RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 17 कृषिगत विकास

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Rajasthan Board RBSE Class 11 Economics Chapter 17 कृषिगत विकास

RBSE Class 11 Economics Chapter 17 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर  

RBSE Class 11 Economics Chapter 17 बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत की मुख्य खाद्यान्न फसल है
(अ) चावल
(ब) गेहूँ
(स) ज्वार
(द) मक्का
उत्तर:
(अ) चावल

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन कौन-सी पंचवर्षीय योजना में लागू किया गया?
(अ) आठवीं पंचवर्षीय योजना
(ब) दसवीं पंचवर्षीय योजना
(स) ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना
(द) बारहवीं पंचवर्षीय योजना
उत्तर:
(स) ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना

प्रश्न 3.
भारत में हरित क्रांति कब अपनाई गई?
(अ) रबी फसल 1965
(ब) रबी फसल 1966
(स) खरीफ फसल 1966
(द) खरीफ फसल 1965
उत्तर:
(स) खरीफ फसल 1966

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से वाणिज्यिक फसल कौन नहीं है
(अ) जूट
(ब) कपास
(स) गन्ना
(द) चावल
उत्तर:
(द) चावल

प्रश्न 5.
नाबार्ड की स्थापना कब की गई?
(अ) जुलाई 1988
(ब) जुलाई 1982
(स) जुलाई 1984
(द) जुलाई 1986
उत्तर:
(ब) जुलाई 1982

प्रश्न 6.
प्रति हैक्टेयर अधिकतम उर्वरकों का उपयोग करने वाला राज्य है
(अ) हरियाणा
(ब) पंजाब
(स) उत्तर प्रदेश
(द) मध्य प्रदेश
उत्तर:
(ब) पंजाब

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन-सा कृषि वित्त का गैर-संस्थागत स्रोत नहीं है?
(अ) महाजन
(ब) रिश्तेदार
(स) साहूकार
(द) सहकारी समितियाँ
उत्तर:
(द) सहकारी समितियाँ

प्रश्न 8.
क्षेत्रीय ग्रामीण बैकों की शुरुआत कब की गई?
(अ) 2 अक्टूबर, 1975
(ब) 2 अक्टूबर, 1976
(स) 2 अक्टूबर, 1977
(द) 2 अक्टूबर, 1978
उत्तर:
(अ) 2 अक्टूबर, 1975

RBSE Class 11 Economics Chapter 17 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत की कितनी प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है?
उत्तर:
65 प्रतिशत।

प्रश्न 2.
खाद्यान्न प्रति हैक्टेयर उत्पादकता 2013-14 में कितनी थी?
उत्तर:
2101 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर।

प्रश्न 3.
नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P) तथा पोटाश (K) का आदर्श अनुपात क्या है?
उत्तर:
4 : 2 : 11

प्रश्न 4.
भारत में सिंचित व असिंचित क्षेत्र कितना
उत्तर:
भारत में सिंचित क्षेत्र 449% है तथा असिंचित क्षेत्र 53.1% है।

प्रश्न 5.
भारत में तालाबों द्वारा सिंचाई कौन-से राज्यों में की जाती है?
उत्तर:
दक्षिण भारत के राज्यों तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक आदि में।

प्रश्न 6.
भारत में हरित क्रांति का जनक किसे माना जाता है?
उत्तर:
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन।

प्रश्न 7.
देशी बैंकर क्या है?
उत्तर:
महाजन, साहूकार, सगे-सम्बन्धी, रिश्तेदार, जमींदार आदि।

प्रश्न 8.
नाबार्ड का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर:
National Bank for Agriculture and Rural Development.

प्रश्न 9.
‘इंद्रधनुषीय क्रांति किसे कहते हैं?
उत्तर:
द्वितीय हरित क्रांति को।

प्रश्न 10.
द्वितीय हरित क्रांति के लिए नवम्बर 2006 में आयोजित सम्मेलन की मुख्य थीम क्या थी?
उत्तर:
नॉलेज एग्रीकल्चर।

RBSE Class 11 Economics Chapter 17 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कृषिगत साख की त्रिस्तरीय सहकारी व्यवस्था को समझाइए।
उत्तर:
सहकारी साख संस्थाएँ त्रिस्तरीय रूप से निम्नगत विभाजित की गई हैं

  • प्राथमिक साख समितियाँ (Primary Credit Societies) :
    यह ग्राम स्तर पर कार्य करती हैं। किसी गाँव या क्षेत्र के कम-से-कम 10 व्यक्ति मिलकर इसे गठित कर सकते हैं। इनके द्वारा उत्पादक कार्यों के लिए ऋण प्रदान किया जाता है।
  • केन्द्रीय सहकारी बैंक (Central Cooperative Bank) :
    यह जिला स्तर पर कार्य करती है। इनका प्रमुख कार्य प्राथमिक साख समितियों को ऋण प्रदान करना है। ये बैंक राज्य सहकारी बैंक तथा प्राथमिक साख समितियों के मध्य मध्यस्थता का कार्य करती है। ये एक से तीन वर्ष के लिए ऋण प्रदान करती है।
  • राज्य सहकारी बैंक (State Cooperative Bank) :
    यह राज्य स्तर पर कार्य करती है। यह जिला सहकारी बैंकों को दीर्घकालीन ऋण प्रदान करती है। रिजर्व बैंक इसे वित्त द्वारा पोषित करता है।

प्रश्न 2.
‘नाबार्ड का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करें।
उत्तर:
जुलाई 1982 में क्राफीकार्ड (CRAFICARD) समिति की अनुशंसा पर नाबार्ड की स्थापना की गई। इसका अध्यक्ष बी. शिवरमन को बनाया गया था। इसका पूरा नाम (National Bank for Agriculture and Rural Development-NABARD) है। इसे ग्रामीण साख की सर्वोच्च संस्था माना जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने कृषि पुनर्वित निगम की स्थापना 1963 में की तथा 1975 में इसका नाम बदलकर ‘कृषि पुनर्वित्त एवं विकास निगम’ (Agriculture Refinance and Development Corporation- ARDC) रख दिया। नाबार्ड द्वारा ARDC के समस्त कार्य तथा भारतीय रिजर्व बैंक के कृषिगत साख विभाग के समस्त कार्य अपने हाथ में ले लिए गए। नाबार्ड की प्राथमिक चुकता पूँजी 100 करोड़ रुपए रखी गयी थी।

प्रश्न 3.
भूमि सुधारों के अंतर्गत किये गए सुधारों को समझाइए।
उत्तर:
भूमि सुधारों के अंतर्गत निम्नलिखित सुधार किये गए :

  • बिचौलियों की समाप्ति (Abolition of Intermediaries) :
    कृषि विकास हेतु प्रथम पंचवर्षीय योजना में उन राज्यों में स्थायी बंदोबस्त किया गया जहाँ भूमि का रिकॉर्ड उपलब्ध था। परन्तु जिन राज्यों में भूमि का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था, वहाँ इसे लागू करने में मुश्किल हुई; जैसे-बिहार, उड़ीसा, राजस्थान आदि। जमींदारी, रैयतवारी तथा महलवारी प्रणालियों को समाप्त कर अनेक कानून निर्मित किये गए।
  • काश्तकारी सुधार (Tenancy Reforms) :
    काश्तकारी प्रणाली के अंतर्गत भूमि का मालिक स्वयं खेती न करके काश्तकारों को भूमि पट्टे पर दे देता है। इसके सुधार के तहत प्रथम पंचवर्षीय योजना में यह सिफारिश की गयी कि अधिकतम लगान कुल उत्पादन का = या = से अधिक नहीं होना चाहिए। काश्तकारों को भूमि से बेदखल न किया जाए, इसके लिए कानून बनाए गए। काश्तकारों को भूमि का मालिकाना हक देने हेतु विभिन्न राज्यों में कानूनों का निर्माण किया गया।
  • जोतों का सीमा निर्धारण (Consolidation of Holdings) :
    जोतों की उच्चतम सीमा सरकार द्वारा निर्धारित कर दी गई, जिससे खेतिहर किसानों को खेत दिये जा सकें। उपखण्डन (Sub-division) तथा उपविभाजन (Fragmentation) की समय के समाधान हेतु जोतों की चकबंदी (Consolidation of Holdings) की गयी।
  • कृषि का पुनर्गठन (Reorganisation of Agriculture) :
    जोतों के चकबंदी के अंतर्गत गाँव में किसान के बिखरे हुए खेतों के स्थान पर एक ही जगह खेत उपलब्ध कराये गए। भूमि सुधारों के अंतर्गत सरकार को लागू किये गए कानूनों से आंशिक सफलता ही प्राप्त हो सकी तथा सभी क्षेत्रों में इन सुधारों को समान रूप से लागू नहीं किया जा पाया।

प्रश्न 4.
कृषिगत उत्पादकता पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के लिए कृषि का विकास होना अति आवश्यक है। कृषि के विकास के लिए कृषि उत्पादन (Production) व इसकी उत्पादकता (Productivity) में वृद्धि के प्रयास किये जाने चाहिए। भारत का मुख्य खाद्यान्न चावल है तथा द्वितीय स्थान पर गेहूँ आता है।

कृषि उत्पादकता से आशय प्रति हैक्टेयर उत्पादकता से है। सभी फसलों की उत्पादकता में भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियाँ पायी गईं। 1950-51 से 2013-14 के मध्य सबसे अधिक उत्पादकता गेहूँ की पायी गई, उसमें 15 गुना वृद्धि दर्ज की गयी (64 लाख टन से बढ़कर 959 लाख टन)। मोटे अनाजों का उत्पादन स्थिर बना रहा। इस अवधि में गैर-खाद्यान्न फसलों में तिलहन की उत्पादकता में लगभग 5 गुना की वृद्धि हुई तथा कपास की उत्पादकता 12 गुना तक बढ़ी। कुल खाद्यान्नों के लिए प्रति हैक्टेयर उत्पादकता 1950-51 में 552 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर से 2013-14 में बढ़कर 2101 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर हो गयी। जोकि 70 के दशक में अपनायी गई, नयी कृषि रणनीति का परिणाम था।

प्रश्न 5.
सिंचाई परियोजनाओं को किस आधार पर एवं कितने भागों में बाँटा गया है?
उत्तर:
सिंचाई परियोजनाओं को कृषि कमाण्ड क्षेत्र के आधार पर 1978-79 के बाद से तीन वर्गों में बाँटा गया है :

  • लघु सिंचाई परियोजना (Small Irrigation Project) :
    इसके अंतर्गत 2000 हैक्टेयर से कम कृषि कमाण्ड क्षेत्र वाली सिंचाई परियोजनाएँ शामिल की जाती हैं।
  • मध्यम सिंचाई परियोजना (Medium Irrigation Project) :
    इसके अंतर्गत 2000 हैक्टेयर से 10,000 हैक्टेयर के मध्य होने वाले कृषि कमाण्ड क्षेत्र वाली सिंचाई परियोजनाएँ शामिल की जाती हैं।
  • बड़ी सिंचाई परियोजना (Large Irrigation Project) :
    इसके अंतर्गत 10,000 से हैक्टेयर से अधिक कृषि कमाण्ड क्षेत्र वाली सिंचाई परियोजनाएँ शामिल की जाती हैं। बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाओं का कुल सिंचित क्षेत्र में 2006-07 के मध्य योगदान 40.73% रहा, जबकि लघु सिंचाई परियोजनाओं का योगदान 59.22% रहा था, जिससे यह कहा जा सकता है कि लघु सिंचाई परियोजनाएँ सिंचाई क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

प्रश्न 6.
कृषि की निम्न उत्पादकता के कारणों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कृषि की निम्न उत्पादकता के कारण (Causes of Low Productivity of Agriculture) यह निम्नलिखित हैं :

  1. कृषि क्षेत्र पर जनसंख्या वृद्धि का बढ़ता दबाव। गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार के अधिक अवसर न होने के कारण यह दबाव निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिकों का लगभग 3/4 भाग कृषि में लगा है।
  2. भारत में गाँव के लोगों में रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, अज्ञानता आदि पायी जाती है जो कृषि उत्पादकता की निम्नता का एक कारण है।
  3. भारत में जोतों का आकार छोटा होता है, जिससे कृषि लागत अधिक आती है तथा उत्पादकता कम रहती है।
  4. आज भी जमींदार, रसूखदार, महाजन आदि लोगों का अस्तित्व भी इसका एक कारण है।
  5. किसानों द्वारा पिछड़ी तकनीकी का प्रयोग किया जाना।
  6. भारतीय कृषि आज भी मानसून पर निर्भर है अर्थात् सिंचाई सुविधाओं का अपर्याप्त विकास हुआ है।
  7. भारतीय किसानों को फसल-मूल्य (Crop Value) उचित नहीं मिलता जिससे किसान उत्पादकता में वृद्धि के लिए अग्रसर नहीं हो पाते हैं।

प्रश्न 7.
कृषिगत साख व्यवस्था को अवधि के आधार पर किये गए विभाजन को समझाइए।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 17 कृषिगत विकास 1

  • अल्पकालीन ऋण (Short Term Loan) :
    किसानों को खाद, बीज, उर्वरक तथा अन्य घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु दिया गया 15 माह से कम अवधि का ऋणा इसकी पूर्ति सहकारी समितियों, महाजन व साहूकारों द्वारा की जाती है।
  • मध्यमकालीन ऋण (Medium Term Loan) :
    किसानों को भूमि पर सुधार करने, कृषि यंत्र, बैल आदि खरीदने के लिए दिया गया 15 माह से 5 वर्ष की अवधि का ऋणा
  • दीर्घकालीन ऋण (Long Term Loan) :
    यह ऋण 5 वर्ष से अधिक की अवधि के लिए भूमि को समतल करवाने, कुएँ ‘खुदवाने, नई भूमि खरीदने, पुराने कर्जे चुकाने, भारी मशीनरी-ट्रैक्टर आदि खरीदने, लघु सिंचाई व्यवस्था को विकसित करने आदि के लिए किये जाते हैं।

प्रश्न 8.
प्रदूषण रहित कृषि विकास पर एक नोट लिखिए।
उत्तर:
प्रदूषण रहित कृषि विकास अथवा द्वितीय हरित क्रांति (Agriculture Development without Pollution or Second Green Revolution) :
कृषि विकास में प्रदूषण रहित संसाधनों के प्रयोग करने अथवा पारिस्थितिकी के अनुकूल ही तकनीक के प्रयोग करने को द्वितीय हरित क्रांति या धारणीय विकास (Sustainable Development) कहा जाता है। एम. एस. स्वामीनाथन, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम व पी.एस. पित्रौदा ने इस क्रांति को निम्न प्रक्रियाओं को अपनाए जाने पर जोर दिया है :

  1. रासायनिक उर्वरकों की जगह जैव-उर्वरकों (Bio-fertilizers) का प्रयोग किया जाए।
  2. रासायनिक कीटनाशकों की जगह जैव-कीटनाशकों (Bio-pesticides) के प्रयोग में वृद्धि की जाए।
  3. जल संरक्षण, फसलों के संतुलित व उपयुक्त प्रतिरूपों (Patterns) को अपनाया जाए।

भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने जनसंख्या वृद्धि के पश्चात् होने वाले खाद्यान्न संकट से बचने के लिए खाद्यान्नों की पूर्ति बनाने हेतु द्वितीय हरित क्रांति को अपनाने पर बल दिया। जिसके अंतर्गत खेत से बाजार तक के सभी तत्त्वों को समावेश होने को अति आवश्यक बनाया गया।

RBSE Class 11 Economics Chapter 17 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्त्व पर लेख लिखिए।
उत्तर:
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व (Importance of Agriculture of Indian Economy) :
स्वतंत्रता के बाद में भारत की लगभग 65% जनसंख्या कृषि कार्यों में संलग्न है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्त्व को अग्रलिखित बिंदुओं के आधार पर समझा जा सकता है :

  • राष्ट्रीय आय में कृषि का महत्त्व (Importance of Agriculture in National Income) :
    भारत केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन के एकत्रित आँकड़ों के अनुसार 1950-51 में कृषि का हिस्सा सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product-GDP) का 56.6% था जो ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के समय 15.2% रह गया। राष्ट्रीय आय में कृषि के अंश के कम होने को विकासात्मक अर्थव्यवस्था का संकेत माना जा सकता है।
  • रोजगार में कृषि का योगदान (Contribution of Agriculture in Employment) :
    भारतीय कार्यशील जनसंख्या का लगभग 65% भाग कृषि पर ही प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से आजीविका के लिए आश्रित है। कृषि एवं इससे सम्बद्ध क्रियाएँ; जैसे मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, पशु पालन आदि में रोजगार के अधिक अवसर होने के कारण जनसंख्या का अधिक हिस्सा इस पर निर्भर है।
  • औद्योगिक विकास में कृषि का महत्त्व (Importance of Agriculture in Industrial Development) :
    विभिन्न उद्योगों में कृषि द्वारा ही कच्चा माल उपलब्ध कराया जाता है। जैसे- चाय उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग, वनस्पति व बागान उद्योग, जूट उद्योग आदि प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर होते हैं। इसके अलावा चावल कूटना, हथकरघा बुनाई, तेल निकालना आदि कार्य अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। वर्तमान में खाद्य प्रसंस्करण (Food-Processing) का उद्योग तीव्र गति से विकास कर रहा है जो पूर्णरूप से कृषि पर निर्भर है।
  • विदेशी व्यापार में कृषि का महत्त्व (Importance of Agriculture in Foreign Trade) :
    भारतीय कृषिगत वस्तुओं में चाय, तम्बाकू, गर्म मसाले, सूखे मेवे, तेल निकालने के बीज आदि को विदेशों में निर्यात किया जाता है, जिससे विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है तथा विदेशी मुद्रा कोष भण्डार में वृद्धि होती है।
  • आर्थिक नियोजन में कृषि का महत्त्व (Importance of Agriculture in Economic Planning) :
    कृषि परिवहन व्यवस्था के विकास का मुख्य आधार है क्योंकि ज्यादातर कृषि वस्तुओं की ढुलाई रेल-परिवहन व सड़क परिवहन द्वारा ही की जाती है। इसके अतिरिक्त फसल अच्छी होने पर किसान अपनी क्रय शक्ति में वृद्धि होने के कारण उद्योगजनित वस्तुओं की मांग बढ़ा देते हैं, जिससे उद्योगों के विकास में वृद्धि होती है। सरकार के वित्त साधन भी अप्रत्यक्ष रूप से बहुत अधिक कृषि पर निर्भर रहते हैं।

उपसंहार (Conclusion) :
इस प्रकार से कहा जा सकता है कि कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है तथा इसकी सम्पन्नता पर ही भारतीय अर्थव्यवस्था की समृद्धि निर्भर है।

प्रश्न 2.
हरित क्रांति से क्या तात्पर्य है? इस क्रांति की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
हरित क्रांति (Green Revolution) :
1960 के दशक की शुरुआत में नई तकनीकी व अधिक उपज देने वाले बीजों का प्रयोग किया गया। जिससे फसलों की प्रति हैक्टेयर उत्पादकता में तेजी से वृद्धि हुई, जिसे ‘हरित क्रांति’ (Green Revolution) कहा गया। भारत में वास्तविक रूप से हरित क्रांति की शुरुआत 1966 में खरीफ की फसल से पायी जाती है। भारत में हरित क्रांति का जनक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन को माना जाता है। जबकि विश्व में नॉरमन ई. बोरलॉग हरित क्रांति के जनक कहे जाते हैं। यह HYV (High Yielding Varieties) बीजों से सम्बन्धित एक सामूहिक पैकेज थी जोकि सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था से सम्बन्धित थी। भारत में हरित क्रांति को दो चरणों में बाँटा गया :

  • प्रथम चरण (First Stage) :
    इसे ‘केन्द्रीकरण का चरण’ कहा गया। यह मुख्य रूप से गेहूँ व चावल की फसलों तक ही केन्द्रित रहा तथा इसका क्षेत्रीय विस्तार पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित रहा. था।
  • द्वितीय चरण (Second Stage) :
    इसमें पाँच फसलों (गेहूँ, चावल, बाजरा, ज्वार व मक्का) को शामिल किया गया तथा इसे देश के अन्य क्षेत्रों में भी लागू किया गया, इसी कारण इसे ‘विकेन्द्रीकरण का चरण’ कहा जाता है।

हरित क्रांति की सफलता/प्रभाव (Success or Impact of Green Revolution) :

  1. फसलों के कुल उत्पादन व उत्पादकता में वृद्धि हुई। गेहूँ में सबसे अधिक वृद्धि होने के कारण इसे गेहूँ-क्रांति (Wheat Revolution) भी कहा जाता है।
  2. उर्वरकों (Fertilizers) के प्रयोग में वृद्धि हुई।
  3. सिंचाई सुविधाओं का विस्तार हुआ।
  4. कृषि में मशीनीकरण को अधिक प्रोत्साहन दिया गया।
  5. कीटनाशकों व उन्नत किस्म के बीजों के प्रयोग में वृद्धि हुई।

हरित क्रांति की असफलताएँ उत्पन्न समस्याएँ (Failures or Problems of Green Revolution) :

  1. हरित क्रांति मुख्य रूप से गेहूँ की वृद्धि पर केन्द्रित रही। मोटे अनाजों पर यह अप्रभावी रही।
  2. वाणिज्यिक फसलों (Commercial Crops) के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई।
  3. दालों के उत्पादन में कम वृद्धि हुई।
  4. हरित क्रांति का प्रभाव सभी क्षेत्रों पर नहीं पड़ा, जिससे कृषि विकास में असंतुलित (Unbalanced) विकास होने लगा।
  5. कृषि की नई रणनीति का लाभ शिक्षित व सम्पन्न किसान ही उठा सके तथा सीमांत व लघु किसान इसके लाभ से अवंचित रहे।
  6. हरित क्रांति के कारण पारिस्थितिकी तंत्र पर भी कई विपरीत प्रभाव पड़े; जैसे- मिट्टी की लवणीयता-क्षारीयता में वृद्धि, मृदा अपरदन, मृदा प्रदूषण आदि।
  7. सरकार द्वारा दी गई कृषिगत. रियायतों का लाभ बड़े किसानों को ही मिला।
  8. रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग बढ़ा जिससे धारणीय विकास की अवधारणा को आघात पहुँचा।

निष्कर्ष (Conclusion) :
अत: हम यह कह सकते हैं कि हरित क्रांति से बहुत से लाभ देखने को मिले, परन्तु यह सीमित क्षेत्रों को ही प्रभावित कर सके, जिससे एक और हरित क्रांति की आवश्यकता महसूस की जाने लगी।

प्रश्न 3.
कृषिगत आगत क्या है? प्रमुख कृषि आगतों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
कृषिगत आगत (Agricultural Inputs) :
कृषिगत उत्पादन व उत्पादकता कृषिगत आगतों पर निर्भर होती है। यदि इनका उचित प्रबंधन व सही मात्रा में प्रयोग किया जाए तो कृषिगत उत्पादकता व उत्पादन में बहुत तेजी से वृद्धि की जा सकती है।

प्रमुख कृषिगत आगत (Main Agricultural Inputs) :
इसके अंतर्गत सिंचाई, उर्वरक, उन्नत किस्म के बीजों व कीटनाशकों के प्रयोग को शामिल किया जाता है। :
(i) उर्वरक (Fertilizers) :
भारत की भूमि में नाइट्रोजन और फास्फोरस तत्वों की कमी होती है, जिससे कि उर्वरकों, प्रयोग कार्बनिक खाद के साथ करने पर फसल में तीव्रता से वृद्धि होती है। अतः खाद्यान्नों का उत्पादन बढ़ाने हेतु उर्वरकों के प्रयोग में वृद्धि उचित है। भारत में नाइट्रोजन (N) तथा फास्फोरस (P) का उत्पादन होता है। जबकि पोटाश (K) के लिए हम पूर्ण रूप से आयात पर निर्भर हैं। भारत में N : P : K अनुपात 2013-14 में 8.2 : 3.2 : 1 था, जोकि इनके प्रयोग में अंसतुलन को दर्शाता है।

(ii) सिंचाई (Irrigation) :
फसलों को उचित समय पर पानी देकर उसकी उत्पादकता को बढ़ाये जाने के लिए सिंचाई अति आवश्यक है। भारत में मात्र 44.9% कृषि भूमि पर ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है बाकी बची 53.1% कृषि भूमि वर्षा पर निर्भर करती है। सन् 1950-51 में भारत में सिंचित क्षेत्र 22.6 मिलियन हैक्टेयर था जो 2011-12 में बढ़कर 113.2 मिलियन हैक्टेयर हो गया था। यह योजनाकाल में किये गए अच्छे प्रबन्ध व प्रयासों का ही नतीजा था।

(iii) उन्नत किस्म के बीज (High Yielding Varities of Seeds) :
भारत में हरित क्रांति के समय उन्नत किस्म के बीजों पर विशेष बल दिया गया। सन् 1966 में खरीफ की फसल से उन्नत किस्म के बीजों को अपनाया गया था। यह कार्यक्रम ‘पैकेज कार्यक्रम’ (Package Programme) कहलाया क्योंकि इसे जिन क्षेत्रों में लागू करना था वहाँ सिंचाई की व्यवस्था, उर्वरकों के प्रयोग से लेकर कीटनाशक दवाओं का उपयोग भी जरूरी था। गेहूँ के साथ-ही-साथ चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का आदि फसलों के लिए यह कार्यक्रम लागू किया गया था। उन्नत किस्म के बीजों से सर्वाधिक सफलता गेहूँ की फसल को मिली जबकि चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का आदि में बहुत कम सफलता देखने को मिली। इस कार्यक्रम द्वारा बहुत-सी महत्त्वपूर्ण फसलों पर ध्यान ही नहीं दिया गया; जैसे-दलहन, तिलहन, फल और सब्जी आदि।

(iv) कीटनाशक दवाएँ (Pesticides and Insecticides) :
भारत में 10-15 प्रतिशत फसल प्रतिवर्ष पौध संरक्षण के अभाव में नष्ट हो जाती है। ऐसे में फसलों को विभिन्न प्रकार के रोगों से बचाने के लिए कीटनाशकों का प्रयोग करना आवश्यक हो जाता है। कीटनाशक दवाओं का प्रयोग 1970-71 में 24.3 हजार टन था जो बढ़कर 2011-12 में 50.58 हजार टन हो गया था। कीटनाशकों के बढ़ते हुए दुष्प्रभावों को देखते हुए इनको नियंत्रित मात्रा में प्रयोग किया जाने लगा

(v) खेती में मशीनीकरण (Farm Mechanization) :
नई तकनीकी व मशीनों के प्रयोग द्वारा मशीनीकरण अपनाकर उत्पादन तथा उत्पादकता में वृद्धि करने के साथ-साथ कुल लागत में कमी, कृषकों की आय में वृद्धि तथा खाद्यान्न फसलों से व्यावसायिक फसलों की ओर अग्रसर होने का अवसर प्राप्त होता है।

निष्कर्ष (Conclusion) :
अत: इस प्रकार से यह कहा जा सकता है कि कृषि आगतों के व्यवस्थित तथा उचित प्रयोग द्वारा कृषि उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है, जिससे कि देश का विकास होगा। इन आगतों के अलावा फार्म मशीनरी, कृषिगत साख, बिजली की व्यवस्था करके भी कृषि की उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है।

प्रश्न 4.
कृषि वित्त के स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कृषि वित्त के स्रोत (Sources of Agricultural Finance) :
कृषि वित्त के स्रोतों को दो भागों में बाँटा जा सकता है :
RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 17 कृषिगत विकास 2


(I) ‘गैर-संस्थागत स्रोत (Non-Institutional Sources) :
इसके अंतर्गत महाजन, साहूकार, सगे-सम्बन्धी, रिश्तेदार, जमींदार आदि सम्मिलित होते हैं। इन्हें ‘देशी बैंकर’ भी कहते हैं। इनके द्वारा किसानों को आसानी से परन्तु अधिक ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध होता है। किसानों द्वारा ऋण न चुका पाने पर उनसे ‘हाली’ के रूप में कार्य करवाया जाना या फिर उन्हें भूमि से बेदखल कर देना, जमीदारों व साहूकारों की मुख्य नीति थी।

(II) संस्थागत स्रोत (Institutional Sources) :
संस्थागत साख में निम्नलिखित स्रोतों को सम्मिलित किया जाता

  • सहकारी साख संस्थाएँ (Cooperative Credit Institutes) :
    इसकी शुरुआत भारत में 2004 में हुई थी। 2013-14 में कुल संस्थागत साख में इनका अंश 169% रहा था। यह मुख्यत: अल्पकालीन साख की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। इन्हें तीन भागों में बाँटा गया है
    1. प्राथमिक साख समितियाँ (Primary Credit Societies) :
      ग्राम स्तर के लिए गठित ये समितियाँ उत्पादक कार्यों के लिए ऋण प्रदान करती हैं।
    2. केन्द्रीय सहकारी बैंक (Central Cooperative Bank) :
      जिला स्तर पर गठित यह बैंक प्रमुख रूप से प्राथमिक साख समितियों को ऋण उपलब्ध कराती हैं। यह एक से तीन वर्ष की अवधि के लिए ऋण देती हैं तथा यह राज्य सहकारी बैंक तथा प्राथमिक साख समितियों के मध्य मध्यस्थ का कार्य करती है।
    3. राज्य सहकारी बैंक (State Cooperative Bank) :
      राज्य स्तर पर गठित यह बैंक जिला सहकारी बैंकों को दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराती है। यह रिजर्व बैंक द्वारा वित्त पोषित होती है।
  • भूमि विकास बैंक (Land Development Bank) :
    भारत में सर्वप्रथम इसकी स्थापना 1929 में की गई। इसे भूमि बंधक बैंक भी कहा जाता है। अब वर्तमान में यह कृषि और ग्रामीण विकास बैंक भी कही जाती है। यह किसानों को दीर्घकालीन ऋण प्रदान करती है।
  • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (Regional Rural Banks – RRBs) :
    2 अक्टूबर, 1975 को 5 बैंकों की स्थापना होने के साथ ही क्षेत्रीय बैंकों की शुरुआत की गई। कुछ वर्षों के बाद इनकी संख्या 196 हो गयी तथा 2005 में विलयन होने के बाद इनकी संख्या घटकर 56 रह गयी है। कुल संस्थागत साख में इनका योगदान 2013-14 में 116% था।
  • व्यापारिक बैंक (Commercial Bank) :
    व्यापारिक बैंकों का कृषि साख में योगदान बढ़ाने हेतु जुलाई 1969 में 14 प्रमुख बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इसके पश्चात् 1980 में 6 और व्यापारिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। 2013-14 में इनका कृषिगत संस्थागत साख में योगदान 71.50% था।
  • नाबार्ड (National Bank for Agriculture and Rural Development-NABARD) :
    क्राफीकार्ड (CRAFICARD) समिति की अनुशंसा पर जुलाई 1982 में नाबार्ड की स्थापना की गयी। इसे ग्रामीण साख की सर्वोच्च संस्था माना जाता है। नाबार्ड द्वारा ARDC तथा भारतीय रिजर्व बैंक के कृषिगत साख विभाग के सभी कार्य अपने हाथ में ले लिये गए हैं।

प्रश्न 5.
नाबार्ड की ग्रामीण साख व्यवस्था की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
क्राफीकार्ड (CRAFICARD) समिति की अनुशंसा पर जुलाई 1982 में नाबार्ड की स्थापना गयी। यह ग्रामीण साख की सर्वोच्च संस्था है। 1963 में भारतीय रिजर्व बैंक ने कृषि पुनर्वित्त निगम की स्थापना की जिसका नाम 1975 में बदलकर कृषि पुनर्वित्त एवं विकास निगम’ (Agricultural Refinance and Development Corporation-ARDC) रख दिया गया। नाबार्ड द्वारा ARDC तथा रिजर्व बैंक के समस्त कृषि साख विभाग के कार्य अपने हाथ में ले लिए गए। नाबार्ड (NABARD) की प्राथमिक चुकता पूँजी 100 करोड़ रुपए थी।

नाबार्ड की ग्रामीण साख व्यवस्था में भूमिका (Role of NABARD in Rural Credit System) :
यह निम्नवत् बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है :

  1. यह ग्रामीण साख की सर्वोच्च संस्था है।
  2. नाबार्ड द्वारा सहकारी समितियों, सहकारी बैंकों, भूमि विकास बैंकों व क्षेत्रीय ग्रामीण विकास बैंकों को अल्पकालीन, मध्यमकालीन तथा दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराये जाते हैं।
  3. नाबार्ड कृषि तथा ग्रामीण क्षेत्र से सम्बन्धित सभी क्रियाओं के समन्वय, एकीकरण व नियंत्रण के लिए जिम्मेदार होती है।
  4. इसके द्वारा अपने कृषि साख विभाग के माध्यम से सहकारी क्षेत्र की गतिविधियों पर नजर रखी जाती है।
  5. नाबार्ड सहकारी बैंकों को मौसमी कृषि कार्यों, उर्वरकों की खरीद व वितरण, कृषि उत्पादन की बिक्री व सहकारी चीनी फैक्ट्रियों की कार्यशील पूँजी के लिए ऋण उपलब्ध कराता है।
  6. नाबार्ड द्वारा राज्य सहकारी बैंकों तथा क्षेत्रीय बैंकों को प्राकृतिक विपदाओं से ग्रस्त इलाकों में ऋण की अवधि बढ़ाने के लिए ऋण उपलब्ध कराता है तथा भूमि समतलीकरण, कृषि औजारों की खरीद के लिए मध्यमकालीन ऋण प्रदान करता है।
  7. नाबार्ड कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सुधार हेतु राज्य सहकारी बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों तथा व्यापारिक बैंकों को दीर्घकालीन ऋण प्रदान करता है।
  8. यह राज्य सरकारों को भी सहकारी साख संस्थाओं के योगदान के लिए दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराता है।
  9. यह अनुसंधान एवं विकास फण्ड रखता है जिससे कृषि व ग्रामीण विकास को प्रोत्साहित किया जा सके व विभिन्न क्षेत्रानुसार परियोजनाओं का निर्माण किया जा सके।

RBSE Class 11 Economics Chapter 17 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 Economics Chapter 17 बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संयुक्त राज्य अमेरिका में कितने प्रतिशत कृषि का योगदान राष्ट्रीय आय में होता है?
(अ) 2-3 प्रतिशत
(ब) 3-4 प्रतिशत
(स) 5-6 प्रतिशत
(द) 7 प्रतिशत
उत्तर:
(अ) 2-3 प्रतिशत

प्रश्न 2.
वर्तमान में कौन-सा उद्योग पूर्णतया कृषि पर निर्भर है?
(अ) चावल कूटना
(ब) खाद्य प्रसंस्करण
(स) साबुन बनाना
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ब) खाद्य प्रसंस्करण

प्रश्न 3.
प्रथम पंचवर्षीय योजना में लगान की सीमा कुल उत्पादन में कितना भाग रखी गई?
(अ) (frac{1}{5}) या (frac{1}{4} )
(ब) (frac{1}{6}) या (frac{1}{7} )
(स) (frac{1}{3}) या (frac{1}{4} )
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) (frac{1}{5}) या (frac{1}{4} )

प्रश्न 4.
2010-11 में सीमांत जोत कुल जोतों की कितनी प्रतिशत थी?
(अ) 28%
(ब) 40%
(स) 62%
(द) 67%
उत्तर:
(द) 67%

प्रश्न 5.
2013-14 में गेहूँ की उत्पादकता कितने किलोग्राम प्रति हैक्टेयर थी?
(अ) 2020
(ब) 2136
(स) 2424
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(स) 2424

RBSE Class 11 Economics Chapter 17 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रत्यक्ष रूप में कौन-से उद्योग कृषि पर निर्भर है?
उत्तर:
चाय, जूट, सूती वस्त्र, चीनी, वनस्पति तथा बग्गम उद्योग व खाद्य प्रसंस्करण उद्योग।

प्रश्न 2.
भारत द्वारा मुख्य रूप से विदेशों को। निर्यात की जाने वाली वस्तुएँ बताइए।
उत्तर:
चाय, तम्बाकू, गर्म मसाले, सूखे मेवे, तेल निकालने के बीज आदि।

प्रश्न 3.
भू-सुधार के अंतर्गत कौन-से कदम उठाये गए?
उत्तर:

  1. बिचौलियों की समाप्ति,
  2. काश्तकारी सुधार,
  3. जोतों का सीमा निर्धारण तथा
  4. कृषि का पुनर्गठन।

प्रश्न 4.
NFSM का पूरा नाम बताइए।
उत्तर:
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (National Food Security Mission)

प्रश्न 5.
नहरों द्वारा सिंचाई प्रमुख रूप से किन राज्यों में की जाती है?
उत्तर:
पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा दक्षिणी भारत।

प्रश्न 6.
2010-11 में तालाबों का शुद्ध सिंचित क्षेत्र में योगदान कितने प्रतिशत था?
उत्तर:
3.1 प्रतिशत।

प्रश्न 7.
भारत की 1966 में खरीफ की उन्नत किस्म का नाम बताइए।
उत्तर:
टाइचुंग नेटिव।

प्रश्न 8.
गेहूँ की 1966 में उन्नत फसलों के नाम लिखिए।
उत्तर:
लरमा, रोजो 64-ए तथा सोनारा-64

प्रश्न 9.
विश्व के संदर्भ में हरित क्रांति के जनक कौन हैं?
उत्तर:
नॉरमन ई. बोरलॉग।

प्रश्न 10.
सूक्ष्म वित्त की अवधारणा सर्वप्रथम किस देश ने अपनायी?
उत्तर:
बांग्लादेश।

प्रश्न 11.
सर्वप्रथम उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग कहाँ किया गया?
उत्तर:
मैक्सिको तथा ताईवान में।

प्रश्न 12.
प्राचीन काल में किन कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए भारत प्रसिद्ध था?
उत्तर:
ढाका की मलमल, भारतीय मसाले, जूट, वस्त्र आदि कृषि उत्पाद पूरे विश्व में अपनी उत्कृष्टता के लिए प्रसिद्ध थे।

प्रश्न 13.
स्वतंत्रता से पूर्व कृषि क्षेत्र का विकास क्यों नहीं हुआ?
उत्तर:
ब्रिटिश शासकों की औपनिवेशिक नीतियों के कारण कृषि का विकास नहीं हुआ तथा उन्होंने भारत को मात्र कच्चे माल का निर्यातक तथा इंग्लैण्ड में बने माल का आयातक बना दिया था।

प्रश्न 14.
राष्ट्रीय आय में कृषि के योगदान को आँकड़ों द्वारा बताइए।
उत्तर:
केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन के अनुसार सन् 1950-51 में जी.डी.पी. में कृषि का अंश 56.6% था जोकि कम होकर ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 15.2% रह गया।

प्रश्न 15.
विदेशी व्यापार में कृषि का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
भारत से कई कृषिगत वस्तुएँ विदेशों को निर्यात की जाती हैं; जैसे-चाय, तम्बाकू, गर्म मसाले, सूखा मेवा आदि, जिससे विदेशी मुद्रा का अर्जन होता है तथा विदेशी मुद्रा कोष में वृद्धि होती है।

प्रश्न 16.
कृषि के पिछड़ेपन के क्या कारण रहे थे?
उत्तर:
ब्रिटिश शासकों द्वारा अपनायी गई लगान वसूली की जमींदारी, रैयतवारी तथा महलवारी प्रथाएँ किसानों की गरीबी, दयनीयता तथा कृषि के पिछड़ेपन का कारण रही थीं।

प्रश्न 17.
काश्तकारी व्यवस्था (Tenancy System) से क्या तात्पर्य है
उत्तर:
वह प्रणाली जिसमें भूमि का मालिक स्वयं खेती न करके काश्तकारों को अपनी भूमि पट्टे पर दे देता हो, वह काश्तकारी व्यवस्था कहलाती है।

प्रश्न 18.
काश्त अधिकारों की सुरक्षा के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:

  1. काश्तकारों की बेदखली को रोकने,
  2. भू-स्वामी को भूमि खुद-काश्त के लिए ही लौटाने,
  3. भूमि को भू-स्वामी का लौटाने के बाद भी कुछ भूमि को काश्तकार के पास छोड़ना।

प्रश्न 19.
चकबंदी (Consolidation) से क्या आशय है?
उत्तर:
चकबंदी से आशय किसानों को गाँव में उनके विभिन्न स्थानों पर बिखरे हुए खेतों की जगह एक ही स्थान पर खेत उपलब्ध कराने से है।

प्रश्न 20.
निम्न कृषि उत्पादकता का जनसंख्या वृद्धि से क्या सम्बन्ध है? बताइए।
उत्तर:
कृषि क्षेत्र पर जनसंख्या के बढ़ते दबाव के कारण आज भी कृषि उत्पादकता कम है तथा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिकों का लगभग : भाग कृषि सम्बन्धित कार्यों में संलग्न है।

प्रश्न 21.
भारत में जोतों का आकार कैसा है तथा उसकी कृषि की उत्पादकता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
भारत में जोतों का आकार छोटा है, जिससे कृषि की लागत तो अधिक आती है तथा उत्पादकता का स्तर अभी भी कम है। लगभग 8% जोतें सीमांत जोत के रूप में विद्यमान हैं।

प्रश्न 22.
भारत में कृषि की निम्न उत्पादकता के लिए सिंचाई सुविधाएँ किस प्रकार से जिम्मेदार हैं?
उत्तर:
आजादी के इतने वर्षों बाद भी अभी 53% भूमि वर्षा पर आश्रित है जो यह दर्शाता है कि भारत में अभी भी सिंचाई सुविधाओं का अभाव है, जिससे कृषि की उत्पादकता निम्न है।

प्रश्न 23.
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषिगत उत्पादकता बढ़ाने हेतु क्या किया गया?
उत्तर:
कृषिगत उत्पादकता बढ़ाने हेतु ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (National Food Security Mission-NFSM) को लागू किया गया।

प्रश्न 24.
सरकार को कृषि उत्पादकता में वृद्धि करने हेतु क्या करना चाहिए?
उत्तर:
सरकार द्वारा भूमि सुधारों का क्रियान्वयन, | कृषिगत आगतों का समुचित मात्रा में प्रयोग, साख तथा – विपणन सुविधाओं की उपलब्धता तथा फसलों हेतु उचित-कीमत नीति लागू की जानी चाहिए।

प्रश्न 25.
कृषिगत आगतों (Agricultural Inputs) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
कृषिगत आगतों में सिंचाई, उर्वरक, उन्नत किस्म के बीज तथा कीटनाशकों के प्रयोग को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 26.
लघु सिंचाई परियोजना से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
वह परियोजनां जिनके अंतर्गत कृषिगत कमाण्ड क्षेत्र 2000 हैक्टेयर से कम होता है, वह लघु सिंचाई परियोजनाएँ (Small Irrigation Project) कहलाते हैं।

प्रश्न 27.
मध्यम सिंचाई परियोजना से क्या आशय
उत्तर:
जिन परियोजनाओं का कृषि कमाण्ड क्षेत्र 2000 हैक्टेयर से 10,000 हैक्टेयर के बीच होता है, वह मध्यम सिंचाई परियोजनाएँ (Medium Irrigation Project) कहलाती हैं।

प्रश्न 28.
बड़ी सिंचाई परियोजना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
वह सिंचाई परियोजनाएँ जिनका कृषि कमाण्ड क्षेत्र 10,000 हैक्टेयर से अधिक होता है, बड़ी सिंचाई परियोजनाएँ (Large Irrigation Project) कहलाती हैं।

प्रश्न 29.
तालाबों द्वारा सिंचाई किन राज्यों में की जाती है?
उत्तर:
तालाबों के द्वारा सिंचाई तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक आदि राज्यों में की जाती है।

प्रश्न 30.
शुद्ध सिंचित क्षेत्र में सर्वाधिक योगदान किसका है?
उत्तर:
शुद्ध सिंचित क्षेत्र में सर्वाधिक योगदान कुओं व नलकूपों का है। यह 2010-11 में शुद्ध सिंचित क्षेत्र का योगदान 61.4 प्रतिशत था।बढ़कर 783.50 लाख हैक्टेयर हो गया।

प्रश्न 31.
उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग आँकड़ों द्वारा बताइए।
उत्तर:
उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग 1966-67 में 18.90 लाख हैक्टेयर भूमि में किया था, जोकि 1998-99 बढ़कर 783.50 लाख हैक्टेयर हो गया।

प्रश्न 32.
हरित क्रान्ति के पश्चात् कीटनाशकों के प्रयोग में कितनी वृद्धि हुई?
उत्तर:
कीटनाशकों का प्रयोग 1970-71 में 24.3 हजार टन था जो. 2011-12 में बढ़कर 50.58 हजार टन हो गया।

प्रश्न 33.
भारत में पहले परम्परागत कृषि किस प्रकार की जाती थी?
उत्तर:
भारत में पहले परम्परागत कृषि हल, बैल, घोड़े, जोहड़, तालाब आदि के माध्यम से की जाती थी, जिससे उत्पादन व उत्पादकता दोनों का स्तर कम रहता था।

प्रश्न 34.
मशीनीकरण (Mechanisation) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
कृषि के परम्परागत तरीकों की जगह आधुनिक तरीकों को अपनाकर कृषि करना, मशीनीकरण कहलाता है।

प्रश्न 35.
हरित क्रान्ति की शुरुआत कब हुई?
उत्तर:
हरित क्रान्ति की शुरुआत 1966 में खरीफ की फसल से मानी जाती है, जब श्रीमती इंदिरा गाँधी तथा कृषि मंत्री श्री सी. सुब्रह्मण्यम ने कृषि की इस रणनीति को अपनाने की बात सबके समक्ष रखी।

प्रश्न 36.
गेहूँ की उन्नत किस्म के बीजों की खोज किसने की तथा इसका क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
मैक्सिको में अनुसंधान में संलग्न कृषि वैज्ञानिक नॉरमन ई. बोरलॉग (Norman E. Borlaug) ने गेहूँ के उत्तम किस्म के बीजों की खोज की थी, जिससे गेहूँ की उत्पादकता को 200 से 250 गुना तक बढ़ाया जा सकता था।

प्रश्न 37.
डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने गेहूँ की कौन-सी किस्में विकसित की?
उत्तर:
इनके द्वारा मैक्सिन गेहूँ के बीजों की कमियाँ दूर करके गेहूँ की नई किस्में ‘शर्बती सोना’ व ‘पूसा लरमा’ को विकसित किया गया।

प्रश्न 38.
1970 में शांति का नोबेल पुरस्कार किसे मिला?
उत्तर:
नॉरमन ई. बोरलॉग को 1970 में शांति को नोबेल पुरस्कार मिला, इन्हें विश्व के संदर्भ में हरित क्रांति का जनक कहा जाता है।

प्रश्न 39.
हरित क्रांति के प्रथम चरण का क्षेत्रीय विस्तार किन राज्यों तक रहा?
उत्तर:
हरित क्रांति के प्रथम चरण का क्षेत्रीय विस्तार पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित रहा।

प्रश्न 40.
हरित क्रांति का प्रथम चरण केन्द्रीयकरण का चरण क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
60 से 90 के दशक के मध्य तक रहे इस प्रथम चरण को मुख्यत: गेहूँ तथा चावल की फसलों तक केन्द्रित होने के कारण ही ‘केन्द्रीयकरण का चरण’ कहा जाता है।

प्रश्न 41.
हरित क्रांति को गेहूँ-क्रांति क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
इस अवधि में सर्वाधिक प्रभाव गेहूँ की फसल पर पड़ा, इसकी उत्पादकता 851 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर से बढ़कर 3075 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर हो गयी।

प्रश्न 42.
हरित क्रांति के दौरान उर्वरकों में कितनी वृद्धि हुई?
उत्तर:
इस अवधि में उर्वरकों के प्रयोग में तीव्र वृद्धि हुई। इसका प्रयोग 1952-53 में मात्र 66000 टन जो 2013-14 में बढ़कर 239.6 लाख टन हो गया।

प्रश्न 43.
हरित क्रांति के दौरान सिंचाई सुविधाओं में क्या परिवर्तन हुआ?
उत्तर:
इस दौरान 1950-51 में सिंचाई संभाव्यता (Irrigation Potential) 2.26 करोड़ हैक्टेयर थी जो 2011-12 में बढ़कर 11.32 हेक्टेयर हो गई थी।

प्रश्न 44.
कृषिगत वित्त के विभाजन को बताइए।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 17 कृषिगत विकास 3

RBSE Class 11 Economics Chapter 17 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
रोजगार में कृषि के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भारतीय अर्थव्यवस्था में आज भी लगभग 65 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से कृषिगत कार्यों में संलग्न हैं। कृषि से सम्बन्धित क्रियाएँ जैसे-मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, पशु पालन आदि में रोजगार सम्भावनाएँ अधिक होने के कारण जनसंख्या इन पर अधिक निर्भर है। कृषि पर जनसंख्या अधिक निर्भर है परन्तु गैर-कृषि क्षेत्रों की तुलना में इनकी औसत आय बहत कम है।

प्रश्न 2.
औद्योगिक विकास में कृषि का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
हमारे उद्योगों के विकास में कृषि की भूमिका अहम् है। कृषि द्वारा ही उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराया जाता है, जैसे-चाय उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योग, वनस्पति उद्योग तथा बागान उद्योग आदि प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर ही आश्रित हैं। इनके अलावा चावल कूटना, साबुन बनाना, खाद्य पदार्थों से सम्बन्धित कार्य करना आदि कृषि पर अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं। वर्तमान समय में खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) का उद्योग तेजी से विकास कर रहा है जो पूर्ण रूप से कृषि पर निर्भर है। इससे आय व रोजगार दोनों बढ़ रहे हैं।

प्रश्न 3.
आर्थिक नियोजन में कृषि के महत्त्व पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
कृषि का हर क्षेत्र पर प्रभाव पड़ता है, जैसे-परिवहन व्यवस्था का मुख्य आधार भी कृषि है क्योंकि रेल-परिवहन व सड़क-परिवहन द्वारा अधिकतर कृषि वस्तुओं की दुलाई होती है। इसके अलावा यदि फसल अच्छी होती है तो इससे किसानों की क्रय शक्ति में वृद्धि होती है तथा वे उद्योग निर्मित वस्तुओं की माँग करते हैं, जिससे उद्योग जगत् में प्रगति होती है। अत: कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इसकी सम्पन्न पर ही भारतीय अर्थव्यवस्था की समृद्धि निर्भर है।

प्रश्न 4.
काश्तकारी सुधारों से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
काश्तकारी सुधार (Tenancy Reforms) :
सरकार द्वारा काश्तकारी व्यवस्था में निम्न सुधार किये गए :

  • लगान का नियमन स्वतंत्रता के पश्चात् प्रथम पंचवर्षीय योजना में यह सिफारिश की गई कि अधिकतम लगान कुल उत्पादन का (frac{1}{5}) या = (frac{1}{4}) से ज्यादा नहीं हो।
  • काश्त-अधिकारों की सुरक्षा-इनके अधिकारों की सुरक्षा के उद्देश्य से कई कानून बनाए गए। इन कानूनों के उद्देश्य काश्तकारों की बेदखली को रोकना, भू-स्वामी को भूमि खुद-काश्त के लिए ही लौटाने आदि थे।
  • काश्तकारों को भूमि का मालिकाना हक दिया गया। इसके लिए बहुत से कानून बनाये गए। इन कानूनों को पश्चिम बंगाल, कर्नाटक व केरल में अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक सफलता प्राप्त हुई।

प्रश्न 5.
जोतों की सीमा-निर्धारण बताइए।
उत्तर:
सरकार ने जोतों की उच्चतम सीमा का निर्धारण कर दिया। जिसके द्वारा खेतिहर किसानों को खेत दिए जा सकें। भारत में अधिकांश सीमांत जोत पायी जाती हैं, जिनकी उपज की तुलना में लागत अधिक आती है। देश में उपविभाजन (Sub-division) व उपखण्डन (Fragmentation) की समस्या के निदान के लिए जोतों की चकबंदी की गयी अर्थात् किसानों को गाँव में उनके बिखरे हुए विभिन्न खेतों के स्थान पर एक ही जगह खेत उपलब्ध करा दिए गए। जोतों का निर्धारण 2010-11 में निम्नांकित तालिकानुसार किया गया तथा उनका प्रतिशत भी इस प्रकार रहा.
RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 17 कृषिगत विकास 4
प्रश्न 6.
देश में जोतों का उपविभाजन व उपखण्डन क्यों हुआ?
उत्तर:
देश में जोतों का उपविभाजन व उपखण्डन होने के पीछे विभिन्न कानूनी, सामाजिक, आर्थिक व जनांकिकीय कारण थे। जैसे-निजी सम्पत्ति का अधिकार, उत्तराधिकार का नियम, जनसंख्या की बढ़ती दर, संयुक्त परिवारों का टूटना, बंटाई प्रथा तथा महाजन व साहूकारों का किसानों पर बढ़ता दबाव। इन्हीं कारणों से भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो गई।

प्रश्न 7.
कृषि के पुनर्गठन के विषय में समझाइए।
उत्तर:
कृषि के पुनर्गठन के अंतर्गत सरकार ने उपखण्डन व उपविभाजन की समस्या के समाधान के लिए चकबंदी (Consolidation) की व्यवस्था लागू की। चकबंदी के द्वारा सरकार ने गाँव में किसानों के बिखरे हुए खेतों के स्थान पर एक ही जगह उन्हें खेत उपलब्ध करवा दिए। इस प्रकार कृषि का पुनर्गठन (Reorganisation of Agriculture) को सार्थक किया।

प्रश्न 8.
भू-सुधारों से क्या प्रभाव देखने को मिले?
उत्तर:
भू-सुधारों के पश्चात् सरकार को लागू कानूनों से आंशिक सफलता ही प्राप्त हो पायी। जमींदारों ने कानूनों की कमियों का लाभ उठाया तथा स्वयं को किसान घोषित कर दिया अथवा न्यायालय में जाकर भू-सुधारों से सम्बन्धित कानूनों को चुनौती देकर भूमि के पट्टे अपने रिश्तेदारों के नाम से जारी करवा लिए। देश के सभी क्षेत्रों में इन भू-सुधारों को समान रूप से लागू नहीं किया जा पाया।

प्रश्न 9.
कृषि उत्पादन तथा उत्पादकता की प्रवृत्तियों को आँकड़ों द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कृषि उत्पादकता से आशय प्रति हैक्टेयर उत्पादकता से है। कृषि उत्पादकता की प्रवृत्तियों को हम निम्नलिखित तालिका के माध्यम से समझ सकते हैं
RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 17 कृषिगत विकास 5
उत्पादन ‘लाख टन’ में है तथा कपास व जूट के लिए ‘लाख गांठ’ में है। कपास के लिए एक गांठ = 170 किलोग्राम। जूट . के लिए एक गांठ = 180 किग्रा।
[Source : 6th FYP, Govt. of India, Economic Survey 2014-15, Vol.II, Govt. of India, Economic Survey 1980-81]

उपर्युक्त तालिकानुसार उत्पादन की दृष्टि से इस अवधि में सर्वाधिक वृद्धि गेहूँ के उत्पादन में हुई है, वह 64 लाख टन से बढ़कर 959 लाख टन हो गया। जबकि कुल खाद्यान्न उत्पादन 588 लाख टन से बढ़कर 2648 लाख टन हो गया। गैर-खद्यान्न फसलों में सर्वाधिक वृद्धि (लगभग 12 गुना) कपास की फसल की हुई।।

उत्पादकता की दृष्टि से देखें तो कुल खाद्यान्नों की उत्पादकता 1950-51 में 552 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर से बढ़कर 2013-14 में 2101 हो गयी तथा सर्वाधिक वृद्धि गेहूँ की उत्पादकता में तथा द्वितीय स्थान पर चावल की उत्पादकता में वृद्धि हुई। गैर-खाद्यान्न फसलों में कपास की उत्पादकता 88 किग्रा प्रति हैक्टेयर से बढ़कर 532 किग्रा प्रति हैक्टेयर हो गई। दालों की उत्पादकता में हर वर्ष औसत रूप से 1% की वृद्धि देखी गई।

प्रश्न 10.
कृषिगत निम्न उत्पादता के चार कारण बताइए।
उत्तर:

  1. जनसंख्या वृद्धि का कृषि क्षेत्र पर बढ़ता दबाव। आज भी ग्रामीण क्षेत्र में कार्यशील जनसंख्या का लगभग भाग कृषि क्षेत्र में संलग्न है।
  2. भारत के गाँव निवासियों की रूढ़िवादिता, अज्ञानता, अंधविश्वास के कारण।
  3. भारत में जोतों का आकार छोटा है, जिससे कृषि लागत अधिक आती है तथा उत्पादकता का स्तर कम रहता है।
  4. सरकार द्वारा भू-स्वामित्व प्रणाली हेतु बनाए गए कानूनों का उचित लाभ किसानों को न मिल पाना।

प्रश्न 11.
सिंचाई के साधन बताइए।
उत्तर:
सिंचाई के साधन (Means of Irrigation) :
प्रमुख रूप से वर्तमान में इन्हें तीन भागों में बाँटा गया है

  • नहरों से सिंचाई :
    नहरों से वर्ष 2010-11 में शुरू सिंचित क्षेत्र के 24.6% भाग पर सिंचाई की गयी। मुख्यत: नहरों द्वारा पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दक्षिण भारत के राज्य, बिहार आदि राज्यों में सिंचाई की जाती है।
  • तालाबों से सिंचाई :
    तालाबों से दक्षिण भारत के अनेक राज्यों; जैसे-तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक आदि में सिंचाई की जाती है। वर्ष 2010-11 में तालाबों द्वारा शुद्ध सिंचित क्षेत्र में 3.1% का योगदान दिया गया था।
  • कुओं से सिंचाई :
    कुओं में दो प्रकार के कुएँ शामिल होते हैं-सतही कुएँ व नलकूप। इनके द्वारा उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश में तथा हरियाणा में मुख्यत: सिंचाई की जाती है। वर्ष 2010-11 में शुद्ध सिंचित क्षेत्र में इसका योगदान 61.4% का था, जोकि सर्वाधिक है।

प्रश्न 12.
हरित क्रांति के प्रथम चरण के विषय में बताइए।
उत्तर:
हरित क्रांति का प्रथम चरण (First Stage of Green Revolution) :
60 से 90 के दशक के बीच की अवधि का यह चरण केन्द्रीयकरण का चरण’ भी कहलाता है। यह मुख्यत: गेहूँ व चावल की फसलों पर ही केन्द्रित रहा तथा इसका क्षेत्रीय विस्तार भी पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रहा था। इस चरण के अंतर्गत गेहूँ की उत्पादकता में बहुत तेजी से वृद्धि हुई, इसी वजह से इसे गेहूं की फसल पर केन्द्रित चरण भी कहते हैं।

प्रश्न 13.
हरित क्रांति के द्वितीय चरण के विषय में बताइए।
उत्तर:
हरित क्रांति का द्वितीय चरण (Second Stage of Green Revolution) :
इस चरण के अंतर्गत पाँच फसलों के समूह को सम्मिलित किया गया था। इनमें चावल, गेहूँ, बाजरा, ज्वार तथा मक्का की फसलें शामिल थीं। इसके साथ ही इन्हें देश के अन्य भागों में भी लागू किया गया, इसी वजह से इसे ‘विकेन्द्रीयकरण का चरण’ भी कहते हैं। इस चरण में सूखी खेती (Dry Farming) में वृद्धि, क्षेत्रीय विषमताओं में कमी, पारिस्थितिकीय संतुलन तथा मुद्रा के उपजाऊपन को बनाए रखने पर बल दिया गया।

प्रश्न 14.
हरित क्रांति के चार प्रभाव बताइए।
उत्तर:

  1. फसलों की कुल उत्पादकता व कुल उत्पादन में वृद्धि हुई। गेहूँ की फसल में अधिक वृद्धि होने के कारण इसे गेहूँ-क्रांति (Wheat Revolution) भी कहा गया।
  2. उर्वरकों के प्रयोग में बहुत तेजी के वृद्धि हुई।
  3. सिंचाई सुविधाओं का तेजी से विकास हुआ।
  4. कृषि में मशीनीकरण (Mechanisation) को बहुत प्रोत्साहन मिला, जिससे फसलों की उत्पादकता व उत्पादन में वृद्धि हुई।

प्रश्न 15. 
हरित क्रांति की चार असफलताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. हरित क्रांति मात्र गेहूँ की फसल पर केन्द्रित रहा। अन्य मोटे अनाज; जैसे-मक्का, ज्वार, बाजरा पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
  2. वाणिज्यिक फसलों (Commercial Crops) के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हो पायी।
  3. हरित क्रांति का प्रभाव कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रह पाया, जिससे असंतुलित विकास (Unbalanced Development) हो पाया।
  4. कृषि की नई रणनीति का फायदा शिक्षित तथा सम्पन्न किसान ही ले पाए।

प्रश्न 16.
उत्पादक तथा अनुत्पादक ऋणों को समझाइए।
उत्तर:
वे ऋण, जिनका प्रयोग किसान उत्पादन कार्यों हेतु करते हैं, उत्पादक ऋण (Productive Loan) कहे जाते हैं; जैसे-खाद, बीज, कृषि औजार, बैल, भूमि पर स्थायी सुधार करने के लिए। वे ऋण, जिनका प्रयोग किसान अनुत्पादक कार्यों हेतु करते हैं, अनुत्पादक ऋण (Unproductive Loan) कहे जाते हैं; जैसे-शादी, मृत्यु-भोज, अन्य सामाजिक संस्कारों, मुकदमेबाजी के लिए दिए गए ऋण।

प्रश्न 17.
गैर-संस्थागत स्रोतों के अंतर्गत किस प्रकार किसानों का शोषण किया जाता था?
उत्तर:
किसानों का कई तरह से शोषण किया जाता था; जैसे-अधिक ब्याज दर निर्धारित करना, ऋण खातों का लेखा-जोखा न रखना, ऋण में हेरा-फेरी करना, ब्याज दरों को बढ़ाकर लिख देना, खाली कागज पर किसानों से अंगूठा लगवा लेना आदि। जब किसानों द्वारा ऋण नहीं चुकाया जाता तो उनसे ‘हाली’ के रूप में कार्य करवाया जाता था फिर उन्हें भूमि से बेदखल कर दिया जाता। यही जमींदारों व साहूकारों की प्रमुख नीति थी।

प्रश्न 18.
विभिन्न राज्यों में साहूकारों तथा महाजनों पर लगाए गए प्रतिबंध बताइए।
उत्तर:
साहूकारों व महाजनों पर लगाए गए प्रमुख प्रतिबंध निम्नलिखित थे

  1. चक्रवृद्धि ब्याज पर प्रतिबंध लगाया गया।
  2. साहूकार ऋणों के अलावा वही व्यय वसूल कर सकते हैं जो कानून में उल्लिखित हो।
  3. मूलधन के अलावा झूठे दावों पर प्रतिबंध लगाना।
  4. दूसरे राज्यों में भुगतान से जुड़े प्रावधानों पर प्रतिबंध लगाना।

प्रश्न 19.
कृषिगत साख के संस्थागत स्रोतों के विषय में बताइए।
उत्तर:
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संस्थागत वित्त व्यवस्था धीरे-धीरे विकसित होने लगी। वर्ष 1951 से 2013 में संस्थागत वित्त का योगदान कृषि वित्त में बढ़कर 60% हो गया था। संस्थागत वित्त को बढ़ावा देने के लिए रिजर्व बैंक ने प्रो. वी.एस. व्यास की अध्यक्षता में Advisory Committee on Flow of Credit of Agriculture and Related Activities from the Banking System को गठित किया। समिति ने 2004 में 99 सुझावों के साथ अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें से 32 सुझावों को रिजर्व बैंक द्वारा मान लिया गया। संस्थागत स्रोतों में-

  1. सहकारी साख संस्थाएँ,
  2. भूमि विकास बैंक,
  3. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक,
  4. व्यापारिक बैंक तथा
  5. नाबार्ड को सम्मिलित किया जाता है।

प्रश्न 20.
सहकारी साख संस्थाओं के विषय में बताइए।
उत्तर:
सहकारी साख संस्थाएँ (Cooperative Credit Institute) :
इनकी शुरुआत सन् 1904 में हुई थी। स्वतंत्रता के पश्चात् इनका तेजी से विकास हुआ। 2013-14 में इनका कुल संस्थागत साख में 16.9% का योगदान रहा। इनकी त्रिस्तरीय व्यवस्था निम्न प्रकार की गयी है :

  • प्राथमिक साख समितियां (Primary Credit Societies) :
    ग्राम स्तर पर गठित की गयी ये समितियाँ उत्पादक कार्यों के लिए ऋण प्रदान करती हैं।
  • केन्द्रीय सहकारी बैंक (Central Cooperative Bank) :
    जिला स्तर पर गठित यह बैंक प्रमुख रूप से प्राथमिक साख समितियों को ऋण उपलब्ध कराती है। यह 1 से 3 वर्ष में लिए ऋण देती है।
  • राज्य सहकारी बैंक (State Cooperative Bank) :
    राज्य स्तर पर गठित यह बैंक जिला सहकारी बैंकों को दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराती हैं। यह रिजर्व बैंक द्वारा वित्त पोषित होती हैं।

प्रश्न 21.
भूमि विकास बैंक के विषय में संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भूमि विकास बैंक (Land Development Bank) :
इसकी स्थापना भारत में सर्वप्रथम 1929 में की गयी थी। इन्हें भूमि बंधक बैंक भी कहा जाता है तथा वर्तमान में इन्हें कृषि और ग्रामीण विकास बैंक कहते हैं। इनके द्वारा किसानों को दीर्घकालीन आवश्यकताओं हेतु साख प्रदान की जाती है। कुछ राज्यों में इनकी एकात्मक संगठन तथा कुछ में द्वि-संगठनात्मक व्यवस्था है। ग्राम स्तर पर प्राथमिक कृषि और विकास बैंक, राज्य स्तर पर राज्य कृषि और ग्रामीण विकास बैंक तथा ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना की जा चुकी है।

प्रश्न 22.
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के विषय में प्रकाश डालिए।
उत्तर:
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (Regional Rural Banks-RBBs) :
छोटे तथा सीमांत किसानों, कृषि मजदूरों, दस्तकारों आदि को ऋण प्रदान करने हेतु 2 अक्टूबर, 1975 में 5 बैंकों की स्थापना के साथ ही क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की शुरुआत हुई। कुछ वर्षों बाद इनकी संख्या 196 हो गयी तथा 2005 में विलयन के पश्चात् इनकी संख्या घटकर वर्तमान में 56 रह गयी है। वर्ष 2013-14 में इनका कुल संस्थागत साख में योगदान 116% था। इनके द्वारा दिए गए कुल ऋण में 90% ऋण ग्रामीण क्षेत्र के कमजोर वर्गों को प्रदान किये गए हैं।

प्रश्न 23.
व्यापारिक बैंकों का कृषि में योगदान बताइए।
उत्तर:
स्वतंत्रता के दौरान कृषि वित्त में व्यापारिक बैंकों का योगदान बहुत कम था। 1950-51 में यह मात्र 09% था। व्यापारिक बैंकों का कृषि वित्त में योगदान बढ़ाने हेतु जुलाई 1969 में प्रमुख 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इसके बाद 1980 में भी 6 और व्यापारिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इसके साथ ही इन्हें यह निर्देशन दिया गया कि ये 40% वित्त प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों; जैसे-कृषि, लघु उद्योग, लघु व्यवसाय आदि को ही उपलब्ध करवाएंगी। वर्ष 2013-14 में उनका योगदान कृषिगत साख में 71.50% था।

प्रश्न 24.
नाबार्ड द्वारा किये जाने वाले पुनर्वित्त के कार्य के विषय में बताइए।
उत्तर:
नाबार्ड द्वारा दो प्रकार से पुनर्वित्त की सहायता प्रदान की जाती है-एक तो उच्च संस्थाओं; जैसे-क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, राज्य सहकारी बैंकों व राज्य सहकारों को सहायता देकर और दूसरें यह ग्रामीण संस्थागत साख की निम्नतम कड़ी ग्रामीण कृषि साख समितियों को भी वित्त सहायता उपलब्ध कराता है।

प्रश्न 25.
ग्रामीण आधार संरचना विकास फण्ड (RIDF) के विषय में बताइए।
उत्तर:
इसे Rural Infrastructure Development Fund – RIDF भी कहा जाता है। 2000 करोड़ रुपए की लागत का पहला ग्रामीण आधार संरचना विकास फण्ड (RIDF-I) 1995-96 में स्थापित किया गया, जिसका उद्देश्य राज्य सरकारों तथा उनके नियंत्रण में चल रहे निगमों को वित्तीय सहायता प्रदान करना था, जिससे कि वे अपनी ग्रामीण आधारित संरचना से सम्बन्धित योजनाओं को पूरा कर पाएँ। वर्ष 2015-16 में RIDF-XIX के अधीन 25,000 करोड़ रुपए की धनराशि की सहायता की व्यवस्था की गयी है। इस फण्ड के अंतर्गत विभिन्न उद्देश्यों के लिए ऋण प्रदान किये जाते हैं, जैसे-सिंचाई परियोजनाएँ जलसंभर (Watershed) प्रबंधन के लिए तथा ग्रामीण सड़कों व पुलों के निर्माण हेतु।

प्रश्न 26.
सूक्ष्म वित्त की व्यवस्था के विषय में टिप्पणी करिए।
उत्तर:
सूक्ष्म वित्त (Micro Finance) :
प्रामीण इलाकों में निर्धन लोगों के पास ऋण लेने हेतु जमानत के लिए कुछ नहीं होता है। इन लोगों की वित्त सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सूक्ष्म वित्त संस्थाओं (Micro Finance Institutions) की व्यवस्था की गयी। यह सूक्ष्म वित्त की अवधारणा सर्वप्रथम बांग्लादेश में अपनायी गयी। यह सहायता गैरसरकारी संस्थाओं तथा स्वयं सहायता समूहों को प्रदान की जाती है। इस व्यवस्था के द्वारा वित्त को ग्रामीण विकास की जड़ों’ तक पहुंचाने का कार्य किया जाता है।

प्रश्न 27.
किसान क्रेडिट कार्ड योजना क्या है?
उत्तर:
किसान क्रेडिट कार्ड योजना (Kisan Credit Card Scheme) :
किसानों को अल्पकालीन ऋण देने हेतु 1998-99 में किसान क्रेडिट कार्ड योजना प्रारम्भ की गयी। इस योजना का कार्यान्वयन बैंकों, केन्द्रीय सहकारी बैंकों व क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के द्वारा किया जा रहा है।

प्रश्न 28.
सहकारी विकास फंड से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
वर्ष 1993 में नाबार्ड ने सहकारी विकास फण्ड (Cooperative Development Fund) की स्थापना की। इसका उद्देश्य सहकारी साख संस्थाओं की संगठनात्मक संरचना, संसाधन एकत्रण, मानव संसाधन विकास (Human Resource Development), ऋणों की वसूली आदि में सुधार व मजबूती लाना है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु यह राज्य सहकारी बैंकों, राज्य सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंकों, केन्द्रीय सहकारी बैंकों और प्राथमिक सहकारी समितियों को आसान किश्तों व कम ब्याज दरों पर वित्त प्रदान करता है तथा अनुदान भी उपलब्ध कराता है।

प्रश्न 29.
नाबार्ड अपनी वित्त सम्बन्धी आवश्यकता की पूर्ति किस प्रकार करता है?
उत्तर:
नाबार्ड अपनी वित्त सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति भारत सरकार, विश्व बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक तथा राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से ऋण लेकर करता है। इसके द्वारा गारण्टी शुदा बॉण्ड तथा ऋण पत्र जारी करके भी संसाधन जुटाए जा सकते हैं। यह समय आने पर ग्रामीण आधारिक संरचना विकास फण्ड (RIDF) को भी प्रयोग में ला सकता है।

प्रश्न 30.
कृषि वित्त के विभिन्न स्रोतों के योगदान को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
सभी कृषि वित्त स्रोतों के योगदान की बात की जाए तो अब भी गैर-संस्थागत स्रोतों का ही योगदान अधिक है, क्योंकि वे आसानी से लोगों को उपलब्ध हो जाते हैं। इसके विपरीत संस्थागत ऋण प्राप्त करने हेतु कागजी कार्यवाही से गुजरना पड़ता है, जिससे समय अधिक खर्च होता है। सरकार द्वारा कृषि साधन के कुछ नए आयाम स्थापित किये गए हैं, वे इस प्रकार से हैं-किसान क्रेडिट कार्ड योजना, स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups) को वित्त उपलब्ध कराना, सूक्ष्म साख (Micro Finance) को बढ़ावा देना तथा कानूनी व कागजी कार्यवाही को किया जाना आदि।

RBSE Class 11 Economics Chapter 17 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
द्वितीय हरित क्रांति के लिए आयोजित सम्मेलन के विषय में बताते हुए इस क्रांति द्वारा किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
द्वितीय हरित क्रांति/प्रदूषण रहित कृषि विकास (Second Green Revolution/Agricultural Development without Pollution) दिसम्बर 2006 में नई दिल्ली में द्वितीय हरित क्रांति के लिए एक सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसकी थीम (Theme) (नॉलेज एग्रीकल्चर’ (Knowledge Agriculture) रखी गयी। इस सम्मेलन में यह बताया गया कि यह क्रांति सतत् कृषि विकास तथा विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation-WTO) की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है। इस क्रांति के अंतर्गत निम्नलिखित प्रयास किये गए :

  1. कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए इस क्रांति को सभी कृषि उत्पादों; जैसे- अनाज, पशुपालन, मत्स्य पालन, रेशम पालन उत्पाद, व्यापारिक फसलें आदि पर लागू किया गया। इसी कारण इसे ‘इन्द्रधनुष’ क्रांति (Rainbow Revolution) भी कहा जाता है। क्रांति में फसल प्रबंधन जैव आगतों के प्रयोग आदि पर जोर दिया गया।
  2. मूल्य परिवर्द्धन (Value Addition) हेतु कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण (Processing) तथा उनको पेय उद्योगों (Drinking Industries) के रूप में विकसित करने पर बल दिया गया।
  3. कृषि के अंतर्गत आधारभूत संरचना (Infrastructure) की मजबूती पर अधिक जोर दिया गया। इस कार्य हेतु कृषि वित्त व्यवस्था को सुधारने, कृषि उत्पादों के भण्डारण के लिए शीतागार (Cold Storage) व शुष्क संग्रहण (Dry Storage) की व्यवस्था करने, कृषि उत्पादों के विपणन की व्यवस्था को सुधारने, मण्डियाँ विकसित करने, संचार व्यवस्था दुरुस्त करने, कृषि में सिंचाई की व्यवस्था करने, आधुनिक सिंचाई तकनीकों का प्रयोग करने जैसे उपायों को प्राथमिकता से लागू करने पर बल दिया गया।
  4. किसानों को उनकी फसलों की सुरक्षा करने हेतु राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना में सभी प्रकार की फसलों व कृषि क्रियाओं को सम्मिलित किया गया।
  5. द्वितीय हरित क्रांति पर 11वीं पंचवर्षीय योजना में अधिक बल दिया गया, जिससे कृषि विकास की लक्षित वृद्धि दर (41) को प्राप्त किया जा सके जबकि हमें इसकी 3.3% वृद्धि दर की प्राप्ति हुई। यदि प्रदूषण रहित कृषि विकास की नीतियों के ठीक ढंग से लागू किया गया तो भारत में 12वीं पंचवर्षीय योजना की लागत कृषि वृद्धि दर 4% को प्राप्त करने में किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

प्रश्न 2.
भू-सुधार से आपका क्या तात्पर्य है? भारत में भू-सुधार कार्यक्रमों की उन्नति का आलोचनात्मक आंकलन कीजिए। इसकी सफलता के लिए आप क्या सुझाव दे सकते हैं?
उत्तर:
भू-सुधार का अर्थ :
भू-सुधार से तात्पर्य छोटे कृषकों एवं कृषि श्रमिकों के लाभार्थ भूमि स्वामित्व के पुनर्वितरण से लगाया जाता है।
प्रो. मिर्डल के शब्दों में :
“भूमि सुधार व्यक्ति और भूमि के सम्बन्धों में नियोजन और संस्थागत पुनर्गठन है।”

भारत के सन्दर्भ में भू-सुधार कार्यक्रम :

  1. बिचौलियों का अन्त–देश की आजादी के समय लगभग 40% भूमि पर जमींदारों, जागीरदारों तथा बिचौलियों का आधिपत्य था। प्रथम दो पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से इन सबका पूर्ण उन्मूलन कर दिया गया।
  2. काश्तकारी प्रणाली में सुधार-सुधारों का ‘ब्यौरा’ निम्न प्रकार है
    • भू-स्वामित्व की सुरक्षा :
      द्वितीय योजनाकाल में योजना आयोग की सलाह पर ऐच्छिक परित्याग के मामलों का पंजीयन कर यह प्रतिबन्ध लगाया गया कि ऐच्छिक परित्याग के पश्चात् भी भू-स्वामी केवल काश्त की जाने वाली भूमि की मात्रा का मालिक होना चाहिए।
    • लगान नियमन :
      पहले किसान तथा आधबटाई वाले, सामान्यता उपज का आधे से अधिक हिस्सा भू-स्वामी को लगान के रूप में देते थे। सुधार कार्यक्रम के पश्चात् लगान की अधिकतम मात्रा 1/5 या 1/4 तक ही तय कर दी गई।
    • स्वयं काश्त में भूमि का पुनर्ग्रहण :
      पुनर्ग्रहण नियमों के तहत् राज्यों को चार भागों में वर्गीकृत किया गया है।
    • काश्तकारों को स्वामी होने का अधिकार :
      प्रारम्भ में भू-स्वामित्व का अधिकार पाना ऐच्छिक था किन्तु तृतीय योजना में इस ऐच्छिकता की सुविधा को हटाया गया, क्योंकि ऐच्छिकता से अधिकारों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता था।
  3. जोतों का सीमा निर्धारण :
    देश के भूमि बँटवारे की स्थिति चिन्ताजनक है। कृषि जाँच समिति की नीति के अनुसार सम्पूर्ण कृषि के 34.4% भूमि पर लगभग 4.5% व्यक्ति ही कृषि करते हैं। 15.5% भूमि पर 66.9% व्यक्ति कृषि करते हैं, जबकि 19% व्यक्ति भूमिहीन हैं। इस प्रकार सामाजिक न्याय तथा समानता की दृष्टि से जोत की सीमा तय करना आवश्यक है।
  4. कृषि पुनर्गठन :
    • चकबन्दी :
      योजना आयोग द्वारा चकबन्दी कार्यक्रम को सदैव प्राथमिकता दी गई है अर्थात् कई छोटे-छोटे और बिखरे हुए भू-भाग को एक बड़े खेत में परिवर्तित करना ही चकबन्दी है। दुर्भाग्य का विषय है कि भारत में चकबन्दी की गति सदैव ही धीमी रही है, जबकि चकबन्दी से भूमि विखण्डन की समस्या का समाधन होता है। कृषि उपज में बढ़ोत्तरी होती है किन्तु दु:खद पहलू है कि अनेक राज्यों ने चकबन्दी कार्यक्रम को समाप्त कर दिया है।
    • भूमि के प्रबन्ध में सुधार :
      इसके अन्तर्गत प्रथम एवं द्वितीय योजनाकाल में भूमि के कुशल प्रबन्ध को प्राथमिकता दी गई अर्थात् भूमि को समतल बनाना, बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाना, उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग, अच्छी खाद, मजबूत औजार आदि के बावजूद भी प्रगति की गति उत्साहवर्धक नहीं रही है।
    • सहकारी खेती :
      प्रथम पंचवर्षीय योजना के अन्त तक देश में कुल 1,000 सहकारी समितियाँ थीं। सन् 1959 ई. में नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस द्वारा संयुक्त सहकारी वृद्धि को कृषि सुधार का अन्तिम लक्ष्य घोषित लक्ष्य घोषित कर सहकारी कृषि के विकास में गति लाई गई।

भूमिहीन को स्थायित्व तथा भू-दान एवं ग्रामदान :
इस योजना के तहत भूमिहीन किसानों को बसाने का प्रयास किया गया। बावजूद इसके आज भी देश की 19% जनसंख्या है जिसे हम भूमिहीन कृषक कह सकते हैं। प्रथम पंचवर्षीय योजना में भूमिहीन किसानों को भूमि दिलाने का प्रयास शुरू किया गया, पर समस्या पूरी तरह से आज भी समाधान के शिखर को नहीं छू पायी है।

भूदान आन्दोलन एक ऐसा आर्थिक आन्दोलन है जिसकी नींव सन् 1951 ई. में आचार्य विनोवा भावे द्वारा रखी गई।

आचार्य विनोवा भावे के शब्दों में :
“इस आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य बिना संघर्ष के इस देश में सामाजिक एवं आर्थिक दुर्व्यवस्था को दूर करना है।” यह आन्दोलन भूमिहीन व्यक्तियों को भूमि बाँटने के लिए स्वेच्छा से भूमि दान का निवेदन करता है। आलोचनात्मक मूल्यांकन-ये निम्न हैं

  1. आज भी अनेक राज्यों में भूमि सम्बन्धी अभिलेख अपूर्ण हैं।
  2. प्रशासन का दृष्टिकोण भू-सुधार में कारगर सिद्ध नहीं हुआ।
  3. अनचाही मुकदमेबाजी को बल मिला है।
  4. इस कार्यक्रम को समन्वित रूप से लागू नहीं किया गया।
  5. देश में भू-सुधार नीति विलम्ब में लागू की गई।
  6. वर्तमान में कई क्षेत्रों में उच्च लगान चालू है।

अन्त में आलोचनात्मक मूल्यांकन के पश्चात् यह निष्कर्ष निकलता है कि भूमि सुधार से सम्बन्धित अनिश्चितता एवं बाधाओं को अविलम्ब समाप्त किया जाए, सुधारों को गम्भीरता से लिया जाए जिससे एक न्यायपूर्ण, शोषण रहित एवं स्वस्थ समाज का निर्माण हो सके।

सुझाव-भू-सुधार कार्यक्रमों हेतु प्रभावशाली सुझाव :

  1. परती भूमियों के वितरण की उचित व्यवस्था एवं सिंचाई सुविधाओं का विस्तार।
  2. दूसरों की भूमि पर खेती करने वालों पर रोक लगाई जाए।
  3. गलत आवंटन व अनुचित हस्तान्तरण में सहयोगी अधिकारियों के प्रति कानूनी कार्यवाही की जाए।
  4. सीमावर्ती क्षेत्रों के भू-वितरण में पूर्व सैनिकों को प्राथमिकता दी जाए।
  5. कृषि में न्यूनतम वेतन को तुरन्त लागू किया जाए।
  6. गाँवों में भूमिहीनों को आवास हेतु भू-खण्ड उपलब्ध कराए जाएँ।
  7. सरकार द्वारा बेनामी हस्तान्तरण को पता करके सीमा से अधिक भूमि का स्वयं अधिग्रहण किया जाए।
  8. कृषकों को भूमि से वंचित करने वाले भू-स्वामी के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जाए।

प्रश्न 3.
वर्ष 1950 से 1990 के बीच की अवधि में भारतीय कृषि की दशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वर्ष 1950 से 1990 के बीच स्वतन्त्र भारत के नीति निर्माताओं ने भू-सुधार तथा उच्च पैदावार वाले बीजों के प्रयोग को बढ़ावा देकर भारतीय कृषि में क्रान्ति का संचार किया, जिसे निम्न शीर्षकों में व्यक्त किया जा सकता है

भू-सुधार :
स्वतन्त्रता के एक वर्ष पश्चात् ही देश में वास्तविक कृषकों को भूमि का स्वामी बनाने के लिए दो महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए जिसके अन्तर्गत जमींदारी उन्मूलन किया गया तथा जोत की अधिकतम सीमा निर्धारित की गई। इसका परिणाम यह हुआ कि किसान बिचौलियों के शोषण से मुक्त हो गए तथा कृषि में निवेश बढ़ाकर अधिक उत्पादन करने लगे।

हरित क्रान्ति :
स्वतन्त्रता के बाद कृषि में उच्च पैदावार वाली किस्मों के बीजों, उर्वरकों, कीटनाशकों का प्रयोग किया गया, नई प्रौद्योगिकी को अपनाया गया, सिंचाई के साधनों में वृद्धि हुई। इन सब कारणों से कृषि पैदावार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। इसी को हरित क्रान्ति का नाम दिया गया। इस प्रौद्योगिकी के विकास से भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बन गया।

कृषि साहयिकी :
किसानों को पैदावार बढ़ाने हेतु दी जाने वाली मौद्रिक साहयिकी ही कृषि साहयिकी कहलाती है। स्वतन्त्रता के पश्चात् किसानों को नई प्रौद्योगिकी को अपनाने के लिए प्रेरित करने हेतु कृषि साहयिकी दी गई, जो आज तक जारी है। लेकिन आजकल कृषि क्षेत्र की दी जाने वाली यह सहायता बहस का मुद्दा बनी हुई है। कुछ अर्थशास्त्री इसे समाप्त करने पर बल दे रहे हैं तथा कुछ इसे बनाए रखने पर बल दे रहे हैं।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि भारतीय कृषि ने स्वतन्त्रता के पश्चात् अभूतपूर्व विकास किया तथा देश खाद्यान्न उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हो गया, लेकिन भारतीय कृषि में विकास की सम्भावनाएँ अभी भी बनी हुई हैं। अत: हमें और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है।

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