RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 7 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण

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Rajasthan Board RBSE Class 11 Economics Chapter 7 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण

RBSE Class 11 Economics Chapter 7 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर  

RBSE Class 11 Economics Chapter 7 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
दो या दो से अधिक सम्बन्धित अंक समूहों की गुण, समय या स्थान पर तुलना करने के लिए किन चित्रों का
प्रयोग किया जाता है
(अ) सरल दण्ड चित्र
(ब) बहुदण्ड चित्र
(स) अन्तर्विभक्त दण्ड चित्र
(द) आयत चित्र
उत्तर:
(ब) बहुदण्ड चित्र

प्रश्न 2.
वृत्त बनाने के लिए जानना आवश्यक है
(अ) वर्ग
(ब) भुजा
(स) त्रिज्या
(द) गोला
उत्तर:
(स) त्रिज्या

प्रश्न 3.
आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण
(अ) एक त्रिज्या
(ब) द्विविमा
(स) त्रिविमा
(द) ये सभी
उत्तर:
(ब) द्विविमा

प्रश्न 4.
यदि 40% महिला भारत में शिक्षित हैं तो इसके अनुपात को वृत्त चित्र में दर्शाने के लिए कोण का प्रयोग होगा।
(अ) 60 डिग्री
(ब) 72 डिग्री
(स) 144 डिग्री
(द) 40 डिग्री
उत्तर:
(स) 144 डिग्री

प्रश्न 5.
आवृत्ति चित्रों की सहायता से बहुलक का निर्धारण किस श्रेणी में किया जा सकता है?
(अ) व्यक्तिगत श्रेणी
(ब) सतत श्रेणी
(स) खण्डित श्रेणी
(द) अपवर्जी श्रेणी
उत्तर:
(ब) सतत श्रेणी

प्रश्न 6.
द्रिविमा चित्र नहीं है
(अ) दण्ड चित्र
(ब) वर्ग चित्र
(स) आयत चित्र
(द) वृत्त चित्र
उत्तर:
(अ) दण्ड चित्र

प्रश्न 7.
बिन्दुरेखीय प्रदर्शन किया जाता है
(अ) सादा पेपर पर.
(ब) ग्राफ पेपर पर
(स) ड्राइंग शीट पर
(द) किसी पर भी
उत्तर:
(ब) ग्राफ पेपर पर

RBSE Class 11 Economics Chapter 7 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
रेखाचित्र से क्या आशय है?
उत्तर:
ये एकविमीय चित्र है। जब तथ्य से सम्बन्धित पद-मूल्यों की संख्या अधिक हो तथा श्रेणी के सबसे छोटे तथा सबसे बड़े मूल्य बीच के अंतर कम हो, तो ऐसी स्थिति में रेखा चित्रों का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 2.
किस चित्र द्वारा बहुलक ज्ञात किया जा सकता है?
उत्तर:
आवृत्ति आयत चित्रों की सहायता से बहुलक ज्ञात किया जाता है।

प्रश्न 3.
सारणीयन को समझाइये।
उत्तर:
समंकों को खानों तथा पंक्तियों में क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करने को सारणीयन कहा जाता है।

प्रश्न 4.
आँकड़े प्रस्तुत करने के कोई तीन आधार बताइए।
उत्तर:
आँकड़े प्रस्तुत करने के तीन आधार निम्नलिखित हैं

  1. पाठ-विषयक या वर्णात्मक प्रस्तुतीकरण
  2. सारणीबद्ध प्रस्तुतीकरण या सारणीयन
  3. आरेखीय या चित्रमय एवं बिन्दुरेखीय प्रस्तुतीकरण।

प्रश्न 5.
चित्रों की उपयोगिता के कोई चार बिन्दु लिखिए।
उत्तर:

  1. आकर्षक एवं प्रभावी,
  2. सरल एवं बोधगम्य प्रस्तुतीकरण,
  3. श्रम एवं समय की बचत,
  4. तुलना में सहायक।

प्रश्न 6.
द्विविमा चित्रों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. आयत चित्र,
  2. वर्ग चित्र।

प्रश्न 7.
एक आवृत्ति आयत चित्र बनाइए।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 7 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण 1

RBSE Class 11 Economics Chapter 7 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सारणीयन तथा वर्गीकरण में अन्तर कीजिए।
उत्तर:
सारणीयन तथा वर्गीकरण में निम्नलिखित अन्तर है :

  1. सबसे पहले अव्यवस्थित आँकड़ों को वर्गीकृत किया जाता है, फिर उसके बाद विभिन्न श्रेणियों में प्रस्तुत किया जाता है अतः वर्गीकरण, सारणीयन का आधार है।
  2. वर्गीकरण में एकत्रित समंकों को उनके समान या असमान गुणों के आधार पर विभिन्न वर्गों या श्रेणियों में बाँटा जाता है, जबकि सारणीयन में वर्गीकृत तथ्यों को पंक्तियों तथा स्तम्भों में प्रस्तुत किया जाता है।
  3. वर्गीकरण सांख्यिकीय विश्लेषण की एक विधि है, जबकि सारणीयन समंकों के प्रस्तुतीकरण की एक प्रक्रिया है।
  4. वर्गीकरण में समंकों को वर्गों व उपवर्गों में बाँटा जाता है, जबकि सारणीयन में उन्हें शीर्षक व उपशीर्षक में रखा जाता

प्रश्न 2.
चित्रमय एवं बिन्दुरेखीय प्रदर्शन में क्या अन्तर है?
उत्तर:

 समंकों का चित्रमय प्रदर्शनसमंकों का बिन्दुरेखीय प्रदर्शन
1दण्ड चित्र, आयत, वृत्त आदि रूप चित्रमय प्रदर्शन के ही  रूप हैं।सांख्यिकीय आँकड़ों का ग्राफ पेपर पर प्रदर्शन बिन्दुरेखीय प्रदर्शन कहलाता है।
2जो विषम अंक समझ में नहीं आते उन्हें सरलता से चित्रमय प्रदर्शन द्वारा समझा जाता है।इसमें सतत वक्रों का निर्माण किया जाता है।
3ये आकर्षक और प्रभावी होते हैं।इसके माध्यम से दो चरों के मध्य सह-सम्बन्ध का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
4चित्रमये, प्रदर्शन में श्रम व समय कम लगता है।इससे जटिल आँकड़ों को सरल एवं समझने योग्य बनाया जाता है।

प्रश्न 3.
बिन्दुरेखीय चित्र बनाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
बिन्दुरेखीय चित्र बनाते समय निम्नलिखित बातें ध्यान में रखनी चाहिए :

  • शुद्धता :
    बिन्दुरेखीय चित्रों को आकर्षक रूप देकर समय शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि अशुद्ध एवं गलत चित्रों से भ्रमात्मक निष्कर्ष निकलते हैं।
  • उपयुक्त आकार :
    चित्रों के आकार के सम्बन्ध में कोई निश्चित नियम नहीं है चित्र न ही बड़ा हो और न ही ज्यादा छोटा।।
  • संकेत :
    चित्र की रचना करते समय उपयोग में लिए गए विभिन्न बिन्दुओं को स्पष्ट करने के लिए ऊपरी नीचे कोने पर संकेत दे देना चाहिए।
  • सरलता :
    आसानी से समझने हेतु चित्र सामान्यत: सरल होने चाहिए। इससे पाठक भ्रम की स्थिति से बच सकता है।

प्रश्न 4.
चित्रों की उपयोगिता के कोई चार बिन्दु समझाइये।
उत्तर:
चित्रों की उपयोगिता के चार बिन्दु निम्नलिखित हैं :

  • आकर्षक और प्रभावी-
    चित्र मानस पटल पर स्थायी छाप छोड़ते हैं। चित्र आकर्षक तथा प्रभावी होने के कारण लोगों का ध्यान तुरन्त अपनी ओर खींच लेते हैं।
  • श्रम एवं समय की बचत :
    प्रायः समंकों को समझने के लिए एवं उनसे निष्कर्ष निकालने के लिए अधिक समय व परिश्रम लगाना पड़ता है। वहीं चित्रों की सहायता से तथ्यों की सारी विशेषताओं को कम समय में बिना तकनीकी ज्ञान से आसानी से समझा जा सकता है।
  • तुलना में सहायक :
    चित्रों की सहायता से विभिन्न तथ्यों के मध्य तुलना की जा सकती है। संख्यात्मक तुलना से चित्रात्मक तुलना ज्यादा प्रभावी होती है।
  • व्यापक उपयोग :
    सांख्यिकी चित्रों को जीवन के सभी क्षेत्रों में व्यापक रूप से काम में लिया जाता है। कलत ह।

प्रश्न 5.
सारणियों का वर्गीकरण किन आधारों पर किया जा सकता है।
उत्तर:
सारणियों को निम्नलिखित आधार पर वर्गीकृत किया जाता है

  • उददेश्यों के अनुसार :
    सामान्य उद्देश्य वाली सारणी का कोई विशिष्ट उद्देश्य नहीं होता। इसे संदर्भ सारणी भी कहते हैं। विशेष उद्देश्य सारणी किसी उद्देश्य विशेष की पूर्ति के लिए तैयार की जाती है। इसका आकार सामान्य सारणी से अपेक्षाकृत छोटा होता है। इसे संक्षिप्त या विश्लेषण सारणी भी कहते हैं। इसमें माध्य, प्रतिशत, अनुपात आदि का प्रयोग किया जाता है।
  • मौलिकता के अनुसार :
    प्राथमिक सारणी में समंकों को उनके मौलिक मूल रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है, इसे वर्गीकरण सारणी भी कहते हैं। इन सारणी में मौखिक समंकों के अतिरिक्त उनमें किये गए योग, प्रतिशत, अनुपात, गुणक आदि को भी प्रस्तुत किया जाता है।
  • रचना के अनुसार :
    जब समंकों को केवल एक गुण के आधार पर प्रस्तुत किया जाता है तो उसे सरल सारणी कहते है। जैसे-जनसंख्या/आयु/लिंग/राज्यों के अनुसार वितरण। जब समंकों को एक से अधिक विशेषताओं के आधार पर विभक्त जाता है तो उसे जटिल सारणी कहते हैं। ये द्विगुणी, त्रिगुणी, बहुगुणी सारणी हो सकती हैं।

RBSE Class 11 Economics Chapter 7 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सारणीयन का अर्थ स्पष्ट कीजिए। सारणी के कौन-कौन से अंग है। सारणी का निर्माण करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
सारणीयन का आशय :
सारणीयन आँकड़ों को सारणी के रूप में प्रस्तुत करने की विधि है। इसके अन्तर्गत वर्गीकृत आँकड़ों को कॉलमों एवं पंक्तियों में दिखाया जाता है। नीसवेंजर के अनुसार, “एक सांख्यिकीय सारणी आँकड़ों का स्तम्भों (कॉलम) तथा पंक्तियों के रूप में व्यवस्थित संगठन है।”

प्रो. ब्लेयर के अनुसार, “सारणीयन विस्तृत अर्थों में कॉलमों तथा पंक्तियों के रूप में आँकड़ों की क्रमबद्ध विशेषता है” सारणी के ऊपर से नीचे की ओर बने खानों को कॉलम तथा बायीं से दायीं ओर जाने वाली रेखाओं को पंक्तियाँ कहते हैं।

सारणी के अंग :
एक अच्छी सारणी के निम्नलिखित अंग हैं :

  • सारणी संख्या :
    किसी सारणी की संख्या उसकी पहचान के लिए की जाती है। इसे सारणी के सबसे ऊपर अंकित करना चाहिए।
  • शीर्षक :
    सारणी का शीर्षक सारणी की विषय-वस्तु को बताता है। यह शीर्षक स्पष्ट संक्षिप्त एवं सही भाषा में हों। इसे सारणी संख्या के बराबर या इसके ठीक बाद में लिखना चाहिए।
  • खानों व पंक्तियों के अनुशीर्षक व उपशीर्षक :
    सारणी की प्रत्येक पंक्ति को एक शीर्षक दिया जाता है। पंक्तियों के नाम को अवशीर्ष भी कहते हैं। ये सारणी के बायीं ओर स्तम्भ में दिये होते हैं। सारणी के प्रत्येक स्तम्भ के ऊपर की ओर एक स्तम्भ होता है, जिसे उपशीर्षकास्तम्भ शीर्षक कहते हैं।
  • सारणी का मुख्य भाग :
    सारणी के मुख्य भाग में तथ्यों/समंकों को प्रस्तुत किया जाता है। यह सारणी का हृदय होता। है। इसका आकार समंकों की उपलब्धता एवं प्रकृति पर निर्भर करता है। इसके आकार व स्वरूप की योजना पहले से ही बना ली जाती है।
  • रेखाएँ खींचना व रिक्त स्थान छोड़ना :
    सारणी की सुन्दरता रेखाएँ खीचने व रिक्त स्थान छोड़ने पर ही निर्भर करती है। कौन-सी रेखा छोटी हो या मोटी हो या किस रंग से खींची जाए, ये सभी बातें उपलब्ध विषय पर निर्भर करती हैं।
  • पदों की व्यवस्था :
    सुव्यवस्थित एवं क्रमबद्ध पदों की व्यवस्था सारणी को अधिक आकर्षक एवं उपयोगी बना देती है। जिन खानों की तुलना करनी हो, वे यथासंभव पास-पास रखे जाएं।
  • माप की इकाई :
    यदि सम्पूर्ण सारणी में माप की इकाई समान है तो माप की इकाई को सारणी के शीर्षक के साथ लिखा जाना चाहिए।
  • टिप्पणियाँ :
    यदि समंकों से सम्बन्धित कोई आवश्यक सूचना सारणी में देने से रह गई है अथवा किसी तथ्य से संबधित विशेष स्पष्टीकरण की आवश्यकता है तो इसके लिए सारणी के अन्त में नीचे व्याख्यात्मक टिप्पणी दी जा सकती है।
  • उदगम/स्रोत :
    सारणी के अन्त में समंकों को संदेहरहित बनाने एवं अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए समंकों के संदर्भ व उद्गम स्थान अवश्य स्पष्ट कर देना चाहिए।

सारणी का निर्माण करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए :

  • शीर्षक :
    प्रत्येक सारणी का एक स्पष्ट, पूर्ण एवं संक्षिप्त शीर्षक होना चाहिए। इससे समंकों से सम्बन्धित विषय, समय, वर्गीकरण का आधार आदि का पता चल जाता है।
  • खाने व पंक्तियाँ :
    सारणीयन के उद्देश्य तथा प्रस्तुत सारणी को ध्यान में रखते हुए खानों व पंक्तियों की संख्या पूर्व में ही निर्धारित कर लेनी चाहिए। खानों पर क्रम संख्या अंकित कर देनी चाहिए।
  • तुलना :
    तुलना योग्य समंकों को सारणी में यथासमय पास-पास रखना चाहिए। प्रतिशत, अनुपात, गुणांक आदि व्युत्पन्न समंकों को भी तुलना की दृष्टि से मूल समंकों के पास वाले खाने में ही रखना चाहिए।
  • रेखाएँ :
    महत्त्वपूर्ण सूचनाओं को मोटी या गहरी रेखाओं वाले खानों में रखनी चाहिए। जिससे ये पाठक का ध्यान तुरन्त आकर्षित कर सके।
  • पदों की व्यवस्था :
    सारणीयों के महत्त्व, आकार, स्थान, समय, वर्णमाला के अनुसार विभिन्न पदों की व्यवस्था करनी चाहिए। अधिक महत्त्व वाले सर्मकों को पहले वाले तथा कम महत्त्व के समंकों को बाद वाले खाने में व्यवस्थित करना चाहिए।
  • विशेष महत्त्व :
    विशेष महत्त्व की सूचनाओं की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए उन्हें मोटे अंकों में लिखना चाहिए।
  • टिप्पणियाँ :
    कोई आवश्यक सूचना जो सारणी में प्रस्तुत न की गई हो या किसी समंक विशेष के बारे में विशेष स्पष्टीकरण देना हो तो उसके लिए सारणी के नीचे टिप्पणी दे देनी चाहिए।
  • उद्गम :
    सारणी में प्रस्तुत समंक कहाँ से उद्धृत किये गए हैं उनको उल्लेख सारणी में नीचे की ओर आवश्यक रूप से होना चाहिए।

प्रश्न 2.
एक नगर में शिक्षा, रोजगार तथा लिंग के आधार पर जनसंख्या वितरण के लिए रिक्त सारणी की रचना : कीजिए।
उत्तर :
जनशक्ति का शिक्षा, रोजगार तथा लिंग के आधार पर वितरण :
RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 7 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण 2

प्रश्न 3.
सांख्यिकीय तथ्यों का प्रदर्शन करने के लिए सामान्यतः जिन विभिन्न प्रकार के चित्रों का प्रयोग किया जाता है, उनका संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सांख्यिकी तथ्यों के प्रदर्शन के लिए निम्नलिखित प्रकार के चित्रों का उपयोग किया जाता है :

  • रेखा-चित्र (Line Diagram) :
    ये एकविमीय चित्र है। जब तथ्य से सम्बन्धित पद-मूल्यों की संख्या अधिक हो तथा श्रेणी के सबसे छोटे तथा सबसे बड़े मूल्य के बीच अंतर कम हो, तो ऐसी स्थिति में रेखाचित्रों का प्रयोग किया जाता हैं। इसमें सभी रेखाओं के बीच अन्तर समान रखा जाता हैं तथा प्रत्येक पद मूल्य के बराबर लम्बाई खड़ी रेखा खींची जाती है। इन रेखाओं में मोटाई नहीं होती; अत: ये कम आकर्षक होते हैं। इसमें दिये गए मूल्य का तुलनात्मक अध्ययन हो जाता है।
  • सरलदण्ड चित्र (Simple Bar diagram) :
    यह भी एकविमीय चित्र हैं, किसी तथ्य से सम्बन्धित पद मूल्यों की संख्या कम होने की दशा में सरल दण्ड चित्र बनाये जाते हैं। रेखाचित्र तथा दण्ड-चित्र में अन्तर यह है कि रेखा-चित्र में चौड़ाई नहीं बनाते जबकि दण्ड-चित्र में रेखाओं की चौड़ाई बना दी जाती है जिससे चित्र आकर्षक बनाया जा सकता है। पद-मूल्यों के अनुपात में ऊँचाई तथा समान चौड़ाई वाले चित्र सरल दण्ड चित्र कहलाते हैं। इन चित्रों में समान अन्तर रखा जाता है। दण्ड चित्र उदग्र (खड़े) तथा क्षैतिज (लेटे हुए) दोनों प्रकार के हो सकते हैं। ये चित्र व्यक्तिगत समंकों, काल श्रेणी तथा स्थानानुसार समंक श्रेणियों के लिए अधिक उपयुक्त होते हैं।
  • आयत चित्र (Rectangular diagrams) :
    ये द्विविमा चित्र कहलाते हैं। एकविमा चित्रों में केवल एक ही विस्तार (ऊँचाई/लम्बाई) का ध्यान रखा जाता है, जबकि द्वि-विमा-चित्रों में दो विस्तारों-ऊँचाई तथा चौड़ाई के आधार पर चित्र निर्मित किये जाते हैं। द्विविमा चित्रों के क्षेत्रफल पद-मूल्यों के अनुपात में होते हैं, इसलिए इन्हें धरातल चित्र या क्षेत्रफल चित्र भी कहते हैं।दो या दो से अधिक राशियों की पारस्परिक तुलना करने के लिए आयत चित्रों का प्रयोग किया जाता है। आयत चित्र दो प्रकार के होते हैं :
    1. प्रतिशत अन्तर्विभक्त चित्र
    2. विभाजित आयत चित्र
  • वृत्त चित्र :
    वृत्त चित्रों की रचना वर्ग-चित्र की भाँति ही की जाती है। ये भी द्वि-विमा वाले चित्र कहलाते हैं। वृत्त चित्र बनाने के लिए सर्वप्रथम दिये गए मूल्यों के वर्गमूल निकाले जाते हैं। फिर वर्गमूलों के अनुपात में वृत्तों की त्रिज्याएँ निकाली जाती हैं। इन त्रिज्याओं को आधार मानकर वृत्त बनाये जाते हैं। वृत्तों को हमेशा एक ही धरातल पर बनाना चाहिए। वृत्त चित्रों को भी उनके विभिन्न उप-भागों में अन्तर्विभक्त किया जा सकता है, उससे हम तुलना कर सकते हैं। इन चित्रों के निर्माण के लिए पदों के कुल योग के लिए 360° मानकर विभिन्न मदों के लिए कोणों का माप निकाल सकते हैं। चूँकि वृत्त के केन्द्र में 360° का कोण होता है इसलिए इन्हें वृत्त खण्ड चित्र भी कहते हैं।

RBSE Class 11 Economics Chapter 7 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 Economics Chapter 7 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
दण्ड-आरेख
(अ) एक विमी आरेख है
(ब) द्वि-विम आरेख है
(स) विम रहित आरेख है
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) एक विमी आरेख है

प्रश्न 2.
आयत चित्र के माध्यम से प्रस्तुत किये गए आँकड़ों से आलेखी रूप से निम्नलिखित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं
(अ) माध्य
(ब) बहुलक
(स) माध्यिका
(द) ये सभी
उत्तर:
(ब) बहुलक

प्रश्न 3.
तोरणों के द्वारा आलेखी रूप में निम्नलिखित की स्थिति जानी जा सकती है
(अ) बहुलक
(ब) माध्य।
(स) माध्यिका
(द) इनमें से कोई भी नहीं
उत्तर:
(स) माध्यिका

प्रश्न 4.
अंकगणितीय रेखाचित्र के द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों से निम्नलिखित को समझाने में मदद मिलती है
(अ) दीर्घकालिक प्रवृत्ति
(ब) आँकड़ों में चक्रीयता
(स) ऑकड़ों में कायिकता
(द) ये सभी
उत्तर:
(अ) दीर्घकालिक प्रवृत्ति

प्रश्न 5.
चित्रमय प्रदर्शन का सबसे सरल रूप है
(अ) सरल दण्ड चित्र
(ब) आयत चित्र
(स) वृत्तीय चित्र
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) सरल दण्ड चित्र

प्रश्न 6.
आँकड़ों का चित्रमय प्रदर्शन उपयोगी होता है, क्योंकि
(अ) यह आकर्षक व प्रभावी होता है।
(ब) यह तुलनात्मक अध्ययन में सहायक होता है।
(स) यह तथ्यों को सरल तथा बुद्धिगम्य बनाता है।
(द) ये सभी
उत्तर:
(द) ये सभी

प्रश्न 7.
बहुलक की गणना की जाती है
(अ) दण्ड चित्र द्वारा
(ब) आयत चित्र द्वारा।
(स) संचयी आवृत्ति वक्र या ओजाइव वक्र द्वारा
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ब) आयत चित्र द्वारा।

प्रश्न 8.
जब किसी सारणी द्वारा दो प्रकार की सूचना प्राप्त होती है, तो उसे कहते हैं
(अ) सरल सारणी
(ब) द्वि-गुणी सारणी
(स) त्रि-गुणी सारणी
(द) बहु-गुणी सारणी
उत्तर:
(ब) द्वि-गुणी सारणी

प्रश्न 9.
छः विभिन्न प्रदेश में पंजीकृत एलोपैथिक तथा होम्योपैथिक चिकित्सकों की संख्या से सम्बन्धित आँकड़ों को प्रदर्शित करने का उपयुक्त चित्र हैं
(अ) रेखाग्राफ
(ब) वर्ग-चित्र
(स) पाई-चित्र
(द) दि-दण्ड चित्र
उत्तर:
(द) दि-दण्ड चित्र

प्रश्न 10.
क्या आयत चित्र एवं स्तम्भ आरेख आँकड़ों को प्रस्तुत करने के लिए एक जैसी विधियाँ हैं?
(अ) हाँ
(ब) नहीं
(स) कहा नहीं जा सकता
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) हाँ

RBSE Class 11 Economics Chapter 7 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सारणीयन किसे कहते हैं?
उत्तर:
समंकों को खानों तथा पंक्तियों में क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करने को सारणीयन कहा जाता है।

प्रश्न 2.
जटिल सारणी किसे कहते हैं?
उत्तर:
जटिल सारणी से आशय ऐसी सारणी से है जो आँकड़ों के एक से अधिक गुणों को प्रकट करती है।

प्रश्न 3.
एक सारणी के मुख्य भाग कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. शीर्षक,
  2. कलेवर या क्षेत्र।

प्रश्न 4.
दण्ड आरेख क्या है?
उत्तर:
दण्ड आरेख वह चित्र है जिसमें आँकड़ों को दण्डों या आयतों के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न 5.
बहुदण्ड आरेख किसे कहते हैं?
उत्तर:
बहुदण्ड आरेख से आशय ऐसे आरेख से है जिसमें दण्डों द्वारा दो या दो से अधिक तथ्यों के आँकड़ों को प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न 6.
वृत्तीय आरेख क्या होता है?
उत्तर:
वृत्तीय आरेख वह चित्र है जिसमें एक वृत्त को कई भागों में बाँटकर सापेक्ष मूल्यों को प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न 7.
दण्ड आरेख की दो विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:

  1. दण्डों की लम्बाई में मूल्यानुसार परिवर्तन होता है।
  2. ये दण्ड समान दूरी पर बनाये जाते हैं।

प्रश्न 8.
सारणीयन का कोई एक गुण बताइये।
उत्तर:
सरल एवं संक्षिप्त प्रस्तुति

प्रश्न 9.
सामान्यत: आँकडे कितने प्रकार से प्रस्तुत किये जाते है?
उत्तर:
तीन

प्रश्न 10.
सारणीयन तथा वर्गीकरण में एक अन्तर लिखिए।
उत्तर:
वर्गीकरण में समंकों को वर्गों व उपवर्गों में बाँटा जाता है, जबकि सारणीयन में उन्हें शीर्षकों व उपशीर्षकों में रखा जाता है।

प्रश्न 11.
सारणी को कितने प्रकार से बाँटा गया है?
उत्तर:
तीन प्रकार से।

प्रश्न 12.
उद्देश्य के अनुसार सारणी को कितने भागों में बाँटा गया है?
उत्तर:
दो भागों में।

प्रश्न 13.
मौलिकता के अनुसार सारणी को कितने भागों में बाँटा गया है?
उत्तर:
दो भागों में।

प्रश्न 14.
सारणियों का निर्माण करते समय ध्यान रखने वाली दो सावधानियाँ बताइये।
उत्तर:

  1. शीर्षक स्पष्ट, पूर्ण एवं संक्षिप्त होना चाहिए।
  2. खाने व पंक्तियों की रचना पूर्व निर्धारित कर लेनी चाहिए।

प्रश्न 15.
चित्रमय प्रदर्शन का कोई एक लाभ लिखिए।
उत्तर:
सरल एवं बोधगम्य प्रस्तुतीकरण।

प्रश्न 16.
सांख्यिकीय चित्र कितने प्रकार के होते?
उत्तर:
पाँच

प्रश्न 17.
वृत्त चित्र बनाने के लिए सर्वप्रथम दिये गए मूल्यों का क्या निकाले जाते हैं?
उत्तर:
वर्गमूल निकाले जाते हैं।

प्रश्न 18.
समंकों के प्रदर्शन की दो विधियाँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर:

  1. चित्रमय प्रदर्शन,
  2. बिन्दुरेखीय प्रदर्शन।

प्रश्न 19.
चित्रमय प्रदर्शन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
चित्रमय प्रदर्शन से अभिप्राय समंकों को दण्ड चित्र, आयत चित्र, वृत्त चित्र आदि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

प्रश्न 20.
संचयी आवृत्ति वक्रों की सहायता से किसका निर्धारण किया जा सकता है?
उत्तर:
मध्यका का।

प्रश्न 21.
से कम वाला वक्र किस तरफ गिरता है?
उत्तर:
नीचे की ओर गिरता है।

प्रश्न 22.
‘से अधिक’ वाला वक्र किस तरफ गिरता
उत्तर:
ऊपर की ओर, उठा हुआ है।

प्रश्न 23.
जिस बिन्दु पर से कम तथा से अधिक वाले वक्र परस्पर काटते हैं वह बिन्दु होता है। .
उत्तर:
मध्यका बिन्दु।

प्रश्न 24.
सामान्यतः आँकड़े कितने प्रकार से प्रस्तुत किये जाते हैं ? नाम बताइये।
उत्तर:
तीन प्रकार से :

  1. पाठविषयक या वर्णनात्मक प्रस्तुतीकरण
  2. सारणीबद्ध प्रस्तुतीकरण,
  3. आरेखीय या चित्रमय एवं बिन्दुरेखीय प्रस्तुतीकरण

प्रश्न 25.
पाठ विषयक प्रस्तुतीकरण किसके लिए उपयोगी है?
उत्तर:
यह क्रम परिणाम वाले आंकड़ों के लिए प्रस्तुतीकरण हेतु यह उपयोगी है।

प्रश्न 26.
सारणीयन के तीन उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:

  1. समंकों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करना
  2. समंकों को संक्षिप्त व स्थायी रूप से प्रकट करना
  3. समस्या को अधिक सरल व स्पष्ट बनाना।

प्रश्न 27.
सारणीयन के कोई दो महत्त्वों को समझाइये।
उत्तर:

  • सरलता :
    सारणीयन से आवश्यक सूचनाएँ बहुत जल्दी एवं सरलता से समझी जा सकती हैं तथा समंकों की जटिलता समाप्त हो जाती है।
  • तुलनात्मक अध्ययन :
    सारणियों में समान एवं तुलना योग्य आँकड़ों को परस्पर निकटवर्ती खानों में रखा जाता है, जिससे उनका आसानी से तुलनात्मक अध्ययन किया जा सके।

प्रश्न 28.
सारणी संख्या क्या है?
उत्तर:
किसी सारणी की संख्या उसकी पहचान के लिए की जाती है। इसे सारणी के सबसे ऊपर अंकित करना चाहिए।

प्रश्न 29.
शीर्षक से क्या आशय है?
उत्तर:
सारणी का शीर्षक सारणी की विषय वस्तु को बताता है। यह शीर्षक स्पष्ट, संक्षिप्त एवं सही भाषा में हो।

प्रश्न 30.
सरल सारणी किसे कहते है?
उत्तर:
जब समंकों को केवल एक गुण के आधार पर प्रस्तुत किया जाता है तो वह सरल गुण सारणी कहलाती है।

प्रश्न 31.
चित्रों को आकर्षक एवं प्रभावशाली बनाने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:

  1. आकर्षक एवं स्वच्छता
  2. शुद्धता
  3. उपयुक्त आकार
  4. शीर्षक एवं फुटनोट
  5. मापदण्ड का चयन।

प्रश्न 32.
रेखाचित्रों का प्रयोग कब किया जाता है?
उत्तर:
जब तथ्य से सम्बन्धित पद-मूल्यों की संख्या अधिक हो तथा श्रेणी के सबसे छोटे तथा सबसे बड़े मूल्य के बीच अन्तर कम हो, तो ऐसी स्थिति में रेखाचित्रों का प्रयोग किया जाता है। ये विमीय चित्र है।

प्रश्न 33.
सरत दण्ड-चित्र कब बनाये जाते है?
उत्तर:
किसी तथ्य से सम्बन्धित पद मूल्यों की संख्या कम होने की दशा में सरल दण्ड चित्र बनाये जाते हैं।

प्रश्न 34.
विभाजित आयत चित्रों का प्रयोग कब किया जाता है?
उत्तर:
इन चित्रों का उपयोग विभिन्न किन्तु परस्पर सम्बन्धित तथ्यों का चित्रों द्वारा प्रदर्शन करने में किया जाता हैं।

प्रश्न 35.
द्विगुण सारणी का निर्माण कब करते हैं?
उत्तर:
जब समंकों की केवल दो विशेषताओं का समावेश किया जाता है तो हम द्विगुण सारणी की रचना करते हैं।

प्रश्न 36.
आवृत्ति आयत चित्र का प्रयोग कब किया जाता है?
उत्तर:
इस रेखा चित्र का प्रयोग सतत श्रेणी के आँकड़ों के प्रदर्शन हेतु किया जाता है।

प्रश्न 37.
आवृत्ति बहुभुज किसे कहते हैं?
उत्तर:
मूल्यों या मध्य बिन्दुओं और मध्य बिन्दुओं और उनकी आवृत्ति पर बनाया गया अनेक भुजा वाला चित्र आवृत्ति बहुभुज कहलाता है।

प्रश्न 38.
आवृत्ति वक्र को कैसे प्रस्तुत किया जा सकता है?
उत्तर:
आवृत्ति वक्र को आवृत्ति बहुभुज के बिन्दुओं से निकटतम गुजरते हुए मुक्तहस्त से वक्र बनाकर बहुत सरलता से प्रदर्शित किया जा सकता है।

प्रश्न 39.
समूहीकृत आवृत्ति बंटन किसके रूप में प्रस्तुत किया जाता है?
उत्तर:
समूहीकृत आवृत्ति बंटनों में आँकड़ों को आवृत्ति आयत चित्र, आवृत्ति बहुभुज, आवृत्ति वक्र, संचयी आवृत्ति वक्र के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

प्रश्न 40.
प्रतिशत दण्ड आरेख क्या होते हैं?
उत्तर:
प्रतिशत दण्ड आरेख वह विधि है जिसमें तथ्य के विभिन्न भागों के मूल्यों को प्रतिशत के रूप में दिखाया जाता है। कुछ मूल्य को 100 मानकर सभी मदों के मूल्य का प्रतिशत निकाल लेते हैं।

RBSE Class 11 Economics Chapter 7 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सारणीयन के मुख्य उद्देश्य बताइये।
उत्तर:
सारणीयन के उद्देश्य :

  1. सारणीयन का उद्देश्य वर्गीकृत समंकों को सुव्यवस्थित एवं क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करना है।
  2. सारणीयन का एक उद्देश्य सांख्यिकीय को थोड़े स्थान में संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करना हो।
  3. इसका उद्देश्य तथ्यों को तुलनात्मक रूप प्रदान करना है।
  4. समस्या को सरल व स्पष्ट करना भी सारणीयन का उद्देश्य होता है।
  5. यह आँकड़ों को बोधगम्य बनाती है।

प्रश्न 2.
सारणी के मुख्य रूप कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
सारणी के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं :

  1. उद्देश्यानुसार सारणी-(अ) सामान्य उद्देश्य वाली, (ब) विशेष उद्देश्य वाली सारणी।
  2. मौलिकता के अनुसार सारणी-(अ) मौलिक सारणी (ब) व्युत्पन्न सारणी।
  3. बनावट के अनुसार सारणी-(अ) सरल एवं एक गुण वाली सारणी (ब) जटिल सारणी-(i) एकगुणी (ii) द्विगुणी (iii) बहुगुणी सारणी।

प्रश्न 3.
द्वि-गुणी सारणी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
द्वि-गुणी सारणी-द्वि-गुणी सारणी समंकों के दो गुणों को प्रदर्शित करती हैं। जैसे-आयात-निर्यात प्रदर्शित करना, विद्यालय के छात्र-छात्राओं की संख्या दर्शाना आदि। इसका एक उदाहरण नीचे दिया गया है।
द्वि-गुणी सारणी
विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या (कक्षा तथा लिंग के अनुसार)

RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 7 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण 3

प्रश्न 4.
सारणी रचना के कोई चार सामान्य नियम बताइये।
उत्तर:
सारणी रचना के चार सामान्य नियम

  1. सारणी का शीर्षक जाँच के उद्देश्य के अनुकूल होना चाहिए।
  2. सारणी का आकार आदर्श होना चाहिए।
  3. सारणी सरल एवं आदर्श होनी चाहिए।
  4. सारणी के नीचे सारेणी का स्रोत देना चाहिए।

प्रश्न 5.
बिन्दुरेखीय प्रदर्शन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
बिन्दुरेखीय प्रदर्शन से आशय :
सांख्यिकीय आँकड़ों को ग्राफ पेपर पर प्रदर्शन बिन्दुरेखीय प्रदर्शन कहलाता है। बिन्दुरेखीय प्रदर्शन चित्रमय प्रदर्शन का ही एक रूप है। बिन्दुरेखीय प्रदर्शन में सतत वक्रों का निर्माण किया जाता है। बिन्दुरेखीय प्रयोग काल श्रेणी तथा आवृत्ति वितरण के प्रदर्शन के लिए किया जाता है। गणित की दृष्टि से बिन्दु रेख को बीजगणित-ज्यामिति की वर्णमाला कहा जाता है।

प्रश्न 6.
कृत्रिम आधार रेखा से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
कृत्रिम आधार रेखा से आशय :
बिन्दुरेखीय रचना में एक महत्त्वपूर्ण नियम है कि उदग्र पैमाने की शून्य अर्थात् मूल बिन्दु से प्रारम्भ करना चाहिए, लेकिन जब चलों के मान जिन्हें उदग्र पैमाने पर दर्शाना होता है, यदि ये बहुत विशाल होते हैं, तो इस नियम का पालन करना सम्भव नहीं होता है, क्योंकि ऐसी स्थिति में मान बिन्दुओं को आधार रेखा से बहुत ऊपर प्रांकित करना होगा। इससे ग्राफ पेपर का बीच का बहुत बड़ा हिस्सा छूट जाएगा। ऐसा प्रांकन अच्छा भी नहीं लगेगा। यह भी सम्भव है कि बिन्दु रेख की सीमित ऊँचाई तक बिन्दुओं को प्रांकित करना सम्भव ही न हो। अतः ऐसी स्थिति में कृत्रिम आधार रेखा का सहारा लिया जाता है। इसके लिए शून्य आधार रेख़ा और न्यूनतम मान बिन्दु के बीच शून्य रेखा के पास ही एक-दूसरे के निकट लहरदार रेखाएँ खींचकर उदग्र पैमाने को तोड़ देते हैं।

प्रश्न 7.
बिन्दुरेखीय प्रदर्शन के लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बिन्दुरेखीय प्रदर्शन के लाभ

  1. बिन्दुरेखीय प्रदर्शन द्वारा जटिल आँकड़ों को सरल एवं समझने योग्य बनाया जाता है।
  2. बिन्दुरेखीय प्रदर्शन द्वारा दर्शाये गए आँकड़े लम्बे समय तक मस्तिष्क पर अंकित रहते हैं।
  3. यह एक अत्यन्त आकर्षक एवं प्रभावशाली साधन है।
  4. इनसे एक ही दृष्टि में विभिन्न तथ्यों की तुलना हो जाती है।
  5. ये सूचना के साथ-साथ दर्शकों का मनोरंजन भी करते हैं।
  6. इनसे बहुलक एवं माध्यिका जैसे औसतों की गणना की जा सकती है।
  7. इनके माध्यम से दो चरों के मध्य सह-सम्बन्ध का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
  8. समझने के लिए विशेष ज्ञान व प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है।

प्रश्न 8.
आयत चित्र से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आयत चित्र का आशय :
आयत चित्रे से आशय ऐसे रेखाचित्र में से जिसमें सतत श्रृंखला से सम्बन्धित मदों तथा उनकी आवृत्तियों को आयतों के रूप में ग्राफ पेपर पर प्रदर्शित किया जाता है। x अक्ष पर वर्ग अन्तर को दिखाते हैं तथा y अक्ष पर आवृत्तियों को प्रदर्शित करते हैं। प्रत्येक वर्गान्तर की सीमाओं के माप-बिन्दुओं पर आवृत्ति के आधार पर चाई रखते। हुए आयत बना लिए जाते हैं। सभी वर्गान्तरों के आयत एक-दूसरे से मिले हुए होते हैं। इस चित्र की रचना करने के लिए समावेशी वर्गान्तर को अपवर्गी में बदल लिया जाता है।

प्रश्न 9.
सरल दण्ड चित्र निर्माण की प्रक्रिया को उदाहरण द्वारा समझाइए। :
उत्तर:
सरल दण्ड चित्र-सरल दण्ड चित्रों से आशय ऐसे चित्रों से है जिसमें दण्डों की मोटाई समान होती है तथा लम्बाई मूल्यों के अनुसार होती है। अत: दण्डों की लम्बाई मूल्यों के अनुसार कम या ज्यादा होती है। व्यक्तिगत मूल्यों, व्यय श्रेणी तथा स्थानानुसार समंक श्रेणी के प्रदर्शन के लिए दण्ड चित्र विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। सरल दण्ड चित्रों का प्रयोग एक ही प्रकार के संख्यात्मक तथ्यों के विभिन्न मूल्यों को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है।

उदाहरण :
RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 7 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण 4
RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 7 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण 5
प्रश्न 10.
बहुगुणी दण्ड आरेख से क्या आशय है?
उत्तर:
बहुगुणी दण्ड आरेख को आशय बहुगुणी दण्ड आरेख ऐसे दण्ड आरेखों को कहते हैं जो दो या दो से अधिक तथ्यों से सम्बन्धित आँकड़ों को प्रदर्शित करते हैं, जैसे-जन्म-दर व मृत्यु-दर की तुलना से सम्बन्धित दण्ड चित्र या आयात-निर्यात की तुलना से सम्बन्धित दण्ड चित्र आदि। इस प्रकार के दण्ड चित्र में प्रत्येक तथ्य के अलग-अलग दण्ड बनाये जाते हैं तथा एक स्थान या समय से सम्बन्धित विभिन्न दण्डों को एक-दूसरे से मिलाकर बनाया जाता है। दूसरे स्थान या समय से सम्बन्धित दण्ड चित्रों को थोड़ा स्थान छोड़कर बनाया जाता है। इन दण्डों में अन्तर स्पष्ट करने के लिए इन दण्डों को अलग-अलग रंगों से या चिह्नों से भरा जाता है। इन रंगों या चिह्नों को स्पष्ट करने के लिए चित्र के ऊपर दाहिनी ओर संकेतक दिये जाते हैं।

प्रश्न 11.
उद्देश्य के अनुसार सारणी को समझाइये।
उत्तर:
सामान्य उद्देश्यीय सारणी का कोई विशिष्ट उद्देश्य नहीं होता। इसे सन्दर्भ सारणी भी कहते हैं। विशेष उद्देशीय सारणी किसी उद्देश्य विशेष की पूर्ति के लिए तैयार की जाती है। इसका आकार सामान्य सारणी से अपेक्षाकृत छोटा होता है। इसे संक्षिप्त या विश्लेषण सारणी भी कहते हैं। इसमें माध्य, प्रतिशत, अनुपात आदि का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 12.
सारणी की रचना के कोई चार नियमों की व्याख्या कीजिये। अथवा सारणी का निर्माण करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
उत्तर:
सारणी का निर्माण करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान चाहिए :

  • शीर्षक :
    प्रत्येक सारणी का एक स्पष्ट, पूर्ण एवं संक्षिप्त शीर्षक होना चाहिए। इससे समंकों से सम्बन्धित विषय, समय, वर्गीकरण का आधार आदि का पता चल जाता है।
  • खाने व पंक्तियाँ :
    सारणीयन के उद्देश्य तथा प्रस्तुत सामग्री को ध्यान में रखते हुए खानों व पंक्तियों की संख्या पूर्व में ही निर्धारित कर लेनी चाहिए। खानों पर क्रम संख्या अंकित कर देनी चाहिए। उनके शीर्षक स्पष्ट एवं संक्षिप्त हो तथा माप की इकाई का भी उल्लेख करना चाहिए।
  • तुलना :
    तुलना योग्य समंकों को सारणी में यथासमय पास-पास रखना चाहिए। प्रतिशत, अनुपात, गुणांक आदि व्युत्पन्न समंकों की भी तुलना की दृष्टि से मूल समंकों के पास वाले स्थान में रखना चाहिए।
  • विशेष महत्त्व :
    विशेष महत्त्व की सूचनाओं की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए उन्हें मोटे अंकों में लिखना चाहिए।

प्रश्न 13.
समंकों के चित्रमय प्रदर्शन के चार लाभों/उपयोगिता की व्याख्या करो।
उत्तर:
समंकों के चित्रमय प्रदर्शन के लाभ :

  • आकर्षक और प्रभावी :
    चित्र मानस पटल पर स्थायी छाप छोड़ते हैं। चित्र आकर्षक तथा प्रभावी होने के कारण लोगों का ध्यान तुरन्त अपनी ओर खींच लेते हैं। जो विषय हमें अंकों से समझ नहीं आता, वह तुरन्त चित्रों की सहायता से आसानी से समझा जा सकता।
  • सरल एवं बोधगम्य प्रस्तुतीकरण :
    जटिल, अव्यवस्थित, नीरस समंकों को चित्रों की सहायता से सरल तथा आसानी से समझने योग्य बनाया जा सकता है। इसके लिए दिमाग पर अधिक जोर डालने की आवश्यकता नहीं होती है।
  • श्रम एवं समय की बचत :
    प्रायः समंकों को समझने एवं उनसे निष्कर्ष निकालने के लिए अधिक समय व परिश्रम लगाना पड़ता है। वही चित्रों की सहायता से तथ्यों की सारी विशेषताओं को कम समय एवं बिना तकनीकी ज्ञान के आसानी से समझा जा सकता है।
  • व्यापक उपयोग :
    सांख्यिकीय चित्रों का जीवन के सभी क्षेत्रों में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है। व्यापार, वाणिज्य, विज्ञापन, पर्यटन, शिक्षा आदि क्षेत्रों में तो चित्रों को बहुत अधिक महत्त्व है।

प्रश्न 14.
चित्रों को आकर्षक एवं प्रभावशाली बनाने के किन्हीं चार नियमों की व्याख्या करो।
उत्तर:

  • आकर्षक एवं स्वच्छता :
    चित्र सांख्यिकीय समंकों के प्रस्तुतीकरण के चक्षुप उपकरण हैं। ये आँखों को लुभाने के साथ-साथ दिमाग पर स्थायी छाप छोड़ते हैं। अतः चित्र स्वच्छ, रोचक एवं आकर्षक हैं।
  • शुद्धता :
    चित्रों को आकर्षक रूप देते समय शुद्ध का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि अशुद्ध एवं गलत चित्रों में भ्रमात्मक परिणाम निकलते हैं।
  • संकेत :
    चित्रों की रचना करते समय उपयोग के लिए विभिन्न प्रकार के चिह्नों (बिन्दुओं, रेखाओं आदि) को स्पष्ट करने के लिए ऊपर शीर्ष कोने पर संकेत दे देना चाहिए।
  • सरलता :
    आसानी से समझने हेतु चित्र सामान्यत: सरल होने चाहिए। इससे पाठक भ्रम की स्थिति से बच सकता है।

प्रश्न 15.
रेखाचित्र को समझाइये।
उत्तर :
रेखाचित्र :
ये एकविमीय चित्र है। जब तथ्य से सम्बन्धित पद-मूल्यों की संख्या अधिक हो तथा श्रेणी के सबसे छोटे तथा सबसे बड़े मूल्य के बीच अन्तर कम हो, तो ऐसी स्थिति में रेखा-चित्रों का प्रयोग किया जाता है। इससे सभी रेखाओं के बीच अन्तर समान रखा जाता है तथा प्रत्येक पद मूल्य के बराबर लम्बाई की खड़ी रेखा खींची जाती है। इन रेखाओं में मोटाई नहीं होती, अतः ये कम आकर्षक होते हैं। इसमें दिये गए मूल्यों का तुलनात्मक अध्ययन हो जाता है।

प्रश्न 16.
प्रतिशत अन्तर्विभक्त आयात-चित्र की समझाइये।
उत्तर:
प्रतिशत अन्तर्विभक्त आयत चित्र :
इसमें विभिन्न परिवारों के पारिवारिक बजट की परस्पर तुलना की जा सकती है। ऐसे चित्रों में कुल आय को 100 मानकर विभिन्न मदों में होने वाले व्यय को प्रतिशत में बदल लिया जाता है। प्रत्येक परिवार के लिए 100 के बराबर एकसमान ऊँचाई वाले आयत बना लिए जाते हैं। इन आयतों को चौड़ाई कुल-व्यय के अनुपात में रखते हैं। फिर विभिन्न पद पर किये जाने वाले व्यय को प्रतिशत राशियों के आधार पर विभिन्न खण्डों में आयत को बाँट दिया जाता है।

प्रश्न 17.
आवृत्ति आयत चित्र समझाइये।
उत्तर:
इस रेखाचित्र का प्रयोग सतत श्रेणी के आँकड़ों में प्रदर्शन हेतु किया जाता है। इसमें वर्गान्तर की आवृत्ति की. ऊँचाई के माप के बराबर आयत बना लेते हैं। यदि वर्गान्तर समावेशी है तो पहले हमें उन्हें अपवर्जी श्रेणी में बदल लेना चाहिए। सभी आयत एक-दूसरे से मिले एवं सटे हुए बनाये जाते हैं। आयत चित्रों की सहायता से बहुलक का निर्धारण किया जा सकता है।

प्रश्न 18.
आवृत्ति बहुभुज समझाइये।
उत्तर:
मूल्यों या मध्य बिन्दुओं और उनकी आवृत्तियों के आधार पर बनाया गया अनेक भुजा वाला चित्र आवृत्ति-बहुभुज कहलाता है। X-अक्ष पर सतत/खंडित श्रेणी के मूल्य तथा Y-अक्ष पर आवृत्तियों का मानकर रेखाचित्र तैयार करते हैं। फिर उन ऊपरी बिन्दुओं को आपस में मिलाकर तथा पहले वे अन्तिम बिन्दुओं को आधार रेखा से मिलाकर आवृत्ति बहुभुज का निर्माण कर लिया जाता है।

RBSE Class 11 Economics Chapter 7 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सारणीयन का आशय स्पष्ट कीजिए। इसके उद्देश्य एवं सीमाओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सारणीयन का आशय :
सारणीयन, आँकडों को सारणी के रूप में प्रस्तुत करने की विधि है। इसके अन्तर्गत आँकड़ों को कॉलमों एवं पंक्तियों में दिखाया जाता है। नीसवेंजर के अनुसार, “एक सांख्यिकीय सारणी आँकड़ों का स्तम्भों (कॉलम) तथा पंक्तियों के रूप में व्यवस्थित संगठन है।”

प्रो, ब्लेयर के अनुसार, “सारणीयन विस्तृत अर्थों में कॉलमों तथा पंक्तियों के रूप में आँकड़ों की क्रमबद्ध विशेषता है।” सारणी के ऊपर से नीचे की ओर बने खानों को कॉलम तथा बायीं से दायीं ओर जाने वाली रेखाओं को पंक्तियाँ कहते हैं।

सारणीयन के उद्देश्य :
सारणीयन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं :

  • सुव्यवस्थित प्रस्तुतीकरण :
    सारणीयन का प्रमुख उद्देश्य वर्गीकृत समंकों को सुव्यवस्थित एवं क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करना है।
  • संक्षिप्त एवं स्थायी रूप प्रदान करना :
    सारणीयन का उद्देश्य अव्यवस्थित सांख्यिकीय सामग्री को थोड़े से स्थान में संक्षिप्त रूप में इस प्रकार प्रस्तुत करना होता है कि विस्तृत सूचना एक ही निगाह में मिल सके। यह सांख्यिकीय सामग्री को स्थायी रूप भी प्रदान करती है।
  • तथ्यों को तुलनात्मक रूप प्रदान करना :
    सारणीयन की सहायता में समंकों को इस प्रकार खानों तथा पंक्तियों में व्यवस्थित किया जाता है जिससे तथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन सम्भव हो सके।
  • समस्या को स्पष्टीकरण :
    समंकों को सारणीयनों के रूप में प्रस्तुत करने से समस्या सरल व स्पष्ट हो जाती है।
  • आँकड़ों को बोधगम्य बनाना :
    सारणीयन का उद्देश्य आँकड़ों को इस प्रकार तालिकाबद्ध करना होता है कि उन्हें आसानी से समझा जा सके।

सारणीयन की सीमाएँ :
सारणीयन की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं :

  1. सारणीयन के अन्तर्गत केवल समंक होते हैं, उनका विवरण नहीं होता है। इस कारण इन्हें आसानी से समझना सम्भव नहीं होता है।
  2. गुणात्मक तथ्यों को सारणियों में प्रस्तुत किया जाना सम्भव नहीं होता है।
  3. सारणीयन के समय समंकों का उत्पादन भी करना पड़ता है। इससे शुद्धता कम हो जाती है।
  4. सारणीयन में समंकों से सम्बन्धित व्यक्तिगत विशेषताएँ समाप्त हो जाती हैं।
  5. सारणीयन का निर्माण किसी उद्देश्य विशेष के लिए ही किया जाता है। इस कारण दूसरे उद्देश्य के लिए उसका प्रयोग सफलतापूर्वक नहीं हो पाता है।
  6. सारणीयन में सीमित स्थान के कारण प्रदर्शित समंकों का सन्दर्भ आदि बहुधा स्पष्ट नहीं होता है।

प्रश्न 2.
एक आदर्श सांख्यिकीय सारणी के मुख्य लक्षणों की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर:
एक आदर्श अथवा अच्छी सांख्यिकीय सारणी का निर्माण निर्माणकर्ता के बौद्धिक स्तर एवं सारणी के उद्देश्य पर निर्भर करता है। एक आदर्श सांख्यिकीय सारणी में निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए

  • शीर्षक अध्ययन के उद्देश्य के अनकल :
    सारणी का शीर्षक सारणी के ऊपर शीर्ष पर तथा बीच में दिया जाना चाहिए। यह शीर्षक अध्ययन के उद्देश्य के अनुकूल होना चाहिए।
  • तुलना :
    तुलना की सुविधा के लिए सारणी में तुलनात्मक समंकों को निकटवर्ती खानों में रखा जाना चाहिए।
  • पदों की व्यवस्था :
    सुव्यवस्थित एवं क्रमबद्ध पदों की व्यवस्था सारणी को अधिक आकर्षक उपयोगी और समझने में सहज बना देती है। जिन खानों की तुलना करनी हो, वे यथासंभव पास-पास रखा जाए।
  • आदर्श आकार :
    सारणी का आकार उचित एवं सन्तुलित होना चाहिए। ज्यादा बड़ी सारणी आदर्श नहीं मानी जाती है।
  • प्रतिशत तथा अनुपात :
    यदि आवश्यक हो तो सारणी में आँकड़ों के प्रतिशत या अनुपात प्रकट किये जाने चाहिए।
  • सरल एवं सुन्दर :
    सारेणी सरल होनी चाहिए तथा आसानी से समझी जा सके और देखने में सुन्दर भी होनी चाहिए।
  • योग :
    सारणी में प्रत्येक वर्ग एवं उप-वर्ग का योग दिया जाना चाहिए।
  • सारणी का स्रोत :
    सारणी के नीचे यह लिखा जाना चाहिए कि आँकड़े कहाँ से प्राप्त किये गए हैं।
  • माप की इकाई :
    सारणी में प्रयुक्त इकाइयों के बारे में कॉलम के ऊपर या अनुशीर्षक के सामने लिखा जाना चाहिए। 10. सारणी की संख्या—प्रत्येक सारणी की संख्या सारणी के सबसे ऊपर दी जानी चाहिए।
  • निर्माण वैज्ञानिक आधार पर :
    सारणी का निर्माण वैज्ञानिक आधार पर होना चाहिए तथा उसमें प्रदर्शित समंक व्यवस्थित होने चाहिए।
  • सारणी के खाने :
    सांख्यिकी के खाने इस प्रकार बनाये जाने चाहिए जिससे समंकों की विशेषताएँ और उनका महत्त्व प्रकट हो सके।

प्रश्न 3.
सारणी के विभिन्न प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सारणियों का मुख्य रूप से तीन आधार पर वर्गीकरण किया जाता है :
1. उद्देश्य के आधार पर,
2. मौलिकता के आधार पर तथा
3. बनावट के आधार पर।

1. उद्देश्य के आधार पर :
उद्देश्य के आधार पर सारणी दो प्रकार की होती है :

  • सामान्य उद्देश्य वाली सारणी :
    यह सारणी सामान्य प्रयोग के लिए आँकड़ों को सारणी के रूप में प्रस्तुत करती है। इसका उद्देश्य आँकड़ों को इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि अनुसन्धानकर्ता अलग-अलग इकाइयों को तुरन्त ढूंढ़ सके। इन्हें सन्दर्भ सारणी भी कहते हैं, क्योंकि आमतौर से ये रिपोर्ट के साथ दी जाती हैं; जैसे-जनगणना रिपोर्ट के साथ दी गई सारणियाँ।
  • विशेष उद्देश्य वाली सारणी :
    ये सारणी किसी विशेष उद्देश्य के लिए तैयार की जाती हैं। ये सारणी अधिकतर . छोटी होती हैं। इनमें विस्तृत आँकड़े नहीं दिये जाते हैं, इन्हें सारांश सारणी भी कहते हैं।

2. मौलिकता के आधार पर :
मौलिकता के आधार पर सारणी दो प्रकार की होती है :

  • प्राथमिक अथवा मौलिक सारणी :
    प्राथमिक सारणी से आशय ऐसी सारणी से है जिसमें आँकड़े उसी मौलिक रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं, जिस रूप में वे संकलित किये गए हैं।
  • व्युत्पन्न सारणी :
    व्युत्पन्न सारणी वह सारणी है जिसमें आँकड़े प्रतिशत, अनुपात आदि के रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं।

3. बनावट के आधार पर :
बनावट के आधार पर भी सारणी दो प्रकार की होती है :

  • सरल या एक गुण वाली सारणी :
    यह सारणी केवल समंकों की एक विशेषता का ही वर्णन करती है; जैसे-किसी विद्यालय के विभिन्न कक्षाओं में छात्रों की संख्या को प्रदर्शित करने वाली तालिका।
  • जटिल सारणी :
    ऐसी सारणी जो समंकों के एक से अधिक गुणों को स्पष्ट करती है, उसे जटिल सारणी कहते हैं। गुणों के आधार से इसके तीन वर्ग किये जाते हैं जो कि निम्नलिखित हैं
    1. द्वि-गुणी सारणी :
      ये सारणी समंकों के दो गुणों को प्रदर्शित करती है। इसीलिए इसे द्वि-गुणी सारणी कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी विद्यालय में विभिन्न कक्षाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या लड़के-लड़कियों में बाँटकर दिखायी जाए तो ऐसी सारणी द्वि-गुणी कहलाएगी।
    2. त्रि-गुणी सारणी :
      ऐसी सारणी समंकों की तीन विशेषताओं को दर्शाती है। उदाहरण के लिए, यदि विद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या को कक्षाओं, लिंग तथा आवास के आधार पर विभक्त करके प्रदर्शित किया जाए तो ऐसी सारणी को त्रि-गुणी सारणी कहा जाएगा।
    3. बहु-गुणी सारणी :
      जब सारणी समंकों की तीन से अधिक विशेषताओं को प्रदर्शित करती है, तो उसे बहु-गुणी सारणी कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि विद्यालय के विद्यार्थियों की संख्या को कक्षा, लिंग, आवास तथा वैवाहिक स्तर के आधार पर बाँटकर प्रदर्शित किया जाए, तो ऐसी सारणी को बहु-गुणी सारणी कहते हैं।

प्रश्न 4.
जटिल सारणी कितने प्रकार की होती है? प्रत्येक का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जटिल सारणी के प्रकार-जटिल सारणी तीन प्रकार की होती है
(i) द्वि-गुणी सारणी :
ये सारणी समंकों के दो गुणों को प्रदर्शित करती हैं। इसका उदाहरण नीचे दिया गया है।
वर्ष 2009-10 में विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या (कक्षा तथा लिंग के अनुसार)

RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 7 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण 6

(ii) त्रिगुणी सारणी :
ऐसी सारणी में समंकों की तीन विशेषताएँ प्रदर्शित की जाती हैं-कक्षा, लिंग तथा आवासीय स्थिति के आधार पर विद्यार्थियों का विवरण प्रस्तुत करना त्रिगुणी सारणी की श्रेणी में आयेगा। इसका उदाहरण निम्नवत् है :
वर्ष 2009-10 में विद्यालय के विद्यार्थियों की संख्या (कक्षा, लिंग तथा आवास के अनुसार)

RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 7 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण 7

वर्ष 2009-10 में विद्यालय के विद्यार्थियों की संख्या
(कक्षा, लिंग, आवास तथा वैवाहिक स्थिति के आधार पर)

RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 7 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण 8

प्रश्न 5.
आँकड़ों के रेखाचित्रीय प्रदर्शन से क्या अभिप्राय है? इसके क्या लाभ एवं सीमाएँ हैं? स्पष्ट समझाइये।
उत्तर:
आँकड़ों के रेखाचित्रीय प्रदर्शन से आशय-सांख्यिकीय आँकड़ों का ग्राफ पेपर पर प्रदर्शन ग्राफ या बिन्दु रेख कहलाता है। सामान्यत: इस प्रकार के ग्राफ की रचना ज्ञात श्रेणी के आँकड़ों को प्रदर्शित करने के लिए की जाती है। अतः एक रेखाचित्र सामान्यत: कालिक श्रृंखला ग्राफ के नाम से भी जाना जाता है। बिन्दु रेख चित्र मात्र प्रदर्शन का ही अंग है। बिन्दु रेख का वर्णन करते हुए ब्लेयर ले लिखा है कि “बिन्दु रेख समझने में सबसे अधिक सुगम, रचना करने में सबसे अधिक सरल और अत्यधिक व्यापक रूप में प्रयोग किये जाने वाला चार्ट है।”

बिन्दु रेख की रचना ग्राफ पेपर पर की जाती है। इस कागज पर रेखाएँ क्षैतिज और उदग्र दिशा में खिंची होती हैं, जो समकोण पर एक-दूसरे को काटती हैं। अन्तर्विभाजन के इस बिन्दु को मूल बिन्दु या शून्य बिन्दु कहते हैं। क्षैतिज रेखा को x-अक्ष तथा उदग्र रेखा को y अक्ष कहते हैं। बिन्दु रेख पर ऋणात्मक तथा धनात्मक माप दोनों ही मूल बिन्दु से अंकित किये जाते हैं। ऊपर की ओर या दायीं ओर माप धनात्मक तथा नीचे की ओर या बायीं ओर माप ऋणात्मक होते हैं। सामान्यतः स्वतन्त्र चलों को क्षैतिज पैमाने पर तथा आश्रित चलों को उदग्र पैमाने पर प्रांकित किया जाता है। x तथा y अक्ष के लिए पैमाने स्वतन्त्र रूप सै आवश्यकतानुसार निर्धारित किये जाते हैं।

रेखाचित्रीय प्रदर्शन के लाभ :
रेखाचित्रीय प्रदर्शन के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं। :

  • सरल एवं समझने योग्य :
    रेखाचित्रीय प्रदर्शन की सहायता से जटिल से जटिल आँकड़ों को सरल एवं समझने योग्य बनाया जा सकता है। इनको देखने मात्र से ही आँकड़ों की विशेषताओं का पता चल जाता है।
  • आकर्षक एवं प्रभावशाली :
    ग्राफ या रेखाचित्र आकर्षक एवं प्रभावशाली होते हैं। यह मन ब मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ते हैं। कहा जाता है कि एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होता है।
  • विशेष प्रशिक्षण व ज्ञान की आवश्यकता नहीं :
    रेखाचित्र द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों को समझने के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण एवं ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है। इन्हें एक सामान्य व्यक्ति भी आसानी से समझ सकता है।
  • लम्बा प्रभाव :
    रेखाचित्रों का मन मस्तिष्क पर दीर्घकालीन प्रभाव होता है। इनको आसानी से भुलाना सम्भव नहीं है।
  • तुलना आसान :
    इनकी सहायता से आँकड़ों का सरलता से तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।
  • मनोरंजन :
    रेखाचित्र विभिन्न विषयों का सरल एवं प्रभावी प्रदर्शन करते हैं, साथ ही ये दर्शक का मनोरंजन भी करते। हैं। अतः इनसे सूचना मिलने के साथ-साथ मनोरंजन भी होता है।
  • औसतों का निर्धारण :
    इनकी सहायता से बहुलक, माध्यिका तथा चतुर्थक आदि की गणना भी की जा सकती है।
  • सह :
    सम्बन्ध का अध्ययन-इनकी सहायता से दो चरों के मध्य सह-सम्बन्ध को समझने में सुविधा रहती है।

रेखाचित्रीय प्रदर्शन की सीमाएँ–रेखाचित्रीय प्रदर्शन की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं :

  • प्राथमिक निष्कर्ष :
    इनके द्वारा अन्तिम निष्कर्ष निकालना सदैव सम्भव नहीं होता है, इनसे केवल सामान्य जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
  • सीमित उपयोग :
    चित्र अथवा रेखाचित्र केवल तुलनात्मक अध्ययन में ही ज्यादा उपयोगी होते हैं।
  • दुरुपयोग :
    प्राय: रेखाचित्रों के द्वारा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर दिखा दिया जाता है। प्रायः विज्ञापनों में ऐसा होता है।

प्रश्न 6.
सांख्यिकी में चित्रों की आवश्यकता एवं महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सांख्यिकी तथ्य जब अंकों के रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं, तो वे सामान्य व्यक्तियों की समझ में नहीं आते हैं। और न ही उनमें उनकी रुचि पैदा हो पाती है। साथ ही उनके लिए इस प्रकार के विभिन्न समंकों के बीच तुलना करना व कोई निष्कर्ष निकालना ही सम्भव हो पाता है, लेकिन जब इन्हीं समंगों को चित्रों के रूप में प्रदर्शित किया जाता है, तो उन्हें विभिन्न तथ्यों को समझने में बड़ी आसानी हो जाती है। विलियम प्लेफेयर ने ठीक ही कहा है कि, “रेखीय अंकगणित पाँच मिनट में ही इतनी जानकारी देती है जिसको समंक सारणी द्वारा बुद्धिगम्य बनाने में कई पूरे दिन लगते हैं।”

इससे स्पष्ट है कि सांख्यिकी में चित्रों का उपयोग बहुत महत्त्वपूर्ण है। सांख्यिकी चित्रों की आवश्यकता अथवा उपयोगिता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं :

  • समंकों को सरल व रोचक बनाना :
    चित्रों में समंकों को सरल एवं रोचक रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता होती है। चित्रों के माध्यम से समंकों की सभी विशेषताएँ स्पष्ट हो जाती हैं। उदाहरण के लिए यदि दो विद्यालयों की प्रगति का अध्ययन करना हो, तो इसे चित्रों की सहायता से ज्यादा सरल रूप में जाना जा सकता है।
  • श्रम एवं समय की बचत :
    जब समंकों को चित्रों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो उन्हें अल्प समय में बिना मस्तिष्क पर ज्यादा जोर डाले आसानी से समझा जा सकता है। इस कारण इससे समय भी बचता है तथा श्रम की भी बचत होती है।
  • तुलना में सहायक :
    चित्रों की सहायता से विभिन्न स्थितियों एवं समस्याओं का आसानी से तुलनात्मक अध्ययन हो सकता है; जैसे-मूल्य वृद्धि के समंक सामान्य व्यक्ति की समझ से परे हो सकते हैं, लेकिन इन्हीं समंकों को वह चित्रों के रूप में देखकर आसानी से अनुमान लगा सकता है।
  • विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं :
    चित्रों को समझाने के लिए सांख्यिकीय विज्ञान की पूरी जानकारी आवश्यक नहीं है। एक साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी उन्हें आसानी से समझ सकता है।
  • मस्तिष्क पर स्थाई प्रभाव :
    अंकों को याद रखना बहुत मुश्किल होता है। अधिकांश व्यक्ति समय के साथ उन्हें भूल जाते हैं, लेकिन चित्रों द्वारा जब समंकों को प्रस्तुत किया जाता है तो वे मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ते हैं।
  • सार्वभौमिक उपयोगिता :
    चित्रमय प्रदर्शन का व्यापक प्रयोग किया जाता है। आर्थिक, सामाजिक, व्यापारिक आदि विभिन्न क्षेत्रों में समंकों के प्रदर्शन के लिए इनका प्रयोग किया जा सकता है, अतः ये सार्वभौमिक उपयोगिता रखते हैं।
  • सूचना के साथ मनोरंजन :
    जब चित्र रंगीन व आकर्षक बनाये जाते हैं, तो उनसे सूचना ही नहीं प्राप्त होती है, बल्कि ये लोगों को मनोरंजन भी करते हैं।

प्रश्न 7.
चित्रमय प्रदर्शन की सीमाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चित्रमय प्रदर्शन की सीमाएँ :
चित्रमय प्रदर्शन सांख्यिकीय तथ्यों को प्रदर्शित करने का एक महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावी साधन है, लेकिन इसका प्रयोग इसकी सीमाओं को दृष्टि में रखते हुए ही करना चाहिए। इसकी निम्नलिखित सीमाएँ

  • तुलना अध्ययन में ही उपयोगी :
    चित्रमय प्रदर्शन का प्रयोग तभी किया जा सकता है, जबकि कम-से-कम दो समान गुणों वाले चित्र बनाना हो। एक चित्र बनाने का तो कोई अर्थ ही नहीं होता है। चित्रमय प्रदर्शन तुलनात्मक अध्ययन में ही उपयोगी है।
  • समान गुण एवं स्वभाव आवश्यक :
    जब सभी चित्रों को समान गुणों के आधार पर बनाया जाता है तभी उनके बीच-तुलना की जा सकती है। यदि अलग-अलग गुणों के आधार पर चित्रों को बनाया जाएगा तो उनसे भ्रामक निष्कर्ष ही निकलेंगे।
  • अनुमानित प्रदर्शन :
    चित्र सन्निकट मूल्यों पर आधारित होते हैं। इस कारण ये तथ्यों का यथार्थ प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं। इनके माध्यम से केवल समंकों का अनुमानित प्रदर्शन ही हो सकता है।
  • सूक्ष्म तथा विशाल अन्तरों को प्रदर्शित करना कठिन :
    चित्रों के माध्यम से विभिन्न मूल्यों का अति सूक्ष्म अन्तर प्रदर्शित करना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार बड़े अन्तरों वाली संख्याओं को भी प्रदर्शित करना सम्भव नहीं होता है।
  • बहुमुखी गुणों का प्रदर्शन असम्भव :
    वर्गीकरण एवं सारणीयन के माध्यम से हम बहुगुणी सूचनाएँ प्रदर्शित कर सकते हैं, लेकिन चित्रों द्वारा यह सम्भव नहीं होता है। चित्रों के माध्यम से तो अधिकतम तीन या चार गुणों का ही प्रदर्शन सम्भव हो पाता है।
  • संख्यात्मक प्रदर्शन असम्भव :
    चित्रों के द्वारा संख्यात्मक प्रदर्शन सम्भव नहीं होता है। इनसे पूर्ण परिमाणात्मक शुद्धता की भी आशा नहीं की जा सकती है।
  • दुरुपयोग :
    प्राय: स्वार्थी लोगों द्वारा अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इसका दुरुपयोग भी किया जाता है।
  • भविष्य में विश्लेषण सम्भव नहीं :
    यदि किसी विषय को चित्रों द्वारा प्रदर्शित किया गया है तो भविष्य में परिवर्तित स्थिति को ध्यान में रखते हुए पुराने चित्र का विश्लेषण सम्भव नहीं होता है।

प्रश्न 8.
आवृत्ति बहुभुज आवृत्ति वक्र से किस प्रकार भिन्न है? काल्पनिक आँकड़ों की सहायता से इन्हें रेखाचित्र द्वारा प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
आवृत्ति बहुभुज एवं आवृत्ति वक्र में अन्तर :
आवृत्ति बहुभुज तथा आवृत्ति वक्र दोनों ही आयतों की ऊपरी भुजाओं के मध्य बिन्दुओं को मिलाकर खींचे जाते हैं, लेकिन इन दोनों में मूलभूत अन्तर यह है कि आवृत्ति बहुभुज में आयतों के ऊपर भुजाओं के मध्य बिन्दुओं को आपस में पैमाने की सहायता से मिलाया जाता है, जबकि आयते क्रम में इन मुख्य बिन्दुओं को मुक्तहस्त द्वारा मिलाया जाता है। इस कारण आवृत्ति बहुभुज में आकर्षक कोण बन जाते हैं, जबकि आवृत्ति वक्र कोण रहित (smooth) होता है।

रेखाचित्र द्वारा प्रस्तुतीकरण :
निम्नलिखित आंकड़ों के लिए आवृत्ति बहुत एवं आवृत्ति वक्र की रचना कीजिए :
RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 7 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण 9
RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 7 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण 10

प्रश्न 9.
बारम्बारता आरेख पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
बारम्बारता आरेख (Frequency Diagram) :
समूहीकृत बारम्बारता वितरण के रूप में प्रस्तुत आँकड़ों को सामान्यतः बारम्बारता आरेखों के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है इसके अन्तर्गत आयत चित्र, बारम्बारता बहुभुज, बारम्बारता वक्र तथा तोरण आदि आते हैं। इनका विस्तार से वर्णन निम्नलिखित प्रकार है

  • आयत चित्र (Rectangular diagram) :
    आयत चित्र एक द्विविम आरेख है। यह आयतों का एक ऐसा समुच्चय होता है, जिसमें वर्ग सीमाओं के अन्तराल (४-अक्ष पर) आधार का कार्य करते हैं तथा जिनके क्षेत्रफल वर्ग बारम्बारता के अनुपात में होते हैं। यदि वर्ग के अन्तराल का विस्तार एकसमान होता है, तो आयतों का क्षेत्रफल उनकी बारम्बारताओं के अनुपात में होता है।
  • बारम्बारता बहुभुज (Frequency Polygon) :
    बारम्बारता बहुभुज सीधी रेखाओं से घिरा हुआ एक समतल होता है, जिसमें सामान्यत: चार या चार से अधिक रेखाएँ होती हैं। यह आयत चित्र का विकल्प होता है, जो आयत चित्र से ही व्युत्पन्न होता है। आयत चित्र के क्रमिक आयतों के ऊपरी छोर के मध्य बिन्दुओं को जोड़कर बारम्बारता बहुभुज आसानी से बनाया जा सकता है। यह आधार रेखा से दूर दो छोरों पर समाप्त हो जाता है। बारम्बारता बहुभुज समूहित बारम्बारता वितरण के प्रस्तुतीकरण के लिए सर्वाधिक उपयुक्त रहता है।।
  • बारम्बारता वक्र (Frequency Curve) :
    बारम्बारता बहुभुज के बिन्दुओं से निकटतम गुजरते हुए मुक्तहस्त से वक्र बनाकर आसानी से बारम्बारता वक्र प्राप्त किया जा सकता है। बारम्बारता बहुभुज के सभी बिन्दुओं से गुजरना इसके लिए आवश्यक नहीं होता है, लेकिन यह उन बिन्दुओं के निकट से होकर गुजरता है।
  • तोरण (Ogive) :
    इसे संचयी बारम्बारता वक्र भी कहते हैं क्योंकि संचयी बारम्बारता दो प्रकार की होती है। पहली, ‘से कम’ प्रकार की तथा दूसरी ‘से अधिक प्रकार की। इसी के अनुसार, तोरण भी दो प्रकार के होते हैं। इन दोनों ही तोरणों की एक रोचक विशेषता यह होती है कि इनका परस्पर प्रतिच्छेद बिन्दु बारम्बारता वितरण की माध्यिका बनाता है। जैसा कि दोनों तोरणों के आकार से स्पष्ट होता है कि ‘से कम’ प्रकार को तोरण कभी घटता नहीं है और से अधिक प्रकार का तोरण कभी बढ़ता नहीं है।

प्रश्न 10.
छात्रों द्वारा वाणिज्य विषय में प्राप्त अंकों के निम्नलिखित विवरण के आधार पर बारम्बारता बहुभुज की रचना कीजिए :
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उत्तर:
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प्रश्न 11.
निम्नांकित समंकों को बहु-दण्ड आरेख द्वारा प्रदर्शित कीजिए।
समंक-विभिन्न शैक्षिक सत्रों में कक्षा-11 में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं की संख्या
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उत्तर:
RBSE Solutions for Class 11 Economics Chapter 7 आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण 14

प्रश्न 12.
आदर्श विद्या निकेतन, उदयपुर में पढ़ने वाले 600 छात्रों में से 350 छात्र कला वर्ग के 150 वाणिज्य वर्ग के तथा 100 छात्र विज्ञान वर्ग के हैं। इन्हें वर्गवार वृत्तचित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर:
समंक-वर्ग के छात्रों की संख्या
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क्योंकि कुल 600 छात्र व्यक्त होंगे 360 अंश से
अतः 350 छात्र व्यक्त होंगे (frac { 360times 350 }{ 600 } ={ 210 }^{ 0 })
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प्रश्न 13.
अर्थशास्त्र में विद्यार्थियों को प्राप्त अंकों के निम्नलिखित समंकों से ‘से कम ओजाइव एवं ‘से अधिक ओजाई बनाइये।
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उत्तर:
सबसे पहले से कम’ और ‘से अधिक संचयी बारम्बारता तालिका बनायेंगे। उसके बाद ओजाइव बनाया जायेगा।
संचयी बारम्बारता तालिका ‘से कम’ प्रकार :
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प्रश्न 14.
निम्नलिखित समंकों से बारम्बारता वक्र तैयार कीजिए
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उत्तर:
प्राप्त समंकों से सबसे पहले एक आयत चित्र बनाया जाएगा तब उनके ऊपर बीच में बिन्दु बनाये जाएंगे, इन बिन्दुओं को मुक्तहस्त से मिलाकर बारम्बारता वक्र अग्र प्रकार प्राप्त होगा

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