RBSE Solutions for Class 11 Business Studies Chapter 9 व्यवसाय की आधुनिक प्रवृत्तियाँ

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Rajasthan Board RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 व्यवसाय की आधुनिक प्रवृत्तियाँ

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ई – कॉमर्स में शामिल नहीं होता है –
(अ) एक व्यवसाय का उसके पूर्तिकर्ताओं से पारस्परिक सम्पर्क
(ब) एक व्यवसाय का उसके ग्राहकों से पारस्परिक सम्पर्क
(स) एक व्यवसाय का अपनी भौगोलिक रूप से फैली हुई इकाइयों के मध्य पारस्परिक सम्पर्क
(द) व्यवसाय के विभिन्न विभागों के मध्य पारस्परिक सम्पर्क
उत्तरमाला:
(द) व्यवसाय के विभिन्न विभागों के मध्य पारस्परिक सम्पर्क

प्रश्न 2.
ई – व्यवसाय का प्रारूपिक भुगतान तंत्र –
(अ) चैक
(ब) ई – नकद
(स) सुपुर्दगी पर नकद
(द) क्रेडिट और डेबिट कार्ड
उत्तरमाला:
(स) सुपुर्दगी पर नकद

प्रश्न 3.
यह ई – व्यवसाय का अनुप्रयोग नहीं है –
(अ) ऑनलाइन व्यापार
(ब) संविदा शोध व विकास
(स) ऑनलाइन बोली
(द) ऑनलाइन अधिप्राप्ति
उत्तरमाला:
(ब) संविदा शोध व विकास

प्रश्न 4.
एक कॉल सेंटर निर्वहन करता है –
(अ) ग्राहकोन्मुख और पाश्र्व दोनों व्यवसाय
(ब) दोनों अंत – बंध एवं बाह्य – बंध स्वर आधारित व्यवसाय
(स) केवल अंत – बंध स्वर आधारित व्यवसाय
(द) बाह्य – बंध स्वर आधारित व्यवसाय
उत्तरमाला:
(स) केवल अंत – बंध स्वर आधारित व्यवसाय

प्रश्न 5.
बाह्यस्रोतीकरण –
(अ) उत्पादन और शोध एवं विकास के साथ सेवा प्रक्रियाओं – मुख्य और गैर-मुख्य दोनों के संविदा बाहेर प्रदान करता है परन्तु यह केवल घरेलू क्षेत्र तक सीमित है।
(ब) देश की भौगोलिक सीमाओं के बाहर बाहयस्रोतीकरण भी सम्मिलित है।
(स) गैर – मुख्य व्यावसायिक प्रक्रियाओं के संविदा बाहर प्रदान करने को प्रतिबंधित करता है।
(द) सिर्फ सूचना प्रौद्योगिकी जन्य सेवाओं के संविदा के बाहर प्रदान करने को प्रतिबंधित करता है।
उत्तरमाला:
(अ) उत्पादन और शोध एवं विकास के साथ सेवा प्रक्रियाओं – मुख्य और गैर-मुख्य दोनों के संविदा बाहेर प्रदान करता है परन्तु यह केवल घरेलू क्षेत्र तक सीमित है।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ई – व्यवसाय एवं ई – कॉमर्स में अन्तर बताइये।
उत्तर:
ई – व्यवसाय का क्षेत्र ई – कॉमर्स की तुलना में अधिक व्यापक है।

प्रश्न 2.
मोबाइल ई – कॉमर्स क्या है?
उत्तर:
वस्तुओं या सेवाओं के किसी वायरलेस हैण्ड हैल्ड उपकरण जैसे – सेल्यूलर फोन के द्वारा क्रय – विक्रय करना मोबाइल कॉमर्स कहलाता है।

प्रश्न 3.
बाह्यस्रोतीकरण क्या है?
उत्तर:
जब कोई फर्म अपने प्रमुख एवं महत्वपूर्ण कार्यों को स्वयं करती है तथा कम महत्वपूर्ण कार्यों को करने के लिये दूसरी फर्म को सौंप देती है। जो इस कार्य में विशेषज्ञ होती है, तो इसे बायस्रोतीकरण कहते हैं।

प्रश्न 4.
फ्रेंचाइजी की उपादेयता क्या है?
उत्तर:
फ्रेंचाइजी से उपलब्ध ट्रेडमार्क पर शीघ्रता से व्यापार प्रारम्भ किया जा सकता है। संसाधन व आधारभूत संरचना को विकसित करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रेंचाइजी के प्रकार बताइये।
उत्तर:
फ्रेंचाइजी को तीन भागों में विभक्त किया जाता है –

  1. छोटे आकार के फ्रेंचाइज – जिनका कार्यक्षेत्र शहर, कस्बा या ब्लॉक स्तर तक सीमित होता है।
  2. मध्यम आकार फ्रेंचाइज – जिनका कार्यक्षेत्र एक जिला या एक से अधिक जिले तक सीमित होता है।
  3. वृहद आकार के फ्रेंचाइज – जिनका कार्यक्षेत्र प्रान्तीय स्तर तक या महानगर स्तर तक होता है।

प्रश्न 2.
फ्रेंचाइजी में पक्षकारों के दायित्व बताइये।
उत्तर:
फ्रेंचाइजी में पक्षकारों के दायित्व निम्न है –

  1. फ्रेंचाइजर द्वारा अपने ट्रेडमार्क की सुरक्षा, व्यवसाय अवधारणा का नियन्त्रण और तकनीकी जानकारी की सुरक्षा करना।
  2. फ्रेंचाइजर द्वारा फ्रेंचाइजी को वे सभी सेवायें देना जिनके लिये ट्रेडमार्क बनाया गया है और प्रसिद्ध हुआ है।
  3. फ्रेंचाइजी के सेवा स्थल के प्रमुख स्थान पर फ्रेंचाइजर के चिह्न, प्रतीक और ट्रेडमार्क को प्रदर्शित करना।
  4. फ्रेंचाइजी के कर्मचारियों द्वारा एक विशेष रंग की वर्दी पहनना।

प्रश्न 3.
ई – व्यवसाय एवं ई – कॉमर्स में कोई दो अन्तर बताइये।
उत्तर:

  1. ई – व्यवसाय का क्षेत्र ई – कॉमर्स की तुलना में अधिक व्यापक है।
  2. ई – व्यवसाय में क्रय – विक्रय के साथ – साथ ग्राहक को सर्विस देना व व्यापारिक साझेदार के साथ सहयोग करना होता है जबकि ई – कॉमर्स में इन्टरनेट पर लेन – देन, इलेक्ट्रॉनिक फण्ड ट्रान्सफर, स्मार्ट कार्ड, डिजिटल कैश आदि क्रियायें सम्मिलित होती है।

प्रश्न 4.
इन्टरनेट व्यवसाय द्वारा उपयोगकर्ताओं को प्रदान की जाने वाली किन्हीं तीन सहायताओं को बताइये।
उत्तर:
इन्टनेट व्यवसाय द्वारा उपयोगकर्ताओं को प्रदान की जाने वाली सहायतायें निम्न प्रकार हैं –

  1. इन्टरनेट व्यवसाय में 24 घण्टे, 365 दिन की व्यवसाय करने की सुविधा रहती है, जिससे कोई भी व्यक्ति कभी भी आदेश दे सकता हैं।
  2. इन्टरनेट व्यवसाय में क्रय – विक्रय की गति बढ़ जाती है। कई सौदों में तो माउस के एक क्लिक द्वारा ही क्रय – विक्रय हो जाता है।
  3. इन्टरनेट व्यवसाय में ऑन लाइन खरीद के लिये वस्तुओं व सेवाओं की सूची – पत्र ढूँढकर सूचना प्राप्त कर सकते हैं।

प्रश्न 5.
ऑनलाइन लेन – देनों की अवस्थाएँ बताइये।
उत्तर:
ऑनलाइन लेन – देन में तीन अवस्थायें प्रयोग में लायी जा सकती हैं –

  1. पहली अवस्था क्रय – विक्रय से पूर्व की, जिसमें प्रचार एवं सूचना का आदान – प्रदान करना होता है।
  2. दूसरी अवस्था क्रय – विक्रय, इसमें वस्तु के बारे में मोलभाव करके उसे क्रय – विक्रय किया जाता है।
  3. तीसरी अवस्था सुपुर्दगी की इसमें वस्तु को विक्रेता द्वारा क्रेता को सुपुर्द कर दिया जाता है।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ऑनलाइन व्यापार में सम्मिलित कदमों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ऑनलाइन लेन – देन:
ऑनलाइन लेन – देन को तीन अवस्थाओं में बाँटा जा सकता है। प्रथम, क्रय/विक्रय से पूर्व की अवस्था जिसमें प्रचार एवं सूचना का आदान – प्रदान होता है। दूसरी, क्रय/विक्रय अवस्था, इसमें वस्तु के बारे में मोल – भाव करके उसे क्रय – विक्रय किया जाता है। तीसरी, सुपुर्दगी अवस्था इसमें वस्तु को विक्रेता द्वारा क्रेता को सुपुर्द कर दिया जाता है। इनमें से पहली दोनों अवस्थाओं में सूचना प्रवाह की आवश्यकता होती है। यह सूचना आमने – सामने पहुँचकर, फोन से, डाक से या इन्टरनेट के माध्यम से हो सकती है। स्पष्ट है कि ऑनलाइन व्यापार प्रक्रिया आसान एवं सस्ती है।
इस प्रक्रिया का वर्णन निम्न प्रकार है –
1. पंजीकरण – ऑनलाइन खरीददारी करने से पूर्व विक्रेता की वेबसाइट पर एक फॉर्म भरकर पंजीकरण कराना होता है। इसके साथ ही विक्रेता के यहाँ आपका ऑनलाइन खाता खुल जाता है तथा आपको एक संकेत शब्द (पास वर्ड) मिल जाता है।

2. आदेश – जिस प्रकार वास्तविक स्टोर से सामान को चुनकर एक ट्रॉली में डालकर बाहर निकलते है, उसी प्रकार ऑनलाइन अभिलेख में दिखाये गये सामानों में से चुनकर आप शॉपिंग कार्ट (खरीददारी ट्रॉली) में डाल सकते है और फिर बाहर निकलकर भुगतान के विकल्पों को चुन सकते है।

3. भुगतान तंत्र – ऑनलाइन खरीददारी के लिए भुगतान की निम्नलिखित विधियाँ है –

  • सुपुर्दगी के समय नकद भुगतान – इस विधि द्वारा जब वस्तु क्रेता के सुपुर्द की जाती है तभी नकद रूप में भुगतान कर दिया जाता है।
  • चेक – ऑनलाइन विक्रेता ग्राहक के पास से चेक प्राप्त कर सकता है तथा जब चेक का भुगतान प्राप्त हो जाता है तब वह वस्तु की सुपुर्दगी दे देता है।
  • नेट बैंकिंग द्वारा हस्तान्तरण – क्रेता, विक्रेता के खाते में नेट बैंकिंग का प्रयोग करके अपने खाते में कोष का हस्तान्तरण कर सकता है। इसके बाद विक्रेता, क्रेता को वस्तु की सुपुर्दगी दे देता है।
  • क्रेडिट या डेबिट कार्ड द्वारा – इन्हें आजकल ‘प्लास्टिक मनी’ के नाम से जाना जाता है। क्रेडिट कार्ड में बैंक से लोन लेकर भुगतान कर दिया जाता है। बाद में क्रेता बैंक लोन को किश्तों के माध्यम से अपनी सुविधानुसार भुगतान करता रहता है। जबकि डेबिट कार्ड में उस राशि तक खरीददारी की जा सकती है जितनी राशि क्रेता के खाते में जमा है। इन दोनों में ही इलेक्ट्रॉनिक तरीके से भुगतान किया जाता है।
  • डिजिटल नकदी – यह इलैक्ट्रॉनिक मुद्रा का रूप है। इसका अस्तित्व केवल साइबर स्पेस में होता है। इस नकदी का प्रयोग करने के लिए कोषों को बैंक में जमा करना पड़ता है। इसके बाद बैंक जमा करने वाले (क्रेता) को एक विशेष सॉफ्टवेयर जारी कर देता है। यह सॉफ्टवेयर डिजिटल नकदी निकालने की स्वीकृति देता है। इसके बाद क्रेता भुगतान करने के लिए डिजिटल नकदी का प्रयोग कर सकता है।

प्रश्न 2.
फर्म से ग्राहक कॉमर्स के प्रमुख पहलुओं का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फर्म से ग्राहक कॉमर्स:
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो रहा है, फर्म से ग्राहक कॉमर्स में एक तरफ व्यावसायिक फर्म होती है तो दूसरी तरफ ग्राहक होते हैं। इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि फर्म से ग्राहक कॉमर्स में केवल विक्रय की क्रियाएँ ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विपणन प्रक्रिया को सम्मिलित किया जाता है। अतः इसके अन्तर्गत व्यावसायिक गतिविधियों को पहचानना, उनका सम्बर्द्धन करना, उत्पादों (संगीत एवं फिल्म आदि) की ऑनलाइन सुपुर्दगी करना आदि शामिल है।

ई – कॉमर्स के माध्यम से अत्यधिक कम लागत में एवं तेज गति से इन गतिविधियों को पूर्ण किया जा सकता है। आजकल ग्राहक बहुत जागरूक हो रहे हैं तथा वे अपने ऊपर व्यक्तिगत रूप से ध्यानाकर्षण चाहते हैं। अब ग्राहकों को अपनी इच्छानुसार विशेषताओं से पूर्ण उत्पाद तो चाहिए ही साथ ही, वह ये भी चाहते हैं कि उन्हें उत्पाद की सुपुर्दगी प्राप्त करने तथा भुगतान करने में भी स्वतन्त्रता प्रदान की जाये। ई – कॉमर्स ने इन सब कार्यों को अति आसान बना दिया है। अब ग्राहक इन्टरनेट पर ही उत्पाद की विशेषताओं को जानकर उसका चयन कर सकता है। चौबीस घंटे तथा 365 दिन कभी भी आदेश कर सकता है तथा कुछ चीजों, जैसेuसॉफ्टवेयर, फिल्म, संगीत आदि की तो सुपुर्दगी भी प्राप्त कर सकता है।

वह अपनी सुविधानुसार ई – बैंकिंग, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या अन्य किसी प्रकार से भुगतान कर सकता है। अतः ई – कॉमर्स ने फर्म को अपने व्यवसाय के विस्तार का एक अनोखा तरीका प्रदान कर दिया है। अब कम्पनियाँ ई – कॉमर्स के माध्यम से अपने ग्राहक के और भी नजदीक आ रही हैं क्योंकि वे अब इसके द्वारा ग्राहकों से जुड़कर उनकी रुचि के उत्पाद बनाने का प्रयास कर रही है। कम्पनियाँ अपने उत्पाद से सम्बन्धित ग्राहक की सन्तुष्टि के स्तर को भी ऑन लाइन सर्वेक्षण आदि के माध्यम से जानने का प्रयास कर रही है।

फर्म से ग्राहक कॉमर्स, में ग्राहक से फर्म कॉमर्स भी सम्मिलित हैं क्योंकि ई – कॉमर्स के परिणामस्वरूप ग्राहक को भी अनेकों विकल्प घर बैठे ही मिल जाते हैं। ग्राहक अब नि:शुल्क कॉल सेंटरों पर फोन करके कम्पनी एवं उत्पाद विशेष के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकता है तथा आदेश दे सकता है और शिकायत भी दर्ज करा सकता है। अधिकांश कम्पनियाँ अपने ग्राहकों को कॉल सेंटर की सुविधा प्रदान करने के लिए बाह्यस्रोतीकरण की सुविधा अन्य कम्पनियों से प्राप्त करती हैं जो ई – व्यवसाय की ही देन है।

प्रश्न 3.
नेटवर्किंग मार्केटिंग पर सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कम्प्यूटर का प्रयोग आज व्यापक क्षेत्र में हो रहा है, जिसमें इन्टरनेट का विशेष योगदान रहा है। इन्टरनेट एक विश्व स्तर पर जुड़े करोड़ों की संख्या में कम्प्यूटरों का समूह है जिसका उपयोग करोड़ों उपभोक्ता सूचना, व्यापार, मनोरंजन, संचार के लिये कर रहे है। इन्टरनेट लोगों तथा सूचनाओं का एक विशाल नेटवर्क होने के कारण ई – कॉमर्स, ई – मोबाईल कॉमर्स का मुख्य घटक है। इसकी सहायता से लोग अपने उत्पादनों का प्रदर्शन कर सकते हैं और उत्पादों को ऑनलाइन बेच सकते हैं। विभिन्न व्यावसायिक संगठन अब अपनी विभिन्न गतिविधियों को इन्टरनेट के माध्यम से ही पूर्ण कर रहे हैं।

सरकारी विभाग एवं अन्य नियामक प्राधिकरण भी अपने विवरणों एवं रिर्पोटों को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से फाइल करने पर बल दे रहे है। सूचना तकनीकी एक्ट पारित हो जाने के बाद अब अनुमति, अनमोदन, लाइसेन्स आदि के क्षेत्र में प्रशासनिक सुधारों पर बल दिया जा रहा है। इन्टरनेट के माध्यम से विक्रेता की पूरे विश्व के बाजार में पहुँच हो गयी है तथा क्रेता भी इसके माध्यम से पूरे विश्व के किसी भी हिस्से से अपनी उपयोगी वस्तु का चयन कर सकता है।
इन्टरनेट उपयोगकर्ताओं को निम्न रूप से सहायता प्रदान करता है –

  1. ऑनलाइन खरीद के लिये वस्तुओं व सेवाओं का सूची – पत्र ढूंढ़कर सूचना प्राप्त कर सकते हैं।
  2. समाचार पत्र एवं टी.वी. चैनलों पर उपलब्ध समाचारों को पढ़ या देख सकते हैं।
  3. नेटवर्किंग मार्केटिंग में ई – मेल का प्रयोग कर सन्देशों का आदान – प्रदान आसानी से कर सकते हैं।
  4. जब दो पक्ष या दो व्यक्ति इन्टरनेट से जुड़े हों तो एक – दूसरे से बात भी की जा सकती है वे सन्देश भी भेजे जा सकते हैं।
  5. नेटवर्किंग मार्केटिंग में फाइल, चित्र, संजीव चित्र आदि को एक स्थान पर भेज सकते हैं।
  6. नेटवर्किंग मार्केटिंग में संगठन अपने उत्पाद व सेवाओं के सम्बन्ध में सूचना की वेबसाइट बना सकते हैं।
  7. वर्ल्ड वाइड वेब के माध्यम से किसी भी विषय के सम्बन्ध में सूचना प्राप्त कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
(बी.पी.ओ.) व्यवसाय प्रक्रिया बाह्यस्रोतीकरण पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
बाह्यस्रोतीकरण:
बाह्यस्रोतीकरण वह वैश्विक घटना है जिसमें तृतीय पक्ष की विशेषता, अनुभव, निपुणता, कार्यकुशलता और निवेश से लाभान्वित होने के लिए प्रथम पक्ष कुछ द्वितीयक व्यावसायिक गतिविधियों को पूरा करने के लिए तृतीय पक्ष के साथ अनुबन्ध कर लेता है तथा तृतीय पक्ष, प्रथम पक्ष की ओर से द्वितीय पक्ष को आवश्यक व्यावसायिक सेवाएँ प्रदान करता है।
इसकी प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं –

  1. बाह्यस्रोतीकरण में संविदा बाहर प्रदान करना सम्मिलित है।
  2. सामान्यतः द्वितीयक (गैर – मुख्य) व्यावसायिक गतिविधियों का ही बाह्यस्रोतीकरण हो रहा है।
  3. प्रक्रियाओं का बाह्यस्रोतीकरण आबद्ध इकाई अथवा तृतीय पक्ष का हो सकता है।

बाह्यस्रोतीकरण का कार्यक्षेत्र – बाह्यस्रोतीकरण में चार प्रमुख खण्ड सम्मिलित होते हैं – संविदा उत्पादन, संविदा शोध, संविदा विक्रय और सूचना विज्ञान।

बाह्यस्रोतीकरण की आवश्यकता – बाह्यस्रोतीकरण की आवश्यकता के कारण या लाभ निम्नलिखित हैं –
1. ध्यान केन्द्रित करना – व्यावसायिक फर्मे कुछ प्रमुख क्षेत्रों जिनमें उनके पास विशिष्ट क्षमता एवं सामर्थ्य होती है उनमें स्वयं कार्य करती हैं तथा शेष कार्यों को बाह्यस्रोतीकरण द्वारा पूरा कराती है। इससे गुणवत्ता में सुधार होता है।

2. उत्कृष्टता की खोज – सीमित कार्यों पर ध्यान केन्द्रित करके तथा निष्पादन में सर्वश्रेष्ठ लोगों को कार्य सौंपकर बाह्यस्रोतीकरण द्वारा विभाजन एवं विशिष्टीकरण के लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं।

3. लागत की कमी – वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए यह आवश्यक है कि गुणवत्ता श्रेष्ठ हो तथा लागत भी कम हो। अतः लागत में कमी लाने के लिए भी बाह्यस्रोतीकरण किया जाता है।

4. गठजोड़ द्वारा विकास – जब आप दूसरों की सेवाएँ ग्रहण करते हैं तो अपने निवेश में कमी लाते हैं तथा दूसरों के शोध एवं विकास का लाभ उठाते हैं। इससे आपके लाभों में वृद्धि होती है तथा वे दोनों संगठन एक-दूसरे के लाभों में शामिल हो जाते है।

5. आर्थिक विकास को प्रोत्साहन – बाह्यस्रोतीकरण जिस देश से किया जाता है उसमें उद्यमशीलता, रोजगार एवं निर्यात को प्रोत्साहन मिलता है।

बाह्यस्रोतीकरण के सरोकार:
बाह्यस्रोतीकरण निम्नलिखित सरोकारों से घिरा हुआ है –
1. गोपनीयता – बाह्यस्रोतीकरण में गोपनीयता अतिआवश्यक होती है। अन्यथा सूचना प्रतिस्पर्धी तक पहुँच सकती है। बाह्यस्रोतीकरण करने वाली संस्था ही प्रतिस्पर्धी व्यवसाय स्थापित कर सकती है।

2. परिश्रम खरीददारी – बाह्यस्रोतीकरण कराने वाली फर्म ‘चिन्तनं कौशल’ के स्थान पर कार्य कौशल पर बल देती है तथा मानव संसाधनों को कम से कम लागत पर कार्य प्रदान करने की कोशिश करती है जिससे बाह्यस्रोतीकरण करने वाले देशों को अधिक लाभ नहीं होता है।

3. नैतिक सरोकार – बाह्यस्रोतीकरण करने वाली फर्ने विभिन्न देशों के कमजोर कानूनों का लाभ उठाकर बाल – श्रम तथा लिंग – भेद पर आधारित मजदूरी प्रदान कर अनैतिक कार्यों को बढ़ावा देती है।

4. गृह देशों में विरोध – जब उत्पादन, विपणन, शोध एवं विकास और सूचना प्रौद्योगिकी पर आधारित सेवाओं की संविदाएँ देश से बाहर की जाती है तो रोजगार एवं नौकरियाँ भी देश से बाहर जाती है जिसके परिणामस्वरूप अपने गृह देश में बेरोजगारी बढ़ती है तथा बाह्यस्रोतीकरण का विरोध प्रारम्भ हो जाता है।

प्रश्न 5.
आधुनिक व्यवसाय के विकास में बढ़ती हुई फ्रेंचाइजी की महत्ता पर विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दूसरी फर्म के सफल व्यापार मॉडल के प्रयोग की पद्धति को फ्रेंचाइजी कहते हैं आधुनिक व्यवसाय के विकास में बढ़ती हुई फ्रेंचाइजी की महत्ता को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है।
1. न्यूनतम निवेश – फ्रेंजाइजी केवल एक अस्थाई व्यापारिक निवेश है, स्वामित्व के प्रयोजन से व्यवसाय को खरीदना नहीं वरन् निश्चित अवधि के लिये भाड़े या पट्टे पर लेना पड़ता है अतः कोई भी व्यक्ति अपनी क्षमता या बजट के हिसाब से पहले इंडस्ट्री का चयन करता है, फिर उसमें होने वाले खर्चे का आकलन करके फ्रेंचाइजी लेकर आसानी से अपना कार्य प्रारम्भ कर सकता है।

2. प्रशिक्षण एवं तकनीकी ज्ञान – फ्रेंचाइजी के लिये बहुत अधिक पढ़ा – लिखा होना जरूरी नहीं देना है बल्कि थोड़ी – सी व्यावसायिक समझ हो तथा सोशल नेटवर्क एवं जोखिम उठाने की क्षमता होनी चाहिए। राष्ट्रीय एवं अन्य विज्ञापन, प्रशिक्षण और मूर्त व अमूर्त जैसी अन्य समर्थन सेवायें सामान्यतः फ्रेंचाइजर द्वारा सुलभ रूप से उपलब्ध करा दी जाती है।

3. उपलब्ध ट्रेडमार्क पर व्यापार – फ्रेंचाइजी से महत्वपूर्ण लाभ यह है कि जिस कम्पनी की फ्रेंचाइजी ली है उसके उपलब्ध ट्रेडमार्क पर व्यापार आसानी से प्रारम्भ किया जा सकता है और उसे संसाधन व आधारभूत संरचना को विकसित करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है।

4. विज्ञापन की आवश्यकता – आधुनिक व्यवसाय में फ्रेंचाइजी एक ऐसा काम है जिसमें कोई व्यक्ति नामी कम्पनियों के उत्पाद को अपने शोरूम या दुकान में रखकर बेचता है तो वह कम्पनी की साख के आधार पर लाभ कमा सकता है, उसे अलग से किसी प्रकार का विज्ञापन कराने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है।

5. संचालन एवं नियन्त्रण – फ्रेंचाइजी ही एक मात्र ऐसा साधन है जिसके माध्यम से श्रृंखला के संचालन पर नियन्त्रण खोये बगैर उद्यम पूंजी निवेश को प्राप्त किया जा सकता है और अपनी सेवाओं के लिए संवितरण प्रणाली का निर्माण किया जा सकता है। ब्राण्ड और सूत्र की रचना और निष्पादन के बाद, फ्रेंचाइजर, फ्रेंचाइज बेच सकते है और जोखिम को न्यून करते हुये अपने फ्रेंचाइजी की पूंजी और संसाधनों का उपयोग करते हुए देश – विदेश और महाद्वीपों में तेजी विस्तार कर सकते है।

6. बाजार में स्थापित होने में कम समय – कोई प्रसिद्ध कम्पनी जिसका बाजार में नाम स्थापित हो चुका है, वह कुछ शर्तों के साथ किसी व्यक्ति को अपने व्यवसाय में अपने नाम का इस्तेमाल करने की अनुमति देता है तो व्यवसाय निरन्तर प्रगति को ओर अग्रसर होता है, उसे किसी प्रकार की फ्रेंचाइजी उत्पाद से सम्बन्धित गतिविधि नहीं करनी पड़ती है।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उनके उत्तर

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्पादों और सेवाओं की ऑन लाइन गतिविधि को कहते है –
(अ) ई – कॉमर्स
(ब) संचार
(स) बाह्यस्रोतीकरण
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तरमाला:
(अ) ई – कॉमर्स

प्रश्न 2.
दो व्यापारिक कम्पनियों के बीच प्रोडक्ट्स, सर्विसेस या सूचनाओं के आदान – प्रदान को कहते है –
(अ) C2C
(ब) C2B
(स) B2B
(द) B2C
उत्तरमाला:
(स) B2B

प्रश्न 3.
ई – बिजनेस टर्म का सर्वप्रथम उपयोग IBM द्वारा अपने व्यापार को बढ़ाने के लिये किया गया था –
(अ) सन् 1897 में
(ब) सन् 1997 में
(स) सन् 1899 में
(द) सन् 1999 में
उत्तरमाला:
(ब) सन् 1997 में

प्रश्न 4.
www का पूरा नाम है –
(अ) वाइड वेब वर्ल्ड
(ब) वेब वाईड वर्ल्ड
(स) वर्ल्ड वाइड वेब
(द) वर्ल्ड वेब वाइड
उत्तरमाला:
(स) वर्ल्ड वाइड वेब

प्रश्न 5.
ई – कॉमर्स का लाभ है –
(अ) विस्तृत जाँच
(ब) बेहतर ग्राहक सेवा
(स) लेन – देन के समय में कमी
(द) उपरोक्त सभी
उत्तरमाला:
(द) उपरोक्त सभी

प्रश्न 6.
SMS सर्विस सेंटर इस कम्पनी द्वारा बनाया गया है –
(अ) नोकिया
(ब) येलो कम्प्यूटिंग
(स) डा. मेटेरना
(द) सिल्फ
उत्तरमाला:
(स) डा. मेटेरना

प्रश्न 7.
बीपीओ का राजस्व कॉल सेन्टरों से प्राप्त होता है –
(अ) 10%
(ब) 70%
(स) 20%
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तरमाला:
(ब) 70%

प्रश्न 8.
‘फ्रेंचाइज’ की उत्पत्ति आंग्ल – फ्रांसीसी शब्द से हुई है –
(अ) फ्रेकर्स
(ब) फ्रेंकस
(स) फ्रेंकी
(द) फ्रेंकू
उत्तरमाला:
(अ) फ्रेकर्स

प्रश्न 9.
फ्रेंचाइजी का उद्गम स्थल है –
(अ) ब्राजील
(ब) चीन
(स) भारत
(द) संयुक्त राज्य अमेरिका
उत्तरमाला:
(द) संयुक्त राज्य अमेरिका

प्रश्न 10.
चीन द्वारा फ्रेंचाइजिंग पर स्पष्ट कानून पारित किया गया –
(अ) सन् 2009 में
(ब) सन् 2008 में
(स) सन् 2007 में
(द) सन् 2006 में
उत्तरमाला:
(स) सन् 2007 में

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ई – कॉमर्स किसे कहते है?
उत्तर:
उत्पादों और सेवाओं की ऑनलाइन व्यापार गतिविधियों को ई – कॉमर्स कहते है।

प्रश्न 2.
बिजनेस टू कस्टमर ई – कॉमर्स (B2C) किसे कहते है?
उत्तर:
किसी कम्पनी एवं ग्राहक के बीच प्रोडक्ट्स, सर्विसेस या सूचनाओं के आदान – प्रदान को बिजनेस टू कस्टमर ई – कॉमर्स कहते है।

प्रश्न 3.
ई – बिजनेस से क्या आशय है?
उत्तर:
कम्प्यूटर नेटवर्क (इन्टरनेट) का प्रयोग करके उद्योग, व्यापार एवं वाणिज्य का संचालन करना ही ई – बिजनेस कहलाता है।

प्रश्न 4.
ई – कॉमर्स के दो लाभ बताइये।
उत्तर:

  • बेहतर ग्राहक सेवा
  • लेन – देन के समय में कमी

प्रश्न 5.
ई – कॉमर्स की दो कमियाँ बताइये।
उत्तर:

  • व्यक्तिगत सम्पर्क न होना।
  • जोखिम की अधिक सम्भावना।

प्रश्न 6.
मोबाइल कॉमर्स किस टेक्नोलॉजी पर आधारित होता है?
उत्तर:
WAP (Wireless Application Protocol)

प्रश्न 7.
वेडिंग मशीन किस कम्पनी द्वारा बनायी गयी?
उत्तर:
सिल्फ कम्पनी द्वारा।

प्रश्न 8.
सेल फोन्स के लिये पहली ई – कॉमर्स सेवा किसने प्रारम्भ की?
उत्तर:
फ्रांस टेलकॉम ने।

प्रश्न 9.
इन्टरनेट व्यवसाय द्वारा उपयोगकर्ताओं को प्रदान की जाने वाली एक सहायता बताइये।
उत्तर:
इन्टरनेट व्यवसाय द्वारा ई – मेल का प्रयोग कर सन्देशों का आदान – प्रदान कर सकते है।

प्रश्न 10.
इन्टरनेट को सन् 1979 से पहले किस नाम से जाना जाता था?
उत्तर:
ARPANET

प्रश्न 11.
प्रचलन के आधार पर ऑनलाइन मार्केटिंग में कितनी अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है? नाम लिखिए।
उत्तर:

  • क्रय – विक्रय पूर्व अवस्था
  • क्रय – विक्रय अवस्था
  • सुपुर्दगी अवस्था

प्रश्न 12.
ऑनलाइन मार्केटिंग में क्रय – विक्रय से पूर्व की अवस्था में किस प्रकार की जानकारी शामिल होती है?
उत्तर:
प्रचार एवं सूचना।

प्रश्न 13.
‘शॉपिंग कार्ड’ क्या होता है?
उत्तर:
‘शॉपिंग कार्ड’ उन सबका ऑनलाइन अभिलेख होता है जिन्हें ऑनलाइन खरीददारी करते समय चुना होगी। इसे खरीददारी ट्रॉली भी कहते हैं।

प्रश्न 14.
बाह्यस्रोतीकरण (BPO) की दो विशेषतायें बताइए।
उत्तर:

  • संविदा बाहर प्रदान करना।
  • सामान्यतः गैर – मुख्य (द्वितीयक) व्यावसायिक गतिविधियों को ही सौंपना।

प्रश्न 15.
बाह्यस्रोतीकरण में कौन – कौन से प्रमुख अंश (खण्ड) सम्मिलित होते हैं?
उत्तर:

  1. संविदा उत्पादन
  2. संविदा शोध
  3. संविदा विक्रय
  4. संविदा सूचना विज्ञान

प्रश्न 16.
बाह्यस्रोतीकरण के दो लाभ बताइये।
उत्तर:

  • उत्पाद के लागत में कमी।
  • श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण को प्रोत्साहन।

प्रश्न 17.
बाह्यस्रोतीकरण के दो दोष बताइये।
उत्तर:

  • गोपनीयता का अभाव।
  • नैतिक मापदण्डों में कमी।

प्रश्न 18.
फ्रेंचाइजिंग किसे कहते है?
उत्तर:
दूसरी फर्म के सफल व्यापार मॉडल के प्रयोग की पद्धति को फ्रेंचाइजिंग कहते है।

प्रश्न 19.
फ्रेंचाइज की उत्पत्ति किस शब्द से हुई है?
उत्तर:
‘फ्रेंचाइज’ की उत्पत्ति आंग्ल – फ्रांसीसी शब्द फेंकर्स से हुई है जिसका अर्थ है ‘मुक्त’।

प्रश्न 20.
छोटे आकार के फ्रेंचाइजी से आप क्या समझते है?
उत्तर:
ऐसे फ्रेंचाइजी जिनका कार्यक्षेत्र शहर, कस्बा या ब्लॉक स्तर तक सीमित होता है, उन्हें छोटे आकार के फ्रेंचाइजी कहा जाता है।

प्रश्न 21.
फ्रेंचाइजी का उद्गम स्थल किस देश से माना जाता है?
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 22.
किन्हीं दो प्रमुख फ्रेंचाइजिंग के नाम बताइये।
उत्तर:

  • सबवे सेंडविच और सलाद।
  • मेकडोनाल्ड्स, टी – फ्रेशों, कॉफी कैफे डे।

प्रश्न 23.
अन्तर्राष्ट्रीय फ्रेंचाइज एसोसिएशन के अनुसार संयुक्त राज्य अमेरिका का लगभग कितने प्रतिशत व्यवसाय फ्रेंचाइजी द्वारा संचालित होता है?
उत्तर:
चार प्रतिशत।

प्रश्न 24.
भारत में फ्रेंचाइज करार, फ्रेंचाइजर एवं फ्रेंचाइजी के बीच संविदा किस अधिनियम के द्वारा शासित है?
उत्तर:
संविदा अधिनियम, 1872 और विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 द्वारा शासित है।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 लघु उत्तरीय प्रश्न (SA – I)

प्रश्न 1.
ई – कॉमर्स क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
एक फर्म द्वारा अपने ग्राहकों और पूर्तिकर्ताओं के साथ इन्टरनेट पर सम्पर्क करके लेन – देन करना ई – कॉमर्स कहलाता है। यह एक कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी तथा इन्फॉर्मेशन को संगठित रूप है जो व्यापार के मध्य लेन – देन में शामिल होता है।

प्रश्न 2.
उपभोक्ता – उपभोक्ता ई – कॉमर्स (C2C) क्या है?
उत्तर:
उपभोक्ता से उपभोक्ता कॉमर्स ऐसी वस्तुओं के लेन – देन में उपयुक्त होता है जिनका कोई स्थायी बाजार तन्त्र नहीं होता है। इसके अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति इन्टरनेट पर भावी खरीददार ढूंढ़ सकता है। अर्थात् इसमें उपभोक्ता के मध्ये किसी तीसरी पार्टी के माध्यम से लेन – देन होता है।
OLX. com, e – bay.com. इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

प्रश्न 3.
डिजिटल मिडिलमेन ई – कॉमर्स से क्या आशय है?
उत्तर:
डिजिटल मिडिलमेन से आशय जिसमें एक कम्पनी जो इन्टरनेट पर वरचुअल कम्युनिटी या पोर्टल (तीसरे पक्ष) बनाती है और इस कम्युनिटी में व्यापारिक दृष्टि से तीसरी या बहुत – सी कम्पनियों को शामिल करती है।

प्रश्न 4.
ई – कॉमर्स के चार लाभों को बताइये।
उत्तर:

  1. ई – कॉमर्स के माध्यम से नये – नये बाजारों के विषय में जानकारी प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
  2. ई – कॉमर्स द्वारा इन्टरनेट पर व्यापार प्रगति को बढ़ावा मिला है।
  3. सामान्य क्रय – विक्रय की तुलना में ई – कॉमर्स से कम समय लगता है।
  4. ई – कॉमर्स के माध्यम से व्यवसाय करने में लागत कम आती है।

प्रश्न 5.
मोबाइल कॉमर्स एप्लीकेशन में किस प्रकार के लेन – देनों को शामिल किया जाता है?
उत्तर:
मोबाइल कॉमर्स एप्लीकेशन में सभी वित्तीय लेन – देनों को शामिल किया जाता है। जैसे – किसी वस्तु के क्रय का भुगतान करना, इलेक्ट्रॉनिक – कैश तरीके से फण्ड ट्रान्सफर करना, दो खातों के मध्य राशि का हस्तान्तरण या फिर किसी खरीद के लिये राशि देना दोनों ही ई – कॉमर्स की एप्लीकेशन है।

प्रश्न 6.
ऑनलाइन पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) से क्या आशय है?
उत्तर:
ऑनलाइन खरीददारी से पहले व्यक्ति को एक पंजीकरण फॉर्म भरकर ऑनलाइन विक्रेता के पास पंजीकरण कराना पड़ता है। व्यक्ति की अपने खाते की सुरक्षा के लिये एक पासवर्ड भी देना होता है जिससे दूसरा व्यक्ति उसके खाते को न देख सके।

प्रश्न 7.
ऑन लाइन भुगतान तन्त्र में क्रेता कौन – कौन से विकल्पों का चयन कर सकता है?
उत्तर:
ऑनलाइन भुगतान में क्रेता अपनी सुविधा से भुगतान के लिये निम्न में से किसी एक विकल्प का चयन कर सकता है –

  1. सुपुर्दगी के समय नकद भुगतान करना।
  2. सुपुर्दगी के समय चैक द्वारा भुगतान करना।
  3. नेट – बैंकिंग हस्तान्तरण।
  4. क्रेडिट व डेबिट कार्ड द्वारा भुगतान।

प्रश्न 8.
क्रेडिट व डेबिट कार्ड क्या है? समझाइये।
उत्तर:
क्रेडिट व डेबिट कार्ड को प्लास्टिक मनी भी कहा जाता है। ये ऑनलाइन लेन – देन में सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम है। क्रेडिट कार्ड से बैंक से लोन लेकर भुगतान किया जाता है और डेबिट कार्ड से उस राशि तक खरीददारी या बैंक से निकाले जा सकते है, जितने कार्ड धारक के खाते में जमा हैं।

प्रश्न 9.
डिजिटल नकदी क्या है?
उत्तर:
डिजिटल नकदी केवल साइबर स्पेस में विद्यमान होती है। इस नकदी में प्रयोगकर्ता को कोष बैंक में जमा करके एक विशेष सॉफ्टवेयर बैंक से लेना होता है जो नकदी निकालने की स्वीकृति प्रदान करता है। स्वीकृति मिलने पर डिजिटल नकदी का प्रयोग किया जा सकता है। इस तरह की भुगतान प्रणाली द्वारा इन्टरनेट पर क्रेडिट कार्ड संख्याओं के प्रयोग सम्बन्धी समस्याओं को दूर किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
बाह्यस्रोतीकरण में शामिल नैतिक सरोकार कौन – से है?
उत्तर:
प्रायः कम्पनियाँ बाह्यस्रोतीकरण इसलिए करती हैं क्योंकि उस देश में मजदूर सस्ते होते है या बाल – श्रम पर रोक नहीं होती या स्त्री श्रमिकों को कम मजदूरी दी जाती है। अपने देश में बाल – श्रम पर रोक होने तथा स्त्री श्रमिकों को समान मजदूरी मिलने के कारण कार्य की लागत ज्यादा आती है, तो क्या लागत कम करने के लिए ऐसा करना नैतिक दृष्टि से उचित है? वास्तव में तो ऐसा करना अनैतिक व्यवहार को प्रोत्साहित करना है।

प्रश्न 11.
फ्रेंचाइजिंग किसे कहते है?
उत्तर:
किसी दूसरी फर्म के सफल व्यापार मॉडल के प्रयोग की पद्धति को फ्रेंचाइजिंग कहते हैं। फ्रेंचाइज की उत्पत्ति आंग्ल – फ्रांसीसी शब्द फ्रेंकर्स से हुई है जिसका अर्थ है ‘मुक्त’। इसका प्रयोग संज्ञा व क्रिया दोनों के रूप में किया जाता है। फ्रेंचाइज, फ्रेंचाइजर को माल के संवितरण के लिये ‘चेन स्टोर’ बनाने और श्रृंखला पर होने वाले निवेश और देयता से बचाने का विकल्प प्रदान करता है।

प्रश्न 12.
किन्हीं पाँच प्रमुख फ्रेंचाइजिंग के नाम बताइये।
उत्तर:

  • सबवे सेंडविच और सलाद।
  • मैकडोनाल्ड्स, टी – फ्रेशों, कॉफी कैफे डे
  • 7 – इलेवन इंक (सुविधा स्टोर)
  • हेम्पटन इन्ज एण्ड स्वीट्स (मध्यम बजट के होटल)
  • सूपर कट्स (हेयर सैलून)

प्रश्न 13.
फ्रेंचाइजी की चार कमियों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:

  • फ्रेंचाइजी अनुबन्ध (संविदा) में किसी तरह की गारन्टी या वारन्टी नहीं होती और विवाद होने पर फ्रेंचाइजी के पास बहुत कम या न के बराबर कानूनी प्रावधान होते है।
  • फ्रेंचाइजी में किये जाने वाले अनुबन्ध फ्रेंचाइजर के ही पक्ष में एक तरफा होते है।
  • कम लागत वाली फ्रेंचाइजी में प्रशिक्षण शुल्क अधिक पड़ता है।
  • फ्रेंचाइजर द्वारा किसी सफलता या लाभ का कोई वादा नहीं किया जाता है।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 लघु उत्तरीय प्रश्न (SA – II)

प्रश्न 1.
ई – व्यवसाय क्या है?
उत्तर:
ई – व्यवसाय:
व्यवसाय एक विस्तृत शब्द है जिसमें उद्योग व्यापार एवं वाणिज्य को सम्मिलित किया जाता है। उद्योग, व्यापार एवं वाणिज्य अर्थात् व्यवसाय के प्रभावी एवं कुशल संचालन हेतु जब कम्प्यूटर नेटवर्क (इन्टरनेट) का प्रयोग किया जाता है तो इसे ई – व्यवसाय अर्थात् इलेक्ट्रॉनिक व्यवसाय कहते है। इन्टरनेट के माध्यम से क्रय – विक्रय करने को ई – कॉमर्स कहते हैं। जबकि ई – व्यवसाय में ई – कॉमर्स के साथ – साथ व्यवसाय द्वारा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से संचालित किये गये अन्य कार्य, जैसे – उत्पादन, स्टॉक प्रबन्ध, लेखांकन एवं वित्त, मानव संसाधन, उत्पादन विकास आदि को भी सम्मिलित किया जाता हैं।

प्रश्न 2.
ई – व्यवसाय के लिए आवश्यक संसाधनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ई – व्यवसाय के लिए निम्न संसाधनों की आवश्यकता होती है –
1. कम्प्यूटर हार्डवेयर – ई – व्यवसाय का आधार इन्टरनेट है। अतः इसके लिए सर्वप्रथम उद्यमी को उचित गति और तकनीक वाला कम्प्यूटर प्राप्त करना चाहिए।

2. तकनीकी कर्मचारी या अधिकारी – व्यवसायी को इन्टरनेट का प्रयोग जानने वाले कुशल कर्मचारियों की नियुक्ति करनी होती है। ये कर्मचारी ऑर्डर प्राप्त करने, उनका क्रियान्वयन, भुगतान प्राप्त करने आदि की क्रियाओं को भली – भाँति जानते हों।

3. भुगतान प्राप्त करने की कम्प्यूटरीकृत प्रणाली – इसके लिए व्यवसायी को वाणिज्यिक बैंकों और क्रेडिट कार्ड प्रतिनिधियों के साथ समझौते करने होते हैं जिससे यह कार्य आसानी से हो सके।

4. उचित वेबसाइट का विकास – व्यवसायी को ग्राहकों से सम्पर्क के लिए उचित वेबसाइट का निर्माण करना होता है।

5. दूरसंचार सुविधाएँ – ई – व्यवसाय की सफलता के लिए उचित टेलीफोन लाइनें व इन्टरनेट सुविधाएँ उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।

प्रश्न 3.
ई – व्यवसाय और पारम्परिक व्यवसाय में कोई तीन अन्तर बताइए।
उत्तर:
ई – व्यवसाय एवं पारम्परिक व्यवसाय में अन्तर:
RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 1
प्रश्न 4.
ई – कॉमर्स की कमियों (सीमायें) पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
ई – कॉमर्स की कमियाँ (सीमायें) निम्नलिखित है –

  1. ई – कॉमर्स में अन्तरवैयक्तिक पारस्परिक सम्पर्क की कमी रहती है।
  2. ई – कॉमर्स में कभी – कभी तकनीकी कमी के कारण समय अधिक लगता है।
  3. ई – कॉमर्स के अन्तर्गत ग्राहक जिन वस्तुओं का क्रय कर रहा है, वह उनको स्पर्श नहीं कर सकता है। केवल बेव पर उनका स्पष्ट चित्र एवं विस्तृत वर्णन मिलता है।
  4. इसमें लेन – देन करने वाले व्यक्तियों को कम्प्यूटर तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता होती है।
  5. ई – कॉमर्स के अन्तर्गत सौदे के अनुरूप वस्तु के न होने पर वापस लौटाने पर तनाव उत्पन्न होता है।
  6. ई – कॉमर्स लेन – देन में जोखिम अधिक होते है क्योंकि इसमें दूसरा पक्ष किसी अन्य व्यक्ति के नाम का प्रयोग कर सकता है। इसके अतिरिक्त इन्टरनेट पर वायरस एवं हैकिंग का भी डर बना रहता है।

प्रश्न 5.
इन्टरनेट क्या है? संक्षेप में समझाइये।
उत्तर:
इन्टरनेट जिसे नेट भी कहा जाता है। नेट कम्प्यूटर जाल – तन्त्र की पूरे विश्व में फैली एक ऐसी प्रणाली है जिसके माध्यम से किसी भी एक कम्प्यूटर के प्रयोग द्वारा अन्य कम्प्यूटरों में संग्रहित सूचनायें प्राप्त की जा सकती है। इन्टरनेट का जन्म अमेरिका सरकार के एडवान्सड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेन्सी (ARPA) द्वारा 1969 ई. में एक सेना परियोजना के रूप में हुआ था। उस समय इसे ARPANET कहते थे। फिर इसे शैक्षणिक एवं अनुसंधान के क्षेत्र, आम जनता एवं व्यापारिक प्रयोग में इसका प्रयोग किया जाने लगा। सन् 1979 से इसे इन्टरनेट के नाम से जाना जाने लगा। आज यह वैश्विक नेटवर्क के रूप में विकसित हो गया है।

प्रश्न 6.
बाह्यस्रोतीकरण के लाभ बताइए।
उत्तर:
बाह्यस्रोतीकरण के निम्न लाभ हैं –
1. आन्तरिक कार्यों पर ज्यादा ध्यान – जब कम्पनियाँ कमें महत्वपूर्ण कार्यों को करने का कार्य बाहरी फर्मों को सौंप देती है तो उनके लिए महत्वपूर्ण कार्यों पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करना सम्भव हो जाता है। इससे कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।

2. लागत में कमी – बाह्यस्रोतीकरण से कम लागत में कार्य हो जाता है क्योंकि वे फर्म अनेकों कम्पनियों के कार्यों को करती हैं जिससे उन्हें बड़े पैमाने पर मितव्ययिता का लाभ मिल जाता है।

3. श्रम समस्याओं से मुक्ति – बाह्यस्रोतीकरण से कम्पनी को कम कर्मचारियों की आवश्यकता रह जाती है। इससे श्रम समस्याएँ भी कम हो जाती है।

4. आधुनिक विकास के लाभ – बाह्य सेवा प्रदाता कुशल सेवाएँ प्रदान करता है। इससे कम्पनी को आधुनिक तकनीक का लाभ प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 7.
बाह्यस्रोतीकरण के सरोकार या मुख्य चिंताएँ क्या है?
उत्तर:
बाह्यस्रोतीकरण के सरोकार – बाह्यस्रोतीकरण निम्नलिखित सरोकारों से घिरा हुआ है –
1. गोपनीयता – बाह्यस्रोतीकरण में गोपनीयता अति आवश्यक होती है। अन्यथा सूचना प्रतिस्पर्धी तक पहुँच सकती है तथा बाह्यस्रोतीकरण करने वाली संस्था ही प्रतिस्पर्धी व्यवसाय स्थापित कर सकती है।

2. परिश्रम खरीददारी – बाह्यस्रोतीकरण कराने वाली फर्म ‘चिंतन कौशल’ के स्थान पर कार्य कौशल’ पर बल देती है तथा मानव संसाधनों को कम – से – कम लागत पर कार्य प्रदान करने की कोशिश करती है जिससे बाह्यस्रोतीकरण करने वाले देशों को अधिक लाभ नहीं होता है।

3. नैतिक सरोकार – बाह्यस्रोतीकरण करने वाली फर्मे विभिन्न देशों के कमजोर श्रम कानूनों का लाभ उठाकर बाल – श्रम तथा लिंग – भेद पर आधारित मजदूरी प्रदान कर अनैतिक कार्यों को बढ़ावा देती है।

4. गृह देशों में विरोध – उत्पादन, विपणन, शोध एवं विकास और सूचना प्रौद्योगिकी पर आधारित सेवाओं की संविदाएँ देश से बाहर की जाती है। इसके फलस्वरूप रोजगार एवं नौकरियाँ भी देश से बाहर जाती है जिसके परिणामस्वरूप अपने गृह देश में बेरोजगारी बढ़ती है तथा बाह्यस्रोतीकरण का विरोध प्रारम्भ हो जाता है।

प्रश्न 8.
बाह्यस्रोतीकरण किस प्रकार व्यवसाय की नई पद्धति का प्रतिनिधित्व करता है?
उत्तर:
पारम्परिक व्यवसाय में व्यवसायी सभी कार्यों को स्वयं करता था। इसके परिणामस्वरूप कार्य कुशलतापूर्वक नहीं हो पाता था तथा उत्पादन लागत में भी वृद्धि हो जाती थी। लेकिन बाह्यस्रोतीकरण में व्यवसायी केवल महत्वपूर्ण कार्यों को तो स्वयं पूर्ण करता है तथा ऐसे अन्य कार्य जो कम महत्व के होते हैं, उन्हें ऐसे बाह्य व्यक्तियों या फर्मों से कराता है जो उस कार्य को करने की विशेष दक्षता रखते हैं। इससे विशिष्टता का लाभ तो मिलता ही है साथ ही लागत भी कम आती है। इस प्रकारे बाह्यस्रोतीकरण से उपभोक्ताओं को समय पर सस्ती एवं श्रेष्ठ किस्म की वस्तुएँ एवं सेवाएँ प्राप्त हो जाती है तथा समाज के विभिन्न वर्गों को रोजगार के अवसर भी प्राप्त हो जाते हैं। अत: बाह्यस्रोतीकरण व्यवसाय की एक नई, कुशल एवं गतिमान पद्धति ह

प्रश्न 9.
फ्रेंचाइजी से सम्बन्धित मुख्य – मुख्य बातों को समझाइये।
उत्तर:
फ्रेंचाइजी से सम्बन्धित मुख्य बातें निम्नलिखित हैं –

  1. फ्रेंचाइजी केवल एक अस्थाई व्यापारिक निवेश है, स्वामित्व के प्रयोजन से व्यवसाय को खरीदना नहीं वरन् निश्चित अवधि तक भाड़े या पट्टे पर लेना है।
  2. फ्रेंचाइजी की एक निश्चित अवधि होती है जो प्रायः छोटी अवधि की होती है जिसका नवीनीकरण कराना पड़ता है और विशिष्ट क्षेत्र के लिए और अवस्थिति से विशिष्ट मील की दूरी पर होता है।
  3. फ्रेंचाइजी में राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञापन, प्रशिक्षण और मूर्त व अमूर्त जैसी अन्य समर्थन सेवायें सामान्यत: फ्रेंचाइजर द्वारा उपलब्ध कराये जाते हैं।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ई – कॉमर्स से आप क्या समझते है? इसके विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ई – कॉमर्स:
एक फर्म द्वारा अपने ग्राहकों और पूर्तिकर्ताओं के साथ इन्टरनेट पर सम्पर्क करके लेन – देन करना ही ई – कॉमर्स कहलाता है। यह एक कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी तथा इन्फॉर्मेशन को संगठित रूप है जो व्यापार के मध्य लेन – देन में शामिल होता है। जिनमें EDI (इलेक्ट्रॉनिक्स फण्ड इन्टरचेंज), इलेक्ट्रॉनिक मेसेजिंग, EFT (इलेक्ट्रॉनिक्स फण्ड ट्रान्सफर), EBB (इलेक्ट्रॉनिक बुलेटिन बोर्ड), इलेक्ट्रानिक पब्लिशिंग व डेटाबेस सर्विसेस सम्मिलित है।

ई – कॉमर्स के प्रकार:
ई – कॉमर्स के प्रकार निम्नलिखित है –
1. बिजनेस टू बिजनेस ई – कॉमर्स – ई – कॉमर्स का मूल आशय इलेक्ट्रानिक्स डाटा अन्तर्विनियम तकनीकी का प्रयोग कर व्यावसायिक प्रलेखों का आदान – प्रदान करके फर्म से फर्म के लेन – देन को सुगम बनाना है। इसमें दो व्यापारिक कम्पनियों के बीच वस्तुओं, सेवाओं या सूचनाओं के आदान – प्रदान को बिजनेस ई – कॉमर्स कहते है।

2. बिजनेस टू कस्टमर ई – कॉमर्स – बिजनेस टू कस्टमर लेन – देनों में एक पक्ष व्यावसायिक फर्म होती है तथा दूसरा पक्ष ग्राहक होता है इन दोनों के मिले बिना विक्रय सम्भव नहीं हो सकता है। विक्रय, विपणन प्रक्रिया का परिणाम होता है। विपणन प्रक्रिया माल को विक्रय के लिये प्रस्तुत करने से पहले प्रारम्भ होकर विक्रय के बाद तक चलती है। इस प्रकार फर्म से ग्राहक कॉमर्स में विपणन गतिविधियों, जैसे गतिविधियों को पहचानना, संवर्धन, ऑन लाइन बिक्री आदि को सम्मिलित किया जाता है। ई – कॉमर्स का यह रूप बहुत कम लागत पर सुगमतापूर्वक व्यवसाय के लिये ग्राहकों से सम्पर्क को सम्भव बनाता है। जैसे ATM से धन निकालना, ऑन लाइन सर्वेक्षण करना आदि।

3. उपभोक्ता व्यापार ई – कॉमर्स – उपभोक्ता व्यापार लेन – देन में रिवर्स कस्टमर टू बिजनेस नीलामी सम्मिलित होते है जो उपभोक्ता को लेन – देन अंजाम देने हेतु सशक्त बनाते हैं। जैसे – एअरलाइन्स यात्री को यात्री की सर्वश्रेष्ठ यात्रा तथा टिकट के लिए ऑफर देता है।

4. उपभोक्ता – उपभोक्ता ई – कॉमर्स – उपभोक्ता से उपभोक्ता ई – कॉमर्स ऐसी वस्तुओं के लेन – देन के लिये अधिक उपयुक्त होता है जिनका कोई स्थायी बाजार तन्त्र नहीं होता है। इसके अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति इन्टरनेट पर भावी खरीददार को ढूंढ़ सकता है। अर्थात् इसमें उपभोक्ता के मध्य किसी तीसरी पार्टी के माध्यम से लेन – देन होता है।
OLX.com, e – bay. com प्रमुख उदाहरण हैं।

5. व्यापार सरकार ई – कॉमर्स – इसमें व्यापार सरकार सम्बन्धी क्रियायें शामिल होती है। सामान्यतः इस कार्य को, वेबसाइट की सहायता से करती है। इस वेबसाइट पर कम्पनी अपने उत्पाद व सेवाओं की जानकारी देती है और ग्राहक को इस बात की सुविधा होती है कि वह इस वेबसाइट के माध्यम से ऑर्डर दे सकता है।

6. डिजिटल मिडिलमेन ई – कॉमर्स – डिजीटल मिडिलमेन (बिचौलिये) से आशय जिसमें एक कम्पनी जो इन्टरनेट पर वरचुअल कम्युनिटी या पोर्टल (तीसरे पक्ष) बनाती है और इस कम्युनिटी में व्यापारिक दृष्टि से तीसरी या बहुत सी कम्पनियों को शामिल करती है।

प्रश्न 2.
ई – कॉमर्स के लाभ तथा इसकी कमियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
ई – कॉमर्स के लाभ:
ई – कॉमर्स के लाभ निम्नलिखित है –
1. लागत में कमी – ई – कॉमर्स के माध्यम से व्यवसाय करने पर लागत में कमी आती है क्योंकि इसमें न तो अधिक कर्मचारियों की आवश्यकता पड़ती है और न ही वस्तुओं के संग्रह के लिये गोदामों की आवश्यकता पड़ती है। इसमें तुलनात्मक रूप से विज्ञापन पर आने वाला खर्चा भी कम होता ह

2. उत्तम ग्राहक सेवा – ग्राहकों को तुरन्त एवं उत्तम सेवा ई-कॉमर्स से प्राप्त होती है। कम्पनियाँ अपने ग्राहकों को वेब पोर्टल पर उत्पादों के सम्बन्ध में आधुनिकतम जानकारी प्रदान कर ग्राहकों को आकर्षित करने में सफल हो रही है जिससे ग्राहकों को भी चयन करने में सुविधा मिलने लगी है।

3. समय की बचत – ई – कॉमर्स लेन – देन प्रक्रिया में उत्पादों के लिये वितरण माध्यम कम हो जाते है तथा ग्राहकों से सीधा सम्पर्क किया जा सकता है। इससे कम्पनी बाजार में नये उत्पाद ला सकती है तथा ग्राहकों की प्रतिक्रिया को शीघ्र जान सकती है। इससे सामान्य क्रय – विक्रय के लेन – देन की अपेक्षा कम समय लगता है।

4. विस्तृत पहुँच – ई – कॉमर्स का क्षेत्र राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित न होकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक फैल चुका है जिससे ग्राहकों को नयी – नयी वस्तुओं तथा नये – नये बाजारों के बारे में जानकारी प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

5. बड़ी मात्रा में व्यवसाय – ई – कॉमर्स की सहायता से बड़ी संख्या में विभिन्न प्रकार के ग्राहकों तक पहुँचना आसान होता है तथा नये – नये बाजारों को खोजने में सहायता मिलती है। इससे उनके व्यवसाय की मात्रा में वृद्धि होती है तथा वे और अधिक लाभ कमा सकते हैं।

ई – कॉमर्स की कमियाँ:
ई – कॉमर्स की कमियाँ (सीमायें) निम्नलिखित हैं –

  1. ई – कॉमर्स में अन्तरवैयक्तिक पारस्परिक सम्पर्क की कमी रहती है।
  2. ई – कॉमर्स के लेन – देन में कभी – कभी तकनीकी कमी के कारण समय अधिक लगता है।
  3. ई – कॉमर्स के अन्तर्गत ग्राहक जिन वस्तुओं का क्रय कर रहा है, वह उनको स्पर्श नहीं कर सकता है। केवल वेब साइट पर उनका स्पष्ट चित्र एवं विस्तृत वर्णन मिलता है।
  4. इसमें लेन – देन करने वाले व्यक्तियों को कम्प्यूटर तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता होती है।
  5. ई – कॉमर्स के अन्तर्गत सौदे के अनुरूप वस्तु न होने पर वापस लौटाने पर तनाव उत्पन्न होता है।
  6. ई – कॉमर्स लेन – देन में जोखिम अधिक होते है, क्योंकि इसमें दूसरा पक्ष किसी अन्य व्यक्ति के नाम का प्रयोग कर सकता है इसके अतिरिक्त इन्टरनेट पर वायरस एवं हैकिंग का भी डर बना रहता है।

प्रश्न 3.
व्यवसाय करने की इलेक्ट्रॉनिक पद्धति की सीमाओं का विवेचन कीजिए। क्या यह सीमाएँ इसके कार्यक्षेत्रों को प्रतिबन्धित करने के लिए काफी है? अपने उत्तर के लिए तर्क दीजिए।
उत्तर:
ई – व्यवसाय की सीमाएँ:
ई – व्यवसाय की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं –
1. अल्प मानवीय स्पर्श – यद्यपि ई – व्यवसाय, व्यवसाय का अत्याधुनिक रूप है लेकिन इसमें अन्तरवैयक्तिक पारस्परिक सम्पर्क की गर्माहट का अभाव होता है। जिन उत्पादन श्रेणियों में उच्च वैयक्तिक स्पर्श महत्वपूर्ण होता है, जैसे – वस्त्र, प्रसाधन आदि, उनके लिए यह कम उपयुक्त विधि है।

2. आदेश पूर्ति की गति में असमरूपता – वैसे इन्टरनेट पर कोई भी सूचना माउस को क्लिक करने मात्र से ही प्रवाहित हो सकती है लेकिन उसकी भौतिक रूप से पूर्ति करने में समय लग जाता है तथा कभी – कभी तकनीकी कमी के कारण भी समय अधिक लग जाता है। यह असमरूपता ग्राहक के सब्र पर भारी पड़ सकती है तथा वह अन्य रास्तों से अपनी इच्छा की पूर्ति कर सकता है।

3. कम्प्यूटर तकनीकी के ज्ञान की आवश्यकता – ई – व्यवसाय के लिए दोनों पक्षों को कम्प्यूटर तकनीकी से सम्बन्धित उच्च कोटि के ज्ञान की आवश्यकता होती है। इससे समाज में कम्प्यूटर ज्ञान के आधार पर ही विभाजन हो जाता है।

4. दोनों पक्षों की जोखिम में वृद्धि – ई – व्यवसाय में क्रेता एवं विक्रेता दोनों के जोखिम में वृद्धि हो जाती है क्योंकि इसमें दूसरा पक्ष किसी अन्य व्यक्ति के नाम का प्रयोग कर सकता है। क्रेडिट कार्ड के विवरण से खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसके अतिरिक्त इन्टरनेट पर वायरस एवं हैकिंग का भी डर बना रहता है।

5. जन – प्रतिरोध – कार्य के नये तरीके को अपनाने से जनता के बीच तनाव एवं असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है जिसके परिणामस्वरूप लोग संस्था के ई – व्यवसाय में प्रवेश का विरोध कर सकते है।

6. नैतिक पतन – आजकल कम्पनियाँ अपने कर्मचारियों एवं व्यवसाय से सम्बन्धित अन्य लोगों की कम्प्यूटर फाइलों, ई – मेल खातों की वेबसाइट आदि तक पहुँचने के लिए विशेष सॉफ्टवेयरों, जिन्हें इलेक्ट्रॉनिक (आई) कहा जा सकता है, का प्रयोग करती है, लेकिन नैतिक दृष्टि से ऐसा करना उचित नहीं है।

ई – व्यवसाय की उपरोक्त सीमाओं के होते हुए भी यह दिनों – दिन प्रगति कर रहा है। अधिकतर सीमाओं को धीरे – धीरे नियन्त्रण में किया जा रहा है, जैसे – निम्न मानवीय स्पर्श की समस्या से निजात पाने के लिए वेबसाइट अब ज्यादा जीवंत हो रही है। अंकीय विभाजन से उबरने के भी प्रयत्न हो रहे है। संचार तकनीक एवं इन्टरनेट के द्वारा संचार गति एवं गुणवत्ता में निरन्तर सुधार हो रहा है। अतः स्पष्ट है कि इन सीमाओं से ई-व्यवसाय के कार्यक्षेत्र को प्रतिबन्धित नहीं किया जा सकता है। ई – व्यवसाय आज की आवश्यकता है तथा यह अर्थव्यवस्थाओं को निश्चित रूप से नया आकार प्रदान करेगा और व्यावसायिक गतिविधियों को नई दिशा देगा। इसलिए हमें अपने आपको ई – व्यवसाय से परिचित कराना चाहिए।

प्रश्न 4.
पारम्परिक व्यवसाय एवं ई – व्यवसाय में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पारम्परिक व्यवसाय एवं ई – व्यवसाय में अन्तर
RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 2

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 9 3

प्रश्न 5.
ई – व्यवसाय जोखिम क्या है? इसके विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ई – व्यवसाय जोखिम:
जोखिम से आशय किसी ऐसी सम्भावना से है जिसके द्वारा लेन – देनों के कारण वित्तीय, प्रतिष्ठात्मक या मानसिक हानियाँ हो सकती है। इनके कारण ही ई – लेन – देनों से सुरक्षा एवं बचाव पर ध्यान देना आवश्यक हो जाता है। इन मुद्दों की विवेचना निम्नलिखित तीन शीर्षकों में की जा सकती है –
1. लेन – देन जोखिम – इसमें निम्नलिखित बातों को शामिल किया जा सकता है –
(a) आदेश लेन – देन सम्बन्धी चूक – विक्रेता इससे मना कर सकता है कि उसे कोई आदेश प्राप्त हुआ था, इसी प्रकार क्रेता भी आदेश देकर यह मना कर सकता है कि उसने कोई आदेश दिया है। अतः दोनों ही आदेश के लेन – देन से मना कर सकते हैं। इससे एक – दूसरे को हानि हो सकती है।
(b) सुपुर्दगी की चूक – सुपुर्दगी न हो पाना, सुपुर्दगी गलत पते पर होना, आदेशानुसार सुपुर्दगी न होना, ये सभी सुपुर्दगी सम्बन्धी चूके हैं जिनके कारण दोनों को ही हानि हो सकती है।
(c) भुगतान सम्बन्धी चूक – क्रेता भुगतान होने का दावा करे लेकिन विक्रेता भुगतान प्राप्त होने से मना करे तो यह भुगतान सम्बन्धी चूक कहलायेगी।
उपरोक्त स्थितियों में पंजीकरण के समय पहचान और पते की जाँच करके तथा आदेश स्वीकृति एवं भुगतान वसूली के लिए एक प्राधिकार प्राप्त करके बचा जा सकता है। अर्थात् जोखिम को कम किया जा सकता है।

2. डाटा संग्रहण एवं प्रसारण जोखिम – ई – लेन – देन में कोई भी सूचना वायरस और हैकिंग के माध्यम से किसी तीसरे व्यक्ति तक पहुँच सकती है जिसका वह दुरुपयोग कर सकता है। वायरस एक ऐसा प्रोग्राम (आदेश की एक श्रृंखला) होता है जो अपनी पुनरावृत्ति कम्प्यूटर प्रणाली पर करता रहता है। इसके कारण आपके सन्देश से छेड़छाड़ की जा सकती है। कार्य प्रणाली में बाध्यता उत्पन्न की जा सकती है, डाटा फाइलों को क्षति पहुँचायी जा सकती है, समूची प्रणाली की क्षति हो सकती है। इससे बचाव के लिए एंटी वायरस प्रोग्रामों तथा क्रिष्टोग्राफी (कूटलेखन विधि) का प्रयोग किया जा सकता है।

3. बौद्धिक सम्पदा एवं निजता पर खतरे के जोखिम – इण्टरनेट एक खुला स्थान है। इस पर जो सूचना एक बार दे दी जाती है फिर उसे प्रसारित होने से रोका नहीं जा सकता है। आपके द्वारा दिये गये डाटा अन्य लोगों तक पहुँच जाते है और आपके पास अन्य प्रकार के प्रचार – प्रसार के लिए ई – मेल आना प्रारम्भ हो जाते हैं। अतः नेट पर कोई भी जानकारी सोच समझ कर ही देनी चाहिए।

प्रश्न 6.
ई – व्यवसाये और बाह्यस्रोतीकरण को व्यवसाय की उभरती पद्धतियाँ क्यों कहा जाता है? इन प्रवृत्तियों की बढ़ती महत्ता के लिए उत्तरदायी कारकों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
ई – व्यवसाय एवं बाह्यस्रोतीकरण ये दो प्रवृत्तियाँ मिलकर व्यवसाय को चलाने की वर्तमान एवं भविष्य की विधियों की पुनर्संरचना कर रही है। आज व्यवसायी कागज रहित लेन – देन की ओर निरन्तर बढ़ रहा है तथा अपने विविध कार्यों के लिए बाह्यस्रोतीकरण को अपनाकरे महत्वपूर्ण कार्यों पर ज्यादा ध्यान देने में समर्थ हो गया है। इन दोनों पद्धतियों ने व्यावसायिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है। आज सारा विश्व एक गाँव की तरह है जिससे आप माउस के मात्र एक क्लिक से सम्पर्क साधने में समर्थ है। इन पद्धतियों में निरन्तर विकास हो रहा है। भविष्य में इनसे और सुविधाएँ बढ़ने की पूरी सम्भावना है। इसी कारण इन पद्धतियों को व्यवसांय की उभरती पद्धतियाँ कहा जाता है।
ई – व्यवसाय एवं बाह्यस्रोतीकरण की बढ़ती महत्ता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –
1. प्रतिस्पर्धा का बढ़ता दबाव – वर्तमान समय में बाजार में बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा ने व्यवसायी को अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए उच्च गुणवत्ता की वस्तुएँ कम – से – कम लागत पर निर्माण करने के लिए हर सम्भव प्रयत्न करने को मजबूर किया है। इसी कारण वह व्यवसाय की इन नई तकनीकों अर्थात् ई – व्यवसाय एवं बाह्यस्रोतीकरण को अपनाने के लिए प्रेरित हुआ है जिससे वह कम – से – कम समय में ग्राहकों की माँगों को उच्च गुणवत्ता की वस्तुएँ प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध कराकर पूरी कर सके।

2. विशिष्टीकरण – व्यवसाय के क्षेत्र में नये – नये अनुसन्धान हो रहे है तथा उत्पादन तकनीक में निरन्तर सुधार की प्रक्रिया चल रही है। अतः उत्पादन के क्षेत्र में विशिष्टीकरण का लाभ उठाना अत्यन्त आवश्यक है जिससे उपभोक्ताओं को उच्च गुणवत्ता की वस्तुएँ उपलब्ध कराई जा सकें।

3. अंकीय प्रणाली का प्रादुर्भाव – अंकीय प्रणाली के प्रादुर्भाव ने व्यवसाय की दुनिया को बदल दिया है। कम्प्यूटर के प्रयोग ने व्यवसाय की दुनिया में एक नई क्रान्ति को जन्म दिया है। अब विश्व बहुत छोटा हो गया है। इन्टरनेट की सहायता से विश्व के किसी भी कोने में चंद सेकेंड में सम्पर्क साधा जा सकता है। कम्प्यूटर के आविष्कार ने ही ई – व्यवसाय व बाह्यस्रोतीकरण को जन्म दिया है। आज व्यवसायी इन दो पद्धतियों की सहायता से अपने ग्राहकों की अच्छी सेवा करने में समर्थ है।

4. वैश्विक पहुँच – ई – व्यवसाय एवं बाह्यस्रोतीकरण दोनों ही वैश्वीकरण को बल प्रदान करते है। आज के दौर में इन्टरनेट की सहायता से विक्रेता अपने माल की पहुँच विश्व के किसी भी बाजार में सुनिश्चित कर सकते है। उसी प्रकार क्रेता को भी ई – व्यवसाय के माध्यम से चयन हेतु बड़ी मात्रा में सामग्री उपलब्ध होती है।

5. सुविधापूर्ण – जिस प्रकार बाह्यस्रोतीकरण से व्यावसायिक फर्मों को सुविधा प्राप्त होती है, उसी प्रकार ई – व्यवसाय से ग्राहकों को किसी भी समय, कहीं भी वस्तु की सुलभता का लाभ प्राप्त होता है।

6. उत्पाद की उत्कृष्टता पर बल – बाह्यस्रोतीकरण से उत्पाद की उत्कृष्टता को बल मिलता है क्योंकि उत्पादक जिस मुख्य कार्य को कर सकता है उसे तो वह स्वयं करता है तथा शेष कार्यों के लिए वह अन्य विशेषज्ञ फर्मों की सहायता लेता है जिससे कि उत्पादन कार्य का सर्वश्रेष्ठ निष्पादन हो सके।

7. लागत में कमी – ई – व्यवसाय तथा बाह्यस्रोतीकरण से वस्तु एवं सेवा की उत्पादन लागत में कमी आती है क्योंकि इसमें कार्य विभाजन एवं विशिष्टीकरण के सिद्धान्तों पर बल दिया जाता है।

8. आर्थिक विकास – ई – व्यवसाय एवं बाह्यस्रोतीकरण के कारण उद्यमशीलता एवं रोजगार के साधनों में वृद्धि होती है एवं निर्यात को प्रोत्साहन मिलता है। इसके परिणामस्वरूप जिस देश से बाह्यस्रोतीकरण किया जाता है उसके आर्थिक विकास में सहायता मिलती है।

प्रश्न 7.
बाह्यस्रोतीकरण की अवधारणा को विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
बाह्यस्रोतीकरण की अवधारणा – बाह्यस्रोतीकरण वह वैश्विक घटना है जिसमें तृतीय पक्ष की विशेषज्ञता, अनुभव, निपुणता, कार्यकुशलता और निवेश से लाभान्वित होने के लिए प्रथम पक्ष कुछ द्वितीयक व्यावसायिक गतिविधियों को पूरा करने के लिए तृतीय पक्ष के साथ अनुबन्ध कर लेता है तथा तृतीय पक्ष, प्रथम पक्ष की ओर से द्वितीय पक्ष को आवश्यक व्यावसायिक सेवाएँ प्रदान करता है। इसकी प्रमुख बातें अग्रलिखित हैं –
1. संविदा बाहर प्रदान करना – शाब्दिक रूप से बाह्यस्रोतीकरण से आशय यह है कि जिस कार्य को अभी तक आप स्वयं कर रहे थे उसकी पूर्ति अब बाहर से कराना। जैसे पहले अपने परिसर की सुरक्षा की जिम्मेदारी कम्पनियाँ स्वयं उठाती थीं लेकिन अब वे इसकी पूर्ति सुरक्षा का कार्य करने वाली विशेष एजेन्सियों से कराती हैं तो यह बाह्यस्रोतीकरण कहलायेगा। अत: इनमें बाहरी एजेन्सियों के माध्यम से अपने कुछ कम महत्व के तथा गैर – मुख्य कार्यों को कराना सम्मिलित है।

2. द्वितीयक (गैर – मुख्य) व्यावसायिक गतिविधियों का बाह्यसोतीकरण – सामान्यतया संस्थान अपनी गैर – मुख्य अर्थात् द्वितीयक गतिविधियों के लिए ही बाह्यस्रोतीकरण का सहारा लेते हैं। अर्थात् वे अपनी मुख्य गतिविधि को स्वयं ही संचालित करना चाहते है। जैसे एक विद्यालय में पठन – पाठन का कार्य मुख्य गतिविधि है तथा विद्यालय परिसर में कैन्टीन चलाना, पुस्तकों की दुकान चलाना, वाहन स्टैण्ड की व्यवस्था करना गैर – मुख्य गतिविधियाँ हैं। अतः विद्यालय इन द्वितीयक (गैर – मुख्य) गतिविधियों के संचालन हेतु अन्य एजेन्सियों से सम्पर्क करके पूर्ति कराता है तो यह बाह्यस्रोतीकरण कहलायेगा।

3. प्रक्रियाओं का बाह्यस्रोतीकरण आबद्ध इकाई या तृतीय पक्ष का हो सकता है – बड़े – बड़े बहुराष्ट्रीय निगम जिनमें भर्ती, चयन, प्रशिक्षण, मानव संसाधन सम्बन्धी अन्य कार्य, देनदारों एवं लेनदारों का प्रबन्ध, शिकायत निवारण आदि बहुत से कार्य बड़े स्तर पर होते रहते हैं। वे अपनी सहायक कम्पनियों के लिए तथा तृतीय पक्ष के कार्यों को पूरा करने के लिए किन्हीं ऐसी एजेन्सियों को कार्य सौंप सकते है जिनका मुख्य कार्य वही हो जिसे वह कराना चाहती हैं। जैसे – कुछ कम्पनियाँ केवल भर्ती एवं चयन की कार्य करती हैं तथा वे उसी क्षेत्र की अच्छी जानकारी रखती हैं तो बड़ी – बड़ी कम्पनियाँ अपने यहाँ भर्ती एवं चयन का कार्य इन्हें सौंपकर इनके अनुभव एवं इस क्षेत्र में इनके संसाधनों एवं योग्यताओं का लाभ उठा सकती है तथा कुछ कम्पनियाँ अपने तृतीय पक्ष की शिकायतों आदि के निवारण का कार्य इन्हें सौंप सकती है जिससे उनकी योग्यता का लाभ तृतीय पक्ष को कम लागत पर ही प्राप्त हो जायेगा।

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