RBSE Solutions for Class 11 Business Studies Chapter 2 व्यवसाय की अवधारणा

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Rajasthan Board RBSE Class 11 Business Studies Chapter 2 व्यवसाय की अवधारणा

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 2 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

RBSE Class 11 Business Studies Chapter बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यापार की सहायक क्रियाओं में सम्मिलित नहीं है –
(अ) बैंक
(ब) बीमा
(स) गोदाम
(द) विक्रय परान्त सेवा
उत्तरमाला:
(द) विक्रय परान्त सेवा

प्रश्न 2.
नव प्रवर्तन का क्या अर्थ है?
(अ) नवीन वस्तुओं का उत्पादन
(ब) ग्राहक संतुष्टि
(स) ग्राहक आवश्यकतानुसार उत्पादन
(द) वस्तुओं का अधिकतम विक्रय करना
उत्तरमाला:
(अ) नवीन वस्तुओं का उत्पादन

प्रश्न 3.
ग्राहकों के सृजन में क्या सम्मिलित है?
(अ) ग्राहकों को सुविधाएँ देना
(ब) ग्राहकों को उचित मूल्य पर वस्तुएँ देना
(स) ग्राहकों की संख्या में वृद्धि
(द) ग्रोहकों को संतुष्ट करना
उत्तरमाला:
(स) ग्राहकों की संख्या में वृद्धि

प्रश्न 4.
व्यवसाय के उद्देश्यों में सर्वप्रमुख उद्देश्य होता है –
(अ) लाभ उद्देश्य
(ब) सेवा उद्देश्य
(स) मानवीय उद्देश्य
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तरमाला:
(अ) लाभ उद्देश्य

प्रश्न 5.
निम्न में से एकल व्यापार विशेषता है?
(अ) समझौता
(ब) दो या दो से अधिक व्यक्ति
(स) लाभ का विभाजन
(द) एकल स्वामित्व
उत्तरमाला:
(द) एकल स्वामित्व

प्रश्न 6.
साझेदारी कब अवैध समझी जाती है?
(अ) दो से कम व्यक्ति हो जाने पर
(ब) अवैधानिक उद्देश्य होने पर
(स) व्यवसाय में 50 से अधिक साझेदारों के होने पर
(द) उपरोक्त सभी
उत्तरमाला:
(द) उपरोक्त सभी

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 2 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यवसाय से क्या अर्थ है?
उत्तर:
धनोपार्जन के उद्देश्य से वस्तुओं का उत्पादन, क्रय – विक्रय तथा सेवायें प्रदान करना व्यवसाय कहलाता है।

प्रश्न 2.
एकल व्यापार किसे कहते है?
उत्तर:
एकल व्यापार उस व्यवसाय को कहते है जिसका स्वामित्व, प्रबन्धन एवं नियन्त्रण एक ही व्यक्ति के हाथ में होता है तथा वही लाभ-हानि के लिये उत्तरदायी होता है।

प्रश्न 3.
साझेदारी को समझाइये।
उत्तर:
जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए मिलकर कोई कार्य करते हैं, तो यह साझेदारी कहलाती है।

प्रश्न 4.
साझेदारी संलेख क्या है?
उत्तर:
साझेदारी संलेख साझेदारों के मध्य होने वाला एक लिखित समझौता है जिसमें फर्म का नाम, व्यवसाय की प्रकृति एवं स्थान, लाभ-हानि बाँटने, साझेदारों के कर्त्तव्य व दायित्व, वेतन आदि से सम्बन्धित शर्तों एवं नियमों का उल्लेख होता है।

प्रश्न 5.
दायभाग प्रणाली क्या है?
उत्तर:
इस प्रणाली के अनुसार हिन्दू अविभाजित परिवार व्यवसाय की सम्पत्ति में पुरुष एवं स्त्री दोनों ही सदस्य सह-समांशी (बराबर का स्वामित्व) होते है। यह प्रणाली केवल पश्चिम बंगाल में प्रचलित है।

प्रश्न 6.
सहकारिता क्या है?
उत्तर:
सहकारिता लोगों का स्वैच्छिक संगठन है जो शोषण से बचने तथा आर्थिक हितों से प्रेरित होकर आपसी लाभ के लिये एकत्रित होते है। इसमें “एक सबके लिये और सब एक के लिये के सिद्धान्त का पालन करते हैं।”

प्रश्न 7.
सार्वजनिक उपक्रमों में सरकारी पूँजी का हिस्सा कितने प्रतिशत होता है?
उत्तर:
51% या इससे अधिक होता है।

प्रश्न 8.
सीमित दायित्व साझेदारी कानून कब से लागू हुआ?
उत्तर:
1 अप्रैल, 2009।

प्रश्न 9.
राजस्थान राज्य सहकारी बैंक की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
14 अक्टूबर, 1953।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 2 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यवसाय के प्रकार बताइये।
उत्तर:
1. एकल व्यापार – वह व्यावसायिक संगठन जिसमें एक ही व्यक्ति द्वारा पूँजी लगायी जाती है तथा वही प्रबन्ध एवं लाभ – हानि के लिये जिम्मेदार होता है।

2. हिन्दू परिवार व्यवसाय – इस व्यवसाय में परिवार के सदस्य ही कार्य करते है, परिवार के मुखिया का इंसमें नियन्त्रण रहता है और सभी सदस्य मुखिया के निर्देशानुसार कार्य करते हैं।

3. साझेदारी – व्यावसायिक संगठन का वह प्रारूप जिसमें कम से कम दो सदस्य होते है तथा व्यवसाय के लाभ – हानि को आय में बाँटने के लिये सहमत हुये हैं।

4. संयुक्त पूँजी कम्पनी – इसका निर्माण भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के अनुसार होता है। इसकी एक सार्वमुद्रा होती है।

5. सहकारी संस्थाएँ – इसका निर्माण सहकारी समिति अधिनियम, 1912 के द्वारा होता है तथा उसी के अन्तर्गत इसका पंजीयन किया जाता है।

6. सार्वजनिक उपक्रम/उद्यम – व्यावसायिक स्वामित्व के इस प्रारूप में स्थापित संस्थाओं को स्वामित्व या प्रबन्ध या दोनों राजकीय हाथों में होता है।

प्रश्न 2.
नवे प्रवर्तन क्या है?
उत्तर:
नव प्रवर्तन से आशय नये विचारों का समावेश करने तथा कार्य करने की नयी – नयी विधियों को अपनाने से है। इसके लिये व्यवसायी उत्पाद अथवा सेवा में नव प्रवर्तन ला सकता है या फिर उसकी पूर्ति में निपुणता तथा तत्परता लाकर नव प्रवर्तन ला सकता है। नव प्रवर्तन के द्वारा व्यवसायी नयी – नयी वस्तुओं का निर्माण करके अपने लाभों में वृद्धि कर सकता है और अपने ग्राहकों को भी अधिकतम सन्तुष्टि प्रदान कर सकता है।

प्रश्न 3.
व्यवसाय एक मानवीय क्रिया है। समझाइये।
उत्तर:
व्यवसाय में लगने वाली पूँजी की व्यवस्था व्यवसायी अपने साधनों के साथ – साथ दूसरे लोगों की सहायता से भी करता है तथा व्यवसाय में उत्पादन क्रिया में समाज के लोगों का सहयोग लेना पड़ता है। इस प्रकार व्यवसाय के प्रत्येक स्तर पर व्यवसायी का सम्पर्क समाज के लोगों से अवश्य होता है। व्यवसाय के अन्तर्गत मनुष्य द्वारा सम्पन्न की जाने वाली आर्थिक क्रियाओं को ही सम्मिलित किया जाता है। पशु – पक्षियों और जानवरों द्वारा की गई क्रियाओं को व्यवसाय में सम्मिलित नहीं किया जाता है।

प्रश्न 4.
उपयोगिता का सृजन क्या है?
उत्तर:
जब व्यवसायी द्वारा कच्चे माल से उपभोग योग्य वस्तु का निर्माण करना, किसी वस्तु का स्थान बदलकर उसकी उपयोगिता में वृद्धि करना जिससे ग्राहकों को वस्तु से सन्तुष्टि प्राप्त होती है और वस्तु की माँग में वृद्धि होती है। व्यवसायी निर्मित की जाने वाली वस्तुओं की उपयोगिता का सृजन ही तो करता है। किसी भी उत्पादित वस्तु या सेवा की उपयोगिता उस समय होती है जब वह वस्तु या सेवा उपभोक्ताओं को उनके निर्धारित स्थान पर उपयुक्त समय पर, उसी रूप में जिसमें उसका उपभोग करना है, मूल्य के बदले में उपभोग करने के अधिकार सहित प्रदान की जाये।

प्रश्न 5.
प्रदर्शन द्वारा साझेदार किसे कहते है?
उत्तर:
वह व्यक्ति जो साझेदार न होते हुए भी अपनी पहल, आचरण अथवा व्यवहार से यह प्रदर्शित करता है कि वह किसी फर्म में साझेदार है तो उसे विबंधन या प्रदर्शन द्वारा साझेदार कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति प्रबन्ध में भाग नहीं लेते, और न ही पूँजी लगाते हैं लेकिन फिर भी फर्म के ऋणों के भुगतान हेतु उत्तरदायी होते हैं क्योंकि अन्य पक्षों की नजरों में वे साझेदार होते हैं और इसी आधारे पर फर्म को ऋण प्राप्त होता है, इसीलिए ये ऋण चुकाने हेतु बाध्य होते हैं। यदि वे पूर्व में ही अपनी स्थिति स्पष्ट कर देते हैं तो वे इस बाध्यता से मुक्ति पा सकते हैं।

प्रश्न 6.
साझेदारी कब अवैध हो जाती है?
उत्तर:
निम्न कारणों से साझेदारी अवैध मानी जाती है –

  • व्यवसाय में दो से कम व्यक्ति रह जाने पर तथा साधारण व्यवसाय में 50 से अधिक व्यक्ति होने पर।
  • यदि साझेदारी का उद्देश्य अवैधानिक हो।
  • यदि साझेदारी व्यवसाय सरकारी नीतियों के विरुद्ध हो।
  • यदि किसी शत्रु राष्ट्र के व्यक्ति के साथ व्यवसाय किया है।
  • जब न्यायालय द्वारा फर्म की समाप्ति के आदेश दिये जा चुके हों फिर भी कारोबार जारी रखा जाता है।
  • जब कोई फर्म सार्वजनिक हित के विरुद्ध व्यवसाय कर रही हो।

प्रश्न 7.
साझेदारी की चार विशेषताएँ समझाइये।
उत्तर:
1. स्थापना – साझेदारी की स्थापना भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 के अनुसार कानूनी समझौते द्वारा होती है। इसमें साझेदारों के मध्य सम्बन्धों, लाभ – हानि को बाँटने, संचालन आदि के बारे में स्पष्ट उल्लेख होता है। साझेदारी का गठन लाभ के लिए वैध व्यवसाय हेतु किया जा सकता है न कि धर्मार्थ सेवा या अवैध व्यवसाय हेतु।

2. असीमित दायित्व – फर्म के साझेदारों का दायित्व असीमित होता है। यदि व्यवसाय की सम्पत्तियाँ ऋणों के भुगतान के लिए अपर्याप्त हैं तो साझेदारों की व्यक्तिगत सम्पत्तियों से ऋणों को चुकाया जायेगा। साझेदार ऐसा करने के लिए व्यक्तिगत एवं संयुक्त रूप से उत्तरदायी होंगे।

3. जोखिम वहन करना – व्यवसाय को संचालित करने से उत्पन्न लाभ को साझेदार जिस अनुपात में बाँटते हैं उसी अनुपात में वे हानि को भी बाँटने के लिए उत्तरदायी होते हैं।

4. निर्णय एवं नियन्त्रण – साझेदार आपस में मिलकर दिन – प्रतिदिन के कार्यों के बारे में निर्णय लेते हैं तथा उसी प्रकार नियंत्रण करने के अपने उत्तरदायित्व का भी निर्वहन करते हैं।

प्रश्न 8.
हिन्दू अविभाजित परिवार की चार सीमायें बताइये।
उत्तर:
1. सीमित साधन – सामान्यतया संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय पैतृक सम्पत्ति पर ही आश्रित होता है। अतः इसकी पूँजी सीमित रहती है जिसके परिणामस्वरूप यह अधिक विस्तार नहीं कर पाता है।

2. कर्ता का असीमित दायित्व – कर्ता का दायित्व असीमित होता है, आवश्यकता होने पर व्यवसाय के ऋणों के लिए उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति को प्रयोग किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप वह अधिक जोखिम भरे कदम नहीं उठाता चाहे उनमें भविष्य में लाभ की अपार सम्भावना ही क्यों न हो।

3. कर्ता का प्रभुत्व – कर्ता अकेला ही निर्णय लेने के लिए स्वतन्त्र होता है। इसमें अन्य सदस्यों की सहमति नहीं ली जाती है। यदि अन्य सदस्य असहमत होते हैं तो टकराव होने के परिणामस्वरूप पारिवारिक इकाई के भंग होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है।

4. सीमित प्रबन्ध कौशल – कोई भी एक व्यक्ति सभी क्षेत्रों का विशेषज्ञ नहीं हो सकता है। अत: व्यवसाय के कर्ता द्वारा लिया गया कोई भी गलत निर्णय व्यवसाय के लिए घातक हो सकता है। उसका परिणाम व्यवसाय को हानि के रूप में भी उठाना पड़ सकता है।

प्रश्न 9.
साझेदारी संलेख के अभाव में लागू होने वाली शर्ने बताइये।
उत्तर:
साझेदारी संलेख के अभाव में निम्न बातें लागू होती हैं –

  • पूँजी पर किसी भी प्रकार का ब्याज नहीं दिया जायेगा।
  • साझेदारी लाभ – हानि समान अनुपात में बाँटे जायेंगे।
  • आहरण पर ब्याज नहीं लिया जायेगा।
  • प्रत्येक सदस्य को फर्म के व्यवसाय में सक्रिय भाग लेने का अधिकार होगा।
  • पूँजी के अतिरिक्त ऋण देने पर साझेदार को 6% वार्षिक ब्याज की दर से ब्याज दिया जायेगा।
  • साझेदारों को वेतन, बोनस व कमीशन देय नहीं होगा।

प्रश्न 10.
प्राथमिक कृषि साख समितियों के कार्य बताइये।
उत्तर:
प्राथमिक कृषि साख समितियों के कार्य निम्नलिखित हैं –

  • अपने क्षेत्र के किसानों, दस्तकारों वे कृषि श्रमिकों एवं अन्य कमजोर वर्ग के लोगों को ऋण प्रदान करना।
  • किसानों को खाद, बीज, कीटनाशक दवाओं एवं कृषि यन्त्रों की पूर्ति में सहायता करना।
  • ग्रामीण जनता में बचत की भावना जाग्रत करना।
  • उन्नत कृषि विकास में सहयोगी बनना।
  • उपभोक्ता वस्तुओं को उचित मूल्यों पर उपलब्ध करवाने में सहायता प्रदान करना।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 2 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यवसाय से आपको क्या आशय है? व्यवसाय की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
व्यवसाय का आशय:
व्यवसाय से आशय उन मानवीय आर्थिक क्रियाओं से है जो वस्तुओं एवं सेवाओं के वितरण के माध्यम से समाज की आवश्यकताओं को पूरा करते हुये लाभ प्राप्त करने के उददेश्य से की जाती हैं। जैसे – व्यापारी द्वारा दुकान पर माल बेचना, कारखाना मालिक द्वारा कारखाने में उत्पादन कार्य करना आदि।

व्यवसाय की विशेषताएँ:
व्यवसाय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. व्यवसाय एक आर्थिक क्रिया – व्यवसाय का प्रमुख उद्देश्य लाभ कमाना होता है। कोई भी व्यक्ति प्यार, सहानुभूति या भावुकता आदि के कारण व्यवसाय नहीं करता है। अतः यह एक आर्थिक क्रिया है।

2. वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन या क्रय करना – व्यावसायिक इकाइयाँ उपभोक्ताओं को प्रयोग हेतु उपलब्ध कराने के लिए या तो वस्तुओं का उत्पादन करती हैं या फिर उन्हें उत्पादकों से प्राप्त करती हैं। ये वस्तुएँ उपभोक्ता वस्तुएँ हो सकती हैं या फिर पूँजीगत वस्तुएँ।

3. वस्तुओं या सेवाओं का विक्रय अथवा विनिमय – व्यवसाय के अन्तर्गत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं या सेवाओं का विक्रय या विनिमय किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपने वे अपने परिवार के प्रयोग के लिए किसी वस्तु या सेवा का उत्पादन करता है तो वह व्यवसाय नहीं कहलायेगा।

4. वस्तुओं और सेवाओं के विनिमय का नियमित होना – एक – दो बार वस्तु या सेवा का क्रय-विक्रय करनी व्यवसाय नहीं कहलाता है। व्यवसाय के लिए नियमित रूप से क्रय – विक्रय या विनिमय किया जाना आवश्यक है। अपने घरेलू उपभोग की किसी वस्तु को लाभ पर बेचना व्यवसाये नहीं कहलायेगा।

5. लाभार्जन – प्रत्येक व्यावसायिक क्रिया का प्रमुख उद्देश्य लाभ कमाना होता है। व्यवसायी इस लाभ को उत्तरोत्तर बढ़ते हुए देखना चाहता है। अत: वह अपने विक्रय में वृद्धि तथा लागत में कमी लाने हेतु प्रयासरत् रहता है।

6. प्रतिफल का अनिश्चित होना – प्रतिफल की अनिश्चितता से आशय व्यवसाय के संचालन से एक निश्चित समय में होने वाले लाभ की अस्थिरता से है। व्यवसायी व्यवसाय में लाभ कमाने हेतु पूँजी लगाता है फिर भी वह यह निश्चय नहीं कर पाता कि उसे एक निश्चित समय पश्चात् कितना लाभ होगा? कभी – कभी तो उसे लगातार प्रयासों के बावजूद हानि ही प्राप्त होती है।

7. जोखिम के तत्व – जोखिम एक ऐसी अनिश्चितता है जो व्यावसायिक हानि की ओर इंगित करती है। जोखिम कुछ प्रतिकूल एवं अवांछित घटनाओं का परिणाम होता है। जोखिम सभी व्यवसायों के साथ जुड़ा होता है, इसे व्यवसाय से अलग नहीं किया जा सकता है। जोखिम के प्रमुख कारणों में फैशन में परिवर्तन, हड़ताल, तालाबन्दी, आग, चोरी, प्राकृतिक आपदा आदि को सम्मिलित किया जाता है।

8. साहस का तत्व – कोई भी व्यवसाय प्रारम्भ तभी हो सकता है जब उसे प्रारम्भ करने वाले में उस व्यवसाय से उत्पन्न जोखिम को वहन करने का साहस हो। अत: साहस के बिना कोई भी व्यवसाय प्रारम्भ नहीं हो सकता है। इसीलिए व्यवसायी को साहसी भी कहा जाता है।

9. उपभोक्ता सन्तुष्टि – व्यवसाय की सफलता ग्राहकों की सन्तुष्टि पर निर्भर करती है। अत: प्रत्येक व्यावसायिक इकाई अपने ग्राहकों को पूर्ण संतुष्टि प्रदान करने हेतु प्रयासरत् रहती है।

10. सेवाभाव – लाभार्जन के साथ – साथ व्यवसाय का उद्देश्य समाज की सेवा करना भी होता है। अतः आजकल सभी व्यवसाय विक्रय के पश्चात् भी बेहतर सेवा प्रदान करने का प्रयास करते हैं।

प्रश्न 2.
व्यवसाय के महत्व को स्पष्ट रूप से समझाइये।
उत्तर:
व्यवसाय का महत्व:
वर्तमान में व्यवसाय किसी भी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति का सूचक है। व्यवसाय समाज के जीवन स्तर में वृद्धि करता है तथा प्राकृतिक एवं मानवीय साधनों के अधिकतम उपयोग में वृद्धि करता हैं।
व्यवसाय के महत्व का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है –
1. प्राकृतिक साधनों का अधिकतम उपयोग – भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में पाये जाते है, उनका सही प्रयोग व्यवसाय के द्वारा ही संम्भव है। प्राकृतिक संसाधनों में वन, खनिज, पानी आदि सम्मिलित होते हैं।

2. रोजगार के साधनों में वृद्धि – भारत में जिस गति से जनसंख्या वृद्धि हो रही है, उस गति से रोजगार के साधनों में वृद्धि व्यवसाय के द्वारा ही सम्भव है। देश में उपलब्ध मानवीय संसाधनों का अधिकतम प्रयोग व्यवसाय के द्वारा ही सम्भव हो सकता हैं।

3. समाज के जीवन स्तर में वृद्धि – जिस देश में व्यावसायिक विकास हो गया है वहाँ रोजगार के साधनों में भी वृद्धि हुई है, जिसके फलस्वरूप वहाँ की राष्ट्रीय एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होने से समाज के लोगों के खान – पान, रहन – सहन आदि में विकास हुआ है।

4. सांस्कृतिक विकास में सहायक – आज व्यवसाय का कार्यक्षेत्र अपने देश की सीमा तक सीमित न होकर अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है। विभिन्न व्यावसायिक गतिविधियों की पूर्ति हेतु व्यावसायियों को अन्य देशों में जाना – आना रहता है जिससे वहाँ की खान – पान, रहन – सहन आदि के बारे में जानकारी होती रहती है, साथ ही विचारों को आदान – प्रदान भी सुगमता से होता रहता हैं।

5. उत्पादन में विशिष्टीकरण – वर्तमान में प्रतिस्पर्धा के बीच टिकने के लिए न्यूनतम लागत पर अच्छी किस्म की वस्तु या सेवा उपलब्ध कराना जिससे ग्राहक की सन्तुष्टि हो सके, यह बहुत ही आवश्यक हो गया है इसलिए विभिन्न व्यावसायिक संस्थाओं में श्रम का विशिष्टीकरण, उत्पादन की सामग्री का विशिष्टीकरण किया जाता है।

6. नवीन वस्तुओं के निर्माण में सहायक – जैसे – जैसे मनुष्य का विकास हो रहा है वैसे ही मनुष्य की आवश्यकताएँ सीमित न रहकर बढ़ती जा रही है और वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रति दृष्टिकोण भी बदलता जा रहा है। उसी सोच को ध्यान में रखकर विभिन्न व्यावसायिक संस्थाएँ नई – नई वस्तुओं एवं सेवाओं की खोज कर तथा उनका निर्माण कर जन – साधारण के मध्य पहुँचाती है।

7. शैक्षिक विकास में सहायक – व्यावसायिक प्रगति के साथ – साथ कुछ जटिलता भी आती है और इन जटिलताओं के समाधान के लिए प्रबन्धन, लेखांकन, बीमा तथा कानून के विषय विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रम में जोड़े गये हैं जिससे व्यावसायिक कुशलता में वृद्धि के साथ – साथ शैक्षिक विकास भी हो रहा है।

8. राष्ट्र के आर्थिक विकास को मापदण्ड – किसी देश के आर्थिक विकास की पहचान वहाँ के औद्योगिक विकास से हो जाती है। जिस देश में व्यवसाय जितना अधिक विकसित होगा वह देश उतना ही समृद्धशाली होगा। भारत एक कृषि प्रधान देश है यहाँ का औद्योगिक विकास अभी विकासशील अवस्था में है, लेकिन जापान जो कि परमाणुओं की मार से बहुत प्रभावित हो गया था, लेकिन व्यावसायिक विकास के कारण ही आज वह विकसित है।

प्रश्न 3.
व्यवसाय के उद्देश्य क्या – क्या होते हैं? विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
व्यवसाय के उद्देश्य:
व्यवसाय की उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि उसके उद्देश्य प्रत्येक क्षेत्र में विशिष्ट तथा व्यवसाय के अनुरूप होने चाहिए। यदि किसी व्यवसाय की आवश्यकता और लक्ष्यों के मध्य सन्तुलने। बनाए रखना है, तो वह किसी एकमात्र लक्ष्य को लेकर सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है। उसे बहुभुजी उद्देश्यों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना होगा। व्यवसाय का उद्देश्य केवल लाभ कमाना ही नहीं है, अपितु कर्मचारियों, ग्राहकों एवं समाज के अन्य वर्गों के हितों की रक्षा करना भी होता है, क्योंकि ये सब व्यवसाय से प्रभावित होते हैं और व्यवसाय की सफलता इन सभी वर्गों के सहयोग पर निर्भर करती है।

व्यवसाय के उद्देश्य प्रत्येक क्षेत्र में विशिष्ट तथा व्यवसाय के अनुरूप ही होने चाहिए जिसका हम निम्न प्रकार से प्रयोग कर सकते हैं –
1. आर्थिक उद्देश्य – प्रत्येक व्यवसायी का व्यवसाय करने का जो मुख्य उद्देश्य होता है वह है लाभ कमाना। जब व्यवसाय में लाभ होगा तभी वह उपलब्ध संसाधनों का समुचित विकास एवं विस्तार कर सकेगा और भविष्य में जोखिम एवं अनिश्चितताओं से अपनी सुरक्षा कर सकेगा। कोई भी व्यवसाय स्वयं नहीं चल सकता भले ही वह संवेग की दशा में क्यों न हो, इसके लिए उसे धन की आवश्यकता होती है और वह धन व्यावसायिक लाभ पर निर्भर करता है।
आर्थिक दृष्टि से व्यवसायी के तीन उद्देश्य होते हैं –

  • लाभ प्रयोजन
  • नव प्रवर्तन
  • ग्राहकों का सृजन

2. सामाजिक उद्देश्य – सामान्यतया व्यवसाय की स्थापना लाभ कमाने के लिए की जाती है लेकिन यह व्यवसाय का एकमात्र उद्देश्य नहीं है क्योंकि एक व्यवसाय द्वारा केवल अपने लाभ पर ध्यान देना तथा अन्य उद्देश्यों को भुला देना उसके भविष्य के लिए हानिकारक होता है तथा ऐसा करने से समाज उस व्यावसायिक इकाई के विरोध में खड़ा हो सकता है तथा उसका व्यवसाय ठप्प होने से हानि हो सकती है। अत: व्यवसाय का उद्देश्य लाभ अर्जित करने के साथ – साथ समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना भी होना चाहिए। यदि कोई व्यवसायी समाज की अपेक्षाओं के विरुद्ध कार्य करता है तो ऐसी स्थिति में वह व्यवसाय अधिक समय तक अपना अस्तित्व नहीं बनाए रख सकता है। व्यवसायी को समाज एवं समाज कल्याण के लिए भी कार्य करना चाहिए। आज के ‘क्रेता बाजार में जहाँ क्रेता, बाजार का राजा है इसलिए सामाजिक उद्देश्यों का महत्व और भी अधिक हो गया है।

व्यवसाय के प्रमुख सामाजिक उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  • देश में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रयोग करना।
  • व्यवसाय में कमाई जाने वाली आय का कुछ भाग समाज कल्याण एवं विकास कार्यों में लगाना।
  • उपभोक्ताओं के सभी वर्गों हेतु पर्याप्त माल उपलब्ध कराना।
  • व्यवसायियों द्वारा ग्राहकों से उचित मूल्य ही प्राप्त करना।
  • समाज की आवश्यकता एवं अभिरुचियों के अनुसार वस्तुओं का निर्माण करना।

3. मानवीय उद्देश्य – कोई भी व्यवसाय उत्पादन के साधनों (श्रम, पूँजी, भूमि, संगठन, साहसी) से भले ही सम्पन्न हो लेकिन व्यवसाय के कुशल संचालन के लिए व्यवसाय में कार्य करने वाले समस्त कर्मचारियों का संतुष्ट होना अत्यन्त आवश्यक है। व्यवसाय में लगने वाली पूँजी की व्यवस्था भी व्यवसायी अपने साधनों से न करके दूसरे लोगों की सहायता से करता है। इस प्रकार व्यवसाय के प्रत्येक स्तर पर व्यवसायी को सम्पर्क समाज के अन्य लोगों से अवश्य होता है।

व्यवसाय के प्रमुख मानवीय उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  • कर्मचारियों एवं श्रमिकों के साथ मानवीय व्यवहार करना।
  • श्रमिकों एवं कर्मचारियों की शिक्षा, चिकित्सा, आवास आदि की पूरी व्यवस्था करना।
  • कर्मचारियों को समय पर उसकी कार्य कुशलता के आधार पर वेतन एवं मजदूरी प्रदान करना।
  • विनियोक्ताओं को उनके द्वारा लगाए धन पर उचित प्रतिफल देना।
  • उपभोक्ताओं हेतु अच्छी किस्म की वस्तु, कम मूल्य पर उपलब्ध कराना।

प्रश्न 4.
व्यवसाय के आर्थिक उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से समझाइये।
उत्तर:
व्यवसाय के आर्थिक उद्देश्य:
प्रत्येक व्यवसायी का व्यवसाय करने का जो मुख्य उद्देश्य होता है वह है लाभ कमाना। जब व्यवसाय में लाभ होगा तभी वह उपलब्ध संसाधनों का समुचित विकास एवं विस्तार कर सकेगा और भविष्य में जोखिम एवं अनिश्चितताओं से अपनी सुरक्षा कर सकेगा। कोई भी व्यवसाय स्वयं नहीं चल सकता भले ही वह संवेग की दशा में क्यों न हो, इसके लिए उसे धन की आवश्यकता होती है और वह धन व्यावसायिक लाभ पर निर्भर करता है।
आर्थिक दृष्टि से व्यवसायी के तीन उद्देश्य होते हैं –

  1. लाभ प्रयोजन
  2. नव प्रवर्तन
  3. ग्राहकों को सृजन

1. लाभ प्रयोजन – प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए धन कमाने के उद्देश्य से ही छोटा या बड़ा कारोबार खोलता है। वह व्यवसाय के समस्त साधनों का समन्वय स्थापित करके न्यूनतम लागत पर श्रेष्ठ वस्तु या सेवाओं का उत्पादन करने का समुचित प्रयास करता है कि उसे अधिकाधिक लाभ हो जिससे स्वयं को अधिक लाभाअर्जन हो सके, व्यवसाय में लगे समस्त कर्मचारियों को सन्तुष्ट करने के अलावा भविष्य में होने वाली हानियों से बचा जा सके।

व्यवसाय में लाभ कमाना निम्न कारणों से आवश्यक हो जाता है –

  • व्यक्ति की अपनी भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए।
  • भविष्य में होने वाली घटनाओं एवं अनिश्चितताओं से सुरक्षित करने के लिए।
  • व्यवसाय में अधिक लाभ कमाना ही व्यक्ति की सफलता का आधार माना जाता है।
  • व्यवसाय का विकास एवं विस्तार लाभ पर ही निर्भर करता है।
  • संसाधनों का समुचित एवं सर्वोत्तम उपयोग करके उत्पादकता में वृद्धि करने के लिए।

2. नव प्रवर्तन – नव प्रवर्तन से आशय कार्य को नई विधि से करने तथा उसमें नये विचारों का समावेश करने से है। व्यवसाय में नव प्रवर्तन दो प्रकार से किया जा सकता है। एक उत्पाद अथवा सेवा में नव प्रवर्तन तथा दूसरा उनकी पूर्ति में नव प्रवर्तन। कोई भी व्यवसाय आधुनिक प्रतियोगिता के युग में बिना नव प्रवर्तन के सफल नहीं हो सकता है। व्यवसायी को अपने द्वारा उत्पादित वस्तु या सेवा में उपभोक्ताओं की रुचि एवं सामाजिक परिवर्तन के अनुसार नव प्रवर्तन अवश्य करना चाहिए जिससे । उपभोक्ताओं को अधिकतम सन्तुष्ट किया जा सके।

3. ग्राहकों का सृजन करना – व्यवसाय में उत्पादन करना सरल है लेकिन वर्तमान में बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा के मध्य अपनी वस्तु या सेवाओं की उपयोगिता बनाए रखना कठिन कार्य है। जब वस्तु या सेवा अच्छी होगी तो ग्राहक भी जुड़े रहेंगे और बिक्री में निरन्तर वृद्धि होगी। व्यवसाय में ग्राहकों की संख्या में वृद्धि करके बिक्री की मात्रा में वृद्धि द्वारा लाभों को अधिकतम करने का प्रयास किया जा सकता है। पीटर एफ. डुकर के अनुसार, “व्यावसायिक उद्देश्य की केवल एक ही वैध परिभाषा है ग्राहकों का सृजन करना।” .

प्रश्न 5.
एकल व्यापार की उपादेयता बताइये।
उत्तर:
एकल व्यापार की उपादेयता (महत्व) निम्नलिखित हैं –
1. शीघ्र निर्णय – एकल स्वामित्व में व्यवसाय का स्वामी किसी से सलाह लेने हेतु बाध्य नहीं होता है। इसलिए जब उसे कोई लाभ का अवसर प्राप्त होता है तो वह तुरन्त निर्णय लेकर उसका लाभ उठाता है।

2. गोपनीयता – एकल स्वामी निर्णय के सभी अधिकारों को स्वयं में ही रखता है। अतः स्वयं निर्णायक होने के कारण व्यापार संचालन से सम्बन्धित सभी सूचनाएँ गोपनीय बनी रहती हैं। उसे अपने लेखों को प्रकाशित करने की बाध्यता नहीं होती है।

3. प्रत्यक्ष प्रोत्साहन – एकल स्वामी अपने द्वारा किये गये कठिन परिश्रम के परिणामस्वरूप प्राप्त लाभ का अकेला ही स्वामी होता है इसलिए वह और भी अधिक परिश्रम करने के लिए प्रेरित होता है।

4. उपलब्धि का अहसास – जब एकल स्वामी अपने व्यवसाय से लाभ प्राप्त करता है तो उसे व्यवसाय की सफलता पर गर्व होता है तथा वह सोचता है कि यह उसके द्वारा किये गये कार्य का परिणाम है। इससे उसे आत्म संतोष प्राप्त होता है तथा अपनी योग्यता एवं आस्था पर विश्वास पैदा होता है।

5. व्यवसाय प्रारम्भ एवं समापन करने में आसानी – एकल स्वामित्व का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इसमें व्यवसाय प्रारम्भ करने तथा उसे बन्द करते समय न्यूनतम वैधानिक औपचारिकताओं की आवश्यकता होती है। इनके नियमन हेतु अलग से कोई कानून नहीं है।

6. पूर्ण नियन्त्रण – एकल स्वामित्व में एकल व्यापारी का व्यापार पर पूर्ण नियन्त्रण रहता है। इसमें जो व्यक्ति पूँजी लगाता है वही जोखिम भी वहन करता है। एकल व्यापार के कार्य में कोई हस्तक्षेप करने वाला नहीं होता है। इससे उसका कार्य सुचारू रूप से संचालित होता रहता है।

7. मितव्ययिता – एकल व्यापारी अपने व्यापार का संचालन स्वयं करता है। वह सभी संसाधनों का अधिकतम प्रयोग तथा अपने खर्चे पर पूर्ण नियन्त्रण करके सम्पूर्ण व्ययों में कमी लाने का प्रयास करता है।

8. सतर्कता – एकल व्यापारी हमेशा अपने सभी कार्यों में सतर्कता बरतता है क्योंकि उसे पता होता है कि यदि वह लापरवाही से कार्य करेगा तो उसकी हानि भी उसको वहन करनी पड़ेगी।

9. व्यक्तिगत सम्पर्क – एकाकी व्यापारी अपने व्यवहार से सभी ग्राहकों को सदा प्रसन्न रखने का प्रयास करता है इसलिए वह अपने व्यवहार को नम्र एवं व्यवहार कुशल बनाने का हर सम्भव प्रयास करता है। साथ ही एकल व्यापारी ग्राहकों से सीधे सम्पर्क में रहने के कारण उनकी रुचि एवं माँग को जानकर उसे पूरा करने का प्रयास करता है।

10. पैतृक ख्याति का लाभ – यदि व्यवसायी पैतृक व्यवसाय को ही कर रहा है तो उसे उसकी पूर्व में बनी ख्याति का भी लाभ प्राप्त होता है। इसके परिणामस्वरूप वह अपने व्यवसाय को तेजी से आगे बढ़ा सकता है।

11. कर्मचारियों से मधुर सम्बन्ध – एकल व्यापारी अपने कर्मचारियों के साथ व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क में बना रहता है तथा उनके सुख – दुख में शामिल रहता है। इससे वे पूर्ण लगन के साथ कार्य करते हैं तथा संतुष्ट रहते हैं।

12. व्यवसाय की स्वतन्त्रता – एकाकी व्यापारी अपने व्यवसाय के बारे में पूर्ण स्वतन्त्रता के साथ निर्णय ले सकता है वह व्यवसाय के चयन, प्रारम्भ तथा बन्द करने तथा समय के साथ उसमें परिवर्तन करने के लिए स्वतन्त्र होता है।

प्रश्न 6.
एकल व्यापार की परिभाषा दीजिए तथा इसकी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
एकल व्यापार:
एकल स्वामित्व उस व्यवस्था को कहते हैं जिसका स्वामित्व, प्रबंधन एवं नियन्त्रण एक ही व्यक्ति के हाथ में होता है तथा वही लाभ प्राप्त करता है तथा हानि को भी वहन करता है जैसे – ब्यूटी पार्लर, परचून की दुकान, हलवाई की दुकान आदि।

जे.एल. हेन्सन के अनुसार, “एकल व्यापार व्यवसाय एक ऐसी व्यावसायिक इकाई है जिसमें एक ही व्यक्ति पूँजी लगाता है, उद्यम का जोखिम उठाता है एवं प्रबन्धन करता है।”

एल. एच. हैने के अनुसार, “एकल स्वामित्व व्यवसाय संगठन का वह स्वरूप है जिसका मुखिया एक ऐसा व्यक्ति है जो उत्तरदायित्व लिए हुए है जो परिचालन का निदेशन करता है एवं जो हानि का जोखिम उठाता है।”

एकल व्यापार की विशेषताएँ:
एकल व्यापार की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. व्यवसाय का प्रारम्भ एवं समापन – एकल स्वामित्व के नियमन के लिए अलग से कोई कानून नहीं है। अत: कुछ व्यवसायों हेतु लाइसेन्स की अनिवार्यता को छोड़कर इस प्रकार के व्यवसायों के प्रारम्भ हेतु किसी कानूनी औपचारिकता को पूरा नहीं करना पड़ता है। इसके समापन पर भी किसी औपचारिकता की आवश्यकता नहीं होती है। इस प्रकार के व्यवसाय को केवल व्यक्तिगत निर्णय के आधार पर ही प्रारम्भ एवं समाप्त किया जा सकता है।

2. असीमित दायित्व – एकल व्यवसाय के स्वामी का दायित्व असीमित होता है। इसका आशय यह है कि यदि व्यवसाय को किसी प्रकार का घाटा हो जाता है या वह ऋण का भुगतान करने में असमर्थ रहता है तो व्यवसायी की निजी सम्पत्ति से भी व्यवसाय के ऋणों का भुगतान किया जा सकेगा। अर्थात् व्यवसायी को व्यवसाय के दायित्वों को चुकाने हेतु उसे अपनी निजी सम्पत्ति भी बेचनी पड़ सकती है।

3. लाभ – हानि प्राप्त करना – एकल व्यवसायी अकेले ही व्यवसाय को होने वाली हानि के वहन करने तथा व्यवसाय के सफल होने पर लाभ प्राप्त करने का हकदार होता है। वह अपनी हानि यो लाभ का बँटवारा नहीं करता है। अत: उसके द्वारा उठाए गए जोखिम का पूरा लाभ उसी को प्राप्त होता है।

4. नियंत्रण – व्यवसाय के बारे में सभी प्रकार के निर्णय लेने एवं उसे संचालित करने का पूरा कार्य एकल . व्यवसायी द्वारा ही किया जाता है। अतः सम्पूर्ण व्यवसाय पर एकमात्र उसी का नियंत्रण होता है।

5. स्वतंत्र अस्तित्व न होना – कानून की दृष्टि में एकल व्यवसायी तथा व्यापार को अलग – अलग नहीं माना जाता है। यह माना जाता है कि एकल व्यवसाय का व्यवसायी से अलग कोई अस्तित्व नहीं है। इसलिए व्यवसाय के सभी कार्यों के लिए व्यवसायी को ही उत्तरदायी माना जाता है।

6. व्यावसायिक निरंतरता का अभाव – क्योंकि व्यवसाय एवं उसके स्वामी का अस्तित्व अलग नहीं होता है इसलिए यह माना जाता है कि व्यवसायी की मृत्यु होने, पागल होने, दिवालिया होने पर व्यवसाय भी समाप्त हो जायेगा, तब उसके जेल में बंद होने, बीमार होने या अन्य किसी कारण कार्य न करने का प्रभाव व्यवसायी को हानि के रूप में झेलना पड़ेगा।

प्रश्न 7.
साझेदारी क्या है? इसके लाभ – दोष बताइये।
उत्तर:
साधारणत: जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए मिलकर कोई कार्य करते हैं, तो यह साझेदारी कहलाती है। अन्य शब्दों में जब दो या दो से अधिक व्यक्ति मिलकर पारस्परिक लाभ कमाने के उद्देश्य से किसी निश्चित व्यापारिक समझौते के अनुसार किसी वैध व्यापार में अपनी योग्यता, श्रम या पूँजी लगाने को सहमत होते हैं, तो यह उनके बीच स्थापित साझेदारी ही कही जाती है। इसमें सम्मिलित सभी व्यक्ति साझेदार कंहलाते हैं तथा इसका सामूहिक रूप फर्म कहलाती है।

साझेदारी के लाभ:
साझेदारी के लाभ निम्न प्रकार हैं –
1. स्थापना एवं समापन में सरलता – साझेदारी व्यवसाय की स्थापना एवं समापन सभी साझेदारों की सहमति से आसानी से किया जा सकता है। साझेदारी का पंजीयन कराना भी अनिवार्य नहीं होता है।

2. संतुलित निर्णय – साझेदार जिस क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं उसी कार्य को करते हैं। जिससे निर्णय लेने में आसानी होती है तथा विशेषज्ञता का लाभ भी प्राप्त होता है।

3. जोखिम बाँटना – जोखिम को सभी साझेदारों में पूर्व निश्चित अनुपात में बाँटा जाता है। इससे किसी अकेले साझेदार पर जोखिम को सहन करने का बोझ नहीं पड़ता है।

4. गोपनीयता – एक साझेदारी फर्म को अपने खातों की जानकारी प्रकाशित करना या ब्यौरा देना कानूनी रूप से आवश्यक नहीं है। अतः साझेदारी में सूचनाएँ गुप्त रखी जा सकती हैं।

5. व्यक्तिगत देख – रेख – साझेदारी में प्रबन्ध के सारे कार्य स्वयं साझेदार ही करते हैं इससे सभी कर्मचारियों पर उनका सीधा नियन्त्रण बना रहता है।

6. लोचपूर्ण प्रकृति – व्यवसाय संगठन का यह प्रकार लोचपूर्ण होता है क्योंकि आवश्यकता पड़ने पर साझेदार अधिक पूँजी लाकर व्यवसाय में लगा सकते हैं तथा व्यवसाय के आकार या स्थान परिवर्तन के लिए उन्हें किसी से अनुमति लेने की आवश्यकता भी नहीं होती है।

7. विशिष्टीकरण के लाभ – एक व्यक्ति सभी विषयों का ज्ञानी नहीं हो सकता है। अतः जब विविध क्षेत्रों के कार्यकुशल लोग एक साथ मिलकर व्यवहार करते हैं तो इससे व्यवसाय प्रगति करता है।

8. कार्यकुशलता में वृद्धि – सभी साझेदार पूर्ण मनोयोग से मिलकर कार्य करते हैं तथा सभी कार्यों को अपना कार्य समझते हैं। इसके परिणामस्वरूप कर्मचारी भी शिथिलता नहीं दिखा पाते हैं तथा उनकी कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।

9. संचालन में सुविधा – एकाकी व्यापार की अपेक्षा साझेदारी संगठन के द्वारा व्यवसाय संचालन में आसानी रहती है तथा निरन्तरता बनी रहती है। जब कोई एक साझेदार अस्वस्थ होता है या अन्य कारण से कार्य नहीं कर पाता है। तो उसके कार्य को दूसरा साझेदार कर लेता है। इस प्रकार व्यवसाय संचालन में बाधा उत्पन्न नहीं होती है।

साझेदारी के दोष (सीमाएँ):
साझेदारी के दोष (सीमाएँ) निम्नलिखित हैं –
1. असीमित दायित्व – व्यवसाय की सम्पत्तियों से फर्म की देनदारी नहीं चुकती है तो सभी साझेदार संयुक्त एवं व्यक्तिगत रूप से देनदारी चुकाने हेतु उत्तरदायी होते हैं। यह उन साझेदारों के लिए हानिकारक होता है जिनके पास अपेक्षाकृत अधिक व्यक्तिगत धन है।

2. सीमित साधन – साझेदारों की संख्या सीमित होती है। अत: वह बड़े पैमाने के व्यवसाय हेतु पूँजी नहीं जुटा पाते हैं। परिणामस्वरूप साझेदारी व्यवसाय सीमित दायरे में ही प्रगति कर सकता है।

3. विरोध की सम्भावना – साझेदारी व्यवसाय व्यक्तियों के समूह द्वारा संचालित होता है। जिसमें विभिन्न साझेदार अपने क्षेत्र से सम्बन्धित निर्णय लेते हैं। इनमें कुछ निर्णयों के कारण आपसी मतभेद पैदा हो सकते हैं तथा वे एक – दूसरे साझेदारं का विरोध कर सकते हैं।

4. निरन्तरती की कमी – एक साझेदार की मृत्यु होने, अवकाश ग्रहण करने, दिवालिया होने या पागल होने के कारण साझेदारी का समापन हो जाता है। इसलिए इसमें स्थायित्व एवं निरन्तरता की कमी पायी जाती है।

5. जनता के विश्वास में कमी – साझेदारी व्यवसाये की वित्तीय सूचनाओं का प्रकाशन एवं प्रसारण आवश्यक नहीं होता है। अत: सामान्य जनता में फर्म के प्रति अविश्वास का भाव बना रहता है।

6. हित हस्तान्तरण पर रोक – साझेदारी फर्म में एक साझेदार अपने अधिकार को अन्य साझेदारों की पूर्व अनुमति के बिना अन्य किसी व्यक्ति को नहीं सौंप सकता है। इस प्रकार वह साझेदारी से बँधा हुआ महसूस करता है।

7. अनिश्चित अस्तित्व – साझेदारी फर्म का अस्तित्व अनिश्चित होता है क्योंकि यदि कोई साझेदार पागल या दिवालिया हो जाये या उसकी मृत्यु हो जाये या इच्छापूर्वक साझेदारी से अलग हो जाये तो साझेदारी का समापन हो जाता है।

8. समन्वय का अभाव – साझेदार व्यवसाय में अपने-अपने हित देखने लगते हैं। इससे उनके मध्य मतभेद की सम्भावना पैदा हो जाती है। परिणामस्वरूप उनमें आपसी समन्वय का अभावे पाया जाता है।

9. एक की लापरवाही से सबको हानि – यदि कोई एक साझेदार अपने कार्य में लापरवाही दिखाता है तथा उसके कारण हानि होती है तो उस हानि को सभी साझेदारों को वहन करना पड़ता है जो अनुचित कार्य व्यवहार को बल प्रदान करता है।

10. शीघ्र निर्णय का अभाव – साझेदारी में सभी निर्णय आपसी विचार विमर्श एवं सहमति के आधार पर ही होते हैं अतः निर्णय में अनावश्यक देरी हो जाती है।

प्रश्न 8.
साझेदारी संलेख की प्रमुख बातों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
साझेदारी संलेख की प्रमुख बातें:
फर्म के व्यवसाय, अवधि, कार्यक्षेत्र आदि में समानता न होने के कारण प्रत्येक संलेख में कुछ विशेषताएँ हो सकती हैं, किन्तु साधारण रूप से अग्रलिखित

स्पष्टीकरण सभी संलेखों में होते हैं –
1. फर्म का नाम व पता – साझेदारी फर्म का कोई भी नाम रखा जा सकता है, परन्तु अन्य पंजीकृत फर्म से मिलता – जुलता नहीं होना चाहिए तथा फर्म का पता भी निश्चित होना चाहिए।

2. व्यापार का क्षेत्र तथा स्वरूप – फर्म किसी वस्तु का उत्पादन करेगी या क्रय – विक्रय करेगी तथा उसका कार्य करने का क्षेत्र स्थानीय, राज्यीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय होगा इसका स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।

3. फर्म की अवधि – साझेदारी की अवधि निश्चित होगी या अनिश्चिते, इस बात का उल्लेख साझेदारी संलेख में किया जाता है।

4. लाभ – हानि का विभाजन – साझेदारी फर्म में होने वाले लाभ या हानि का विभाजन किस अनुपात में होगा, यह स्पष्ट रूप से निश्चित किया जाता है।

5. साझेदारों के कर्तव्य तथा अधिकार – साझेदारों के पारस्परिक अधिकार और कर्तव्य क्या होंगे? कार्य का आवंटन सभी साझेदारों में किस प्रकार होगा? इन बातों का उल्लेख साझेदारी संलेख में स्पष्ट रूप से होना चाहिए। जिससे साझेदारों के मध्य पारस्परिक विवादों से बचा जा सके।

6. पूँजी पर ब्याज – साझेदारों द्वारा लगाई पूँजी पर ब्याज दिया जाएगा अथवा नहीं और यदि ब्याज दिया जायेगा तो उसकी दर क्या होगी?

7. आहरण पर ब्याज – साझेदार अपने निजी प्रयोग हेतु रोकड़ या माल ले सकता है या नहीं इस बात का उल्लेख भी साझेदारी संलेख में होना चाहिए।

8. ख्याति का मूल्यांकन – किसी साझेदार के अवकाश ग्रहण करने पर या मृत्यु होने की दशा में ख्याति का मूल्यांकन किस विधि से होगा इसका स्पष्ट उल्लेख संलेख में होना चाहिए।

9. फर्म का समापन – साझेदारी फर्म का समापन किन-किन परिस्थितियों में किया जा सकता है। इसका उल्लेख संलेख में होना चाहिए।

10. साझेदारों का प्रवेश तथा निवृत्त होना – अधिनियम के अनुसार नये साझेदार का प्रवेश पुराने साझेदारों की सहमति से होता है। यदि कोई परिवर्तन हो, तो उसका उल्लेख संलेख में किया जाना चाहिए। साझेदार के निवृत्त होने के नियमों का उल्लेख भी आवश्यक होता है।

प्रश्न 9.
हिन्दू अविभाजित परिवार का अर्थ बताते हुए इसकी चार विशेषताएँ एवं चार गुण बताइए।
उत्तर:
हिन्दू अविभाजित परिवार का अर्थ:
संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय का अभिप्राय उस व्यवसाय से है जिसका स्वामित्व एवं संचालन एक संयुक्त हिन्दू परिवार के सदस्य करते हैं। इस व्यवसाय का संचालन हिन्दू कानून के द्वारा होता है। व्यवसाय का यह स्वरूप केवल भारत में ही पाया जाता है तथा यह भारत का सबसे पुराना संगठन स्वरूप है। परिवार में जन्म लेने वाला प्रत्येक बालके इसका सदस्य बन जाता है। इस परिवार का मुखिया ‘कर्ता’ कहलाता है तथा सभी सदस्य सह – समांशी कहलाते हैं।

हिन्दू अविभाजित परिवार की विशेषताएँ:
हिन्दू अविभाजित परिवार की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. निर्माण – हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अनुसार, इसके निर्माण हेतु कम से कम दो पारिवारिक सदस्यों तथा पैतृक सम्पत्ति की आवश्यकता होती है। इसकी सदस्यता परिवार में जन्म के कारण मिलती है। अतः इसमें किसी अनुबन्ध की आवश्यकता नहीं होती है।

2. दायित्व – कर्ता को छोड़कर शेष सभी सह – समांशी सदस्यों का दायित्व सम्पत्ति में उनके अंश तक ही सीमित होता है।

3. नियंत्रण – परिवार के व्यवसाय पर उसके कर्ता का नियन्त्रण होता है। वही सभी निर्णय लेता है तथा प्रबन्ध करता है। अन्य सभी सदस्य उसके निर्णयों से बाध्य होते हैं।

4. निरंतरता – कर्ता की मृत्यु होने पर शेष बचे सदस्यों में से सर्वाधिक आयु का कोई अन्य सदस्य कर्ता बन जाता है। इस प्रकार व्यवसाय स्थायी रूप से चलता रहता है। इसका समापन सभी सदस्यों की स्वीकृति से ही किया जा सकता है।

हिन्दू अविभाजित परिवार के गुण (लाभ):
हिन्दू अविभाजित परिवार के गुण निम्नलिखित हैं –
1. प्रभावशाली नियन्त्रण – निर्णय के सम्पूर्ण अधिकार कर्ता के पास होते हैं। कोई भी सदस्य उसके निर्णय के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। इसके परिणामस्वरूप निर्णय बिना किसी मतभेद के शीघ्रतापूर्वक लिए जाते हैं।

2. स्थायित्व – व्यवसाय की निरंतरता को किसी प्रकार का खतरा नहीं होता है। क्योंकि परिवार के कर्ता की मृत्यु के बाद अन्य सदस्यों में सर्वाधिक आयु का सदस्य कर्ता बन जाता है।

3. सदस्यों का सीमित दायित्व – इस प्रकार के व्यवसाय में कर्ता को छोड़कर अन्य सभी सदस्यों के जोखिम स्पष्ट एवं निश्चित होते है क्योंकि उनका दायित्व व्यवसाय में उनके अंश तक ही सीमित होता है।

4. निष्ठा एवं सहयोग में वृद्धि – एक ही परिवार के सदस्य मिलकर व्यवसाय चलाते हैं इसलिए उनमें आपस में एक – दूसरे के प्रति अधिक निष्ठा एवं विश्वास होता है। इसके परिणामस्वरूप सभी सदस्य एक – दूसरे का पूर्ण सहयोग करते हैं।

प्रश्न 10.
सीमित दायित्व साझेदारी (एल.एल.पी.) पर टिप्पणी लिखिए।
अथवा
एल.एल.पी. का अर्थ बताते हुए इसकी दस विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
सीमित दायित्व साझेदारी:
वर्तमान में व्यावसायिक क्रियाओं में होने वाले तीव्र परिवर्तनों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए व्यावसायिक संगठन के एक नये रूप की आवश्यकता महसूस की गई जिसमें साझेदारी व्यवसाय के प्रमुख तत्त्वों के साथ एक सीमित दायित्व वाली कम्पनी के लाभ भी निश्चित रूप से प्राप्त हो। इस जरुरत ने वर्तमान व्यावसायिक क्षेत्र में एक नये संगठन को जन्म दिया है जिसे सीमित दायित्व साझेदारी के नाम से जाना जाता है। सीमित दायित्व साझेदारी का गठन समामेलित साझेदारी के रूप में होता है। ये सीमित दायित्व व स्थायी अस्तित्व की विशेषताओं के साथ सीमित दायित्व साझेदारी अधिनियम 1 अप्रैल, 2009 से प्रभावी हुआ। प्रथम सीमित दायित्व साझेदारी फर्म का पंजीकरण 2 अप्रैल, 2009 को हुआ।

सीमित दायित्व साझेदारी की विशेषताएँ:
सीमित दायित्व साझेदारी की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. सीमित दायित्व साझेदारी एक निगम निकाय है तथा इसको अपने साझेदारों से पृथक् अस्तित्व होता है।
  2. साझेदारों के परस्पर अधिकार एवं कर्तव्य तथा फर्म से सम्बन्धित अधिकार एवं कर्तव्यों एक अनुबन्ध एवं अधिनियम के प्रावधानों के द्वारा नियमित किया जाता है।
  3. सीमित दायित्व साझेदारी को एक पृथक् कानूनी इकाई के रूप में मान्यता दी गई है।
  4. सीमित दायित्व साझेदारी में साझेदारों का दायित्व उनके सहमति अनुपात तक ही सीमित रहेगा।
  5. सीमित दायित्व साझेदारी में न्यूनतम दो व्यक्ति साझेदार होंगे और उनमें एक का भारत का निवासी होना आवश्यक है।
  6. इसमें कम्पनी अधिनियम के प्रावधान लागू किए जा सकते हैं लेकिन भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 के प्रावधान इस पर लागू नहीं होंगे।
  7. सीमित दायित्व साझेदारी के मामले का निरीक्षण करने का अधिकार केन्द्र सरकार के पास होता है।
  8. सीमित दायित्व साझेदारी में साझेदारों के दायित्व फर्म तक सीमित रहते हैं और साझेदारों की व्यक्तिगत सम्पत्ति पर लागू नहीं होते हैं।
  9. सीमित दायित्व साझेदारी अधिनियम, 2008 की धारा 34 के अनुसार वित्तीय जानकारी को प्रकट करना अनिवार्य है।
  10. इसके द्वारा असीमित दायित्व की कमियों को तथा कम्पनी अधिनियम के प्रावधानों की कठोरता को दूर किया जाता है।

प्रश्न 11.
साझेदारों के विभिन्न प्रकारों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
साझेदारी के प्रकार:
1. सक्रिय साझेदार – जो साझेदार फर्म की संचालन व्यवस्था में सक्रियता से भाग लेते हैं, उन्हें सक्रिय साझेदार कहा जाता है। इनके अधिकार अन्य साझेदारों की अपेक्षा अधिक होते हैं।

2. निष्क्रिय साझेदार – जो साझेदार फर्म के व्यापार में केवल पूँजी लगाते हैं, उसके संचालन में क्रियात्मक रूप से भाग नहीं लेते हैं, उन्हें शान्त या निष्क्रिय साझेदार कहते हैं। यह फर्म के वास्तविक साझेदार होते हैं।

3. नाममात्र का साझेदार – वह साझेदार जो न तो फर्म के कार्यों में पूँजी लगाता है और न ही व्यापार के संचालन में सक्रिय रूप से भाग लेता है, लेकिन फर्मों को अपने नाम के साख को प्रयोग करने देता है।

4. केवल लाभ के साझेदार – कुछ साझेदार अन्य साझेदारों की स्वीकृति से अपनी कुछ पूँजी फर्म में विनियोग करते हैं, किन्तु वे लाभ के भाग में ही साझेदार होते हैं और हानि के लिए उत्तरदायी नहीं होते हैं।

5. गत्यावरोध या प्रदर्शन द्वारा साझेदार – वह साझेदार जो लिखित या मौखिक शब्दों में अपने व्यवहार द्वारा प्रदर्शित करता है कि जिससे दूसरों को यह विश्वास हो जाये कि वह फर्म को साझेदार है लेकिन वह फर्म को साझेदार नहीं होता है। वह अपने दायित्व के लिए उत्तरदायी होता है।

6. अवयस्क या नाबालिग साझेदार – भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की धारा 30 के अनुसार यदि समस्त साझेदार सहमत हों, तो एक अवयस्क को साझेदारी के लाभों में सम्मिलित किया जा सकता है। इस प्रकार के साझेदार की उम्र 18 वर्ष से कम होती है।

7. आगन्तुक साझेदार – वह साझेदार जो अन्य साझेदारों की सहमति या साझेदारी संलेख की शर्ते के अनुसार साझेदारी फर्म में नये साझेदार के रूप में प्रवेश करता है, उसे आगन्तुक साझेदार कहते हैं।

8. बाहर जाने वाला साझेदार – वह साझेदार जो स्वेच्छा से या निष्कासन द्वारा फर्म से अलग हो जाता है। ऐसे साझेदार को फर्म से पृथक् होने की घोषणा करनी होती है। इस घोषणा के पश्चात् ऋण आदि का उसके ऊपर कोई दायित्व नहीं रहता है।

प्रश्न 12.
सहकारिता आन्दोलन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सहकारिता आन्दोलन:
सहकारिता का प्रारम्भ कब और कैसे हुआ यह बताना थोड़ा कठिन लगता है किन्तु अनुमान यह है कि मनुष्य अपनी आवश्यकता पूर्ति, रक्षा करने एवं जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए साथ – साथ रहने के कार्य करने को प्रेरित होते रहे हैं। भारत में सहकारिता का विचार व कार्य संस्कृति अत्यन्त प्राचीन है। भारतीय समाज के अन्तर्गत संयुक्त परिवार प्रथा तथा जन्म से लेकर मृत्यु तक की परम्पराओं, विशेषकर शादी – विवाह में मिलजुल कर कार्य करने, सहयोग करने, सुख – दुख में हाथ बँटाने के उदाहरण सहकारिता के ही स्वरूप है। ग्रामीण जीवन में घरेलू कार्य, घरेलू उत्पादों के उत्पादन एवं कृषि कार्य में आज भी सहकारिता जीवित है।

“भारत में साहूकारी व्यवस्था के चंगुल में फँसे किसानों एवं औद्योगिक क्रान्ति के बाद पूँजीवाद एवं बढ़ते कारखानों से श्रमिक वर्ग का शोषण प्रारम्भ हुआ, लघु उद्योग भी समाप्त होने लगे। इस दुर्दशा व शोषण के समाधान के लिए 1895 व 1897 में चेन्नई सरकार द्वारा नियुक्त सर निकल्सन ने अपनी रिपोर्ट में ग्रामीण साख समितियों” के गठन का सुझाव दिया। तत्पश्चात् उत्तर प्रदेश में सहकारी साख व्यवस्था पर कार्य कर रहे ड्यूपरनेक्स ने भी अपनी पुस्तक Peoples Bank for Northern India में ग्रामीण बैंकों का सुझाव दिया।

सन् 1901 में भारत सरकार ने एडवर्ड लॉ समिति का गठन किया। इस समिति ने भी सिफारिश की कि सरकारी सहायता से सहकारी समितियाँ स्थापित की जाए, इसके आधार पर केन्द्रीय विधानसभा में बिल प्रस्तुत कर सहकारी साख समिति अधिनियम 1904 बना। वहीं से आन्दोलन प्रारम्वा हुआ। इस अधिनियम के दोषों को दूर करने के लिए दूसरा चिन्हि लाया गया। जिसके तहत् हजारों कृषि व गैर – कृषि समितियाँ बनी।

1947 में स्वतन्त्रता प्राप्ति से अब तक पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से इस आन्दोलन को संरक्षितं रखकर मजबूत बनाया गया, इस हेतु समय – समय पर संविधान संशोधन द्वारा राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय सहकारी कृषि एवं ग्रामीण बैंकों का विस्तार किया गया एवं प्रभारी बनाया गया। सरकार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम, नाबार्ड बैंक , भारतीय कृषक उर्वरक सहकारी समिति, राष्ट्रीय सहकारी आवास संघ द्वारा साख व्यवस्था से प्रारम्भ सहकारिता आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त हो चुकी है।

प्रश्न 13.
राजस्थान में कार्यरत् सहकारी संस्थाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
राजस्थान में सहकारी संस्थाएँ:
राजस्थान में निम्न सहकारी संस्थाएँ संचालित हैं –
1. राजस्थान राज्य सहकारी बैंक/शीर्ष बैंक – रिजर्व बैंक द्वारा श्री कोठारी की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिश पर 14 अक्टूबर, 1953 को शीर्ष सहकारी बैंक की स्थापना की गई। इस बैंक की स्थापना करने का उद्देश्य सम्पूर्ण राज्य में सहकारी आन्दोलन को समन्वित विकास करना था। इसका मुख्यालय जयपुर में रखा गया है।
राज्य सहकारी बैंक के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं –

  • राज्य में सहकारी साख व्यवस्था का प्रसार करना।
  • केन्द्रीय सहकारी बैंकों को अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन ऋण प्रदान करना।
  • जनता की जमाओं को स्वीकार करना।
  • विनिमय बिलों एवं चैकों आदि का संग्रह करना।
  • बहुमूल्य वस्तुओं की सुरक्षा हेतु लॉकर्स की सुविधा प्रदान करना।
  • रिजर्व बैंक, नाबार्ड एवं राज्य केन्द्रीय बैंक, सहकारी बैंक के मध्य कड़ी का कार्य करना।

2. केन्द्रीय सहकारी बैंक – केन्द्रीय सहकारी बैंक जिला स्तर पर गठित किए हैं। राजस्थान का पहला केन्द्रीय सहकारी बैंक सन् 1910 में अजमेर में खोला गया। लेकिन स्वतन्त्रता के पूर्व तक इसकी कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद आर्थिक विकास की नीति अपनाई गई। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में सहकारिता को महत्व देने से केन्द्रीय बैंकों का विकास हुआ। वर्तमान में राज्य में 29 केन्द्रीय सहकारी बैंक, इनकी 429 शाखाएँ तथा 6231 ग्राम सहकारी समितियाँ कार्यरत हैं।

3. प्राथमिक कृषि साख समितियाँ – प्राथमिक कृषि साख समितियों का सम्पर्क ग्रामीण जनता से रहता है। ये ग्रामीण क्षेत्रों में बचत को प्रोत्साहित एवं एकत्रित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। यही समितियाँ अपने सदस्यों को अल्पकालीन एवं मध्यकालीन ऋण देती है। राजस्थान में प्राथमिक कृषि साख समितियों की संख्या 6231 (3103 -15) है।

प्राथमिक कृषि साख समितियों के कार्य निम्नलिखित हैं –

  • अपने क्षेत्रों के किसानों, दस्तकारों व कृषि श्रमिकों एवं अन्य कमजोर वर्ग के लोगों को ऋण प्रदान करना।
  • किसानों को बीज, खाद, कीटनाशक दवाओं एवं कृषि यन्त्रों की पूर्ति में सहायता करना।
  • ग्रामीण जनता में बचत की भावना विकसित करना।
  • उन्नत कृषि विकास में सहयोगी बनना।
  • उपभोक्ता वस्तुओं को उचित मूल्यों पर उपलब्ध करवाने में सहायता प्रदान करना।

4. भूमि विकास बैंक – ये बैंक अपने सदस्यों को भूमि की उत्पादन क्षमता बढ़ाने, भूमि में सिंचाई की व्यवस्था करने, कुएँ व तालाबों के निर्माण व मरम्मत पम्प सेट आदि लगवाने, भूमि खरीदने तथा फलों की खेती के लिए दीर्घकालीन ऋण प्रदान करते हैं। इनकी ब्याज दर कम होती है तथा ऋण को किश्तों में भुगतान की सुविधा होती है। 26 मार्च, 1957 को स्थापित राजस्थान राज्य सहकारी भूमि विकास बैंक लिमिटेड वर्तमान में 33 जिलों में 36 भूमि विकास बैंकों द्वारा 143 शाखाओं के माध्यम से ग्रामीण विकास में कार्यरत् है।

5. अन्य सहकारी समितियाँ –

  • सहकारी विपणन समितियाँ (राजफैड)
  • सहकारी उपभोक्ता भण्डार (कानफैड)
  • सहकारी गृह निर्माण समितियाँ
  • डेयरी सहकारी समितियाँ।
  • सहकारी शिक्षा एवं प्रबन्ध संस्थान (राइसेम)

प्रश्न 14.
सार्वजनिक उपक्रम की उपादेयता बताते हुए उनके वर्गीकरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सार्वजनिक उपक्रम की उपादेयता:
सार्वजनिक क्षेत्र की उपादेयता (महत्व) निम्नलिखित हैं –
1. आधारभूत ढाँचे का विकास – औद्योगिकीकरण के आधारभूत ढाँचे के लिए परिवहन, संचार, ईंधन, ऊर्जा आदि को सम्मिलित किया जाता है। इनके बिना औद्योगिकीकरण की प्रगति को बनाये नहीं रखा जा सकता है। इन क्षेत्रों में भारी मात्रा में पूँजी निवेश की आवश्यकता होती है। अत: सरकार ने इन क्षेत्रों में भारी मात्रा में निवेश किया तथा तकनीशियनों एवं कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया है। इसके परिणामस्वरूप निजी क्षेत्र में भी औद्योगिक उत्पादन को बल मिला है।

2. क्षेत्रीय सन्तुलन – सभी क्षेत्रों का समान विकास करना सरकार का उत्तरदायित्व है। स्वतन्त्रता से पूर्व कुछ क्षेत्रों का तो विकास हुआ था लेकिन कुछ क्षेत्र अत्यधिक पिछड़े थे। सरकार ने 1951 के बाद पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश के पिछड़े क्षेत्रों में स्टील आदि के संयन्त्र स्थापित किये जिससे उन क्षेत्रों के विकास को बल मिला तथा कुछ क्षेत्र जिनमें निजी क्षेत्र बड़ी मात्रा में निवेश कर रहा था, उसे हतोत्साहित करने का प्रयास किया गया जिससे विकास के क्षेत्रीय संतुलन को बल मिला।

3. बड़े पैमाने पर उत्पादन के लाभ – जिन क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में पूँजी निवेश की आवश्यकता होती है उनमें निवेश के लिए सार्वजनिक क्षेत्र आगे आए तथा बिजली, प्राकृतिक गैस, पेट्रोलियम, संचार आदि क्षेत्रों में बड़ी – बड़ी इकाइयों की स्थापना की गयी। इसके परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में उत्पादन से मितव्ययिता के लाभ सार्वजनिक क्षेत्र को ही प्राप्त हुए।

4. आर्थिक केन्द्रीयकरण पर रोक – निजी क्षेत्र में कुछ औद्योगिक घराने भारी औद्योगिक क्षेत्रों में निवेश करके अत्यधिक लाभ प्राप्त करते हैं। इससे एकाधिकार एवं आर्थिक असमानता को बल मिलता है। ऐसे में निजी क्षेत्र पर नियन्त्रण के लिए सार्वजनिक क्षेत्र भारी निवेश करके बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना करता है जिससे बड़ी मात्रा में कर्मचारियों को रोजगार तथा लाभ प्राप्त होता है।

5. आयात प्रतिस्थापन – भारत ने कुछ क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनने हेतु दूसरी पंचवर्षीय योजना से ही प्रयास शुरू कर दिये थे। औद्योगिक विकास के लिए भारी मशीनों के आयात के लिए विदेशी मुद्रा की आवश्यकता थी जो हमारे लिए आवश्यक अन्य सामानों के आयात में ही समाप्त हो जाती थी। अतः ऐसे उद्योगों की स्थापना पर बल दिया गया जिससे आयात पर हमारी निर्भरता कम हो सके।

सार्वजनिक उपक्रमों का वर्गीकरण:
औद्योगिक नीति संकल्प पत्र, 1956 ने उद्यमों को राज्य द्वारा निभाई गई भूमिका के आधार पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है –

  • पहली श्रेणी (अनुसूची अ) में उन उद्यमों को शामिल किया गया है, जिनके विकास की विशेष जिम्मेदारी भविष्य में राज्यों की होगी।
  • द्वितीय श्रेणी (अनुसूची ब) में उन उद्यमों को शामिल किया गया है, जिनका विकास मुख्य रूप से राज्य द्वारा संचालित किया जायेगा, परन्तु राज्य के प्रयासों के पूरक के तौर पर निजी भागीदारी को शामिल होने की अनुमति होगी।
  • तृतीय श्रेणी में शेष उद्योग, जो निजी क्षेत्र के लिए छोड़ दिये गये थे।

प्रश्न 15.
सहकारिता संस्थानों के गुण-दोष बताइए।
उत्तर:
सहकारी संस्थाओं के गुण:
सहकारी संस्थाओं के गुण निम्नलिखित हैं –
1. वोट की समानता – सहकारी समिति में प्रत्येक सदस्य को एक वोट देने का अधिकार होता है चाहे वह कितनी ही पूँजी लेकर क्यों न आये। अत: इसमें वोट की समानता पायी जाती है।

2. सीमित दायित्व – सहकारी समिति के सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा लगाई गई पूँजी तक सीमित होता है। उनकी निजी सम्पत्ति से समिति के ऋणों को चुकता नहीं किया जा सकता है।

3. स्थायित्व – समिति का पृथक् अस्तित्व होने के कारण इसके किसी सदस्य की मृत्यु या दिवालिया या पागल होने का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

4. मितव्ययी संचालन – समिति के सदस्य सामान्य तथा अवैतनिक सेवाएँ देते हैं तथा अधिकांश ग्राहक समिति के सदस्य ही होते हैं। इससे डूबते ऋणों का जोखिम भी नहीं होता है। इस प्रकार संचालन मितव्ययी होता

5. सरकारी सहायता – सहकारी समिति लोकतन्त्र एवं धर्मनिर्पेक्षता पर आधारित होती है इसलिए सरकार इसे बढ़ावा देने के लिए टैक्स एवं ब्याज दर में छूट देती है तथा समय-समय पर अनुदान प्रदान करती है।

सहकारी संस्थाओं के दोष:
सहकारी संस्थाओं के दोष (सीमाएँ) निम्नलिखित हैं –
1. सीमित संसाधन – सहकारी समिति के सभी संसाधन सदस्यों की पूँजी से ही जुटाये जाते हैं। जबकि सदस्य संख्या भी बहुत अधिक नहीं होती है। इसलिए इसे संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ता है।

2. अक्षम प्रबन्ध – सहकारी समिति कम वेतन पर कार्य लेती है इसलिए उन्हें अच्छे प्रबन्धक नहीं मिलते हैं तथा जो सदस्य स्वेच्छा से प्रबन्ध में अपना समय देते हैं वे भी पेशेवर योग्यता नहीं रखते हैं।

3. गोपनीयता की कमी – समिति अधिनियम की धारा (7) के अनुसार प्रत्येक के सामने आने वाले सभी विषयों पर खुलकर चर्चा होती है तथा समिति पर सभी विषयों को प्रकट करने का दायित्व होता है। इससे व्यवसाय की गोपनीयता भंग होती है।

4. सरकारी नियंत्रण – सहकारी समिति को सरकार सुविधाएँ देती है। इसके बदले में खातों के ‘अंकेक्षण आदि से सम्बन्धित कई सरकारी नियमों का पालन समिति को करना पड़ता है।’ इस पर राज्य सहकारी विभाग का नियंत्रण भी बना रहता है। इससे इनके कार्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

5. विचारों की भिन्नता – सदस्यों के मध्य वैचारिक भिन्नता के कारण कभी – कभी समय से निर्णय नहीं हो पाते हैं। कुछ सदस्य अपने व्यक्तिगत हितों पर अधिक ध्यान देते हैं। परिणामस्वरूप समिति के सामूहिक हित प्रभावित होते हैं।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 2 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उनके उत्तर

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 2 बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अमेरिका, जापान, ब्रिटेन तथा फ्रांस आदि विकसित देशों को शीर्ष स्तर पर पहुँचने का कारण है –
(अ) कृषि
(ब) जनसंख्या
(स) पशुपालन
(द) व्यवसाय
उत्तरमाला:
(द) व्यवसाय

प्रश्न 2.
व्यवसाय की विशेषता है –
(अ) व्यवसाय एक मानवीय क्रिया है
(ब) जोखिम एवं साहस का तत्त्व
(स) उपयोगिता का सृजन
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तरमाला:
(स) उपयोगिता का सृजन

प्रश्न 3.
व्यवसाय का महत्व नहीं है –
(अ) शिक्षा का विकास
(ब) जीवन स्तर में कमी
(स) उत्पादन का विशिष्टीकरण
(द) सांस्कृतिक विकास
उत्तरमाला:
(ब) जीवन स्तर में कमी

प्रश्न 4.
व्यवसाय का आर्थिक उद्देश्य है –
(अ) लाभ प्रयोजन
(ब) नव प्रवर्तन
(स) ग्राहकों का सृजन
(द) उपरोक्त सभी
उत्तरमाला:
(द) उपरोक्त सभी

प्रश्न 5.
“व्यावसायिक उद्देश्य की केवल एक ही वैध परिभाषा है ग्राहकों का सृजन करना।” यह कथन है –
(अ) पीटर एफ. डुकर
(ब) प्रो. हेने
(स) व्हीलर
(द) उर्विक
उत्तरमाला:
(अ) पीटर एफ. डुकर

प्रश्न 6.
व्यवसाय का सामाजिक उद्देश्य है –
(अ) लाभ प्रयोजन
(ब) नव प्रर्वतन
(स) करों का नियमित भुगतान
(द) ग्राहकों का सृजन
उत्तरमाला:
(स) करों का नियमित भुगतान

प्रश्न 7.
व्यापारिक संगठन के स्वरूप (प्रकार) हैं –
(अ) एकल व्यापार
(ब) साझेदारी
(स) कम्पनी
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तरमाला:
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 8.
कम से कम वैधानिक औपचारिकताएँ पूर्ण करके स्थापना की जा सकती है –
(अ) साझेदारी व्यापार
(ब) एकाकी व्यापार
(स) सार्वजनिक उपक्रम
(द) कोई नहीं
उत्तरमाला:
(ब) एकाकी व्यापार

प्रश्न 9.
वह व्यवसाय संगठन का प्रारूप जिसका स्वामित्व एवं प्रबन्ध एक ही व्यक्ति के हाथ में होता है –
(अ) साझेदारी
(ब) कम्पनी
(स) एकल व्यापार
(द) कोई नहीं
उत्तरमाला:
(स) एकल व्यापार

प्रश्न 10.
व्यावसायिक स्वामित्व का अति प्राचीन स्वरूप है –
(अ) एकल व्यापार
(ब) साझेदारी
(स) कम्पनी
(द) सहकारी संगठन
उत्तरमाला:
(अ) एकल व्यापार

प्रश्न 11.
एकल व्यापार में स्वामी का दायित्व होता है –
(अ) असीमित
(ब) सीमित
(स) कुछ सीमित
(द) अधिक सीमिते
उत्तरमाला:
(अ) असीमित

प्रश्न 12.
एकल व्यापार की स्थापना से सम्बन्धित प्रमुख लाभ हैं –
(अ) सुगम स्थापना
(ब) चयन में स्वतंत्रता
(स) शीघ्र निर्णय
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तरमाला :
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 13.
एकल व्यापार का मुख्य दोष होता है –
(अ) छोटा आकार
(ब) सीमित पूँजी
(स) गलत निर्णय
(द) उपरोक्त सभी
उत्तरमाला:
(द) उपरोक्त सभी

प्रश्न 14.
साझेदारी अधिनियम लागू हुआ था –
(अ) सन् 1949 में
(ब) सन् 1956 में
(स) सन् 1932 में
(द) सन् 1872 में
उत्तरमाला:
(स) सन् 1932 में

प्रश्न 15.
साझेदारी की न्यूनतम संख्या होती है –
(अ) 7
(ब) 3
(स) 2
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तरमाला:
(स) 2

प्रश्न 16.
भारतीय कम्पनी अधिनियम की किस धारा के अनुसार एक साझेदारी में संस्था में 50 से अधिक व्यक्ति नहीं होने चाहिए?
(अ) धारा – 2
(ब) धारा – 4
(स) धारा – 5
(द) धारा – 6
उत्तरमाला:
(ब) धारा – 4

प्रश्न 17.
साझेदारी में प्रत्येक साझेदार का दायित्व होता है –
(अ) सीमित
(ब) अंशत: सीमित
(स) असीमित
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तरमाला:
(स) असीमित

प्रश्न 18.
साझेदारी फर्म का पंजीकरण होता है –
(अ) ऐच्छिक
(ब) अनिवार्य
(स) अ एवं ब दोनों
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तरमाला:
(अ) ऐच्छिक

प्रश्न 19.
साझेदारी व्यवसाय का प्रमुख लाभ है –
(अ) सुगम स्थापना
(ब) पंजीकरण ऐच्छिक
(स) ऋण प्राप्ति में सुविधा
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तरमाला:
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 20.
साझेदारी व्यवसाय का प्रमुख दोष है –
(अ) असीमित दायित्व
(ब) शीघ्र निर्णय का अभाव
(स) सीमित साधन
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तरमाला:
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 21.
व्यावसायिक संगठन का स्वरूप केवल भारत में ही पाया जाता है –
(अ) एकल व्यापार
(ब) साझेदारी
(स) हिन्दू अविभाजित परिवार एवं पारिवारिक व्यवसाय
(द) कंम्पनी
उत्तरमाला:
(स) हिन्दू अविभाजित परिवार एवं पारिवारिक व्यवसाय

प्रश्न 22.
हिन्दू अविभाजित परिवार एवं पारिवारिक व्यवसाय में दायभाग प्रणाली राज्य में प्रचलित है –
(अ) राजस्थान
(ब) पश्चिमी बंगाल
(स) उत्तर प्रदेश
(द) तमिलनाडु
उत्तरमाला:
(ब) पश्चिमी बंगाल

प्रश्न 23.
बच्चे को जन्म लेते ही व्यवसाय में हिस्सा मिल जाता है –
(अ) एकल व्यापार में
(ब) साझेदारी में
(स) हिन्दू अविभाजित परिवार में
(द) कम्पनी में
उत्तरमाला:
(स) हिन्दू अविभाजित परिवार में

प्रश्न 24.
प्रथम सीमित दायित्व साझेदारी फर्म को पंजीकरण हुआ था –
(अ) 2 अप्रैल, 2009 को
(ब) 1 अप्रैल, 2009 को
(स) 2 अप्रैल, 2008 को
(द) 1 अप्रैल, 2008 को
उत्तरमाला:
(अ) 2 अप्रैल, 2009 को

प्रश्न 25.
सीमित दायित्व साझेदारी का लाभ नहीं है –
(अ) आन्तरिक लचीलापन
(ब) सीमित दायित्व
(स) निजता का अभाव
(द) पृथक् वैधानिक अस्तित्व
उत्तरमाला:
(स) निजता का अभाव

प्रश्न 26.
भारत सरकार द्वारा ‘एडवर्ड लॉ’ समिति का गठन किया था –
(अ) सन् 1901 में
(ब) सन् 1904 में
(स) सन् 1912 में
(द) सन् 1932 में
उत्तरमाला:
(अ) सन् 1901 में

प्रश्न 27.
“सहकारिता सामाजिक तत्त्व से युक्त एक आर्थिक पद्धति है।” यह कथन है –
(अ) एम.टी. हैरिक का
(ब) सर होरेक प्लेन्केट का
(स) प्रो. पी.एच. केसलमेन का
(द) सैलिगमैन का।
उत्तरमाला:
(स) प्रो. पी.एच. केसलमेन का

प्रश्न 28.
“एक सब के लिए वे सब एक के लिए” मूलमन्त्र है –
(अ) साझेदारी का
(ब) एकल व्यापार का
(स) सहकारिता का
(द) सार्वजनिक उपक्रम का
उत्तरमाला:
(स) सहकारिता का

प्रश्न 29.
राज्य का पहला केन्द्रीय सहकारी बैंक इस शहर में खोला गया –
(अ) जयपुर
(ब) अजमेर
(स) उदयपुर
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तरमाला:
(ब) अजमेर

प्रश्न 30.
सहकारी शिक्षा एवं प्रबन्ध संस्थान (राईसेम) का गठन हुआ था –
(अ) सन् 1994 में
(ब) सन् 1967 में
(स) सन् 1948 में
(द) सन् 1953 में
उत्तरमाला:
(अ) सन् 1994 में

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 2 अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यवसाय के विभिन्न प्रकार कौन – कौन से हैं? उनके नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. एकल व्यापार
  2. संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय
  3. साझेदारी
  4. संयुक्त पूँजी वाली कम्पनियाँ
  5. सहकारी संस्थाएँ।
  6. सार्वजनिक उपक्रम

प्रश्न 2.
आधुनिक व्यवसाय की दो विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:

  1. यातायात एवं संचार के नवीन साधनों का प्रयोग।
  2. विज्ञापन एवं विक्रय संवर्द्धन का उपयोग।

प्रश्न 3.
आर्थिक दृष्टि से व्यवसायी के तीन प्रमुख उद्देश्य कौन – कौन से हैं?
उत्तर:

  1. लाभ प्रयोजन
  2. नव प्रवर्तन
  3. ग्राहकों का सृजन।

प्रश्न 4.
व्यावसायिक संगठन का सबसे प्राचीन स्वरूप किसे माना जाता है?
उत्तर:
एकल व्यापार।

प्रश्न 5.
एकाकी व्यापार आज भी लोकप्रिय होने के कोई दो कारण बताइये।
उत्तर:

  1. व्यापार प्रारम्भ करने में सुगमता।
  2. व्यवसाय की स्वतन्त्रता।

प्रश्न 6.
एकल व्यापार के कोई दो गुण लिखिए।
उत्तर:

  1. शीघ्र निर्णय
  2. सूचना की गोपनीयता

प्रश्न 7.
एकल व्यापार के दो दोष (सीमायें) बताइये।
उत्तर:

  1. असीमित दायित्व
  2. सीमित साख।

प्रश्न 8.
साझेदारी की दो विशेषताएँ (लक्षण) बताइये।
उत्तर:

  1. साझेदारी का जन्म समझौते के द्वारा होता है।
  2. साझेदारी में कम – से – कम दो सदस्य होने चाहिए।

प्रश्न 9.
साझेदारी व्यवसाय से होने वाले दो लाभ लिखिए।
उत्तर:

  1. व्यवसाय संचालन में सुविधा।
  2. ऋण प्राप्ति में सुविधा।

प्रश्न 10.
साझेदारी व्यवसाय के दो दोष (सीमाये) बताइये।
उत्तर:

  1. असीमित उत्तरदायित्व।
  2. शीघ्र निर्णय का अभाव।

प्रश्न 11.
साझेदारी अवैध होने के कोई दो कारण बताइये।
उत्तर:

  1. व्यवसाय में दो से कम व्यक्ति रह जाने पर
  2. यदि साझेदारी व्यवसाय सरकारी नीति के विरुद्ध हो।

प्रश्न 12.
निष्क्रीय या सुप्त साझेदार को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
ऐसे साझेदार जो फर्म में पूँजी लगाते हैं लेकिन संचालन में सक्रिय योगदान नहीं करते है वे निष्क्रिय या सुप्त साझेदार कहलाते हैं।

प्रश्न 13.
हमारे देश में साझेदारी किस अधिनियम के अनुसार शासित होती है?
उत्तर:
भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932।

प्रश्न 14.
साझेदारी संलेख के अभाव में साझेदारों द्वारा लाभ – हानि को किस अनुपात में बाँटा जायेगा?
उत्तर:
बराबर अनुपात में।

प्रश्न 15.
प्रथम सीमित दायित्व साझेदारी फर्म का पंजीकरण कब हुआ था?
उत्तर:
2 अप्रैल, 2009 में।

प्रश्न 16.
हिन्दू अविभाजित परिवार एवं पारिवारिक व्यवसाय क्या है? समझाइये।
उत्तर:
हिन्दू अविभाजित परिवार एवं पारिवारिक व्यवसाय में परिवार के सभी सदस्य मिलकर व्यवसाय चलाते हैं तथा उनमें सबसे अधिक उम्र का एक व्यक्ति उसका कर्ता होता है जो व्यवसाय सम्बन्धी निर्णय लेता है।

प्रश्न 17.
हिन्दू अविभाजित परिवार एवं पारिवारिक व्यवसाय में कौन – सा अधिनियम लागू होता है?
उत्तर:
हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956।

प्रश्न 18.
मिताक्षरा प्रणाली क्या है?
उत्तर:
यह प्रणाली पश्चिम बंगाल को छोड़कर शेष सम्पूर्ण भारत में लागू होती है। इसके अनुसार संयुक्त हिन्दू व्यवसाय में केवल पुरुष सदस्य ही सह – समांशी होते है।

प्रश्न 19.
सह – समांशी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संयुक्त हिन्दू परिवार में अपने पूर्वजों की सम्पत्ति में सभी सदस्यों का बराबर का स्वामित्व होता है। इससे उन्हें सहसमांशी कहा जाता है।

प्रश्न 20.
संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय के दो दोष बताइये।
उत्तर:

  1. कर्ता का असीमित दायित्व।
  2. सीमित पूँजी।

प्रश्न 21.
ईसा से 3000 वर्ष पूर्व किस देश में दस्तकारों के सहकारी संघ थे?
उत्तर:
मिश्र में।

प्रश्न 22.
जर्मनी में भूमि बन्धक बैंकों की स्थापना कब की गयी थी?
उत्तर:
सन् 1769 में।

प्रश्न 23.
‘रॉकडेल’ स्थान के 28 बुनकरों ने मिलकर एक सहकारी संगठन का गठन कब किया था?
उत्तर:
सन् 1844 में।

प्रश्न 24.
मद्रास सरकार द्वारा नियुक्त सर निकल्सन ने अपनी रिपोर्ट में किसके गठन का सुझाव दिया था?
उत्तर:
ग्रामीण साख समितियों के गठन को।

प्रश्न 25.
उत्तर प्रदेश में सहकारी साख व्यवस्था पर कार्य कर रहे ड्यूपरनेक्स ने अपनी किस पुस्तक में ग्रामीण बैंक की स्थापना का सुझाव दिया था?
उत्तर:
Peoples Bank for Northern India में।

प्रश्न 26.
भारत सरकार द्वारा सन् 1901 में किस समिति का गठन किया गया था?
उत्तर:
एडवर्ड लॉ समिति का।

प्रश्न 27.
भारत में सरकारी सहायता से सहकारी समितियों की स्थापना करने की सिफारिश किस समिति द्वारा की गई थी?
उत्तर:
एडवर्ड लॉ समिति।

प्रश्न 28.
सहकारिता की दो विशेषताएँ बताइये?
उत्तर:

  1. ऐच्छिक संगठन।
  2. सेवा और सहयोग की भावना।

प्रश्न 29.
आधुनिक युग में सहकारिता के दो महत्व लिखिए।
उत्तर:

  1. सहकारिता ग्रामीण जन समुदाय को बचत के लिये प्रोत्साहित करती है।
  2. लघु व कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन।

प्रश्न 30.
सहकारिता के दो दोष (कमियाँ) बताइये।
उत्तर:

  1. कमजोर प्रबन्ध व्यवस्था।
  2. अपेक्षित वर्ग को लाभ न मिलना।

प्रश्न 31.
किसकी अध्यक्षता में समिति ने राजस्थान में सहकारी विकास के लिये शीर्ष बैंक स्थापित करने का सुझाव दिया?
उत्तर:
श्री कोठारी की अध्यक्षता में।

प्रश्न 32.
राजस्थान राज्य सहकारी बैंक/शीर्ष बैंक के दो कार्य बताइये।
उत्तर:

  1. राज्य में सहकारी साख व्यवस्था का प्रसार करना।
  2. केन्द्रीय सहकारी बैंकों को अल्पकालीन एवं मध्यकालीन ऋण प्रदान करना।

प्रश्न 33.
राज्य का प्रथम केन्द्रीय सहकारी बैंक किस वर्ष खोला गया था?
उत्तर:
सन् 1910 में।

प्रश्न 34.
राजस्थान राज्य सहकारी बैंक/शीर्ष बैंक का मुख्यालय कहाँ है?
उत्तर:
जयपुर।

प्रश्न 35.
वर्तमान में राज्य में कितने केन्द्रीय सहकारी बैंक है?
उत्तर:29।

प्रश्न 36.
प्राथमिक कृषि साख समितियों के दो कार्य बताइये।
उत्तर:

  1. ग्रामीण जनता में बचत की भावना विकसित करना।
  2. उन्नत कृषि के विकास में सहयोग प्रदान करना।

प्रश्न 37.
राजस्थानी स्टेट को – ओपरेटिव बैंक लिमिटेड द्वारा वर्ष 2014 – 15 में क्रियान्वित दो योजनायें बताइये।
उत्तर:

  1. ज्ञान सागर ऋण योजना 15.77 लाख का ऋण दिया।
  2. स्वरोजगार केन्द्रित कार्ड योजना 1564 – 04 लाख का ऋण।

प्रश्न 38.
राजस्थान में भूमि विकास बैंक की स्थापना क्यों की गई थी?
उत्तर:
किसानों को दीर्घकालीन ऋण प्रदान करने के लिये राजस्थान में भूमि विकास बैंक की स्थापना की गयी।

प्रश्न 39.
भूमि विकास बैंक ने सन् 2014 – 15 में विभिन्न योजनाओं के अन्तर्गत कितनी राशि का ऋण प्रदान किया?
उत्तर:
25638.86 लाख।

प्रश्न 40.
सहकारी विपणन समितियों (राजफैड) के क्या कार्य है?
उत्तर:
कृषकों के उत्पादन में वृद्धि करना तथा उनके उत्पादन का उचित मूल्य दिलाना राजफैड का प्रमुख कार्य है।

प्रश्न 41.
राजस्थान में जनता को आवश्यक उपभोक्ता वस्तुएँ उचित मूल्य पर उपलब्ध कराने के लिये कौन – सी सहकारी समिति की स्थापना की गयी?
उत्तर:
सहकारी उपभोक्ता भण्डार (कानफैड)।

प्रश्न 42.
राज्य में सहकारी उपभोक्ता भंडार की स्थापना किस वर्ष की गयी थी?
उत्तर:
सन् 1967 में।

प्रश्न 43.
कानफैड द्वारा अपनी व्यावसायिक गतिविधियों का संचालन किन-किन अनुभागों के माध्यमों से किया जा रहा है?
उत्तर:
मेडिकल, मार्केटिंग व नागरिक आपूर्ति के माध्यमों से।

प्रश्न 44.
कमजोर वर्ग को आवास सुविधायें उपलब्ध करवाने के लिये कौन – सी समितियाँ कार्य कर रही है?
उत्तर:
सहकारी गृह – निर्माण समितियाँ।

प्रश्न 45.
व्यावसायिक प्रबन्धक एवं दक्ष कार्मिकों का वर्ग तैयार करने के लिये किस संस्थान का गठन किया गया?
उत्तर:
सहकारी शिक्षा एवं प्रबन्ध संस्थान (राइसेम)।

प्रश्न 46.
वर्ष 1969 में सरकार द्वारा कितने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था?
उत्तर:
14 बैंकों का।

प्रश्न 47.
‘सार्वजनिक उपक्रम में महारत्न’ का खिताव प्राप्त करने के लिये प्रतिवर्ष औसत कारोबार कितना होना चाहिए?
उत्तर:
20,000 करोड़।

प्रश्न 48.
वर्तमान में देश में कितने केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम हैं?
उत्तर:
250 से अधिक।

प्रश्न 49.
स्वतन्त्र भारत में वर्ष 1951 में सार्वजनिक उपक्रमों की संख्या कितनी थी?
उत्तर:
मात्र 5।

प्रश्न 50.
औद्योगिक नीति संकल्प पत्र 1956 में उद्यमों को राज्य द्वारा निभाई गई भूमिका के आधार पर कितनी श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है?
उत्तर:
तीन।

प्रश्न 51.
सार्वजनिक क्षेत्र की कुल बाजार पूँजीकरण में हिस्सेदारी कितने प्रतिशत है?
उत्तर:
21%।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 2 लघु उत्तरीय प्रश्न (SA – I)

प्रश्न 1.
व्यवसाय से आप क्या समझते हैं? समझाइये।
उत्तर:
व्यवसाय का अर्थ एवं परिभाषा:
व्यवसाय से आशय उन मानवीय आर्थिक क्रियाओं से है जो वस्तुओं एवं सेवाओं के वितरण द्वारा समाज़ की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से की जाती है जैसे व्यापारी द्वारा माल बेचना। प्रो. हेने के अनुसार “व्यवसाय से तात्पर्य ऐसी मानवीय क्रियाओं से है जिनका उद्देश्य वस्तुओं के क्रय – विक्रय द्वारा धनोत्पत्ति करना या लाभ कमाना है।”

प्रश्न 2.
व्यवसाय की किन्हीं दो विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. व्यवसाय एक आर्थिक क्रिया है – व्यवसाय की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह एक आर्थिक क्रिया है क्योंकि व्यवसाय प्रारम्भ करने के लिए धन की आवश्यकता होती है तथा व्यवसाय धनार्जन के उद्देश्य से ही किया जाता है। कोई भी व्यक्ति प्यार, सहानुभूति या भावुकता आदि के कारण व्यवसाय नहीं करता है।

2. प्रतिफल का अनिश्चित होना – व्यवसाय में प्रतिफल अनिश्चित होता है। अतः लाभ या हानि के चक्र व्यवसाय में चलते रहते हैं। कभी अधिक लाभ प्राप्त होता है तो कभी कम, यह नहीं कहा जा सकता कि किसी निश्चित समयान्तराल में कितना लाभ होगा। अत: इसमें पूरे वर्ष कार्य करने के बाद प्रतिफल अनिश्चित ही बना रहता है।

प्रश्न 3.
व्यवसाय को सामाजिक उद्देश्य का निर्वाह क्यों करना चाहिए?
उत्तर:
व्यवसाय समाज का अभिन्न अंग होता है तथा इसके द्वारा समाज के संसाधनों का प्रयोग किया जाता है। इस कारण व्यवसाय का समाज के प्रति कुछ उत्तरदायित्व बनता है। यद्यपि व्यवसाय का प्रमुख उद्देश्य लाभ कमाना है लेकिन उसे सामाजिक दायित्वों का भी निर्वाह करना चाहिए। समाज सेवा व्यावसायिक सफलता का रास्ता खोलती है तथा दीर्घकाल में व्यवसाय को स्थायित्व प्रदान करती है।

प्रश्न 4.
एकल व्यापार की स्थापना कब उपयुक्त रहती है?
उत्तर:
एकाकी व्यापार की स्थापना निम्नलिखित परिस्थितियों में उपयुक्त रहती है –

  • ऐसे व्यवसाय जिनमें पूँजी की कम आवश्यकता होती है जैसे कि नाई की दुकान।
  • जिन व्यवसायों का कार्य क्षेत्र सीमित होता है तथा संचालन हेतु सीमित प्रबन्धकीय योग्यता की आवश्यकता होती है।
  • जिन व्यवसायों में व्यक्तिगत निपुणता के साथ – साथ ग्राहकों से सीधे संम्पर्क की आवश्यकता होती है।
  • जिन व्यवसायों में व्यक्तिगत देख – रेख तथा कार्य सम्बन्धित विशिष्ट योग्यता की आवश्यकता होती है।
  • जिन व्यवसायों में ग्राहकों की व्यक्तिगत रुचि पर ध्यान देना आवश्यक होता है, जैसे – ब्यूटी पार्लर।
  • जिन व्यवसायों में वस्तुओं व सेवाओं की माँग सीमित होती है।

प्रश्न 5.
व्यवसाय के निम्न प्रकारों में से एकल स्वामित्व संगठन किसके लिए अधिक उपयुक्त रहेगा और क्यों?

  1. परचून की दुकान
  2. दवाई की दुकान
  3. विधिक सलाह सम्बन्धी
  4. शिल्प (क्राफ्ट) केन्द्र
  5. इंटरनेट केफे
  6. ब्यूटी पार्लर
  7. चार्टर्ड एकाउन्टेंसी फर्म।

उत्तर:
एकल स्वामित्व संगठन दिये गये व्यवसायों में से –
1. परचून की दुकान, 2. दवाई की दुकान, 6. ब्यूटी पार्लर के लिए अधिक उपयुक्त रहेगा, क्योंकि इन तीनों ही व्यवसायों के लिए अधिक पूँजी की आवश्यकता नहीं होती है। इनके लिए व्यक्तिगत सम्पर्क एवं विशेष ज्ञान की आवश्यकता होती है, इन व्यवसायों का क्षेत्र स्थानीय होता है, इनमें किसी विशेष औपचारिकता को पूरा करना आवश्यक नहीं होता है।

प्रश्न 6.
यदि पंजीयन ऐच्छिक है तो साझेदारी फर्म स्वयं को पंजीकृत कराने के लिए वैधानिक औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए क्यों इच्छुक रहती है? समझाइए।
उत्तर:
भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 के अनुसार साझेदारी फर्म का पंजीयन कराना अनिवार्य नहीं, ऐच्छिक है। लेकिन, फर्म का पंजीयन न होने से उस फर्म तथा साझेदारों को कई हानियाँ उठानी पड़ती है तथा वे कई लाभों से वंचित रह जाते हैं। एक अपंजीकृत फर्म का साझेदार अपनी फर्म अथवा अन्य साझेदारों के विरुद्ध वाद दायर नहीं कर सकता है तथा ऐसी फर्म भी साझेदारों तथा अन्य पक्षों के विरुद्ध वाद दायर नहीं कर सकती है। इन्हीं सब कारणों से एक फर्म अपने को पंजीकृत कराना चाहती है।

प्रश्न 7.
साझेदारी संलेख पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
साझेदारी के गठन हेतु साझेदारों के मध्य मौखिक एवं लिखित समझौता किया जा सकता है। साझेदारी संलेख वह लिखित समझौता होता है जो साझेदारी को शासित करने के लिए शर्ते व परिस्थितियों का उल्लेख करता है। साझेदारी संलेख में फर्म का नाम, व्यवसाय की प्रकृति, स्थान, अवधि, पूँजी, हानि एवं लाभ के बँटवारे, साझेदारों के कर्तव्य एवं दायित्व, साझेदारों के वेतन, आहरण आदि के बारे में स्पष्ट उल्लेख किया जाता है जिस पर सभी साझेदारों के हस्ताक्षर होते हैं।

प्रश्न 8.
हिन्दू अविभाजित परिवार व्यवसाय में नाबालिग की स्थिति की साझेदारी फर्म में उसकी स्थिति से तुलना कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय में सदस्यता जन्म के आधार पर होती है। परिवार में जन्म लेते ही बालक इस व्यवसाय का सदस्य बन जाता है। अत: एक नाबालिग भी व्यवसाय का सदस्य हो सकता है। साझेदारी फर्म अनुबन्ध के आधार पर स्थापित होती है जबकि नाबालिग को अनुबन्ध करने का कानूनी अधिकार नहीं है। इस आधार पर वह किसी साझेदारी फर्म में साझेदार नहीं बन सकता है। परन्तु सभी साझेदारों की सहमति से उसे फर्म के लाभ में हिस्सेदार बनाया जा सकता है। इस अवस्था में उसका दायित्व लगाई गई पूँजी तक ही सीमित रहता है।

प्रश्न 9.
संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय की चार विशेषताएँ (लक्षण) बताइये।
उत्तर:
संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 लागू होता है।
  • इसमें व्यवसाय का प्रबन्ध परिवार के सबसे बड़े सदस्य या कर्ता के हाथों में होता है।
  • इसमें कर्ता का दायित्व असीमित होता है।
  • इसमें व्यवसाय के सदस्यों की संख्या पर कोई प्रतिबंध नहीं होता है।

प्रश्न 10.
संयुक्त हिन्दू परिवार में कर्ता सहित किसी भी सदस्य की मृत्यु होने पर व्यवसाय पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
कर्ता सहित किसी भी सदस्य की मृत्यु के बाद संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय चलता रहता है। परिवार में सबसे बड़ा जीवित सदस्य व्यवसाय का कर्ता बन जाता है लेकिन परिवार के सभी सदस्य यदि यह घोषित करें कि अब वे संयुक्त परिवार व्यवसाय के सदस्य नहीं हैं तो इसका समापन हो जाता है।

प्रश्न 11.
संयुक्त हिन्दू परिवार में ‘कर्ता’ से आपका क्या आशय है?
उत्तर:
संयुक्त हिन्दू परिवार के व्यवसाय में अपने पूर्वजों की सम्पत्ति पर सभी सदस्यों का समान अधिकार होता है। लेकिन व्यवसाय पर नियन्त्रण एवं प्रबन्ध की दृष्टि से परिवार में सबसे बड़ी आयु का व्यक्ति ही कार्य करता है। इसी को ‘कर्ता’ या परिवार का मुखिया कहते हैं। संयुक्त हिन्दू परिवार के दायित्वों के सन्दर्भ में इसका उत्तरदायित्व असीमित होता है। अर्थात् यदि हानि होती है तो इसे अपनी व्यक्तिगत सम्पत्तियों से भी दायित्वों का भुगतान करना पड़ सकता है।

प्रश्न 12.
सीमित दायित्व साझेदारी अधिनियम 2008 की चार प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. सीमित दायित्व साझेदारी (LLP) को एक पृथक् कानूनी इकाई के रूप में मान्यता होगी।
  2. भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 के प्रावधान इस पर लागू नहीं होंगे परन्तु कम्पनी अधिनियम के प्रावधान लागू किये जा सकते हैं।
  3. यह एक निगम निकाय है तथा इसका अपने साझेदारों से पृथक् वैधानिक अस्तित्व होता है।
  4. सभी साझेदारों का दायित्व उनके सहमत अनुपात तक सीमित रहेगा।

प्रश्न 13.
सहकारिता के दो लक्षणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
1. ऐच्छिक संगठन – सहकारिता एक स्वतन्त्र सार्वलौकिक संगठन है जिसमें व्यक्ति स्वेच्छा से स्वतन्त्रतापूर्वक सदस्य बन सकता है या सदस्यता त्याग सकता है।

2. समानता की व्यवस्था – सहकारिता में गरीब – अमीर, शिक्षित – अनपढ़ या लिंग, जाति, वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। सभी एक समान सदस्य होते हैं।

प्रश्न 14.
सहकारिता द्वारा किस प्रकार रोजगार के साधनों में वृद्धि होती है?
उत्तर:
सहकारिता एक आर्थिक आन्दोलन है जिसके माध्यम से लाखों व्यक्तियों को रोजगार मिला है। सहकारी समितियाँ ग्रामीण बचतों को प्रोत्साहित कर इकट्ठा करती है जिससे बहुत बड़ी पूँजी का निर्माण होता है और इस बचत को उत्पादन कार्यों में लगाया जाता है इसमें अनेक व्यक्तियों को रोजगार मिलता है। सीमित साधन वाले व्यक्ति भी आपस में मिलकर अपने साधनों को इकट्ठा कर कोई न कोई उत्पादन कार्य प्रारम्भ कर सकते हैं।

प्रश्न 15.
राजस्थानी स्टेट को – ओपरेटिव बैंक लिमिटेड द्वारा वर्ष 2014 – 15 में क्रियान्वित मुख्य योजनाओं का वर्णन कीजिए?
उत्तर:

  • सहकारी किसान क्रेडिट कार्ड धारकों को 1683054 करोड़ का ऋण दिया गया।
  • ज्ञान सागर ऋण योजना में 15.77 लाख का ऋण दिया गया।
  • स्वरोजगार क्रेडिट कार्ड योजना में 1564.04 लाख का ऋण प्रदान किया गया है।
  • व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना के अन्तर्गत तीन लाख का 43र प्रीमियम की दर पर बीमा किया गया।
  • स्वयं सहायता समूह ऋण सुविधा हेतु 3600 स्वयं सहायता समूहों को 3410 लाख का ऋण प्रदान किया गया।

प्रश्न 16.
स्वतन्त्रता से पूर्व हमारा देश किन सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा था?
उत्तर:
स्वतन्त्रता से पहले हमारा देश आय की असमानता और रोजगार के निम्न स्तर, आर्थिक विकास और प्रशिक्षित जन शक्ति, कमजोर औद्योगिक आधार, अपर्याप्त निवेश और बुनियादी सुविधाओं आदि के अभाव में क्षेत्र असन्तुलन जैसी गम्भीर सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा था।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 2 लघु उत्तरीय प्रश्न (SA – II)

प्रश्न 1.
क्या एक नाबालिग साझेदारी फर्म में साझेदार हो सकता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
नाबालिग व्यक्ति अनुबंध करने में सक्षम नहीं होता है तथा साझेदारी का निर्माण दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच अनुबंध के आधार पर होता है। अत: एक नाबालिग व्यक्ति साझेदार नहीं बन सकता है। हाँ, उसे सभी साझेदारों की सहमति से लाभ में हिस्सेदार बनाया जा सकता है। इस स्थिति में उसका दायित्व उसके द्वारा लगाई गई पूँजी तक सीमित रहता है, वह फर्म के प्रबन्ध में भाग नहीं ले सकता। नाबालिग के बालिग हो जाने पर 6 माह के अन्दर उसे सार्वजनिक नोटिस देकर अपनी स्थिति को स्पष्ट करना होता है कि वह फर्म में साझेदार बने रहना चाहता है अथवा नहीं। नोटिस न देने पर पूर्ण साझेदार मान लिया जाता है और उसको दायित्व असीमित होता है।

प्रश्न 2.
सहकारी संगठन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
सहकारी संगठन उन लोगों का स्वैच्छिक संगठन है जो आपसी कल्याण के लिये एकजुट हुये हैं। इसकी प्रमुख परिभाषाएँ निम्न हैं –

एम.टी. हैरिक के अनुसार – “सहकारिता स्वेच्छा से संगठित ऐसे व्यक्तियों की क्रिया है जो सामूहिक लाभ या हानि के लिये पारस्परिक प्रबन्ध के अन्तर्गत अपनी शक्तियों या दोनों का सम्मिलित प्रयोग करते हैं।”

भारतीय सहकारी समिति अधिनियम, 1912 की धारा 4 (स) के अनुसार – “सहकारी समिति – एक ऐसी समिति है, जिसका उद्देश्य सिद्धान्तों के अनुरूप अपने सदस्यों के आर्थिक हितों में वृद्धि करना है।”

प्रश्न 3.
सहकारी समिति किस प्रकार जनतान्त्रिक एवं धर्म – निरपेक्षता का आदर्श प्रस्तुत करती है?
उत्तर:
सहकारी समिति के सदस्य अपने में से ही एक प्रबन्ध समिति का चयन करते हैं जो समिति के सभी कार्यों को व्यवस्थित रूप से संचालित करती है। इस चयन हेतु सहकारी समिति के प्रत्येक सदस्य को एक वोट देने का अधिकार होता है चाहे उसने कितनी भी पूँजी लगायी हो। इस प्रकार सहकारी समिति जनतान्त्रिक आदर्श प्रस्तुत करती है।

सहकारी समिति का सदस्य बनने के लिए किसी विशेष योग्यता का निर्धारण नहीं किया गया है। कोई भी व्यक्ति कभी भी इसकी सदस्यता ग्रहण कर सकता है तथा कभी भी सदस्यता का त्याग कर सकता है। यह व्यक्ति किसी भी जाति, धर्म या प्रान्त का हो सकता है। इसकी सदस्यता में किसी भी धर्म के लोगों के प्रति भेदभाव नहीं किया जाता है तथा किसी धर्म के लोगों को सदस्यता में प्राथमिकता नहीं दी जाती है। इस प्रकार ये सहकारी समितियाँ धर्म – निरपेक्षता का आदर्श प्रस्तुत करती हैं।

प्रश्न 4.
‘भूमि विकास बैंक’ पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भारतीय किसानों को लम्बे समय हेतु (दीर्घकालीन) ऋण प्रदान करने के लिए भूमि विकास बैंक स्थापित किये गये है। ये बैंक अपने सदस्यों को उनकी भूमि की जमानत पर ऋण प्रदान करते हैं। राजस्थान में इनका ढाँचा द्वि – स्तरीय है। जिला स्तर पर प्राथमिक भूमि विकास बैंक कार्य करता है तथा राज्य स्तर पर राज्य सहकारी भूमि विकास बैंक कार्य करता है। ये बैंक अपने सदस्यों को भूमि की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए, सिंचाई की व्यवस्था करने, कुंए व तालाबों के निर्माण व पम्प सेट आदि लगाने, भूमि खरीदने व फलों की खेती के लिये दीर्घकालीन ऋण प्रदान करते हैं। इनकी ब्याज दर कम होती है तथा ऋण को किस्तों में भुगतान की सुविधा होती है।

प्रश्न 5.
राजस्थान राज्य सहकारी बैंक/शीर्ष बैंक के कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
राजस्थान राज्य सहकारी बैंक के कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. राज्य में सहकारी साख व्यवस्था का प्रचार करना।
  2. रिजर्व बैंक, नावार्ड एवं राज्य के केन्द्रीय सहकारी बैंकों के बीच सम्पर्क का कार्य करना।
  3. विभिन्न केन्द्रीय सहकारी बैंकों के मध्य वित्तीय सन्तुलन का कार्य करना।
  4. विनिमय बिलों एवं चैकों आदि का संग्रह करना।
  5. बहुमूल्य वस्तुओं को सुरक्षित रखने के लिये लाकर्स की सुविधायें प्रदान करना।

प्रश्न 6.
सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिये मिलने वाले खिताब ‘महारत्न’ पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
महारत्न का खिताब प्राप्त करने की योग्यता के लिये एक कम्पनी क्त वर्ष में औसत कारोबार के Rs.20000 करोड़ रुपये होना चाहिए जो तीन साल पहले Rs.25000 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया था। कम्पनी का औसत वार्षिक कुल मूल्य Rs.10000 करोड़ रुपये होना चाहिए। महारत्न का खिताब वृहद् सीपीएसई को अपने अभियान का विस्तार करने और वैश्विक स्तर पर उभरने की ताकत प्रदान करता है।

प्रश्न 7.
भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री श्री नेहरू ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को आधुनिक भारत का मन्दिर क्यों कहा था?
उत्तर:
भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री श्री नेहरू ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को आधुनिक भारत का मन्दिर कहा था, उनका यह कथन अकारण नहीं था। प्रथम पंचवर्षीय योजना में है 29 करोड़ के कुल निवेश से पाँच केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम स्थापित किये जाने के बाद से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने हमारे देश की आय असमानता और रोजगार के अवसर, आर्थिक विकास और प्रशिक्षित जनशक्ति, बुनियादी सुविधाओं आदि सामाजिक – आर्थिक विकास में बहुत अहम भूमिका निभाई है। इन उपक्रमों का कुल कारोबार देश की जी.डी.पी. का करीब 25 प्रतिशत और निर्यात आय में इनकी हिस्सेदारी 8 प्रतिशत है। इन इकाइयों में लगभग 13.9 लाख लोग काम करते हैं।

RBSE Class 11 Business Studies Chapter 2 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“प्रत्येक व्यवसायी का प्रमुख उद्देश्य लाभ कमाना है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
अथवा
व्यवसाय में लाभ की भूमिका को विस्तार से समझाइये।
उत्तर:
प्रत्येक व्यवसायी का प्रमुख उद्देश्य लाभ कमाना है। लाभ ही व्यवसायी को कार्य करने की प्रेरणा देता है। व्यवसाय को स्थिर रखने में लाभ की मुख्य भूमिका होती है। लाभ व्यवसाय के संचालन, उसके विकास एवं विस्तार के लिए अत्यंत आवश्यक है। लाभार्जन क्षमता के आधार पर ही व्यवसायी एवं व्यवसाय की सफलता ऑकी जाती है। एडम स्मिथ के अनुसार, “लाभ वह मंत्र है जो मनुष्य की स्वार्थपरता को उपयोगी सेवाओं में बदल देता है। अतः स्पष्ट है कि यदि व्यवसायी को लाभ प्राप्त न हो तो लोगों को उनकी आवश्यक वस्तु एवं सेवाएँ भी प्राप्त नहीं होंगी।

लाभ को व्यवसायी का प्रमुख उद्देश्य निम्न कारणों से माना जाता है –
1. लाभ सेवाओं को प्रतिफल – व्यवसायी अन्य व्यक्तियों की तरह व्यवसाय चलाने में परिश्रम कर रहा है। अत: इसको मिलने वाला लाभ उसकी सेवाओं का प्रतिफल मात्र है। बिना लाभ के कोई व्यक्ति व्यवसाय क्यों करना चाहेगा? जिस प्रकार मजदूर को मजदूरी मिलती है, पूँजीपति को ब्याज मिलता है, उसी प्रकार व्यवसायी को लाभ प्राप्त होता है।

2. लाभ एक प्रेरणा – कोई भी व्यक्ति लाभ की प्रेरणा से ही व्यवसाय के क्षेत्र में प्रवेश करता है। लाभ के माध्यम से ही वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। लाभ ही वह तत्त्व है जो व्यवसायी को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। यदि व्यवसायी को लाभ प्राप्त होने की सम्भावना न हो तो वह व्यवसाय नहीं करेगा, इसके परिणामस्वरूप लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।

3. लाभ ही विनिमय का आधार है – वस्तुओं एवं सेवाओं का विनिमय पारस्परिक, लाभ के लिए ही किया जाता है। अत: व्यावसायिक लेन – देनों का आधार लाभ ही है। यदि लाभ नहीं होगा तो कोई भी व्यक्ति विनिमय नहीं करेगा जिसके परिणामस्वरूप कुछ लोगों के पास अनावश्यक वस्तुएँ एकत्रित हो जायेंगी तथा कुछ लोगों को उनकी आवश्यक वस्तुएँ भी प्राप्त नहीं होंगी।

4. व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन – प्रत्येक व्यक्ति को अपनी तथा अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करना होता है। ये आवश्यकताएँ व्यवसायी द्वारा अर्जित लाभ से ही पूरी की जाती हैं। जब तक आवश्यकताएँ हैं तब तक समाज में लाभ का अस्तित्त्व भी बना ही रहेगा।

5. व्यावसायिक कुशलता का मापदण्ड – किसी व्यवसाय एवं व्यवसायी की कुशलता लाभ की मात्रा से ही ऑकी जाती है। जब व्यवसाय से लाभ होता है तो यह माना जाता है कि व्यवसाय कुशलतापूर्वक चलाया जा रहा है/चल रहा है तथा संसाधनों का सदुपयोग हो रहा है।

अधिकांशतः व्यक्ति लाभ को व्यवसाय का प्रमुख उद्देश्य मानते हैं। लोनोपा ने लाभ को व्यवसाय का अनिवार्य अंग बताया है लेकिन कुछ लोग इस बात से सहमत नहीं हैं, उनके अनुसार लाभ कमाना व्यवसाय को प्रमुख उद्देश्य नहीं है। बल्कि यह तो व्यावसायिक क्रियाओं के सफल संचालन का परिणाम है क्योंकि यदि व्यवसाय का संचालन सफलतापूर्वक न हो तो हानि भी उठानी पड़ती है।

प्रश्न 2.
व्यवसाय के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिये।
अथवा
व्यावसायिक संगठन के प्रारूपों को संक्षेप में समझाइये।
उत्तर:
व्यवसाय के प्रकार:
व्यवसाय के प्रकार (स्वरूप) निम्नलिखित हैं –
1. एकल व्यापार – एकल व्यापार व्यावसायिक स्वामित्व का अति प्राचीन स्वरूप है जिसमें व्यवसाय का स्वामित्व एक ही व्यक्ति के हाथों में होता है। वहीं उसमें पूँजी लगाता है, उसका प्रबन्ध करता है तथा समस्त लाभ – हानि के लिये उत्तरदायी होता है। इस प्रकार इस प्रारूप में व्यवसाय के प्रारम्भं से अन्त तक एक ही व्यक्ति सभी क्रियाओं पर नियन्त्रण रखता है।

2. साझेदारी – व्यावसायिक स्वामित्व का यह प्रारूप सामूहिक स्वामित्व या संयुक्त स्वामित्व का प्रतीक है। व्यावसायिक स्वामित्व के इस प्रारूप में कम – से – कम दो व्यक्ति हो सकते हैं तथा साझेदारी की अधिकतम संख्या के बारे में साझेदारी अधिनियम, 1932 में कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन भारतीय कम्पनी अधिनियम की धारा 4 के अनुसार 50 से अधिक नहीं होने चाहिए। इसमें एक निश्चित समझौते के अन्तर्गत व्यवसाय की स्थापना की जाती है एवं उसका संचालन किया जाता है। व्यवसाय में होने वाले लाभ को आपस में बाँट लिया जाता है।

3. हिन्दू अविभाजित परिवार एवं पारिवारिक व्यवसाय – व्यवसाय संगठन के इस स्वरूप का संगठन परिवार के मुखिया (कर्ता) के हाथों में केन्द्रित रहता है तथा वही परिवार के अन्य सदस्यों के सहयोग से व्यवसाय को चलाता है। ऐसे प्रारूप में मुखिया को ही समस्त निर्णय लेने तथा अन्य समस्त व्यवहार करने का अधिकार होता है। यह प्रारूप केवल भारत में ही पाया जाता है।

4. संयुक्त पूँजी कम्पनी – संयुक्त पूँजी कम्पनी व्यावसायिक स्वामित्व का विकसित एवं आधुनिक प्रारूप है जिसकी स्थापना भारतीय कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत की जाती है। कम्पनी विधान द्वारा निर्मित एक कृत्रिम व्यक्ति है जिसका उसके सदस्यों से पृथक् अस्तित्त्व होता है तथा जिसके पास एक सार्वमुद्रा होती है। इसके सदस्यों का दायित्व साधारणत: सीमित होता है। यह दूसरों पर वाद प्रस्तुत कर सकती है और दूसरे इस पर भी वाद प्रस्तुत कर सकते है।

5. सहकारी समिति – यह व्यावसायिक संगठन का ऐसा प्रारूप है जिसमें कुछ व्यक्ति स्वेच्छा से सहकारिता के आधार पर संगठित होते है और अपने साधनों को एकत्रित करते है। इन साधनों से अपने पारस्परिक हितों की रक्षा के लिये व्यवसाय का संचालन करते है। इसका सिद्धान्त है “एक सबके लिये और सब एक के लिये”। इसमें सहकारी समिति अधिनियम, 1912 लागू होता है।

6. सार्वजनिक उपक्रम – भारत सरकार द्वारा नियंत्रित एवं संचालित उद्यमों एवं उपक्रमों को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम या पी.एस.यू. कहा जाता है। इन उपक्रमों में सरकारी पूँजी की हिस्सेदारी 51% या इससे अधिक होती है। इस प्रारूप में स्थापित उपक्रमों का संगठन मुख्यत: विभागीय संगठन, निगम, कम्पनी परिचालन अनुबन्ध व्यवस्था, अभ्यास मण्डल एवं सूत्रधारी कम्पनी आदि प्रारूपों में किया जाता है।

प्रश्न 3.
एक उपयुक्त संगठन का स्वरूप चुनना क्यों महत्वपूर्ण है? उन घटकों का विवेचन कीजिए जो संगठन के किसी स्वरूप के चुनाव में सहायक होते हैं।
उत्तर:
संगठन के एक उपयुक्त स्वरूप के चुनाव का महत्व:
एंकल व्यापार, संयुक्त हिन्दू परिवार, साझेदारी, सहकारी संगठन एवं संयुक्त पूँजी कम्पनी ये सभी संगठन के स्वरूप हैं। ये सभी स्वरूप प्रत्येक व्यवसाय के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते क्योंकि इन सभी स्वरूपों के अपने – अपने गुण – दोष हैं। अतः उपयुक्त व्यवसाय के लिए उपयुक्त संगठन स्वरूप का चयन करना अति आवश्यक हो जाता है। उपयुक्त संगठन स्वरूप का चयन न होने पर अर्थात् गलत चयन होने पर व्यवसाय असफल हो सकता है। अतः व्यवसाय संगठन के स्वरूप का चयन करते समय व्यवसाय की प्रकृति, आकार, क्षेत्र आदि का ध्यान रखना चाहिए तथा परिस्थितियों को समझकर उनके अनुकूल ही संगठन के स्वरूप का चयन करना चाहिए।

संगठन के स्वरूप के चुनाव में सहायक घटक:
संगठन के स्वरूप का चुनाव करते समय निम्नलिखित घटकों को ध्यान में रखना अति आवश्यक है –
1. प्रारम्भिक लागत – प्रारम्भिक लागत के सन्दर्भ में एकल व्यवसाय सबसे कम खर्चीला होता है तथा साझेदारी भी सीमित पैमाने का व्यवसाय होने के कारण कम खर्चीली होती है। लेकिन सहकारी समिति एवं कम्पनी का पंजीयन अनिवार्य होने के कारण इनका प्रारम्भिक व्यय अधिक होता है। अतः छोटे स्तर पर व्यवसाय के लिए एकल स्वामित्व तथा साझेदारी उपयुक्त है। जबकि बड़े स्तर पर व्यवसाय के लिए कम्पनी प्रारूप उपयुक्त होता है।

2. दायित्व – एकल स्वामित्व एवं साझेदारी में स्वामी का दायित्व असीमित होता है तथा सहकारी समिति एवं कम्पनी में सदस्यों का दायित्व सीमित होता है और हिन्दू अविभाजित परिवार में केवल कर्ता का दायित्व असीमित होता है। इस दृष्टि से कम्पनी स्वरूप उचित है।

3. निरन्तरता – एकल स्वामित्व एवं साझेदारी स्वामी की मृत्यु, दिवालिया या पागल होने पर समाप्त हो जाते हैं जबकि संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय, सहकारी समिति एवं कम्पनी की निरन्तरता पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अत: कम समय तक चलने वाले व्यवसाय के लिए एकल स्वामित्व तथा साझेदारी उपयुक्त है जबकि लम्बे समय तक चलने वाले व्यवसाय के लिए कम्पनी स्वरूप अधिक उपयुक्त रहता है।

4. प्रबन्धकीय योग्यता – एकल व्यापारी सभी क्षेत्रों का विशेषज्ञ नहीं हो सकता है इसलिए इसमें प्रबन्धकीय योग्यता की कमी पायी जाती है। जबकि साझेदारी या कम्पनी इस दृष्टि से उपयुक्त सांगठनिक स्वरूप है।

5. पूँजी – एकल स्वामित्व एवं साझेदारी में पूँजी सीमित मात्रा में ही पायी जाती है। जबकि कम्पनी पूँजी की दृष्टि से उपयुक्त विकल्प है। कम्पनी बाजार से भी ऋण आदि के माध्यम से वित्त की व्यवस्था कर सकती है।

6. नियन्त्रण – व्यवसाय संचालन में नियन्त्रण का अधिकार स्वयं के पास ही रखना है तो एकल स्वामित्व उपयुक्त है। जबकि नियन्त्रण में भागीदारी स्वीकार हो तो साझेदारी अथवा कम्पनी अच्छे विकल्प हो सकते हैं। कम्पनी में स्वामी एवं प्रबन्धक अलग – अलग होते हैं।

7. व्यवसाय की प्रकृति – यदि व्यवसाय ऐसा है जिसमें ग्राहकों आदि से स्वामी का व्यक्तिगत सम्पर्क आवश्यक है तो एकल स्वामित्व अधिक उपयुक्त रहेगा। यदि पेशेवर क्षेत्रों का व्यवसाय है तो साझेदारी उपयुक्त रहेगी। यदि व्यवसाय का सम्बन्ध विनिर्माण कार्य से है जहाँ व्यक्तिगत सम्पर्क आवश्यक नहीं होता तो वहाँ कम्पनी स्वरूप उपयुक्त रहेगा।

8. कानूनी औपचारिकताएँ – व्यवसायी को यह देखना होगा कि वह विभिन्न प्रकार की कानूनी प्रक्रियाओं को पूर्ण कर सकता है या नहीं। यदि वह ऐसा कर सकता है तो सहकारी समिति या संयुक्त स्कन्ध कम्पनी का चयन कर सकता है। यदि नहीं तो उसे एकल स्वामित्व या साझेदारी का चयन करना चाहिए।

9. जोखिम की मात्रा – जोखिम की मात्रा भी संगठन के स्वरूप के चयन को प्रभावित करती है। यदि अधिक जोखिम की सम्भावना है तो सहकारी समिति या कम्पनी स्वरूप को चुनना उपयुक्त रहेगा क्योंकि इनके सदस्य अधिक होते हैं तथा उनका दायित्व भी सीमित होता है। यदि व्यवसाय ऐसा है जिसमें जोखिम की मात्रा कम है तो संगठन का एकल स्वामित्व स्वरूप ही उपयुक्त रहेगा।

10. झवी विस्तार की सम्भावनाएँ – यदि भविष्य में व्यवसाय के विस्तार की सम्भावनाएँ अधिक हों तो संगठन का साझेदारी या कम्पनी स्वरूप उपयुक्त रहेगा और यदि विस्तार की सम्भावनाएँ नहीं हैं तो संगठन का एकल स्वामित्व स्वरूप ही उपयुक्त रहेगा। अत: व्यवसाय विस्तार की भावी सम्भावनाएँ भी संगठन के स्वरूप को चयन में ध्यान देने योग्य घटक है।

11. कर भार – यदि लाभ की सम्भावित मात्रा अधिक हो तो कर की दृष्टि से कम्पनी स्वरूप उपयुक्त रहता है। यदि लाभ सीमित मात्रा में ही होने वाला है तो एकल स्वामित्व या साझेदारी स्वरूप उपयुक्त माना जाता है।

प्रश्न 4.
“एकल व्यापार विश्व में सर्वोत्तम है, यदि वह व्यक्ति इतना सर्वगुण सम्पन्न हो कि वह व्यापार सम्बन्धी हर चीज पर नियन्त्रण कर सके।” इस कथन पर प्रकाश डालिए तथा एकल व्यापार की सीमाओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
एकल व्यापार के दोषों पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
उत्तर:
एकाकी व्यापार अपने विभिन्न गुणों के कारण व्यावसायिक संगठन का एक उत्तम प्रारूप है क्योंकि इसमें व्यापार को चलाने वाला एवं स्वामी एक ही व्यक्ति होता है जो व्यापार की अच्छी देख – रेख कर सकता है, गोपनीयता बनाये रख सकता है तथा शीघ्र निर्णय लेकर व्यापारिक गतिविधियों को कुशलतापूर्वक चला सकता है। ऐसा तभी सम्भव हो सकता है जब वह व्यक्ति सर्वगुण सम्पन्न हो तथा व्यापार को आकार भी छोटा हो।

सर्वगुण सम्पन्न व्यक्ति बहुत कम होते हैं तथा आजकल व्यवसाय अधिकांशतः बड़े पैमाने पर किये जाते हैं। इस कारण इन बड़े पैमाने के व्यवसायों को, जिनमें अनेकों जटिलताएँ होती हैं, एकल स्वामित्व संगठन के रूप में चलाना सम्भव नहीं हो पाता है। अतः प्रो. विलियम आर. वैसेर का यह कथन कि “एकाकी व्यापार विश्व में सर्वोत्तम है, यदि वह व्यक्ति इतना सर्वगुण सम्पन्न हो कि वह व्यापार सम्बन्धी हर चीज पर नियन्त्रण कर सके” एक सीमा तक ही सच प्रतीत होता है। छोटे आकार के व्यापारों के लिए जिसमें कम पूँजी की आवश्यकता होती है तथा कम प्रबन्धकीय कुशलता से काम चल सकता है, ये प्रारूप आज भी अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाये हुए हैं लेकिन इस प्रारूप की अपनी सीमाएँ हैं, जिनके कारण हर प्रकार के व्यवसाय के लिए यह उपयुक्त नहीं रहता है।

ये सीमाएँ अग्रलिखित हैं –
1. छोटा आकार – एकाकी व्यापार प्रारूप तभी उपयुक्त रहता है जबकि व्यापार का आकार छोटा हो। हर व्यक्ति के कार्य करने की सीमा होती है। एक व्यक्ति मात्र के लिए बड़े पैमाने के व्यवसाय को अकेले चलाना बहुत कठिन होता है। अतः इस प्रारूप को तभी अपनाया जाना चाहिए जबकि व्यापार छोटे पैमाने पर किया जाना हो।

2. सीमित पूँजी – एक व्यक्ति की पूँजी जुटाने एवं ऋण लेने की सीमा होती है। वह अकेला बहुत बड़ी मात्रा में पूँजी की व्यवस्था नहीं कर सकता है। अत: ऐसे व्यापारों के लिए जिनमें बड़ी मात्रा में पूँजी की आवश्यकता होती है, यह प्रारूप उपयुक्त नहीं रहता है।

3. असीमित दायित्व – एकल स्वामित्व प्रारूप में स्वामी का दायित्व असीमित होता है। यदि व्यापार में हानि हो जाती है तो उसकी निजी सम्पत्तियाँ भी बिक जाती हैं तथा वह पूरी तरह बर्बाद हो जाता है। अत: बड़े आकार के एवं जोखिम पूर्ण व्यवसायों के लिए भी व्यवसाय का यह प्रारूप उपयुक्त नहीं होता है। .

4. सीमित जीवनकाल – एकल स्वामित्व व्यवसाय में फर्म एवं स्वामी पृथक् नहीं माने जाते हैं। यदि स्वामी की मृत्यु हो जाती है या वह पागल हो जाता है या दिवालिया हो जाता है अथवा अस्वस्थ हो जाता है तो व्यवसाय बंद हो सकता है। अतः लम्बी अवधि तक व्यवसाय की निरन्तरता को बनाये रखने के लिए यह प्रारूप उपयुक्त नहीं है।

5. सीमित प्रबन्ध क्षमता – व्यवसाय में अनेकों कार्य करने होते हैं, जैसे – माल का क्रय – विक्रय, आय – व्यय का लेखा रखना, कर्मचारियों की नियुक्ति, कार्य विभाजन, नियन्त्रण तथा कर आदि का भुगतान एवं हिसाब – किताब। ये सभी कार्य अकेले व्यक्ति के लिए करना मुश्किल होता है, इसमें त्रुटियाँ हो सकती हैं। हर व्यक्ति की प्रबन्ध क्षमता सीमित होती है तथा वह सभी कार्यों की विशेषज्ञ नहीं होता। ऐसी स्थिति में एकल स्वामित्व अपनाने से जोखिम बढ़ जाता है।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि एकल स्वामित्व प्रारूप तभी श्रेष्ठ रहता है जबकि व्यापार छोटे आकार का हो, उसमें जोखिम कम हो, कम पूँजी एवं प्रबन्ध कुशलता की आवश्यकता हो अन्यथा साझेदारी या कम्पनी प्रारूप ही ज्यादा उपयुक्त रहते हैं।

प्रश्न 5.
साझेदारी को परिभाषित कीजिये तथा इसके लक्षणों (विशेषताओं) का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
साझेदारी:
साझेदारी का जन्म एकल स्वामित्व के दोषों को दूर करने के लिए हुआ। यह बड़ी मात्रा में पूँजी निवेश, विभिन्न प्रकार के कौशलों एवं जोखिम में भागीदारी की आवश्यकताओं को पूरा करती है।

भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 के अनुसार – “यह उन व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्ध हैं जिनके द्वारा या उन सब की ओर से किसी एक साझेदार द्वारा संचालित व्यापार के लाभ को वे आपस में बाँटने के लिए स्वीकृति देते हैं।”

एल.एच. हैने के अनुसार – “साझेदारी उन लोगों के बीच का सम्बन्ध है जो अनुबन्ध के लिए सर्वथा योग्य हैं तथा जिन्होंने निजी, लाभ के लिए आपस में मिलकर एक वैधानिक व्यापार करने का समझौता किया है।”

भारतीय प्रसंविदा अधिनियम के अनुसार – “साझेदारी उन लोगों के मध्य सम्बन्ध है जिन्होंने किसी व्यवसाय में अपनी सम्पत्ति, श्रम अथवा निपुणता को मिला लिया है तथा वे आपस में उससे होने वाले लाभ को बाँटते हैं।”

साझेदारी के लक्षण:
साझेदारी के लक्षण या विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. स्थापना – साझेदारी की स्थापना भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 के अनुसार कानूनी समझौते द्वारा होती है। इसमें साझेदारों के मध्य सम्बन्धों, लाभ – हानि को बाँटने, संचालन आदि के बारे में स्पष्ट उल्लेख होता है। साझेदारी का गठन लाभ के लिए वैध व्यवसाय हेतु किया जा सकता है न कि धर्मार्थ सेवा या अवैध व्यवसाय हेतु।

2. असीमित दायित्व – फर्म के साझेदारों का दायित्व असीमित होता है। यदि व्यवसाय की सम्पत्तियाँ ऋणों के भुगतान के लिए अपर्याप्त हैं तो साझेदारों की व्यक्तिगत सम्पत्तियों से ऋणों को चुकाया जायेगा। साझेदार ऐसा करने के लिए व्यक्तिगत एवं संयुक्त रूप से उत्तरदायी होंगे।

3. जोखिम वहन करना – व्यवसाय को संचालित करने से उत्पन्न लाभ को साझेदार जिस अनुपात में बाँटते हैं उसी अनुपात में वे हानि को भी बाँटने के लिए उत्तरदायी होते हैं।

4. निर्णय एवं नियन्त्रण – साझेदार आपस में मिलकर दिन – प्रतिदिन के कार्यों के बारे में निर्णय करते हैं तथा उसी प्रकार नियन्त्रण करने के अपने उत्तरदायित्व का भी निर्वहन करते हैं।

5. निरन्तरता – साझेदारी में निरन्तरता का अभाव पाया जाता है क्योंकि यदि कोई एक साझेदार मर जाता है, अवकाश ग्रहण करता है, दिवालिया या पागल हो जाता है तो साझेदारी समाप्त हो जाती है। इसके पश्चात् शेष साझेदार पुनः नई साझेदारी का गठन कर सकते हैं।

6. सदस्य संख्या – साझेदारी में कम से कम दो तथा बैंकिंग व्यवसाय के लिए अधिकतम 10 तथा अन्य व्यवसायों के लिए 20 सदस्य हो सकते हैं।

7. एजेंसी सम्बन्ध – साझेदारी को सभी सदस्यों की ओर से कोई एक चला सकता है या वें सभी मिलकर चला सकते हैं। अत: प्रत्येक साझेदार एजेन्ट भी होता है तथा स्वामी भी होता है।

प्रश्न 6.
साझेदारी एवं एकल व्यापार में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
साझेदारी एवं एकल व्यापार में अन्तर
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प्रश्न 7.
सहकारिता से आपको क्या आशय है? इनकी विशेषताओं (लक्षणों) पर प्रकाश डालिये।
उत्तर:
सहकारी शब्द से आशय किसी साझे उद्देश्य के लिये मिलकर काम करने से है। सहकारी समिति उन लोगों का स्वैच्छिक संगठन है जो आपसी लाभ हेतु एकजुट हुए हैं। ये संभावित शोषण से बचने हेतु अपने आर्थिक हितों से प्रेरित होते हैं। ये संगठन सहकारी समिति अधिनियम, 1912 के अन्तर्गत पंजीकृत होते हैं।

एम.टी. हैरिक के अनुसार – “सहकारिता स्वेच्छा से संगठित ऐसे व्यक्तियों की क्रिया है, जो सामूहिक लाभ या हानि के लिए पारस्परिक प्रबन्ध के अन्तर्गत अपनी शक्तियों, साधनों या दोनों का सम्मिलित प्रयोग करते हैं।”

सहकारिता के लक्षण या विशेषताएँ:
सहकारिता के लक्षण या विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. स्वैच्छिक सदस्यता – सहकारी समिति की सदस्यता ऐच्छिक होती है। किसी भी धर्म, जाति एवं लिंग का कोई भी व्यक्ति इसका सदस्य बन सकता है। इसी प्रकार एक नोटिस देकर कोई भी सदस्य अपनी सदस्यता का त्याग भी कर सकती है।

2. वैधानिक स्थिति – इसका पंजीकरण अनिवार्य होता है। समिति तथा इसके सदस्यों का अस्तित्त्व पृथक् होता है। इसके अस्तित्व पर सदस्यों के प्रवेश या छोड़कर जाने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। समिति किसी भी व्यक्ति या संस्था पर मुकदमा कर सकती है तथा कोई भी व्यक्ति समिति पर भी मुकदमा कर सकता है।

3. सीमित दायित्व – सहकारी समिति के सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा लगाई गई पूँजी की सीमा तक ही सीमित होता है।

4. नियन्त्रण – समिति का स्वरूप प्रजातान्त्रिक होता है। इसके सदस्य वोट के द्वारा प्रबन्ध कमेटी का चयन करते हैं, जो समिति से सम्बन्धित सभी निर्णय लेती है तथा सभी कार्यों पर नियन्त्रण भी रखती है।

5. सेवा भावना – सहकारी समिति के उद्देश्य एक – दूसरे की सहायता एवं कल्याण के मूल्यों पर आधारित लेते हैं। अतः समिति के कार्यों में सेवाभाव की प्रधानता पायी जाती है।

6. समान मताधिकार – सहकारी समितियाँ ‘एक व्यक्ति एक वोट’ के प्रजातान्त्रिक सिद्धान्त पर कार्य करती हैं। लगाई गई पूँजी को मताधिकार से कोई सम्बन्ध नहीं होता है, सभी सदस्यों को केवल एक वोट देने का अधिकार होता है।

7. पृथक् वैधानिक अस्तित्व – एक पंजीकृत सहकारी समिति का पृथक् वैधानिक अस्तित्त्व होता है। समिति अपने नाम से ही सम्पत्ति का क्रय – विक्रय करती है। इस पर सदस्यों के आने – जाने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

8. पारस्परिक सहयोग – सहकारी संगठन की एक प्रमुख विशेषता यह है कि ये आपसी स्पर्धा को समाप्त कर सहयोग की भावना पर जोर देते हैं। इसमें सदस्यों के मध्य एक – दूसरे की सहायता करना नैतिक कर्त्तव्य माना जाता है।

प्रश्न 8.
एक संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय एवं साझेदारी में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय एवं साझेदारी में अन्तर
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सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम देश के आर्थिक विकास और संपन्नता में महत्वपूर्ण योगदान कर रहें हैं।

पाठ्यपुस्तक में दिए चार्ट पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
देश में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को लोक उपक्रम विभाग द्वारा किन – किन रत्नों से नवाजा जाता है?
उत्तर:
महारत्न, नवरत्न और मिनीरत्न।

प्रश्न 2.
सार्वजनिक क्षेत्र के ‘महारत्न’ खिताब का दर्जा प्राप्त दो उपक्रमों के नाम बताइये।
उत्तर:

  • गैस अथॉरिटी ऑफ इण्डिया (गेल)।
  • कोल इण्डिया लिमिटेड (सी.आई.एल.)।

प्रश्न 3.
“नवरल” खिताब का दर्जा प्राप्त दो उपक्रमों के नाम बताइये।
उत्तर:

  • भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (वी.पी.सी.एल.)।
  • पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड।

प्रश्न 4.
इंजीनियर्स इण्डिया लिमिटेड को सर्वश्रेष्ठ ग्लोबल प्रजेंस अवार्ड में किस दर्जे का खिताब हासिल है?
उत्तर:
मिनीरत्न।

प्रश्न 5.
सर्वाधिक ईको – फ्रेंडली के क्षेत्र में “महारत्न” का दर्जा किस लोक उपक्रम को प्राप्त है?
उत्तर:
स्टील अथॉरिटी ऑफ इण्डिया लिमिटेड (सेल)।

प्रश्न 6.
“मिनीरत्न” खिताब का दर्जा प्राप्त दो सार्वजनिक उपक्रमों के नाम बताइये।
उत्तर:

  • वाप्कोस लिमिटेड।
  • एन्नोर पोर्ट लिमिटेड।

प्रश्न 7.
सी.एस.आर टिकाऊपन में सर्वश्रेष्ठ “नवरत्न” दर्जा प्राप्त उपक्रम का नाम बताइये।
उत्तर:
ऑयल इण्डिया लिमिटेड।

प्रश्न 8.
राजस्थान इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंस्टुमेंट्स लिमिटेड को “मिनीरत्न” का दर्जा किस क्षेत्र में प्राप्त है?
उत्तर:
आरऐंडी इनोवेशन में सर्वश्रेष्ठ।

प्रश्न 9.
सर्वाधिक मूल्यवान के क्षेत्र में ‘नवरत्न’ दर्जा प्राप्त लोक उपक्रम का नाम बताइये।
उत्तर:
नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एन.एम.डी.सी.)।

प्रश्न 10.
नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड को मिनीरत्न का दर्जा किस क्षेत्र में प्राप्त है?
उत्तर:
सर्वाधिक ईको – फ्रेंडली।

प्रश्न 11.
सर्वश्रेष्ठ ग्लोबल प्रजेंस अवार्ड “महारत्न” का दर्जा प्राप्त लोक उपक्रम का नाम बताइये।
उत्तर:
भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल)।

प्रश्न 12.
सर्वाधिक तेज वृद्धि के क्षेत्र में ‘मिनीरत्न’ का दर्जा प्राप्त सार्वजनिक उपक्रम का नाम बताइये।
उत्तर:
एन्नोर पोर्ट लिमिटेड।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
देश के आर्थिक विकास और ‘सम्पन्नता में महत्वपूर्ण महारत्न’ का दर्जा प्राप्त सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के नाम बताइये।
उत्तर:

  1. गैस अथारिटी ऑफ इण्डिया लिमिटेड (गेल)
  2. कोल इण्डिया लिमिटेड (सी.आई.एल.)
  3. ऑयल एंड नेचुरल गैस कार्पोरेशन (ओ.एन.जी.सी.)
  4. स्टील अथारिटी ऑफ इण्डिया लिमिटेड (सेल)
  5. नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एन.टी.पी.सी.)
  6. भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल)

प्रश्न 2.
“मिनीरत्न” दर्जा प्राप्त पाँच सार्वजनिक उपक्रमों के नाम बताइये।
उत्तर:

  1. वाप्कोस लिमिटेड
  2. एन्नोर पोर्ट लिमिटेड
  3. नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक कॉर्पोरेशन लिमिटेड
  4. इस्कॉन इण्टरनेशनल लिमिटेड
  5. हाउस एंड अर्बन डेक्लपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (हुडको)
  6. नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड

प्रश्न 3.
“नवरत्न” दर्जा प्राप्त पाँच सार्वजनिक उपक्रमों के नाम बताइये।
उत्तर:

  1. भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (वी.पी.सी.एल)
  2. पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड
  3. नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कार्पोरेशन लिमिटेड (एन.एम.डी.सी)
  4. ऑयल इण्डिया लिमिटेड
  5. भारत इलेक्ट्रोनिक्स लिमिटेड

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