RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 11 प्राचीन भारतीय आर्थिक अवधारणाएँ

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Rajasthan Board RBSE Class 11 Economics Chapter 11 प्राचीन भारतीय आर्थिक अवधारणाएँ

RBSE Class 11 Economics Chapter 11 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर  

RBSE Class 11 Economics Chapter 11 बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वृक्षों की रक्षा के लिए पहला बलिदान देने वाली अमृता देवी का सम्बन्ध था
(अ) जयपुर
(ब) खेजड़ी (जोधपुर)
(स) उदयपुर
(द) कोटा
उत्तर:
(ब) खेजड़ी (जोधपुर)

प्रश्न 2.
विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं
(अ) वेद
(ब) बाइबिल
(स) कुरान
(द) उपनिषद
उत्तर:
(अ) वेद

प्रश्न 3.
प्राचीन भारतीय आर्थिक चिन्तन के अनुरूप आवश्यकताओं की निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता नहीं
(अ) आवश्यकता असीमित है
(ब) आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन सीमित हैं
(स) आवश्यकताएँ बार-बार उत्पन्न होती हैं
(द) सभी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि सम्भव है
उत्तर:
(द) सभी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि सम्भव है

प्रश्न 4.
वर्णाश्रम व्यवस्था में सभी लोगों का जीविकोपार्जन करता है
(अ) ब्रह्मचारी
(ब) गृहस्थ
(स) वानप्रस्थी
(द) संन्यासी
उत्तर:
(ब) गृहस्थ

प्रश्न 5.
वैदिक वाङ्मय के अनुसार व्यक्ति का उपभोग नहीं होना चाहिए –
(अ) संयमित उपभोग
(ब) न्यायोचित उपभोग
(स) सहउपभोग
(द) अमर्यादित उपभोग
उत्तर:
(द) अमर्यादित उपभोग

प्रश्न 6.
लोक कल्याण की दृष्टि से दस कुओं के बराबर का महत्त्व दिया गया है
(अ) बावड़ी को
(ब) तालाब को
(स) पुत्र को
(द) वृक्ष को
उत्तर:
(अ) बावड़ी को

RBSE Class 11 Economics Chapter 11 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘समग्र सुख’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा का सम्पूर्ण सुख ही समग्र सुख कहलाता है।

प्रश्न 2.
मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर:
मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं-अन्न, वस्त्र, मकान, चिकित्सा तथा शिक्षा की।

प्रश्न 3.
मनुष्य को अधिकतम सन्तुष्टि कब प्राप्त होती है?
उत्तर:
आवश्यकता की पूर्ति होने पर ही मनुष्य को अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त होती है।

प्रश्न 4.
चाणक्य के अनुसार धर्म का मूल क्या है?
उत्तर:
चाणक्य के अनुसार धर्म का मूल धन है, बिना धन अथवा अर्थ के धर्म तथा धाम सिद्ध नहीं होते हैं।

प्रश्न 5.
मनुष्यों की रक्षा के लिए अपना बलिदान करने वाली महिला का नाम बताइए।
उत्तर:
मनुष्यों की रक्षा के लिए अपना बलिदान करने वाली महिला का नाम अमृता देवी है।

प्रश्न 6.
वेदों में उल्लेखित पर्यावरण प्रदूषण से बचाने के लिए दो प्रमुख उपायों को बताइए।
उत्तर:

  1. भूमि की सतह को प्रदषण मुक्त रखने के लिए खुले में मल-मूत्र नहीं त्यागना चाहिए तथा कटे हुए बाल, नाखून एवं बेकार वस्तुओं को खेतों व बगीचों में नहीं डालना चाहिए।
  2. पानी में अपवित्र पदार्थ, विष आदि नहीं डालना चाहिए। यज्ञ द्वारा आकाशीय जल को शुद्ध करने का प्रयास करना चाहिए।

RBSE Class 11 Economics Chapter 11 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन भारतीय चिन्तन में वर्णित आवश्यकताओं के प्रमुख लक्षणों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्राचीन भारतीय चिन्तन में आवश्यकताओं के निम्नलिखित लक्षण बताये गए हैं :

  1. आवश्यकताएँ असीमित होती हैं।
  2. आवश्यकता सन्तुष्टि के साधन सीमित होते हैं।
  3. आवश्यकताओं को उपलब्ध संसाधनों से सन्तुष्ट नहीं किया जा सकता है।
  4. कुछ आवश्यकताएँ बार-बार उत्पन्न होती हैं।
  5. आवश्यकताएँ विकास के साथ-साथ बढ़ती हैं।
  6. आवश्यकताएँ सामाजिक, आर्थिक स्थिति एवं धार्मिक भावनाओं आदि से प्रभावित होती हैं।
  7. आवश्यकताएँ प्रतियोगी होती हैं।

प्रश्न 2.
प्राचीन भारतीय साहित्य में कृपणता (कंजूसी) का विरोध क्यों किया गया है?
उत्तर:
प्राचीन भारतीय साहित्य में कृपणता का विरोध इसलिए किया गया है, क्योंकि कृपण व्यक्ति के हाथ में पहुँचे धन का मनुष्य को कोई लाभ नहीं मिलता है। कृपण का धन चूहों द्वारा एकत्रित किये गए धान्य के समान माना गया है। इस धन से उपार्जनकर्ता को कोई सुख प्राप्त नहीं होता है। कृपणता समाज में प्रभावी माँग को कम करती है, बेरोजगारी को बढ़ाती है तथा समाज में न्यायपूर्ण वितरण के उद्देश्य को कुप्रभावित करती है।

प्रश्न 3.
व्यक्ति को अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रहण क्यों नहीं करना चाहिए?
उत्तर:
वस्तुओं को आवश्यकता से अधिक संग्रहण इसलिए नही करना चाहिए, क्योंकि इससे अनेक समस्याएं पैदा हो जाती हैं। संग्रह किये गए माल पर सम्बन्धियों एवं चोरों की नजर रहती है। इस कारण संग्रहित वस्तु की सुरक्षा समस्या बन जाती है। संग्रहण केवल उचित मात्रा में तथा न्यूनतम अवधि के लिए ही किया जाना चाहिए।

प्रश्न 4.
धनार्जन करते समय कौन-कौन सी बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए?
उत्तर:
धनार्जन करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए :

  1. धनार्जन धर्मपूर्वक होना चाहिए।
  2. धनार्जन आवश्यकता के अनुरूप ही होना चाहिए।
  3. धनार्जन करते समय संयम रखना चाहिए, क्योंकि धन एक तृष्णा है जो कभी समाप्त नहीं होती है।
  4. धनार्जन के प्रति अनासक्ति भाव रखना चाहिए।
  5. धनार्जन आवश्यक सुविधा की श्रेणी में आने वाली आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ही किया जाना चाहिए।
  6. धनार्जन स्वयं के परिश्रम से किया जाना चाहिए।
  7. धनार्जन करते समय पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए।
  8. धन का व्यय न्यायोचित ढंग से होना चाहिए।

प्रश्न 5.
महाभारत के अनुसार धन के उपयोग कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
महाभारत के अनुसार धन के. पाँच उपयोग बतलाये गए हैं :

  1. धन का प्रयोग धार्मिक कार्यों के लिए करना चाहिए जिससे उसका लाभ समाज को मिल सके।
  2. मनुष्य को धन का प्रयोग आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करना चाहिए तथा इसका प्रयोग बाँटकर करना चाहिए।
  3. इसका प्रयोग पूँजी निर्माण के लिए किया जाता है।
  4. इसका प्रयोग यश प्राप्ति एवं कल्याणकारी कार्यों के लिए किया जाता है।
  5. इसका प्रयोग स्वजनों के लिए किया जाता है।

प्रश्न 6.
प्राचीन भारतीय साहित्य में वर्णित उपभोग की आचार संहिता को बताइए।
उत्तर:
प्राचीन भारतीय साहित्य में उपभोग की आचार संहिता का निर्माण किया गया था जिसके प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित हैं :

  1. उपभोग न्यायोचित साधनों से अर्जित धन का ही करना चाहिए।
  2. जीविका रहित गरीब लोगों को बिना खिलाये उपभोग नहीं करना चाहिए।
  3. उपभोग संयमित होना चाहिए। संयमित उपभोग ही स्वास्थ्यवर्धक होता है।
  4. अनैतिक तरीकों से उपभोग नहीं करना चाहिए जैसे-चुराकर खाना।
  5. अति उपभोग को निषेध बताया गया है।
  6. कर्ज लेकर उपभोग नहीं करना चाहिए।
  7. कंजूस प्रवृत्ति को त्याग कर ही उपभोग करना चाहिए।
  8. खाद्यान्नों का संग्रह अपनी आवश्यकता के अनुरूप ही करना चाहिए।

प्रश्न 7.
वायु-प्रदूषण का अर्थ बताइए।
उत्तर:
पृथ्वी के वायुमण्डल में प्राकृतिक तौर पर 79 प्रतिशत नाइट्रोजन, 20.09 प्रतिशत ऑक्सीजन तथा शेष कार्बनडाईऑक्साइड, ऑर्गन, नियोन, हीलियम, ओजोन आदि गैसें होती हैं। स्वस्थ जीवन के लिए इन सभी का एक निश्चित नाना अत्यन्त आवश्यक है। इस अनुपात में असन्तुलन होने को ही वायु प्रदूषण कहते हैं। शुद्ध हवा मनुष्य को रोगों से बचाती हैं तथा बल प्रदान करती है। वेदों में वायु को जीवन का मुख्य आधार कहा गया है।

प्रश्न 8.
प्रकृति तथा पर्यावरण में वैदिक सम्बन्ध बताइए।
उत्तर:
प्रकृति एवं पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। मानव के परिवेश में जलवायु, मिट्टी, सूर्य का प्रकाश, वन, पर्वत, वायु, प्राणी और विविध वनस्पतियों का सामीप्य रहता है। वेदों में मानव के आसपास के इसी परिवेश को पर्यावरण कहा गया है। एतरेय उपनिषद् में कहा गया है कि संसार पाँच तत्त्वों-पृथ्वी, सूर्य, पानी, वायु तथा आकाश से बना है। जब इन पाँचों तत्त्वों के प्राकृतिक सन्तुलन में परिवर्तन हो जाता है तो पर्यावरण प्रदूषण पैदा हो जाता है। पर्यावरण प्रदूषण मानव मात्र के स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक होता है।

प्रश्न 9.
प्राचीन ग्रन्थों में वृक्षों को इतना महत्त्व क्यों दिया गया है?
उत्तर:
प्राचीन ग्रन्थों में वृक्षों को इतना महत्त्व इसलिए दिया गया है, क्योंकि वृक्षों से न केवल वायु प्रदूषण कम होता है, बल्कि ये मनुष्य को एक सुरम्य वातावरण प्रदान करते हैं। वनों के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है, क्योंकि मनुष्य का तीन-चौथाई जीवन (ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम) वन में ही व्यतीत होता था। जीवन शब्द जीव + वन से मिलकर बना है जिसका आशय है कि जहाँ वन है वहीं जीवन है। अथर्ववेद में वनस्पतियों के सतत् उपयोग के साथ-साथ उनकी जड़ को न काटने का आदेश है। मत्स्य पुराण में वृक्ष की महिमा का वर्णन है।

RBSE Class 11 Economics Chapter 11 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संयमित उपभोग की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन साहित्य में अर्जित धन का इच्छाओं की पूर्ति के लिए न्यून एवं संयमित उपभोग के लिए निर्देशित किया गया है। जीवन की रक्षा के लिए जितने आहार की आवश्यकता हो उतना ही अन्न ग्रहण करना चाहिए। भारतीय वांड्मय में संयमित उपभोग पर इसलिए जोर दिया गया है क्योंकि किसी भी मनुष्य के लिए सभी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि करना सम्भव नहीं है। अतः हमारे शास्त्रों में यह कहा गया है, कि कामनाओं की तृप्ति को असम्भव मानकर तथा सम्पत्ति द्वारा अमृतत्त्व की प्राप्ति को व्यर्थ जानकर व्यक्ति को संयमित उपभोग करना चाहिए।

इशोपनिषद् में कहा गया है कि, “हे मनुष्य तू किसी के धन की इच्छा मत कर क्योंकि धन तो किसी का नहीं है जो उसकी इच्छा की जाय।” मनुष्य को जीवन निर्वाह हेतु वस्तुओं का संकलन व उपभोग आवश्यकतानुसार न्यूनतम ही करना चाहिए। महाभारत में भी कहा गया है कि मनुष्य को उतना ही धन अर्जित करना चाहिए तथा ग्रहण करना चाहिए जिससे उसका कभी दण्डनीय नहीं माना गया है लेकिन गलत तरीकों से कमाया गया धन तथा आवश्यकता से अधिक धन संग्रह दण्डनीय माना गया है।

आचार्य शुक्र तो अधिक धन व्यय करने वाले व्यक्ति को राज्य से निकालने का निर्देश देते हैं। कौटिल्य ने भी राज्य का यह उत्तरदायित्व बताया है कि वह ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले तथा धन का अनुचित व्यय करने वाले व्यक्ति पर रोक लगाये। संक्षेप में संयमित उपभोग के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण बातें निम्नलिखित हैं

  1. मनुष्य की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति सम्भव नहीं है।
  2. उपभोग आवश्यकतानुसार होना चाहिए न कि इच्छानुसार अर्थात् उपभोग न्यूनतम होना चाहिए।
  3. स्वअर्जित धन का ही उपभोग करना चाहिए। उधार लेकर उपभोग करना उचित नहीं है।
  4. विभिन्न वस्तुओं पर समाज का अधिकार मानना चाहिए न कि व्यक्ति विशेष का। त्याग का दृष्टिकोण रखते हुए समाज के लिए अपने जीवन को चलाने हेतु वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए।

प्रश्न 2.
सह उपभोग की अवधारणा को समझाइये।
उत्तर:
प्राचीन साहित्य में सह-उपभोग पर बल दिया गया है अर्थात् लोगों को वस्तुओं के परस्पर मिल बाँटकर उपभोग सम्पत्ति ईश्वर की देन है। अतः इसे बाँटकर ही उपभोग करना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि उपार्जित धन का स्वजनों, पूँजी निर्माण, धार्मिक तथा अन्य कल्याणकारी कार्यों पर व्यय कर शेष का उपभोग करना चाहिए।

अथर्ववेद में कहा गया है कि हे मनुष्य तू सौ हाथों से धन प्राप्त कर और हजारों हाथों वाला बनकर उसे खर्च कर। इस भावना से ही मनुष्य को अधिकतम सन्तुष्टि मिल सकती है तथा इससे सम्पूर्ण राष्ट्र का सुख भी बढ़ता है।

मनु, शुक्र, विष्णु, याज्ञवल्क्य के धर्मसूत्रों के अनुसार मनुष्य को अतिथियों, नौकरों, असहाय व्यक्तियों, पशु-पक्षियों को खिलाकर ही उपभोग करना चाहिए। कौटिल्य ने तो यहाँ तक कहा है कि जो लोग बच्चों, माता-पिता, विधवाओं, पुत्रियों का भरण पोषण नहीं करते हैं उन्हें राज्य द्वारा दण्डित किया जाना चाहिए। अथर्ववेद में समान उपभोग का निर्देश दिया गया है जिसका आशय है कि सभी लोगों का खान-पान समान होना चाहिए। उनका मानना है कि उच्च चरित्र वाले व्यक्ति सम्पूर्ण संसार को ही अपना परिवार मानते हैं।

अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

अर्थात् यह मेरा है यह पराया है, ऐसे विचार निम्न कोटि के व्यक्ति ही रख सकते हैं। उच्च चरित्र वाले व्यक्ति तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ में विश्वास करते हैं। गृहस्थ आश्रम में रहने वाले सभी व्यक्तियों को मिल बाँट कर वस्तुओं का उपभोग करना चाहिए। लोगों को अपनी आय का एक उचित हिस्सा दान में भी देना चाहिए।

महाभारत में कहा गया है कि “पृथ्वी पर जो कुछ भी वस्तु है उसमें मेरा कुछ भी नहीं है अर्थात् इममें जैसा मुझे अधिकार है वैसा ही दूसरों का भी है।” इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि मानव मात्र को वस्तुओं का उपभोग मिल बाँटकर करना चाहिए।

प्रश्न 3.
प्राचीन भारतीय चिन्तन में वर्णित धनार्जन की आचार संहिता का संक्षेप में वर्णन कीजिये।
उत्तर:
प्राचीन भारतीय साहित्य में धनार्जन को बहुत महत्त्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि धन के बिना धर्म तथा धाम सिद्ध नहीं होते हैं। धनहीन व्यक्ति को उसके बन्धु भी छोड़ देते हैं तथा धनवान व्यक्ति के अवगुण भी गुण मान जाते हैं। महाभारत में कहा गया है कि अर्थ उच्चतम धर्म है, प्रत्येक वस्तु अर्थ पर निर्भर है, अर्थ सम्पन्न लोग सुखी रह सकते हैं निर्धन व्यक्ति को मृत व्यक्ति के समान है।

धन के इतने महत्त्वपूर्ण होने के बाद भी प्राचीन भारतीय साहित्य में धनार्जन करते समय कुछ बातों का ध्यान रखने की सलाह दी गई है जैसे-धनार्जन इस प्रकार होना चाहिए कि अन्य प्राणियों को कोई पीड़ा न हो, धनार्जन से अपने शरीर को भी किया जाना चाहिए तथा धनार्जन से स्वाध्याय में कोई बाधा नहीं पहुँचनी चाहिए।

धनार्जन की आचार संहिता का आशय उन नियमों से है जिनका धनार्जन करते समय प्रत्येक व्यक्ति को ध्यान रखना चाहिए। ये बातें निम्नलिखित हैं :

  • धर्म मार्ग से धनार्जन :
    प्राचीन भारतीय विद्वान् धर्म के मार्ग पर चलकर अर्जित किये गए धन को ही उचित मानते हैं। उनके अनुसार धर्म मार्ग पर चलकर अर्जित किया गया धन टिकाऊ होता है तथा यह समृद्धि का आधार होता है। हमारे साहित्यों में धर्म का एक पैसा अधर्म या चोरी से कमाये गए हजार रुपये से भी अच्छा माना गया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने कहा है कि अर्थशास्त्र तथा धर्मशास्त्र में पूरी तरह सामंजस्य होना चाहिए।
  • धन संग्रह में संयम :
    मनु के अनुसार मनुष्य को धनोपार्जन करते समय संयम से काम लेना चाहिए, क्योंकि धन मनुष्य की आवश्यकता न होकर तृष्णा है तो कभी समाप्त नहीं होती है। इस कारण मनुष्य को यथासम्भव अपने परिवार की रक्षा तथा यज्ञ आदि के लिए आवश्यक धन से ज्यादा की इच्छा नहीं करनी चाहिए।
  • आवश्यकतानुसार धनोपार्जन :
    मानव मात्र को धनोपार्जन उतना ही करना चाहिए जिससे उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। वैदिक संस्कृति में इसे ही आदर्श माना गया है। निम्नलिखित दोहों से ये बात और ज्यादा स्पष्ट हो जाती है :
    “साई इतना दीजिये जामे कुटुम्ब समाय।
    मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय।।”
  • धनार्जन के प्रति अनासक्ति भाव :
    प्राचीन भारतीय साहित्य में धनार्जन के प्रति अनासक्ति भाव रखने पर बल दिया गया है जिससे मनुष्य अर्थ का दास न बन जाये। हमारे धर्म ग्रन्थों में इसलिए मर्यादित उपभोग पर बल दिया गया है। यदि मनुष्य मर्यादित उपभोग करेगा तो उसके अर्थ की आवश्यकता भी सीमित ही होगी।
  • इच्छा-परिमाण व्रत का पालन :
    गीता में स्पष्ट कहा गया है कि पृथ्वी पर जो भी धान, जौ, स्वर्ण, पशु आदि हैं वे सब भी मनुष्य की कामनाओं को सन्तुष्ट करने में समर्थ नहीं हैं। मनुष्य को अपनी आवश्यक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ही धनार्जन करना चाहिए तथा विलासपूर्ण आवश्यकताओं का दमन करना चाहिए।
  • आय से कम व्यय करना :
    शुक्र कहते हैं कि आय की तुलना में धन का व्यय कम होना चाहिए। बुद्धिमान व्यक्ति को थोड़े कार्य के लिए धन अधिक नहीं खर्च करना चाहिए।
  • धनार्जन स्वयं के प्रयत्नों से :
    प्राचीन भारतीय साहित्य में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि मनुष्य को धनोपार्जन स्वयं के परिश्रम एवं प्रयासों द्वारा ही करना चाहिए। स्वयं द्वारा बनाये गए धन से ही अपनी तथा अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करना चाहिए। ऋण लेकर आवश्यकताओं की पूर्ति को उचित नहीं माना गया है।
  • पर्यावरण का संरक्षण :
    महाभारत एवं मनुस्मृति में यह स्पष्ट कहा गया है कि व्यक्ति को जीविकोपार्जन के लिए ऐसे तरीके अपनाने चाहिए जिनसे पर्यावरण को कोई क्षति न पहुँचे। आजकल उत्पादन बढ़ाने के लिए जो तरीके अपनाये जा रहे हैं उनसे पर्यावरण को बहुत नुकसान हो रहा है तथा इसका मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। अथर्ववेद में तो धरती माँ से प्रार्थना की गई है कि हे माँ अपने ऊर्जा भण्डार से ऐसी शक्ति दीजिये जिससे हम प्रतिष्ठा के साथ जी सकें।

प्रश्न 4.
प्राचीन भारतीय साहित्य में वर्णित पर्यावरण संरक्षण पर एक लेख लिखिये।
उत्तर:
प्राचीनकाल में आज जिस प्रकार का प्रदूषण हो रहा है, उस प्रकार का प्रदूषण नहीं था। वायु प्रदूषण के वर्तमान साधन जैसे-वाहन, औद्योगीकरण, बढ़ती जनसंख्या नहीं थे। इसी प्रकार जल प्रदूषण के भी वर्तमान कारक औद्योगीकरण, शहरीकरण, हानिकारक केमीकल आदि नहीं थे। उस समय मानव निर्मित प्रदूषण न के बराबर था। इसी कारण जो भी थोड़ा बहुत प्रदूषण था उसको दूर करने के साधन भी भिन्न थे जैसे यज्ञ द्वारा वायु प्रदूषण को नियन्त्रित करना, औषधियों द्वारा जल को शुद्ध करना आदि। वन भी-प्रदूषण को कम करने में सहायक थे क्योंकि वृक्षों के द्वारा वायु शुद्ध होती है। वृक्ष कार्बनडाइ ऑक्साइड ग्रहण करते हैं तथा ऑक्सीजन छोड़ते हैं। इस प्रकार वृक्ष प्रदूषण को अवशोषित करते हैं।

हमारे प्राचीन शास्त्रों में पर्यावरण के संरक्षण पर बहुत ध्यान दिया गया है। महाभारत तथा मनुस्मृति में स्पष्ट कहा गया है कि मानव मात्र को जीविकोपार्जन के लिए ऐसे साधन अपनाने चाहिए जिनसे वनस्पतियों व प्राणियों को कोई नुकसान न हो। अथर्ववेद में धरती माँ से प्रार्थना की गई है कि हे माँ! हमें ऐसा पर्यावरण दीजिये जो हमारे जीवन के लिए उपयुक्त हो।

यजुर्वेद में पर्यावरण प्रदूषण के प्रति मनुष्य को सचेत करते हुए कहा गया है कि “हे मनुष्य! वायु, जल, वनस्पतियों और प्राणियों में सन्तुलन बना रहने से सम्पूर्ण सृष्टि अपनी साम्य अवस्था में रहती है। जब इनका सन्तुलन बिगड़ जाता है तो इसमें रहने का सभी जीव जन्तु, पेड़-पौधे तथा मनुष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।”

वेदों में प्राकृतिक सन्तुलन बनाये रखने के लिए प्राकृतिक साधनों के अबाध दोहन की अनुमति नहीं दी है। प्रकृति स्वयं अपने तरीकों से पर्यावरण की हुई क्षति की पूर्ति करती रहती है। हमारे वेदों में सभी प्राकृतिक शक्तियों को देवता स्वरूप माना गया है तथा उनकी पूजा की जाती है।

वेदों में जल को प्राण रक्षक एवं कल्याणकारी माना गया है तथा इसे किसी भी प्रकार से प्रदूषित करने को मना किया गया है। मनु के अनुसार पानी में अपवित्र पदार्थ विष, मल-मूत्र आदि नहीं डालना चाहिए। ऋग्वेद में यज्ञ द्वारा आकाशीय जल को शुद्ध करने का तरीका बताया गया है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय साहित्य में पर्यावरण संरक्षण पर अत्यधिक बल दिया गया है।

प्रश्न 5.
“पर्यावरण का वैदिक स्वरूप आज के युग में पर्यावरण प्रदूषण के निवारण हेतु प्रासंगिक है।” इसकी व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
आजकल आर्थिक विकास की दौड़ में भूमि, जल, वायु सभी प्रदूषित हो रहे हैं तथा पारिस्थितिक सन्तुलन भी बिगड़ गया है। सभी देश प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुंध प्रयोग करके आर्थिक विकास को गति प्रदान करने में लगे हैं और इस प्रक्रिया में वे पर्यावरण पक्ष की उपेक्षा कर रहे हैं। वायु, जल, प्रदूषण खतरे की स्थिति में पहुंच चुका है जिसका मानव एवं जीव-जन्तुओं के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। वातावरण में तापमान में वृद्धि, ओजोन परत का ह्रास, अम्लीय वर्षा, बढ़ता जल तथा भूमि प्रदूषण, लुप्त होती प्रजातियाँ, वायु प्रदूषण आदि सब पर्यावरण असन्तुलन के कारण ही हैं। पर्यावरण प्रदूषण को नियन्त्रित करने के जो उपाय वेदों में बताये गए हैं उनको अपनाना आज के युग में बहुत प्रासंगिक होता जा रहा है।

वायु प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए औद्योगीकरण को नियन्त्रित करना, यज्ञों का आयोजन करना, जनसंख्या को नियन्त्रित करना, परिवहन के साधनों से उत्पन्न प्रदूषण को नियन्त्रित करना अत्यन्त आवश्यक है। यजुर्वेद में पर्यावरण प्रदूषण के प्रति मनुष्य को सचेत करते हुए कहा गया है कि “हे मनुष्य! वायु, जल, वनस्पतियों और प्राणियों में सन्तुलन बने रहने से सम्पूर्ण सृष्टि अपनी साम्य अवस्था में रहती है। जब इनका सन्तुलन बिगड़ जाता है तो इसमें रहने वाले प्रत्येक जीव-जन्तु, पेड़-पौधे और मनुष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अत: पर्यावरण के इन तत्त्वों को मत छेड़ना, इनका सन्तुलन बनाये रखना अन्यथा तेरा जीवन असम्भव हो जाएगा।”

वेदों में प्रकृति के प्रति अपार श्रद्धा का वर्णन मिलता है तथा सारी शक्तियों को देवता स्वरूप मानकर पूजने का विधान है। हमारे यहाँ वायु, नदियों, पहाड़ों, पृथ्वी आदि सभी को पूजा जाता है। वेदों में भूमि प्रदूषण रोकने के लिए मल-मूत्र खुले में त्यागने तथा बाल, नाखून व बेकार वस्तुओं को जुते हुए खेतों में, बगीचों में, पानी के श्रोतों में तथा खुली हवा में डालने के लिए मना किया गया है। इसी प्रकार जल प्रदूषण रोकने के लिए मनु ने पानी में अपवित्र पदार्थ, विष, मल-मूत्र आदि डालने को मना किया है। यज्ञों द्वारा आकाशीय जल को शुद्ध करने का सुझाव दिया है। वायु प्रदूषण रोकने के लिए यज्ञ को अप्रतिम साधन बताया है।

प्रश्न 6.
वेदों में वर्णित पर्यावरण के प्रति चेतना को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
वैदिक साहित्य में प्राकृतिक सन्तुलन बनाये रखने पर बहुत बल दिया गया है। सभी प्राकृतिक शक्तियों को देवता तुल्य मानकर उनकी पूजा करने का विधान है। वैदिक दृष्टिकोण से पृथ्वी, जल, वायु आदि में किसी प्रकार की विकृति, अशुद्धि, अपवित्रता या अस्वच्छता होती है तो वह प्राणीमात्र के लिए दुःखों का कारण बना जाती है। यजुर्वेद में पर्यावरण प्रदूषण के प्रति मनुष्य को सचेत करते हुए कहा गया है कि ‘हे मनुष्य! वायु, जल, वनस्पतियों और प्राणियों में सन्तुलन बने रहने से सम्पूर्ण सृष्टि अपनी साम्य अवस्था में रहती है। जब इनका सन्तुलन बिगड़ जाता है तो इसमें रहने वाले प्रत्येक जीव-जन्तु, पेड़-पौधों और मनुष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।”

यजुर्वेद में आगे कहा गया है कि “पर्यावरण के इन तत्त्वों को मत छेड़ना, इसका सन्तुलन बनाये रखना अन्यथा तेरा जीवन असम्भव हो जाएगा। वेदों में प्रकृति के प्रति अगाध श्रद्धा का वर्णन है। सभी प्राकृतिक शक्तियों को देवतुल्य माना गया है। इसके पीछे एक ही उद्देश्य रहा होगा कि मनुष्य जब इन्हें पूजेगें तो क्षति नहीं पहुँचाएँगे। जब मानव द्वारा इन्हें क्षति नहीं पहुँचायी जाएगी तो पर्यावरण शुद्ध रहेगा।

अथर्ववेद में वनस्पतियों के सतत् उपयोग के साथ-साथ उनकी जड़ को न काटने का आदेश दिया गया हैं। वनों को जलाने एवं नष्ट करने वालों को दण्डित करने का प्रावधान किया गया है। मत्स्य पुराण में वृक्ष की महिमा का जिस प्रकार वर्णन किया गया है, ऐसा अप्रतिम अनुराग विश्व की किसी भी संस्कृति में देखने को नहीं मिलता है।

दश कूप समावापी, दस वापी समो हृदः।
दशहदसमः पुत्रः, दस पुत्र समोद्रुमः।।

अर्थात् दस कुओं के समान एक बावड़ी का महत्त्व है तथा दस बावड़ी के समान एक तालाब तथा दस तालाबों के समान स पुत्रों के समान एक वृक्ष का महत्त्व है। इससे स्पष्ट होता है कि हमारे शास्त्रों में वृक्ष को कितना महत्त्व दिया गया है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि वेदों में पर्यावरण के प्रति लोगों में चेतना जाग्रत करने के लिए विभिन्न प्रकार से प्रकृति के महत्त्व को स्पष्ट किया गया है।

RBSE Class 11 Economics Chapter 11 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर  

RBSE Class 11 Economics Chapter 11 बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य की आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाला तत्त्व है
(अ) व्यक्ति विशेष की आर्थिक स्थिति
(ब) देश के आर्थिक विकास का स्तर
(स) धार्मिक भावनाएँ
(द) ये सभी
उत्तर:
(द) ये सभी

प्रश्न 2.
महाभारत में धन का उपयोग बताया गया है
(अ) आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
(ब) पूँजी निर्माण के लिए
(स) धार्मिक आयोजनों के लिए
(द) इन सभी के लिए
उत्तर:
(द) इन सभी के लिए

प्रश्न 3.
वैदिक साहित्य पर्यावरण के सम्बन्ध में सन्देश देता है कि
(अ) पर्यावरण का संरक्षण करे
(ब) अपने स्वार्थ के लिए पर्यावरण को प्रदूषित करें
(स) पर्यावरण पर कोई ध्यान न दें
(द) इन तीनों में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) पर्यावरण का संरक्षण करे

प्रश्न 4.
पर्यावरण सन्तुलन बिगड़ने का कारण है लिए
(अ) विकास कार्यक्रमों में पर्यावरण पक्ष की उपेक्षा
(ब) प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुंध उपयोग
(स) बढ़ती जनसंख्या
(द) ये सभी
उत्तर:
(द) ये सभी

प्रश्न 5.
वृक्षों की रक्षा के लिए पहला बलिदान देने वाली महिला का नाम था
(अ) सीता देवी
(ब) अमृता देवी
(स) महा देवी
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ब) अमृता देवी

RBSE Class 11 Economics Chapter 11 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
चारों वेद के नाम बताइए।
उत्तर:
चारों वेदों के नाम हैं :

  1. ऋग्वेद
  2. यजुर्वेद
  3. अथर्ववेद
  4. सामवेद।

प्रश्न 2.
चार नीतियों के नाम बताइए।
उत्तर:
चार नीतियाँ हैं :

  1. चाणक्य नीति
  2. वृहस्पति नीति
  3. विदुर नीति तथा
  4. शुक्र नीति।

प्रश्न 3.
तीन पुराणों के नाम बताइए।
उत्तर:
तीन पुराण है :

  1. विष्णु पुराण
  2. भागवत पुराण तथा
  3. अग्नि पुराण।

प्रश्न 4.
चार स्मृतियाँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर:
चार स्मृतियाँ हैं :

  1. मनुस्मृति
  2. याज्ञवल्क्य स्मृति
  3. नारद स्मृति तथा
  4. वृहस्पति स्मृति।

प्रश्न 5.
‘आवश्यकता’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रभावपूर्ण इच्छा को ही आवश्यकता कहते हैं। प्रभावपूर्ण इच्छा के लिए तीन बातें होना आवश्यक हैं :

  1. वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा
  2. इच्छा पूर्ति के साधन तथा
  3. साधनों को इच्छा पूर्ति के लिए व्यय करने की तत्परता।

प्रश्न 6.
पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के ‘चतुर्विध सुख’ से क्या आशय है?
उत्तर:
चतुर्विध सुख का आशय शरीर, मन, बुद्धि तथा आत्मा के सम्पूर्ण सुख से लगाया जाता है। इसे समग्र सुख भी कहते हैं।

प्रश्न 7.
सुख के सम्बन्ध में यजुर्वेद में क्या कहा गया है?
उत्तर:
यजुर्वेद में कहा गया है कि सुख से बढ़कर कुछ और नहीं है। सुख के लिए ही धर्म व अर्थ की ओर मनुष्य प्रवृत्त होता है। सुख के लिए ही सारे कार्य किये जाते हैं। सुख ही सबसे श्रेष्ठ पदार्थ है।

प्रश्न 8.
आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले दो तत्त्व बताइए।
उत्तर:
आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले दो तत्त्व हैं :

  1. आवश्यकताएँ व्यक्ति की आर्थिक स्थिति से प्रभावित होती हैं।
  2. आवश्यकताएँ देश के आर्थिक विकास के स्तर से भी प्रभावित होती हैं।

प्रश्न 9.
महाभारत व रामायण में प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व किसका बताया गया है?
उत्तर:
महाभारत तथा रामायण में प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व राजा का माना गया है।

प्रश्न 10.
आवश्यकताओं की पूर्ति के सम्बन्ध में कठोपनिषद में क्या कहा गया है?
उत्तर:
कठोपनिषद में कहा गया है कि मनुष्य कितना – ही धन प्राप्त कर ले उस साधन से इच्छाएँ कभी तृप्त नहीं होती हैं। जितना धन मिलता जाता है उतनी ही इच्छा बढ़ती जाती है।

प्रश्न 11.
आवश्यकताओं की पूर्ति के सम्बन्ध में हितोपदेश तथा विश्वामित्र ने क्या कहा है?
उत्तर:
हितोपदेश में कहा गया है कि इच्छाएँ चक्र की भाँति बढ़ती चली जाती हैं उनकी कभी तृप्ति नहीं हो पाती है। संसार में ऐसा कोई द्रव्य नहीं है जो मनुष्य की आवश्यकताओं का पेट भर सके। विश्वामित्र के अनुसार, मनुष्य की कामनाएँ कभी पूर्ण नहीं होती हैं। एक के बाद एक उत्पन्न होती रहती हैं।

प्रश्न 12.
प्राचीन भारतीय चिन्तन के अनुसार आवश्यकताओं के दो लक्षण बताइए।
उत्तर:
प्राचीन भारतीय चिन्तन के अनुसार आवश्यकताओं के दो लक्ष्य हैं :

  1. आवश्यकताएँ असीमित होती हैं।
  2. आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के साधन सीमित होते हैं।

प्रश्न 13.
वैदिक साहित्य आवश्यकताओं की पूर्ति के सम्बन्ध में क्या कहता है?
उत्तर:
वैदिक साहित्य में इस बात पर बल दिया गया है कि आवयकताओं की पूर्ति उत्तम, न्यायोचित एवं स्वयं द्वारा अर्जित धन से ही की जानी चाहिए।

प्रश्न 14.
‘उपभोग’ से क्या आशय है?
उत्तर:
व्यक्ति की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए वस्तुओं तथा सेवाओं का प्रत्यक्ष एवं अन्तिम प्रयोग ही उपभोग कहलाता है।

प्रश्न 15.
शुक्र ने उपभोग का क्या अर्थ बताया है?
उत्तर:
शुक्र के अनुसार, धान्य, वस्त्र, गृह, बगीचा, गाय, विद्या तथा राज्य आदि के उपार्जन के लिए और धन आदि की प्राप्ति के लिए तथा इन सभी की रक्षा के लिए जो व्यय किया जाता है, उसे उपभोग कहते हैं।

प्रश्न 16.
संयमित उपभोग से क्या आशय है?
उत्तर:
संयमित उपभोग का आशय स्वयं द्वारा अर्जित धन से अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने से लगाया जाता है।

प्रश्न 17.
सह उपभोग की अवधारणा क्या है?
उत्तर:
प्राचीन साहित्य में इस बात पर बल दिया गया है कि व्यक्तियों को विभिन्न वस्तुओं को मिल बाँटकर खाना चाहिए। जो अकेला उपभोग करता है उसे पापी कहा गया है।

प्रश्न 18.
उपभोग की आचार संहिता के दो प्रमुख बिन्दु बताइए।
उत्तर:

  1. न्यायोचित साधनों से अर्जित धन का ही उपभोग करना चाहिए।
  2. व्यक्ति को अकेले किसी वस्तु का उपभोग नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 19.
उपभोग में नैतिकता से क्या आशय है?
उत्तर:
मनु वस्तुओं के उपभोग में नैतिकता को बहुत महत्त्व देते हैं। उनके अनुसार चुराकर उपभोग करना दण्डनीय है। शुक्र जुआ, शराब आदि के उपभोग को अनुचित मानते हैं।

प्रश्न 20.
भारतीय चिन्तन में कृपणता का विरोध क्यों किया गया है?
उत्तर:
भारतीय चिन्तन में कृपणता अर्थात् कंजूसी का विरोध किया गया है, क्योंकि कंजूस के हाथ में पहुँचे धन का कोई लाभ नहीं होता है। कृपणता समाज में प्रभावी माँग की कमी करती है, बेरोजगारी बढ़ाती है।

प्रश्न 21.
भारतीय अर्थ चिन्तकों ने कौन-से चार पुरुषार्थों का उल्लेख किया है?
उत्तर:
भारतीय अर्थचिन्तकों ने धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चार पुरुषार्थों का उल्लेख किया है तथा उनका चिन्तन इन्हीं के ऊपर आधारित है।

प्रश्न 22.
भारतीय चिन्तन के अनुसार मनुष्य की सुख सुविधा का मूल क्या है?
उत्तर:
भारतीय चिन्तन के अनुसार मनुष्य की सुख सुविधा का मूल धर्म को माना गया है तथा धर्म का मूल है अर्थ। चाणक्य के अनुसार, “सुखस्य मूल धर्मः। धर्मस्य मूलमः अर्थः।

प्रश्न 23.
वेदों के महान् भाष्यकार यास्काचार्य ने धन के सम्बन्ध में क्या कहा है?
उत्तर:
यास्काचार्य कहते हैं कि “धन वह है जो सबको सन्तुष्ट और प्रसन्न करता है।” यह समस्त पदार्थों के विनिमय का साधन है।

प्रश्न 24.
वेदों के अनुसार धन का क्या आशय है?
उत्तर:
वेदों में धन का अभिप्राय सम्पत्ति, वैभव तथा मुद्रा से लगाया गया है।

प्रश्न 25.
भारतीय वांग्मय में अर्थ के कौन श्रोत बताये गए हैं?
उत्तर:
भारतीय वांग्मय में भूमि, कृषि, वाणिज्य, व्यवसाय तथा उद्योग को अर्थ में मुख्य श्रोत माने गए हैं।

प्रश्न 26.
धनार्जन करते समय किन पाँच बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
धनार्जन करते समय निम्नलिखित 5 बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. धनार्जन से अन्य प्राणियों को पीड़ा नहीं होनी चाहिए।
  2. अपने शरीर को अनुचित कष्ट नहीं होना चाहिए।
  3. धन गलत साधन से अर्जित नहीं होना चाहिए।
  4. उसके उपार्जन में स्वाध्याय से बाधा नहीं पड़नी चाहिए तथा
  5. स्वअर्जित साधनों से धन प्राप्त करना चाहिए।

प्रश्न 27.
कृष्ण अथवा काला धन क्या है?
उत्तर:
विष्णु, नारद एवं वृहस्पति ने उस धन को कृष्ण अथवा काला धन कहा है जो धूर्तता, मिलावट, चोरी, जुआ, डकैती, ब्याज आदि से प्राप्त किया जाता है। आधुनिक दृष्टिकोण से काला धन वह है जिस पर सरकार को कर का भुगतान नहीं किया जाता है।

प्रश्न 28.
महाभारत में धन के कौन से 5 उपयोग बताये गए हैं?
उत्तर:

  1. धार्मिक कार्यों के लिए
  2. आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
  3. पूँजी निर्माण के लिए
  4. कल्याणकारी कार्यों के लिए तथा
  5. स्वजनों के लिए।

प्रश्न 29.
धनार्जन की आचार संहिता के दो बिन्दु बताइए।
उत्तर:

  1. धर्म मार्ग से ही धनार्जन किया जाना चाहिए।
  2. स्वयं के परिश्रम एवं प्रयत्नों से ही धनार्जन होना चाहिए।

प्रश्न 30.
वैदिक साहित्य पर्यावरण के सम्बन्ध में क्या सन्देश देता है?
उत्तर:
वैदिक साहित्य यह सन्देश देता है कि हमें अपने स्वार्थ के लिए पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करना चाहिए. तथा पर्यावरण का संरक्षण करना चाहिए।

प्रश्न 31.
यजुर्वेद में पर्यावरण प्रदूषण के प्रति किस | प्रकार सचेत किया गया है?
उत्तर:
यजुर्वेद में कहा गया है कि वायु, जल, वनस्पतियों और प्राणियों में सन्तुलन बना रहना चाहिए। जब इनमें सन्तुलन बिगड़ जाता है तो प्रत्येक जीव-जन्तु, पेड़-पौधों तथा मनुष्य पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 32.
पर्यावरण प्रदूषण के तीन रूप बताइए।
उत्तर:

  1. भूमि प्रदूषण,
  2. जल प्रदूषण
  3. वायु प्रदूषण

प्रश्न 33.
वेदों में पर्यावरणीय घटकों की शुद्धता के लिए कौन-सा उपाय बताया गया है?
उत्तर:
वेदों में पर्यावरणीय घटकों की शुद्धता के लिए यज्ञ को अप्रतिम साधन बताया गया है। यजुर्वेद में कहा गया है कि यज्ञ की आहुतियों से हवा, जल तथा आकाश के हानिकारक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 34.
अथर्ववेद में पर्यावरण प्रदूषण के सम्बन्ध में क्या कहा गया है?
उत्तर:
अथर्ववेद में कहा गया है कि यदि हम अपने लिए वनस्पतियों और औषधियों को काटकर पृथ्वी को सताते हैं, तो पृथ्वी हमें अनावृष्टि, अतिवृष्टि तथा भयंकर तूफानों से नष्ट कर देगी।

प्रश्न 35.
दुर्गा सप्तशती में मानव एवं प्रकृति के सम्बन्ध के बारे में क्या कहा गया है?
उत्तर:
दुर्गा सप्तशती में मानव एवं प्रकृति दोनों के सम्बन्ध में स्पष्ट कहा गया है कि जब तक पृथ्वी वृक्षों तथा जंगलों से समृद्ध रहेगी तब तक यह मनुष्यों का पोषण करती रहेगी।

RBSE Class 11 Economics Chapter 11 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आवश्यकता से क्या आशय है? स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
साधारण अर्थ में इच्छा तथा आवश्यकता दोनों को एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है लेकिन अर्थशास्त्र में इन दोनों शब्दों में अन्तर किया जाता है। अर्थशास्त्र में प्रभावपूर्ण इच्छा (Effective Disire) की ही आवश्यकता माना जाता है। प्रभावपूर्ण इच्छा के लिए तीन बातों का होना आवश्यक है-(i) किसी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा (ii) इच्छा को सन्तुष्ट करने के लिए पर्याप्त साधन तथा (iii) साधनों की इच्छा पूर्ति के लिए खर्च करने की तत्परता। यदि कोई कार खरीदने के बारे में सोचता है तो यह उसकी इच्छा मात्र है लेकिन यदि उसके पास कार खरीदने के लिए पर्याप्त मुद्रा हो और उस मुद्रा को वह कार खरीदने पर खर्च करने को तत्पर हो तो कार की इच्छा उसकी आवश्यकता बन जाती है।

प्रश्न 2.
इच्छा, आवश्यकता एवं माँग के क्षेत्र को चित्र द्वारा समझाइये।
उत्तर:
इच्छा आकाश के समान अनन्त होती है। अत: इसका क्षेत्र बहुत विस्तृत होता है। आवश्यकता का क्षेत्र इच्छा की तुलना में छोटा या संकुचित होता है क्योंकि सभी इच्छाएँ आवश्यकताएँ नहीं होती हैं। माँग का क्षेत्र आवश्यकता के क्षेत्र की तुलना में संकुचित होता है। यह प्रस्तुत चित्र से और स्पष्ट हो जाता है।
RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 11 प्राचीन भारतीय आर्थिक अवधारणाएँ 1

प्रश्न 3.
आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कोई दो तत्त्व बताइए।
उत्तर:
आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले दो तत्त्व :

  • व्यक्ति की आर्थिक स्थिति :
    आवश्यकता मनुष्य की आर्थिक स्थिति से प्रभावित होती है। जिस व्यक्ति के पास आर्थिक साधन ज्यादा होते हैं उसकी आवश्यकताएँ भी ज्यादा होती हैं। गरीब व्यक्ति की आवश्यकताएँ कम होती हैं।
  • आर्थिक विकास का स्तर :
    आवश्यकताएँ आर्थिक विकास के साथ-साथ बढ़ती जाती हैं। अविकसित समाज की आवश्यकताएँ कम होती हैं, जबकि विकसित समाज की आवश्यकताएँ ज्यादा होती हैं।

प्रश्न 4.
प्राचीन भारतीय चिन्तन के अनुसार आवश्यकताओं के लक्षण बताइए।
उत्तर:
प्राचीन भारतीय चिन्तन के अनुसार आवश्यकताओं के निम्नलिखित लक्षण होते हैं :

  1. आवश्यकताएँ असीमित होती हैं।
  2. सन्तुष्टि के साधन सीमित होते हैं।
  3. उपलब्ध साधनों से आवश्यकताओं को सन्तुष्ट न कर पाने के कारण मनुष्य दुःखी रहता है।
  4. कुछ आवश्यकताएँ आवर्ती स्वभाव की होती हैं अर्थात् कुछ समय बाद वह पुनः उत्पन्न हो जाती हैं।
  5. आवश्यकताएँ सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति तथा धार्मिक भावनाओं आदि से प्रभावित होती हैं।
  6. आवश्यकताएँ आर्थिक विकास के साथ बढ़ती जाती हैं।

प्रश्न 5.
संयमित उपभोग की अवधारणा समझाइये।
उत्तर:
प्राचीन भारतीय साहित्य में संयमित उपभोग पर बल दिया गया है। इसके अनुसार मनुष्य को उतने ही अन्न को ग्रहण करना चाहिए जितने अन्न की जीवन रक्षा के लिए आवश्यकता हो। ईशोपनिषद में कहा गया है कि “हे मनुष्य! तू किसी के धन की इच्छा मतकर क्योंकि धन तो किसी का नहीं है जो उसकी इच्छा की जाए।”

हमारे शास्त्रों के अनुसार जीवन निर्वाह हेतु विषय सामग्री का एकत्रण व उपभोग इच्छानुसार न करके आवश्यकतानुसार अर्थात् न्यूनतम करना ही न्यायसंगत माना गया है। महाभारत में लिखा है कि मनुष्य का अधिकार केवल उतने धन पर है जितने से उसका पेट भर जाए। इससे अधिक धन संग्रह करने वाले को चोर एवं दण्ड का पात्र माना गया है।

प्रश्न 6.
सह उपभोग की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन भारतीय साहित्य में यह निर्देशित किया गया है कि मनुष्य को विभिन्न वस्तुओं को बाँटकर खाना चाहिए। ऐश्वर्य, वैभव व सम्पत्ति सब ईश्वर की देन है। अत: इनका उपभोग मिल बाँटकर करना चाहिए। जो व्यक्ति अकेला उपभोग करता है उसे पापी कहा गया है। उपार्जित धन का स्वजनों, पूँजी निर्माण, धार्मिक तथा अन्य कल्याणकारी कार्यों पर व्यय करके ही शेष का स्वयं उपभोग करना चाहिए। अथर्ववेद में लिखा है कि हे मनुष्य! तू सौ हाथों से धन अर्जित कर तथा हजारों हाथ वाला बनकर उसे खर्च कर। इस भावना से ही मनुष्य को अधिकतम सन्तुष्टि मिल सकती है। यह भी कहा गया है कि मनुष्य को अतिथियों, नौकरों, असहाय व्यक्तियों एवं पशु-पक्षियों को खिलाकर ही उपभोग करना चाहिए।

प्रश्न 7.
उपभोग की आचार संहिता के दो प्रमुख बिन्दु बताइए।
उत्तर:
उपभोग की आचार संहिता के दो प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित हैं :

  1. न्यायोचित साधनों से प्राप्त धन का उपभोग-व्यक्ति को न्यायोचित तरीके से कमाये हुए धन का ही नीतिपूर्वक उपभोग करना चाहिए। अन्याय एवं बेईमानी से कमाया हुआ धन उपभोग योग्य नहीं माना गया है।
  2. अकेले उपभोग का निषेध-व्यक्ति को अकेले उपभोग नहीं करना चाहिए। निःसहाय एवं गरीब लोगों को खिलाकर ही उपभोग करना चाहिए।

प्रश्न 8.
प्राचीन भारतीय साहित्य में खाद्यान्न के संग्रहण के सम्बन्ध में क्या विचार व्यक्त किये गए हैं?
उत्तर:
प्राचीन भारतीय साहित्य में कहा गया है कि खाद्यान्नों का संग्रहण आवश्यकता से अधिक नहीं करना चाहिए और संग्रहण की न्यूनतम अवधि के लिए होना चाहिए। यदि आवश्यकता से ज्यादा खाद्यान्न का संग्रहण हो जाए तो अतिरिक्त खाद्यान्न को जरूरतमन्द व्यक्तियों में वितरित कर देना चाहिए। उनके अनुसार संग्रहण अनेक समस्याओं को जन्म देता है। संग्रहीत खाद्यान्न पर राजा, सम्बन्धियों तथा चोरों की निगाह रहती है।

प्रश्न 9.
देश की सुरक्षा के लिए धन का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
किसी भी देश की सुरक्षा देश में उपलब्ध धन पर निर्भर करती है। महाभारत में कहा गया है कि राजा का मूल कोष ही है। इसी कोष के माध्यम से राजा कर्मचारियों का भरण-पोषण करता है दान-दक्षिणा देता है, किले की मरम्मत कराता है, हाथी, घोड़े को खरीदता है तथा वाणिज्य, धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि करता है। सेना का मूल तो खजाना ही है। अग्नि पुराण में भी अर्थ को राज्य की सुरक्षा एवं समृद्धि का साधन माना गया है।

प्रश्न 10.
धन के भेद बताइए।
उत्तर:
वृहस्पति, नारद एवं विष्णु आदि ने धन को तीन भागों में विभाजित किया है :

  • शुक्ल अथवा सफेद धन (White Money) :
    जो धन वीरता, विद्या, पौरोहित्य आदि उचित वृत्तियों से कमाया जाता है उसे शुक्ल धन के अन्तर्गत शामिल किया जाता है।
  • सबल धन (Branded Money) :
    कृषि, वाणिज्य, शिल्प एवं सेवा द्वारा कमाये गए धन को राजस या सबल धन कहते हैं।
  • कृष्ण अथवा काला धन (Black Money) :
    धूर्तता, मिलावट, छल कपट, जुआ, चोरी, डकैती, एवं ब्याज आदि द्वारा अर्जित धन को काला धन कहा गया है। काले धन को दण्डनीय माना गया है।

प्रश्न 11.
रिश्वतखोरी या भ्रष्टाचार से क्या आशय है?
उत्तर:
भारतीय अर्थ चिन्तन में रिश्वतखोरी अथवा भ्रष्टाचार को विनिमय का एक विलक्षण माध्यम माना गया है जिसमें काली मुद्रा का सृजन होता है। ऐसे समस्त लेन-देन गुप्त होते हैं तथा इन लेन-देनों में कोई उचित मापदण्ड नहीं होता है। कहा जाता है कि रिश्वत सब पापों का द्वार है। रिश्वतखोर लोगों को पैसे के बल पर आसानी से खरीदा जा सकता है। जिस देश में ऐसे लोगों पर लगाम नहीं कसी जाती है उस देश के नागरिक कमी खुशहाल व समृद्ध नहीं हो सकते हैं।

प्रश्न 12.
जल प्रदूषण किस प्रकार हानिकारक है? स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
जल ही जीवन है। लेकिन जब जल प्रदूषित हो जाता है तो समाज के सामने अनेक समस्याएँ पैदा हो जाती हैं। आजकल औद्योगिक विकास के कारण तथा रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों तथा डिटरजेन्ट पाउडरों के प्रयोग के कारण जल प्रदूषित हो रहा है। जल को वेदों में प्राणों का रक्षक एवं कल्याणकारी माना है। मनु के अनुसार पानी में अपवित्र पदार्थ, विष, मलमूत्र, आदि डालकर प्रदूषित नहीं करना चाहिए। जल प्रदूषण से न केवल मनुष्य अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाता है बल्कि भूमि की उत्पादन क्षमता भी कम हो जाती है।

प्रश्न 13.
वैदिक साहित्य पर्यावरण प्रदूषण के बारे में क्या कहता है?
उत्तर:
वैदिक साहित्य में यह स्पष्ट कहा गया है कि हमें अपने स्वार्थ के लिए पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करना चाहिए और पर्यावरण संरक्षण पर बल देना चाहिए। पर्यावरण प्रदूषण की समस्या ने विश्व के अस्तित्व को ही खतरा पैदा कर दिया है। पर्यावरण प्रदूषण ने भूमि,जल एवं वायु सभी को प्रदूषित कर दिया है जिससे मानव मात्र को भयंकर परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं। इसी कारण आजकल पर्यावरण संरक्षण पर बहुत बल दिया जा रहा है।

प्रश्न 14.
भारतीय प्राचीन साहित्य में पर्यावरण प्रदूषण के कौन-से रूपों का उल्लेख मिलता है?
उत्तर:
भारतीय प्राचीन साहित्य में पर्यावरण प्रदूषण के निम्नलिखित रूपों का उल्लेख मिलता है :

  1. भूमि प्रदूषण
  2. जल प्रदूषण
  3. वायु प्रदूषण
  4. आकाश प्रदूषण
  5. समय प्रदूषण
  6. दिशा प्रदूषण
  7. बुद्धि प्रदूषण
  8. गर्मी प्रदूषण आदि।

प्रश्न 15.
भूमि प्रदूषण से बचाव के लिए वेदों ने क्या सुझाव दिये हैं?
उत्तर:
प्राचीन समय में भारतीय लोग भूमि को अपनी माँ मानते थे, क्योंकि भूमि से उन्हें अनाज, अनेक प्रकार की औषधियाँ, पेड़-पौधे मिलते थे। भूमि जब उपयोगी से अनुपयोगी हो जाए तो इसे भूमि प्रदूषण कहते हैं। भूमि की सतह को प्रदूषण मुक्त करने के लिए मलमूत्र खुले में न त्यागना, कटे हुए बाल व नाखून तथा बेकार वस्तुओं को जुते हुए खेतों व बगीचों मैं न डालना आवश्यक है। खेती के काम में रासायनिक खादों का प्रयोग भी बन्द होना चाहिए।

प्रश्न 16.
पर्यावरण संरक्षण पर हमारे प्राचीन ग्रन्थों में क्या निर्देशित किया गया है?
उत्तर:
भारतीय प्राचीन ग्रन्थों में पर्यावरण संरक्षण पर बहुत बल दिया गया है। महाभारत तथा मनुस्मृति में स्पष्ट कहा गया है कि व्यक्ति को जीविकोपार्जन के लिए ऐसे रास्ते अपनाना चाहिए जिससे प्राणियों को बिल्कुल कष्ट न हो तथा वनस्पतियों का नुकसान न हो। हमें अपने स्वार्थ के लिए पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करना चाहिए बल्कि उसका संरक्षण करना चाहिए। यजुर्वेद में पर्यावरण संरक्षण के लिए कहा गया है कि मनुष्य को वायु, जल, वनस्पतियों तथा प्राणियों के बीच सन्तुलन बनाकर चलना चाहिए। अन्यथा प्रत्येक जीव जन्तु, पेड़-पौधों और मनुष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी है।

प्रश्न 17.
हमारे भारतीय साहित्य में वृक्षों की महिमा का किस प्रकार वर्णन किया गया है?
उत्तर:
मत्स्य पुराण में वृक्ष की महिमा का जो वर्णन मिलता है वैसा विश्व की अन्य किसी संस्कृति में देखने को नहीं मिलता है।

दश कूप समावापी, दश वापीसमो हृदः।
दश हृदसमः पुत्रः दस पुत्र समोद्रुमः।।

इसका आशय है कि दस कुओं के बराबर बावड़ी का महत्त्व है तथा दस बावड़ी के बराबर एक तालाब का तथा दस तालाबों के बराबर एक पुत्र का और दस पुत्रों के समान एक वृक्ष का महत्त्व है। इससे वृक्ष की महिमा का पता चल जाता है। अर्थर्ववेद में भी वनस्पतियों के निरन्तर उपयोग के साथ-साथ उनकी जड़ न काटने का आदेश दिया गया है तथा वनों को जलाने एवं नष्ट करने वालों को दण्डित करने का प्रावधान है।

प्रश्न 18.
प्रदूषण से बचाव के लिए यज्ञ का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
वेदों में यज्ञ को आध्यात्मिक उपासना का साधन होने के साथ-साथ पर्यावरण को शुद्ध करने, उसे कीटाणु रहित एवं प्रदूषण रहित बनाने में यज्ञ को महत्त्वपूर्ण साधन बताया गया है। यज्ञ की आहुतियों से हवा, जल तथा आकाश के हानिकारक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। यज्ञ में दी जाने वाली आहुतियाँ नष्ट नहीं होती हैं बल्कि वह अपना स्वरूप बदलकर सूक्ष्म एवं व्यापक होकर मानव मात्र के लिए लाभदायक होती हैं। यज्ञ के तत्त्व तीव्र होकर वायु, जल, पृथ्वी और आकाश में प्रवेश करके प्रदूषण को नष्ट करते हैं।

प्रश्न 19.
जल प्रदूषण के कारण बताइए।
उत्तर:
जल प्रदूषण के मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण हो सकते हैं :

  1. नदियों के पानी में मल-मूत्र को मिला देना।
  2. रासायनिक खादों एवं कीटनाशक दवाओं के प्रयोग से।
  3. औद्योगिक संस्थानों के अंवशिष्ट पदार्थों को नदियों से बहाने से।
  4. मृत व्यक्तियों एवं पशुओं की लाशों को नदियों में बहाने से।
  5. परमाणु विस्फोटों से उत्पन्न रेडियोधर्मी पदार्थ जो जल में जाकर मिल जाते हैं।

प्रश्न 20.
भारतीय चिन्तन में पारस्थितिकीय सन्तुलन (Ecological Balance) के सम्बन्ध में क्या दृष्टिकोण अपनाया गया है?
उत्तर:
पारिस्थितिकीय सन्तुलन का आशय है कि जल, जंगल व जमीन में परस्पर सन्तुलन बनाकर रखना। इसमें असन्तुलन होने पर प्रकृति एवं मानव दोनों को क्षति पहुँचाती है। अत: जल, जंगल एवं जमीन तीनों का उपयोग सोच समझकर करना चाहिए तथा इनके संरक्षण एवं विकास पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाना आवश्यक है।

प्रश्न 21.
आवश्यकता की पूर्ति एवं सन्तुष्टि में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
मनुष्य को अधिकतम सन्तुष्टि या सुख की प्राप्ति अपनी विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने से ही होती है। वैदिक साहित्य में भी उत्तम, न्यायोचित एवं स्वअर्जित धन द्वारा ही आवश्यकताओं की पूर्ति करके सुखी होने की कामना की गई है। यजुर्वेद में भी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न वस्तुओं पर धन व्यय करने के बाद पुन: धन प्राप्त करने तथा पूर्ण प्राप्त धन को विनियोग करने पर बल दिया गया है। ऐसा विचार इसलिए रखा गया है जिससे व्यक्ति अधिक धन अर्जित कर अपनी अधिक-से-अधिक आवश्यकताओं को पूर्ण कर सन्तुष्टि अथवा सुख प्राप्त कर सके। इस प्रकार आवश्यकता पूर्ति एवं सुख में सीधा सम्बन्ध है।

प्रश्न 22.
शुक्र ने उपभोग को किस प्रकार परिभाषित किया है?
उत्तर:
शुक्र के अनुसार, धान्य, वस्त्र, गृह, बगीचा, गाय, विद्या तथा राज्य आदि के उपार्जन के लिए तथा और अधिक धन प्राप्त करने के लिए तथा इन सभी की रक्षा के लिए जो व्यय किया जाता है उसे उपभोग कहते हैं। शुक्र ने तो सोना, चाँदी, रत्न, रथ, घोड़े, गाय, हाथी, ऊँट तथा इन्हें रखने के स्थान, अनाज, अस्त्र, शस्त्र आदि के रखने के स्थान तथा मन्त्री, वैद्य, रसोइया, शिल्पी आदि के जो स्थान हैं, उन सबको उपभोग की श्रेणी में रखा है।

प्रश्न 23.
भारतीय वैदिक साहित्य में उपभोग करने के सम्बन्ध में क्या विचार व्यक्त किये हैं?
उत्तर:
मनु, शुक्र, विष्णु एंव याज्ञवल्क्य के धर्म सूत्रों के अनुसार मनुष्य को अतिथियों, नौकरों, असहाय व्यक्तियों एवं पशु-पक्षियों को खिलाकर भोजन करना चाहिए। कौटिल्य ने तो यहाँ तक कहा है कि जो व्यक्ति बच्चे, माता-पिता, विधवाओं का भरण पोषण नहीं करता है, उसे दण्डित करना चाहिए।

प्रश्न 24.
“साई इतना दीजिये जा में कुटुम्ब समाय। मैं भी भूखा न रहँ, साधु न भूखा जाय।।” इसको स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
इस दोहे में यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य को धनोपार्जन आवश्यकता के अनुसार ही करना चाहिए। ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि हे ईश्वर! मुझे इतना धन दीजिये जिससे मैं अपने कुटुम्ब का लालन-पालन ठीक प्रकार कर सकूँ तथा मेरे घर से कोई साधू भूखा न जाए और मैं भी अपना पेट भर सकूँ। वैदिक संस्कृति में आवश्यकता से ज्यादा धनार्जन को पाप माना गया है।

प्रश्न 25.
आर्थिक विकास ने किस प्रकार पर्यावरण को प्रदषित किया है?
उत्तर:
आजकल आर्थिक विकास की होड़ में हम पर्यावरण के महत्त्व को अनदेखा कर रहे हैं। आर्थिक विकास के कारण भूमि, जल एवं वायु तो प्रदूषित हुए ही हैं, पारिस्थितिक सन्तुलन भी बिगड़ गया है। इस कारण तापमान में वृद्धि, ओजोन परत का ह्रास, अम्लीय वर्षा, बढ़ता जल स्तर, लुप्त होती प्रजातियाँ तथा भूमि प्रदूषण जैसी समस्याएँ पैदा हो गई हैं। इन सबका प्राणी मात्र के स्वास्थ्य पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

RBSE Class 11 Economics Chapter 11 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उपभोग की विभिन्न अवधारणाओं को स्पष्ट कीजिये।
अथवा
संयमित उपभोग एवं सह-उपभोग की अवधारणा को समझाइये।
उत्तर:
प्राचीन भारतीय साहित्य में वर्णित उपभोग की विभिन्न अवधारणाओं का अध्ययन संयमित उपभोग एवं सह-उपभोग शीर्षक के अन्तर्गत किया जा सकता है। :
1. संयमित उपभोग की अवधारणा (Concept of Balanced Consumption) :
“प्राचीन भारतीय साहित्य में स्वअर्जित धन से संयमित उपभोग करने पर बल दिया गया है। इसके अनुसार मनुष्य को जीवन की रक्षा के लिए जितने आहार की आवश्यकता है, उतना ही अन्न उसे ग्रहण करना चाहिए। ईषोपनिषद में कहा गया है कि हे मनुष्य! तू किसी के धन की इच्छा मतकर क्योंकि धन तो किसी का नहीं है जो उसकी इच्छा की जाए।”

जीवन निर्वाह हेतु विषय-सामग्री का संकलन व उपभोग इच्छानुसार न करके आवश्यकतानुसार अर्थात् न्यूनतम करना चाहिए। महाभारत में भी लिखा है कि मनुष्य का अधिकार केवल उतने धन पर है जितने से उसका पेट भर जाए। गलत तरीके से अर्जित धन और आवश्यकता से ज्यादा धन संग्रह को दण्डनीय माना गया है। आचार्य शुक्र तो अधिक धन व्यय करने वाले व्यक्ति को राज्य से निकालने का निर्देश देते हैं। कौटिल्य ने भी ऐश्वर्य का जीवन जीने वाले तथा धन का अनुचित व्यय करने वाले व्यक्ति को रोकने के लिए राज्य को निर्देशित किया है।

2. सह-उपभोग की अवधारणा (Concept of Co-consumption) :
हमारे प्राचीन साहित्य में यह निर्देशित किया गया है कि व्यक्तियों को विभिन्न वस्तुएँ आपस में बाँटकर उपभोग करना चाहिए। जो व्यक्ति अकेला उपभोग करता है उसे पापी व्यक्ति कहा गया है। महाभारत में कहा गया है कि “पृथ्वी पर जो कुछ है उसमें मेरा कुछ नहीं हैं अर्थात् उस पर सभी का समान अधिकार है।” हमारे शास्त्रों के अनुसार जो भी धन अर्जित किया जाए उसका उपभोग स्वजनों, धार्मिक एवं कल्याणकारी कार्यों पर व्यय करने तथा विनियोग करने के उपरान्त ही उपभोग करना चाहिए।

मनु, शुक्र, विष्णु एवं यज्ञवल्क्य के धर्मसूत्रों के अनुसार मनुष्य को अतिथियों, असहाय व्यक्तियों, नौकरों, पशु-पक्षियों को खिलाकर खुद अन्न ग्रहण करना चाहिए। कौटिल्य तो यहाँ तक कहते हैं कि जो लोग बच्चों, माता-पिता, विधवाओं, पुत्रियों का भरण-पोषण नहीं करते हैं, उन्हें दण्डित करना चाहिए।

“अथर्ववेद में तो समान उपभोग के लिए निर्देशित किया गया है। उच्च चरित्र वाले व्यक्ति सम्पूर्ण संसार को ही अपना परिवार मानते हैं।” वसुधैव कुटुम्बकम का मंत्र उनकी जीवन शैली का आधार होता है।

प्रश्न 2.
उपभोग की आचार संहिता के विभिन्न बिन्दुओं को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
प्राचीन अर्थचिन्तकों द्वारा उपभोग की आचार संहिता का निर्माण किया गया था जिसके प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित

  • न्यायोचित साधन से प्राप्त धन का ही उपभोग :
    आचार संहिता के अनुसार मनुष्य को केवल उसी धन का उपभोग करना चाहिए जिसे न्यायोचित तरीके से अर्जित किया गया हो। गलत तरीकों से अर्जित धन का उपभोग वर्जित माना गया है।
  • अकेले उपभोग का निषेध :
    किसी भी वस्तु का अकेले उपभोग करना उचित नहीं माना गया है। मनुष्य को गरीब लोगों को खिलाकर ही भोजन करना चाहिए।
  • संयमित उपभोग स्वास्थ्यपूर्ण :
    मनु एवं चाणक्य का कहना है कि संयमित उपभोग ही स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है तथा ऐसे उपभोग से व्यक्ति की आय भी बढ़ती है।
  • उपभोग में नैतिकता :
    उपभोग में नैतिकता का होना अत्यन्त आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति किसी वस्तु को चोरी से प्राप्त करके उपभोग करता है तो यह अनैतिक कार्य है जिसके लिए वह व्यक्ति दण्ड का पात्र है। इसी प्रकार कालाबाजारी, जुआ, डकैती आदि से प्राप्त धन का उपभोग अनैतिक माना गया है।
  • कर्ज लेकर उपभोग करना अनुचित :
    उपभोग स्वअर्जित धन का होना चाहिए। कर्ज लेकर उपभोग करना उचित नहीं माना गया है। यदि विपत्ति के समय ऋण लिया भी जा रहा है तो उसे शीघ्रतिशीघ्र लौटाने का प्रयत्न करना चाहिए।
  • अति उपभोग वर्जित :
    शुक्राचार्य ने कहा है कि संयमित उपभोग ही सर्वोपरि है। आवश्यकता से ज्यादा किसी वस्तु का उपभोग करना उचित नहीं है।
  • कृपणता अनुचित :
    हमारे साहित्य में कृपणता या कंजूसी को अच्छा नहीं माना गया है। जो धन कंजूस के हाथ में पहुँच जाता है उससे किसी का भला नहीं होता है। अत: मानव को कंजूस प्रवृत्ति को त्यागते हुए विभिन्न वस्तुओं का उपभोग करना चाहिए। कृपणता समाज में प्रभावी माँग को कम करती है जिससे बेरोजगारी बढ़ती है।
  • खाद्यान्नों का आवश्यकतानुसार संग्रहण :
    प्राचीन भारतीय साहित्य में यह भी निर्देशित किया गया है कि मनुष्य को खाद्यान्नों का संग्रहण आवश्यकता से अधिक नहीं करना चाहिए तथा जो भी संग्रहण किया जाए वह उस अवधि के लिए ही किया जाना चाहिए। यदि किसी कारण संग्रहण आवश्यकता से अधिक हो जाए तो अतिरिक्त खाद्यान्न को जरूरतमन्द लोगों में बाँट देना चाहिए। राजा द्वारा संग्रहण आवश्यक बताया गया है, क्योंकि इसका प्रयोग सेवकों के भरण-पोषण, अकाल, सूखा, बाढ़ आदि से उत्पन्न विपरीत परिस्थितियों में किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
धनार्जन के उद्देश्य एवं महत्त्व स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
मनुष्य की अनेक आवश्यकताएँ होती हैं जिन्हें पूरा करने के लिए धनार्जन आवश्यक होता है। मनुष्य के समस्त सामाजिक कर्तव्यों और दायित्वों को पूरा करने के लिए भी धन की आवश्यकता होती है। धन.ही सुख का आधार है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यकतानुसार धनार्जन करना आवश्यक होता है। प्राचीन भारतीय शास्त्रों के अनुसार धन के महत्त्व को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है

  • अर्थ कार्य की पूर्णता का साधन :
    बिना अर्थ के किसी भी कार्य को पूरा करना सम्भव नहीं है। रामायण में धन का महत्त्व बताते हुए कहा गया है कि केवल धनवान व्यक्ति ही बहादुर, ज्ञानी एवं सर्वगुण सम्पन्न होता है। धनवान व्यक्ति को ही अच्छे परिवार का, सुन्दर एवं वाक्पटु माना जाता है। बिना धन के तो जीवनयापन करना भी सम्भव नहीं है।
  • धर्म-अर्थ का नियन्त्रक :
    मानव जीवन में अर्थ का पदार्पण पहले हुआ। बाद में अर्थ को नियन्त्रित करने के लिए धर्म की उत्पत्ति हुई। धर्म को अर्थ का नियन्त्रक माना जाता है। भारतीय चिन्तन में सही साधन से धनोपार्जन करने पर बल दिया गया है।
  • अर्थ एवं परमार्थ :
    धन से ही धर्म, कामसिद्धि, विद्या अध्ययन तथा स्वर्ग आदि सिद्ध होते हैं। बिना धन के मनुष्य धार्मिक कार्यों को भी सम्पन्न नहीं कर सकता है। धन के द्वारा ही मनुष्य परामर्थ कर सकता है।
  • भौतिक एवं आध्यात्मिक सुख :
    धन के द्वारा ही आध्यात्मिक कार्यों को पूर्ण किया जाता है। धन के माध्यम से ही धर्म में रुचि पैदा की जाती है तथा धर्म की वृद्धि होती है। बिना धन के न तो भौतिक सुख प्राप्त होता और न ही आध्यात्मिक सुख। इसलिए भौतिक एवं आध्यात्मिक सुख के लिए धन का उपार्जन अत्यन्त आवश्यक है।
  • देश की समृद्धि के लिए :
    देश की समृद्धि बिना धन के नहीं हो सकती है। सड़कों का निर्माण, हथियारों का संग्रह एवं निर्माण, आवश्यकता की वस्तुओं का निर्माण, शिक्षा का प्रसार तथा व्यापार कार्य सभी के लिए धन की आवश्यकता होती है। अत: देश की समृद्धि के लिए पर्याप्त मात्रा में धन होना आवश्यक है।
  • देश की सुरक्षा के लिए :
    प्रत्येक राज्य का यह कर्तव्य होता है कि वह राज्य में आन्तरिक शान्ति एवं सुरक्षा के वातावरण का निर्माण करे, लेकिन बिना धन के यह सम्भव नहीं है। राज्य की सीमाओं की सुरक्षा भी बिना धन के नहीं हो सकती है। पुलिस बल, फौज, हथियार आदि सभी के लिए पर्याप्त धन का होना आवश्यक है।

अग्नि पुराण में भी धन को राज्य की सुरक्षा का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया है। धन के माध्यम से ही राज्य कर्मचारियों का भरण-पोषण करता है तथा आवश्यक संसाधन जुटाता है।

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