Biology Notes For Class 12 in Hindi

वनोन्मूलन क्या है | परिभाषा | के कारण| प्रभाव \ रोकथाम के उपाय

वनोन्मूलन क्या है , परिभाषा  कारण, प्रभाव , रोकथाम के उपाय: वनोन्मूलन(Vannomoolan):- वनोन्मूलन के कारण शीतोषण क्षेत्रों के वनों में 1 प्रतिशत तथा उष्ण कटिबन्धीय वनों में 40 प्रतिशत की कमी आयी है।भारत में वनों का प्रतिशत:- 20 वीं सदी के प्रारंभ में 30 प्रतिशत20 वीं सदी के अन्त में 19.4 प्रतिशत वन होने चाहिए राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार मैदानी क्षेत्रों में 33 प्रतिशत और पहाडी क्षेत्रों में 67 प्रतिशत वनोन्मूलन के कारण(Causes of deforestation):- 1 .कृषि के कारण वनों का काटा जाना, सर्वाधिक नुकसान काटों और जमाओं झूम कृषि के कारण हुआ है। 2.अवाधिक चराई 3. सिंचाई के गलत तरीके 4. वृक्ष एवं वनोत्पाद प्राप्त करने के लिएवनों का काटा जाना 5. जनसंख्या वृद्धि के कारण अवासीय बस्तियाँ, सडक आदि बनाने के कारण प्रभाव(effects):- 1. वातावरण में CO2 की सान्द्रता बढना। 2. वैश्विक उष्णता में वृद्धि। 3. जल-चक्र का अनियमित होना। 4. मृदा अपरदन एवं मृरूस्थलीकरण। 5. जैव विविधता में कमी 6. परितंत्र असन्तुलित रोकथाम के उपाय(Preventions):- पुर्नवनीकरण:- काटे गये स्थान पर पुनः वृक्ष लगाना वन संरक्षण हेतु सामाजिक प्रयास – एक अध्ययन(Social efforts for forest conservation – a study):- 1773 में खेजडल जोधपुर की अमृता देवी विश्नोई ने अपने परिवार एवं सैकडों लोगों के साथ पेडों को बचाने के लिए अपनी जाने दी। सरकार द्वारा अमृता देवी विश्नोई वन संरक्षण पुरस्कार दिया जाता है   2. 1974 में हिमालय के गढवाल क्षेत्र में पेडों की रक्षा के लिए चिपको आन्दोलन चलाया गया।  3. इसी प्रकार सरकार ने सामाजिक भागीदारी बढाने के लिए संयुक्त वन प्रबंधन की नीति प्रारंभ की । सके तहत वनो की सुरक्षा का जिम्मा स्थानीय समुदाय का होगा तथा इसके बदले में वे वनोत्पाद प्राप्त कर सकेगें। Remark: दोस्तों अगर आपको इस Topic …

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संसाधनो के अनुचित अनुरक्षण व प्रयोग द्वारा निम्नीकरण

संसाधनो के अनुचित अनुरक्षण व प्रयोग द्वारा निम्नीकरण:- प्रदूषण के साथ-2 प्राकृतिक संसाधनों के सही तरीके से प्रयोग न करने के कारण भी इनका निम्नीकरण होता है जैसे:- 1. मृदा अपरदन व मृरूथलीकरण:- मनुष्य के निम्न क्रियाकलापो के कारण मृदा अपसदन होता है। 1. कृर्षि के कारण वनों को काटा जाना 2. नगरीकरण 3. सिंचाई के गलत तरीके 4. अबाधिक चराई इस प्रकार उपरोक्त कारणों से शुष्क मृदा खण्ड बन जाते है तथा इनके मिलने से मरूस्थल का निर्माण होता है। जलाक्रांति व मृदा लवणता (Hydrochloric and soil salinity) : जल के विकास की उचित व्यवस्था के बिना सिंचाई के द्वारा मृदा जलाक्रान्त हो जाती है। ऐसी मृदा में भूमि की सतह एवं पौधों की जडों पर अत्यधिक मात्रा में लवण जमा हो जाते है। इससे पौधों की वृद्धि रूक जाती है तथा कृषि पर हानिकारक प्रभाव उत्पन्न होते है। मृदा लवणीयता की समस्या हरित क्रान्ति के कारण ही उत्पन्न हुई है। Remark: दोस्तों अगर आपको इस Topic के समझने में कही भी कोई परेशांनी हो रही हो तो आप Comment करके हमे बता सकते है | इस टॉपिक के expert हमारे टीम मेंबर आपको जरूर solution प्रदान करेंगे| …

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ओजोन अवक्षय परत व इसके प्रभाव कारण |  प्रभाव रोकथाम के उपाय

ओजोन अवक्षय परत व इसके प्रभाव , कारण ,  प्रभाव(effects) , रोकथाम के उपाय/प्रयास:- क्षोभमण्डल में मौसम संबंधी परिवर्तन होते है। जबकि समताप मण्डल में ताप लगभग स्थिर रहता है। तथा इसमें अच्छा ओजोन पाया जाता है जो हानिकारक पराबैंगनी विकिरणों से हमारी रक्षा करता है ओजोन परत की मोटाई इकाई डॉबसन यूनिट (du) है।  ओजोन अवक्षय परत व इसका कारण:- ओजोन परत की मोटाई में कमी आने के कारण ओजोन स्थिर पतला होता जाता है इस क्रियाको ओजोन अवक्षय कहते है। अटाँर्कटिका क्षेत्र में ओजोन की खतबस्तुत अधिक पतली हो गयी है तथा इसे ओमोन छिद्र कहते है। पराबैंगनी किरणों की उपस्थिति में ओजोन आॅक्सीजन में विघटित होती रहती है तथा पुनः ओजोन का निर्माण भी होता रहता है। O3  ⇌  O2  + O  (UV की उपस्थिति में ) CFC से UV की उपस्थिति में क्लोरीन मुक्त होती है जो ओजोन के अपघटन में उत्प्रेरक के रूप में काम आती है CFC की उपस्थिति में यह एक सतत् एवं स्थाई किया है इस प्रकार ओजोन परत की मोटाई में कमी आ जाती है। CFC → Cl उत्प्रेरक प्रभाव(effects):- छोटी तरंग दैध्र्य की पराबैंगनी किरणें ओजोन परत के द्वारा अवशोषित हो जाती है किन्तु न्ट.ठ किरणें ओजोन परत के पतले होने के कारण पृथ्वी की सतह तक पहुंचती है तथा हानिकारक प्रभाव उत्पन्न करती है जो निम्न है:- 1.  क्षतिग्रस्त हो जाता है तथा इसमें उत्परिवर्तन हो सकता है 2.  त्वचा कैसर हो सकता है। 3. हिम अंधता मोतियाबिद हो जाता है। तथा काॅर्निया क्षतिग्रस्त हो सकता है।  रोकथाम के उपाय/प्रयास(Prevention measures / efforts):- ओजोन अबक्षय को रोकने के लिए अन्र्तराष्ट्रीय प्रयास किये गये। माॅस्ट्रियल कना में 1987 में एक अन्तराष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर किये गये जिसे माॅस्ट्रियल प्रोटोकाल कहते है। यह संधि 1999 में लागू हुई तथा इसमें विकसित एवं विकासशील देशों के लिए अलग-2 मानक रखते हुये यह तय किया गया कि व अन्य ओजोन अवक्षयाकारी तत्वों के उत्सर्जन में कमी की जाये। Remark: दोस्तों अगर आपको इस Topic के समझने में कही भी कोई परेशांनी हो रही हो तो आप Comment करके हमे बता …

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ग्रीन हाउस प्रभाव पौध घर प्रभाव क्या है | रोकथाम के उपाय

ग्रीन हाउस प्रभाव पौध घर प्रभाव रोकथाम के उपाय:- शीत ऋतु में काँच के बने पौध घर के समान की पृथ्वी की सतह एवं वायुमण्डल के वर्न हो जाने की क्रिया को ग्रीन हाउस प्रभाव (हरित ग्रह प्रभाव) कहते है। हरित ग्रह प्रभाव उत्पन्न करने वाली गैसों को ग्रीन हाउस गैसे कहते है। ये गैसे पृथ्वी की सतह को लौटाने वाले विकिरणों को अवशोषित कर लेती है तथा पुनः पृथ्वी की सतह की ओर लौटा देती है जिससे पृथ्वी की सतह एवं वायुमण्डल गर्म हो जाता है ग्रीन हाउस गैसे एवं उनकी प्रतिशत मात्रा।  प्रभाव(Effects):- 1     हानिकारक वातावरणीय प्रभाव उत्पन्न होना। 2     विचित्र जलवायु परिवत्रन अलमिनो प्रभाव 3     वैश्विक ऊष्णता में वृद्धि एसोबल वार्मिग- गत शताब्दी में विश्व का तापमान 0.60 डिग्री सेंटीग्रेट बढा है। यही स्थिति रही तो 2100 तक तापमान में 1.40 से 5.80 डिग्री सेंटीग्रेट तक वृद्धि हो सकती है यदि ग्रीन हाउस प्रभाव न हो तो पृथ्वी की सतह का औसत तापमान 150 डिग्री सेंटीग्रेट के स्थान पर .180 डिग्री सेंटीग्रेट होता है। 3    ध्रुवों की बर्फ पर पिघलना 4     नदियों में बाढ आना। 5     समुद्र के किनारे स्थित शहरो के ढूबने का खतरा।  रोकथाम के उपाय(ways of Prevention):- 1     जीवशनीय ईधन का प्रयोग कम करना। 2     उर्जा दक्षता में सुधार करना। 3     जनोन्मूलन रोकना। 4     वृक्षारोपण करना। 5     जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित रोकना 6    अंतराष्ट्रीय प्रयास करना। Remark: दोस्तों अगर आपको इस Topic के समझने में कही भी कोई परेशांनी हो रही हो तो आप Comment करके …

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नाभिकीय रसायन व उसके प्रभाव

नाभिकीय रसायन या परमाणु ऊर्जा के उपयोग की समस्या:- 1. आकस्मिक रिसाव जैसे:- थीमाइल आइलैण्ड अमेरिका, चेरनोबिल खस फुकुशिमा जापान 2. सुरक्षित निपटान की समस्या  प्रभाव(effects):- नाभिकीय रसायनों के कारण हानिकारक प्रभाव उत्पन्न होते है इनसे उच्च दर से उत्परिवर्तन होते है। इनकी अधिक मात्रा घातक होती है तथा कम मात्रा में उत्पन्न होने वाले नाभिकीय विकिरण अनेक विकार उत्पन्न करते है जिनमे कैंसर मुख्य है। निपटान का तरीका(ways of disposal):-  परमाणु भट्टियों को उपयोग के पश्चात् अच्छी तरह से कवचित पात्रों में बंद करके चट्टानों के नीचे पृथ्वी में 500 मीटर की गहराई में दबा देना चाहिए। Remark: दोस्तों अगर आपको इस Topic के समझने में कही भी कोई परेशांनी हो रही हो तो आप Comment करके हमे बता सकते है | इस टॉपिक के expert हमारे टीम मेंबर आपको जरूर solution प्रदान करेंगे| यदि आपको https://hindilearning.in वेबसाइट में दी …

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कृषि रसायन व उसके प्रभाव | जैव-कृषि एक अध्ययन

कृषि रसायन व उसके प्रभाव(Agricultural Chemistry and Its Effects):– विभिन्न प्रकार के पीडकनाशी एवं रासायनिक उर्वरकशुदा के परितंत्र को असन्तुलित करते है ये लक्ष्य जीवों के साथ-2 उपलक्ष्य जीवों को भी मार देते है, इनसे मृदा अन उपजाऊ हो जाती है तथा ये जलीय परितंत्र में पहुंचकर जैव-आवर्धन के द्वारा हानिकारक प्रभाव उत्पन्न करते है। जैव-कृषि एक अध्ययन(A study of bio-agriculture):- चक्रिय एवं शून्य अपशिष्ट उत्पाद वाली कृषि को एकीकृत जैव-कृषि कहते है। इसमें कृषि कार्यो के साथ-2 पशुपालन, मधुमक्खी पालन, जल संग्रहण, कम्पोस्ट निर्माण आदि किये जाते है।  महत्व(Importance):- 1 .इसमें अपशिष्ट उत्पाद नगणय होते है। 2.एक प्रक्रम का अपशिष्ट उत्पाद अन्य प्रक्रम में पोषक पदार्थो के रूप में प्रयुक्त होता है। 3. संसाधनों का अधिकतम उपयोग संभव होता है। यह बहुत ईमाइती एवं लम्बे समय तक चलने वाल प्रक्रम है। 4. रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता नहीं होती है। 5. सोनीपत हरियाणा के किसान रमेश चन्द डागर ने एकीकृत कृषि को अपनाया। तथा इसके लाभ प्राप्त किये — ने एकीकृत कृषि को अपनाया। तथा इसके लाभप्राप्त किये उसने अन्य किसानों को भी इससे फायदा पहुंचाने के लिए एक किसान कल्ब बनाया जिसके 5000 से अधिक सदस्य बने। Remark: दोस्तों अगर आपको इस Topic के समझने में कही भी कोई परेशांनी हो रही हो तो आप Comment करके हमे बता सकते है | इस टॉपिक के expert हमारे टीम मेंबर आपको जरूर solution प्रदान …

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इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट क्या है | परिभाषा | तरीके

इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट क्या है , परिभाषा , तरीके:- कम्प्यूटर, मोबाइल, घडी आदि इलेक्ट्रानिक सामान आदि जो मरम्मत योग्य नहीं होता है उसे म्.ूंेजम कहते है। विकसित देश ऐसे इलेक्ट्राॅनिक अपशिष्टों को विकाशील देशों को निर्यात कर देते है अधिकाँश भागों को निकालने के बाद विकासशील देशों में बैच दिया जाता है। शेष भागों का पुनः चक्रण करते है तथा उनसे उपयोगी धातुएं सोना, चाँदी, ताबा आदि पुनः प्राप्त कर लेते है। विकासशील देश ऐसे अपशिष्टों को लेण्डफिल्स में गाढ़ देते है या भस्माक की सहायता से उन्हें नष्ट कर देते है। इन्हें पर्यावरण अनुकूल तरीके से पुनः चक्रण भी किया जा सकता है। Remark: दोस्तों अगर आपको इस Topic के समझने में कही भी कोई परेशांनी हो रही हो तो आप Comment करके हमे बता सकते है | इस टॉपिक के expert हमारे टीम मेंबर आपको जरूर solution प्रदान करेंगे| यदि आपको https://hindilearning.in वेबसाइट में दी गयी जानकारी से लाभ …

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प्लास्टिक के उपचार संबंधी एक अध्ययन |अस्पताल के अपशिष्ट

अस्पताल के अपशिष्ट,प्लास्टिक के उपचार संबंधी एक अध्ययन:- बैंगलोर निवासी अहमदाबाद 51 वर्ष जो लगभग 20 वर्षो से बोरे बेचने का व्यवसाय कर रहे थे उन्होने लगभग 8 वर्ष पूर्व प्लास्टिक अपशिष्ट के निपटान का एक सुरक्षित तरीका खोज निकाला। उसने प्लास्टिक नाम दिया इसे बिटूेन के साथ लाकर इनका उपयोग सडक निर्माण में किया तथा 2000 तक लगीाग 40 किमी सडक का निर्माण किया इस कार्य में उन्होंने R.V. engineering college एवं banglore city corporation (BMC) का सहयोग प्राप्त किया। महत्व(Importance):- 1     बिटूमेन का जल निबर्बण्ड गुण बढ गया। 2     सडक तीन गुना मजबूत बनी। 3     कचरा बीनने वालों को 40 से 1 किलोग्राम के स्थान पर 6/किलोग्राम मिलने लगा। 4     प्लास्टिक के दमघोटू प्रभाव से छुटकारा। अस्पताल के अपशिष्ट(Hospital waste):-अस्पताल के उपशिष्ट में विसंक्रमाक, रूई, पट्टी, रूइयाँ, खाली बोतले, हानिकारक रसायन, रोगजनक सूक्ष्म जीव आदि होते है। इनके निपटान के लिए भस्मक (एन्सीनिरेटर) का प्रयोग किया जाना चाहिए। Remark: दोस्तों अगर आपको इस Topic के समझने में कही भी कोई परेशांनी हो रही हो तो आप Comment करके हमे बता सकते है | इस टॉपिक के expert हमारे टीम मेंबर …

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मानव अपशिष्ट का निपटान | महत्व | के तरीके

मानव अपशिष्ट का निपटान,  महत्व , तरीके  :- पारिस्थितिक स्वच्छता का सुरक्षित तरीका ‘‘शुष्क टायलेट कम्पोस्टिंग‘‘ महत्व:- 1- व्यावसायिक, स्वास्थ्यकर 2- पीनी की आवश्यकता नहीं 3- पुन:चक्रण द्वारा उर्वरक 4- सस्ता उदाहरण:- इको सैन केरल के कुछ भागों व शहरों में। ठोस अपशिष्ट (solid waste):- वे सभी अपशिष्ट पदार्थ जो कूडे-कचरे में फेंके जाते है उन्हें ठोस अपशिष्ट कहते है मुख्य ठोस अपशिष्ट निम्न है:- 1. नगरपालिका अपशिष्ट:- वे सभी वस्तुएं जो कार्यालयों, विद्यालयों, घरों एवं भण्डारकारों द्वारा कचरे के रूप में फेंकी जाती है इनका एकत्रीकरण एवं निपटान नगर पालिका द्वारा किया जाता है उसे नगरपालिका अपशिष्ट कहते है। जैसे काँच, कागज, वस्त्र, चमडा, धातु, प्लास्टिक आदि। निपटान का तरीका:- 1    परंपरागत तरीका(Conventional way):- कचरे को एकत्रित करके उसे जला दिया जाता है जिससे उसके आयतन में कमी आ जाती है। समस्या कमी/सीमाएं:- ऐसे कथन मक्खी, मच्छर एवं चूहों के प्रजनन कथल बन जाते है तथा ये बीमारीयाँ फैलाते है। 2     नया तरीका(New methods):- कचरे के सैनेटरी लेण्डकिस्स गड्ढा/खड्डा में डालकर उसके ऊपर रेत-मिट्टी आदि डाल देते है। समस्या:- इनसे हानिकारक रसायनों का रिसाब होता है तथा ये भूमिगत जल को प्रूदूषित करते है। समाधान/हल:- कचरे का वर्गीकरण करना। अपशिष्ट पदार्थो को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है 1     जैव निम्नीकृत (अपघटनीय)(Biodegradable ):- जिसका अपघन होता है जैसे:- मल-मुत्र आदि पादपों एवं जीवों के अवशेष, कृषि अपशिष्ट फल सब्जियों के छिलके आदि। 2    पुनः चक्रण योग्य (Recyclable):- जिनको पुनः चक्रीत करके उपयोग में लिया जा सकता है जैसे:- कागज, प्लास्टिक आदि। 3     जैव अनिम्नीकृत अन-अपघटनीय(Biodegradable non-decomposable):- जिसका विघटन बही होता है जैसे:- DDT, पारे के लक्ष्ण, पाॅलिटाीन की थैलियाँ जैव अनिम्नीकृत अपशिष्ट कम से कम उत्पन्न होने चाहिए। Remark: दोस्तों अगर आपको इस Topic के समझने में …

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एकीकृत अपशिष्ट जल उपचार एक अध्ययन

एकीकृत अपशिष्ट जल उपचार एक अध्ययन:- (कैलिफोर्निया) में हम्बोल्ट स्टेट यूनिर्वसिटी के सहयोग से अपशिष्ट जल के निपटान हेतु कृत्रिम एवं प्राकृतिक दोनो तरीकों का उपयोग किया। 1-    कृत्रिम विधि(artificial techniques):- इसमें परम्परागत अवसादन तथा निक्यराँपन के पश्चात् क्लोरीन द्वारा उपचारित किया गया किन्तु इसमें भारी धातुएं व अन्य हानिकारक रसायन दूर नहीं किये। 2-    प्राकृतिक/जीव विज्ञानीय उपचार(Natural / Biological Treatment):- इसके अन्तर्गत 60 हैक्टेयर क्षेत्र में फैेले 6 कच्छों को मिलाकर एक श्रृंखला विकसित की गई। इनमें जीवाणु शैवाल एवं पादव डाले गये जिनसे प्रदूषक अवशोषित व निस्प्रभावी हो गये। इन कारणों की देखभाल का जिम्मा को थ्व्ड दी गई। महत्व(Importance):- जल को प्रदूषण समाप्त हो गया तथा इन कच्छों में विभिन्न तरह की मछलियाँ व अन्य जलीय जीव पाये जाने लगे तथा जैव-विविधता में वृद्धि हुई। Remark: दोस्तों अगर आपको इस Topic के समझने में कही भी कोई परेशांनी हो रही हो तो आप Comment करके हमे बता सकते है | इस टॉपिक के expert हमारे टीम मेंबर आपको जरूर solution प्रदान करेंगे| यदि आपको https://hindilearning.in वेबसाइट में दी गयी …

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जैव आवर्धन  | कारण |प्रभाव/हानि

जैव आवर्धन (biomagnification):कुछ प्रदूषक खाद्य श्रृंखला के द्वारा अगले पोषण क्तर में पहुंचकर संचित हो जाते है अतः क्रमिक पोषणस्तरों में प्रदूषक पदार्थो की मात्रा बढ़तीे जाती है अतः क्रमिक पोषण स्तरों में प्रदूषक पदार्थो की मात्रा बढती जाती है इसे जैव आवर्धन (biomagnification )कहते है। कारण (biomagnification causes ):-  ये प्रदूषक विघटित नही होते तथा प्रत्येक पोषक स्तर पर संचित होते जाते है   जैसे क्व्ज् व पारे के लवण जैव आवर्धन से प्रभाव/हानि (biomagnification effects & losses ):- जलीय खाद्य श्रृंखला के द्वारा पक्षीयों में पहुँचकर अण्ड कवच को कमजोर कर देते है। क्योकि इनमें कैल्शियम उपायचय प्रभावित होता है इस प्रकार पक्षीयो की सृष्टि घट जाती है। Remark: दोस्तों अगर आपको इस Topic के समझने में कही भी कोई परेशांनी हो रही हो तो आप Comment करके हमे बता सकते है | इस टॉपिक के expert हमारे टीम मेंबर आपको जरूर solution प्रदान करेंगे| यदि आपको https://hindilearning.in वेबसाइट में दी गयी …

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त्वरित सुपोषण व BOD बढना, जैव रासायनिक आवश्कयता क्या है

त्वरित सुपोषण :- (ताला) तालाब या झील का पानी स्वच्छ और शीतल होता है इसकी गहराई अधिक होती है। जल प्रदूषकों के खरा आने वाले पोषकोंके कारण इसमें शैवालों और अन्य जलीय जीवों की वृद्धि अधिक होती है। मुख्य पोषक पदार्थ नाइट्रेट और फास्फेट होते है धीरे-2 झील उधाली (कम गहरी) होती जाती है इसका पानी गरम हो जाता है। झील में आॅक्सीजन की कमी हो जाती है तथा झील का दम घुटने लगता है तथा झील की वायु में इस काल के प्रभाव को त्वरित सुपोषण कहते है। BOD(Biochemical oxygen demand) बढना , (जैव रासायनिक आवश्कयता):- जल में उपस्थित कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थो के विघटन के लिए आवश्यक आॅक्सीजन की मात्रा को ठव्क् कहते है। जल के प्रदूषित होने पर ठव्क् बढती है। तथा जल में घुलित आॅक्सीजन की कमी होने लगती है जिससे जलीय जीव मरने लगते है। Remark: दोस्तों अगर आपको इस Topic के समझने में कही भी कोई परेशांनी हो रही हो तो आप Comment करके हमे बता सकते है | इस टॉपिक के expert हमारे टीम मेंबर आपको जरूर solution प्रदान करेंगे| यदि आपको https://hindilearning.in वेबसाइट में दी गयी जानकारी से …

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