RBSE Solutions for Class 11 Political Science Chapter 2 राजनीति विज्ञान का परम्परागत व आधुनिक दृष्टिकोण (व्यवहारवाद एवं उत्तर व्यवहारवाद)

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RBSE Class 11 Political Science Chapter 2 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 Political Science Chapter 2 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यवहारवाद के कोई चार लक्षण बताइए।
उत्तर:
व्यवहारवाद के चार लक्षण हैं-

  1. नियमन
  2. सत्यापन
  3. तकनीक का प्रयोग
  4. परिमाणीकरण

प्रश्न 2.
व्यवहारवाद की किन्हीं तीन सीमाओं को गिनायें।
उत्तर:
व्यवहारवाद की तीन सीमाएँ हैं

  1. राजनीतिक व्यवहार की गलत धारणा
  2. अत्यधिक खर्चीली पद्धति
  3. अत्यधिक शब्दाडम्बर।

प्रश्न 3.
व्यवहारवाद की किन्हीं दो उपलब्धियों को गिनायें।
उत्तर:
व्यवहारवाद की दो उपलब्धियाँ हैं

  1. नये राजनीति विज्ञान की स्थापना,
  2. अन्तर-अनुशासनात्मक दृष्टिकोण की स्थापना

प्रश्न 4.
व्यवहारवाद के किन्हीं दो प्रतिपादकों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. डेविड ईस्टन
  2. चार्ल्स मेरियम।

प्रश्न 5.
उत्तर व्यवहारवाद क्या है?
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवाद एक वैचारिक क्रान्ति है। यह व्यवहारवाद का सुधार आन्दोलन है जिसमें कर्म और प्रासंगिकता पर बल दिया जाता है।

प्रश्न 6.
उत्तर व्यवहारवादी क्रान्ति के दो प्रमुख कारण बताइए।
उत्तर:

  1. व्यवहारवाद के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया।
  2. विश्व मानवता के प्रति दायित्वों की उपेक्षा।

प्रश्न 7.
उत्तर व्यवहारवाद किस प्रकार परम्परावाद से अलग है?
उत्तर:
परम्परावाद राजनीति विज्ञान के शास्त्रीय पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है। वहीं उत्तर व्यवहारवाद राजनीति विज्ञान के वर्तमान समय के विकास को प्रकट करता है।

प्रश्न 8.
उत्तर व्यवहारवाद तथ्य अथवा मूल्य में से किस पर अधिक जोर देता है?
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवाद मूल्य पर अधिक जोर देता है।

प्रश्न 9.
उत्तर व्यवहारवादी उपागम में मूल्यों की क्या भूमिका है?
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवादी उपागम के अनुसार, मानव समाज के लिए केवल उसी ज्ञान का महत्व है जो मूल्यों पर आधारित है।

प्रश्न 10.
उत्तर व्यवहारवाद के दो आधारभूत लक्षण बताइए।
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवाद के दो आधारभूत लक्षण हैं-

  1. सामाजिक परिवर्तन पर बल
  2. मूल्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका।

प्रश्न 11.
व्यवहारवाद एवं उत्तर व्यवहारवाद के बीच दो प्रमुख अन्तर बताइए।
उत्तर-:

  1. व्यवहारवाद तथ्यों पर बल देता है, जबकि उत्तर व्यवहारवाद मूल्यों की केन्द्रीय भूमिका पर बल देता है।
  2. व्यवहारवाद में प्रासंगिकता के सिद्धान्त की उपेक्षा की गयी है, जबकि उत्तर व्यवहारवाद इस सिद्धान्त को मानता है।

RBSE Class 11 Political Science Chapter 2 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यवहारवाद उपागम क्या है?
उत्तर:
व्यवहारवाद उपागम राजनीतिक तथ्यों की व्यवस्था एवं विश्लेषण की एक विशेष विधि है जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् अमरीकी राजनीति शास्त्रियों ने विकसित किया था। व्यवहारवाद उपागम विभिन्न सामाजिक विज्ञानों के अन्तर्गत एक ऐसा बौद्धिक आन्दोलन है जिसका उद्देश्य समाज शास्त्रीय चिंतन को अधिक आनुभविक, प्रामाणिक और वैज्ञानिक बनाना है।

यह उपागम राजनीति विज्ञान के सन्दर्भ में अपना सम्पूर्ण ध्यान राजनीतिक व्यवहार पर केन्द्रित करता है तथा इस बात का प्रतिपादन करता है कि राजनीतिक गतिविधियों का वैज्ञानिक अध्ययन व्यक्तियों के राजनीतिक व्यवहार के आधार पर ही किया जा सकता है। व्यवहारवाद अनुभवात्मक व क्रियात्मक है। इसमें मूल्यों और कल्पनाओं आदि के लिए कोई स्थान नहीं है।

डेविड ईस्टन के अनुसार, “व्यवहारवाद वास्तविक व्यक्तियों पर अपना समस्त ध्यान केन्द्रित करता है।” डेविड टूमैन के अनुसार, “व्यवहारवाद उपागम से अभिप्राय यह है कि अनुसन्धान व्यवस्थित हो तथा उसका प्रमुख आग्रह आनुभविक प्रणालियों के प्रयोग पर ही होना चाहिए।” हज यूलाऊ के अनुसार, “राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन का सम्बन्ध राजनीतिक सन्दर्भ में मानव के कार्यों, रुख, वरीयताओं एवं आकांक्षाओं से है।” संक्षेप में, व्यवहारवाद उपागम एक बौद्धिक प्रवृत्ति, एक अध्ययन पद्धति, आन्दोलन और मनोभाव है जो यथार्थवादी दृष्टिकोण पर आधारित आनुभविक अध्ययन द्वारा मानव व्यवहार का अध्ययन कर राजनीति शास्त्र को विशुद्ध विज्ञान बनाना चाहता है।

प्रश्न 2.
व्यवहारवाद के उदय के कारण बताइए।
उत्तर:
व्यवहारवाद के उदय के कारण – व्यवहारवाद के उदय के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं परम्परागत अध्ययन पद्धतियों के प्रति असन्तोष-
(i) 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में राजनीति शास्त्री परम्परागत राजनीति शास्त्र की अध्ययन पद्धतियों एवं परिणामों से निराश हो गए थे। इसका मुख्य कारण परम्परागत पद्धतियों के माध्यम से राजनीतिक जीवन की वास्तविकता का चित्र उनके सामने स्पष्ट न हो पाना था।

शासन की नीति – निर्माण एवं निर्धारण में उन्हें कोई महत्त्व नहीं दिया जा रहा था। परम्परागत उपागम में यथार्थवादी अध्ययनों का अभाव था। इसके अतिरिक्त यह उपागम फासीवाद, नाजीवाद, प्रजातिवाद एवं एकाधिकारी प्रवृत्तियों के उदय, विकास एवं लोकप्रियता की व्याख्या करने में असमर्थ था।

(ii) द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रभाव – द्वितीय विश्व युद्धकालीन प्रमुख घटनाओं ने राजनीति वैज्ञानिकों को नवीन शोध एवं सिद्धान्त के लिए प्रेरित किया। राजनीति वैज्ञानिकों के मन में यह धारणा बन गई थी कि राजनीतिक जीवन की जटिलताओं को पूर्णतया समझने हेतु संस्थाओं एवं उनकी संरचनाओं के अध्ययन के स्थान पर राजनीतिक संस्थाओं और उनमें कार्यरत व्यक्तियों के व्यवहार पर ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक है।

(iii) विभिन्न सामाजिक विज्ञानों से प्रेरणा – अन्य सामाजिक विज्ञानों में अध्ययन की वैज्ञानिक पद्धति एवं व्यवहारवादी दृष्टिकोण का बहुत पहले से ही प्रयोग हो रहा था। अतः राजनीति विज्ञान ने भी उनसे प्रेरित होकर अध्ययन के वैज्ञानिक एवं नवीन तरीकों को अपनाना प्रारम्भ कर दिया।

(iv) नवीन अध्ययन पद्धतियों का प्रयोग-परीक्षण, उपकरणों, सर्वेक्षण पद्धतियों, गणितीय प्रारूपों, सांख्यिकीय विश्लेषणों एवं निदर्शन-सर्वेक्षण आदि प्रविधियों के बढ़ते हुए प्रयोग ने राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन को वस्तुनिष्ठ बनाकर व्यवहारवाद को बढ़ावा दिया।

प्रश्न 3.
व्यवहारवाद की सीमाओं एवं उपलब्धियों को गिनाइए।
उत्तर:
व्यवहारवाद की सीमाएँ – व्यवहारवाद की सीमाएँ निम्नलिखित हैं:

  1. अत्यधिक शब्दाडम्बर
  2. तकनीक एवं पद्धतियों पर अनुचित बल
  3. मूल्य निरपेक्ष अध्ययन सम्भव नहीं
  4. राजनीतिक व्यवहार की गलत धारणा
  5. अत्यधिक खर्चीली पद्धति
  6. राज़नीति विज्ञान के स्वतन्त्र अस्तित्व को खतरा
  7. सुनिश्चित सिद्धान्त एवं भविष्यवाणी असम्भव,
  8. कथन व आचरण में विरोध,
  9. अध्ययन हेतु अन्य पद्धतियों की अनुचित उपेक्षा,
  10. राजनीतिक व्यवहार का मापन सम्भव नहीं,
  11. सूक्ष्म अध्ययन के परिणामों को वृहद् स्तर पर लागू करना कठिन कार्य,
  12.  नीति-निर्माण में सहायता देने में असमर्थ।

व्यवहारवाद की उपलब्धियाँ:
व्यवहारवाद की प्रमुख उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं:

  1. नवीन राजनीति विज्ञान की स्थापना,
  2. राजनीति विज्ञान को वैज्ञानिकता प्रदान करना,
  3. राजनीति विज्ञान के लक्ष्य, विषय क्षेत्र, स्वरूप एवं अध्ययन पद्धति में व्यापक परिवर्तन,
  4. अन्तर-अनुशासनात्मक दृष्टिकोण की स्थापना,
  5. राजनीति विज्ञान के अध्ययन को यथार्थवादी बनाना,
  6. मानव व्यवहार को केन्द्रीय भूमिका प्रदान करना,
  7. वैकल्पिक धारणाएँ प्रदान करना।

प्रश्न 4.
किस प्रकार उत्तर व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान को एक कर्मनिष्ठ विज्ञान मानते हैं?
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवादियों के अनुसार राजनीति विज्ञान अपनी प्रकृति से एक मानव विज्ञान होने के साथ ही एक कर्मनिष्ठ विज्ञान भी है। इसके दोनों पक्षों में उचित समन्वय की आवश्यकता है। उत्तर व्यवहारवाद के प्रमुख समर्थक डेविड ईस्टन ने राजनीति विज्ञान को एक कर्मनिष्ठ विज्ञान माना है। डेविड ईस्टन के अनुसार, “जानने का अर्थ है-प्राप्त ज्ञान को कर्म रूप में लागू करना और इस प्रकार कार्य करने का अर्थ है-समाज के पुनर्निर्माण एवं पुनर्गठन में व्यस्त होना ।

कर्महीन ज्ञान निष्फल है और ज्ञान का फल कर्म है।” उत्तर व्यवहारवादी कर्म पर बल देते हैं। इनके अनुसार राजनीति विज्ञान को समाज के पुनर्निर्माण में संलग्न रहना चाहिए। ज्ञान व्यावहारिक रूप से सार्थक रहना चाहिए। शोधकर्ता को ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहयोग प्राप्त हो सके।

प्रश्न 5.
उत्तर व्यवहारवाद क्या है?
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवाद एक वैचारिक क्रान्ति है। यह व्यवहारवाद को सुधार आन्दोलन है जिसमें कार्य और प्रासंगिकता पर बल दिया गया है। 1960 के दशक की समाप्ति से पूर्व ही व्यवहारवादियों ने स्वयं ही व्यवहारवाद की उपयोगिता पर अनेक प्रश्न चिन्ह लगाने प्रारम्भ कर दिए। परिणामस्वरूप एक नए आन्दोलन का जन्म हुआ जो उत्तर व्यवहारवाद के नाम से जाना गया। उत्तर व्यवहारवाद, व्यवहारवादी शोध में सुधार का आन्दोलन एवं प्रगतिगामी कदम है।

यह समाज और राजनीतिक व्यवस्था की समस्याओं तथा चुनौतियों का अध्ययन व समाधान का प्रयत्न करता है। उत्तर व्यवहारवादियों की मान्यता है कि शोध की पद्धति की तुलना में शोध की प्रासंगिकता महत्त्वपूर्ण है। डेविड ईस्टन ने उसे ‘प्रासंगिकता का सिद्धान्त’ अथवा ‘प्रासंगिकता की धर्म’ कहा है। उत्तर व्यवहारवादियों के दो त्रारे हैं-कर्म और प्रासंगिकता।

उत्तर व्यवहारवाद में इस बात पर बल दिया गया है कि राजनीति विज्ञान का शोध और अध्ययन समाज की  वास्तविक आवश्यकताओं के सन्दर्भ में प्रासंगिक होना चाहिए। उत्तर व्यवहारवाद राजनीति विज्ञानियों से तटस्थ भाव से अध्ययन करने तथा सामाजिक व राजनीतिक समस्याओं के प्रति उदासीनता एवं पलायनवादी प्रवृत्ति अपनाने के स्थान पर समाज को नेतृत्व प्रदान करने का आग्रह करता है।

प्रश्न 6.
व्यवहारवाद एवं उत्तर व्यवहारवाद में अन्तर बताइए।
उत्तर:
व्यवहारवाद एवं उत्तर व्यवहारवाद में अन्तर-व्यवहारवाद एवं उत्तर व्यवहारवाद में निम्नलिखित अन्तर हैं

  1. विकास की विभिन्न अवस्थाओं में अन्तर – व्यवहारवाद परम्परागत राजनीतिक दृष्टिकोण के प्रति एक बौद्धिक प्रतिक्रिया है, जो राजनीति विज्ञान के विकास को प्रकट करती है, जबकि उत्तर व्यवहारवाद व्यवहारवाद में महत्त्वपूर्ण सुधार है।
  2. प्रकृति में अन्तर – व्यवहारवाद की मूल प्रकृति रचनात्मक नहीं है, जबकि उत्तर व्यवहारवाद अपनी प्रकृति से रचनात्मक है। इसने व्यवहारवाद का विरोध करने के साथ-साथ ही नवीन प्रयोग कर उसका विकास किया।
  3. दृष्टिकोण में अन्तर – व्यवहारवाद के राजनीतिक अध्ययन में केवल तथ्यों को महत्त्व प्रदान किया गया है, जबकि उत्तर व्यवहारवाद ने राजनीतिक अध्ययन में मूल्य एवं तथ्य दोनों के महत्त्व को स्वीकार किया है।
  4. प्रासंगिकता का अन्तर – व्यवहारवाद ने प्रासंगिकता के सिद्धान्त की उपेक्षा की है, जबकि उत्तरे व्यवहारवाद प्रासंगिकता के सिद्धान्त को मानता है।
  5. मान्यता में अन्तर – व्यवहारवाद राजनीति विज्ञान एवं प्राकृतिक विज्ञान में आधारभूत समानता को स्वीकार करता है, जबकि उत्तर व्यवहारवाद इस समानता को स्वीकार न करके राजनीति विज्ञान को एक सामाजिक विज्ञान मानता है।

RBSE Class 11 Political Science Chapter 2 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यवहारवाद के प्रमुख लक्षण बताइए।
अथवा
व्यवहारवादी उपागम की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
अथवा
व्यवहारवाद की आधारभूत मान्यताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
डेविड ईस्टन के अनुसार व्यवहारवाद की प्रमुख मान्यताएँ कौन-कौन सी हैं? वर्णन कीजिए।
अथवा
व्यवहारवादी उपागम के प्रमुख आधारों का वर्णन कीजिए।
अथवा
सम्पूर्ण व्यवहारवाद की बौद्धिक आधारशिला का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
व्यवहारवाद / व्यवहारवादी उपागम के प्रमुख लक्षण/आधार विशेषताएँ / मान्यताएँ / सम्पूर्ण व्यवहारवाद की बौद्धिक आधारशिला व्यवहारवाद के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) नियमन – नियमन से आशय यह है कि राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन हेतु नियमों अथवा सिद्धान्तों का निर्माण सम्भव है।
यद्यपि मानव व्यवहार परिवर्तनशील है और अनेक कारणों से प्रभावित होता है किन्तु मानव के राजनीतिक व्यवहार में नियमितता को ढूँढ़ा जा सकता है। वैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा मानव व्यवहार की नियमितताओं को खोज कर राजनीतिक व्यवहार को समझने योग्य सिद्धान्तों को निर्माण किया जा सकता है।

(2) सत्यापन – यह वैज्ञानिकता का आधार है। व्यवहारवादियों का मत है कि मानव व्यवहार के तथ्यों का अनुभववादी मानकों के आधार पर सत्यापन किया जा सकता है। मानव व्यवहार से सम्बन्धित एकत्रित सामग्री का पुनः परीक्षण करने एवं उसकी पुष्टि करने की प्रक्रिया को सत्यापन कहा जाता है। सत्यापन द्वारा नियमों को विश्वसनीय बनाया जा सकता है।

(3) तकनीक – तकनीक वे साधन होते हैं जिनके माध्यम से तथ्यों की प्राप्ति एवं उनका विश्लेषण किया जाता है। व्यवहारवादी प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति राजनीति विज्ञान में भी परिष्कृत तकनीक का उपयोग करने पर बल देते हैं जिनके आधार पर सुसंगत, विश्वसनीय और प्रेक्षण योग्य सामग्री एकत्रित की जा सके। व्यवहारवादी विश्लेषण में सांख्यिकीय, सर्वेक्षण, प्रतिदर्श, गणितीय प्रतिरूप एवं साक्षात्कार जैसी वैज्ञानिक तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।

(4) परिमाणीकरण – परिमाणीकरण से आशय है एकत्रित किए गए तथ्यों, आँकड़ों एवं विवरण आदि के शुद्धिकरण की प्रक्रिया। व्यवहारवादियों की मान्यता है कि एकत्रित सामग्री व तथ्यों में निश्चितता एवं स्पष्टता लाने के लिए परिमाणीकरण किया जाना आवश्यक है।

(5) क्रमबद्धता – व्यवहारवादियों का मत है कि शोध कार्य क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित होना चाहिए। शोध एवं सिद्धान्त निर्माण में सामंजस्य होना चाहिए। शोध पर आधारित सिद्धान्त ही प्रामाणिक एवं वैज्ञानिक हो सकते हैं। सर्वप्रथम शोध का कार्य किया जाना चाहिए तत्पश्चात् शोध से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर सिद्धान्त का निर्माण किया जाना चाहिए।

(6) मूल्य निर्धारण – व्यवहारवादी मूल्यों और तथ्यों को पृथक रखते हैं। इनका नैतिक आदर्शों एवं मूल्यों से कोई सम्बन्ध नहीं है। उदाहरण के रूप में; लोकतन्त्र, समानता अथवा स्वतन्त्रता अपने आप में बहुत उच्च मूल्य हो सकते हैं परन्तु। उनकी सत्यता अथवा असत्यता की जाँच वैज्ञानिक तरीके से नहीं की जा सकती। शोध की वैज्ञानिकता एवं वस्तुनिष्ठता के लिए शोधकर्ता को मूल्य निरपेक्ष होना आवश्यक है तभी वैज्ञानिक अध्ययन सम्भव है। इस प्रकार व्यवहारवादी मूल्य निरपेक्ष दृष्टिकोण पर बल देते हैं।

(7) समग्रता – इसे एकीकरण भी कहा जाता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसका राजनीतिक व्यवहार अनेक कारकों, यथा-आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक से प्रभावित होता है। अत: मानव व्यवहार का अध्ययन खण्डों में नहीं किया जाना चाहिए। मानव व्यवहार में एक आधारभूत एकता पायी जाती है। अत: राजनीतिक घटनाओं और व्यवहार को समझने के लिए समाज में होने वाली अन्य घटनाओं के सन्दर्भ में अध्ययन आवश्यक होता है।

(8) विशुद्ध विज्ञान – व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान को एक विशुद्ध विज्ञान के रूप में विकसित करना चाहते हैं, क्योंकि राजनीति का परिष्कृत विज्ञान ही राजनीतिक समस्याओं के समाधान में प्रभावशाली होगा। व्यवहारवादी राजनीति शास्त्र को विशुद्ध विज्ञान बनाने के लिए प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति परिष्कृत पद्धतियों के प्रयोग करने पर बल देते हैं।

प्रश्न 2.
व्यवहारवाद से आप क्या समझते हैं? व्यवहारवाद के उदय के कारणों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
व्यवहारवाद से आशय व्यवहारवाद राजनीतिक तथ्यों की व्यवस्था और विश्लेषण का एक विशेष तरीका है, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् अमरीकी राजनीति शास्त्रियों द्वारा विकसित किया गया। व्यवहारवाद का उदय परम्परागत दृष्टिकोण की उपलब्धियों के प्रति असन्तोष का परिणाम है। व्यवहारवाद विभिन्न सामाजिक विज्ञानों के अन्तर्गत एक ऐसा बौद्धिक आन्दोलन है।

जिसका उद्देश्य समाजशास्त्रीय चिंतन को अधिक आनुभविक, प्रामाणिक और वैज्ञानिक बनाना है। डेविड ईस्टन के अनुसार, “व्यवहारवाद वास्तविक व्यक्तियों पर अपना समस्त ध्यान केन्द्रित करता है।” डेविड टूमैन के अनुसार, “व्यवहारवाद से अभिप्राय है कि अनुसन्धान व्यवस्थित हों तथा उनका प्रमुख आग्रह आनुभविक प्रणालियों के प्रयोग पर ही होना चाहिए।”

हींज यूलाऊ के अनुसार, “राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन का सम्बन्ध राजनीतिक सन्दर्भ में मानव के कार्यों, रुख, वरीयताओं एवं आकाक्षांओं से है।” संक्षेप में कहा जा सकता है कि, व्यवहारवाद एक बौद्धिक प्रवृत्ति, एक अध्ययन पद्धति, आन्दोलन और मनोभाव है, जो यथार्थवादी दृष्टिकोण पर आधारित आनुभविक अध्ययन द्वारा मानव व्यवहार का अध्ययन कर राजनीति शास्त्र को विशुद्ध विज्ञान बनाना चाहता है।

व्यवहारवाद के उदय के कारण:
व्यवहारवाद के उदय के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं
(1) परम्परागत अध्ययन पद्धतियों के प्रति असन्तोष-राजनीति शास्त्रियों को परम्परागत अध्ययन पद्धतियों से निराशा हुई, परम्परागत उपागम में अनेक कमियाँ अन्तर्निहित थीं। परम्परागत उपागम के प्रति असन्तोष के निम्नलिखित कारण माने जाते हैं

  • शासन के नीति निर्माण एवं संचालन में राजनेताओं को ही महत्त्व दिया जाता था। राजनीति विज्ञानियों एवं शोधार्थियों की उपेक्षा की जाती थी।
  • परम्परागत उपागम में सैद्धान्तिक एवं वर्णनात्मक अध्ययन किया जाता था। विषयवस्तु में यथार्थवादी अध्ययनों का अभाव था।
  • परम्परागत उपागम फासीवाद, नाजीवाद, प्रजातिवाद एकाधिकारीवादी प्रवृत्तियों के उदय, विकास एवं लोकप्रियता की व्याख्या करने में असमर्थ था।
  • परम्परागत उपागम में राजनीति विज्ञान की अध्ययन पद्धति, जो कि वर्णनात्मक शैली की थी, को अपर्याप्त माना गया।

(2) द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव – द्वितीय विश्व युद्ध के विनाशकारी घटनाक्रम ने मानव सभ्यता के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया। परम्परागत अध्ययन पद्धतियाँ इस विश्व युद्ध के बारे में पूर्वानुमान तक नहीं लगा पायी र्थी। युद्धकालीन प्रमुख घटनाओं ने राजनीति विज्ञानियों को नवीन शोध एवं सिद्धान्त के लिए प्रेरित किया।

(3) विभिन्न सामाजिक विज्ञानों से प्रेरणा – विभिन्न सामाजिक विज्ञानों में अध्ययन की वैज्ञानिक पद्धति एवं व्यवहारवादी दृष्टिकोण को बहुत पहले से ही प्रयोग हो रहा था। ऐसी दशा में राजनीति विज्ञान का इससे अछूत रहना सम्भव नहीं था।

(4) नवीन अध्ययन पद्धतियों का प्रयोग – द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् राजनीति के क्षेत्र में इस विचार ने जोर पकड़ लिया कि राजनीति विज्ञान में नवीन अध्ययन पद्धतियों को स्थान देना होगा। सांख्यिकीय विश्लेषणों, गणितीय प्रारूपों, निदर्शन सर्वेक्षण, परीक्षण एवं उपकरणों आदि प्रविधियों के बढ़ते हुए प्रयोग ने राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन को वस्तुनिष्ठ बनाकर व्यवहारवाद को बढ़ावा प्रदान किया।

(5) नए राज्यों का उदय एवं पिछड़े देशों की समस्याएँ – द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् अनेक राज्य स्वतन्त्र हुए। इन एशिया, अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिका के नव स्वतन्त्र देशों एवं पिछड़े देशों की कई समस्याओं, प्रक्रियाओं एवं चुनौतियों का अध्ययन परम्परागत पद्धतियों द्वारा करने पर वास्तविक स्थिति का ज्ञान प्राप्त करना सम्भव नहीं था।

प्रश्न 3.
व्यवहारवादी उपागम का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
अथवा
व्यवहारवाद की सीमाएँ बताइए।
अथवा
व्यवहारवाद की आलोचना किन-किन आधारों पर की जाती है? विस्तार से उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
व्यवहारवादी उपागम का आलोचनात्मक परीक्षण/सीमाएँ:
व्यवहारवादी आन्दोलन ने राजनीति विज्ञान को एक नई दिशा देने का प्रयत्न किया था परन्तु वास्तव में व्यवहारवादी उने अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाए जिनसे प्रेरित होकर यह आन्दोलन प्रारम्भ किया गया था। व्यवहारवाद के आलोचकों में अर्नाल्ड ब्रेश्ट, लियो स्ट्रास, सिबली, किर्क पेट्रिक, राबर्ट ए. डहल एवं डायस आदि प्रमुख हैं। व्यवहारवादी उपागम की आलोचना अथवा इसकी सीमाओं का उल्लेख निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है

(1) अत्यधिक शब्दाडम्बर – व्यवहारवादियों ने अत्यधिक जटिल शब्दावली का प्रयोग किया जो शब्दाडम्बर ही प्रतीत होती है। अपरिचित एवं जटिल शब्दावली शब्दजाल जैसी लगती है। डॉ. एस. पी. वर्मा ने ठीक ही लिखा है कि, तटस्थता और निष्पक्षता की प्राप्ति के लिए अनुभववादी सिद्धान्तवादियों ने एक नया उलझाने वाला एवं फूहड़ शब्दजाल आविष्कृत कर लिया है।”

(2) मानव के राजनैतिक व्यवहार की नियमितता खोजना असम्भव – व्यवहारवादियों का मत है कि राजनीति विज्ञान में संस्थागत अध्ययन के स्थान पर मानव के राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन किया जाना चाहिए, परन्तु व्यवहारवादी मानव व्यवहार का अध्ययन करने में असफल रहे हैं।

(3) तकनीक व पद्धतियों पर अनुचित बल – व्यवहारवादी शोध के उद्देश्यों की अपेक्षा शोध के उपकरणों को परिष्कृत करने पर अत्यधिक बल देते हैं। वे अध्ययन पद्धतियों पर इतना अधिक बल देते हैं कि राजनीति विज्ञान की विषयवस्तु गौण हो जाती है। यह उचित नहीं है।

(4) मूल्य निरपेक्ष अध्ययन सम्भव नहीं – व्यवहारवादियों ने राजनीति विज्ञान में मूल्य निरपेक्ष अध्ययन पर बल दिया है। आलोचकों का मत है कि राजनीति विज्ञान में मूल्य निरपेक्ष अध्ययन न तो सम्भव है और न ही उचित है।

(5) अत्यधिक खर्चीली पद्धति – व्यवहारवादी अध्ययन पद्धति अत्यधिक खर्चीली है। इसकी तकनीकी और पद्धतियों के प्रयोग के लिए बहुत अधिक धन, समय और कौशल की आवश्यकता होती है। अत: एक सामान्य शोधकर्ता अथवा अविकसित देशों का निर्धन समाज इस पद्धति को अपनाने में असमर्थ दिखाई देता है।

(6) कथन व आचरण में विरोध – व्यवहारवादियों के कथन और आचरण में विरोधाभास दिखाई पड़ता है। एक ओर तो वे मूल्य निरपेक्ष अध्ययन पर बल देते हैं वहीं दूसरी ओर तानाशाही की तुलना में उदारवादी लोकतन्त्र की अच्छाइयों को स्वीकार करते हैं।

(7) अध्ययन हेतु अन्य पद्धतियों की उपेक्षा अनुचित – व्यवहारवादी विचारक अध्ययन के लिए केवल व्यवहारवादी अध्ययन पद्धति को ही स्वीकार करते हैं। अन्य अध्ययन पद्धतियों को महत्त्व नहीं देते।

(8) राजनीति विज्ञान के स्वतन्त्र अस्तित्व को खतरा – व्यवहारवादियों ने न तो राजनीति विज्ञान को परिभाषित किया और न ही उसके अध्ययन क्षेत्र को निश्चित किया और दूसरी ओर उन्होंने राजनीति विज्ञान के अध्ययन के लिए अन्य सामाजिक विज्ञान की अवधारणाओं, पद्धतियों व तकनीकों को अपनाने पर बल दिया है। ऐसी स्थिति में यह भय उत्पन्न हो गया कि राजनीति विज्ञान एक स्वतन्त्र विषय के रूप में अपना अस्तित्व खो सकता है।

(9) सुनिश्चित सिद्धान्त एवं भविष्यवाणी सम्भव नहीं – व्यवहारवादी यह मानते हैं कि सिद्धान्तों के निर्माण में मानव के राजनीतिक व्यवहार एवं कार्यकलापों के बारे में सही भविष्यवाणी करनी सम्भव है किन्तु वास्तव में वे अभी तक ऐसे विश्वसनीय सिंद्धान्तों के निर्माण में असफल रहे हैं। आलोचकों का मत है कि राजनीति विज्ञान में ऐसे सुनिश्चित सिद्धान्तों का निर्माण सम्भव नहीं है। इसलिए सटीक भविष्यवाणी भी सम्भव नहीं है।

(10) नीति-निर्माण में सहायता प्रदान करने में असमर्थ – नीति-निर्माण में तथ्यों के अतिरिक्त मूल्यों की भी आवश्यकता होती है। मूल्यों की उपेक्षा करके मात्रं तथ्यों के आधार पर निर्मित नीति अमानवीय तथा अनैतिक हो सकती है। व्यवहारवाद केवल तथ्यों को महत्त्व देता है एवं मूल्यों की उपेक्षा करता है। अतः इस आधार पर व्यवहारवाद नीति-निर्माण में सहायता प्रदान करने में असमर्थ है।

(11) लघु एवं वृहत् इकाई सम्बन्धी समस्या – व्यवहारवादी अध्ययन की सुविधा एवं शुद्धता की दृष्टि से छोटे-छोटे समूहों का अध्ययन करते हैं एवं इस प्रकार के अध्ययनों से प्राप्त निष्कर्षों को सम्पूर्ण समाज पर लागू करते हैं। जो कि अनुचित होने के साथ-साथ एक कठिन कार्य भी है।

प्रश्न 4.
व्यवहारवाद के अर्थ, उद्देश्य एवं सीमाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
व्यवहारवाद का अर्थ व्यवहारवाद राजनीतिक तथ्यों की व्यवस्था और विश्लेषण का एक विशेष तरीका है, जिसे द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् अमरीकी राजनीति शास्त्रियों द्वारा विकसित किया गया। यह उपागम राजनीति विज्ञान के सन्दर्भ में अपना समस्त ध्यान मुख्य रूप से राजनीतिक व्यवहार पर केन्द्रित करता है एवं इस बात का प्रतिपादन करता है कि राजनैतिक गतिविधियों का वैज्ञानिक अध्यययन व्यक्तियों के राजनीतिक व्यवहार के आधार पर ही किया जा सकता है।

व्यवहारवाद का उद्देश्य व्यवहारवाद का उद्देश्य राजनीतिक जीवन के आनुभविक पक्ष को ऐसी प्रणालियों, सिद्धान्तों, तकनीकों एवं कसौटियों के द्वारा स्पष्ट करना है जो आधुनिक आनुभविक विज्ञान के अधिनियमों, अभिसमयों एवं अभिग्रहों को पूरा करती हों। यह उपागम राजनीति विज्ञान को प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति एक विशुद्ध विज्ञान बनाना चाहता है।

इस हेतु व्यवहारवाद वैज्ञानिक पद्धति से मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार का विश्लेषण करे सामान्यीकरण करने का प्रयत्न करता है। राबर्ट ए. डहल के अनुसार, “ व्यवहारवाद का उद्देश्य प्रशासन सम्बन्धी समस्त घटनाओं को मनुष्य के एक ऐसे व्यवहार के रूप में प्रस्तुत करना है जिसका प्रेक्षण कर लिया गया हो और जिसका प्रेक्षण किया जा सकता हो।”

व्यवहारवाद की सीमाएँ:
व्यवहारवाद की सीमाएँ निम्नलिखित हैं

  1. व्यवहारवादी मानव व्यवहार का विज्ञान प्रस्तुत करने में असफल सिद्ध हुए हैं।
  2. मानव के राजनीतिक व्यवहार का आकलन व गणना गणितीय रूप में प्रस्तुत की जा सकती।
  3. प्राविधिक तकनीकों पर अत्यधिक बल दिया जाना अनुचित है।
  4. व्यवहारवादी अपने आपको मूल्य निरपेक्ष घोषित करते हैं, परन्तु शोध के लिए विषय चुनते समय वे मूल्यों से अप्रभावित नहीं रह पाते।
  5. व्यवहारवादियों ने अत्यधिक जटिल शब्दावली का प्रयोग किया है, जो कि शब्दाडम्बर ही प्रतीत होती है।
  6. व्यवहारवादी अध्ययन पद्धति अत्यधिक खर्चीली है।
  7. व्यवहारवाद से राजनीति विज्ञान के स्वतन्त्र अस्तित्व के समक्ष खतरा उत्पन्न हो गया है।
  8. राजनीति विज्ञान में सुनिश्चित नियमों का निर्माण असम्भव है।
  9.  व्यवहारवादी अन्य पद्धतियों के महत्त्व को स्वीकार नहीं करते, जो कि अनुचित है।
  10. राजनीति विज्ञान में मूल्य निरपेक्ष अध्ययन सम्भव नहीं है तथा ने ही यह उचित है।
  11. सूक्ष्म अध्ययन के परिणामों को वृहत स्तर पर लागू करना एक कठिन कार्य है।

प्रश्न 5.
उत्तर व्यवहारवाद से आप क्या समझते हैं? उत्तर: व्यवहारवाद के प्रमुख लक्षण बताइए।
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवाद से आशय :
उत्तर व्यवहारवाद एक वैचारिक क्रान्ति है। यह व्यवहारवाद का सुधार आन्दोलन है जिसमें कर्म और प्रासंगिकता पर बल दिया गया है। 1960 के दशक की समाप्ति से पूर्व ही व्यवहारवादियों ने स्वयं ही व्यवहारवाद की उपयोगिता पर अनेक प्रश्न चिन्ह लगाने प्रारम्भ कर दिए। इसके परिणामस्वरूप एक नवीन आन्दोलन का जन्म हुआ जो उत्तर व्यवहारवाद के नाम से जाना गया। उत्तर व्यवहारवाद, व्यवहारवादी शोध में सुधार का आन्दोलन एवं प्रगतिशील कदम है। यह समाज और राजनीतिक व्यवस्था की समस्याओं और चुनौतियों का अध्ययन एवं समाधान का प्रयत्न करता है।

उत्तर व्यवहारवाद में इस बात पर बल दिया गया है कि राजनीति विज्ञान का शोध और अध्ययन समाज की वास्तविक आवश्यकताओं के सन्दर्भ में प्रासंगिक होना चाहिए। उत्तर व्यवहारवाद राजनीति विज्ञानियों से तटस्थ भाव से पृथक् रहकर अध्ययन करने तथा सामाजिक व राजनैतिक समस्याओं के प्रति उदासीनता एवं पलायनवादी प्रवृत्ति अपनाने के स्थान पर समाज को नेतृत्व प्रदान करने का आग्रह करता है।उत्तर व्यवहारवाद के प्रमुख लक्षण राजनीति विज्ञान में व्यवहारवाद के प्रबल समर्थक डेविड ईस्टन ने उत्तर व्यवहारवाद के दो प्रमुख लक्षण बताए। हैं

  1. शोध की प्रासंगिकता
  2. कर्मनिष्ठता।

व्यापक परिप्रेक्ष्य में उत्तर व्यवहारवाद के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) प्रविधि से पूर्व सार – राजनीतिक अनुसन्धान में तकनीक का उतना महत्त्व नहीं है जितना सार तत्व का है, अनुसन्धान सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहायक न हों तो उससे किनारा कर लेना ही बेहतर होगा।

(2) सामाजिक परिवर्तन पर बल – व्यवहारवाद सामाजिक स्थिरता पर बल देता रहा है। अतः उसने अपना सम्पूर्ण ध्यान तथ्यों के विश्लेषण तक ही सीमित रखा है, परन्तु अब राजनीति विज्ञान को सामाजिक परिवर्तनों की ओर मुड़कर इन तथ्यों को व्यापक सामाजिक सन्दर्भ के साथ जोड़ना चाहिए।

(3) समस्याओं के विश्वसनीय समाधान की आवश्यकता – उत्तर व्यवहारवादी समकालीन सामाजिक समस्याओं के समाधान पर बल देते हैं। इनकी मान्यता है कि राजनीति विज्ञान की उपयोगिता तभी है जब वह समाज की समस्याओं का समाधान करे। आज समाज में महामारियाँ, कुपोषण, निर्धनता, प्रदूषण, आण्विक युद्धों का भय आदि मानव सभ्यता को विनाश की ओर धकेल रहे हैं। ऐसी स्थिति में राजनीति विज्ञान को ऐसी समस्याओं के समाधान का प्रयत्न करना चाहिए. तभी इस विषय के अध्ययन की सार्थकता है।

(4) मूल्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका – उत्तर व्यवहारवादी मूल्यों की निर्णायक भूमिका स्वीकार करते हैं। मानव समाज के लिए केवल उसी ज्ञान का महत्व है जो मूल्यों पर आधारित हो। सामाजिक विज्ञान का उद्देश्य एक श्रेष्ठ मानव समाज की कल्पना है। अतः उन्हें तो मूल्य सापेक्ष ज्ञान ही अर्जित करना चाहिए।

(5) बुद्धिजीवियों की भूमिका – उत्तर व्यवहारवादियों ने समाज में बुद्धिजीवियों की भूमिका को महत्त्वपूर्ण माना है। मानवीय मूल्यों की रक्षा करना उनका विशेष दायित्व है। इनकी मान्यता है कि बुद्धिजीवियों को मात्र वैज्ञानिक शोधकर्ता ही नहीं बनना चाहिए बल्कि समाज को नेतृत्व भी प्रदान करना चाहिए।

(6) कर्मनिष्ठ ज्ञान – उत्तर व्यवहारवादी कर्म पर बल देते हैं। इनके अनुसार राजनीति विज्ञान को समाज के पुनर्निर्माण में संलग्न रहना चाहिए। ज्ञान व्यावहारिक रूप से सार्थक होना चाहिए। शोधकर्ता को ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहयोग प्राप्त हो सके।

(7) व्यवसायों का राजनीतिकरण – उत्तर व्यवहारवाद वैज्ञानिकों की निष्क्रियता के पक्ष में नहीं है बल्कि उन्हें सक्रिय भूमिका के लिए प्रेरित करता है। उत्तर व्यवहारवादी व्यवसायों के राजनीतिकरण पर बल देते हैं। उनकी मान्यता है कि राजनीति वैज्ञानिकों को समाज में सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए जिससे समाज के उद्देश्यों को व्यवस्थित एवं योजनाबद्ध दिशा दी जा सके।

प्रश्न 6.
व्यवहारवाद और उत्तर व्यवहारवाद में अन्तर बताइए।
अथवा
व्यवहारवाद तथा व्यवहारवाद की तुलना कीजिए।
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवाद और उत्तर व्यवहारवाद में अन्तर / तुलना: व्यवहारवाद और उत्तर व्यवहारवाद में निम्नलिखित अन्तर हैं
(1) विकास की विभिन्न अवस्थाओं में अन्तर – व्यवहारवाद परम्परागत राजनीतिक दृष्टिकोण के प्रति एक बौद्धिक प्रतिक्रिया है। यह परम्परागत राजनीतिक दृष्टिकोण से आगे राजनीति विज्ञान के विकास को प्रकट करता है।
वहीं दूसरी ओर उत्तर व्यवहारवाद व्यवहारवाद में महत्त्वपूर्ण सुधार है। यह व्यवहारवाद से आगे के राजनीति विज्ञान के विकास को प्रकट करता है।

(2) प्रकृति में अन्तर – व्यवहारवाद की मूल प्रकृति रचनात्मक नहीं है जबकि उत्तर व्यवहारवाद की मूल प्रकृति रचनात्मक है। उत्तर व्यवहारवाद ने व्यवहारवाद का विरोध ही नहीं किया बल्कि नये – नये प्रयोग कर उनका विकास किया है। समाधान पर बल,

(3) मान्यता में अन्तर-व्यवहारवाद राजनीति विज्ञान एवं प्राकृतिक विज्ञान में आधारभूत समानता स्वीकार करता है, जबकि उत्तर व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान को प्राकृतिक विज्ञान के समकक्ष नहीं मानते। उन्होंने राजनीति विज्ञान को एक सामाजिक विज्ञान के रूप में मान्यता प्रदान की है।

(4) दृष्टिकोण में अन्तर – व्यवहारवाद राजनीतिक अध्ययन में केवल तथ्यों के महत्त्व को स्वीकार करता है तथा मूल्यों की उपेक्षा करता है, जबकि उत्तर व्यवहारवाद राजनीतिक अध्ययन में मूल्य और तथ्य दोनों के महत्त्व को स्वीकार करता है।

(5) प्रासंगिकता का अन्तर – व्यवहारवाद तकनीकी परिशुद्धता पर बल देता है, जबकि उत्तर व्यवहारवाद तकनीकी परिशुद्धता के साथ-साथ शोध की प्रासंगिकता पर भी बल देता है। डेविड ईस्टन ने ठीक ही कहा है कि उत्तर व्यवहारवाद प्रासंगिकता के सिद्धान्त को मानता है जबकि व्यवहारवाद ने इसकी उपेक्षा की है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि अपनी उत्पत्ति से व्यवहारवाद एवं उत्तर व्यवहारवाद दोनों ही आधुनिक राजनीति विज्ञान को अमरीकी राजनीति शास्त्रियों की देन हैं।

उत्तर व्यवहारवाद, व्यवहारवाद का विरोधी आन्दोलन नहीं है अपितु उत्तर व्यवहारवाद ने राजनीतिक सिद्धान्त में समन्वयवादी दृष्टिकोण का विकास किया है। आज पारस्परिक विरोध की स्थिति समाप्त हो गयी है। उत्तर व्यवहारवाद, व्यवहारवाद की कमियों को दूर करने का एक प्रयत्न है।

प्रश्न 7.
उत्तर व्यवहारवाद पर एक निबन्ध लिखिए।
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवाद का अभिप्राय उत्तर – व्यवहारवाद एक वैचारिक क्रान्ति है। यह व्यवहारवाद का सुधार आन्दोलन है। इसमें कर्म और प्रासंगिकता पर बल दिया जाता है। 1960 के दशक की समाप्ति से पूर्व ही व्यवहारवादियों ने स्वयं ही व्यवहारवाद की उपयोगिता पर अनेक प्रश्नचिह्न लगाने प्रारम्भ कर दिए। परिणामस्वरूप एक नए आन्दोलन का जन्म हुआ जो उत्तर व्यवहारवाद के नाम से जाना गया।

उत्तर व्यवहारवाद का उद्देश्य – उत्तर व्यवहारवाद का मूल उद्देश्य यह है कि राजनीति विज्ञान का शोध और अध्ययन समाज की वास्तविक आवश्यकताओं के सन्दर्भ में प्रासंगिक होना चाहिए। उत्तर व्यवहारवाद राजनीति शास्त्रियों से तटस्थ भाव से अध्ययन करने एवं सामाजिक व राजनीतिक समस्याओं के प्रति उदासीनता और पलायनवादी प्रवृत्ति के स्थान पर समाज को नेतृत्व प्रदान करने का आग्रह करता है। उत्तर व्यवहारवाद के उदय के कारण-उत्तर व्यवहारवाद परम्परागत एवं व्यवहारवादी दृष्टिकोणों की कमियों के कारण अस्तित्व में आया। उत्तर व्यवहारवाद के उदय के कारण निम्नलिखित हैं

(i) व्यवहारवाद के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया – उत्तर व्यवहारवादी आन्दोलन व्यवहारवाद के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है। व्यवहारवादी आन्दोलन ने राजनीति विज्ञान को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने का प्रयत्न किया है लेकिन ये प्रयत्न अपर्याप्त एवं अपूर्ण माने जाते हैं।

(ii) अध्ययन पद्धतियों से असहमति – राजनीति विज्ञान में प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति अध्ययन पद्धतियों को लागू करने का प्रयत्न करना उचित नहीं है क्योंकि समाज और व्यक्ति की प्रवृत्ति परिवर्तनशील है। अतः प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति तथा उन्हीं मानदण्डों के आधार पर राजनीति विज्ञान का अध्ययन सम्भव नहीं है।

(iii) व्यवहारवादी शोध के प्रति निराशा – व्यवहारवादी शोध में मूल्यों की उपेक्षा की जाती है तथा तथ्यों पर बल दिया जाता है। उत्तर व्यवहारवाद ने तथ्यों व मूल्यों दोनों को ही प्रासंगिक तथा उपयोगी माना है। राजनीति विज्ञान के अध्ययन में मूल्यों को नकारा नहीं जा सकता।

(iv) विश्व मानवता के प्रति दायित्वों की उपेक्षा – जिस समय व्यवहारवादी वैचारिक संरचनाओं, मॉडलों और सिद्धान्तों के निर्माण में संलग्न थे, उसी समय वैश्विक समाज तीव्र सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक संकटों का सामना कर रहा था। व्यवहारवादी विचारक इन संकटों से अनभिज्ञ थे। तत्कालीन समाज विघटन और टूट-फूट की ओर अग्रसर हो रहा था।

इतना ही नहीं वियतनाम संकट, अमेरिका में बढ़ता आन्तरिक असन्तोष, आण्विक युद्ध, तानाशाही शासन की बढ़ती सम्भावनाएँ एवं जनसंख्या विस्फोट जैसे संकटों का आभास व्यवहारवादियों को नहीं था और इन संकटों के समाधान के लिए उनके द्वारा कोई प्रयास नहीं किया गया। उत्तर व्यवहारवाद की विशेषताएँ / लक्षण / आधारभूत मान्यताएँ-उत्तर व्यवहारवाद की प्रमुख विशेषताएँ/लक्षण/ आधारभूत मान्यताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. प्रविधि से पूर्व सार,
  2. सामाजिक परिवर्तन पर बल,
  3. समस्याओं के
  4.  मूल्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका,
  5. बुद्धिजीवियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका,
  6. कर्म पर बल,
  7. व्यवसायों का राजनीतिकरण।

उत्तर व्यवहारवाद की आलोचना-यद्यपि उत्तर व्यवहारवाद ने परम्परागत राजनीतिक दृष्टिकोण एवं व्यवहारवादी दृष्टिकोण के अवगुणों को समाप्त कर राजनीति शास्त्र को विज्ञान का नया रूप प्रदान किया है। इसके बावजूद उत्तर व्यवहारवाद भी आलोचनाओं से अछूता नहीं है। इसकी अग्रलिखित आधारों पर आलोचना की जाती है

  1. उत्तर व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान के अध्ययन को एक साथ मूल्य प्रधान, आदर्शवादी व वस्तुनिष्ठ बनाने के साथ-साथ ही मूल्य निरपेक्ष और यथार्थवादी बनाना चाहते हैं जो सम्भव नहीं है।
  2. उत्तर व्यवहारवादी तकनीक से पहले सार को महत्त्व देते हैं जो अवैज्ञानिक है।
  3. उत्तर व्यवहारवाद अमरीकी राष्ट्रीय हितों का प्रतिनिधि दिखाई देता है।
  4. उत्तर व्यवहारवाद मात्र उदारवादी मूल्यों का प्रतिनिधि है।
  5. उत्तर व्यवहारवाद का तृतीय विश्व के लिए सीमित महत्त्व है।

उत्तर व्यवहारवाद का महत्त्व-अनेक आलोचनाओं के बावजूद उत्तर व्यवहारवाद के महत्त्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। उत्तर व्यवहारवाद ने परम्परावाद एवं व्यवहारवाद दोनों के अवगुणों को त्यागकर इनके गुणों में उचित सामंजस्य स्थापित किया है। यह राजनीति विज्ञान की सन्तुलित एवं आधुनिकतम विकास की अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है।

RBSE Class 11 Political Science Chapter 2 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यवहारवादी उपागम मुख्यतः सम्बन्धित होते हैं
(अ) राजनीतिक व्यवहार से
(ब) संस्थाओं से
(स) संविधान से
(द) राज्य से
उत्तर:
(अ) राजनीतिक व्यवहार से

प्रश्न 2.
चार्ल्स मेरियम द्वारा रचित पुस्तक का नाम है
(अ) ह्यूमन नेचर इन पॉलिटिक्स
(ब) न्यू ऑसपेक्ट्स ऑफ पॉलिटिक्स
(स) द पॉलिटिकल सिस्टम
(द) पावर एण्ड सोसायटी।
उत्तर:
(ब) न्यू ऑसपेक्ट्स ऑफ पॉलिटिक्स

प्रश्न 3. व्यवहारवाद का अर्थ है
(अ) समाजवाद
(ब) उदारवाद
(स) साम्यवाद
(द) अनुभववाद
उत्तर:
(द) अनुभववाद

प्रश्न 4.
‘कर्म’ व ‘प्रासंगिकता’ सम्बन्धित है
(अ) व्यवहारवाद से
(ब) उत्तर व्यवहारवाद से
(स) अराजकतावाद से
(द) राजनैतिक विकास से
उत्तर:
(ब) उत्तर व्यवहारवाद से

प्रश्न 5.
व्यवहारवाद किस प्रकार की अध्ययन की इकाई पर जोर देता है?
(अ) लघु इकाई
(ब) बड़ी इकाई
(स) लघु एवं बड़ी इकाई
(द) बड़े-बड़े विषयों के गम्भीर अध्ययन
उत्तर:
(अ) लघु इकाई

प्रश्न 6.
व्यवहारवाद का जनक किसे कहा जाता है?
(अ) चार्ल्स मेरियम
(ब) डेविड ईस्टन
(स) गास्नेल
(द) लॉसवेल
उत्तर:
(ब) डेविड ईस्टन

प्रश्न 7.
‘तकनीक से पहले तथ्य’ इस पर कौन अधिक जोर देता है?
(अ) व्यवहारवादी
(ब) उत्तर व्यवहारवादी
(स) मनोवैज्ञानिक
(द) अनुभववादी।
उत्तर:
(ब) उत्तर व्यवहारवादी

प्रश्न 8.
‘प्रासंगिकता’ का सिद्धान्त किससे सम्बन्धित है?
(अ) वैज्ञानिक समाजवाद।
(ब) उदारवाद
(स) प्रजातान्त्रिक समाजवाद
(द) उत्तर व्यवहारवाद
उत्तर:
(द) उत्तर व्यवहारवाद

प्रश्न 9.
कर्म तथा प्रासंगिकता पर किसने जोर दिया है?
(अ) व्यवहारवाद
(ब) उत्तर व्यवहारवाद
(स) मार्क्सवाद
(द) उदारवाद
उत्तर:
(ब) उत्तर व्यवहारवाद

प्रश्न 10.
डेविड ईस्टन ने उत्तर व्यवहारवाद के कितने लक्षण बताये हैं?
(अ) 7
(ब) 8
(स) 9
(द) 10
उत्तर:
(अ) 7

प्रश्न 11.
‘प्रविधि से पूर्व सार’ पर कौन अधिक बल देता है?
(अ) व्यवहारवाद
(ब) उत्तर व्यवहारवाद
(स) अनुभववाद
(द) समाजवाद
उत्तर:
(ब) उत्तर व्यवहारवाद

प्रश्न 12.
उत्तर व्यवहारवाद का लक्षण नहीं है
(अ) कर्मनिष्ठ विज्ञान
(ब) प्रविधि से पूर्व सार
(स) तकनीक पर जोर
(द) मूल्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका
उत्तर:
(स) तकनीक पर जोर

प्रश्न 13.
उत्तर व्यवहारवाद किस पर जोर देता है?
(अ) राजनीतिक तटस्थता
(ब) मूल्य निरपेक्षता
(स) ज्ञान का क्रियात्मक होना
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(स) ज्ञान का क्रियात्मक होना

प्रश्न 14.
उत्तर व्यवहारवाद का लक्षण नहीं है
(अ) व्यवसाय का राजनीतिकरण
(ब) मूल्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका
(स) सामाजिक परिवर्तन पर बल
(द) विशुद्ध विज्ञान
उत्तर:
(द) विशुद्ध विज्ञान

प्रश्न 15.
1960 की समाप्ति से पहले व्यवहारवादी क्रान्ति के किस प्रमुख प्रतिपादक ने व्यवहारवादी स्थिति पर प्रबल प्रहार किया?
(अ) चार्ल्स मेरियम
(ब) डेविड ईस्टन
(स) हेरल्ड लॉसवेल
(द) गास्वेल।
उत्तर:
(ब) डेविड ईस्टन

RBSE Class 11 Political Science Chapter 2 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 Political Science Chapter 2 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
परम्परागत राजनीति विज्ञान की असफलताओं के प्रति असन्तोष का परिणाम है
(अ) व्यवहारवादी क्रान्ति
(ब) उत्तर व्यवहारवाद
(स) मार्क्सवाद
(द) उदारवाद
उत्तर:
(अ) व्यवहारवादी क्रान्ति

प्रश्न 2.
राजनीति विज्ञान के सन्दर्भ में कौन-सा दृष्टिकोण अपना ध्यान मुख्य रूप से राजनीतिक व्यवहार पर केन्द्रित करता है?
(अ) उत्तर व्यवहारवाद
(ब) उदारवाद
(स) प्रजातान्त्रिक समाजवाद
(द) व्यवहारवाद
उत्तर:
(द) व्यवहारवाद

प्रश्न 3.
राजनीतिक तथ्यों की व्यवस्था और विश्लेषण का एक विशेष तरीका कौन-सा है जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् अमरीकी राजनीति शास्त्रियों ने विकसित किया था?
(अ) उदारवाद
(ब) व्यवहारवाद
(स) उत्तर व्यवहारवाद
(द) परम्परावाद
उत्तर:
(ब) व्यवहारवाद

प्रश्न 4.
निम्न में से किस राजनीति शास्त्री ने व्यवहारवाद का अर्थ अधिक व्यापकता के साथ प्रस्तुत किया है
(अ) राबर्ट ए. डहल ने
(ब) डेविड ईस्टन ने
(स) डेविड ट्रमैन ने
(द) उपर्युक्त सभी ने
उत्तर:
(अ) राबर्ट ए. डहल ने

प्रश्न 5.
…………….विषय के आनुभविक तथ्यों को अधिक वैज्ञानिक बनाने का प्रयत्न है।
(अ) व्यवहारवाद
(ब) उत्तर व्यवहारवाद
(स) समाजवाद
(द) अनुभववाद
उत्तर:
(अ) व्यवहारवाद

प्रश्न 6.
‘ह्यूमन नेचर इन पॉलिटिक्स’ पुस्तक के लेखक हैं
(अ) ए. एफ. बैन्टले
(ब) ग्राह्म वालेस
(स) चार्ल्स मेरियम
(द) हर्बर्ट साइमन
उत्तर:
(ब) ग्राह्म वालेस

प्रश्न 7.
‘द प्रोसेस ऑफ गवर्नमेंट’ किसकी रचना है?
(अ) गासनेल
(ब) थर्स्टन
(स) ए. एफ. बैन्टले
(द) डेविड ईस्टन
उत्तर:
(स) ए. एफ. बैन्टले

प्रश्न 8.
व्यवहारवाद से सम्बन्धित है
(अ) शिकागो सम्प्रदाय
(ब) फ्रैंकफर्ट स्कूल
(स) ऑस्ट्रियन स्कूल
(द) चीनी सम्प्रदाय
उत्तर:
(अ) शिकागो सम्प्रदाय

प्रश्न 9.
‘दी पॉलिटिकल सिस्टम’ के लेखक हैं.
(अ) कैटलिन
(ब) डेविड ईस्टन
(स) बर्क
(द) अल्बर्ट
उत्तर:
(ब) डेविड ईस्टन

प्रश्न 10.
डेविड ईस्टन ने व्यवहारवाद के कितने आधार बताये हैं?
(अ) 7
(ब) 8
(स) 9
(द) 10.
उत्तर:
(ब) 8

प्रश्न 11.
व्यवहारवाद की वह बौद्धिक आधारशिला कौन-सी है, जिसके अनुसार मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार में ऐसे सामान्य तथ्य पाये जाते हैं जिनके आधार पर सिद्धान्तों का निर्माण किया जा सकता है?
(अ) नियमन
(ब) सत्यापन
(स) तकनीक
(द) विशुद्ध विज्ञान
उत्तर:
(अ) नियमन

प्रश्न 12.
अन्तः शास्त्रीय दृष्टिकोण पर बल देने वाली व्यवहारवाद की बौद्धिक आधारशिला है
(अ) विशुद्ध विज्ञान
(ब) क्रमबद्धीकरण
(स) मूल्य निर्धारण
(द) समग्रता
उत्तर:
(द) समग्रता

प्रश्न 13.
राजनीति विज्ञान को विचारधारा मुक्त बनाने का आह्वान व्यवहारवाद की किस बौद्धिक आधारशिला के रूप में किया गया है?
(अ) मूल्य निर्धारण
(ब) परिमाणीकरण
(स) सत्यापन
(द) शुद्ध विज्ञान
उत्तर:
(अ) मूल्य निर्धारण

प्रश्न 14.
व्यवहारवाद की सीमाओं का उल्लेख किया है
(अ) अर्नाल्ड ब्रेश्ट ने
(ब) लियो स्ट्रास ने
(स) सिबली ने
(द) उपर्युक्त सभी ने
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी ने

प्रश्न 15.
निम्न में से व्यवहारवाद की सीमा नहीं है
(अ) राजनीतिक व्यवहारवाद की गलत धारणा
(ब) अत्यधिक शब्दाडम्बर
(स) अत्यधिक खर्चीली पद्धति
(द) अध्ययन पद्धतियों से असहमति
उत्तर:
द) अध्ययन पद्धतियों से असहमति

प्रश्न 16.
यह किस राजनीति शास्त्री का कथन है कि ‘व्यवहारवादियों ने राजनीति विज्ञान में अनुसन्धान के लिए नए क्षेत्रों को निकाला है और नई, अध्ययन तकनीकों का विकास किया है।”
(अ) राबर्ट डहल
(ब) डेविड ईस्टन
(स) डॉ. एस. पी. वर्मा
(द) स्ट्रास
उत्तर:
(अ) राबर्ट डहल

प्रश्न 17.
राजनीति विज्ञान के किस दृष्टिकोण ने परम्परागत राजनीति विज्ञान की कमियों को उजागर किया? ।
(अ) व्यवहारवाद ने
(ब) उत्तर व्यवहारवाद ने
(स) उदारवाद ने
(द) फासीवाद ने।
उत्तर:
(अ) व्यवहारवाद ने

प्रश्न 18.
किस विचारधारा ने राजनीति विज्ञान का वैज्ञानीकरण करने का प्रयत्न किया? ।
(अ) उत्तर व्यवहारवाद ने
(ब) व्यवहारवाद ने
(स) उदारवाद ने
(द) नाजीवाद ने
उत्तर:
(ब) व्यवहारवाद ने

प्रश्न 19.
उत्तर व्यवहारवाद है
(अ) व्यवहारवाद का उत्तर
(ब) व्यवहारवाद की रचनात्मक समीक्षा
(स) परम्परावाद की निरन्तरता
(द) व्यवहारवाद का रूप
उत्तर:
(ब) व्यवहारवाद की रचनात्मक समीक्षा

प्रश्न 20.
निम्न में से कौन-सा राजनीतिक विचारक राजनीति विज्ञान में व्यवहारवाद तथा उत्तर व्यवहारवाद दोनों से ही समान रूप से सम्बद्ध है
(अ) डेविड ईस्टन
(ब) चार्ल्स मेरियम
(स) डॉ. एस. पी. वर्मा
(द) थर्स्टन
उत्तर:
(अ) डेविड ईस्टन

प्रश्न 21.
उत्तर व्यवहारवादी क्रान्ति के उदय का प्रमुख कारण नहीं है
(अ) व्यवहारवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया
(ब) अध्ययन पद्धतियों से असहमति
(स) व्यवहारवादी शोध के प्रति असन्तोष
(द) द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव
उत्तर:
(द) द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव

प्रश्न 22.
राजनीति विज्ञान का कार्य विज्ञान’ द्वारा प्रतिनिधित्व करता है
(अ) उत्तर व्यवहारवाद
(ब) समाजवाद
(स) साम्यवाद
(द) उदारवाद
उत्तर:
(अ) उत्तर व्यवहारवाद

प्रश्न 23.
राजनीति विज्ञान के शास्त्रीय पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है
(अ) उत्तर व्यवहारवाद
(ब) व्यवहारवाद
(स) परम्परावाद
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(स) परम्परावाद

प्रश्न 24.
उत्तर व्यवहारवाद की सात मान्यताओं का उल्लेख किसने किया है?
(अ) डेविड ईस्टन ने
(ब) डेविड ट्रमेन ने
(स) हज यूलाऊ ने
(द) मोरिस जानोबिज ने
उत्तर:
(अ) डेविड ईस्टन ने

प्रश्न 25.
मूल्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया है
(अ) उत्तर व्यवहारवाद ने
(ब) व्यवहारवाद ने
(स) परम्परावाद ने
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) उत्तर व्यवहारवाद ने

प्रश्न 26.
राजनीति विज्ञान का उद्देश्य ऐसे ज्ञान की प्राप्ति करना है, जो समाज के पुनर्निर्माण में सहायक हो। यह कथन किसे विचारधारा से सम्बन्धित है
(अ) व्यवहारवाद से
(ब) उत्तर व्यवहारवाद से
(स) प्रजातान्त्रिक समाज़वाद से
(द) उदारवाद से
उत्तर:
(ब) उत्तर व्यवहारवाद से

प्रश्न 27.
व्यवसायों के राजनीतिकरण की अनिवार्यता पर जोर देते हैं
(अ) व्यवहारवादी
(ब) उत्तर व्यवहारवादी
(स) परम्परावादी
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ब) उत्तर व्यवहारवादी

प्रश्न 28. उत्तर व्यवहारवाद की आलोचना का मुख्य बिन्दु है
(अ) अन्तर्विरोध
(ब) अवैज्ञानिक दृष्टिकोण
(स) तृतीय विश्व के लिए सीमित महत्त्वे
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 29.
राजनीति विज्ञान की सन्तुलित एवं आधुनिकतम विकास की अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है
(अ) उत्तर व्यवहारवाद
(ब) शक्ति सन्तुलन
(स) परम्परावाद
(द) उदारवाद
उत्तर:
(अ) उत्तर व्यवहारवाद

RBSE Class 11 Political Science Chapter 2 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राबर्ट ए. डहल के अनुसार व्यवहारवादी क्रान्ति को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
राबर्ट ए. डहल के अनुसार, “व्यवहारवादी क्रान्ति परम्परागत राजनीति विज्ञान की असफलताओं के प्रति असन्तोष का परिणाम है। इस क्रान्ति का उद्देश्य राजनीति विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक बनाना है।”

प्रश्न 2.
व्यवहारवाद का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
व्यवहारवाद एक बौद्धिक प्रवृत्ति, एक अध्ययन पद्धति, आन्दोलन और यथार्थवादी दृष्टिकोण पर आधारित आनुभविक अध्ययन द्वारा मानव व्यवहार का अध्ययन कर राजनीति विज्ञान को विशुद्ध विज्ञान बनाना चाहता है।

प्रश्न 3.
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् परम्परागत राजनीति विज्ञान के विरोध में एक व्यापक क्रान्ति हुई। इस क्रान्ति को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
व्यवहारवाद के नाम से।

प्रश्न 4.
राजनीति विज्ञान के सन्दर्भ में व्यवहारवाद अपना ध्यान मुख्य रूप से किस पर केन्द्रित करता है?
उत्तर:
राजनीतिक व्यवहार पर।

प्रश्न 5.
व्यवहारवादी विज्ञान’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया जाने लगा है?
उत्तर:
सामाजिक विज्ञान के अन्तर्गत आने वाले समस्त विषयों के लिए व्यवहारवादी विज्ञान’ शब्द का प्रयोग किया जाने लगा है।

प्रश्न 6.
व्यवहारवादी उपागम क्या है?
उत्तर:
व्यवहारवादी उपागम राजनीतिक तथ्यों की व्यवस्था और विश्लेषण का एक विशेष तरीका है जिसका विकास द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् अमरीकी राजनीति शास्त्रियों ने किया था।

प्रश्न 7.
व्यवहारवाद का प्रणेता किसे माना जाता है?
उत्तर:
डेविड ईस्टन को।

प्रश्न 8.
डेविड टुमैन के अनुसार व्यवहारवादी उपागम को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
डेविड ट्रमैन के अनुसार, “व्यवहारवादी उपागम से अभिप्राय है कि अनुसन्धान व्यवस्थित हो तथा उसका प्रमुख आग्रह आनुभविक प्रणालियों के प्रयोग पर ही होना चाहिए।”

प्रश्न 9.
व्यवहारवाद का लक्ष्य क्या है?
उत्तर:
व्यवहारवाद एक ऐसा दृष्टिकोण है जिसका लक्ष्य विश्लेषण की नई इकाइयों, नई पद्धतियों, नई तकनीकों, नये तथ्यों एवं एक व्यवस्थित सिद्धान्त के विकास को प्राप्त करना है।

प्रश्न 10.
व्यवहारवाद की आधारभूत मान्यता बताइए।
उत्तर:
व्यवहारवाद की आधारभूत मान्यता यह है कि प्राकृतिक विज्ञानों और समाज विज्ञानों के मध्य एक गुणात्मक निरन्तरता है।

प्रश्न 11.
व्यवहारवादी अवधारणा का जन्म कब हुआ?
उत्तर:
द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात्।

प्रश्न 12.
व्यवहारवादी उपागम के जन्म और विकास में कौन-कौन से तत्व सहायक रहे हैं?
उत्तर:

  1. द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व का अनुभववाद।
  2.  द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान राजनीति शास्त्रियों के यथार्थवादी अनुभव।

प्रश्न 13.
किन – किन विद्वानों ने राजनीति विज्ञान में संस्थाओं के अध्ययन और विश्लेषण के आधार पर राजनीतिक निष्कर्ष निकालने का विरोध किया?
उत्तर:
ग्राह्म वालेस एवं ए. एफ. बेन्टले ने।

प्रश्न 14.
व्यवहारवादी उपागम के सन्दर्भ में ग्राह्य वालेस का क्या मत है?
उत्तर:
ग्राह्म वालेस का मत है कि राजनीति विज्ञान का अध्ययन संस्थाओं के प्रसंग में नहीं बल्कि मानव के व्यवहार के प्रसंग में किया जाना चाहिए।

प्रश्न 15.
व्यवहारवाद के विकास में किस पुस्तक का विशेष महत्त्व है?
उत्तर:
व्यवहारवाद के विकास में 1925 में प्रकाशित चार्ल्स मेरियम की पुस्तक ‘न्यू ऑस्पेक्ट्स ऑफ पोलिटिक्स’ का विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 16.
‘न्यू ऑस्पेक्ट्स ऑफ पॉलिटिक्स’ किसकी रचना है?
उत्तर:
चार्ल्स मेरियम की।

प्रश्न 17.
चार्ल्स मेरियम ने अपनी पुस्तक ‘न्यू ऑस्पेक्ट्स ऑफ पॉलिटिक्स’ में किस बात पर बल दिया है?
उत्तर:
चार्ल्स मेरियम ने अपनी पुस्तक में राजनीतिक घटनाओं और तथ्यों के विश्लेषण के लिए मनोवैज्ञानिक एवं समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण व तकनीकों के प्रयोग पर बल दिया है।

प्रश्न 18.
किस राजनीति शास्त्री ने संयुक्त राज्य अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय को अपने विचारों के विस्तार का केन्द्र बनाया और व्यवहारवादी उपागम का विकास किया?
उत्तर:
चार्ल्स मेरियम ने।

प्रश्न 19.
व्यवहारवाद के विकास से सम्बन्धित किन्हीं दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. डेविड ईस्टन की पुस्तक ‘दी पॉलिटिकल सिस्टम’
  2. हर्बर्ट साइमन की पुस्तक’ एडमिनिस्ट्रेटिव बिहेवियर

प्रश्न 20.
शिकागो विश्वविद्यालय के कौन-कौन से विद्वानों को व्यवहारवादी उपागम का संस्थापक माना जाता है?
उत्तर:
पी.वी. स्मिथ, चार्ल्स मेरियम एवं हेराल्ड लॉसवेल को।

प्रश्न 21.
व्यवहारवाद के उदय के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  1. परम्परागत अध्ययन पद्धतियों के प्रति असन्तोष,
  2. अन्य सामाजिक विज्ञानों से प्रेरणा।।

प्रश्न 22.
ऐतिहासिक दृष्टि से राजनीतिक चिन्तन में व्यवहारवादी मान्यताओं के कुछ तथ्य किन-किन प्राचीन विद्वानों के चिन्तन में मिलते हैं?
उत्तर:
अरस्तू, मैकियावेली, जॉन लॉक एवं मांटेस्क्यू के चिंतन में।

प्रश्न 23.
20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में राजनीति शास्त्रियों में परम्परागत अध्ययन पद्धतियों के प्रति असन्तोष क्यों उत्पन्न हुआ?
उत्तर:
क्योंकि परम्परागत अध्ययन पद्धतियों से राजनीतिक जीवन की वास्तविकता का चित्र राजनीति शास्त्रियों के समक्ष स्पष्ट नहीं हो पा रहा था।

प्रश्न 24.
राबर्ट डहल के अनुसार व्यवहारवाद के उद्देश्य को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
राबर्ट डहल के अनुसार, व्यवहारवाद एक ऐसा आन्दोलन है जिसका उद्देश्य राजनीतिक अध्ययन को आधुनिक मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में विकसित सिद्धान्तों, पद्धतियों, खोजों और दृष्टिकोणों के निकट सम्पर्क में लाना है।

प्रश्न 25.
डेविड ईस्टन ने व्यवहारवाद या व्यवहारवादी उपागम के कितने प्रमुख आधार बताए हैं?
उत्तर:
आठ प्रमुख आधार।

प्रश्न 26.
डेविड ईस्टन ने सम्पूर्ण व्यवहारवाद की बौद्धिक आधारशिला किसे कहा है?
उत्तर:
डेविड ईस्टन ने व्यवहारवाद के आठ प्रमुख आधार बतायें हैं, जिन्हें उन्होंने सम्पूर्ण व्यवहारवाद की बौद्धिक आधारशिला कहा है।

प्रश्न 27.
डेविड ईस्टन के अनुसार व्यवहारवाद की कोई चार मान्यताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. नियमन
  2. सत्यापन
  3. परिमाणीकरण
  4. मूल्य निर्धारण।

प्रश्न 28.
व्यवहारवाद के सन्दर्भ में सत्यापन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
व्यवहारवाद के सन्दर्भ में सत्यापन से तात्पर्य यह है कि मानव व्यवहार के बारे में जो भी नियम बनाया गया है उसकी सत्यता की जाँच होनी चाहिए।

प्रश्न 29.
राजनीति विज्ञान का कौन-सा उपागम मानव को एक सामाजिक प्राणी मानता है?
उत्तर:
व्यवहारवाद।

प्रश्न 30.
व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान को एक विशुद्ध विज्ञान का रूप क्यों देना चाहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि राजनीति का विशुद्ध विज्ञान आनुभविक सिद्धान्तों के निर्माण में सहायक होने के साथ-साथ वर्तमान काल की सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं को सुलझाने में सहायक सिद्ध होगा।

प्रश्न 31.
व्यवहारवाद की आलोचना करने वाले किन्हीं चार विद्वानों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. अर्नाल्ड ब्रेस्ट,
  2. लियो स्ट्रास,
  3. सिबली,
  4. राबर्ट ए. डहल।

प्रश्न 32.
मानव व्यवहार की नियमितता खोजना क्यों असम्भव है?
उत्तर:
क्योंकि मानव सजीव और चेतनशील प्राणी होता है। इसका व्यवहार, अनुभव, आशाओं एवं परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तनशील होता है।

प्रश्न 33.
व्यवहारवाद का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दोष (सीमा) कौन-सा है?
उत्तर:
मूल्य निरपेक्षता पर बल देना।

प्रश्न 34.
राजनीति विज्ञान का कौन-सा उपागम प्रविधि एवं तकनीकों पर अत्यधिक बल देता है?
उत्तर:
व्यवहारवादी उपागम।

प्रश्न 35.
व्यवहारवाद में क्या अन्तर्विरोध दिखाई पड़ता है?
उत्तर:
व्यवहारवाद में एक ओर तो मूल्य निरपेक्ष अध्ययन पर बल दिया जाता है वहीं दूसरी ओर तानाशाही की तुलना में उदारवादी लोकतन्त्र की श्रेष्ठता को स्वीकार किया जाता है।

प्रश्न 36.
व्यवहारवादी अध्ययन बहुत अधिक खर्चीला एवं समय साध्य है? क्यों?
उत्तर:
क्योंकि व्यवहारवादी अध्ययन में शुद्धता व पूर्णता के नाम पर बार-बार सर्वेक्षण कर आँकड़े एकत्रित किये जाते हैं और फिर उनका विश्लेषण किया जाता है। यह सम्पूर्ण कार्य अत्यधिक खर्चीला व समय साध्य होता है।

प्रश्न 37.
व्यवहारवाद किस प्रकार नीति-निर्माण में सहायता प्रदान करने में असमर्थ है?
उत्तर:
व्यवहारवाद केवल तथ्यों को महत्त्व देता है और मूल्यों की उपेक्षा करता है। इसलिए वह नीति-निर्माण में सहायता प्रदान करने में असमर्थ है।

प्रश्न 38.
व्यवहारवाद के राजनीति विज्ञान में महत्त्व के कोई दो बिन्दु बताइए।
उत्तर:

  1. नवीन राजनीति विज्ञान की स्थापना
  2. अन्तर अनुशासनात्मक दृष्टिकोण की स्थापना।

प्रश्न 39.
राबर्ट ए. डहल ने व्यवहारवाद के किस दृष्टिकोण को राजनीति विज्ञान की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना है?
उत्तर:
अन्तर – अनुशासनात्मक दृष्टिकोण को।

प्रश्न 40.
व्यवहारवाद ने राजनीति विज्ञान को कौन-कौन सी वैकल्पिक धारणाएँ प्रदान की हैं? नाम लिखिए।
उत्तर:
शक्ति, समूह, व्यवस्था, इच्छा शक्ति, मतदान व्यवहार एवं खोज सिद्धान्त आदि।

प्रश्न 41.
किस राजनीति शास्त्री ने उत्तर व्यवहारवाद को व्यवहारवाद के प्रति एक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं अपितु मूल व्यवहारवादी आन्दोलन में सार्थक सुधार के रूप में स्वीकार किया है?
उत्तर:
डेविड ईस्टन ने।

प्रश्न 42.
उत्तर व्यवहारवादी किस बात के पक्षधर हैं?
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवादी राजनीतिक विश्लेषण में मूल्यों को सम्मिलित कर राजनैतिक अध्ययन को औचित्यपूर्ण प्रासंगिता प्रदान करने के पक्षधर हैं।

प्रश्न 43.
उत्तर व्यवहारवाद में प्रासंगिकता एवं धर्म शब्द का प्रयोग किस राजनीति शास्त्री ने किया?
उत्तर:
डेविड ईस्टन ने।

प्रश्न 44.
उत्तर व्यवहारवाद में प्रासंगिकता का धर्म क्या है?
उत्तर:
शोध किसी भी पद्धति से किया जाए उसे प्रासंगिकता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। यही प्रासंगिकता का धर्म है।

प्रश्न 45.
उत्तर व्यवहारवाद के कोई दो आधार बताइए।
अथवा
उत्तर व्यवहारवादियों के दो नारे कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. कर्म,
  2. शोध की प्रासंगिकता।

प्रश्न 46.
उत्तर व्यवहारवादी क्रान्ति की उत्पत्ति का मूल कारण बताइए।
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवादी क्रान्ति की उत्पत्ति का मूल कारण व्यवहारवाद में अन्तर्निहित कमियों एवं दोषों के विरुद्ध उत्पन्न हुए तीव्र असन्तोष को माना जाता है।

प्रश्न 47.
परम्परावाद और उत्तर व्यवहारवाद में कोई दो अन्तर बताइए।
उत्तर:

  1. परम्परावाद राजनीति विज्ञान की यथास्थिति से सन्तुष्ट है, जबकि उत्तर व्यवहारवाद राजनीति विज्ञान के निरन्तर विकास में विश्वास रखता है।
  2. परम्परावाद अपनी प्रवृत्ति से भूतोन्मुखी है, जबकि उत्तर व्यवहारवाद अपनी प्रकृति से भविष्योन्मुखी है।

प्रश्न 48.
डेविड ईस्टन के अनुसार उत्तर व्यवहारवाद के कोई दो लक्षण लिखिए।
उत्तर:

  1. शोध की सार्थकता या प्रासंगिकता
  2. क्रियानिष्ठता या कर्म।

प्रश्न 49.
प्रासंगिकता के सिद्धान्त से क्या आशय है?
उत्तर:
डेविड ईस्टन ने उत्तर व्यवहारवाद की सात मान्यताओं का प्रतिपादन किया है जिन्हें प्रासंगिकता का सिद्धान्त कहा जाता है।

प्रश्न 50.
उत्तर व्यवहारवाद की कोई दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. सामाजिक परिवर्तन पर बल,
  2. कर्मनिष्ठ विज्ञान।

प्रश्न 51.
मूल्यों के सन्दर्भ में उत्तर व्यवहारवादियों का क्या मत है?
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवादियों का मत है कि मानव समाज के लिए केवल उसी ज्ञान का महत्व है जो मूल्यों पर आधारित है।

प्रश्न 52.
उत्तर व्यवहारवादियों के अनुसार राजनीति विज्ञान का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवादियों के अनुसार राजनीति विज्ञान का उद्देश्य ऐसे ज्ञान की प्राप्ति करना है जो समाज के पुनर्निर्माण में सहायक हो।

प्रश्न 53.
राजनीति विज्ञान का कौन-सा उपागम राजनीति विज्ञान को प्राकृतिक विज्ञान के समान नहीं मानता है?
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवाद।

प्रश्न 54.
कौन-सा उपागम राजनीति विज्ञान को एक सामाजिक विज्ञान के रूप में मान्यता प्रदान करता है?
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवाद।

प्रश्न 55.
उत्तर व्यवहारवाद की आलोचना के कोई दो बिन्दु लिखिए।
उत्तर:

  1.  अवैज्ञानिक दृष्टिकोण,
  2. अमरीकी राष्ट्रीय हितों का प्रतिनिधित्व।

प्रश्न 56.
राजनीति विज्ञान की सन्तुलित एवं आधुनिकतम् विकास की अवस्था का प्रतिनिधित्व कौन-सा उपागम करता है?
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवाद

RBSE Class 11 Political Science Chapter 2 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
डेविड ईस्टन के अनुसार व्यवहारवाद की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
डेविड ईस्टन के अनुसार, “व्यवहारवाद वास्तविक शक्तियों पर अपना समस्त ध्यान केन्द्रित करता है। व्यवहारवाद के अध्ययन की इकाई मानव का ऐसा व्यवहार है, जिसका प्रत्येक व्यक्ति द्वारा पर्यवेक्षण, मापन और सत्यापन किया जा सकता है। व्यवहारवाद राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन से राजनीति की संरचनाओं तथा प्रतिक्रियाओं आदि के बारे में वैज्ञानिक व्याख्याएँ विकसित करना चाहता है।”

प्रश्न 2.
व्यवहारवाद के अर्थ को राबर्ट ए. डहल ने किस प्रकार विश्लेषित किया है?
उत्तर:
राबर्ट ए. डहल द्वारा व्यवहारवाद के अर्थ का विश्लेषण इस प्रकार किया गया है

  1. यह राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत एक विरोध आन्दोलन है, जिससे ऐसे अनेक राजनीति वैज्ञानिक विशेषकर अमरीकी सम्बद्ध हैं, जो परम्परागत राजनीति विज्ञान से असन्तुष्ट हैं।
  2. यह परम्परागत राजनीति विज्ञान के विभिन्न उपागमों, यथा-ऐतिहासिक, दार्शनिक, विवरणात्मक एवं संस्थात्मक आदि के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है।
  3. व्यवहारवादी वैज्ञानिकों का मत है कि कुछ नवीन पद्धतियों एवं उपागमों का विकास किया जा सकता है।
  4. यह एक ऐसा आन्दोलन है जिसका उद्देश्य राजनीतिक विज्ञान अध्ययन को आधुनिक मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में विकसित सिद्धान्तों, पद्धतियों, खोजों एवं दृष्टिकोण के निकट सम्पर्क में लाना है।
  5. यह आनुभविक तथ्यों को अधिक वैज्ञानिक बनाने का प्रयत्न है।
  6. व्यवहारवाद का उद्देश्य प्रशासन सम्बन्धी समस्त घटनाओं को मानव के एक ऐसे व्यवहार के रूप में प्रस्तुत करना है, जिसका प्रेक्षण कर लिया गया हो और जिसका प्रेक्षण किया जा सकता हो ।

प्रश्न 3.
व्यवहारवाद की किन्हीं दो मान्यताओं का उल्लेख कीजिए। उत्तर
व्यवहारवाद की मान्यताएँ
(i) नियमन – नियमन से आशय यह है कि राजनीति के अध्ययन हेतु नियमों अथवा सिद्धान्तों का निर्माण सम्भव है। व्यवहारवादी विचारकों का मत है कि मानव के राजनीतिक व्यवहार में ऐसे सामान्य तथ्य पाये जाते हैं जिनके आधार पर सिद्धान्तों का निर्माण किया जा सकता है।

(ii) मूल्य निर्धारण – व्यवहारवादी विचारक मूल्यों और तथ्यों को पृथक रखते हैं। इनका नैतिक आदर्शों और मूल्यों से कोई सम्बन्ध नहीं है। लोकतन्त्र, समानता अथवा स्वतन्त्रता अपने आप में बहुत उच्च मूल्य हो सकते हैं परन्तु इनकी सत्यता अथवा असत्यता की जाँच वैज्ञानिक तरीके से नहीं की जा सकती है। शोध की वैज्ञानिकता एवं वस्तुनिष्ठता के लिए शोधकर्ता का मूल्य निरपेक्ष होना आवश्यक है। शोधकर्ता द्वारा व्यक्तिगत मूल्यों से तटस्थ एवं निरपेक्ष रहकर ही वैज्ञानिक अध्ययन सम्भव है। इस प्रकार व्यवहारवादी मूल्य निरपेक्ष दृष्टिकोण पर बल देते हैं।

प्रश्न 4.
‘समग्रता’ व्यवहारवाद की एक प्रमुख मान्यता है। व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
‘समग्रता’ अथवा ‘एकीकरण’ व्यवहारवाद की एक प्रमुख मान्यता है। व्यवहारवाद के अनुसार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसका राजनीतिक व्यवहार अनेक गैर राजनीतिक कारकों, यथा-सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं संस्कृति से प्रभावित होता है। अत: मानव व्यवहार का खण्ड-खण्ड में अध्ययन किया जाना सम्भव नहीं है। ऐसी दशा में राजनीतिक घटनाओं और व्यवहार को समझने के लिए समाज में होने वाली अन्य घटनाओं के सन्दर्भ में अध्ययन आवश्यक होता है।

व्यवहारवादी उपागम राजनीति शास्त्र एवं अन्य सामाजिक विज्ञानों में सम्बन्ध बनाकर अन्त: अनुशासनात्मक अध्ययन पर बल देता है। राजनीति शास्त्र के अध्ययनकर्ताओं को अन्य सामाजिक विज्ञानों की खोजों तथा उपलब्धियों का प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार व्यवहारवादियों की मान्यता है कि विभिन्न सामाजिक विज्ञानों के ज्ञान को समन्वित करना चाहिए।

प्रश्न 5.
व्यवहारवादी विचारकों ने अन्य पद्धतियों के महत्त्व को स्वीकार नहीं किया। इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध राजनीतिक विचारक सिबली ने क्या कहा है?
उत्तर:
व्यवहारवादी विचारक अध्ययन के लिए केवल व्यवहारवादी अध्ययन पद्धति को स्वीकार करते हैं तथा अन्य अध्ययन पद्धतियों को महत्त्व नहीं देते। इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध राजनीतिक विचारक सिबली का मत है कि, “राजनीति का अध्ययन यदि केवल इसी आधार पर नहीं करना है कि व्यक्ति का व्यवहार निर्दिष्ट परिस्थिति में क्या हो सकता है, परन्तु इस आधार पर भी कि वह आज क्या है, कल क्या था, भविष्य में क्या होगा और कैसा होना चाहिए तो हमारा काम केवल व्यवहारवाद से नहीं चलेगा। हमें राजनीतिक चिंतन के इतिहास, नीति, दर्शन, सांस्कृतिक इतिहास, शास्त्रीय परम्परा के परिकल्पनाशील राजनीतिक दर्शन, राजनीतिक विकास, प्रत्यक्ष राजनीतिक अनुभव एवं राजनीतिक विवरण से सहायता लेनी होगी।”

प्रश्न 6.
व्यवहारवाद ने नवीन राजनीति विज्ञान की किस प्रकार स्थापना की है?
अथवा
व्यवहारवादी अध्ययन के प्रभाव के कारण ही राजनीति विज्ञान को नवीन राजनीति विज्ञान की संज्ञा दी जाने लगी है। क्यों?
उत्तर:
व्यवहारवादी अध्ययन के प्रभाव के कारण ही राजनीति विज्ञान को नवीन राजनीति विज्ञान की संज्ञा दी जाने लगी है। व्यवहारवाद ने परम्परागत राजनीति विज्ञान की कमियों को विश्व के समक्ष उजागर करके उसके स्थान पर नये राजनीति विज्ञान की स्थापना की है। जहाँ परम्परावादी राजनीति विज्ञान में मूल्य प्रधानता, आदर्शवादी एवं व्यक्तिनिष्ठ अध्ययन को महत्त्व दिया जाता था।

वहीं व्यवहारवाद ने आधुनिक राजनीति विज्ञान के अध्ययन को मूल्य निरपेक्ष, यथार्थवादी एवं वस्तुनिष्ठ बनाने का प्रयास किया। व्यवहारवादी आन्दोलन के प्रभावस्वरूप इसके साहित्य में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आज अनेक राजनीतिक विचारक वैज्ञानिक तथ्यों के महत्त्व को स्वीकार करते हैं। व्यवहारवाद ने आधुनिक राजनीति शास्त्र को नवीन अध्ययन पद्धति, नवीन शब्दावली एवं नवीन मान्यताएँ प्रदान की है। इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप राजनीति का नवीन विज्ञान विकसित हो रहा है।

प्रश्न 7.
उत्तर व्यवहारवाद के सम्बन्ध में डेविड ईस्टन के विचार लिखिए।
अथवा
उत्तर व्यवहारवादी बनने के लिए डेविड ईस्टन ने कौन – कौन से तर्क प्रस्तुत किए?
उत्तर:
डेविड ईस्टन ने उत्तर व्यवहारवाद को व्यवहारवाद के प्रति एक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं बल्कि मूल व्यवहारवादी आन्दोलन में सार्थक सुधार के रूप में स्वीकार किया है। डेविड ईस्टन के अनुसार, “उत्तर व्यवहारवाद भविष्योन्मुखी है, जो राजनीति विज्ञान को विकास की नई दिशा में ‘बढ़ाना चाहता है। यह अतीत (व्यवहारवाद) की उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए उसमें कुछ नया जोड़ना चाहता है।”

डेविड ईस्टन के शब्दों में, “उत्तर व्यवहारवादी क्रान्ति उस व्यवहारवाद का घोर विरोध करती है जिसके द्वारा राजनीति विज्ञान को प्राकृतिक विज्ञान की कठोर वैज्ञानिक शोध पद्धति का प्रयोग कर विशुद्ध विज्ञान का रूप देने का प्रयत्न किया गया है। यह विरोध, परम्परावादियों द्वारा किए गए इसी प्रकार के विरोध से सर्वथा भिन्न है। परम्परावादी वैज्ञानिक पद्धति का विरोध करते हैं क्योंकि वे प्रायः मनुष्य के व्यवहार में परीक्षण योग्य सामान्यीकरण को खोजने की सम्भावनाओं को ही अस्वीकार करते हैं।

उनका मत है कि मानवीय और सामाजिक व्यवहार विभिन्नताओं से भरा हुआ है। अतः उसका सामान्यीकरण नहीं हो सकता। उत्तर व्यवहारवादी इस परम्परावादी तर्क से सहमत नहीं हैं। इनके अनुसार मानव और सामाजिक व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन न केवल सम्भव है अपितु आवश्यक एवं उचित भी है। व्यवहारवादी क्रान्ति से हम अपने विश्लेषण को सार्थकता नहीं दे सकते। अतः हमें उत्तर व्यवहारवादी बनना होगा।”

प्रश्न 8.
व्यवहारवादी शोध के प्रति असन्तोष किस प्रकार उत्तर व्यवहारवादी क्रान्ति के उदय का कारण बना? बताइए।
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवाद एक प्रकार से व्यवहारवाद के प्रति असन्तोष का परिणाम है। व्यवहारवादी शोध में मूल्यों की उपेक्षा की जाती है तथा तथ्यों पर ही बल दिया जाता है। व्यवहारवाद में मूल्यों के अध्ययन को वैज्ञानिकता की दुर्बलता माना गया है तथा तथ्य प्रधान अध्ययन को विज्ञान का पर्याय माना गया है जबकि उत्तर व्यवहारवाद में तथ्यों और मूल्यों दोनों को ही व्यक्ति के सन्दर्भ में प्रासंगिक व उपयोगी माना गया है। अतः इनमें अन्तर करना कृत्रिम है। राजनीति विज्ञान को सही अर्थों में राजनीतिक एवं वैज्ञानिक दोनों ही रूपों में जीवन्त होना चाहिए। अत: राजनीति विज्ञान के अध्ययन में मूल्यों को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 9.
परम्परावाद एवं उत्तर व्यवहारवाद में दो प्रमुख अन्तर बताइए।
उत्तर:
परम्परावाद एवं उत्तर व्यवहारवाद में अन्तर
(i) विकास की विभिन्न अवधारणाओं में अन्तर – परम्परावाद उन्नीसवीं शताब्दी के राजनीति विज्ञान के विकास को प्रकट करता है। यह राजनीति विज्ञान के शास्त्रीय पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है जबकि उत्तर व्यवहारवाद राजनीति विज्ञान के वर्तमान समय के विकास को प्रकट करता है।

(ii) अध्ययन के दृष्टिकोण में अन्तर – परम्परावाद राजनीति विज्ञान का अध्ययन मूल्यात्मक दृष्टिकोण से करता है जबकि उत्तर व्यवहारवाद राजनीति विज्ञान के अध्ययन में मूल्यात्मक दृष्टिकोण के साथ-साथ यथार्थवादी दृष्टिकोण को भी अपनाता है।

प्रश्न 10.
उत्तर व्यवहारवाद की कोई दो आधारभूत मान्यताएँ बताइए।
उत्तर
उत्तर व्यवहारवाद की आधारभूत मान्यताएँ
(i) प्रविधि से पूर्व सार – राजनीति विज्ञान के शोध में तकनीक की तुलना में सार-वस्तु को महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। तकनीक कितनी भी परिष्कृत क्यों न हो यदि वह समकालीन सामाजिक समस्याओं की दृष्टि से सुसंगत और सारगर्भित नहीं है, तो उस शोध पर श्रम करना अनुपयोगी है।

(ii) मूल्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका – उत्तर व्यवहारवादी मूल्यों की निर्णायक भूमिका स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार मानव समाज के लिए केवल उसी ज्ञान का महत्त्व है जो मूल्यों पर आधारित है। मूल्यों को ज्ञान की प्रेरक शक्ति मानकर ही समाज भयमुक्त हो सकता है। उत्तर व्यवहारवादियों ने मूल्य निरपेक्ष ज्ञान की अवधारणा को मूलतः मानवता विरोधी मानकर उसका विरोध किया है। सामाजिक विज्ञानों का उद्देश्य एक श्रेष्ठ मानव समाज की कल्पना है। अतः उन्हें तो मूल्य सापेक्ष ज्ञान ही प्राप्त करना चाहिए।

प्रश्न 11.
उत्तर व्यवहारवादियों के अनुसार व्यवसायों का राजनीतिकरण क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवादी विचारक राजनीति वैज्ञानिकों की निष्क्रियता के पक्षधर नहीं हैं। वे उन्हें सक्रिय भूमिका के लिए प्रेरित करते हैं। उत्तर व्यवहारवादी व्यवसायों के राजनीतिकरण पर बल देते हैं। उनकी मान्यता है कि राजनीति वैज्ञानिकों को समाज में सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए जिससे समाज के उद्देश्यों को व्यवस्थित एवं योजनाबद्ध दिशा प्रदान की जा सके।

उत्तर व्यवहारवादी राजनीति शास्त्रियों, शिक्षण संस्थानों, बुद्धिजीवियों से सम्बन्धित संघों व विश्वविद्यालयों आदि का राजनीतिकरण करना चाहते हैं। मानवीय मूल्यों की रक्षा एवं समाज की चुनौतियों का सामना करने के लिए राजनीति वैज्ञानिकों को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। ऐसी स्थिति में व्यवसायों का राजनीतिकरण आवश्यक है।

प्रश्न 12.
उत्तर व्यवहारवाद की कोई दो सीमाएँ लिखिए।
अथवा
उत्तर व्यवहारवाद की आलोचना के दो आधार बताइए।
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवाद की सीमाएँ (आलोचनाएँ):
(i) अन्तर्विरोध का होना – उत्तर व्यवहारवाद अपने अध्ययन में मूल्य और तथ्य दोनों को महत्त्वपूर्ण मानता है। फलस्वरूप इसके कारण उत्तर व्यवहारवाद में अन्तर्विरोध भी उत्पन्न हुए हैं। उत्तर व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान के अध्ययन को एक साथ ही मूल्यं प्रधान, आदर्शवादी, व्यक्तिनिष्ठ के साथ ही मूल्य निरपेक्ष, यथार्थवादी व वस्तुनिष्ठ भी बनाना चाहते हैं जो कि असम्भव है।

(ii) अवैज्ञानिक दृष्टिकोण – उत्तर व्यवहारवादी विचारक तकनीक से पहले सार को महत्त्व देते हैं अर्थात् वे पहले शोध का उद्देश्य निर्धारित करते हैं। तत्पश्चात् उद्देश्य की पुष्टि के लिए तकनीक का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार उत्तर व्यवहारवादियों का अध्ययन पूर्वाग्रह से ग्रस्त होता है। ऐसे अध्ययन को अवैज्ञानिक कहा जा सकता है।

RBSE Class 11 Political Science Chapter 2 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
परम्परागत अध्ययन पद्धतियों के प्रति असन्तोष के प्रमुख कारण बताइए।
अथवा
परम्परागत उपागम के प्रति असन्तोष के कौन-कौन से कारण माने जाते हैं?
उत्तर:
परम्परागत अध्ययन पद्धतियों (उपागम) के प्रति असन्तोष के प्रमुख कारण:  परम्परागत अध्ययन पद्धतियों (उपागम) के प्रति असन्तोष के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं
(1) शासन के नीति – निर्माण एवं संचालन में राजनीतिज्ञों को महत्त्व दिया जाना-बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में राजनीति शास्त्रियों को परम्परागत राजनीति शास्त्र की अध्ययन पद्धतियों और परिणामों से निराशा उत्पन्न हुई। शासन के नीति-निर्माण एवं संचालन में केवल राजनेताओं को महत्त्व दिया जाता था। राजनीति विज्ञान के विद्वानों एवं शोधार्थियों के ज्ञान, कौशल और अनुभव की उपेक्षा की जाती थी।

(2) अध्ययन विषय में सैद्धान्तिक पक्ष के विवेचन पर बल दिया जाना – राजनीति शास्त्रियों ने यह अनुभव किया कि परम्परागत उपागम के अन्तर्गत अध्ययन विषय में सैद्धान्तिक पक्ष के विवेचन पर ही बल दिया जा रहा था, यह विश्वसनीय नहीं था। अध्ययन विषय में यथार्थवादी विषयवस्तु का अभाव था।

(3) सर्वाधिकारवादी विचारों की व्याख्या करने में असमर्थ – परम्परागत उपागम फासीवाद, नाजीवाद, प्रजातिवाद, एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों के उदय, विकास एवं लोकप्रियता की व्याख्या करने में असमर्थ था। इतना ही नहीं, उभरता हुआ साम्यवादी विश्व भी उदार लोकतन्त्र के लिए खतरा बन रहा था। परम्परागत उपागम द्वारा सर्वाधिकारवादी विचारों की व्याख्या एवं समाधान सम्भव नहीं था।

(4) अध्ययन पद्धति का अपर्याप्त होना – परम्परागत उपागम की अध्ययन पद्धति वर्णनात्मक थी। राजनीति विज्ञान के निरन्तर विकास एवं लोकप्रियता के पश्चात् भी विषय की अध्ययन पद्धति, जो कि मूल रूप से वर्णनात्मक शैली की थी, को अपर्याप्त माना गया।

(5) नवीनतम् एवं विश्वसनीय पद्धतियों एवं तकनीकों के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होना – अन्य विषयों जैसे प्राकृतिक विज्ञानों एवं समाजशास्त्रों में विकसित प्रक्रिया के परिणामस्वरूप नवीनतम् तथा विश्वसनीय पद्धतियों और तकनीकों के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न हुई। इस विषय में यह उचित माना गया कि अन्तर-विषयक विनिमय की निरन्तरता राजनीति शास्त्र के अस्तित्व, संरक्षण एवं विकास हेतु आवश्यक है। यह तथ्य व्यवहारवाद के उदय और विकास में एक महत्त्वपूर्ण कदम सिद्ध हुआ।

(6) द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् की स्थिति-द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में जिस प्रकार के वातावरण का निर्माण हुआ, उसमें राजनीति शास्त्रियों ने यह महसूस किया कि पश्चिमी व्यवस्थाओं एवं वातावरण में किए गए शोध अध्ययन, उनके निष्कर्ष तथा अध्ययन पद्धतियाँ सीमित क्षेत्र में ही उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं।

एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका के नव स्वतन्त्र एवं पिछड़े देशों की कई समस्याओं का अध्ययन परम्परागत पद्धतियों से करने पर वास्तविक स्थिति का ज्ञान सम्भव नहीं है। फलस्वरूप सांस्कृतिक एवं अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में राजनीतिक प्रक्रिया व व्यवहार के अध्ययन को उपयोगी माना गया।

प्रश्न 2.
राजनीति विज्ञान पर व्यवहारवाद के प्रभाव को बताइए।
अथवा
व्यवहारवाद की उपयोगिता एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।
अथवा
व्यवहारवाद को राजनीति विज्ञान में महत्त्व स्थापित कीजिए।
अथवा
राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में व्यवहारवाद के योगदान का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में व्यवहारवाद का योगदान / महत्त्व / उपयोगिता व्यवहारवाद ने राजनीति विज्ञान को नवीन अध्ययन पद्धति, नवीन शब्दावली, नवीन शैली, नवीन अवधारणाएँ, नवीन पद्धतियाँ तथा नवीन तकनीके प्रदान की हैं। डॉ. एस. पी. वर्मा, ने ठीक ही कहा है कि “व्यवहारवादियों ने राजनीति विज्ञान में अनुसन्धान के लिए नए क्षेत्रों को निकाला है तथा नवीन अध्ययन पद्धतियों का विकास किया है।” राजनीति विज्ञान पर व्यवहारवाद के प्रभाव अथवा उसकी उपयोगिता व महत्त्व को निम्नलिखित रूपों में व्यक्त किया जा सकता है

(1) नवीन राजनीति विज्ञान की स्थापना – व्यवहारवादी अध्ययन के प्रभाव के कारण ही राजनीति विज्ञान को नवीन राजनीति विज्ञान की संज्ञा दी जाने लगी है। इसने परम्परागत राजनीति विज्ञान की कमियों को उजागर किया है। व्यवहारवाद ने परम्परावाद के विपरीत आधुनिक राजनीति विज्ञान के अध्ययन को मूल्य निरपेक्ष, यथार्थवादी एवं वस्तुनिष्ठ बनाने का प्रयास किया है।

(2) राजनीति विज्ञान को वैज्ञानिकता प्रदान करना – व्यवहारवाद ने राजनीति विज्ञान के अध्ययन के लिए वैज्ञानिक पद्धति अपनाने पर बल दिया। इसने राजनीति विज्ञान के अध्ययन हेतु सर्वेक्षण विधि, प्रश्नावली विधि, साक्षात्कार विधि तथा सांख्यिकीय विधि आदि को अपनाया।

(3) विषयवस्तु में परिवर्तन – परम्परागत राजनीति विज्ञान में अध्ययन का केन्द्र बिन्दु राजनीतिक संस्थाएँ थीं। वहीं व्यवहारवाद ने राजनीतिक संस्थाओं के सैद्धान्तिक विवेचन के स्थान पर राजनीति विज्ञान के अध्ययन में मानव व्यवहार क केन्द्रीय भूमिका प्रदान की तथा इसे ही अपनी अध्ययन इकाई माना।

(4) अन्तः अनुशासनात्मक दृष्टिकोण की स्थापना – व्यवहारवाद ने राजनीति विज्ञान को अन्त: अनुशासनात्मक स्वरूप प्रदान किया है तथा इस बात के लिए प्रेरित किया है कि राजनीति विज्ञान का अध्ययन अन्य सामाजिक विज्ञानों के सन्दर्भ में किया जाना चाहिए। व्यवहारवाद ने राजनीति शास्त्रियों के दृष्टिकोण को व्यापक बनाया है।

(5) वैकल्पिक धारणाएँ प्रदान करना – व्यवहारवाद ने राजनीति विज्ञान को अनेक वैकल्पिक धारणाएँ प्रदान की हैं। इन धारणाओं का राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन में विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान है। उदाहरण के रूप में; शक्ति, समूह व्यवस्था, इच्छा शक्ति, मतदान व्यवहार एवं खोज सिद्धान्त आदि का नाम लिया जा सकता है।

(6) राजनीतिक अध्ययन को यथार्थवादी बनाना – व्यवहारवाद ने राजनीति विज्ञान के अध्ययन में क्या होना चाहिए’, के स्थान पर क्या है’, पर बल दिया है। इस प्रकार व्यवहारवाद ने राजनीति विज्ञान के अध्ययन को यथार्थवादी बनाया है।

प्रश्न 3.
उत्तर व्यवहारवादी क्रान्ति के कारणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
उत्तर व्यवहारवाद के उदय के प्रमुख कारण बताइए।
अथवा
उत्तर व्यवहारवादी आन्दोलन किस प्रकार अस्तित्व में आया? बताइए।
उत्तर:
उत्तर व्यवहारवादी क्रान्ति के कारण उत्तर व्यवहारवादी आन्दोलन परम्परागत एवं व्यवहारवादी दृष्टिकोणों की कमियों के कारण अस्तित्व में आया। उत्तर व्यवहारवादी क्रान्ति के उदय के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं
(1) व्यवहारवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया – उत्तर व्यवहारवाद, व्यवहारवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया है। व्यवहारवादी आन्दोलन ने राजनीति विज्ञान को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया है, लेकिन ये प्रयत्न अपर्याप्त वे अपूर्ण माने गये।

(2) अध्ययन पद्धतियों से असहमति – उत्तर व्यवहारवाद के अनुसार राजनीति विज्ञान में प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति अध्ययन पद्धतियों को लागू करने का प्रयत्न उचित नहीं है क्योंकि व्यक्ति और समाज की प्रवृत्ति परिवर्तनशील है। अतः प्राकृतिक विज्ञान की भाँति एवं उन्हीं मानदण्डों के आधार पर राजनीति विज्ञान का अध्ययन सम्भव नहीं है।

(3) व्यवहारवादी शोध के प्रति घोर निराशा – उत्तर व्यवहारवाद के उदय का कारण व्यवहारवादी शोध के प्रति घोर निराशा भी माना जाता है। व्यवहारवादी शोध में मूल्यों की उपेक्षा की जाती है तथा तथ्यों पर बल दिया जाता है। वहीं उत्तर व्यवहारवाद ने तथ्यों और मूल्यों दोनों को ही प्रासंगिक एवं उपयोगी माना है। राजनीति विज्ञान के अध्ययन में मूल्यों को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

(4) विश्व मानवता के प्रति दायित्वों की उपेक्षा – जिस समय व्यवहारवादी वैचारिक संरचनाओं, प्रतिमानों और सिद्धान्तों के निर्माण में संलग्न थे, उस समय सम्पूर्ण विश्व तीव्र सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक कठिनाइयों का सामना कर रहा था। व्यवहारवादी विचारक तत्कालीन विश्व की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक समस्याओं से अनभिज्ञ थे।

तत्कालीन समाज विघटन और टूट – फूट की ओर अग्रसर हो रहा था। इतना ही नहीं वियतनाम संकट, आण्विक युद्ध का। भय, अमेरीका में बढ़ता आन्तरिक असन्तोष, तानाशाही शासन की बढ़ती सम्भावनाएँ एवं जनसंख्या विस्फोट आदि संकटों का आभास व्यवहारवादी विचारकों को नहीं था और इन संकटों के समाधान हेतु उनके द्वारा कोई प्रयास नहीं किया गया।

प्रश्न 4.
उत्तर व्यवहारवाद का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
अथवा
उत्तर व्यवहारवादी उपागम की किन-किन आधारों पर आलोचना की जाती है?
उत्तर:
व्यवहारवाद की आलोचना यद्यपि उत्तर व्यवहारवाद ने परम्परागत राजनीतिक दृष्टिकोण एवं व्यवहारवादी दृष्टिकोण के दोषों को समाप्त कर राजनीति विज्ञान को एक विज्ञान के रूप में नवीन स्वरूप प्रदान किया। इसके बावजूद उत्तर व्यवहारवाद की निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की जाती है

(1) अन्तर्विरोध का होना – उत्तर व्यवहारवादियों ने अपने अध्ययन में मूल्य और तथ्य दोनों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है जिसके कारण उत्तर व्यवहारवाद में अन्तर्विरोध भी उत्पन्न हुए हैं। व्यवहारवादी विचारक राजनीति विज्ञान के अध्ययन को एक साथ ही मूल्य प्रधान, आदर्शवादी तथा व्यक्तिनिष्ठ के साथ-साथ ही मूल्य निरपेक्ष, यथार्थवादी वे वस्तुनिष्ठ बनाना चाहते हैं जो सम्भव नहीं है।

(2) अवैज्ञानिक दृष्टिकोण का होना – उत्तर व्यवहारवादी विचारक तकनीक से पहले सार को महत्त्व प्रदान करते हैं। अन्य शब्दों में कहें, तो उत्तर व्यवहारवादी पहले शोध के उद्देश्य निर्धारित करते हैं तत्पश्चात् इस उद्देश्य की पुष्टि के लिए तकनीक का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार उनका अध्ययन पूर्वाग्रह से ग्रस्त होता है। ऐसा अध्ययन अवैज्ञानिक माना जाता है।

(3) मात्र उदारवादी मूल्यों का प्रतिनिधित्व करना – उत्तर व्यवहारवाद मानव मूल्यों की रक्षा पर बल देता है। ये मूल्य समाज और समुदायों के ऊपर व्यक्ति की स्वतन्त्रता को अधिक महत्त्व देते हैं। उत्तर व्यवहारवादी विचारक अपने उदारवादी मूल्यों को ही मानव मूल्य समझकर स्वयंसिद्ध एवं शाश्वत मूल्यों के रूप में स्वीकार करते हैं।

(4) तृतीय विश्व के लिए सीमित महत्व – उत्तर व्यवहारवाद ने अपने मानवीय मूल्यों को लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अनिवार्य एवं आधारभूत मूल्यों के रूप में प्रस्तुत किया है लेकिन इन मूल्यों का तृतीय विश्व के देशों के लिए सीमित महत्त्व है। एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका के देशों में राजनीतिक अस्थिरता, जनसंख्या विस्फोट, निर्धनता आदि समस्याएँ हैं।

इन देशों में पहली आवश्यकता तीव्र आर्थिक विकास के साथ – साथ राजनीतिक स्थिरता प्राप्त करना है। अतः ये लोकतान्त्रिक व्यवस्थाएँ विकास के सन्दर्भ में मूल्यों को महत्त्व प्रदान करती हैं जबकि उत्तर व्यवहारवादी मूल्यों पर आधारित विकास को महत्त्व प्रदान करते हैं। इस प्रकार तृतीय विश्व के देशों की लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं की दृष्टि से उत्तर व्यवहारवादियों के मतों एवं मूल्यों का सीमित महत्त्व है।

(5) अमरीकी राष्ट्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करना-उत्तर व्यवहारवाद की आलोचना इस आधार पर भी की जाती है कि यह अमरीकी राष्ट्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करता है। उत्तर व्यवहारवाद अमरीकी राजनीति विज्ञानियों की विश्व को देन है। उत्तर व्यवहारवाद की प्रतिबद्धता उस प्रासंगिकता के प्रति है, जिसे अमेरिकी राष्ट्रीय हितों एवं मूल्यों के सन्दर्भ में समझा जा सकता है। इसके अतिरिक्त उत्तर व्यवहारवादी विचारकों ने व्यवसायों के राजनीतिकरण में जिस आवश्यकता को महत्व प्रदान किया है वह विश्व स्तर पर अमेरिका के राष्ट्रीय हितों के प्रति प्रतिबद्ध दिखाई देता है।

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