RBSE Solutions for Class 11 political science Chapter 5 राज्य का स्वरूप

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Rajasthan Board RBSE Class 11 political science Chapter 5 राज्य का स्वरूप

RBSE Class 11 political science Chapter 5 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर।

RBSE Class 11 political science Chapter 5 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मनु ने राजा का निर्माण किन दिव्य तत्वों से माना है?
उत्तर:
मनु ने इन्द्र, वायु, सूर्य, यम, वरुण, चन्द्रमा, अग्नि, पृथ्वी तथा कुबेर आदि दिव्य तत्वों के दिव्य अंशों को मिलाकर राजा को निर्माण माना है।

प्रश्न 2.
कौटिल्य ने राज्य की उत्पत्ति का क्या आधार माना है?
उत्तर:
कौटिल्य ने राज्य की उत्पत्ति का आधार जनता की सहमति और स्वीकृति को माना है।

प्रश्न 3.
महाभारत में राज्य के कितने कार्य माने गए हैं?
उत्तर:
महाभारत में राज्य के कार्य प्रजा की भौतिक सुरक्षा से लेकर उसके सामाजिक आर्थिक, नैतिक जीवन की सुव्यवस्था व उन्नति तक सम्मिलित हैं। राज्य के अन्य कार्यों में देश की सुरक्षा, सामाजिक कारकों का निवारण बाह्य आक्रमण से रक्षा आदि भी शामिल है।

प्रश्न 4.
उदारवाद के विकास में सहायक दो परिस्थितियाँ बताइए।
उत्तर:
उदारवाद के विकास में सहायक परिस्थितियाँ हैं-

  1. पुनर्जागरण
  2. धर्म सुधार

प्रश्न 5.
सकारात्मक उदारवाद के किन्हीं दो लेखकों के नाम बताइए।
उत्तर:
सकारात्मक उदारवाद के दो प्रमुख लेखक हैं-

  1. जॉन स्टुअर्ट मिल
  2. टी.एच. ग्रीन

प्रश्न 6.
नकारात्मक उदारवाद के दो लेखकों के नाम बताइए।
उत्तर:
नकारात्मक उदारवाद के दो प्रमुख लेखक हैं-

  1. जर्मी बेंथम
  2. एडम स्मिथ।

प्रश्न 7.
नकारात्मक उदारवाद के दो लक्षण बताइए।
उत्तर:

  1. व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा हेतु राज्य की नकारात्मक भूमिका पर बल।
  2. राजनीतिक अधिकारों की माँग।

प्रश्न 8.
मार्क्स द्वारा प्रतिपादित राज्य सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मार्क्स के अनुसार, राज्य एक कृत्रिम संस्था है। यह वर्ग शोषण को प्रोत्साहित करने वाली संस्था है। समाजवादी अवस्था में राज्य क्रमशः नष्ट होता चला जाएगा। निजी सम्पत्ति का अन्त एवं वर्गविहीन समाज की स्थापना होगी। यह अवस्था समाज की साम्यवादी अवस्था होगी।

RBSE Class 11 political science Chapter 5 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सम्प्रभुता के विषय में मनु के विचार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मनु ने राज्य की सर्वोच्च सत्ता अर्थात सम्प्रभुत्ता को स्वीकार किया है। यह सम्प्रभुत्ता दण्ड के रूप में है। जिसका ईश्वर ने स्वयं निर्माण किया है और इसे राजा को प्रदान किया है। दण्ड शाक्ति असीमित अथवा निरंकुश नहीं है। बल्कि यह धर्म के अधीन है। दण्ड शक्ति राजा के रूप में किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि राजपद के रूप में एक संस्था को सौंपी गई है। दण्ड रूपी सम्प्रभुता का उद्देश्य राज्य में नैतिक मूल्यों की रक्षा एवं वृद्धि है।

इन नैतिक मूल्यों को ही मनु ने धर्म की संज्ञा दी है। सम्प्रभुता धर्म की रक्षक भी है और धर्म के अधीन भी है । इस प्रकार मनु ने धर्म युक्त दण्ड अर्थात नैतिक मूल्यों से मर्यादित सम्प्रभुता के विचार को स्वीकारा है। मनु ने धर्म एवं दण्ड को सम्प्रभुता का आधार माना है। राजा दण्ड शक्ति का धारक है, स्वामी नहीं और स्वयं भी वह दण्ड के अधीन है।

प्रश्न 2.
महाभारत में राज्य की उत्पत्ति के कौन-कौन से सिद्धान्त बताए गए हैं?
उत्तर:
महाभारत में राज्य की उत्पत्ति के निम्नलिखित सिद्धान्त बताए गए हैं

  1. दैवीय सिद्धान्त – राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रस्तुत इस सिद्धान्त में राज्य की उत्पत्ति देवताओं द्वारा स्वयं की गई है। यह सर्वप्रथम सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त में राजा की सनातन देव स्वीकारा गया है जो नर रूप धारण कर इस पृथ्वी पर विचरण करता है।
  2. सामाजिक समझौता सिद्धान्त – राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में महाभारत में दैवीय सिद्धान्त के साथ-साथ समझौता सिद्धान्त का भी उल्लेख मिलता है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य की उत्पत्ति में दैवीय सत्ता के साथ-साथ प्रजा सत्ता को भी माना गया है।
  3. राज्य की उत्पत्ति का बल सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य में बल होने का गुण होने के साथ-साथ अन्य राज्य संचालन गुण की आवश्यक है। यह सिद्धान्त राजा को अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देता है।
  4. सप्तांग सिद्धान्त – हमारे समाजशास्त्र प्रणेताओं ने राज्य के स्वरूप की कल्पना की है एवं राज्य के सात अंगों-राजा, मंत्री, कोष, सेना, मित्र, दुर्ग एवं देश की विवेचना की है राज्य का निर्माण इन्हीं अंगों से होता है।

प्रश्न 3.
कौटिल्य के अनुसार राज्य के सात अंग कौन – कौन से हैं?
उत्तर:
कौटिल्य के अनुसार राज्य के सात अंग निम्नलिखित हैं

  1. स्वामी
  2. अमात्य
  3. जनपद
  4. दुर्ग’
  5. कोष
  6. दण्ड
  7. मित्र

प्रश्न 4.
शुक्रनीति में राज्य की उत्पत्ति का क्या आधारे माना है।
उत्तर:
यद्यपि शुक्रनीति में राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अधिक स्पष्ट एवं विस्तृत रूप से किसी अवधारणा को प्रस्तुत नहीं किया गया है फिर भी ग्रन्थ के दो प्रसंगों से ऐसा आभास होता है कि शुक्र ने राज्य की दैवीय उत्पत्ति के सिद्धान्त का समर्थन किया है। शुक्र ने एक प्रसंग में कहा है कि बृह्मा द्वारा राजा को प्रजा का सेवक बनाया गया है जो वेतन के रूप में प्रजा से कर प्राप्त करता है, उसका अस्तित्व प्रजा की रक्षा के लिए है।

एक अन्य प्रसंग में यह भी कहा गया है कि जब विश्व में कोई स्वामी नहीं था अर्थात सर्वत्र अराजक अवस्था थी, और लोग भयाकुल हो इधर – उधर छिपने लगे तब प्रभु ने इस विश्व की रक्षा के लिए राजा का सृजन किया। शुक्र ने प्रजा की भौतिक सुरक्षा एवं नैतिक उन्नति को राज्य के अस्तित्व को आधार माना है।

प्रश्न 5.
उदारवाद से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उदारवाद से अभिप्राय-उदारवाद आधुनिक युग की एक महत्त्वपूर्ण एवं प्रगतिशील विचारधारा है। यह न केवल एक विचारधारा है वरन् एक जीवन पद्धति व आन्दोलन भी है, जो मध्यकालीन रूढ़िवादी विचारधारा को अस्वीकार कर नए विचारों को अपनाता है। उदारवाद अंग्रेजी के ‘लिबरलिज्म’ (Liberalism) शब्द का हिन्दी रूपान्तरण है।

इस शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द ‘लिबरलिस’ (Liberalis) से हुई है, जिसका अर्थ है – स्वतन्त्रता। इस प्रकार उदारवाद (लिबरलिज्म) शब्द का अर्थ है – विचारों की संकीर्णता से मुक्ति, लोकतान्त्रिक व्यवस्था व सांविधानिक परिवर्तनों में विश्वास करने वाली विचारधारा।

यह व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में, चिन्तन, गरिमा, अधिकार, अभिव्यक्ति, विचार – विमर्श, विश्वास, व्यवसाय एवं सहयोग आदि में अधिकाधिक स्वतन्त्रता देने के पक्ष में है। यह व्यक्ति की अच्छाई, प्रतिभा एवं स्वतन्त्रता में विश्वास करने वाली विचारधारा है यह विधि एवं विवेकयुक्त शासन में आस्था रखती है।

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के अनुसार, “दर्शन या सिद्धान्त के रूप में उदारवाद एक विचार है जो सरकार की पद्धति और नीति में, समाज के संगठन के सिद्धान्त एवं व्यक्ति व समाज के जीवन के ढंग में स्वतन्त्रता के लिए वचनबद्ध है।” सारटोरी के अनुसार, “साधारण शब्दों में, उदारवाद व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, न्यायिक सुरक्षा एवं संवैधानिक राज्य का सिद्धान्त व व्यवहार है।”

प्रश्न 6.
परम्परागत उदारवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
परम्परागत उदारवाद-इसे प्राचीन या नकारात्मक उदारवाद भी कहते हैं। परम्परागत उदारवाद का स्वरूप नकारात्मक था। इसका प्रारम्भ निरंकुश राजतन्त्र तथा सामन्तशाही के विरुद्ध व्यक्ति की राजनीतिक स्वतन्त्रता तथा चर्च एवं पोपशाही की निरङ्कुशता के विरुद्ध व्यक्ति की धार्मिक स्वतन्त्रता की माँग से हुआ। इस प्रकार परम्परागत उदारवाद ने मनुष्य की विवेकशीलता, स्वतन्त्रता और व्यक्तिवाद पर जोर दिया। परम्परावादी उदारवादियों ने स्वतन्त्रता को प्रतिबन्धों का अभाव माना तथा उन्होंने राज्य को मनुष्य की स्वतन्त्रता का विरोधी बताया।

परम्परागत उदारवाद ने राज्य को एक आवश्यक बुराई मानते हुए राज्य के कार्यों व शक्तियों को कम करने का पक्ष लिया। इन्होंने निरंकुश वं स्वेच्छाचारी कानून का विरोध, विधि व विवेकयुक्त शासन में आस्था, व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों पर बल दिया तथा आवश्यकता पड़ने पर सत्ता के विरुद्ध संघर्ष व क्रान्ति को भी उचित ठहराया। 1688 ई. की इंग्लैण्ड की क्रान्ति इतिहास की सबसे पहली उदारवादी क्रान्ति मानी जाती है। जर्मी बेंथम, एडम स्मिथ, हरबर्ट स्पेन्सर, जॉन लॉक, रिकार्डी, जेम्स मिल आदि ने परम्परागत उदारवाद के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।

प्रश्न 7.
उदारवाद लोकतन्त्र का पर्याय नहीं है। कैसे?
उत्तर:
उदारवाद एक राजनीतिक दर्शन है जो व्यक्ति की स्वतन्त्रता, संवैधानिक राज्य, व्यक्ति के अधिकार एवं स्वतन्त्रता, स्वतन्त्र प्रेस, कानून का शासन, निष्पक्ष न्यायपालिका और विकेन्द्रीकरण का समर्थन करता है। उदारवाद लोकतन्त्र का सिद्धान्त माना जाता है। व्यक्ति की स्वतन्त्रता तथा समानता का समर्थक होने के कारण उदारवाद स्वाभाविक रूप में लोकतन्त्र की समर्थक विचारधारा है क्योंकि उसके अनुसार व्यक्ति की स्वतन्त्रता व उसके अधिकारों की रक्षा का श्रेष्ठ उपाय यही है कि शासन की शक्ति जनता के हाथों में हो एवं कोई व्यक्ति या वर्ग जनता पर अपनी इच्छानुसार शासन न करे।

उदारवाद की मान्यता है कि स्वतन्त्र व्यक्ति पर कोई व्यवस्था सम्बन्धी बन्धन भी उसकी सहमति से ही लगाया जा सकता है। इस प्रकार लोकतन्त्र के मूल में व्यक्ति की स्वतन्त्रता का उदारवादी विचार ही है। लेकिन इसका आशय यह नहीं है कि उदारवादं लोकतन्त्र का पर्याय है। दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध होते हुए भी ये दोनों एक नहीं हैं। उदार का आधार स्वतन्त्रता है तथा यह केन्द्रीयकृत शासन का विरोध करता है वहीं लोकतन्त्र का मूल आधार समानता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि उदारवाद लोकतन्त्र का पर्याय नहीं है।

प्रश्न 8.
उदारवाद समाजवाद का पूरक है। कैसे?
उत्तर:
व्यक्ति को साध्य मानते हुए भी उदारवाद सामाजिक हित की उपेक्षा नहीं करती। यद्यपि यह राज्य को साधने मानता है किन्तु यह व्यक्ति की स्वतंत्रता को उस सीमा तक सीमित करने का समर्थन करता है जहाँ तक समुचित हितों की प्राप्ति हेतु उचित है। उदारवाद व्यक्ति के व्यक्तित्व के समुचित विकास और समाज के कल्याण में उचित सामंजस्य स्थापित करता है। उदारवाद सामाजिक कल्याण पर आधारित है अतः इसे समाजवाद का पूरक माना जा सकता है।

प्रश्न 9.
उदारवाद व्यक्ति का पर्याय नहीं है। कैसे?
उत्तर:
सामान्यत: उदारवाद को व्यक्तिवाद का पर्याय मान किया जाता है किन्तु ऐसा बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि दोनों में अत्यधिक अन्तर है। व्यक्तिवादी विचारधारा व्यक्ति के जीवन में राज्य के हस्तक्षेप को सहन नहीं करती जबकि आधुनिक युग में उदारवाद ने व्यक्तिवादी दृष्टिकोण से आगे बढ़कर राज्य के सकारात्मक पक्ष को स्वीकार कर लिया है। और जनहित में राज्य द्वारा व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप की यह अनुचित नहीं मानता । अत: उदारवाद, व्यक्तिवाद का पर्याय नहीं माना जा सकता है।

प्रश्न 10.
मार्क्स के राज्य के अवसान सिद्धान्त’ की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मार्क्स का राज्य के अवसान का सिद्धान्त-कार्ल मार्क्स क्रान्तिकारी एवं वैज्ञानिक समाजवाद के प्रवर्तक थे। मार्क्स ने राज्य के अवसान का सिद्धान्त प्रतिपादित किया, मार्क्स का राज्य के अवसान का सिद्धान्त उसकी राज्य सम्बन्धी सम्पूर्ण धारणा का ही एक अंश है।

मार्क्स का मत है कि समाजवादी समाज में उन भौतिक परिस्थितियों का जन्म होगा जिनके कारण राज्य की आवश्यकता नहीं रहेगी और वह धीरे – धीरे नष्ट हो जाएगा। इसके साथ ही समाजवादी समाज के स्थान पर साम्यवादी समाज की स्थापना हो जाएगी। मार्क्स के अनुसार, समाजवादी समाज में राज्य के क्रमशः क्षीण होकर नष्ट हो जाने के निम्नलिखित कारण होंगे

(i) मार्क्स के अनुसार, “राज्य नामक संस्था को जन्म व्यक्तिगत सम्पत्ति के रक्षक के रूप में हुआ है लेकिन समाजवादी समाज में व्यक्तिगत सम्पत्ति की संस्था का अन्त कर दिया जाएगा। इस प्रकार राज्य के अस्तित्व को मूल आधार ही नष्ट हो जाएगा और तब राज्य के विलुप्त होने की प्रक्रिया का प्रारम्भ होगा।”

(ii) समाजवादी समाज में पूँजीपति वर्ग का अन्त हो जाएगा और समाज में एक श्रमिक वर्ग रह जाएगा अतः वर्ग संघर्ष का भी अन्त हो जाएगा। इस स्थिति में राज्य की आवश्यकता नहीं रहेगी और तब राज्य के अन्त की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाएगी।

(iii) समाजवादी समाज में ऐसी न्यायपूर्ण व शोषणरहित परिस्थितियाँ बनेंगी जिससे अपराध नहीं होंगे। अतः समाज में शान्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिए भी राज्य की आवश्यकता नहीं रहेगी। इन समस्त कारणों से समाजवादी समाज में राज्य क्रमशः नष्ट हो जाएगा। अंततोगत्वा साम्यवादी समाज की स्थापना होगी जो कि राज्यविहीन व वर्गविहीन समाज होगा।

RBSE Class 11 political science Chapter 5 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुस्मृति में वर्णित राज्य की उत्पत्ति एवं स्वरूप की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मनुस्मृति में राज्य की उत्पत्ति – मनुस्मृति में मनु ने राज्य से पूर्व की अवस्था का वर्णन करते हुए कहा है कि राज्यहीन अवस्था में समाज में चारों ओर अन्याय उत्पीड़न भय तथा असुरक्षा का वातावरण व्याप्त था बलवान लोग निरंकुश थे और वे निर्बलों पर नाना प्रकार के अत्याचार करते थे।

ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण संसार की सुरक्षा के लिए और निर्बलों के मन से असुरक्षा के भाव को दूर करने के लिए तथा बलवानों पर अंकुश लगाने के लिए स्वयं ईश्वर ने राजा की सृष्टि की। मनुस्मृति में राज्य के स्थान पर राजा की उत्पत्ति का उल्लेख यह प्रकट करता है कि मनु ने राजा और राज्य को पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त किया है।

परन्तु एक सम्प्रभु संस्था के रूप में राज्य तथा इस संस्था के संचालक के रूप में राजा अथवा शासक के मध्य मनु ने स्पष्ट भेद किया है। राज्य की दैवीय उत्पत्ति का वर्णन करते हुए मनु ने कहा है कि ईश्वर ने इन्द्र, वायु, सूर्य , यम, वरुण, चन्द्रमा, अग्नि, पृथ्वी तथा कुबेर आदि दिव्य तत्वों के दिव्य अंशों को मिलाकर राजा की सृष्टि की।

दिव्य तत्वों के इन अंशों को धारण करने के कारण राजा तेजस्वी होता है। सूर्य के समान संताप को धारण करने के कारण पृथ्वी पर कोई भी इसे देखने में समर्थ नहीं है। दिव्य तत्वों के रूप में राजा के दिव्य व्रतों का उल्लेख करके मनु ने शासक के ऊपर पर्याप्त नैतिक बंधन आरोपित किए हैं। जिनका कि शासक उल्लंघन नहीं कर सकता।

स्वयं मनु ने यह कहा है कि यदि राजा इन दिव्य तत्वों के अनुसार अपने दिव्य व्रतों का पालन नहीं करेगा, तो वह देवत्व में गिर जाएगा, और धीरे – धीरे उसका अस्तित्व भी मिट जाएगा। क्योंकि उसका निर्माण इन दिव्य तत्वों के अंशों को मिलाकर ही किया जाता है। मनु द्वारा प्रतिपादित राजा का दिव्य स्वरूप राजा एवं प्रजा दोनों के लिए ही नैतिक बंधन आरोपित करता है।

राजकीय दायित्वों जैसे गम्भीर कार्यों को सम्पन्न करने के लिए राजा का विशेष योग्यताओं एवं क्षमताओं से युक्त होना आवश्यक है। राज्य का स्वरूप मनुस्मृति में राज्य के सावयवी स्वरूप का वर्णन किया गया है और राज्य के सात घटक माने हैं जिन्हें मनु ने ‘प्रकृति’ नाम दिया है। ये प्रकृतियाँ निम्नलिखित हैं।

  1. स्वामी – मनु ने राजा को स्वामी की संज्ञा दी है और नैतिक गुणों एवं प्रशासनिक क्षमता से युक्त एक कर्तव्यनिष्ठ राजा को राज्य के लिए आवश्यक माना है।
  2. मंत्री – राजा की शक्ति उसकी निजी शक्ति नहीं है बल्कि यह एक संस्थागत शक्ति है। अत: इस शक्ति का प्रयोग राजा संस्थागत के रूप में ही कर सकता है। राज्य की शक्ति के संस्थागत रूप का नाम मंत्रिपरिषद है। अतः राजा को राज्य के दायित्वों के निर्वाह संबंधी प्रत्येक कार्य को मन्त्रियों की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए ।
  3. पुर – पुर का अर्थ राज्य की राजधानी से है। मनु ने ऐसे क्षेत्र को राज्य की राजधानी बनाने का उल्लेख किया है। जो भली-भाँति सुरक्षित हो और जिसमें दुर्ग भी हो।।
  4. राज्य – मनु ने राज्य की सीमाओं के अधीन आने वाली भूमि और उस पर निवास करने वाली जनता के राज्य की संज्ञा दी है और इस रूप में इसे भी राज्य का एक अनिवार्य अंग माना है।
  5. कोष – राज्य में शासन के पास एकत्रित धन को कोष का नाम दिया गया है और यह विचार व्यक्त किया गया है कि राज्य के पास पर्याप्त कोष होने पर ही राजा प्रजा की सुरक्षा और उसके कल्याण के लिए विभिन्न कार्यों को करे सकेगा।
  6. दण्ड – दण्ड या सेना को मनु ने राज्य की सुरक्षा के लिए अनिवार्य माना है। सेना पर आन्तरिक तथा बाह्य सुरक्षा का दोहरा दायित्व होता है। राजा से अपेक्षा की जाती है कि वह सेना के सभी अंगों को सुदृढ़ बनाए रखे।
  7. मित्र – मनु ने मित्र को भी राज्य के आवश्यक अंग के रूप में स्वीकार किया है। राज्य को अन्य राज्यों के साथ भी अपने संबंधों का निर्वाह करना पड़ता है अत: इन सम्बन्धों के कुशलतापूर्वक संचालन के लिए यह आवश्यक है कि राजा ऐसे प्रयास करे कि उसके मित्र राज्यों की संख्या अधिकतम हो। राज्य के इन सभी अंगों के तुलनात्मक महत्व के सम्बन्ध में मनु ने कहा है कि प्रत्येक प्रकृति का महत्व उसके पश्चात् । दी गई प्रकृति की तुलना में अधिक है। इस प्रकार राजा को राज्य का शीर्षस्थ घटक माना जाना चाहिए। राज्य के संचालन ‘ के लिए अन्य प्रकृतियों को उचित रूप में उपयोग करना चाहिए।

प्रश्न 2.
कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार राज्य के कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार राज्य के कार्य – कौटिल्य द्वारा अर्थशास्त्र में राज्य के कार्यों का विस्तृत वर्णन किया गया है इन कार्य क्षेत्रों का विवरण निम्नवत है।
1. प्रजा की रक्षा-राज्य का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व है, कि वह सभी प्रकार के आंतरिक तथा बाह्य संकटों से प्रजा की रक्षा करे। आंतरिक दृष्टि से राज्य समाज कंटकों तथा आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्तियों को दण्डित करके प्रजा के जीवन एवं सम्पत्ति की रक्षा करे तथा बाह्य दृष्टि से राज्य के ऊपर होने वाले बाहरी आक्रमणों से राज्य की सुरक्षा करे।

2. लोक कल्याण – कौटिल्य ने राजा से लोक कल्याणकारी अनेक कार्यों को करने की अपेक्षा की है। राज्य वृद्धों, बालकों, महिलाओं और असहायों की हर संभव सहायता करे। जन साधारण के लिए कृषि व्यवस्था, सिंचाई व्यवस्था, रोजगार आदि की व्यवस्था के साथ ही अकाल, बाढ़, महामारी आदि की स्थिति में जनता की सहायता राज्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए। सफाई व्यवस्था, चिकित्सीय व्यवस्था, जलाशयों का निर्माण एवं इनकी स्वच्छता आदि मानव कल्याणकारी नीतियाँ राज्य की व्यवस्थापिका के भाग होने चाहिए।

3. अर्थव्यवस्था का नियमन एवं नियंत्रण – कौटिल्य के अनुसार राज्य को अर्थव्यवस्था को इस प्रकार नियमन एवं नियंत्रण करना चाहिए कि समाज में आर्थिक साधनों का केन्द्रीकरण न हो और सभी वर्गों के आर्थिकहित सुरक्षित रहें। राज्य विभिन्न व्यवसायों और उनसे सम्बन्धित व्यक्तियों की गतिविधियों पर नियंत्रण रखे, उत्पादित वस्तुओं का मूल्य निर्धारित करे तथा किसी विशेष व्यवसाय में किसी व्यापारी के एकाधिकार को समाप्त कर अर्थव्यवस्था पर प्रभावी नियंत्रण रखे।

4. राज्य का न्यायिक दायित्व – कौटिल्य ने न्यायिक दायित्वों को राज्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दायित्व माना है। और इसे राज्य अस्तित्व का आधार माना है। कौटिल्य ने न्याय के दो पक्ष माने हैं। प्रथम वितरणात्मक न्याय अर्थात राज्य यह सुनिश्चित करे कि प्रजा का कोई भी वर्ग अभाव ग्रस्त न हो ताकि समाज में साधनों का वितरण न्याय और औचित्य के सिद्धान्तों के अनुसार हो तथा द्वितीय सुधारात्मक न्याय अर्थात राज्य कानूनों के उल्लंघन द्वारा प्रजा के अधिकारों का अतिक्रमण करने वाले व्यक्तियों को समुचित दण्ड देकर प्रजा के अधिकारों की रक्षा करे।

5. सामाजिक व्यवस्था का निर्वाह – कौटिल्य के अनुसार राज्य यह सुनिश्चित करे कि सामाजिक व्यवस्था को निर्वाह वेदों और शास्त्रों में स्वीकृत वर्ण और आश्रम व्यवस्था के अनुरूप हो । विभिन्न वर्गों के सदस्य और आश्रम व्यवस्था में रहने वाले व्यक्ति अपने कर्तव्यों एवं मर्यादाओं का पालन करें। विभिन्न वर्गों के पारस्परिक संबंधों तथा वैवाहिक व्यवस्था आदि को राजा राज्य की विधि द्वारा बिनियमित और संचालित करे।

6. प्रशासनिक प्रणाली का निर्वाह – कौटिल्य के अनुसार राज्य अपने व्यापक दायित्वों की पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए राज्य में एक समक्ष प्रशासनिक प्रणाली की स्थापना करे। राज्य विभिन्न विभागों का संगठन करके उनमें उचित संख्या में सुयोग्य अधिकारी एवं कर्मचारियों की नियुक्ति करे। राज्य और राजकीय कर्मचारियों पर भली-भाँति नियंत्रण रखे और यह सुनिश्चित करे कि इन अधिकारी और कर्मचारियों द्वारा प्रजा का शोषण न किया जाए।

7. पर – राष्ट्र संबंधों का संचालन-कौटिल्य ने राज्य से पर – राष्ट्र सम्बन्धों के संचालन में पूर्ण सावधानी एवं कुशलता की अपेक्षा की है अन्यथा राज्य के अस्तित्व के लिए संकट पैदा हो सकता है। राज्य अनावश्यक युद्धों से बचने का प्रयास करे और अन्तर्राज्यीय क्षेत्र में अपने मित्रों की संख्या अधिकतम और शत्रुओं संख्या न्यूनतम रखे।

प्रश्न 3.
महाभारत के अनुसार राज्य के कार्य बताइए।
उत्तर:
महाभारत के अनुसार राज्य के कार्य – महाभारत के शान्ति पर्व में राज्य के कार्य क्षेत्र को अत्यन्त व्यापक . माना गया है तथा प्रजा की भौतिक सुरक्षा से लेकर उसके सामाजिक, आर्थिक और नैतिक जीवन की सुव्यवस्था व उन्नति के लिए राज्य को उत्तरदायी माना गया है। प्रजा के उत्थान और प्रजा के अभ्युदय की सामान्य धारणा के मध्य विद्यमान भेद का महत्व इस दृष्टि से सार्थक है कि ये दोनों राज्य के सकारात्मक और नकारात्मक दायित्वों की व्यक्त करते हैं।

प्रजा की सुरक्षा के लिए राज्य को बाहरी शत्रुओं से सुरक्षा, प्रजा की जान-माल का संरक्षण, शांति, सुव्यवस्था और न्याय के प्रबन्ध का दायित्व वहन करना होता है प्रजा के उत्थान के लिए राज्य को अनेक प्रकार की सामाजिक, आर्थिक व नैतिक गतिविधियों सम्पन्न करनी होती हैं। जैसे – शिक्षा दान, स्वास्थ्य रक्षन, व्यवसाय, डाक और यातायात का प्रबन्ध, जंगल और खानों का विकास, दीन-अनाथों की देख-रेख आदि। राज्य से यह उपेक्षा की जाती है। कि वह अंतरंग लोगों की बाहरी लोगों से रक्षा करे।

साथ ही राज्य पर यह दायित्व डाला गया है कि वह शराब खाना खोलने वाले, वैश्याओं, जुआरियों, कुटनी, कुशील व इस भाँति के अन्य बुरे पेशे करने वाले लोगों पर नियंत्रण रखे। ऐसा न करने पर उत्तम प्रजा कलेश पाती है। इसके अतिरिक्त राज्य से अनेक लोककल्याकारी गतिविधियाँ सम्पन्न करने की अपेक्षा की गई है जैसे-बड़ी-बड़ी सड़कों का निर्माण, वैद्यों एवं औषधालयों की व्यवस्था, कुएँ खुदवाना, सुरक्षा प्राचीर का निर्माण करवाना, आग की आशंका से बचने के लिए घासफूस हटवाना, कृषि भूमि का विकास करवाना इत्यादि।

राज्य के अन्य कार्य:
महाभारत के शांति पर्व में उपरोक्त के अलावा कुछ अन्य कार्यों का भी विवरण मिलता है। ये कार्य निम्नलिखित हैं।

  1. देश की रक्षा व्यवस्था
  2. समाज कंटको का निवारण
  3. दुर्बलों की रक्षा
  4. बाह्य आक्रमण से रक्षा कार्य
  5. प्रजा का पालन
  6. कृषि व व्यापार की व्यवस्था।

प्रश्न 4.
शक्रनीति में वर्णित राज्य की उत्पत्ति एवं स्वरूप की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
शुक्रनीति में राज्य की उत्पत्ति – यद्यपि शुक्रनीति में राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अधिक स्पष्ट और विस्तृत रूप से किसी अवधारणा को प्रस्तुत नहीं किया गया है फिर भी ग्रन्थ के दो प्रसंगों से ऐसा आभास होता है कि शुक्र ने राज्य की दैवीय उत्पत्ति के सिद्धान्त का समर्थन किया है। एक प्रसंग में शुक्र ने कहा है कि ब्रह्मा द्वारा राजा को प्रजा का सेवक बनाया गया जो वेतन के रूप में प्रजा से कर प्राप्त करता है, उसका अस्तित्व प्रजा की रक्षा के लिए ही है।”

दूसरे प्रसंग में शुक्र ने कहा है कि जब विश्व में कोई स्वामी न था अर्थात सर्वत्र अराजक स्थिति व्याप्त थी और लोग यथाकृत हो इधर-उधर छिपने लगे तब प्रभु ने इस संसार की रक्षा के लिए राजा का सृजन किया।” सम्पूर्ण शुक्रनीति ग्रन्थ में दो ही ऐसे प्रसंग हैं जिनसे राज्य भी उत्पत्ति के सम्बन्ध में किसी दृष्टिकोण का आभास होता है। राज्य के अस्तित्व के सैद्धान्तिक पक्षों को प्रतिपादन करते हुए ग्रन्थ में राज्य को एक अनिवार्य और स्वाभाविक संस्था माना गया है।

ग्रन्थ में इस संसार के अभ्युदय का आधारे राज्य को बताते हुए इसकी तुलना चन्द्रमा से भी गई है और कहा गया है कि जिस प्रकार चन्द्रमा समुद्र की वृद्धि का कारण है उसी प्रकार राज्य लोगों के अभ्युदय का मूल आधार है। यद्यपि शुक्र ने राजा की नियुक्ति बह्मा द्वारा बताकर तथा ईश्वर द्वारा राजा के सृजन का उल्लेख करके राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धान्त का समर्थन किया है किन्तु राजा को प्रजा का सेवक बताकर उसने राजा के दैवीय अधिकारों का निषेध किया है।

शुक्रनीति में राज्य का स्वरूप:
शुक्र ने राज्य के सावयवी स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए उसके सात अंग माने हैं-

  1. राजा
  2. मंत्री
  3. मित्र
  4. कोष
  5. राष्ट्र
  6. दुर्ग तथा
  7. सेना।

राज्य की तुलना मानव शरीर से करते हुए शुक्र ने राजा को सिर, मंत्री को नेत्र, मित्र को कान, कोष को मुख, सेना को मन, दुर्ग को दोनों हाथ तथा राष्ट्र को दोनों पैर माना है। शुक्रनीति ग्रन्थ के ही एक अन्य प्रसंग में राज्य की तुलना एक वृक्ष से करते हुए राजा को इस वृक्ष का मूल, मन्त्रियों को स्कन्ध, सेनापति को शाखाएँ, सेनाओं को पल्लव, प्रजा को धूल, भूमि से प्राप्त होने वाले कारकों को फल तथा राज्य की भूमि को बीज माना है।

शुक्रनीति में राष्ट्र एवं राज्य के मध्य अन्तर स्पष्ट किया गया है। राष्ट्र के अन्तर्गत दो तत्वों को शामिल किया गया है, प्रथम जड़ तत्व जैसे- भूमि, पर्वत, प्राकृतिक सम्पदा आदि तथा द्वितीय चेतन तत्व जैसे – मनुष्य। ग्रन्थ में संप्रभु नियंत्रण से विहीन जन-समुदाय को राष्ट्र माना गया है तथा कहा गया है कि इस राष्ट्र पर संप्रभु का नियंत्रण उसे राज्य में परिवर्तित कर देता है, अर्थात् किसी निश्चित भूखण्ड पर निवास करने वाले सम्प्रभु नियंत्रण से विहीन जन – समुदाय को राष्ट्र कहते हैं एवं सम्प्रभु नियंत्रण से युक्त इसी जनसमुदाय को राज्य कहा जा सकता है।

प्रश्न 5.
उदारवाद से आप क्या समझते हैं? उदारवाद के प्रमुख लक्षणों का विवेचन करें।
उत्तर:
उदारवाद का अर्थ एवं परिभाषा:
उदारवाद आधुनिक युग की एक महत्त्वपूर्ण एवं प्रगतिशील विचारधारा है। यह न केवल एक विचारधारा है वरन् एक जीवन पद्धति व आन्दोलन भी है जो मध्यकालीन रूढ़िवादी विचारधारा को अस्वीकार कर नए विचारों को अपनाता है। उदारवाद अंग्रेजी के ‘लिबरलिज्म’ (Liberalism) शब्द का हिन्दी रूपान्तरण है।

इस शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द लिबरलिस (Liberlis) से हुई है जिसका अर्थ है-स्वतन्त्रता। इस प्रकार उदारवाद (लिबरलिज्म) शब्द का अर्थ है – विचारों की संकीर्णता से मुक्ति लोकतान्त्रिक व्यवस्था व सांविधानिक परिवर्तनों में विश्वास करने वाली विचारधारा। यह व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में चिन्तन, गरिमा, अधिकार, अभिव्यक्ति, विचार-विमर्श, विश्वास, व्यवसाय एवं सहयोग आदि में अधिकाधिक स्वतन्त्रता देने के पक्ष में है। यह व्यक्ति की अच्छाई, प्रतिभा एवं स्वतन्त्रता में विश्वास करने वाली विचारधारा है।

यह विधि एवं विवेकयुक्त शासन में आस्था रखती है। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के अनुसार, “दर्शन या सिद्धान्त के रूप में उदारवाद एक विचार है, जो सरकार की पद्धति और नीति में समाज के संगठन के सिद्धान्त एवं व्यक्ति व समाज के जीवन के ढंग में स्वतन्त्रता के प्रति वचनबद्ध है।” सारटोरी के अनुसार, “साधारण शब्दों में, उदारवाद व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, न्यायिक सुरक्षा तथा संवैधानिक राज्य का सिद्धान्त व व्यवहारं है।”

उदारवाद के प्रमुख लक्षण:
उदारवाद के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं-

  1. उदारवाद ऐसी विचारधारा है जो सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक मामलों में बुद्धिवाद के आधार पर क्रमिक सुधारों का समर्थन करती है।
  2. यह विचारधारा मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर बहुत अधिक बल देती है।
  3. यह विचारधारा आर्थिक क्षेत्र में स्वतन्त्र व्यापार और न्यूनतम हस्तक्षेप की नीति अपनाती है।
  4.  उदारवादी विचारधारा राजनीति के क्षेत्र में संसदीय तथा वैध तरीकों से क्रमिक सुधार करने में विश्वास रखती है। अर्थात् राजनीतिक सिद्धान्तों के रूप में उदारवाद दो पृथक् तत्वों का सम्मिश्रण है-
    •  लोकतन्त्र और
    • व्यक्तिवाद
  5. यह विचारधारा नागरिकों की स्वतन्त्रता को विशेष महत्त्व देती है।
  6. यह विचारधारा मानव समाज की प्रगति के सिद्धान्त में आस्था रखती है।
  7. उदारवाद एक ऐसी मानसिक प्रवृत्ति है जो सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रश्नों पर खुले दिमाग से स्वतन्त्रतापूर्वक विचार करती है। यह बुद्धि और तर्क की कसौटी पर सभी संस्थाओं को सामाजिक हित की दृष्टि से परख कर देखती है और इसमें पायी जाने वाली बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न करती है। यह व्यक्ति के सर्वांगीण विकास पर बल देती है।
  8. यह राज्य को एक आवश्यक बुराई नहीं मानता, बल्कि उसे एक नैतिक, लोक कल्याणकारी और समाजसेवी संस्था मानता है। यह राज्य को एक समन्वयकारी संस्था समझता है। इसकी धारणा है कि राज्य समाज के विद्यमान भिन्न-भिन्न समुदायों, वर्गों व हितों में समन्वय स्थापित करता है।
  9. उदारवाद को उसके विकास की दृष्टि से दो भागों-
    • प्राचीन उदारवाद या नकारात्मक उदारवाद एवं
    • आधुनिक या सकारात्मक उदारवाद में विभाजित किया जाता है। प्राचीन उदारवाद वैयक्तिक स्वतन्त्रता को अधिक महत्त्व देता है वहीं आधुनिक उदारवाद यह विश्वास करता है कि व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्धों को नियन्त्रित और सन्तुलित करने के लिए राज्य को सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।

प्रश्न 6.
उदारवाद की दो धाराएँ कौन-सी हैं? दोनों के अन्तर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उदारवाद की धाराएँ उदारवाद की दो धाराएँ हैं

  1. प्राचीन उदारवाद
  2.  आधुनिक उदारवाद।

प्राचीन उदारवाद और आधुनिक उदारवाद में अन्तर यद्यपि प्राचीन और आधुनिक उदारवादी ये दोनों ही स्वरूप व्यक्ति को सम्पूर्ण व्यवस्था का केन्द्रबिन्दु मानते हैं। वे व्यक्ति को साध्य मानते हुए राज्यसहित अन्य समस्त संगठनों को एक साधन के रूप में मानते हैं। दोनों ने ही व्यक्ति की स्वतन्त्रता व अधिकारों को सर्वोपरि माना है। प्राचीन और आधुनिक उदारवाद के अन्तर को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता है

(i) विकास के आधार पर अन्तर -प ्राचीन उदारवाद का विकास 16वीं से 18वीं शताब्दी के मध्य हुआ था, जबकि आधुनिक उदारवाद का विकास 19र्वी शताब्दी से वर्तमान तक माना जाता है।

(ii) उदय के कारणों के आधार पर अन्तर – प्राचीन उदारवाद के विकास के पीछे निरंकुश राजतन्त्र, सामन्तवाद व पोपवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया आदि अनेक कारण रहे, जबकि आधुनिक उदारवाद का उद्भव पूँजीवादी व्यवस्था तथा मार्क्सवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ।

(iii) राज्य के प्रति धारणा के आधार पर अन्तर – प्राचीन उदारवादी विचारक राज्य को एक आवश्यक बुराई मानते हैं। इसमें व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए राज्य की नकारात्मक भूमिका पर बल दिया जाता है, जबकि आधुनिक उदारवादी विचारक राज्य को आवश्यक बुराई नहीं मानते हैं। वे राज्य को एक नैतिक और कल्याणकारी संस्था मानते हैं। आधुनिक उदारवादं में व्यक्ति के कल्याण को विशेषकर निर्बल और निर्धन व्यक्ति के कल्याण को उसकी स्वतन्त्रता की शर्त माना जाता है।

(iv) राज्य के स्वरूप के आधार पर अन्तर – प्राचीन उदारवादी विचारक अहस्तक्षेपवादी राज्य में आस्था रखते हैं। जबकि आधुनिक उदारवादी एक नैतिक एवं लोक-कल्याणकारी राज्य में विश्वास रखते हैं।

(v) स्वतन्त्रता के आधार पर अन्तर – प्राचीन उदारवादी व्यक्ति की असीमित स्वतन्त्रता का समर्थन करते हैं, जबकि आधुनिक उदारवादी व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर सामाजिक व राज्यहित में प्रतिबन्धों को स्वीकार कर व्यक्ति की सीमित स्वतन्त्रता का पक्ष लेते हैं।

(vi) अधिकारों की दृष्टि से अन्तर – प्राचीन उदारवादी व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों को नैसर्गिक मानते हैं। जबकि आधुनिक उदारवादी विचारक व्यक्ति के अधिकारों को राज्य द्वारा प्रदत्त एवं संरक्षित मानते हैं।

(vii) सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से अन्तर – प्राचीन उदारवादी विचारक सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र में राज्य की न्यूनतम भूमिका को स्वीकार करते हैं, जबकि आधुनिक उदारवादी विचारक सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र के विकास के लिए राज्य की भूमिका व्यापक रूप में स्वीकार करते हैं।

(viii) प्रमुख समर्थकों की दृष्टि में अन्तर – प्राचीन उदारवाद के विकास में जर्मी बेंथम, एडम स्मिथ, हरबर्ट स्पेन्सर, जॉन लॉक, रिकार्डो, बेन्थम आदि ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, जबकि आधुनिक उदारवाद के विकास में जॉन स्टुअर्ट मिल, टी.एच. ग्रीन, एल.टी. हॉबहाउस, एच.जे. लास्की एवं मैकाइवर आदि ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रश्न 7.
आधुनिक उदारवाद के विकास के कारणों एवं लक्षणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आधुनिक उदारवाद के विकास के कारण 19र्वी शताब्दी में उदारवादी विचारकों ने परम्परागत उदारवाद में समय की माँग के अनुसार संशोधन व परिवर्तन किया, जिसे हम आधुनिक सकारात्मक उदारवाद कहते हैं। आधुनिक उदारवाद, मूल उदारवाद की समाप्ति नहीं, अपितु यह समाजवादी युग के प्रसंग में मूल उदारवाद का नवीन संस्करण है। उदारवाद के साध्यों में परिवर्तन के साथ – साथ इसके लिए नई विधियों का आविष्कार हुआ।

इसका मूलभूत आदर्श तो वही रहा सर्वत्र स्वतन्त्र व्यक्ति, परन्तु इस आदर्श का अर्थ और उसकी सिद्धि के साधन बदल गए। उदारवाद में यह नया मोड़ इसलिए भी आया कि राजनैतिक व दार्शनिक स्तर पर इसे चुनौती दी जा रही थी। रूढ़िवादी, मार्क्सवादी तथा समाजवादी इस बात की ओर बार-बार संकेत कर रहे थे। जिसका परिणाम यह हुआ कि 1848 ई. के पश्चात् विवश होकर उदारवाद को लोकतांत्रिक, राष्ट्रवादी एवं समाजवादी भावना को साथ लेकर चलना पड़ा।

आधुनिक उदारवाद के प्रमुख समर्थक विद्वानों में जॉन स्टुअर्ट मिल, टी. एन. ग्रीन, एल.टी. हाबहाउस, एच. जे. लॉस्की एवं मैकाईवर आदि प्रमुख हैं। आधुनिक उदारवाद के समर्थक राज्य को एक आवश्यक बुराई नहीं मानते हैं। वे राज्य को लोगों के हितों के विकास एवं सुरक्षा के लिए एक सकारात्मक और कल्याणकारी संस्था मानते हैं।

वे सांविधानिक प्रजातन्त्रीय व संसदीय तरीकों से समाज में सामाजिक और आर्थिक सुधार लाना चाहते हैं तथा यह अपेक्षा करते हैं कि राज्य नागरिकों में फैली हुई अशिक्षा, निर्धनता, बीमारी, शोषण जैसी बुराइयों का समापन करे तथा लोगों की उन्नति के लिए निरन्तर प्रयास करे। प्राचीन उदारवाद के विपरीत आधुनिक उदारवाद यह विश्वास करता है कि व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्धों को नियमित और सन्तुलित करने के लिए राज्य को सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। आगे चलकर यही आधुनिक उदारवाद एक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के रूप में विकसित हुआ।

आधुनिक उदारवाद के प्रमुख लक्षण:
आधुनिक उदारवाद के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. राज्य एक नैतिक एवं कल्याणकारी संस्था है। यह एक आवश्यक बुराई नहीं है।
  2. इसकी लोक प्रभुता एवं विधि के शासन में अटूट आस्था है।
  3. सभी नागरिकों का सर्वांगीण विकास करना राज्य का दायित्व है।
  4. व्यक्ति की स्वतन्त्रताएँ व अधिकार राज्य द्वारा संरक्षित हैं।
  5. राज्य का अर्थव्यवस्था पर सम्पूर्ण नियन्त्रण है।
  6. राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक परिवर्तन के लिए राज्य द्वारा सांविधानिक एवं लोकतान्त्रिक विधियों को अपनाना चाहिए।
  7. राज्य की शक्तियाँ असीमित नहीं हैं उनमें यथोचित मर्यादाएँ होनी चाहिए।
  8. व्यक्ति और राज्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।

प्रश्न 8.
उदारवाद के प्रमुख सिद्धान्तों का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
उदारवाद के प्रमुख सिद्धान्त उदारवाद स्वतन्त्रता, दासता व प्रतिबन्धों से मुक्ति तथा इच्छानुसार सोचने व कार्य करने का अधिकार है। उदारवाद के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं
(i) मनुष्य के विवेक में आस्था – मध्य युग में जीवन के सभी क्षेत्रों में विवेक के स्थान पर धर्म, अन्धविश्वासों और पोप की निरंकुश सत्ता एवं अत्याचारों का वर्चस्व था। धर्म के क्षेत्र में पोप के निर्देशों का पालन करना पड़ता था। राजकीय क्षेत्र में निरंकुश राजतन्त्र का कठोर नियन्त्रण था एवं सामाजिक क्षेत्र में अन्धविश्वासों से भरी रूढ़िवादी मान्यताएँ प्रचलित थीं।

ऐसी स्थिति में व्यक्ति की आत्मा और विवेक कुण्ठित हो गया था, जिससे व्यक्ति और समाज दोनों को हानि पहुँचती थी। इस मध्ये युग की समाप्ति उदारवादी पुनर्जागरण के इस आह्वान से हुई कि मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है। उदारवादियों के अनुसार जीवन के समस्त क्षेत्रों में निर्णय विवेक और बुद्धि के आधार पर लिए जाने चाहिए। वस्तुतः उदारवाद स्वतन्त्र चिन्तन का पक्षधर है।

(ii) ऐतिहासिक परम्पराओं का विरोध – उदारवाद का विकास मध्ययुगीन सामाजिक व्यवस्था एवं राज्य व चर्च की निरंकुश व मनमानी सत्ता के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ है। उदारवादियों का मानना है कि प्राचीन इतिहास व परम्पराओं पर आधारित व्यवस्था को समाप्त कर बुद्धि व विवेक के आधार पर समाज का नव निर्माण किया जाना चाहिए।

(iii) व्यक्ति की स्वतन्त्रता का समर्थक-उदारवाद इस मूल मान्यता पर आधारित है कि मनुष्य जन्म से स्वतन्त्र पैदा होता है और स्वतन्त्रता प्रत्येक व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार है। ऐसी दशा में उसे राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक एवं धार्मिक क्षेत्रों में पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए।

(iv) समाज और राज्य कृत्रिम संस्थाएँ हैं – उदारवाद समाज व राज्य को दैवीय संस्था नहीं मानता है, उसके अनुसार ये कृत्रिम संस्थाएँ हैं। राज्य का निर्माण व उसका विकास व्यक्तियों द्वारा अपनी विशेष आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया गया है।

(v) व्यक्ति साध्य और समाज व राज्य साधन हैं – उदारवादी व्यक्ति को साध्य और समाज व राज्य को साधन मानते हैं। समाज और राज्य को व्यक्ति अपने हितों की पूर्ति के लिए बनाता है, अत: कोई समुदाय, समाज या राज्य ऐसा नहीं हो सकता जिसके नाम पर व्यक्ति का बलिदान किया जा सके।

(vi) व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों का समर्थक – उदारवाद के समर्थक व्यक्ति के प्राकृतिक व नैसर्गिक अधिकारों की अवधारणा में विश्वास करते हैं। वे प्रत्येक व्यक्ति के कुछ ऐसे जन्मजात अधिकार मानते हैं, जिन्हें व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार कहा जाता है। लॉक के मतानुसार, व्यक्ति के तीन मुख्य प्राकृतिक अधिकार हैं, जीवन, सम्पत्ति एवं स्वतन्त्रता का अधिकार। राज्य का अस्तित्व इन अधिकारों की रक्षा के लिए ही है।

(vii) स्वामीविहीन व्यक्ति की धारणा – उदारवादी विचारकों का मत है कि मानव प्राकृतिक रूप से स्वतन्त्र एवं परिपूर्ण है, वह अपना स्वामी स्वयं है। प्रत्येक मनुष्य के व्यक्तित्व का अलग-अलग महत्व है। वह अपने व्यक्तित्व का विकास तथा भौतिक व आध्यात्मिक कल्याण अपनी इच्छानुसार स्वयं ही कर सकता है।

(viii) व्यक्ति की समानता और कानून के शासन में विश्वास – उदारवादी स्वतन्त्रता के समान ही व्यक्ति की समानता और कानून के शासन में विश्वास रखते हैं। उनका मानना है कि कानून और शासन की दृष्टि से सभी मनुष्यों को समान समझना चाहिए। उनमें जाति, धर्म, लिंग अथवा भाषा आदि के आधार पर किसी प्रकार का कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए।

(ix) धर्म निरपेक्ष राज्य के विचार को मान्यता – उदारवादियों ने धार्मिक स्वतन्त्रता व सहिष्णुता एवं राज्य की ओर से धार्मिक क्षेत्र में अहस्तक्षेप के आदर्श का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार व्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए यह आवश्यक है कि राज्य धर्म निरपेक्ष हो।

(x) राष्ट्रीयता के सिद्धान्त का समर्थक – उदारवादियों का मत है कि विदेशी शासन की दासता के विरुद्ध संघर्ष करना, प्रत्येक राज्य की जनता का नैतिक एवं राजनीतिक अधिकार है। इनके अनुसार व्यक्ति की स्वतन्त्रता तभी रह सकती है जब शासन उसकी सहमति व पसन्द का हो।

(xi) लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली का समर्थक-उदारवादी विचारधारा क्रान्तिकारी परिवर्तनों के स्थान पर समाज में शान्तिपूर्ण और लोकतान्त्रिक परिवर्तनों व सुधारों में विश्वास करती है।

(xii) राज्यों के उद्देश्यों एवं कार्यों के सम्बन्ध में परिवर्तनशील दृष्टिकोण-राज्य के उद्देश्यों एवं कार्यों के सम्बन्ध में उदारवादियों के दृष्टिकोण में परिवर्तन होते रहे हैं। इस सम्बन्ध में उनके विचारों को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है-

  1. परम्परागत दृष्टिकोण
  2. आधुनिक दृष्टिकोण

परम्परागत उदारवाद राज्य के संकुचित कार्य क्षेत्र का समर्थक है, जबकि आधुनिक दृष्टिकोण लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में विश्वास करता है।

प्रश्न 9.
उदारवाद न व्यक्तिवाद का पर्याय हैन लोकतंत्र का और न समाजवाद का इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
उदारवाद न व्यक्तिवाद का पर्याय है न लोकतंत्र का और न समाजवाद का। दर्शन या सिद्धान्त के रूप में उदारवाद एक विचार है जो सरकार की पद्धति और नीति में, समाज के संगठन के सिद्धान्त एवं व्यक्ति और समाज के जीवन के ढंग में स्वतंत्रता के प्रति वचनबद्ध है। उपरोक्त कथनों को निम्नप्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. उदारवाद, व्यक्तिवाद का पर्याय नहीं है – सामान्यतया उदारवाद को व्यक्तिवाद का पर्याय मान लिया जाता है। परन्तु यह सत्य नहीं है क्योंकि दोनों में बहुत अन्तर है। व्यक्तिवादी विचारधारा व्यक्ति के जीवन में राज्य के हस्तक्षेप को सहन नहीं करती जबकि आधुनिक युग में उदारवाद ने व्यक्तिवादी दृष्टिकोण से आगे बढ़कर राज्य के सकारात्मक पक्ष को स्वीकार किया है और जनहित में राज्य द्वारा व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप को यह अनुचित नहीं मानता।

2. उदारवाद, लोकतंत्र को पर्याय नहीं है – कुछ लोग लोकतंत्र को उदारवाद का पर्याय मान लेते हैं किन्तु यह भी सत्य नहीं है। यद्यपि लोकतंत्र एवं उदारवाद में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है फिर भी ये दोनों एक नहीं हैं। उदारवाद का आधार स्वतंत्रता है और वह केन्द्रीयकृत शासन का विरोधी है जबकि लोकतंत्र का मूल आधार समानता है।

3. उदारवाद, समाजवाद का पर्याय नहीं है – उदारवाद को समाजवाद का भी पर्याय नहीं माना जा सकता है। व्यक्ति को साध्य मानते हुए भी उदारवाद सामाजिक हित की उपेक्षा नहीं करता। यद्यपि यह राज्य को साधन मानता है किन्तु यह व्यक्ति की स्वतंत्रता को उस सीमा तक सीमित करने का समर्थन करता है, जहाँ तक सामूहिक हितों की प्राप्ति हेतु उचित है। उदारवाद ने आधुनिक युग के समाजवादी एवं साम्यवादी विचारों का विरोध किया है।

प्रश्न 10.
मार्क्स के राज्य सम्बन्धी विचारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
मार्क्स के राज्य सम्बन्धी विचार कार्ल मार्क्स ने राज्य को एक वर्गीय संस्था माना है। राज्य की उत्पत्ति ही वर्ग विभेद के कारण हुई है। राज्य निरन्तर शोषण का एक महत्त्वपूर्ण यन्त्र रहा है। राज्य की सहायता से शोषक वर्ग द्वारा शोषित वर्ग का शोषण सम्भव होता है। माक्र्स के राज्य सम्बन्धी विचार अग्रलिखित हैं

(i) राज्य की उत्पत्ति – माक्र्स राज्य को एक वर्गीय संस्था मानते हैं। मार्क्स के अनुसार, आदिम साम्यवादी अवस्था में समाज के लोगों में हितों का कोई टकराव नहीं था। लोग मिलजुल कर अपना कार्य करते थे और राज्य का अस्तित्व नहीं था। समाज के क्रमिक विकास के फलस्वरूप निजी सम्पत्ति का जन्म हुआ और सम्पूर्ण समाज सम्पत्तिशाली एवं सम्पत्तिविहीन दो वर्गों में विभाजित हो गया। मार्क्स ने इस अवस्था को दास युग कहा तथा इसी काल में राज्य की उत्पत्ति हुई।

(ii) राज्य की प्रकृति – मार्क्स के अनुसार, राज्य अपनी प्रकृति से एक नैतिक संस्था न होकर एक वर्गीय संस्था है। इसका निर्माण शोषक वर्ग ने अपने हितों की रक्षा हेतु किया है। राज्य के कानून एवं न्याय प्रणाली शोषक वर्ग के हितों की वृद्धि करने वाले होते हैं। राज्य की प्रभुसत्ता वास्तव में शोषक वर्ग की ही प्रभुसत्ता होती है।

(iii) राज्य का उद्देश्य – मार्क्स के अनुसार, राज्य का उद्देश्य उस वर्ग के हितों की रक्षा एवं वृद्धि करना होता है। जिसका उसकी सत्ता पर अधिकार होता है। समाज के क्रमिक विकास के फलस्वरूप राज्य पर सम्पत्तिशाली वर्ग का। आधिपत्य रहा है, इस वर्ग ने सम्पत्तिविहीन वर्ग का पर्याप्त शोषण किया। राज्य ने सम्पत्तिशाली अल्पसंख्यक शोषक वर्ग के हितों की रक्षा का ही कार्य किया।

भविष्य में समाजवादी राज्य की स्थापना होने पर राज्य की सत्ता पर बहुसंख्यक सम्पत्ति विहीन श्रमिक वर्ग अर्थात् शोषक वर्ग का अधिकार होगा तब राज्य का उद्देश्य श्रमिक वर्ग के हितों की रक्षा करना होगा। इस प्रकार राज्य सम्पूर्ण समाज के सामान्य कल्याण की संस्था कभी नहीं रहा है।

(iv) राज्य व्यवस्था अपनी सामाजिक अवस्था के सापेक्ष-मार्क्स के अनुसार, किसी भी काल में पाई जाने वाली राज्य व्यवस्था अपनी सामाजिक अवस्था के सापेक्ष होती है। समाज की किसी भी प्रकार की अवस्था में पायी जाने वाली भौतिक व आर्थिक परिस्थितियाँ विशेष प्रकार की होती हैं तथा इनके सन्दर्भ में ही सम्बन्धित समाज में शोषक वर्ग, यथा – स्वामी, सामन्त या पूँजीपति के विशिष्ट हित होते हैं। अपने इन विशिष्ट हितों को ध्यान में रखते हुए ही उस समाज का शोषक वर्ग संविधान के मूल सिद्धान्तों, शासन प्रणाली के रूप में अधिकारों की व्यवस्था तथा न्याय व दण्ड प्रणाली आदि को निर्धारित करता है।

(v) राज्यविहीन और वर्गविहीन समाज का उद्भव – मार्क्स के अनुसार, राज्य एक स्थायी संस्था नहीं है इसका अस्तित्व वर्ग संघर्ष के कारण है। सम्पत्तिविहीन श्रमिक वर्ग के अधिनायकत्व के पश्चात् राज्य का अस्तित्व नहीं रहेगा। क्योंकि इस अवस्था में विरोधी वर्ग नहीं होगा।

वर्गविहीन समाज की स्थापना के साथ ही राज्य का अन्त हो जाएगा। यह समाज की साम्यवादी अवस्था होगी। प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुसार वस्तुएँ प्राप्त होंगी तथा प्रत्येक को अपनी योग्यतानुसार श्रम करना होगा। ऐसे समाज धर्म, जाति, रंग या धन के आधार पर भेद नहीं किया जाएगा।

RBSE Class 11 political science Chapter 5वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुस्मृति में राज्य को माना है
(अ) दैवीय संस्था
(ब) समाजवादी संस्था
(स) लोकतांत्रिक व्यवस्था
(द) साम्यवादी व्यवस्था।
उत्तर:
(अ) दैवीय संस्था

प्रश्न 2.
राजा की सृष्टि ऋषियों द्वारा मानी गई है
(अ) मनुस्मृति में
(ब) अर्थशास्त्र में
(स) महाभारत में
(द) शुक्रनीति में।
उत्तर:
(स) महाभारत में

प्रश्न 3.
कौटिल्य ने राज्य की उत्पत्ति मानी है
(अ) ईश्वर द्वारा
(ब) निर्वाचन द्वारा
(स) समझौते द्वारा
(द) युद्ध द्वारा।
उत्तर:
(स) समझौते द्वारा

प्रश्न 4.
उदारवादियों के सामाजिक विश्लेषण की इकाई है.
(अ) व्यक्ति
(ब) समूह
(स) समाज
(द) राज्य
उत्तर:
(अ) व्यक्ति

प्रश्न 5.
कौन उदारवादी विचारक नहीं है
(अ) जे.एस.मिल।
(ब) लॉक।
(स) हर्बर्ट स्पेन्सर।
(द) मार्क्स।
उत्तर:
(द) मार्क्स।

प्रश्न 6.
कल्याणकारी राज्य का सिद्धान्त सम्बन्धित है
(अ) फासीवाद से।
(ब) उदारवाद से।
(स) समाजवाद से।
(द) मार्क्सवाद से।
उत्तर:
(ब) उदारवाद से।

प्रश्न 7.
मार्क्सवादी समाजवाद को कहा जाता है
(अ) कल्पनावाद
(ब) कल्पनावादी समाजवाद
(स) वैज्ञानिक समाजवाद
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(स) वैज्ञानिक समाजवाद

प्रश्न 8.
मार्क्स राज्य को समझता है
(अ) एक कानून निर्मात्री संस्था
(ब) एक लोक कल्याणकारी संस्था
(स) एक वर्गीय संगठन
(द) एक क्रान्ति का साधन।
उत्तर:
(स) एक वर्गीय संगठन

प्रश्न 9.
‘दास केपिटल’ किसकी कृति है?
(अ) मार्क्स
(ब) लॉक
(स) प्लेटो
(द) रूसो
उत्तर:
(अ) मार्क्स

प्रश्न 10.
वैज्ञानिक समाजवाद’ का दूसरा नाम है
(अ) आदर्शवाद
(ब) साम्यवाद
(स) प्रजातान्त्रिक समाजवाद
(द) मार्क्सवाद
उत्तर:
(द) मार्क्सवाद।

RBSE Class 11 political science Chapter 5 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 political science Chapter 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
“पृथ्वी के किसी निश्चित भाग में शान्तिमय जीवन के लिए संगठित लोगों को राज्य कहते हैं।” यह कथन है
(अ) बुडरो विल्सन का
(ब) महात्मा गाँधी का
(स) कार्ल मार्क्स को
(द) एडम स्मिथ का।
उत्तर:
(अ) बुडरो विल्सन का

प्रश्न 2.
राज्य का प्रयोजन है – अप्राप्त की प्राप्ति, प्राप्त की संरक्षा, संरक्षित का संवर्द्धन तथा संवद्धित को सत्पात्रों में वितरण।” यह कथन है?
(अ) अरस्तू का
(ब) मार्टिन लूथर का
(स) लॉस्की का
(द) कौटिल्य का
उत्तर:
(द) कौटिल्य का

प्रश्न 3.
किस भारतीय साहित्य में राजनीति विज्ञान के संहिताबद्ध स्वरूप को राजधर्म की संज्ञा दी गई है?
(अ) मनुस्मृति व महाभारत में
(ब) अर्थशास्त्र व शुक्रनीतिसार में
(स) रामायण व ऋग्वेद में
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) मनुस्मृति व महाभारत में

प्रश्न 4.
‘रामराज्य’ अवधारणा की कल्पना, जिसे भारतीय विचारक ने की, वे हैं
(अ) जवाहर लाल नेहरू
(ब) महात्मा गाँधी
(स) सुभाष चन्द्र बोस
(द) दादा भाई नौरोजी।
उत्तर:
(ब) महात्मा गाँधी

प्रश्न 5.
उदारवाद का केन्द्रीय तत्व है
(अ) स्वतन्त्रता
(ब) निरंकुश सत्ता
(स) वैज्ञानिक क्रान्ति
(द) भारतीय चिन्तन
उत्तर:
(अ) स्वतन्त्रता

प्रश्न 6.
इंग्लैण्ड की क्रान्ति कब हुई थी
(अ) 1692 में
(ब) 1688 में
(स) 1680 में
(द) 1690 में।
उत्तर:
(ब) 1688 में

प्रश्न 7.
उदारवाद का विश्वास है
(अ) उग्र राष्ट्रवाद में।
(ब) व्यक्तिगत स्वतन्त्रता में
(स) रामराज्य में
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ब) व्यक्तिगत स्वतन्त्रता में

प्रश्न 8.
प्राचीन उदारवाद की विशेषता है
(अ) व्यक्ति की स्वतन्त्रता में आस्था
(ब) निरंकुश कानूनों का विरोध
(स) अहस्तक्षेपवादी राज्य में विश्वास
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 9.
सकारात्मक उदारवाद सम्बन्धित है
(अ) लोकल्याणकारी राज्य से
(ब) मार्क्सवादी राज्य से
(स) समाजवादी राज्य से
(द) उपर्युक्त सभी से।
उत्तर:
(अ) लोकल्याणकारी राज्य से

प्रश्न 10.
कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में विश्वास करने वाली विचारधारा है
(अ) व्यक्तिवादी
(ब) साम्यवादी
(स) समाजवादी
(द) उदारवादी।
उत्तर:
(द) उदारवादी।

प्रश्न 11.
उदारवाद का सिद्धान्त है
(अ) मनुष्य के विवेक में विश्वास
(ब) ऐतिहासिक परम्पराओं का विरोध
(स) लोकतन्त्रीय शासन प्रणाली का समर्थन
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 12.
सारटोरी के अनुसार उदारवाद क्या है?
(अ) व्यक्तिगत स्वतन्त्रता
(ब) न्यायिक सुरक्षा
(स) संवैधानिक राज्य का सिद्धान्त एवं व्यवहार
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 13.
यूरोप में धर्मसुधार आन्दोलन के नेतृत्वकर्ता थे
(अ) मार्टिन लूथर
(ब) रूसो
(स) एडम स्मिथ
(द) टॉमस पेन।
उत्तर:
(अ) मार्टिन लूथर

प्रश्न 14.
“राज्य व समाज कृत्रिम व मनुष्य कृत हैं। इसकी रचना व्यक्तियों ने अपनी इच्छानुसार अपनी सुविधा के लिए की है।” यह विचारधारा सम्बन्धित है
(अ) समाजवाद से
(ब) उदारवाद से
(स) मार्क्सवाद से
(द) गाँधीवाद से।
उत्तर:
(ब) उदारवाद से

प्रश्न 15.
हॉबहाउस के अनुसार व्यक्ति की स्वतन्त्रताओं की संख्या है
(अ) 9.
(ब) 12
(स) 15
(द) 4.
उत्तर:
(अ) 9.

प्रश्न 16.
उदारवाद सुधारों का सिद्धान्त है क्योंकि यह समर्पित रहा है?
(अ) आर्थिक क्षेत्र में सुधार के प्रति
(ब) राजनीतिक क्षेत्र में सुधार के प्रति
(स) सामाजिक क्षेत्र में सुधार के प्रति
(द) उपर्युक्त सभी के प्रति
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी के प्रति

प्रश्न 17.
‘उदारवाद का प्रारम्भ और अन्त किसके साथ होता है?
(अ) राज्य के
(ब) राष्ट्र के
(स) समुदाय के
(द) व्यक्ति के।
उत्तर:
(द) व्यक्ति के।

प्रश्न 18.
उदारवाद किस वर्ग का राजनीतिक दर्शन है?
(अ) पूँजीवादी वर्ग
(ब) श्रमिक वर्ग
(स) शासक वर्ग
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(अ) पूँजीवादी वर्ग

प्रश्न 19.
राज्य को आवश्यक बुराई मानता है
(अ) समाजवाद
(ब) उदारवाद
(स) पूँजीवाद
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ब) उदारवाद

प्रश्न 20.
उदारवाद का योगदान है|
(अ) राजनीतिक क्षेत्र में.
(ब) सामाजिक क्षेत्र में
(स) आर्थिक क्षेत्र में
(द) उपर्युक्त सभी में।
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी में।

प्रश्न 21.
प्रथम समाजवादी लेखक हैं
(अ) कार्ल मार्क्स
(ब) सेंट साइमन
(स) सी. एम. जोड
(द) राबर्ट ओवन।
उत्तर:
(अ) कार्ल मार्क्स

प्रश्न 22.
वैज्ञानिक समाजवाद है
(अ) पूँजीवाद
(ब) मार्क्सवाद
(स) समाजवाद
(द) उदारवाद
उत्तर:
(ब) मार्क्सवाद

प्रश्न 23.
निम्न में से किस विचारक ने राज्य को अपनी प्रकृति से एक वर्गीय संस्था बताया है
(अ) बुडरो विल्सन ने
(ब) कार्ल मार्क्स ने
(स) मनु ने
(द) जर्मी बेंथम ने।
उत्तर:
(ब) कार्ल मार्क्स ने

प्रश्न 24.
मार्क्सवाद किस वर्ग का राजनीतिक दर्शन है?
(अ) श्रमिक वर्ग का
(ब) पूँजीवादी वर्ग का
(स) राजकीय कर्मचारी वर्ग का
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) श्रमिक वर्ग का

प्रश्न 25.
मार्क्सवाद का उदय किस समाज के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ
(अ) साम्यवादी
(ब) समाजवादी
(स) पूँजीवादी
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(स) पूँजीवादी

प्रश्न 26.
मार्क्सवाद को जन्मदाता कहा जाता है?
(अ) महात्मा गाँधी को
(ब) कार्ल मार्क्स को
(स) वुडरो विल्सन को
(द) लेनिन को।
उत्तर:
(ब) कार्ल मार्क्स को

प्रश्न 27.
निम्न में से किस विचारक ने राज्य के अवसान का सिद्धान्त दिया
(अ) कार्ल मार्क्स ने
(ब) मार्टिन लूथर ने
(स) लेनिन ने
(द) कौटिल्य ने।
उत्तर:
(अ) कार्ल मार्क्स ने

प्रश्न 28.
राज्य को वर्ग शोषण को प्रोत्साहित करने वाली संस्था मानता है
(अ) मार्टिन लूथर
(ब) कार्ल मार्क्स
(स) कौटिल्य
(द) मनु।
उत्तर:
(ब) कार्ल मार्क्स

प्रश्न 29.
मार्क्स के अनुसार राज्य की उत्पत्ति का कारण है
(अ) लोककल्याण
(ब) श्रमिक हित
(स) वर्ग विभेद
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(स) वर्ग विभेद

प्रश्न 30.
मार्क्स का अन्तिम लक्ष्य है
(अ) राज्यविहीन समाज
(ब) पूँजीवादी समाज
(स) वर्गविहीन समाज
(द) राज्यविहीन और वर्गविहीन समाज।
उत्तर:
(द) राज्यविहीन और वर्गविहीन समाज।

RBSE Class 11 political science Chapter 5 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय चिन्तन में राज्य की अवधारणा के सूत्र कहाँ से प्राप्त होते हैं?
उत्तर:
वैदिक साहित्य से।

प्रश्न 2.
किन-किन भारतीय ग्रन्थों में राज्य की अवधारणा व उसके प्रयोजन का विस्तार से वर्णन मिलता है?
उत्तर:

  1. मनुस्मृति
  2. अर्थशास्त्र
  3. शुक्रनीतिसार
  4. रामायण
  5. महाभारत।

प्रश्न 3.
मनु के अनुसार शासक का परम कर्त्तव्य क्या है?
उत्तर:
मनु के अनुसार, स्वयं धर्म से शासित रहते हुए प्रजा के व्यवहार में धर्म को सुनिश्चित करना शासक का परम कर्तव्य है।

प्रश्न 4.
राज्य की गतिविधियों की दृष्टि से लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा किस राजनीतिक विचारक ने प्रस्तुत की?
उत्तर:
कौटिल्य ने।

प्रश्न 5.
किन – किन भारतीय धर्मग्रन्थों में राज्य के संविदावादी सिद्धान्त का विस्तार से वर्णन मिलता है?
उत्तर:
वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत में।

प्रश्न 6.
राज्य धर्म का विषय क्षेत्र बताइए।
उत्तर:
राज्य धर्म के अन्तर्गत शासक और प्रजा के पारस्परिक सम्बन्धों, राज्य के कार्य क्षेत्र, राज्य के उद्देश्यों एवं राजकीय शक्ति के नियन्त्रण व मर्यादित उपयोग के सम्बन्ध में आदर्श सूत्रों को सम्मिलित किया गया है।

प्रश्न 7.
भारतीय चिन्तन के किन-किन प्रतिनिधि ग्रन्थों में राज्य के सप्तांग सिद्धान्त का वर्णन मिलता है?
उत्तर:

  1. मनुस्मृति,
  2. अर्थशास्त्र।

प्रश्न 8.
सप्तांग से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सप्तांग से तात्पर्य राज्य के सात अंगों से है; यथा – स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड एवं मित्र।

प्रश्न 9.
किस भारतीय राजनीतिक विचारक ने राज्य को संगठित हिंसा का प्रतीक माना है?
उत्तर:
महात्मा गाँधी ने।

प्रश्न 10.
गाँधीजी ने किस प्रकार के राज्य की वकालत की थी?
उत्तर:
रामराज्य की।

प्रश्न 11.
विकेन्द्रीकृत ग्राम स्वराज्य की अवधारणा किसने प्रतिपादित की?
उत्तर:
महात्मा गाँधी ने।

प्रश्न 12.
राजनीतिक शक्ति के केन्द्रीकरण को हिंसा की संज्ञा किसने दी?
उत्तर:
महात्मा गाँधी ने।

प्रश्न 13.
गाँधीजी ने किस बात पर बल दिया?
उत्तर:
गाँधीजी ने ग्राम को राजनीतिक व्यवस्था की स्वायत्त और आत्मनिर्भर इकाई बनाने पर बल दिया।

प्रश्न 14.
गाँधीजी का तात्कालिक राजनीतिक लक्ष्य क्या था?
उत्तर:
अहिंसक लोकतन्त्र अथवा प्रतिनिधि लोकतन्त्रों को सुधारवादी स्वरूप गाँधीजी का तात्कालिक राजनीतिक लक्ष्य था।

प्रश्न 15.
मनुस्मृति में मनु ने राजा के लिए क्या कहा है?
उत्तर:
मनु के अनुसार पृथ्वी पर राजा सर्वोपरि है, वह ईश्वर का प्रतिनिधि है, अत: वह केवल ईश्वर के प्रति ही उत्तरदायी है।

प्रश्न 16.
मनु ने किसे धन एवं वैभव का देवता कहा है?
उत्तर:
मनु ने कुबेर को धन एवं वैभव का देवता कहा है।

प्रश्न 17.
मनु ने सम्प्रभुता का आधार किसे माना है?
उत्तर:
मनु ने धर्म एवं दण्ड को सम्प्रभुता का आधार माना है।

प्रश्न 18.
महाभारत में ‘पॉलिटी’ शब्द किन-किन अर्थों में प्रयुक्त हुआ है?
उत्तर:
महाभारत में पॉलिटी शब्द का उपयोग दण्डनीति, राजधर्म, राजोपनिषद, राजशास्त्र, राजनीति आदि अर्थों में हुआ है।

प्रश्न 19.
महाभारत में दण्ड शब्द का उपयोग किस व्यवस्था के लिए हुआ है?
उत्तर:
महाभारत में दण्ड शब्द का उपयोग उस व्यवस्था विशेष के लिए हुआ है, जो उद्दण्ड मनुष्यों का दमन करे और दुष्टों को सजा दे।

प्रश्न 20.
राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धान्त व सप्तांग सिद्धान्त का वर्णन किस ग्रन्थ में मिलता है?
उत्तर:
महाभारत में

प्रश्न 21.
शुक्र ने राज्य के अस्तित्व का आधार किसे माना है?
उत्तर:
शुक्र ने प्रजा की भौतिक सुरक्षा एवं नैतिक उन्नति को राज्य के अस्तित्व का आधार माना है।

प्रश्न 22.
अर्थशास्त्र की रचना किसने की?
उत्तर:
अर्थशास्त्र की रचना कौटिल्य ने की।

प्रश्न 23.
कौटिल्य ने न्याय के कौन-कौन से दो पक्ष माने हैं?
उत्तर:

  1. वितरणात्मक न्याय
  2. सुधारात्मक न्याय।

प्रश्न 24.
उदारवाद का क्या अर्थ है?
उत्तर:
उदारवाद एक राजनीतिक दर्शन है जो व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में चिन्तन, अभिव्यक्ति, विचार-विमर्श, व्यवसाय, विश्वास एवं सहयोग आदि में अधिकाधिक स्वतन्त्रता देने की वकालत करता है।

प्रश्न 25.
उदारवाद का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
व्यक्ति को समस्त प्रकार की निरंकुशता से मुक्ति दिलाना ही उदारवाद का प्रमुख उद्देश्य है।

प्रश्न 26.
उदारवाद को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
सारटोरी के अनुसार, “साधारण शब्दों में उदारवाद व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, न्यायिक, सुरक्षा एवं संवैधानिक राज्य का सिद्धान्त एवं व्यवहार है।”

प्रश्न 27.
किसे अर्थशास्त्र को जनक माना जाता है?
उत्तर:
एडम स्मिथ को अर्थशास्त्र का जनक माना जाता है।

प्रश्न 28.
बेल्थ ऑफ नेशन्स’ के लेखक कौन हैं?
उत्तर:
एडम स्मिथ

प्रश्न 29.
उदारवाद का उदय किन कारणों से हुआ?
उत्तर:
उदारवाद का उदय पुनर्जागरण, बौद्धिक क्रान्ति, इंग्लैण्ड की गौरवमयी क्रान्ति, अमेरिका का स्वतन्त्रता संग्राम तथा फ्रांस की क्रान्ति के फलस्वरूप हुआ।

प्रश्न 30.
व्यक्ति को चर्च की दासता से मुक्त कराने में किस आन्दोलन ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया।
उत्तर:
धर्म सुधार आन्दोलन ने।

प्रश्न 31.
किस तत्व ने राज्य के अहस्तक्षेपवादी स्वरूप के विचार का प्रतिपादन किया?
उत्तर:
औद्योगिक क्रान्ति ने।

प्रश्न 32.
उदारवाद किस प्रकार की शासन प्रणाली का समर्थन करता है?
उत्तर:
लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली का।

प्रश्न 33.
उदारवाद की प्रमुख विशेषता क्या है?
उत्तर:
निरंकुश राजतन्त्र, सामन्ती व्यवस्था एवं चर्च की प्रभुता का विरोध करना।

प्रश्न 34.
यूरोप में बौद्धिक क्रान्ति से सम्बन्धित किन्हीं दो विचारकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. वाल्टेयर
  2. रूसो

प्रश्न 35.
उदारवाद के प्रकार बताइए।
उत्तर:

  1. प्राचीन उदारवाद
  2. आधुनिक उदारवाद।

प्रश्न 36.
प्राचीन उदारवाद को नकारात्मक उदारवाद क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि प्राचीन उदारवाद में व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए राज्य की नकारात्मक भूमिका पर बल दिया जाता है।

प्रश्न 37.
नकारात्मक उदारवाद राज्य के किस स्वरूप में विश्वास करता है?
उत्तर:
नकारात्मक उदारवाद राज्य को एक नकारात्मक संस्था और एक आवश्यक बुराई मानता है।

प्रश्न 38.
आधुनिक उदारवाद के कोई दो लक्षण लिखिए।
उत्तर:

  1. राज्य एक नैतिक व कल्याणकारी संस्था है।
  2. कानून के शासन में आस्था।

प्रश्न 39.
सकारात्मक उदारवाद राज्य के किस स्वरूप में विश्वास करता है?
उत्तर:
सकारात्मक उदारवाद राज्य के नैतिक व लोक कल्याणकारी स्वरूप में विश्वास करता है।

प्रश्न 40.
किन दो महत्त्वपूर्ण घटनाओं का सम्पूर्ण श्रेय उदारवादी विचारधारा को दिया जा सकता है?
उत्तर:

  1. इंग्लैण्ड की गौरवपूर्ण क्रान्ति
  2. फ्रांस की राज्य क्रान्ति।

प्रश्न 41.
कौन – सी विचारधारा समस्त प्रकार की निरंकुशताओं की विरोधी है?
उत्तर:
उदारवाद।

प्रश्न 42.
सकारात्मक उदारवाद व्यक्ति की स्वतन्त्रता एवं राज्य के कार्य व शक्तियों के मध्य क्या सम्बन्ध मानता है?
उत्तर:
सकारात्मक उदारवाद व्यक्ति की स्वतन्त्रता एवं राज्य के कार्य व शक्तियों के मध्य परस्पर पूरक होने का सम्बन्ध मानता है।

प्रश्न 43.
उदारवाद का मूल मन्त्र क्या है?
उत्तर:
उदारवाद का मूल मन्त्र वैयक्तिक स्वतन्त्रता है।

प्रश्न 44.
उदारवादी राज्य का क्या स्वरूप मानते हैं?
उत्तर:
उदारवादियों के अनुसार राज्य व्यक्ति के कल्याण हेतु मानव निर्मित संस्था है।

प्रश्न 45.
उदारवाद के कोई दो सिद्धान्त बताइए।
अथवा
उदारवाद की किन्हीं दो मान्यताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. मनुष्य के विवेक में विश्वास
  2. लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली का समर्थन।

प्रश्न 46.
उदारवादियों के अनुसार व्यक्ति साध्य है या साधन?
उत्तर:
उदारवादियों के अनुसार व्यक्ति साध्य है।

प्रश्न 47.
उदारवाद के अनुसार समाज और राज्य क्या हैं?
उत्तर:
उदारवाद के अनुसार समाज और राज्य साधन हैं।

प्रश्न 48.
उदारवादियों के अनुसार राज्य और समाज की स्थिति बताइए।
उत्तर:
उदारवादियों के अनुसार राज्य और समाज कृत्रिम और मनुष्य कृत हैं। इनका निर्माण व्यक्तियों ने अपनी इच्छानुसार अपनी सुविधा के लिए किया है।

प्रश्न 49.
उदारवाद के अनुसार व्यक्ति के अधिकार प्राकृतिक हैं या कृत्रिम।
उत्तर:
उदारवाद के अनुसार व्यक्ति के अधिकार प्राकृतिक हैं।

प्रश्न 50.
लॉक के अनुसार व्यक्ति के मुख्य प्राकृतिक अधिकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. जीवन
  2. सम्पत्ति
  3. स्वतन्त्रता।

प्रश्न 51.
“स्वतन्त्रता व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार है।” यह कथन किस राजनीतिक विचारधारा से सम्बन्धित है?
उत्तर:
उदारवाद से।

प्रश्न 52.
व्यक्ति की स्वतन्त्रता के प्रमुख समर्थक कौन थे?
उत्तर:
हॉबहाउस।

प्रश्न 53.
हॉबहाउस ने व्यक्ति की कौन-कौन-सी स्वतन्त्रताएँ बतायी हैं?
उत्तर:

  1. नागरिक स्वतन्त्रता
  2. वैयक्तिक स्वतन्त्रता
  3. आर्थिक स्वतन्त्रता
  4. वित्तीय स्वतन्त्रता
  5. पारिवारिक स्वतन्त्रता
  6. सामाजिक स्वतन्त्रता
  7. राजनैतिक स्वतन्त्रता
  8. जातिगत राष्ट्रीय स्वतन्त्रता
  9.  अन्तर्राष्ट्रीय स्वतन्त्रता।

प्रश्न 54.
उदारवाद के आधुनिक दृष्टिकोण का विकास किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
परम्परावाद, उदारवाद की प्रतिक्रिया के रूप में उदारवाद के सम्बन्ध में आधुनिक दृष्टिकोण का विकास हुआ।

प्रश्न 55.
लोक प्रभुसत्ता के सिद्धान्त के मूल में क्या है?
उत्तर:
लोक प्रभुसत्ता के सिद्धान्त के मूल में व्यक्ति की स्वतन्त्रता का उदारवादी विचार है।

प्रश्न 56.
राजनीति विज्ञान की कौन-सी विचारधारा यह मानती है कि व्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए यह आवश्यक है कि राज्य धर्मनिरपेक्ष हो।
उत्तर:
उदारवादी विचारधारा।

प्रश्न 57.
उदारवाद की आलोचना के कोई दो बिन्दु लिखिए।
उत्तर:

  1. राज्य एक आवश्यक बुराई नहीं है।
  2. उदारवाद पूँजीवाद का दर्शन है।

प्रश्न 58.
‘माक्र्स प्रथम समाजवादी लेखक हैं। जिनके कार्य को वैज्ञानिक कहा जा सकता है।” यह किस राजनीतिक विचारक का कथन है?
उत्तर:
सी.ई.एम. जोड का।

प्रश्न 59.
मार्क्सवाद का जन्मदाता किस विचारक को कहा जाता है?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स को।

प्रश्न 60.
मार्क्सवाद क्या है?
उत्तर:
मार्क्सवाद श्रमिक वर्ग का राजनीतिक दर्शन है जो समानता, सामाजिक न्याय, समस्त प्रकार के शोषण की समाप्ति, प्रत्येक व सबके लिए रोजगार के साथ नियोजित अर्थव्यवस्था का समर्थन करता है।

प्रश्न 61.
वैज्ञानिक समाजवाद किसे कहा जाता है?
उत्तर:
मार्क्सवाद को वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है।

प्रश्न 62.
समाजवादी विचारधारा का प्रतिपादन किसने किया?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने।

प्रश्न 63.
किस विचारक ने समाजवादी समाज की स्थापना के लिए क्रान्ति की अनिवार्यता पर बल दिया?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने।

प्रश्न 64.
किन्हीं दो समाजवादी विचारकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. कार्ल मार्क्स
  2. सर टामस मूर।

प्रश्न 65.
मार्क्सवाद का उदय किस समाज के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ?
उत्तर:
पूँजीवादी समाज के विरुद्ध।

प्रश्न 66.
लेन लंकास्तर के अनुसार मार्क्सवाद के वैज्ञानिक समाजवाद होने के दो प्रमुख आधार कौन-कौन से हैं ।
उत्तर:

  1. वास्तविकता पर आधारित होना,
  2. वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाना।

प्रश्न 67.
राज्य को अपनी प्रकृति से एक वर्गीय संस्था किस विचारक ने बताया है?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने।

प्रश्न 68.
“राज्य एक कृत्रिम संस्था है जिसका निर्माण शोषक वर्ग ने अपने हितों की रक्षा के लिए किया है। और यह शोषक वर्ग के हाथों में शोषित वर्ग के दमन एवं उत्पीड़न का साधन है।” यह किस विद्वान को कथन है?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स का।

प्रश्न 69.
मार्क्स के अनुसार समाज में सदैव कौन-कौन-से वर्ग विद्यमान रहे हैं?
उत्तर:

  1. शोषक वर्ग,
  2. शोषित वर्ग।

प्रश्न 70.
मार्क्स के अनुसार राज्य का उद्देश्य क्या होता है?
उत्तर:
मार्क्स के अनुसार, राज्य का उद्देश्य उस वर्ग के हितों की रक्षा एवं वृद्धि करना होता है जिसका इसकी सत्ता पर अधिकार होता है।

प्रश्न 71.
मार्क्स समाज में कौन-कौन से दो वर्गों के मध्य संघर्ष अनिवार्य मानता है?
उत्तर:
पूँजीपति वर्ग एवं श्रमिक वर्ग के मध्य।

प्रश्न 72.
मार्क्स का अन्तिम आदर्श क्या है?
उत्तर:
मार्क्स का अन्तिम आदर्श है – साम्यवादी समाज की स्थापना।

प्रश्न 73.
मार्क्स के राज्य सम्बन्धी सिद्धान्त की आलोचना के कोई दो बिन्दु लिखिए।
उत्तर:

  1. राज्य वर्गीय संस्था नहीं है
  2. राज्यविहीन समाज की स्थापना सम्भव नहीं।

प्रश्न 74.
राज्य के अवसान का सिद्धान्त किसने दिया?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने।

प्रश्न 75.
मार्क्स के अनुसार समाजवादी समाज के स्थान पर साम्यवादी समाज की स्थापना किस प्रकार होगी?
उत्तर:
मार्क्स के अनुसार, समाजवादी समाज में उन भौतिक परिस्थितियों का जन्म होगा जिनके कारण राज्य की आवश्यकता नहीं रहेगी और वह क्रमश: नष्ट हो जाएगा और समाजवादी समाज के स्थान पर साम्यवादी समाज की स्थापना हो जाएगी।

RBSE Class 11 political science Chapter 5 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मनु के अनुसार राज्य की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
मनुस्मृति में उल्लिखित राज्य की भारतीय अवधारणा का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनु द्वारा रचित मनुस्मृति में राज्य की अवधारणा व इसके प्रयोजनों का विस्तार से विवेचन किया गया है। मनुस्मृति में राज्य की प्रकृति, सम्प्रभुता, शासन के स्वरूप, राज्य सत्ता पर नियन्त्रण की आवश्यकता, उसकी विधियों, न्याय व दण्ड व्यवस्था, राज्य, समाज व व्यक्तियों के सम्बन्धों जैसे विषयों का व्यवस्थित अध्ययन किया गया है। राज्य के दायित्वों ‘प्रजारक्षण’ एवं ‘प्रजारंजन’ की सीमा में मनु ने विभिन्न कल्याणकारी गतिविधियों को सम्मिलित किया है।

मनुस्मृति में अनेक सैद्धान्तिक, संस्थागत एवं व्यावहारिक उपायों से शासक की शक्तियों को मर्यादित करने की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है। मनु के अनुसार ‘स्वधर्म’ से शासित रहते हुए प्रजा के व्यवहार में धर्म को सुनिश्चित करना राजा का परम कर्तव्य है। मनुस्मृति में राज्य के सप्तांग सिद्धान्त का भी वर्णन मिलता है। मनुस्मृति में राजनीतिक ज्ञान के संहिताबद्ध स्वरूप को ‘राजधर्म’ की संज्ञा दी गयी है।

प्रश्न 2.
कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा प्रस्तुत राज्य की अवधारणा को उल्लेख कीजिए।
अथवा
कौटिल्य रचित ‘अर्थशास्त्र’ नामक ग्रन्थ में प्रस्तुत राज्य की अवधारणा को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
कौटिल्य को चाणक्य के नाम से भी जाना जाता है। इनके द्वारा लिखित राजनीति विषयक ग्रन्थ का नाम ‘अर्थशास्त्र’ है। कौटिल्य ने अपने ग्रन्थ अर्थशास्त्र में लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा प्रस्तुत की। कौटिल्य ने राज्य का उद्देश्य – अप्राप्त की प्राप्ति, प्राप्ति का संरक्षण, संरक्षित का संवर्द्धन और संवर्द्धित का सत्पात्रों में वितरण करना बताया। कौटिल्य ने जनमत व जन नियन्त्रण को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है तथा शासक का मूल्यांकन उसके द्वारा किए जाने वाले धर्मपूर्ण आचरण के आधार पर किये जाने की अपेक्षा की गई है।

प्रश्न 3.
रामायण व महाभारत में प्रस्तुत की गई राज्य की अवधारणा का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
रामायण एवं महाभारत भारत के प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ हैं। इन दोनों ग्रन्थों में राज्य की भारतीय अवधारणा का विस्तार से वर्णन मिलता है। रामायण और महाभारत के शान्तिपर्व में राज्य के संविदावादी सिद्धान्त का विस्तार से विवेचन किया गया है। महाभारत में राजनीतिक ज्ञान के संहिताबद्ध स्वरूप को राजधर्म की संज्ञा दी गई है।

राजधर्म की परिधि में शासक और प्रजा के पारस्परिक सम्बन्धों, राज्य के कार्यक्षेत्र, राज्य के उद्देश्यों और राजकीय शक्ति के नियन्त्रण व मर्यादित उपयोग के सम्बन्ध में आदर्श सूत्रों को सम्मिलित किया गया है। शासक से यह अपेक्षा की गई है कि वह प्रजा के कल्याण हेतु अपने सकारात्मक दायित्वों को निभाए तथा शासकीय शक्ति का प्रयोग करते समय अपेक्षित मर्यादाएँ रखे।

प्रश्न 4.
कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र में वर्णित राज्य के सप्तांग सिद्धान्त का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र में राज्य के सप्तांग सिद्धान्त का वर्णन किया गया है। सप्तांग सिद्धान्त से तात्पर्य है – राज्य के सात अंग होते हैं-

  1. स्वामी,
  2. अमात्य,
  3. जनपद,
  4.  दुर्ग,
  5. कोष,
  6. दण्ड,
  7.  मित्र।

1. स्वामी – स्वामी से तात्पर्य है राजा संगठन का प्रधान है तथा वह प्रभुसत्ता सम्पन्न होता है।
2. अमात्य – अमात्य राज्य के विभिन्न कार्यों के प्रभारी अधिकारी के रूप में कार्य करता है। यह राजकीय कार्यों में राजा को सहयोग प्रदान करता है।
3. जनपद – जनपद से तात्पर्य निश्चित भू-भाग व जनसंख्या से होता है।
4.  दुर्ग – दुर्ग से तात्पर्य राज्य की राजधानी से है। दुर्ग कई प्रकार के होते हैं।
5.  कोष -कोष से तात्पर्य राजकोष या खजाने से है अर्थात् राज्य के प्रशासनिक कार्य हेतु राज्य के पास निश्चित मात्रा में राजकोष होना चाहिए।
6. दण्ड – दण्ड से तात्पर्य सेना से है जिसके विभिन्न प्रकार होते हैं।
7. मित्र – मित्र से तात्पर्य महत्त्वपूर्ण एवं विश्वसनीय मित्रों से है तो आपातकाल में राज्य की सहायता करते हैं।

प्रश्न 5.
शुक्रनीतिसार में वर्णित राज्य के सप्तांग सिद्धान्त का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शुक्र द्वारा शुक्रनीतिसार में भी राज्य के सप्तांग सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है। शुक्र नीति में राज्य के ‘सावयव’ स्वरूप को व्यक्त करते हुए एक स्थान पर राज्य की तुलना मानव शरीर से की गई है। राज्य के सात अंगों में से, राजा को सिर, मंत्री को नेत्र, मित्र को कर्ण, कोष को मुख, सेना को मन, दुर्ग को दोनों हाथ तथा राष्ट्र को दोनों पैर माना गया है।

एक अन्य प्रसंग में राज्य की तुलना वृक्ष से की गई है। जिसमें राजा को वृक्ष का मूल, मन्त्रियों को स्कन्ध, सेनापति को शाखाएँ, सेनाओं को पल्लव, प्रजा को धूल, भूमि से प्राप्त होने वाले कारकों को फल, राज्य की भूमि को बीज माना गया है। प्राचीन भारतीय चिन्तन में प्रतिपादित राज्य के सप्तांग सिद्धान्त में पश्चिमी विचारकों द्वारा प्रतिपादित राज्य के चार अंग यथा-जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार एवं प्रभुसत्ता सम्मिलित हैं।

प्रश्न 6.
महात्मा गाँधी के राज्य सम्बन्धी विचारों को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
गाँधीजी के मतानुसार राज्य की अवधारणा समझाइए।
उत्तर:
महात्मा गाँधी के विचार भी प्राचीन भारतीय अवधारणाओं से प्रभावित हैं। राज्य के नैतिक आधारों का विवेचन गाँधीजी के विचारों में परिलक्षित होता है। राज्य को गाँधीजी ने संगठित हिंसा का प्रतीत माना है। आदर्श रूप में महात्मा गाँधी ‘राम राज्य’ का सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं। जहाँ बाह्य नियन्त्रण की कोई आवश्यकता ही न रहे किन्तु व्यक्ति सत्य व अहिंसा के प्रति उस सीमा तक प्रतिबद्ध नहीं हो सकते जिस स्तर की गाँधी को अपेक्षा है। अतः गाँधीजी का यह आदर्श राज्य व्यवहार में परिणत नहीं हो सकता।

उप आदर्श राज्य के रूप में गाँधीजी ने विकेन्द्रीकृत ग्राम स्वराज्य की अवधारणा प्रतिपादित की है। गाँधीजी ने राजनीतिक शक्ति के केन्द्रीकरण को हिंसा की संज्ञा दी है। गाँधीजी के अनुसार, एक विकेन्द्रीकृत राजनीतिक प्रणाली ही अहिंसा के उप आदर्श के अनुरूप मानी जा सकती है। उन्होंने ग्राम को राजनीतिक व्यवस्था की स्वायत्त और आत्मनिर्भर इकाई बनाने पर बल दिया है। गाँधीजी राज्य की किसी प्रकार की बाध्यकारी शक्ति के समर्थन में नहीं थे। अहिंसक लोकतन्त्र या प्रतिनिधि लोकतन्त्रों को सुधारवादी स्वरूप उनका तात्कालिक राजनीतिक लक्ष्य था।

प्रश्न 7.
उदारवाद, अनुदारवाद का विलोमार्थी नहीं है। केसे?
उत्तर:
यद्यपि उदारवाद इंग्लैण्ड में प्रचलित अनुदारवादी दृष्टिकोण की विरोधी विचारधारा रही है। उदारवाद ने सदैव परिवर्तन का समर्थन किया। उदारवाद ने समस्त क्रान्तिकारी परिवर्तनों का समर्थन किया। यह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का प्रतीक का बन गया। उदारवाद, फ्रांस व संयुक्त राज्य अमेरिका की क्रान्तियों का समर्थक था। वहीं इंग्लैण्ड में अनुदारवाद सुधार एवं परिवर्तनों का विरोधी दृष्टिकोण था।

वह राजाओं, सामन्तों एवं चर्च के अधिकारियों के विशेषाधिकारों की रक्षा का पक्षधर था। अत: उदारवाद को अनुदारवाद की विरोधी विचारधारा समझा जाने लगा। किन्तु यह धारणा ठीक नहीं है, उदारवाद ने वर्तमान युग के समाजवादी एवं साम्यवादी विचारों का भी विरोध किया, जबकि ये विचारधाराएँ क्रान्तिकारी। परिवर्तनों की द्योतक थीं। अत: उदारवाद को अनुदारवाद का विलोमार्थी नहीं माना जा सकता है।

प्रश्न 8.
उदारवाद, व्यक्तिवाद का पर्यायवाची नहीं है। केसे?
उत्तर:
सामान्यतया उदारवाद को व्यक्तिवाद का पर्यायवाची मान लिया जाता है। उदारवाद और व्यक्तिवाद में बहुत अधिक अन्तर है। व्यक्तिवादी विचारधारा का जन्म 15वीं व 16वीं शताब्दी में तब हुआ जब पुनर्जागरण और सुधार आन्दोलन में मध्ययुगीन परम्पराओं को पूर्णत: नष्ट कर दिया गया। व्यक्तिवाद राज्य को एक आवश्यक बुराई मानता है। यह विचारधारा व्यक्ति के जीवन में राज्य के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करती।

यह मानती है कि राज्य द्वारा किया गया कार्य उतना श्रेष्ठ और सुन्दर नहीं होता जितना कि व्यक्तियों के द्वारा किया गया कार्य होता है, जबकि उदारवाद ऐतिहासिक दृष्टि से मध्ययुग के अन्त एवं आधुनिक युग के प्रारम्भ की विचारधारा है। यह आधुनिक युग में व्यक्तिवादी दृष्टिकोण से आगे बढ़कर राज्य के सकारात्मक पक्ष को स्वीकार करती है तथा जनहित में राजा द्वारा व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप को यह विचारधारी गलत नहीं मानती। अतः उक्त आधारों पर कहा जा सकता है कि उदारवाद, व्यक्तिवाद का पर्यायवाची नहीं है।

प्रश्न 9.
उदारवाद सामाजिक कल्याण पर आधारित है। केसे?
उत्तर:
उदारवाद व्यक्ति को साध्य एवं समाज व राज्य को साधन मानता है। उदारवदियों के अनुसार, व्यक्ति का नैतिक और आध्यात्मिक कल्याण एवं उसका विकास सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। व्यक्ति को साध्य मानते हुए उदारवाद सामाजिक हित की उपेक्षा नहीं करता है। यह व्यक्ति की स्वतन्त्रता को उस सीमा तक सीमित करने का समर्थन करता है। जहाँ तक सामूहिक हितों की प्राप्ति हेतु उचित है। यह राज्य के लोक कल्याणकारी स्वरूप पर बल देता है। यह राज्य को मानव कल्याण का साधन मानता है। इस प्रकार यह व्यक्ति के व्यक्तित्व के समुचित विकास तथा समाज के कल्याण में उचित सामंजस्य स्थापित करता है।

प्रश्न 10.
मनु ने मनुस्मृति में न्याय की व्यवस्था को किस प्रकार बताया है?
उत्तर:
मनुस्मृति में न्याय की स्थापना को राज्य के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कर्त्तव्यों के रूप में मान्यता दी गई है और इसे राज्य के अस्तित्व का आधार भी माना गया है। क्योंकि समाज में व्याप्त अन्याय का निराकरण करने एवं न्याय की स्थापना करने हेतु ईश्वर ने राजा की सृष्टि की। मनु के अनुसार संसार में निष्पाप लोगों की संख्या बहुत कम होती है। व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ आदि के वशीभूत होकर अन्य व्यक्तियों के अधिकारों को छीनने लगता है तथा अपने कर्तव्यों की अवहेलना करने लगता है।

मनु के अनुसार राज्य की दण्ड शक्ति दुष्टों को भयभीत रखती है एवं सभी व्यक्तियों को अपने कर्तव्य पालन हेतु बाध्य करती है तथा अपने अधिकारों का प्रयोग करने में समर्थ बनाती है। अपने इस दायित्व के पालन द्वारा ही राज्य समस्त व्यक्तियों में सुरक्षा की भावनाओं का संचार करता है। मनुस्मृति में अपराधों एवं दण्डों का विस्तृत वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है और राजा को यह निर्देश दिया गया है कि वह स्वयं न्याय कार्य करे।

प्रश्न 11.
महाभारत में वर्णित शास्त्र के उद्गम को समझाइए।
उत्तर:
महाभारत के अनुसार पितामह ब्रह्मा ने जिस शास्त्र की रचना की थी, उसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सभी का समावेश था। राजनीति शास्त्र का उद्गम उसी से हुआ है। विद्वानों द्वारा उसे विशिष्ट एवं स्वतंत्र शास्त्र का दर्जा दिया गया और कृमिक रूप से संक्षिप्त होते-होते यह सुलभ और सुग्राध्य शास्त्र के रूप में परिणत हुआ। महाभारत राजशास्त्र की दैवीय उत्पत्ति का समर्थन करता है जो उसकी प्राचीनता का ही प्रतीक है, इसके रचयिता ब्रह्मा ही नहीं, विष्णु और सरस्वती भी माने गये हैं। महाभारत के शांतिपर्व में ही एक अन्यत्र प्रसंग में भीष्म ने विशालाक्ष, भगवान काव्य, सहस्त्राक्ष, प्राचेत, समुन, भारद्वाज एवं मुनि गौर शिरा को समाजशास्त्र प्रणेता कहा है।

प्रश्न 12.
किन्हीं तीन तत्वों का उल्लेख कीजिए जो आपकी दृष्टि में उदारवाद के उदय एवं विकास में सहायक रहे हैं?
अथवा
उदारवाद के विकास में सहायक परिस्थितियाँ या कारक कौन-कौन से हैं? किन्हीं तीन का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उदारवाद के उदय और विकास में सहायक तत्व / परिस्थितियाँ / कारक – उदारवाद के उदय और विकास में सहायक तत्व या परिस्थितियाँ या कारक निम्नलिखित हैं
(1) धर्म सुधार आन्दोलन – 16वीं शताब्दी में पोप व धर्म की निरंकुशता के विरुद्ध मॉर्टिन लूथर के नेतृत्व में हुए आन्दोलन ने मनुष्य की आध्यात्मिक व बौद्धिक स्वतन्त्रता का मार्ग प्रशस्त किया। इस आन्दोलन ने यूरोप में प्रोटेस्टेन्ट धर्म स्थापित किया। इस आन्दोलन ने मनुष्य के दृष्टिकोण को व्यापक तथा उदार बनाकर उदारवाद के विकास में सहयोग दिया।

(2) औद्योगिक क्रान्ति -18वीं शताब्दी में हुई, यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति से नये उद्योगपतियों का उदय हुआ। जिन्होंने अधिकाधिक लाभ कमाने के लिए राज्य द्वारा राजनैतिक व आर्थिक जीवन में लगाये गए प्रतिबन्धों का विरोध कर उदारवाद का मार्ग प्रशस्त किया।

(3) निरंकुशतावाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया – उदारवाद के उदय का प्रमुख कारण निरंकुशतावादी सरकारों के विरुद्ध प्रतिक्रिया थी। 16वीं व 17वीं शताब्दी में यूरोप में निरंकुश राजतन्त्र विद्यमान था। ऐसी स्थिति में जॉन लॉक, जे.एस. मिल, हरबर्ट स्पेन्सर तथा टी.एच. ग्रीन आदि ने व्यक्ति की स्वतन्त्रता और अधिकारों की अवधारणा को प्रतिपादित किया, जिससे उदारवाद का उदय हुआ।

प्रश्न 13.
उदारवाद के प्रकारों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
उदारवाद के प्रकारे-उदारवाद के दो प्रमुख प्रकार निम्न हैं-

  1.  प्राचीन उदारवाद
  2. आधुनिक उदारवाद।

(i) प्राचीन / नकारात्मक उदारवाद – उदारवाद का प्रारम्भिक स्वरूप नकारात्मक था। यह राज्य को व्यक्ति की स्वतन्त्रता का विरोधी मानता है। इसकी मान्यता थी कि राज्य के नकारात्मक कार्यों से व्यक्ति की स्वतन्त्रता, समानता तथा अधिकारों का हनन होता है इसलिए नकारात्मक उदारवादी राज्य को एक आवश्यक बुराई मानते हैं।

परम्परागत उदारवाद के समर्थक विद्वान जॉन लॉक, जर्मी बेंथम, जे. एस. मिल. एडम स्मिथ, रिकार्डो, हरबर्ट स्पेन्सर आदि थे। प्रारम्भ में यह उदारवाद वैयक्तिक अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा की माँग तक सीमित था। बाद में उदारवाद धार्मिक स्वतन्त्रता, सहिष्णुता, संविधानवाद एवं राजनीतिक अधिकारों की माँग के रूप में सामने आया।

(ii) आधुनिक (सकारात्मक) उदारवाद-19र्वी सदी में परम्परागत उदारवाद में जो संशोधन व परिवर्तन किया गया उसे आधुनिक या सकारात्मक उदारवाद कहा जाता है। इसके प्रमुख समर्थक विद्वान थे। टी.एच. ग्रीन, जान स्टुअर्ट मिल, लॉस्की, हाबहाउस, मैकाइवर आदि।

सकारात्मक उदारवादी राज्य के लोगों के हित के विकास एवं सुरक्षा के लिए एक सकारात्मक और कल्याणकारी संस्था मानते हैं। इनके अनुसार राज्य एक आवश्यक बुराई नहीं है। व्यक्ति और राज्य एक-दूसरे से पूरक हैं। आधुनिक उदारवाद यह मानता है कि व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्धों को नियमित एवं सन्तुलित करने के लिए राज्य को सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।

प्रश्न 14.
प्राचीन उदारवाद तथा आधुनिक उदारवाद में कोई चार अन्तर बताइए।
अथवा
परम्परागत और सकारात्मक उदारवाद के मध्य चार अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन (परम्परागत) और आधुनिक (सकारात्मक) उदारवाद में निम्नलिखित अन्तर हैं
(1) विकास के आधार पर अन्तर – प्राचीन (परम्परागत) उदारवाद का विकास 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच हुआ, जबकि आधुनिक उदारवाद का विकास 19वीं शताब्दी से वर्तमान काल तक माना जाता है।

(2) उदय के कारणों के आधार पर अन्तर – परम्परागत उदारवाद के विकास के पीछे निरंकुश राजतन्त्र, सामन्तवाद व पोपवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया आदि अनेक कारण रहे, जबकि आधुनिक सकारात्मक उदारवाद का उदय पूँजीवादी व्यवस्था तथा माक्र्सवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में फैला हुआ है।

(3) राज्य के प्रति धारणा के आधार पर अन्तर – परम्परागत उदारवादी राज्य को एक आवश्यक बुराई मानते हैं, जबकि सकारात्मक उदारवादी राज्य को आवश्यक बुराई नहीं मानते हैं। वे राज्य को एक नैतिक और कल्याणकारी संस्था मानते हैं।

(4) अधिकारों की दृष्टि से अन्तर – परम्परागत उदारवादी व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों को नैसर्गिक मानते हैं जबकि आधुनिक उदारवादी व्यक्ति के अधिकारों को राज्य द्वारा प्रदत्त व संरक्षित मानते हैं।

प्रश्न 15.
उदारवाद के कोई चार सिद्धान्त बताइए।
उत्तर:
उदारवाद के चार प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं

  1. व्यक्ति साध्य और समाज व राज्य साधन – उदारवाद के अनुसार व्यक्ति स्वयं में साध्य है और समाज व राज्य व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के साधन मात्र हैं।
  2. व्यक्ति की स्वतन्त्रता को समर्थन – उदारवादियों की मान्यता है कि मनुष्य जन्म से ही स्वतन्त्र होता है वह अपना स्वामी स्वयं है। अतः स्वतन्त्रता उसका प्राकृतिक एवं जन्मसिद्ध अधिकार है।
  3. लोकतन्त्रात्मक शासन प्रणाली का समर्थक – उदारवाद संविधानिक साधनों में आस्था रखते हैं, वे किसी कार्य को बलपूर्वक सम्पन्न करने के पक्ष में नहीं हैं। इनके अनुसार राजकीय सत्ता या व्यवस्था का आधार लोक सहमति होनी चाहिए। किसी भी व्यक्ति पर बन्धन उसकी सहमति से ही लगाये जा सकते हैं।
  4. धर्म निरपेक्ष राज्य के विचार को मान्यता – उदारवादियों के अनुसार, राज्य को नागरिकों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। धर्म व्यक्ति की निजी आस्था और विश्वास की वस्तु है, वह किसी भी धर्म को मानने के लिए स्वतन्त्र है। धर्म के आधार पर नागरिकों में भेदभाव नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 16.
उदारवाद की आलोचना के कोई तीन आधार बताइए।
उत्तर:
उदारवाद की आलोचना के तीन प्रमुख आधार अग्रलिखित हैं
(i) राज्य आवश्यक बुराई नहीं – उदारवादी राज्य को आवश्यक बुराई मानते हैं, किन्तु यह धारणा भ्रामक है। राज्य का निर्माण मानव जीवन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए हुआ है और उसका आदर्श मानव कल्याण में वृद्धि करना है। राज्य के बिना एक सभ्य और सुसंस्कृत समाज की कल्पना नहीं की जा सकती।

(ii) पूँजीवादी दर्शन – माक्र्स के मतानुसार, उदारवाद ने विश्व में पूँजीवाद और आर्थिक शोषण को प्रोत्साहित किया है। उदारवाद, पूँजीवादी आर्थिक तथा राजनीतिक व्यवस्था के हितों का संरक्षक है।

(iii) सामाजिक परिवर्तन के गलत सिद्धान्त-उदारवाद की मान्यता है कि क्रमिक विकास द्वारा सामाजिक परिवर्तन लाना सम्भव है, जबकि वास्तविकता यह है कि वर्ग विभाजित समाज में परिवर्तन वर्ग संघर्ष तथा क्रान्ति द्वारा ही । होता है।

प्रश्न 17.
उदारवाद का योगदान अथवा महत्त्व बताइए।
अथवा उदारवाद का प्रभाव जीवन के किन-किन क्षेत्रों में देखा जा सकता है?
उत्तर:
उदारवाद का प्रभाव / महत्त्व / योगदान जीवन के निम्नलिखित क्षेत्रों में देखा जा सकता है

  1. सामाजिक क्षेत्र – इस क्षेत्र में उदारवाद ने समाज में व्याप्त अन्धविश्वासों, रूढ़ियों, अनुपयोगी प्रथाओं, आडम्बरी, अशिक्षा, भुखमरी आदि का विरोध किया तथा व्यक्ति के जीवन को सुखद बनाने का प्रयास किया।
  2. धार्मिक क्षेत्र – इस क्षेत्र में उदारवाद में धार्मिक स्वतन्त्रता व सहिष्णुता पर बल दिया तथा रोम में पोप के मनमाने आचरण को नियन्त्रित किया। धार्मिक दृष्टि से व्यक्ति को स्वतन्त्रता दिलाने में उदारवादी अग्रणी रहे हैं।
  3. राजनैतिक क्षेत्र – राजनैतिक क्षेत्र में उदारवाद ने स्वतन्त्रता, समानता, अधिकारों, सहिष्णुता, बन्धुत्व एवं लोकतन्त्रात्मक शासन प्रणाली का समर्थन किया जिससे राजतन्त्रात्मक व्यवस्थाओं का अन्त होकर विश्व के अनेक भागों में सार्वजनिक मताधिकार के आधार पर लोकतन्त्रीय व्यवस्थाओं की स्थापना हुई।
  4. आर्थिक क्षेत्र – उदारवाद का आर्थिक क्षेत्र में बहुत महत्व है। इसने राज्य के अहस्तक्षेपवादी स्वरूप पर बल दिया जिसके परिणामस्वरूप विश्व के दूरस्थ देशों से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुए और विश्व बाजार की धारणा प्रबल जक

प्रश्न 18.
महाभारत में वर्णित राज्य के स्वरूप के सप्तांग सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
राजशास्त्र प्रणेताओं द्वारा राज्य के स्वरूप की कल्पना की गई है तथा राज्य के सात अंगों की विस्तृत विवेचना की है। इसी आधार पर राज्य को सप्तांग अथवा सात प्रकृत माना गया है। महाभारत के शान्ति पर्व में, शुक्रनीति, कौटिल्य के अर्थशास्त्र व मुनस्मृति की भाँति राज्य के सप्तांग सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है। महाभारत में राज्य के सात अंगों का विवरण दिया गया है

  1. राजा
  2. मंत्री
  3. कोष (खजाना)
  4. सेना
  5. मित्र
  6. दुर्ग तथा
  7. देश।

ग्रन्थ में नाम भेद से जहाँ तहाँ अनेक बार इनका विवेचन किया गया है। महाभारत में ही एक अन्य प्रसंग में राजा के कर्तव्य का उल्लेख करते हुए भीष्म के मुख से व्यास जी ने कहलाया है कि राजा को उचित है कि वह सात वस्तुओं की रक्षा करे। ये सात वस्तुएँ हैं-राजा को अपना शरीर, मंत्री, कोष, दण्ड, मित्र, राष्ट्र और नगर। महाभारत में राज्य के सप्तांग सिद्धान्त को स्वीकार करके राज्य के स्वरूप के सावयव सिद्धान्त की ओर संकेत मात्र किया है।

प्रश्न 19.
शुक्रनीति में राज्य के विभिन्न कार्यक्षेत्र कौन – कौन से सुझाए गए हैं?
उत्तर:
शुक्रनीति में राज्य के निम्नलिखित कार्य क्षेत्रों को सुझाया गया है

  1. प्रजा की सुरक्षा
  2. प्रजापालन
  3. अर्थव्यवस्था का निर्वाह
  4. राज्य के शिक्षा सम्बन्धी कार्य
  5. सामाजिक व्यवस्था का निर्वाह
  6. न्यायिक व्यवस्था का निर्वाह
  7. प्रशासनिक प्रणाली का निर्वाह
  8. पर राष्ट्र सम्बन्धों का निर्वाह।

प्रश्न 20.
मार्क्स से पूर्व के समाजवादियों को स्वप्नलोकी समाजवादी क्यों कहा जाता है? बताइए।
उत्तर:
कार्ल मार्क्स प्रथम समाजवादी विचारक नहीं थे। मार्क्स से पूर्व के विचारकों में सर टामस मूर, सेंट साइमन, चार्ल्स कोरियर, रॉबर्ट ओवन, बावेक, जान. डी. सिसमांडी, लुई ब्लांक, हल्लू व विलियम थाम्पसन आदि प्रमुख थे। इन समाजवादियों ने समाज में व्याप्त व्यक्तिगत सम्पत्ति, पूँजीवाद, आर्थिक विषमताओं तथा सामाजिक असमानताओं का विरोध किया। इनके अनुसार भूमि और उत्पादन के साधनों पर एक वर्ग विशेष के नियन्त्रण की अपेक्षा सम्पूर्ण समाज या राज्य को नियन्त्रण होना चाहिए।

समाज के प्रत्येक व्यक्ति को कार्य करने का अवसर मिले तथा इस कार्य के लिए उसे वेतन प्राप्त हो। ये विचारक धन के न्यायोचित वितरण पर बल देते थे किन्तु इन्होंने यह नहीं बतलाया था कि यह विषमता क्यों उत्पन्न होती है तथा उत्पादन की विधियों से इसका क्या सम्बन्ध है। इन्होंने समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया की न तो कोई व्याख्या प्रस्तुत की और न ही विद्यमान व्यवस्था को सुधारने के लिए कोई व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किया। इसी कारण मार्क्स से पूर्व के समाजवादी विचारकों को स्वप्नलोकी समाजवादी कहा जाता है।

प्रश्न 21.
कार्ल माक्र्स द्वारा प्रतिपादित विचारधारा को वैज्ञानिक समाजवाद क्यों कहा जाता है? बताइए।
उत्तर:
कार्ल मार्क्स द्वारा प्रतिपादित विचारधारा को वैज्ञानिक समाजवाद के नाम से जाना जाता है। मार्क्स का दृष्टिकोण पूर्णतः वैज्ञानिक था। मार्क्स के पूर्ववर्ती विचारकों ने समाज में व्याप्त आर्थिक विषमताओं का अन्त एवं आर्थिक साधनों के न्यायोचित वितरण पर बल दिया। यह विषमता किन कारणों से उत्पन्न हुई तथा उनका उत्पादन की विधियों के साथ क्या सम्बन्ध है इस सम्बन्ध में कोई तार्किक विकल्प प्रस्तुत नहीं किया गया।

माक्र्स ने न केवल पूँजीवाद के दोषों को उजागर किया बल्कि पूँजीवाद का अन्त कर वर्गविहीन समाज की स्थापना के लिए एक विस्तृत कार्य योजना प्रस्तुत की। उसने समाजवाद को काल्पनिक पृष्ठभूमि से निकालकर एक वैज्ञानिक धरातल प्रदान किया और उसे मार्क्सवाद नाम दिया। लेन लंकास्टर ने मार्क्सवाद के वैज्ञानिक समाजवाद होने के दो प्रमुख आधार बताए-

  1.  यह वास्तविकता पर आधारित है। न कि कल्पनी पर।
  2. यह पुरानी व्यवस्था को ही वैज्ञानिक तरीके से प्रस्तुत नहीं करता वरन् नई व्यवस्था प्राप्त करने के लिए भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाता है। टेलर ने भी कहा है कि मार्क्सवाद में सामाजिक परिवर्तन करने वाली शक्तियों की जो व्याख्या है, वह उसे वैज्ञानिकता प्रदान करती है।

प्रश्न 22.
कार्ल मार्क्स के अनुसार राज्य की उत्पत्ति किस प्रकार हुई?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स के अनुसार राज्य की उत्पत्ति-कार्ल मार्क्स के अनुसार, आदिम साम्यवादी अवस्था में राज्य नहीं था। इस अवस्था में समाज के लोगों के हितों में कोई टकराव नहीं था। लोग मिलजुल कर अपना कार्य करते थे। निजी सम्पत्ति का अस्तित्व नहीं था। समाज के क्रमिक विकास के फलस्वरूप निजी सम्पत्ति का जन्म हुआ और सम्पूर्ण समाज दो वर्गों, यथा-सम्पत्तिशाली और सम्पत्तिहीन में बँट गया। मार्क्स ने इस अवस्था को दास युग कहा।

दास युग में सम्पत्तिशाली स्वामी वर्ग अत्यधिक प्रभावशाली था, किन्तु उनकी संख्या सम्पत्तिविहीन व असन्तुष्ट दास वर्ग की तुलना में बहुत कम थी। सम्पत्तिशाली वर्ग को हमेशा दास वर्ग के विद्रोह का भय रहने लगा अतः उसने दासों के दमन एवं अपनी सम्पत्ति की रक्षा हेतु शक्ति की आवश्यकता अनुभव की और कानून, पुलिस, सेना, जेल एवं न्यायालय आदि की व्यवस्था की। इन संस्थाओं पर सम्पत्तिशाली शोषक वर्ग का ही नियन्त्रण था। इस वर्ग ने इन संस्थाओं के माध्यम से दास वर्ग पर अपना कठोर नियन्त्रण स्थापित कर लिया। इस प्रकार राज्य संस्था का निर्माण दो वर्गों के विभेद के कारण अर्थात् वर्ग संघर्ष के कारण हुआ।

प्रश्न 23.
मार्क्सवादियों के अनुसार राज्य के लुप्त होने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
माक्र्सवादियों के अनुसार, वर्ग समाज का परिणाम होने के कारण राज्य एक वर्गीय संस्था है। यह न तो निष्पक्ष और न ही न्यायपूर्ण है। वस्तुत: यह एक वर्ग संस्था है। यह पक्षपातपूर्ण, दमनकारी एवं शोषणकारी संस्था है। यह उस वर्ग के हितों की रक्षा और वृद्धि के लिए है जिसको इसकी सत्ता पर अधिकार होता है।

अतीत में राज्य की सत्ता पर अल्पसंख्यक शोषक वर्ग का अधिकार रहा है और राज्य ने इस वर्ग के हितों की रक्षा का ही कार्य किया है किन्तु भविष्य में समाजवादी राज्य की स्थापना होगी और राज्य की सत्ता पर बहुसंख्यक श्रमिक वर्ग (शोषित वर्ग) का अधिकार होगा और तब राज्य का उद्देश्य श्रमिक वर्ग के हितों की रक्षा करना होगा।

समय के साथ जब समाजवादी समाज पूरी तरह साम्यवादी हो जाएगा तब राज्य स्वत: लुप्त हो जाएगा। एक बार साम्यवादी समाज की स्थापना हो जाने के बाद श्रमिकों को राज्य की कोई आवश्यकता नहीं होगी अर्थात् वह धीरे-धीरे नष्ट हो जाएगा। समाजवादी अवस्था के पश्चात् आने वाला समाज वर्गहीन समाज तथा राज्यविहीन समाज दोनों ही होगा अर्थात् श्रमिक वर्ग का शासन होगा।

प्रश्न 24.
मार्क्स के राज्य सिद्धान्त की आलोचना के कोई दो आधार बताइए।
उत्तर:
मार्क्स के राज्य सम्बन्धी सिद्धान्त की निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की गई
(i) राज्य वर्गीय संस्था नहीं है – मार्क्स राज्य की उत्पत्ति के वर्गीय सिद्धान्त के समर्थक थे। इन्होंने माना कि राज्य की उत्पत्ति वर्ग संघर्ष के परिणामस्वरूप हुई है। राज्य शोषक वर्ग के हितों की रक्षा करने वाली संस्था है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। राज्य तो अपनी जनता की सेवा और कल्याण करने वाला संगठन है। राज्य का उदय मनुष्य के हितों की रक्षा के लिए हुआ है, किसी वर्ग विशेष के हितों की रक्षा के लिए नहीं।

(ii) पूँजीवादी राज्य सम्बन्धी गलत धारणा – वर्तमान समय में जिस प्रकार से पूँजीवादी राज्यों का विकास हो रहा है। इसने मार्क्स की धारणा को असत्य साबित कर दिया है। मार्क्स ने पूँजीवादी राज्यों को श्रमिकों के शोषण का साधन। बताया था, जबकि वर्तमान काल में पूँजीवादी राज्य ने श्रमिकों के कल्याण का दायित्व स्वीकार कर लिया है। मार्क्स के अनुसार, पूँजीवादी राज्य का अन्त सुनिश्चित है, जबकि आधुनिक काल में पूँजीवादी राज्ये पूर्व की तुलना में अधिक शक्तिशाली एवं प्रभावशाली हैं।

RBSE Class 11 political science Chapter 5 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्य की भारतीय अवधारणा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
राज्य की भारतीय अवधारणा राज्य की भारतीय अवधारणा व्यापक दार्शनिक मान्यताओं पर आधारित है। भारतीय चिन्तन में राज्य की अवधारणा के सूत्र वैदिक साहित्य से प्राप्त हुए। मनुस्मृति, अर्थशास्त्र, रामायण, महाभारत आदि में राज्य की अवधारणा व इसके प्रयोजन का विस्तार से विवेचन किया गया है।
(1) मनुस्मृति में राज्य की अवधारणा – मनु द्वारा रचित मनुस्मृति में राज्य की प्रकृति, सम्प्रभुता, शासन के स्वरूप, राज्य सत्ता पर नियन्त्रण की आवश्यकता, उसकी विधियों, न्याय व दण्ड व्यवस्था, राज्य, समाज व व्यक्तियों के सम्बन्धों जैसे विषयों का व्यवस्थित अध्ययन किया गया है।

(2) अर्थशास्त्र की अवधारणा – कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र में लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा प्रस्तुत की गई है। कौटिल्य ने राज्य का प्रयोजन-अप्राप्त की प्राप्ति, प्राप्ति का संरक्षण, संरक्षित का संवर्द्धन और संवद्धित का सत्पात्रों में विवरण करना बताया है।

(3) रामायण एवं महाभारत के शान्ति पर्व में राज्य की अवधारणा – रामायण व महाभारत के शान्ति पर्व में राज्य के संविदावादी सिद्धान्त का विस्तार से विवेचन किया गया है। महाभारत में राजनीतिक ज्ञान के संहिताबद्ध स्वरूप को राजधर्म की संज्ञा दी गई है। राजधर्म की परिधि में शासक व प्रजा के पारस्परिक सम्बन्धों, राज्य के कार्यक्षेत्र, राज्य के उद्देश्यों और राजकीय शक्ति के नियन्त्रण व मर्यादित उपयोग के सम्बन्ध में आदर्श सूत्रों को सम्मिलित किया गया।

शुक्रनीतिसार में राज्य के सप्तांग सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है। इस ग्रन्थ में राज्य के सावयव स्वरूप को व्यक्त करते हुए एक स्थान पर राज्य की तुलना मानव शरीर से की गई है। राज्य सात अंगों – राजा को सिर, मन्त्री नेत्र, मित्र को कर्ण, कोष का मुख, सेना को मन, दुर्ग को दोनों हाथ एवं राष्ट्र को दोनों पैर माना गया है। एक अन्य प्रसंग में राज्य की तुलना वृक्ष से की गई है। राजा वृक्ष का मूल, मन्त्रियों को स्कन्ध, सेनापति वर्ग की शाखाएँ, सेनाओं को पल्लव, प्रजाओं को धूल भूमि से प्राप्त होने वाले कारकों को फल एवं राज्य की भूमि को बीज माना गया।

प्राचीन भारतीय चिन्तन में राज्य के सप्तांग सिद्धान्त में पश्चिमी विचारकों द्वारा प्रतिपादित राज्य के चार अंग यथा- भूमि, जनसंख्या, सरकार एवं प्रभुसत्ता भी सम्मिलित हैं। महात्मा गाँधी की राज्य सम्बन्धी अवधारणा – महात्मा गाँधी का विचार भी भारतीय परम्पराओं से प्रभावित है। राज्य का नैतिक आधारों पर विवेचन गाँधी के विचारों में परिलक्षित होता है। राज्य को गाँधीजी ने संगठित हिंसा का प्रतीक माना है।

आदर्श रूप में महात्मा गाँधी रामराज्य का सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं जहाँ बाह्य नियन्त्रण की कोई आवश्यकता न हो। व्यक्ति सत्य व अहिंसा के प्रति उस सीमा तक प्रतिबद्ध नहीं हो सकते जिसे स्तर की गाँधीजी की अपेक्षा है। गाँधीजी का यह आदर्श राज्य व्यवहार में परिणत नहीं हो सकता।

उप आदर्श राज्य के रूप में गाँधीजी ने विकेन्द्रीकृत ग्राम स्वराज्य की अवधारणा प्रतिपादित की है। गाँधीजी ने राजनीतिक शक्ति के केन्द्रीकरण को हिंसा की संज्ञा दी है। गाँधीजी राज्य में किसी भी प्रकार की बाध्यकारी शक्ति के समर्थक नहीं थे। उनका तात्कालिक लक्ष्य अहिंसक लोकतन्त्र या प्रतिनिधि लोकतन्त्र का सुधारवादी स्वरूप लागू करना था।

प्रश्न 2.
अर्थशास्त्र में वर्णित राज्य की उत्पत्ति एवं स्वरूप की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
अर्थशास्त्र के अनुसार राज्य की उत्पत्ति – कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राज्य से पूर्व की स्थिति का चित्रण करते हुए कहा है कि समाज में राज्य के अभाव में अराजकता व्याप्त थी और चारों ओर अन्याय, उत्पीड़न व भय का वातावरण व्याप्त था।

इस स्थिति से मुक्ति के लिए लोगों ने विवस्वान के पुत्र मनु को अपना शासक नियुक्त कर दिया और उससे यह समझौता किया कि वे अर्थात् प्रजाजन उसके अर्थात् शासक के प्रति सदैव आज्ञाकारिता का भाव रखेंगे और अपनी आय का एक निश्चित भाग शासक को कर के रूप में देंगे ताकि शासक राजकीय दायित्वों को पूर्ण कर सके।

प्रजाजनों ने शासक को अपनी आजीविका एवं कृषि उपज से प्राप्त आय का छठा भाग तथा व्यापार एवं स्वर्ण आदि से प्राप्त आय का दसवां भाग कर के रूप में देना स्वीकार किया और इसके बदले में शासन ने प्रजा के योगक्षेम की व्यवस्था करना स्वीकार किया राज्य की उत्पत्ति के उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि कौटिल्य ने राज्य के समझौता सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है और राज्य की उत्पत्ति को एक सामाजिक समझौते का परिणाम माना है।

यह समझौता शासक व शासितों के मध्य हुआ है, इसमें शासक के शासितों के प्रति कुछ कर्त्तव्य हैं तो शासितों के शासक के विरुद्ध कुछ अधिकार भी हैं। प्रजा या शासितों द्वारा राजा को अपदस्त कर किसी अन्य योग्य व्यक्ति को शासक बनाने का प्रयोग यह व्यक्त करता है कि कौटिल्य ने शासकीय शक्ति का अन्तिम स्रोत जनता को माना है और जनता की सहमति वे स्वीकृति को इस शासकीय शक्ति का आधार माना है।

एक प्रकार से यह आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्याओं जैसी प्रणाली प्रतीत होती है। कौटिल्य द्वारा किया गया राज्य से पूर्व की स्थिति का वर्णन हाब्स की प्रकृति अवस्था से मिलता-जुलता है। अर्थशास्त्र में राज्य का स्वरूप मनु की तरह कौटिल्य ने भी राज्य के सावयवी स्वरूप का वर्णन करते हुए राज्य के सात अंग माने हैं। इन्हें प्रकृतियाँ भी कहा गया है

1. स्वामी – कौटिल्य ने राजा अथवा स्वामी को राज्य का सर्वोच्च अंग स्वीकारा है। राज्य के समस्त दायित्वों की पूर्ति के लिए अन्तिम रूप से राजा ही उत्तरदायी है। कौटिल्य ने राजा के लिए उच्च चरित्र वाला तथा सद्गुण सम्पन होना आवश्यक माना है।

2. अमात्य – कौटिल्य ने अमात्य या मंत्री को राज्य को अनिवार्य अंग माना है, क्योंकि उसके अनुसार राज्य की शक्ति राजा की निजी शक्ति नहीं है वरन् एक संस्थागत शक्ति है। कौटिल्य ने सुयोग्य व्यक्तियों की अमात्य के रूप में नियुक्ति को आवश्यक माना है।

3. जनपद – जनपद से कौटिल्य का आशय राज्य की सीमाओं और उसके अन्तर्गत निवास करने वाले लोगों से है। कौटिल्य ने राज्य की एक प्रादेशिक इकाई के रूप में भी जनपद का उल्लेख किया है। इस अर्थ में जनपद को आधुनिक जिला जैसी प्रशासनिक इकाई माना जा सकता है।

4. दुर्ग – राज्य की सुरक्षा के लिए कौटिल्य ने दुर्ग को भी एक आवश्यक अंग के रूप में स्वीकार किया है। उसके अनुसार राज्य की सीमाओं पर चारों ओर तथा उपयुक्त स्थानों पर सीमाओं के मध्य दुर्ग बनाए जाने चाहिए। ये दुर्ग चार प्रकार के हो सकते हैं-

  1. औदक दुर्ग, जिसके चारों ओर पानी भरा हो,
  2.  पार्वत दुर्ग, जिसके चारों ओर बड़े-बड़े पत्थरों हों,
  3. धान्वन दुर्ग, जो मैदान में बना हो तथा
  4. वन दुर्ग, जिसके चारों ओर वन – वृक्ष हों। इन दुर्गों को विभिन्न प्रकार से उपयोग किया जा सकता है।

5. कोष – राजकीय दायित्वों को सम्पन्न करने के लिए कौटिल्य ने कोष को आवश्यक माना है और राजा को यह परामर्श दिया है कि वह समुचित माध्यमों से राज्य के कोष में निरन्तर वृद्धि करे। कोष संचालन के लिए उपयुक्त कर्मचारी भी नियुक्त किए जाने चाहिए।

6. दण्ड – राज्य की सैन्य शक्ति को कौटिल्य ने दण्ड का नाम दिया है और राज्य की आन्तरिक व बाह्य सुरक्षा के लिए आवश्यक माना है।

7. मित्र – कौटिल्य ने राजा को परामर्श दिया है कि अन्तर्राज्यीय क्षेत्र में राजा की नीति ऐसी होनी चाहिए कि उसके मित्र राज्यों की संख्या अधिकतम तथा शत्रुओं की संख्या कम से कम हो।

प्रश्न 3.
प्राचीन उदारवाद के परिप्रेक्ष्य में एडमस्मिथ, बेन्थम तथा स्पेन्सर के विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
एडमस्मिथ एडमस्मिथ को अर्थशास्त्र का जनक माना जाता है। इन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति “वेल्थ ऑफ नेशन्स 1776″ में हस्तक्षेप की नीति और व्यक्तिवाद को प्रबल समर्थन किया है। इन्होंने लिखा है कि प्रत्येक व्यक्ति में व्यापार की सहज प्रवृति पायी जाती है जो उसे अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने के लिए प्रेरित करती है। उद्यम व्यक्ति भी स्वार्थ भावना तथा सामान्य हित को बढ़ावा देता है, इससे संरकार, व्यापारी और मजदूर तीनों का हित होता है।

और राष्ट्र की सम्पदा में वृद्धि होती है। एडम स्मिथ ने उद्योग और व्यापार की स्वतंत्रता को प्राकृतिक स्वतंत्रता का नाम दिया और राष्ट्रीय समृद्धि के लिए आवश्यक माना। सरकार को उद्योग व्यापार के मामले में हस्तक्षेप (Laissez Faire) की नीति का अनुसरण करना चाहिए। ऐसी स्थिति में सरकार के केवल तीन ही कार्य रह जाते हैं प्रथम विदेशी आक्रमण से राष्ट्र की रक्षा, द्वितीय न्याय का प्रवर्तन तथा तृतीय सार्वजनिक निर्माण के कार्य।

बेन्थम (1748 से 1832):
बेन्थम उपयोगितावादी विचारक थे जिन्होंने तर्क प्रस्तु किया कि पूर्ण अधिकार, पूर्ण प्रभुसत्ता तथा पूर्ण न्याय जैसी संकल्पनाएँ सामाजिक जीवन के यथार्थ से मेल नहीं खातीं मानव जीवन के संबंध में केवल एक ही मानदण्ड लागू होता है। अतः सार्वजनिक नीति को एक ही कसौटी पर रखना चाहिए और वह है-“अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख।”

बेन्थम के अनुसार प्रकृति ने मनुष्य को दो शक्तियों के अधीन रखा है। जो कि सुख और दुःख हैं। जो कार्य मनुष्य के सुखों में वृद्धि तथा दु:खों को कम करते हैं, मनुष्य को वे कार्य उपयोगी तथा जिन कार्यों से दु:ख प्राप्त होता है या सुख में कमी होती है, वे कार्य अनुपयोगी लगते हैं।

सरकार का कार्य भी इसी उद्देश्य की पूर्ति करना है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने हित का सर्वोत्तम निर्णायक होता है। इसलिए सरकार ऐसे कानूनों का निर्माण करे जो लोगों की स्वतंत्र गतिविधियों के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करे। सामान्य हित को ध्यान में रखते हुए लोगों पर उचित प्रतिबन्ध लगाना तथा अपराधियों को दण्ड देना भी सरकार का कार्य है परन्तु कानून का पालन करने वाले नागरिकों के मामले में सरकार को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इस प्रकार बेन्थम व्यक्तिवाद एवं हस्तक्षेप की नीति का समर्थन करता है।

हर्बर्ट स्पेन्सर (1820 से 1903):
स्पेन्सर इंग्लैण्ड के विचारक थे, जिन्होंने न्यूनतम शासन के सिद्धान्त को चरम सीमा तक पहुँचाया। इन्होंने समाज की कल्पना एक जीवित प्राणी के रूप में की। इनका कहना था कि समाज रूपी जीव के जो अंग सुचारू रूप से कार्य न करें, उनका नष्ट हो जाना ही समाज के लिए लाभदायक है।

समाज के समर्थ सदस्यों का यह कर्तव्य नहीं है कि वे निर्बल एवं असमर्थ सदस्यों को सहारा देकर समाज की क्षति को होने दें। स्पेन्सर ने चाल्र्स डार्बिन ने इस सिद्धान्त को आधार बनाया कि जीवन संघर्ष में योग्यतम की उत्तर जीविता (Survival of the Fittest) होती है। स्पेन्सर के अनुसार समाज के दीन – दुखियों की राज्य या समाज की ओर से सहायता करना सामाजिक विकास में बाधक होगा। अतः ऐसे प्रयास निन्दनीय हैं।

स्पेन्सर ने प्रगति के अर्थ में कहा है कि सबको अपनी उन्नति के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया जाए और प्रगति की इस दौड़ में योग्य व्यक्ति आगे आएँगे और अयोग्य व्यक्ति पिछड़ जाएँगे। यदि राज्य निर्बल और असमर्थ लोगों की जनकल्याण के नाम पर सहायता करता है तो उसका यह कार्य प्राकृतिक व्यवस्था में हस्तक्षेप माना जाएगा। राज्य को केवल वे ही कार्य करने चाहिए जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता बनी रहे।

प्रश्न 4.
उदारवाद के विकास में यूरोप के इतिहास की कौन-कौन-सी परिस्थितियों का विशेष योगदान रहा है? विस्तार से बताइए।
अथवा
उदारवाद के विकास में सहायक कारकों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
अथवा
उदारवाद के उदय एवं विकास के कारणों को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
राजनीतिक चिन्तन के क्षेत्र में उदारवाद का उदय किन-किन प्रवृत्तियों का परिणाम है?
उत्तर:
उदारवाद का उदय एवं विकास उदारवाद के उदय एवं विकास के प्रमुख कारक/कारण/परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं
(1) पुनर्जागरण -14वीं शताब्दी में यूरोप में पुनर्जागरण इटली से प्रारम्भ होकर फ्रांस, स्पेन, जर्मनी तक पहुँचा। इसके फलस्वरूप कला व साहित्य के क्षेत्र में चर्च का एकाधिकार समाप्त हो गया तथा राजनीति में मानववाद को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। इसने मानव के दृष्टिकोण को बदल दिया जिसका प्रभाव दार्शनिक, वैज्ञानिक, आर्थिक एवं तकनीकी क्षेत्रों में भी प्रकट हुआ।

(2) धर्म सुधार आन्दोलन – उदारवाद के उदय का एक अन्य प्रमुख कारण धर्म सुधार आन्दोलन है। इस आन्दोलन से पूर्व समस्त यूरोप में चर्च का आधिपत्य था। पोप को ईश्वर का प्रतिरूप समझा जाता था तथा धार्मिक मामलों में वह सर्वोच्च था, व्यक्ति उसका दास था। 16वीं शताब्दी में मार्टिन लूथर ने पोप की इस निरंकुशता के विरुद्ध विद्रोह किया।

इनकी यह धारणा थी कि ईश्वर में आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति धर्म ग्रन्थों के माध्यम से ईश्वर के साथ सम्पर्क स्थापित कर सकता है। इसके लिए केथोलिक चर्च के पोप की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है। लूथर का आन्दोलन प्रोटेस्टेन्ट धर्म के रूप में हमारे समक्ष आया।

(3) वैज्ञानिक क्रान्ति -16 17वीं शताब्दी में वैज्ञानिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप यह बात सामने आयी कि सम्पूर्ण विश्व एक यन्त्र की तरह सर्वव्यापक, स्वचालित एवं निर्विकार नियमों से संचालित होता है। इससे सत्य का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक विधि को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। यह विधि उदारवाद की आधारशिला बन गई।

(4) बौद्धिक क्रान्ति -18वीं शताब्दी के दौरान सम्पूर्ण पश्चिमी जगत में एक बौद्धिक क्रान्ति आयी जिसने अपने युग के विचारों एवं दृष्टिकोणों में बहुत परिवर्तन कर दिया। वाल्टेयर, रूसो, मान्टेस्क्यू, लॉक, एडम स्मिथ, गैटेल, कान्ट व टॉमस पेन आदि ने बताया कि मनुष्य की तर्क, बुद्धि या विवेक जीवन के किसी भी क्षेत्र में सत्य का पता लगाने के सर्वोत्तम साधन हैं। यह दृष्टिकोण उदारवाद का आदर्श बन गया।

(5) औद्योगिक क्रान्ति एवं पूँजीपति वर्ग का उदय – मध्य युग में व्यक्ति का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व एवं अधिकार नहीं था। लोगों का आर्थिक व धार्मिक जीवन स्वतन्त्र नहीं था वे चर्च व सामन्तों के नियन्त्रण में रहते थे। 18वीं शताब्दी के अन्त में औद्योगिक क्रान्ति हुई। यह आर्थिक क्षेत्र में उन परिवर्तनों का द्योतक है जो वैज्ञानिक क्रान्ति का स्वाभाविक परिणाम हैं।

औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना हुई, जिससे उत्पादन में वृद्धि हुई। इससे आर्थिक सत्ता सामन्त वर्ग के हाथों से हटकर उच्च मध्य वर्ग के हाथों में स्थानान्तरित हो गई। नए उद्योगपतियों व श्रमिक वर्गों का उदय हुआ।

(6) निरंकुशतावाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया – उदारवाद के उदय का अन्य प्रमुख कारण निरंकुश सरकारों के विरुद्ध प्रतिक्रिया का पैदा होना था। 16 व 17वीं शताब्दी में यूरोप में निरंकुश राजतन्त्र विद्यमान था। कुछ राजाओं ने तो अपने आपको ईश्वर का अवतार कहकर निरंकुशतावाद की स्थापना की। ऐसी स्थिति में जॉन लॉक, हरबर्ट स्पेन्सर, टी. एच. ग्रीन, जे. एस. मिल जैसे विचारकों ने व्यक्ति की स्वतन्त्रता व व्यक्ति के अधिकारों की अवधारणा को प्रतिपादित किया। जिसने उदारवाद के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।

प्रश्न 5.
उदारवाद का अर्थ बताते हुए इसके प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उदारवाद का अर्थ:
उदारवाद आधुनिक युग की एक महत्त्वपूर्ण एवं प्रगतिशील विचारधारा है। यह न केवल एक विचारधारा है वरन् एक जीवन पद्धति व आन्दोलन भी है, जो मध्यकालीन रूढ़िवादी विचारधारा को अस्वीकार कर नए विचारों को अपनाता है। उदारवाद के अंग्रेजी पर्याय लिबरलिज्म (Liberalism) की उत्पत्ति लैटिन भाषा के लिबरलिसे (Liberlis) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ-स्वतन्त्रता है। इस प्रकार उदारवाद वह विचारधारी है जो व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में चिन्तन, अभिव्यक्ति, विचार – विमर्श, विश्वास, व्याख्या एवं सहयोग आदि में अधिकाधिक स्वतन्त्रता देने के पक्ष में है। स्वतन्त्रता उदारवाद का केन्द्रीय तत्व है।

उदारवाद के प्रकार:
उदारवाद को ऐतिहासिक विकास के आधार पर दो भागों में बाँटा जा सकता है

  1. प्राचीन उदारवाद
  2. आधुनिक उदारवाद

(i) प्राचीन उदारवाद – इसे परम्परागत या नकारात्मक उदारवाद भी कहते हैं।
उदारवाद का प्रारम्भिक स्वरूप नकारात्मक था। यह निरंकुश राजतन्त्र और सामन्तवाद के विरुद्ध व्यक्ति की स्वतन्त्रता की माँग से प्रारम्भ हुआ। प्राचीन उदारवाद में राज्य को व्यक्ति की स्वतन्त्रता का विरोधी माना गया क्योंकि राज्य के नकारात्मक कार्यों से व्यक्ति की स्वतन्त्रता, समानता एवं अधिकारों का हनन होता है।

यह वैयक्तिक अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा की माँग तक सीमित था। कालान्तर में प्राचीन उदारवाद धार्मिक स्वतन्त्रता, सहिष्णुता, संविधानवाद एवं राजनीतिक अधिकारों की माँग के रूप में हमारे समक्ष आया। जर्मी बेंथम, एडम स्मिथ, हरबर्ट स्पेन्सर आदि प्राचीन उदारवाद के प्रमुख समर्थक माने जाते हैं।

(ii) आधुनिक उदारवाद -19वीं शताब्दी में उदारवादी विचारकों ने परम्परागत उदारवाद में समय की माँग के अनुसार संशोधन एवं परिवर्तन किया। इसमें राज्य की नकारात्मक भूमिका के स्थान पर उसके सकारात्मक पक्ष पर बल दिया गया अतः इसे सकारात्मक उदारवाद भी कहते हैं। आधुनिक उदारवाद में व्यक्ति के कल्याण को विशेषतः निर्बल और निर्धन व्यक्ति के कल्याण को उसकी स्वतन्त्रता की शर्त माना जाता है।

प्राचीन उदारवाद के विपरीत आधुनिक उदारवाद यह विश्वास करता है कि व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्धों को नियमित एवं सन्तुलित करने के लिए राज्य को सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। आधुनिक उदारवाद के समर्थक राज्य को एक आवश्यक बुराई नहीं मानते। वे राज्य को लोगों के हितों के विकास एवं सुरक्षा के लिए एक सकारात्मक और कल्याणकारी संस्था मानते हैं। आधुनिक उदारवादियों में जॉन स्टुअर्ट मिल, टी.एच. ग्रीन, एल.टी. हाबहाउस, एच.जे.लॉस्की एवं आर.एम. मैकाइवर आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 6.
उदारवाद का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
उदारवाद का मूल्यांकन उदारवाद आधुनिक युग की एक महत्त्वपूर्ण एवं प्रगतिशील विचारधारा है। इसका मूल्यांकन वैयक्तिक स्वतन्त्रता है। यह ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करता है जिससे व्यक्ति किसी अन्य सत्ता के नियन्त्रण में रहकर अपना जीवनयापन न करे। उदारवाद के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं

  1. उदारवाद मनुष्य के विवेक में आस्था रखता है अतः यह स्वतन्त्र चिन्तन का पक्षधर है।
  2. उदारवादियों का मत है कि प्राचीन इतिहास व परम्पराओं पर आधारित प्राचीन व्यवस्था का उन्मूलन करके विवेक के अनुसार एवं नये आदर्शों के आधार पर समाज का नवनिर्माण किया जाना चाहिए।
  3. उदारवादियों के अनुसार मनुष्य प्राकृतिक रूप से स्वतन्त्र एवं अपने आप में परिपूर्ण है।
  4. उदारवाद की मान्यता है कि व्यक्ति साध्य है तथा समाज व राज्य साधन हैं।
  5. उदारवादियों की मान्यता है कि समाज व राज्य कृत्रिम संस्थाएँ हैं।
  6. उदारवादी व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों का समर्थन करते हैं।
  7. उदारवदियों के मतानुसार राज्य को नागरिकों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। राज्य की। दृष्टि में सभी धर्म समान हैं।
  8. उदारवाद मानवीय समानता एवं विधि के शासन में आस्था रखता है।
  9. यह लोकतान्त्रिक शासन में विश्वास करता है तथा कल्याणकारी राज्य में आस्था रखता है।
  10. उदारवाद राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के सिद्धान्त का समर्थन करता है।
  11.  उदारवाद राज्य के उद्देश्यों व कार्यों के सम्बन्ध में परिवर्तनशील दृष्टिकोण रखता है।
  12. उदारवाद व्यक्ति की स्वतन्त्रता का समर्थन निरपेक्ष रूप से करता है।

उदारवाद की आलोचना उदारवाद की प्रमुख आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं:

  1. राज्य एक आवश्यक बुराई नहीं है। राज्य का निर्माण मानव जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ । है। यह एक मानव कल्याणकारी संस्था है।
  2. राज्य स्वतन्त्रता को नष्ट नहीं करता बल्कि यह कानूनों से व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा करता है।
  3. खुली प्रतियोगिता दुर्बल वर्ग के लिए हानिकारक होती है।
  4. यह पूँजीवादी वर्ग का दर्शन है। यह राज्य को आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार भी केवल पूँजीवादी अर्थव्यवस्था को बनाने के लिए देता है।
  5. उदारवाद की मान्यता है कि क्रमिक विकास द्वारा सामाजिक परिवर्तन लाना सम्भव है, जबकि वास्तविक रूप से वर्ग विभाजित समाज में परिवर्तन वर्ग संघर्ष एवं क्रान्ति द्वारा ही होता है।
  6. यह विचारधारा ऐतिहासिक परम्पराओं की उपेक्षा करती है।
  7. यह विचारधारा राज्य को कृत्रिम मानती है, जबकि राज्य विकास का परिणाम है।

उपर्युक्त विवरणों के परिप्रेक्ष्य में यह बात स्पष्ट होती है कि राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में उदारवाद का अपना महत्व है। राजनीतिक क्षेत्र में उदारवाद ने स्वतन्त्रता व समानता पर आधारित लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली का समर्थन किया। आर्थिक क्षेत्र में उदारवाद ने अहस्तक्षेप की नीति पर बल दिया। धार्मिक क्षेत्र में उदारवाद ने धार्मिक स्वतन्त्रता व सहिष्णुता पर बल दिया। उदारवाद ने समाज में व्याप्त अन्धविश्वास, रूढ़ियों, आडम्बरों, अशिक्षा, भुखमरी एवं अनुपयोगी। पृथाओं आदि का विरोध किया तथा व्यक्ति के जीवन को खुशहाल बनाने का प्रयास किया।

प्रश्न 7.
मार्क्स के राज्य सिद्धान्त का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
मार्क्स के राज्य सिद्धान्त का मूल्यांकन कार्ल मार्क्स ने राज्य को अपनी प्रकृति से एक वर्गीय संस्था बताया। इनका मत है कि राज्य एक कृत्रिम संस्था है। जिसका निर्माण शोषक वर्ग ने अपने हितों की रक्षा के लिए किया है और यह शोषक वर्ग के हाथों में शोषित वर्ग के दमन व उत्पीड़न का साधन है। मार्क्स के राज्य सम्बन्धी विचार निम्नलिखित हैं

  1. मार्क्स के अनुसार, आदिम साम्यवादी अवस्था में लोग मिल – जुलकर कार्य करते थे और राज्य का अस्तित्व नहीं था। समाज के क्रमिक विकास के फलस्वरूप निजी सम्पत्ति का उदय हुआ और सम्पूर्ण समाज सम्पत्तियुक्त एवं सम्पत्ति– विहीन वर्ग में बँट गया। मार्स ने समाज की इस अवस्था को दास युग कहा। उनके अनुसार इसी काल में वर्ग संघर्ष से राज्य की उत्पत्ति हुई।
  2. मार्क्स के अनुसार, राज्य अपनी प्रकृति से एक वर्गीय संस्था है। इसका निर्माण शोषक वर्ग ने अपने हितों की रक्षा के लिए किया है। राज्य के कानून और न्याय-प्रणाली शोषक वर्ग के हितों की वृद्धि करने वाले होते हैं।
  3. मार्क्स के अनुसार, राज्य का उद्देश्य उच्च वर्ग के हितों की रक्षा व वृद्धि करना होता है जिसको उसकी सत्ता पर अधिकार होता है।
  4. मार्क्स के अनुसार, इतिहास के किसी भी युग में पायी जाने वाली राज्य व्यवस्था अपनी सामाजिक व्यवस्था के सापेक्ष होती है।
  5. मार्क्स के अनुसार, राज्य एक स्थायी संस्था नहीं है। सर्वप्रथम निजी सम्पत्ति का अन्त होगा, समाज वर्गहीन होगा, वर्ग संघर्ष नहीं होगा। वर्गों के न होने पर वर्गीय संस्था राज्य की भी आवश्यकता नहीं रहेगी तथा राज्य लुप्त हो जाएगा। यह अवस्था समाज की साम्यवादी अवस्था होगी।

मार्क्स के राज्य सिद्धान्त की आलोचना।:
मार्क्स के राज्य सम्बन्धी सिद्धान्त की निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की जाती है

  1. राज्य एक वर्गीय संस्था नहीं है, यह व्यक्तियों की सेवा और कल्याण करने वाला संगठन है।
  2. राज्य शोषक वर्ग के हाथों में शोषित वर्ग के उत्पीड़न, दमन और शोषण की संस्था न होकर एक कल्याणकारी संस्था है। यह सभी वर्गों के हितों की रक्षा करती है, किसी वर्ग विशेष के हितों का नहीं।
  3. वर्तमान समय में पूँजीवादी राज्य के विकास ने इससे सम्बन्धित राज्य विषयक मार्क्स की धारणा को गलत सिद्ध कर दिया है। पूँजीवादी राज्य श्रमिकों के क्रूर शोषण का साधन न होकर श्रमिकों के कल्याण हेतु प्रयासरत है।
  4. मार्क्स ने समाजवादी समाज में व्यक्ति के चरित्र में गुणात्मक परिवर्तन की कल्पना की थी जो असत्य सिद्ध हुई।
  5. मार्क्स की राज्यविहीन समाज की स्थापना की धारणा एक कल्पना मात्र है जो साकार नहीं हो सकती।

मार्क्स के राज्य सिद्धान्त का महत्त्व-यद्यपि मार्क्स की राज्य की उत्पत्ति का सिद्धान्त एक पक्षीय व पूर्वाग्रहों से युक्त है फिर भी इसका अपना महत्त्व है। मार्क्स ने अपने समाजवादी विचारों के माध्यम से उदारवाद को चुनौती दी। इन्होंने निर्धन वशोषित वर्ग को पूँजीपतियों अर्थात् शोषक वर्ग के विरुद्ध प्रेरणा देकर संघर्ष का मार्ग प्रस्तुत किया।

निर्धन अर्थात् श्रमिक वर्ग में अपने अधिकारों के प्रति एक नवीन चेतना उत्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त मार्क्स ने अपने सिद्धान्त के माध्यम से समाज का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया। इस प्रकारे मार्क्स द्वारा प्रतिपादित मार्क्सवाद एक विचारधारा ही नहीं अपितु एक आन्दोलन था जिसने सम्पूर्ण विश्व पर अपना प्रभाव छोड़ा।

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