज्ञानिक या प्रत्यक्षवादी अवस्था तथ्यों के अवलोकन द्वारा प्रारम्भ होती है। तथ्यों के अवलोकन के बाद उनका वर्गीकरण तथा सामान्यीकरण किया जाता है। प्राप्त परिणामों का तरह-तरह से परीक्षण किया जाता है। पर्याप्त परीक्षण के बाद नियम बनाये जाते हैं। ये नियम वैज्ञानिक नियम कहलाते हैं। वैज्ञानिक या प्रत्यक्षवादी अवस्था के चार अवयव होते हैं-अवलोकन पद्धति, परीक्षण पद्धति, तुलनात्मक पद्धति एवं ऐतिहासिक पद्धति।।

प्रश्न 5.
रेमण्ड ऍरा ने कार्ल मार्क्स की वर्ग की अवधारणा के विषय में क्या कहा है?
उत्तर:
रेमण्ड ऍरा ने कार्ल मार्क्स की वर्ग की अवधारणा के विषय में निम्नलिखित बातें कही हैं :

  1. वर्गों का अस्तित्व उत्पाद पद्धतियों के विकास के साथ इतिहास की विविध दशाओं के साथ जुड़ा है अर्थात वर्ग उत्पादन के विकास के साथ बनते हैं।
  2. वर्ग संघर्ष अनिवार्य रूप से सर्वहारा को अधिनायकवाद की ओर ले जाता है।
  3. यह अधिनायकवाद जो केवल संक्रमण काल होता है वर्गों का उन्मूलन करता है और वर्गहीन समाज की स्थापना की ओर ले जाता है।

प्रश्न 6.
पूँजीवादी समाज में वर्ग की प्रकृति पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
पूँजीवादी समाज की स्थापना मशीनों के आविष्कार और बड़े-बड़े उद्योगों के कारण हुई। इस समाज में उत्पादन के साधनों पर पूँजीपतियों का अधिकार होता है तथा उत्पादन का कार्य श्रमिकों के द्वारा कराया जाता है। कार्ल मार्क्स श्रमिक वर्ग को सर्वहारा वर्ग और पूँजीपति वर्ग को बुर्जुआ वर्ग कहते हैं। सर्वहारा वर्ग के पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व नहीं होता है बल्कि वे उत्पादन के साधन होते हैं, जबकि पूँजीपति के पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व होता है और वे अधिक लाभ कमाने के लिए सर्वहारा वर्ग का शोषण करते हैं।

प्रश्न 7.
वर्ग संघर्ष के उद्भव एवं विशेषता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
वर्ग संघर्ष की अवधारणा मार्क्स के महत्वपूर्ण विचारों में से एक है। काले मार्क्स ने वर्ग संघर्ष की अवधारणा ऑगस्टिन थोर नामक विचारक से ली थी किन्तु इसकी पूर्ण विवेचना मार्क्स ने ही की। मार्क्स यह मानते हैं कि इतिहास के प्रत्येक युग और प्रत्येक समाज में हमेशा से ही दो परस्पर विरोधी वर्ग रहे हैं। शोषक और शोषित वर्ग और यह दोनों वर्ग परस्पर संघर्षरत रहे हैं। इनमें संघर्ष से ही समाज के विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ती रही है और समाज का एक युग या अवस्था समाप्त होकर उनका स्थान दूसरा युग या अवस्था लेती रही है अर्थात् समाज में विभिन्न वर्ग होते हैं और उनके अपने-अपने हित होते हैं, जिन्हें लेकर उनमें विरोध और संघर्ष पाया जाता है। दोनों वर्गों के बीच संघर्ष होता है। उसका मुख्य कारण उत्पादन के साधनों का स्वामित्व है। दोनों ही वर्ग उत्पादन के साधनों पर अपना अधिकार जमाने के लिए संघर्ष करते हैं।

प्रश्न 8.
‘सावयवी एकता’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
‘सावयवी एकता’ समाजशास्त्री इमाईल दुखीम द्वारा प्रतिपादित अवधारणा है। इस प्रकार की एकता आधुनिक, जटिल, विकसित और औद्योगिक समाजों में पाई जाती है। समूह के सदस्यों में पायी जाने वाली विभिन्नताएँ इस एकता का आधार होती हैं। इसीलिए ऐसे समाजों को विभिन्नता की एकता वाला समाज भी कहा जाता है। इस प्रकार की एकता वाले समाजों में श्रम विभाजन व विशेषीकरण की प्रधानता होने के कारण भिन्नताएँ अधिक पायी जाती हैं। ये भिन्नताएँ समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बढ़ावा देती हैं तथा सामूहिक चेतना की भावना को कमजोर करती हैं। विभिन्नता युक्त आधुनिक समाजों में लोगों की आवश्यकताओं की अधिकता होती है, इसीलिए वे उनकी पूर्ति हेतु दूसरे लोगों पर अधिक निर्भर रहते हैं। जैसे शरीर के विभिन्न अंग एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं उसी प्रकार ऐसे समाज के भिन्न-भिन्न अंग भी एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं। ऐसे समाजों में प्रतिकारी कानून पाये जाते हैं जिनमें व्यक्ति को सुधरने का मौका दिया जाता है।

प्रश्न 9.
दुर्शीम की ‘सामाजिक एकता की अवधारणा’ का संक्षेप में विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
दुीम की ‘सामाजिक एकता की अवधारणा’ :
सामाजिक एकता की अवधारणा समाजशास्त्र को दुर्थीम की अनुपम देन है। दुर्थीम के अनुसार किसी भी समाज का विकास उसकी एकता में सन्निहित है। जब तक समाज के लोगों में एक दूसरे के प्रति लगाव नहीं होता है तब तक वे एक दूसरे के प्रति निकट आने की आवश्यकता अनुभव नहीं करते किन्तु लगाव केवल समानता में ही नहीं होता है वरन् यह भिन्नता व असमानता में भी होता है जैसे भारत में जातीय, भाषायी, क्षेत्रीय, धार्मिक, सांस्कृतिक कई प्रकार की भिन्नताएँ होते हुए भी समानता यह है कि हम भारतीय समाज के अंग हैं। यह भिन्नता हमें साथ मिलकर कार्य करने के लिए बाध्य करती है। इस प्रकार दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन में ही सामाजिक एकता छिपी हुई होती है।

प्रश्न 10.
सामाजिक क्रिया के सम्बन्ध में मैक्स वेबर के दृष्टिकोण को संक्षेप में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक क्रिया के सम्बन्ध में मैक्स वेबर का दृष्टिकोण :
समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने सामाजिक क्रिया को समाजशास्त्र की विषयवस्तु मानते हुए उसे केन्द्रीय अध्ययन की वस्तु माना है। मैक्स वेबर ने सामाजिक क्रिया की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की है। समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति को दर्शाने के लिए उन्होंने सामाजिक क्रिया सिद्धान्त का सहारा लिया। उनका यह सिद्धान्त आदर्श प्रारूप का एक प्रकार है। इस सिद्धान्त को इन्होंने अपनी पुस्तक ‘सामाजिक और आर्थिक संगठन’ में प्रतिपादित किया।

मैक्स वेबर की दृष्टि में सामाजिक सम्बन्धों के निर्माण के लिए हमें विभिन्न लोगों से अन्तः क्रिया करनी पड़ती है। इन अन्तः क्रियाओं से ही सामाजिक सम्बन्धों का निर्माण होता है।

RBSE Class 11 Sociology Chapter 9 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रत्यक्षवाद क्या है? विस्तृत विवेचना कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र की विषयवस्तुओं का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन करने के लिए अगस्त कॉम्ट ने प्रत्यक्षवाद को जन्म दिया। प्रत्यक्षवाद को विज्ञानवाद के नाम से भी जाना जाता है। प्रत्यक्षवाद के अनुसार ज्ञान का विकास निश्चित अवस्था में हुआ। कॉम्ट समाजशास्त्र को एक विज्ञान के रूप में स्थापित करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने समाजशास्त्र से वैज्ञानिक विधि के प्रयोग पर बल दिया। उनके अनुसार समाजशास्त्र को यदि विज्ञान की श्रेणी में लाना है तो समाजशास्त्रियों को निम्नलिखित चार पद्धतियों से समाज की घटनाओं का अध्ययन करना होगा :

  • अवलोकन पद्धति :
    अगस्त कॉम्ट के अनुसार सामाजशास्त्र को विज्ञान बनाना है तो इसमें अवलोकन पद्धति पर बल दिया जाना चाहिए। अवलोकन मानव इन्द्रियों द्वारा किया गया क्रमबद्ध व व्यवस्थित अध्ययन है। अर्थात् किसी भी घटना का मानव इन्द्रियों (आँख, कान, नाक व स्पर्श) द्वारा क्रमबद्ध व व्यवस्थित तरीके से अध्ययन किया जाता है तो वह शास्त्र विज्ञान की श्रेणी में आता है।
  • परीक्षण पद्धति :
    कॉम्ट के अनुसार समाजशास्त्र में घटनाओं और घटनाओं का बार-बार परीक्षण होना चाहिए हालांकि उनका यह भी मानना था कि सामाजिक विज्ञानों में परीक्षण नहीं हो सकता है, लेकिन समाजशास्त्र को विज्ञान की श्रेणी में लाना है तो घटनाओं का आंशिक परीक्षण होना आवश्यक है।
  • तुलनात्मक पद्धति :
    कॉम्ट के अनुसार सामाजिक विज्ञानों में सामाजिक प्रघटनाओं का तुलनात्मक अध्ययन होना आवश्यक है। क्योंकि हर तरह की घटना के कार्य-कारण अलग-अलग होते हैं। इसलिए उन घटनाओं का तुलनात्मक विवेचन आवश्यक है।
  • ऐतिहासिक पद्धति :
    कॉम्ट का मानना था कि ऐतिहासिक पद्धति का प्रयोग वैज्ञानिक नहीं है। लेकिन समाजशास्त्र में मानव समाज का अध्ययन है। अतः समाज का सामाजिक घटनाओं को समझने के लिए ऐतिहासिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि कॉम्ट ने समाजशास्त्र को एक विज्ञान के रूप में स्थापित करने का प्रयत्न किया। उन्होंने समाजशास्त्र को निश्चित विषयवस्तु नहीं दी, लेकिन उन्होंने समाजशास्त्र को प्रत्यक्षवादी विज्ञान बनाने के लिए अध्ययन पद्धति और ज्ञान के विकास की जो व्यवस्था की है वह समाजशास्त्र के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 2.
वर्ग के सम्बन्ध में लेनिन के दृष्टिकोण की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
वर्ग के सम्बन्ध में लेनिन का दृष्टिकोण वर्ग को परिभाषित करते हुए लेनिन लिखते हैं कि वर्ग लोगों के ऐसे बड़े समूह को कहते हैं जो सामाजिक उत्पादन की इतिहास द्वारा निर्धारित किसी पद्धति में अपने-अपने स्थान की दृष्टि से उत्पादन के साधनों के साथ अपने संबंध की दृष्टि से श्रम के सामाजिक संगठन में अपनी भूमिका की दृष्टि से और फलस्वरूप सामजिक सम्पदा के जितने हिस्से के वे मालिक होते हैं उसके परिणाम तथा उसे प्राप्त करने के तौर-तरीकों की दृष्टि से एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। इस परिभाषा में लेनिन ने वर्ग की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है :

  1. वर्ग लोगों के बहुत बड़े समूह को कहते हैं।
  2. प्रत्येक वर्ग का सामाजिक उत्पादन के इतिहास द्वारा निर्धारित पद्धति में एक स्थान होता है।
  3. सामाजिक समूह का उत्पादन के साधनों से सम्बन्ध होता है।
  4. धर्म के सामाजिक संगठन में उनकी भूमिका होती है।
  5. प्रत्येक वर्ग का सामाजिक सम्पदा प्राप्त करने का अपना तौर-तरीका होता है।
  6. मार्क्स कहते हैं कि इतिहास में अब तक जितनी भी सामाजिक व्यवस्थाएँ रही हैं। उनमें सम्पत्ति का वितरण और समाज का वर्ग एवं श्रेणियों में विभाजन इस बात पर निर्भर रहा है कि समाज में क्या और कैसे उत्पादन हुआ तथा उपज का विनिमय कैसे हुआ।

प्रश्न 3.
प्राचीन काल से लेकर आधुनिक समय तक समाज में वर्गों का निर्माण किस प्रकार हुआ? कार्ल मार्क्स के दृष्टिकोण से समझाइए।
उत्तर:
कार्ल मार्क्स की दृष्टि में प्राचीन काल से लेकर आज तक समाज में वर्गों का निर्माण अग्रलिखित तरह से हुआ :

  • आदिम साम्यवादी समाज में वर्ग :
    यह इतिहास का प्रथम युग कहा जाता है। इस युग में उत्पादन के साधनों पर सबका समान स्वामित्व होता था। सब लोग मिलकर उत्पादन कार्य करते थे तथा उसका वितरण भी समान होता था। समाज में श्रम विभाजन लिंग भेद के आधार पर पाया जाता था। इस प्रकार इस युग में वर्ग व्यवस्था नहीं पनपी।
  • दासत्व युग में वर्ग :
    जब समाज में दासत्व युग का प्रारम्भ हुआ तो उस समय वर्ग का निर्माण होने लगा। उस समय मनुष्य कृषि कार्य करता था। समाज में निजी सम्पत्ति के विचारों का उदय हुआ और श्रम विभाजन पनपने लगा। इस युग में बल या शक्ति के आधार पर उत्पादन के साधनों पर कुछ लोगों का आधिपत्य हो गया तथा कुछ ने दासत्व स्वीकार किया। अर्थात् मालिक व दास जैसे वर्गों का जन्म हुआ।
  • सामन्ती समाज में वर्ग :
    इस युग में स्पष्ट रूप से दो वर्गों का अस्तित्व देखा जा सकता है। एक सामन्त दूसरा अर्द्धदास किसान। सामन्तों के पास उत्पादन के साधन और विशेषतः भूमि थी, यही लोग सत्ताधारी भी थे। अर्द्धदास किसान सामन्तों के अधीन थे और उनसे खेती का कार्य करवाया जाता था। हालाँकि इनकी स्थिति पूर्ण रूप से दासों जैसी नहीं थी किन्तु इन पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध थे। सामन्तों द्वारा किसानों का शोषण किया जाता था।
  • पूँजीवादी समाज में वर्ग :
    इस समाज में उत्पादन के साधनों पर पूँजीपतियों का अधिकार होता है तथा उत्पादन का कार्य श्रमिकों के द्वारा कराया जाता है। मार्क्स श्रमिक वर्ग को सर्वहारा वर्ग और पूँजीपति वर्ग को बुर्जुआ वर्ग कहते हैं। सर्वहारा वर्ग के पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व नहीं होता है वरन् वे उत्पादन के साधन होते हैं जबकि पूँजीपति के पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व होता है।

प्रश्न 4.
सामाजिक एकता की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए यान्त्रिक एवं सावयवी एकता को समझाइए।
उत्तर:
सामाजिक एकता की अवधारणा को समाजशास्त्री इमाईल दुर्थीम ने प्रस्तुत किया। इसके अन्तर्गत ही यान्त्रिक एवं सावयवी एकता सन्निहित है। इसका विस्तृत विवरण अग्रलिखित है :

सामाजिक एकता की अवधारणा :
सामाजिक एकता की अवधारणा समाजशास्त्र को दुर्थीम की अनुपम देन है। दुर्थीम के अनुसार किसी भी समाज का विकास उसकी एकता में है। जब तक समाज के लोगों में एक दूसरे के प्रति लगाव नहीं होता है तब तक वे एक दूसरे के निकट आने की आवश्यकता महसूस नहीं करते किन्तु लगाव केवल समानता में ही नहीं होता है बल्कि यह भिन्नता व असमानता में भी होता है। जैसे भारत में जातीय, भाषायी, क्षेत्रीय, धार्मिक, सांस्कृतिक कई प्रकार की भिन्नताएँ होते हुए भी समानता यह है कि हम भारतीय समाज के अंग हैं। यह भिन्नता हमें साथ मिलकर कार्य करने के लिए बाध्य करती है। इस प्रकार दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन में ही सामाजिक एकता छिपी हुई होती है।

यान्त्रिक एकता :
इस प्रकार की एकता सरल, आदिम एवं प्राचीन समाजों में पायी जाती है। इस प्रकार की एकता वाले समाजों में लोगों की परिस्थितियों एवं भूमिकाओं में, विचारों, विश्वासों और जीवन शैलियों में, मानसिकता, सामाजिकता और नैतिकता में समानता पायी जाती है। इस प्रकार के समाजों का आकार बहुत छोटा होता है, इसलिए लोगों की आवश्यकताएँ सीमित तथा समान होती हैं। उन पर परम्परा, जनमत और धर्म का नियन्त्रण और दबाव होता है। इस प्रकार के समाजों में व्यक्ति का व्यक्तित्व समूह के अस्तित्व में मिल जाता है। वह समूह के साथ यन्त्रवत् सोचता, कार्य करता एवं आज्ञाओं का पालन करता है। ऐसे समाजों में श्रम विभाजन व विरोधीकरण नगण्य होता है, इसलिए इस प्रकार के समाजों को ‘यान्त्रिक एकता’ कहा गया है।

सावयवी एकता :
दुर्थीम के अनुसार यान्त्रिक एकता के ठीक विपरीत वाली एकता को सावयवी एकता कहा जाता है। इस प्रकार की एकता आधुनिक, जटिल, विकसित और औद्योगिक समाजों में पाई जाती है। समूह के सदस्यों में पायी जाने वाली विभिन्नताएँ इस एकता का आधार होती हैं। इसीलिए ऐसे समाजों को विभिन्नता की एकता वाला समाज कहा जाता है। इस प्रकार की प्रधानता होने के कारण भिन्नताएँ अधिक पायी जाती हैं। ये भिन्नताएँ समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बढ़ावा देती हैं तथा सामूहिक चेतना की भावना को कमजोर करती हैं। इस समस्त प्रवृत्तियों वाली एकता को ही समाजशास्त्री इमाईल दुर्थीम ने सावयवी एकता कहा है।

प्रश्न 5.
श्रम विभाजन के परिणामों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
श्रम विभाजन के परिणाम-श्रम विभाजन के परिणाम निम्नलिखित हैं :

  • प्रकार्यात्मक स्वतंत्रता एवं विशेषीकरण :
    श्रम विभाजन का एक प्रमुख परिणाम यह होता है कि इससे कार्यों के विभाजन के साथ-साथ कार्य करने की स्वतंत्रता और गतिशीलता में वृद्धि होती जाती है। इससे कार्यों के परिवर्तन के अवसर भी बढ़ जाते हैं।
  • सभ्यता का विकास :
    दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन के कारण सभ्यता का भी विकास होता है अर्थात् जैसे-जैसे समाज में श्रम विभाजन का विकास होता है वैसे-वैसे सभ्यता का विकास होता है। अतः श्रम विभाजन का परिणाम सभ्यता का विकास भी है। . (ग) सामाजिक प्रगति श्रम विभाजन के कारण समाज में परिवर्तन होता है और यह परिवर्तन सामाजिक प्रगति को भी बढ़ाता है। परिवर्तन एक शाश्वत नियम है। समाज में श्रम विभाजन में भी परिवर्तन होता है।
  • नवीन समूहों की उत्पत्ति और अन्तर्निर्भरता :
    दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन का महत्वपूर्ण परिणाम यह भी है कि इसके कारण न केवल समाज में नवीन समूहों का निर्माण होता है बल्कि उनमें एक दूसरे पर निर्भरता भी बढ़ती है क्योंकि जो नवीन समूह समाज में निर्मित होते हैं वे एक विशेष प्रकार का ही कार्य करते हैं तथा उनकी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति समाज के दूसरे समूह द्वारा की जाती है। इसीलिए समाज में विभिन्न समूहों में अन्त:निर्भरता भी बढ़ जाती है।
  • व्यक्तिवादी विचारधारा :
    प्राचीन समाजों में श्रम विभाजन की मात्रा कम होती थी लेकिन सामूहिक चेतना अधिक मात्रा में होती थी जैसे-जैसे समाज में श्रम विभाजन बढ़ता जाता है वैसे-वैसे सामूहिक चेतना में शिथिलता आती है, जिसके कारण व्यक्तिवादी विचारधारा में वृद्धि हुई।
  • प्रतिकारी कानून एवं नैतिक दबाव :
    श्रम विभाजन समाज की कानून व्यवस्था को भी बदल देता है। यान्त्रिक एकता वाले समाजों में जहाँ समरूपता पायी जाती है दमनकारी कानून पाये जाते हैं, वहीं सावयवी एकता वाले समाजों, जहाँ पर विभिन्नता के कारण श्रम विभाजन अधिक होता है, जिसके परिणामस्वरूप विशेषीकरण के कारण समाज में जटिलता में वृद्धि होती है। ऐसे समाजों में व्यक्तिगत हितों की रक्षा में लिए प्रतिकारी कानून बनाये जाते हैं। श्रम विभाजन जहाँ एक तरफ व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन देता है वहीं दूसरी तरफ सामूहिक हितों से सम्बन्धित नैतिकता को भी विकसित करता है।
  • सावयवी सामाजिक एकता :
    श्रम विभाजन के कारण सावयवी एकता स्थापित होती है, जिसमें विभिन्न अंगों में परस्पर प्रकार्यात्मक निर्भरता एवं सहयोग पाया जाता है हालांकि यह विभिन्न अंग भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों को सम्पादित करते हुए भी एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं।

प्रश्न 6.
मैक्स वेबर द्वारा प्रस्तुत ‘सामाजिक क्रिया’ की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मैक्स बेबर द्वारा प्रस्तुत ‘सामाजिक क्रिया’ की अवधारणा की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :

  1. सामाजिक क्रिया दूसरे व्यक्तियों के भूतकाल, वर्तमान या भावी व्यवहार द्वारा प्रभावित होती है, चाहे वह व्यवहार भूतकाल, वर्तमान या भावी किसी भी काल में किया गया हो। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति भूतकाल में उसे दी गयी गाली का बदला लेने के लिए अपने दुश्मन के साथ मारपीट करता है तो उसकी यह क्रिया सामाजिक क्रिया कहलाएगी।
  2. प्रत्येक प्रकार की क्रिया सामाजिक क्रिया नहीं है। समाज में घटित होने वाली सभी क्रियाएँ सामाजिक क्रिया नहीं होती हैं क्योंकि सामाजिक क्रिया की श्रेणी में वही क्रिया आएगी जिसमें एक से अधिक कर्ता एक-दूसरे को अपने कार्य द्वारा प्रभावित करें। उदाहरणार्थ, कोई व्यक्ति एकान्त में रहकर कार्य करता है, उससे कोई और व्यक्ति प्रभावित नहीं होता है तो ऐसी क्रिया सामाजिक क्रिया की श्रेणी में नहीं आएगी।
  3. जब व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से सम्पर्क में आने के बाद उसे प्रभावित करे तो वह सामाजिक क्रिया की श्रेणी में आएगा अन्यथा नहीं। उदाहरणार्थ यदि दो व्यक्ति आपस में टकराकर बिना कुछ बोले और करे अपने कार्य में व्यस्त हो जाते हैं, तो वह सामाजिक क्रिया नहीं कहलाएगी। यह सामाजिक क्रिया तभी कहलाएगी जब उनके बीच वाद-विवाद, बहस या मारपीट हो, क्योंकि तभी वे एक-दूसरे को अपने व्यवहार से प्रभावित करते हैं।
  4. दूसरे व्यक्तियों द्वारा एवं दूसरे व्यक्तियों के व्यवहारों द्वारा प्रभावित क्रिया में अन्तर है। जैसे कुछ व्यक्ति सड़क पर चल रहे हैं और अचानक वर्षा आ जाए और सभी अपना छाता निकाल लें तो यह सामाजिक क्रिया नहीं है, क्योंकि क्रिया दूसरे व्यक्तियों से प्रभावित होकर नहीं वरन् वर्षा के कारण है। इसके ठीक विपरीत यदि किसी व्यक्ति के इशारे पर कुछ व्यक्ति नृत्य करते हैं तो उसे सामाजिक क्रिया कहेंगे क्योंकि यह किसी के कहने या इशारे करने पर की गई है।

प्रश्न 7.
सामाजिक क्रिया के प्रकारों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक क्रिया के प्रकार–सामाजिक क्रिया के प्रकार निम्नलिखित हैं।
(i) तार्किक क्रिया :
मैक्स वेबर के अनुसार इस प्रकार की क्रिया में तर्क तथा विशिष्ट उद्देश्य को महत्वपूर्ण माना जाता है। इस प्रकार की क्रियाओं को करते समय व्यक्ति अपने लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए तर्क के आधार पर क्रिया करता है। इसीलिए वेबर इस प्रकार की क्रिया को लक्ष्य के प्रति अभिस्थापित’ कहते हैं। उदाहरण के लिए जब कोई इन्जीनियर किसी नदी पर पुल बनाता है तो वह तर्क के आधार पर निश्चित करता है कि पुल किस स्थान पर बनाया जाए ताकि उस पुल से अधिक से अधिक लाभ मिल सके तो ऐसी क्रिया तार्किक क्रिया की श्रेणी में आती है।

(ii) मूल्यात्मक क्रिया :
जब व्यक्ति समाज के मूल्यों से प्रभावित होकर क्रिया करता है तो ऐसी क्रिया को मूल्यात्मक क्रिया कहते हैं। वेबर इसे मूल्य के प्रति अभिस्थापित कहते हैं। इस प्रकार की क्रिया के पीछे तर्क का होना आवश्यक नहीं है वरन् नैतिकता व धर्म प्रतिमानों द्वारा निर्देशित होती है। उदाहरणार्थ, जब कोई समुद्री जहाज डूब रहा होता है तो उस जहाज के कप्तान की नैतिकता होती है कि वह पहले जहाज में यात्रा करने वालों तथा अपने अधीनस्थ को बचाएगा। उसके उपरान्त स्वयं को। ऐसा करते समय वह मर जाना अच्छा समझता है न कि पहले खुद को बचाना। वह ऐसा इसीलिए करता है क्योंकि समाज के मूल्यों से वह बँधा हुआ है। अतः ऐसी क्रिया को मूल्यात्मक क्रिया कहा जाता है।

(iii) भावनात्मक क्रिया :
इस प्रकार की क्रिया का सम्बन्ध व्यक्ति की भावनाओं से होता है। अर्थात् प्रेम, दया, घृणा, सहानुभूति तथा क्रोध के वशीभूत होकर जब व्यक्ति कोई क्रिया करता है तो उसे भावनात्मक क्रिया कहा जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति का स्वयं पर नियन्त्रण समाप्त हो जाता है तथा भावनाओं के अन्तर्गत वह ऐसी क्रिया करता है। उदाहरण के लिए, व्यक्ति क्रोध में आकर किसी की हत्या कर दे तो ऐसी क्रिया भावनात्मक क्रिया की श्रेणी में आएगी।

(iv) परम्परात्मक क्रिया :
इस प्रकार की क्रिया का सम्बन्ध प्राचीनकाल से चली आ रही प्रथाओं, परम्पराओं आदि से होता है। अर्थात् जो सामाजिक क्रिया प्रचलित प्रथाओं, परम्पराओं आदि के प्रभाव से निर्देशित होती हैं तो उसे परम्परात्मक क्रिया कहा जाता है। उदाहरण के लिए, मृत्युभोज, जाति में विवाह आदि क्रिया को परम्परात्मक क्रिया कहते हैं।

सामाजिक क्रिया के उपर्युक्त वर्गीकरण से स्पष्ट है कि वेबर ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि व्यक्ति कोई भी कार्य करता है वह तर्क, मूल्य, भावों तथा परम्पराओं के वशीभूत होकर ही करता है। वेबर के अनुसार पश्चिमी देशों में तार्किक एवं पूर्वी देशों में मूल्यात्मक, भावनात्मक व परम्परात्मक क्रियाएँ होती हैं।

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