RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 43 प्राकृतिक संसाधन और उनका संरक्षण

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Rajasthan Board RBSE Class 11 Biology Chapter 43 प्राकृतिक संसाधन और उनका संरक्षण

RBSE Class 11 Biology Chapter 43 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 43 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न में से अक्षय प्राकृतिक संसाधन का उदाहरण है
(क) खनिज
(ख) धातु
(ग) वन्य जीव
(घ) सौर ऊर्जा

प्रश्न 2.
अनवीकरणीय संसाधन का उदाहरण है
(क) खनिज
(ख) धातु
(ग) मृदा
(घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 3.
भू-अपरदन का कारण है
(क) जल
(ख) वायु
(ग) क व ख दोनों ही
(घ) दोनों में से कोई नहीं

प्रश्न 4.
लवणीय जल नम भूमि पर पाई जाने वाली वनस्पति को क्या कहते हैं?
(क) अधिपादप
(ख) कैक्टस
(ग) मैंग्रोव
(घ) जलीय पादप

प्रश्न 5.
नवीकरणीय ऊर्जा का उदाहरण है
(क) पेट्रोलियम
(ख) कोयला
(ग) वन
(घ) प्राकृतिक गैस

प्रश्न 6.
भारत के कुल भू-भाग का वन क्षेत्र कितना है
(क) 20.5%
(ख) 30.0%
(ग) 33.0%
(घ) 35.5%

प्रश्न 7.
देश का वह राज्य जिसमें सर्वाधिक वन क्षेत्र स्थित हैं
(क) राजस्थान
(ख) मध्यप्रदेश
(ग) अरुणाचल प्रदेश
(घ) सिक्किम

उत्तरमाला –
1. (घ)
2. (घ)
3. (ग)
4. (ग)
5. (ग)
6. (क)
7. (ख)

RBSE Class 11 Biology Chapter 43 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संसाधनों के विनाश का प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर-
मानव की बढ़ती सुख सुविधा व ऐशो आराम की जीवन शैली संसाधनों के विनाश का प्रमुख कारण है।

प्रश्न 2.
सूर्य किस प्रकार का संसाधन है?
उत्तर-
नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है।

प्रश्न 3.
पृथ्वी पर जल कितने प्रतिशत है?
उत्तर-
पृथ्वी पर 75% भाग जल का है।

प्रश्न 4.
कुल जल का कितना प्रतिशत भाग कृषि कार्य में काम आता है?
उत्तर-
70% भाग कृषि कार्य हेतु उपयोग में आता है।

प्रश्न 5.
जल कृषि कितने प्रकार की होती है?
उत्तर-
दो प्रकार की स्वच्छ जल कृषि तथा समुद्री जल कृषि

प्रश्न 6.
बूंद-बूंद सिंचाई किसे कहते हैं?
उत्तर-
इसमें जल को बूंद-बूंद करके पौधे की जड़ों में सीधे छोड़ा जाता है।

प्रश्न 7.
मिट्टी किन-किन अवयवों का मिश्रण है?
उत्तर-
खनिज व अपघटित कार्बनिक पदार्थों से मिलकर बनी होती है।

प्रश्न 8.
भू-अपरदन किसे कहते हैं?
उत्तर-
मृदा की ऊपरी परत का किसी कारण से कटाव हो जाना मृदा अपरदन कहलाता है।

प्रश्न 9.
अनूप भूमि किसे कहते हैं?
उत्तर-
वे स्थान जो कम गहरे या छिछले जल में डूबे रहते हैं। तथा इस प्रकार की भूमि में वृक्ष तथा झाड़ियाँ पाई जाती हैं, ये अनूप भूमि कहलाती है।

प्रश्न 10.
मीठा जल नम भूमि में कौन-कौन से फल लगते हैं?
उत्तर-
काली बेरी तथा नीले बेरी के फल ।

प्रश्न 11.
मैंग्रोव वनस्पति कहां पाई जाती है?
उत्तर-
समुद्र तट के किनारे लवणीय जल नम भूमि में मैंग्रोव वनस्पति मिलती है।

प्रश्न 12.
जीवाश्म ईंधन किसे कहते हैं?
उत्तर-
जीवाश्मों से प्राप्त होने वाले जैसे कोयला, पेट्रोलियम उत्पाद।।

प्रश्न 13.
नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के उदाहरण दीजिये।
उत्तर-
सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जैव ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा व जल विद्युत ऊर्जा आदि।

प्रश्न 14.
जीवाश्म ईंधन के प्रयोग से पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभाव बताइये।
उत्तर-
इनके जलने से Co2, Co, No2 आदि गैंसे विमोचित होकर पर्यावरण को प्रदूषित करती हैं।

प्रश्न 15.
यूरेनिमय के विखण्डन से कौन सी ऊर्जा निकलती है?
उत्तर-
परमाणु ऊर्जा।

प्रश्न 16.
राष्ट्रनीति के अनुसार कितना मैदानी भू-भाग वनाच्छादित होना चाहिये?
उत्तर-
33 प्रतिशत भू-भाग पर वन होने चाहिये।

प्रश्न 17.
राजस्थान के वन किस पर्वतमाला पर विद्यमान हैं?
उत्तर-
अरावली पर्वतमाला पर वन विद्यमान हैं।

प्रश्न 18.
वन महोत्सव का प्रारम्भ किस सन् में हुआ?
उत्तर-
1952 में ।

RBSE Class 11 Biology Chapter 43 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अक्षय वे क्षय संसाधनों में अन्तर बताइये।
उत्तर-
अक्षय संसाधन प्रकृति में असीमित मात्रा में होते हैं, ये समाप्त नहीं होते जैसे-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा, परमाणु व ज्वारीय ऊर्जा । क्षय संसाधन प्रकृति में सीमित मात्रा में होते हैं, ये समाप्त हो सकते हैं। ये सभी नवीकरणीय तथा अनवीकरणीय संसाधन होते हैं। जैसे पेट्रोलियम, कोयला; धातुएँ आदि।

प्रश्न 2.
नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन किसे कहते हैं? उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर-
ये प्रकृति के जैविक संसाधन हैं, जैसे कृषि, वन, घास स्थल, जीव जन्तु आदि। इन संसाधनों को उपयोग में लेने के बाद इनकी वृद्धि व पुनः उत्पादन की क्षमता को नियंत्रित करके इन्हें पुनः प्राप्त किया जा सकता है। जैसे-जल, प्रकाश, सूर्य का प्रकाश, मृदा व जीव ।

प्रश्न 3.
जल कृषि किसे कहते हैं? यह कितने प्रकार की होती है? समझाइये।
उत्तर-
जल के द्वारा कई प्रकार के खाद्य पदार्थों का उत्पादन किया जाता है। इनमें मछलियों, झींगों, लोबस्टर, केकड़ों का उत्पादन किया जाता है। इन सभी को मानव भोजन के रूप में उपयोग में लेता है। इन प्राणियों के उत्पादन की क्रिया जल कृषि कहलाती है। जल कृषि दो प्रकार की होती है-स्वच्छ जल कृषि तथा समुद्री जल कृषि।।

प्रश्न 4.
जल संसाधन के संरक्षण का प्रबन्धीकरण किस प्रकार किया जाना चाहिये? समझाइये।
उत्तर-
जल संसाधन का संरक्षण

  • पानी की आवश्यकतानुसार उपयोग, कुंओं को ढककर रखना व पानी को प्रदूषित होने से बचाना।
  • घर के रिसते नल को ठीक करावे व जल का सीमित उपयोग करना।
  • महासागरीय और समुद्री जल में परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाई जानी चाहिए।
  • सागर तट के किनारे औद्योगिक गतिविधियां न्यूनतम होनी चाहिए।
  • रेगिस्तानी या गर्म प्रदेशों में जल वाष्पन की दर को कम करने हेतु हेक्साडिकेनाले डालना चाहिए। यह पानी परे पतली पर्त बना लेता है जिससे वाष्पन कम हो जाता है।
  • सिंचाई के लिए जल को महीन फुहार के रूप में छोड़ा जाना चाहिए। “बूंद-बूंद सिंचाई’ अधिक कारगर है, इससे जेल को बूंद-बूंद करके पौधे की जड़ों में सीधे छोड़ा जाता है।

वर्षा जल का प्रबंधन

  • जल आपूर्ति के लिए वर्षा जल को संचित करना।
  • वर्षा के जल को टांके में एकत्र करके उपयोग में लेना चाहिए।
  • पहाड़ों पर वर्षा जल नियन्त्रण के लिए छोटे-छोटे बांधों का निर्माण करवाना चाहिए।
  • प्राकृतिक झीलों, दलदली क्षेत्रों व पोखरों के मृदा भराव को रोकना चाहिए।
  • रेगिस्तानी क्षेत्रों वे पहाड़ी भागों में वर्षा जल को नहरों में भण्डारण करके वन व कृषि का विकास करना चाहिए। उदाहरण इन्दिरा गांधी नहर परियोजना।

प्रश्न 5.
वर्षा जल का प्रबंधन कैसे करना चाहिए?
उत्तर-
जल संसाधन का संरक्षण

  • पानी की आवश्यकतानुसार उपयोग, कुंओं को ढककर रखना व पानी को प्रदूषित होने से बचाना।
  • घर के रिसते नल को ठीक करावे व जल का सीमित उपयोग करना।
  • महासागरीय और समुद्री जल में परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाई जानी चाहिए।
  • सागर तट के किनारे औद्योगिक गतिविधियां न्यूनतम होनी चाहिए।
  • रेगिस्तानी या गर्म प्रदेशों में जल वाष्पन की दर को कम करने हेतु हेक्साडिकेनाले डालना चाहिए। यह पानी परे पतली पर्त बना लेता है जिससे वाष्पन कम हो जाता है।
  • सिंचाई के लिए जल को महीन फुहार के रूप में छोड़ा जाना चाहिए। “बूंद-बूंद सिंचाई’ अधिक कारगर है, इससे जेल को बूंद-बूंद करके पौधे की जड़ों में सीधे छोड़ा जाता है।

वर्षा जल का प्रबंधन

  • जल आपूर्ति के लिए वर्षा जल को संचित करना।
  • वर्षा के जल को टांके में एकत्र करके उपयोग में लेना चाहिए।
  • पहाड़ों पर वर्षा जल नियन्त्रण के लिए छोटे-छोटे बांधों का निर्माण करवाना चाहिए।
  • प्राकृतिक झीलों, दलदली क्षेत्रों व पोखरों के मृदा भराव को रोकना चाहिए।
  • रेगिस्तानी क्षेत्रों वे पहाड़ी भागों में वर्षा जल को नहरों में भण्डारण करके वन व कृषि का विकास करना चाहिए। उदाहरण इन्दिरा गांधी नहर परियोजना।

प्रश्न 6.
मृदा किसे कहते हैं? इसका निर्माण कैसे होता है?
उत्तर-
मिट्टी भूमि की सबसे ऊपरी परत है। यह खनिज व अपघटित कार्बनिक पदार्थों से मिलकर बनी होती है। जब चट्टानों का अपक्षय (Weathering) होता है तो मृदा बनती है। मृदा का निर्माण चट्टानों, जलवायु, जीवों, समय व उस स्थल की आकृति के बीच होने वाली पारस्परिक क्रियाओं द्वारा होता है।

मृदा, पादप को जल, स्थान, पोषक पदार्थ उपलब्ध करवाकर पादप के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

मृदा में मिट्टी अकार्बनिक पदार्थ एवं कार्बनिक पदार्थ, वायु, जल व विभिन्न जीवों वनस्पतियों के अंश से मिलकर बनी होती है। सामान्यत: मृदा में 40 प्रतिशत भाग खनिज कण, 10 प्रतिशत कार्बनिक पदार्थ तथा 50 प्रतिशत भाग वायु व जल से बनता है।

प्रश्न 7.
मृदा अपरदन किसे कहते हैं? यह किन कारणों से होता है? समझाइये।
उत्तर-
मृदा की ऊपरी परत का किसी कारण से कटाव हो जाना मृदा अपरदन कहलाता है।
यह निम्नलिखित कारणों से होता है

1. जल द्वारा भूमि का कटाव (Soil erosion by water)
जल द्वारा होने वाले भूमि का कटाव स्वच्छ जल व समुद्री जल दोनों के द्वारा हो सकता है।

  • स्वच्छ जल द्वारा कटाव (Soil Erosion by Water) – नदियों, झरनों, नालों, लहरों द्वारा स्वच्छ जल प्रवाहित हो जाता है। इनके प्रवाह से होने वाला कटाव निम्न प्रकार है
    (क) तटवर्ती भूमि कटाव (Diverian erosion) – अधिक वर्षा अथवा बांध के टूटने पर नदियों का बहाव तेज हो जाता है जिससे उपजाऊ मिट्टी बह जाती है यह बाढ़ के समय होता है।
    (ख) पर्त कटाव (Sheet erosion) – किसी स्थान पर लगातार जल-प्रवाहित होते रहने पर भूमि की ऊपरी सतह नष्ट हो जाती है इसके कारण कृषि भूमि नष्ट हो जाती है।
    (ग) नहर कटाव (Gully erosion) – ढलान वाले क्षेत्र में जल कटाव नाले या नहर का रूप ले लेते हैं।
  • समुद्री जल कटाव (Soil Erosion by Marine Water) – लहरों, ज्वारभाटा समुद्री तट की ऊँचाई आदि द्वारा यह कटाव होता

2. वायु द्वारा मृदा का कटाव (Soil Erosion by Air)
मरुस्थलीय भागों में तेज हवा (आंधियाँ) चलती हैं जिससे रेत के टीले एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाते हैं।

प्रश्न 8.
नम भूमि किसे कहते हैं? यह कितने प्रकार की होती
उत्तर-
नम भूमि वे क्षेत्र हैं जो कम गहरे या छिछले जल में डूबे रहते हैं। इनमें पाई जाने वाली वनस्पति जल के प्रति अनुकूलित होती है। नम भूमि अलवणीय या लवणीय जलयुक्त हो सकती है। नम भूमि तीन प्रकार की होती है

  • कच्छ भूमि या दलदली भूमि (Marshy land) – इनमें घास के समान पादप होते हैं ।
  • अनूप भूमि (Swamps) – इस प्रकार की भूमि में वृक्ष तथा झाड़ियां पाई जाती हैं।
  • नदी तट (Riverine) – ये निचले क्षेत्रों में नदियों के किनारे पर पाये जाते हैं।

प्रश्न 9.
सौर ऊर्जा के बारे में समझाइये।
उत्तर-
सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा को सौर ऊर्जा कहते हैं। सूर्य में ऊर्जा का असीमित भण्डार है तथा इसका उपयोग अनंत समय तक किया जा सकता है। सौर ऊर्जा से प्रदूषण नहीं फैलता है। सौर ऊर्जा का रूपान्तरण सीधे ताप ऊर्जा में तथा फिर इसे विद्युत ऊर्जा में बदल कर उपयोग में लिया जाता है। जबे रात्रि में सूर्य नहीं होता है तो पूर्तिकर विधि के द्वारा पैदा की गई बिजली को इकट्ठा करके उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 10.
जल से विद्युत का उत्पादन किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर-
जुल को ऊँचाई से गिराकर स्थितिज ऊर्जा को गतिज ऊर्जा में बदलकर टरबाइन द्वारा विद्युत का उत्पादन किया जाता है। यह ऊर्जा तापीय विद्युत संयंत्र द्वारा बनाई गई विद्युत से सस्ती होती है। आज अनेक देशों में गिरते हुये पानी से ऊर्जा का उत्पादन किया जाती है।

प्रश्न 11.
जीवाश्म ईंधन किसे कहते हैं? समझाइये।
उत्तर-
इसमें जीवाश्मों से प्राप्त होने वाले ऊर्जा स्रोत आते हैं। जैसे-कोयला, पेट्रोलियम उत्पाद आदि । विश्व में कोयला, पेट्रोलियम के भण्डार सीमित हैं तथा इनकी खपत अधिक है। यदि इनका उपयोग इसी प्रकार किया जाता रहा तो एक दिन समाप्त हो जायेंगे। इसलिये इनका उपयोग सीमित मात्रा में ही किया जाना चाहिए।

प्रश्न 12.
खनिज संसाधनों का संरक्षण व प्रबंधन किस प्रकार किया जा सकता है?
उत्तर-
खनिज संसाधन (Mineral Resources)
पृथ्वी का निर्माण तीन प्रकार की चट्टानों के द्वारा हुआ है। प्रारम्भिक निर्माण आग्नेय चट्टानें (Igneous rocks), इसके पश्चात् अवसादी (sedimentary) व फिर रूपान्तरित चट्टानों से हुआ है। इन चट्टानों में अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ हैं। जैसे सोना, चांदी, लोहा, तांबा, जिंक, बॉक्साइट, सिलिका, अभ्रक, संगमरमर, कोयला, फॉस्फेट, जिप्सम, नाइट्रेट आदि। खनिज पदार्थों की दृष्टि से हमारा देश सम्पन्न राष्ट्र है। बिहार व मध्यप्रदेश में लोहा, कोयला; राजस्थान में जिंक, तांबा, बॉक्साइट, सिलिका, अभ्रक एवं संगमरमर पाया जाता है।
दक्षिण भारत में सोने की खाने हैं। असम, गुजरात, महाराष्ट्र में पेट्रोलियम पाया जाता है। अभी हाल ही में हुई खोज में राजस्थान में पेट्रोलियम का वृहद भण्डार मिला है।

खनिज संसाधनों का संरक्षण व प्रबंधन (conservation and management of mineral resources)
इन खनिज पदार्थों की मात्रा भी सीमित है तथा मानव लगातार पृथ्वी के गर्भ से खनिज निकाल रहा है जिससे इनके समाप्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। अतः यह आवश्यक है कि इनका खनन योजनाबद्ध तरीके से ही किया जाए। प्राकृतिक रूप में खनिजों का उपयोग करने के बाद इन्हें जीवधारी मूल भण्डार में डालकर खनिज चक्र को पूरा करते रहें। खनिज चक को पूरा होने में लाखों वर्ष लग जाते हैं।

प्रश्न 13.
वन किसे कहते हैं?
उत्तर-
वन, वृक्षों, झाड़ियों और अन्य काष्ठीय वनस्पति का एक सघन समुदाय होता है। वनों के संगठन व सघनता में अधिक विभिन्नताएं मिलती हैं।

प्रश्न 14.
भारत के उस राज्य का नाम बताइये जिसमें सर्वाधिक वन क्षेत्र हैं।
उत्तर-
मध्य प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, आन्ध्रप्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र तथा उत्तरप्रदेश ।।

प्रश्न 15.
वनोन्मूलन के प्रमुख कारण बताइये।
उत्तर-
वनोन्मूलन (Deforestation)-
हमारे देश में बढ़ती हुयी जनसंख्या तथा घरेलू पशुओं की बढ़ती हुयी आबादी, इमारती काष्ठ व ईंधन की बढ़ती हुई खपत, कृषि उत्पादन के लिये अधिक भूमि की आवश्यकता, घरेलू पशुओं द्वारा अधिक चारण वे चराई वनोन्मूलन के कुछ प्रमुख कारण हैं। घाटी-बाँध योजनाएँ, औद्योगिक प्रसार व पर्वतीय वन क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण ने भी वनों को नष्ट किया है। नई पद्धतियों से भी वनों का क्षेत्र कम हो रहा है। झूम खेती (Jhum cultivation) का प्रचलून उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में बढ़ रहा है। इस प्रकार की खेती में वनों के कुछ क्षेत्र में वृक्षों को काटकर जलाया जाता है, जिससे भूमि की उर्वरता, राख के कारण बढ़ती है। कृषक ऐसे स्थल पर दो या तीन फसल लेने के बाद मृदा की उर्वरता कम होने के कारण उस क्षेत्र को छोड़कर नये वन क्षेत्र में ऐसी ही प्रक्रिया अपनाते हैं इस कारण झूम खेती को स्थानान्तरी खेती (Shifting cultivation) भी कहते हैं। कभी-कभी मानव की असावधानी से या प्राकृतिक कारणों से वनों में भयंकर आग लग जाने के कारण भी वनों का एक बड़ा क्षेत्र नष्ट हो जाता है।

भारत की वर्ष 1952 की राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार मैदानी भू भागों के 33 प्रतिशत भाग में तथा पर्वतीय भागों के 60 प्रतिशत भाग में वन होना, जल व भूमि संरक्षण के लिए आवश्यक है। इतनी स्पष्ट चेतावनी के बाद भी भारत में प्रतिवर्ष 13 लाख हैक्टेयर भू-भाग में वनों का सफाया कर दिया जाता है।

वनोन्मूलन से मृदा अपरदन, बाढ़ व अकाल प्रकोपों में तेजी से तीव्र वृद्धि होती जा रही है। हमारे देश में वनस्पति आवरण के नष्ट होने से प्रतिवर्ष 1% भूमि अनावृत्त हो जाती है। वनोन्मूलन के कारण हिमालय क्षेत्र में वार्षिक वर्षा में 3-4% की कमी हो गयी है और बहुमूल्य वन्य जीवों की कई जातियाँ विलुप्त हो गयी हैं व कई विलुप्त होने की स्थिति में आ गयी हैं।

प्रश्न 16.
सामाजिक वानिकी क्या है?
उत्तर-
वन संरक्षण के लिए जन सहयोग हेतु एक अभिनव योजना सामाजिक वानिकी (Social forestry) प्रारम्भ की गई है। सामाजिक वानिकी के अन्तर्गत पंचायत स्तर पर रेल मार्गों, सड़कों, नहरों के किनारे, बंजर भूमि व पंचायत भूमि पर जन सामान्य व समाज के लिए इमारती व जलाऊ लकड़ी, फल, चारे की पूर्ति हेतु बहुउद्देश्यीय वृक्ष (Multipurpose trees) लगाये जाते हैं।

प्रश्न 17.
चिपको आंदोलन के बारे में लिखें।
उत्तर-
कृषि में आत्मनिर्भरता व पर्यावरण की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिये हमारे देश की कम से कम एक-तिहाई भूमि पर सघन वनों का होना अति आवश्यक है। अतः यह आवश्यक है कि इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये समाज के सभी (व्यक्तिगत, सामुदायिक व प्रशासनिक) स्तरों पर सघन सक्रिय अभियान चलाये जावे। विगत कुछ वर्षों में वन सम्पदा को संरक्षित रखने की दिशा में कई जन आंदोलन प्रारम्भ हुये हैं। हमारे देश में इस आशय को दृष्टान्त सर्वप्रथम अपने ही राज्य राजस्थान में मिलता है। सन् 1731 में जोधपुर के खेजड़ी गाँव की विश्नोई महिला अमृता देवी ने खेजड़ी वृक्ष को न काटने देने व सुरक्षा हेतु आंदोलन चलाया। इस आंदोलन में विश्नोई समुदाय के 363 सदस्य शहीद हुए जिसमें स्वयं अमृता देवी भी सम्मिलित थी। इस घटना से तत्कालीन सरकार को खेजड़ी वृक्ष की कटाई पर कठोर प्रतिबंध लगाना पड़ा। इसी भांति वन संरक्षण में चिपको आंदोलन (Chipko movement) को भी विशेष योगदान रहा है। जो वर्तमान में सुन्दरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में चल रहा है। टिहरी व गढ़वाल क्षेत्र की महिलाओं ने एक नारा दिया है जो चिपको नारे के नाम से जाना जाता है –
क्या है जंगल के उपचार? मिट्टी पानी और बयार।
मिट्टी पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार ।।

RBSE Class 11 Biology Chapter 43 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राकृतिक संसाधन किसे कहते हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं? उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर-
प्राकृतिक संसाधनों को दो भागों में बांट सकते हैं-
1. असमाप्य या अक्षय संसाधन (Inexhaustible resources)-
ये संसाधन प्रकृति में असीमित मात्रा में होते हैं। इनका अधिकतम उपयोग करने के उपरान्त भी ये समाप्त नहीं होते।
उदाहरणार्थ – सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा आदि।

2. समाप्य या क्षय संसाधन (Exhaustible resources)-
इस प्रकार के संसाधन प्रकृति में सीमित मात्रा में होते हैं। यदि इन संसाधनों का अधिक उपयोग किया गया तो ये समाप्त हो सकते हैं। इसलिये इनका उपयोग विवेकपूर्ण विधि से किया जाना चाहिये क्षय संसाधनों को पुनः दो प्रकारों में विभक्त किया जा सकता है

  • नवीकरणीय संसाधन (Renewable resources) – ये प्रकृति के जैविक संसाधन हैं, जैसे कृषि, वन, घास स्थान, जीव-जन्तु इत्यादि। इन संसाधनों को उपयोग में लेने के पश्चात् भी इनकी वृद्धि व पुनः उत्पादन की क्षमता होती है व इन्हें पुनः प्राप्त किया जा सकता है।
  • अनवीकरणीय संसाधन (Non-renewable resources) – ये अजैविक संसाधन होते हैं, इन्हें पुनर्निर्मित नहीं किया जा सकता है। जैसे जीवाश्मों से प्राप्त ईंधन (पेट्रोलियम, कोयला), खनिज धातुएं जैसे तांबा, लोहा, सोना आदि। इनका अंधाधुंध तरीके से उपयोग के पश्चात् ये सदैव के लिये समाप्त हो जाते हैं व इन्हें पुनः प्राप्त करना सम्भव नहीं होगा।
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प्रश्न 2.
जल संसाधने का संरक्षण व प्रबन्धीकरण किस प्रकार किया जाता है तथा वर्षा के जल का प्रबंधीकरण कैसे किया जा सकता है? विस्तार से समझाइये।
उत्तर-
जल संसाधन (Water Resources)
भूमण्डल का प्रमुख घटक जल है। पृथ्वी का 75% भाग जल है। जल को जीवन के साथ अटूट सम्बन्ध है। वायु में जलवाष्प के रूप में तथा मृदा में जल के रूप में मिलता है । महासागरों में जल का अधिकांश भाग मिलता है जो प्रत्यक्ष रूप से अनुपयोगी होता है। ग्लेशियर तथा ध्रुवीय बर्फ के रूप में भी जल मिलता है। इसके अलावा अलवणीय झील, तालाब, सरिता, नदी आदि में जल मिलता है। लगभब 3% प्रतिशत जल का उपयोग मानव द्वारा किया जाता है। जीवों के शरीर का जल एक अभिन्न भाग है तथा जीवन की क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने हेतु नितांत आवश्यक है। मृदा जल पादपों की वृद्धि, जनन क्रियाओं आदि को प्रभावित करता है। किसी स्थान पर उगने वाली वनस्पति के निर्धारण में भी वर्षा जल की महत्वपूर्ण भूमिका है। भूमण्डलीय जल जलवायु को सर्वाधिक प्रभावित करता है।

कुल भूमंडलीय वाष्पीकरण को करीब 84 प्रतिशत भाग समुद्री सतह से तथा 16 प्रतिशत भाग भूमि सतह से वाष्पीकृत होता है कुल वृष्टि का लगभग 77 प्रतिशत भाग समुद्र सतह द्वारा एवं 23 प्रतिशत भाग भूसतह द्वारा प्राप्त किया जाता है। इस तरह भू-सतह पर जल वृष्टि का कुल 7 प्रतिशत भाग ही प्राप्त होता है । इसके अतिरिक्त जल, नदियों द्वारा सतही जल प्रवाह द्वारा समुद्र में वापस हो जाता है। भू-मंडलीय आधार पर, जल चक्र पूर्णतः संतुलित रहता है, क्योंकि कुल वार्षिक वाष्पीकरण, वार्षिक वर्षा के बराबर होता है। जल स्रोतों के मुख्य उपयोग निम्न प्रकार हैं

  1. सिंचाई के लिए
  2. परिवहन
  3. पेयजल प्राप्ति के लिये
  4. हाइड्रोइलेक्ट्रिक बिजली के उत्पादन में
  5. जलीय खेलों (sports) में
  6. नहाने के लिये
  7. औद्योगिक तथा म्यूनसिपलटी के व्यर्थ पदार्थों के बाहर निकालने के लिये
  8. मछली उत्पादन आदि में
  9. रेडियोएक्टिव व्यर्थ को फेंकने हेतु
  10. खनिज पदार्थों के उत्पादन में
  11. सच्चे मोती के उत्पादन में
  12. अगर-अगर, आयोडीन आदि के उत्पादन में।

विश्व स्तर पर कुल जल का लगभग 70% भाग कृषि कार्य हेतु उपयोग में आता है।

(i) जल कृषि (Aqua culture)-
जल के द्वारा नाना प्रकार के खाद्य पदार्थों का उत्पादन किया जाता है। इनमें मछलियों, झींगों, लोबस्टर, केकड़ों का उत्पादन किया जाता है। इन सभी को मनुष्य भोजन के रूप में उपयोग में लेता है। इन प्राणियों के उत्पादन की क्रिया जल कृषि कहलाती है। जल कृषि को भी दो भागों में बांटा गया है
(अ) स्वच्छ जल कृषि (Fresh water culture) – समस्त अलवीणय जल स्रोत जैसे नदियां, झरने, पोखर, झीलें, तालाब इत्यादि स्वच्छ या अलवणीय जल कृषि संसाधन हैं। यहां सिंघाडा, मछलियों इत्यादि की कृषि की जाती है।
(ब) समद्री जल कृषि (Mariculture) – विभिन्न समुद्रों तथा महासागरों में बड़ी मछलियों, भूरी व लाल शैवालों की कृषि की जाती है।

(ii) जल संसाधन का संरक्षण व प्रबंधन के उपाय (Measures for water conservation and management) –
जल संरक्षण के लिये निम्न उपाय किये जाने चाहिये-

  • जल को बहुमूल्य राष्ट्रीय सम्पदा समझकर उसका समुचित नियोजन किया जाना चाहिये।
  • वर्षा जल संग्रहण विधियों द्वारा जल का संग्रहण किया जाना चाहिये। अर्थात् सतह पर प्रवाहित वर्षा जल को भूमिगत करने के लिए प्रेरित करना जल संरक्षण की दिशा में सही कदम है।
  • नदियों पर छोटे-बड़े बांध बनाये जाने चाहिये जिससे बाढ़ नियंत्रण के साथ एकत्रित जल को सिंचाई, पेयजल, बिजली उत्पादन आदि में उपयोग किया जा सके। गांवों में तालाबों का निर्माण करना चाहिये।
  • सिंचाई फव्वारा विधि व टपकन विधि से की जानी चाहिये। नहरों को पक्का करके अपस्रवण की हानि को रोका जाना चाहिये।
  • घरेलू उपयोग में जल की बर्बादी को रोका जाना चाहिये।
  • रसोई में प्रयुक्त पानी को रसोई उद्यान (Kitchen Garden) में प्रयोग किया जाना चाहिये।
  • अधिकाधिक वृक्षारोपण किया जाना चाहिये। अच्छे वन जल का सर्वोत्तम संचय करते हैं। वन ऐसे जलाशय हैं जिनमें कभी भी अवसादन होने की संभावना नहीं है।
  • बाढ़ नियंत्रण व जल के समुचित उपयोग के लिए नदियों को परस्पर जोड़ा जाना चाहिये।
  • भू-जल का अति दोहन नहीं किया जाना चाहिये।
  • जल को प्रदूषित होने से रोकना चाहिये।
  • जल को पुनः चक्रित कर काम में लिया जाना चाहिये।
  • जल संरक्षण के दृष्टिकोण से भवनों में खाली स्थान होना चाहिए तथा छतों के जल को भूमिगत करने के लिए टेंक का प्रावधान होना चाहिये।

इस दिशा में पहला कदम है समाकलित जल संभर प्रबंधन द्वारा जल संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन । दूसरा कदम है वर्षा जल संग्रहण। तीसरा कदम है जल को अप्रदूषित रखना ।

प्रश्न 3.
मृदा का निर्माण कैसे होता है? मृदा अपरदन किसे कहते हैं? यह किन-किन कारणों से होता है? इस पर नियंत्रण के उपाय बताइये।
उत्तर-
मिट्टी या मृदा (Soil)-
भूमि की सबसे ऊपरी परत को मृदा कहते हैं। यह खनिज एवं अपघटित कार्बनिक पदार्थों के संयोग से बनती है। भू-पर्पटी का वह भाग जिस पर पौधे उगे हुए होते हैं-मृदा है। जब चट्टानों का अपक्षय होता है तो मृदा बनती है। मृदा का निर्माण चट्टानों, जलवायु, जीवों, समय व उस स्थल की आकृति के बीच होने वाली पारस्परिक क्रियाओं द्वारा होता है। मृदा, पादप को जल, स्थान, पोषक पदार्थ उपलब्ध करवाकर पादप के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

(i) मृदा के गुण (Properties of soil)-
मृदा अकार्बनिक व कार्बनिक पदार्थ, वायु, जल व विभिन्न जीवों तथा वनस्पतियों के अंश से मिलकर बनी होती है। सामान्यतः मृदा में 40% भाग खनिज कण, 10% कार्बनिक पदार्थ तथा 50% भाग वायु व जल से बनता है।

प्रायः मृदा के निर्माण व कटाव की क्रिया निरन्तर चलती रहती है। किन्तु वृक्षों की कटाई, पशुओं के चरने से भूमि नग्न हो जाती है। जिससे शीर्ष मृदास्तर नष्ट होता है या इसका पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता है। एक इंच मोटे स्वस्थ मृदा स्तर को निर्मित होने में 500-1000 वर्षों तक का समय लगता है।

आपने यह अनुभव किया होगा कि तेज हवा, आँधी, वर्षा के जल के तेज प्रवाह से, मृदा एक स्थान से उड़कर/बहकर दूसरे स्थान पर जमा हो जाती है। इसको मृदा अपरदन (Soil Erosion) कहते हैं। भूमि संरक्षण की सबसे बड़ी समस्या मृदा अपरदन ही है।

(ii) मृदा अपरदन के प्रमुख प्रकार (Main types of soil erosion)-
मृदा हानि की दर के आधार पर मृदा अपरदन दो प्रकार का होता है
(अ) स्वाभाविक अपरदन : यह अपरदन स्वाभाविक प्राकृतिक परिस्थितियों में होता है। इसमें मानव का प्रत्यक्ष या परोक्ष हस्तक्षेप नहीं
होता है। यह एक धीमी प्रक्रिया है और अपरदन से हुई मृदा हानि की दर व मृदा नवीनीकरण (renewal) की दर लगभग समान होती है।
(ब) त्वरित मृदा अपरदन : इसमें अपरदने शीघ्रता से होता है। और मृदा नवीकरण से कहीं अधिक तेज दर से होता है। इसमें मृदा की गम्भीर हानि होती है। यह प्रायः मानव व जन्तुओं द्वारा होता है।

(iii) मृदा अपरदने के कारक (Factors of soil erosion)-
मृदा अपरदन के विभिन्न कारक हैं और इनके द्वारा मृदा हानि की प्रक्रिया भी अलग-अलग प्रकार की होती है
(अ) जल अपरदन : यह अपरदन जल की क्रिया के कारण होता है। जल बूंदों के मृदा पर गिरने से मृदा अपने स्थान से हट जाती है। जल प्रवाह अपने साथ मृदा के सतह स्तर को बहा ले जाता है। यह चार प्रकार का होता है।

  • परत अपरदन (Sheet Erosion) : जल प्रवाह द्वारा भूमि के बड़े क्षेत्र से मृदा एक परत के रूप में हट जाती है।
  • रिल अपरदन (Rill Erosion) : रिल अपरदन में जल प्रवाह से मृदा सतह पर प्रवाह की दिशा में मृदा हटने से, अंगुली सदृश्य खाँचे या रिलें बन जाती हैं।
  • अवनालिका अपरदन (Gully Erosion) : कई रिलों के संयोजित होने से अपेक्षाकृत चौड़ी खाँच या संकरी नालियाँ, ढलान पर बन जाती हैं इन्हें अवनालिकाएँ (gullies) कहते हैं। अधिक वर्षा में अवनालिकाएँ पर्याप्त गहरी हो जाती हैं।
  • नदतटीय अपरदन (Riparian Erosion) : यह तेजी से बहने वाली नदियों के तटों पर होता है। जल की सतही धारा तटों को पाश्र्वी दिशा में काटती जाती है। धारा स्तर वाला तट जब पर्याप्त गहरा कट जाता है तो इसके ऊपर की मृदा एक साथ बड़े खण्ड के रूप में नदी में गिर पड़ती है।

(ब) वायु अपरदन (Wind Erosion) : शुष्क (arid) क्षेत्रों में जहाँ वनस्पति बहुत कम अथवा नहीं होती है और मृदां सूखी होती है। वहाँ मृदा का अपरदन वायु द्वारा ही होता है। हमारे देश की लगभग 50 लाख हैक्टेयर भूमि जिसमें राजस्थान का भी अधिकांश भाग आ जाता है-वायु अपरदन से प्रभावित है। विवेकहीन वृक्ष कटाई व पशुओं की चराई से नष्ट वनस्पति के कारण, अधिकांश भूमि अनावृत है जिस पर तेज वायु व आंधियों का प्रभाव होता है।

(iv) मृदा प्रबंधन या संरक्षण (Soil management or Conservation)-
मृदा संरक्षण व प्रबंधन तीन उद्देश्यों की पूर्ति करने वाला होना चाहिये-
(अ) भूमि सतह पर मृदा जिस स्थिति में है उसी स्थिति में बनी रहे।
(ब) इसका पोषक स्तर वांछनीय स्तर से कम न हो।
(स) भूमि से सम्बन्धित मानव समुदाय को पारितंत्र (ecosystem) संतुलन व मृदा संरक्षण की महत्ता के बारे में जागरूक करना।

भूमि प्रबंधन का प्रमुख चरण उन भौतिक व जैविक बलों को कम करना है जो मृदा अपरदन के कारक हैं। अनावृत्त भूमि सतह को, वनस्पति आवरण परिवर्धित कर, आवरित करता है। अपरदन को रोकने यो कम करने का एकमात्र उपाय ही पादप आवरण है। यह पादप आवरण आर्थिक उपयोगिता वाला होना चाहिये जिससे खाद्य, चारा, औषधि व अन्य उपयोगी पदार्थ प्राप्त होते रहें।

भूमि संरक्षण कई मूल सिद्धांतों पर आधारित है-

  • वर्षा बूंद के प्रहार से मृदा को संरक्षित करना,
  • ढलानों पर संकरे पथों से होने वाले जल प्रवाह को अवरुद्ध करना,
  • ढलानों पर बहन वाले जल के प्रवाह की गति को धीमा करना,
  • मृदा में अधिकाधिक जल का भूमि में अंत:स्त्रवण (भूमि में गहराई की ओर रिसना) को प्रोत्साहित करना,
  • मृदा कण आकार को बढ़ाना,
  • पादप आवरण उगाकर,
  • भूमि सतह के स्तर पर, वायु वेग को कम करना,
  • ऐसी वनस्पतियों को लगाना जो मृदा के उड़ते/बहते कणों को अटका सकें।

(v) मृदा संरक्षण की विधियाँ (Methods of soil conservation)-
विभिन्न विधियों को दो वर्गों में वर्गीकृत किया गया
(अ) वनस्पति आवरण द्वारा भू-संरक्षण-इसे जैविक विधि (Biological method) कहते हैं।
(ब) भौतिक संरचनाएँ बनाकर भू-संरक्षण करना-सामान्यतया ये विधियां जैविक विधि की संपूरक विधियों के रूप में प्रयुक्त होती हैं। इन्हें भौतिक विधियाँ या यात्रिक विधियाँ (mechanical methods) कहते हैं।

(अ) जैविक विधियाँ (Biological Methods)- ये निम्न प्रकार की होती है-

  • सस्य वैज्ञानिक विधि (Agronomic practices)-
    इसका उपयोग सामान्य कृषि क्षेत्रों में किया जाता है। यहाँ वनस्पति स्वयं मृदा संरक्षक होती है। इस विधि में वनस्पति को इस प्रकार से उगाते हैं कि मृदा-हानि कम हो। यह चार प्रकार की हैं
  • परिरेखा कृषि (Contour Farming)-
    कम वर्षा वाले क्षेत्रों में फसल बोने से पूर्व, खेतों में एकान्तर क्रम में उसी स्तर पर खाँचे व कटकें (furrows and ridges) बना देते हैं। समान स्तर पर बनायी गयी कटकों को परिरेखा या कंटूर (Contour) कहते हैं। वर्षा का जल खाँचों में भरता रहता है और इसका प्रवाह वेग कम हो जाता है। अतः अपरदन कम होता है। कटकों पर फसली पौधों को लगा देते हैं।
  • मल्च बनाना (Mulching)-
    यह विधि वायु व जल अपरदनों को कम करती है। शाक पौधों जैसे कि दालों के पौधों के मूलतंत्र सहित तने के आधार भाग को ढूंठ के रूप में फसल काटते समय खेत में पंक्तियों में छोड़ देते हैं। फसली पौधों को, ढूंठ पंक्तियों के, एकान्तर लगाते हैं। यह देंठ पंक्ति मक्का, कपास, तम्बाकू, अरहर, आलू आदि की भी हो सकती है। इँठ पंक्तियाँ मृदा-नमी के वाष्पन को रोकती है। और कार्बनिक पदार्थ मृदा को देती है जिससे मृदा में नमी का अनुपात बढ़ जाता है।
  • फसल चक्र (Crop Rotation)-
    खेत में एक फसल को कई वर्षों तक उगाने से उस खेत की मृदा में पोषक तत्त्वों की कमी हो जाती है। इसलिये जलवायु के अनुसार दो या तीन फसलों को एक के बाद एक क्रम में उगाते हैं। इसे फसल चक्र कहते हैं। चक्र में कम से कम एक फसल लैग्यूम फसल होनी चाहिये। लैग्यूम (जैसे दालें, चना, मेथी, रजका आदि) के पौधों की जड़ों में राइजोबियम (Rhizobium) जीवाणुयुक्त ग्रंथिकाएँ (nodules) होती हैं। ये जीवाणु वायुमण्डल की नाइट्रोजन का यौगिकीकरण (fixation) कर, इसे नाइट्रेट में बदलते हैं। जो पौधों को सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं।
  • पट्टीदार खेती (Strip Cropping)-
    इस प्रकार की खेती में फसलों की चौड़ी पट्टिकाओं के प्रतिरूप में उगाते हैं। यह कम ढलान वाली भूमि के लिये उपयुक्त रहती है। पट्टिकाएँ ढलान से 90° के कोण पर बनायी जाती हैं या वायु की दिशा में 90° कोण पर बनायी जाती हैं।
  • शुष्क खेती (Dry Farming)-
    इस प्रकार की खेती अनिश्चित व कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिये उपयुक्त है। इसमें अपरदन रोकने के लिये घास, चारा, रजका आदि उगाते हैं।
  • घास वैज्ञानिक विधि (Agrostological Method)-
    अनेक घासों में कम लम्बा परन्तु सघन, प्रसारित रेशेदार मूलतन्त्र होता है जो सतही मृदा को सफलतापूर्वक आवंधित कर लेता है। ऐसी घासे 98% अपरदन रोकने में समर्थ हैं। पर्वतों के ढलानों पर बनी अवनालिकाओं में ऐसी घासें जैसे सायनोडॉन डेक्टीलॉन (Cyanodon dactylon) व सेकेरम बेंगालेन्सिस (saccharum bengalensis) पट्टिका रूप में लगाते हैं। कम ढलान वाली कृषि भूमि में घास-फसल चक्र का उपयोग करते हैं। इसे स्तर कृषि (Layer farming) कहते हैं। ऐसी भूमि में जहाँ शीर्ष मृदा अधिकांशतः अपरदित हो चुकी हो, वहाँ चराई योग्य घासों को लगाते हैं।

(ब) भौतिक विधियाँ (Mechanical Methods)
यह विधियाँ, जैविक विधियों की संपूरक (supplementary) हैं-

  • बेसिन या दोणी बनाना (Basin filling)-
    परिरेखा (contours) के साथ-साथ अवतली द्रोणियाँ (प्यालेनुमा गर्त) बना देते हैं जो जल को रोके रखती हैं और जल प्रवाह के वेग को कम करती हैं।
  • वेदिका फार्म (Terrace Farms)-
    जहाँ ढाल अधिक नहीं होता है, वेदिका फार्म बनाकर कृषि की जाती है। ढाल की विभिन्न ऊँचाइयों पर पर्याप्त चौड़ाई के समतल स्थल खण्ड बना दिये जाते हैं जिन्हें वेदिका (Terrace) कहते हैं। जहाँ वेदिको के अगले किनारे समाप्त होते हैं, इसके नीचे ऐसी ही दूसरी वेदिका बनाते हैं। इस प्रकार दो वेदिकाओं के मध्य ढलान लगभग उदग्र हो जाता है। वेदिका के किनारों पर भूमि को आबंधित कने वाली घास जातियाँ लगा देते हैं। व शेष भाग में फसली पौधे लगाते हैं। इस प्रकार जल प्रवाह कम हो जाता है और मृदा स्थायी बनी रहती है। दूर से देखने पर वेदिका कृषि, सीढ़ी समान दिखाई देती है।
  • नदी तट संरक्षण (River Bank Protection)-
    नदी के मोड़ वाले तट पर, बड़े पत्थरों की ढलान वाली चुनाई कर देते हैं ताकि तट का कटान नहीं हो पाये। सीधे तटों पर दोनों ओर वृक्षों की सघन पंक्तियां लगा देते हैं।

प्रश्न 4.
नम भूमि किसे कहते हैं? यह कितने प्रकार की होती। है? विस्तार से समझाइये।
उत्तर-
नमभूमि (Wetlands)-
नम भूमि वे क्षेत्र हैं जो कम गहरे या छिछले जल में डूबे रहते हैं। इनमें पाई जाने वाली वनस्पति पानी के प्रति अनुकूलित रहती हैं। नम भूमि अलवणीय या लवणीय जलयुक्त हो सकती है।
नम भूमि तीन प्रकार की होती है
(अ) कच्छ भूमि ( दलदल ) (Marshes) – इसमें घास के समान पादप होते हैं।
(ब) अनूप भूमि (Swamps) – इस प्रकार की भूमि में वृक्ष तथा झाड़ियां पाई जाती हैं।
(स) नदी तट (Riverine) – ये निचले क्षेत्रों में नदियों के किनारे पर पाए जाते हैं।
नम भूमि पूरे विश्व की भूमि सतहों का 6 प्रतिशत भाग पर स्थित है। जल की प्रकृति के आधार पर नम भूमि दो प्रकार की होती है।

(i) अलवणीय जल नम भूमि (Fresh water wetland) –
नम भूमि में रहने वाले पौधे अधिक उत्पादन करते हैं तथा वहां रहने वाले जीवों को भोजन व आश्रय प्रदान करते हैं। इस प्रकार की भूमि बाढ़ आने पर जल संचित करके बाढ़ पर नियंत्रण करती है वे फिर यहाँ से जल धीरे-धीरे नदी में चला जाता है व इस प्रकार वर्ष भर नदियां प्रवाही बनी रहती हैं। नम भूमि दूषित जल व बहते जल को स्वच्छ रखती है। इस भूमि में फल (काली व नीले बेरी), जंगली चावल, माँस (Mosses) आदि की खेती भी की जाती है।

(ii) लवणीय जल नम भूमि (Salt water wetland) –
समुद्र तट के किनारे लवण जल की अधिकता वाली भूमि लवणीय जल भूमि होती है। यह समुद्री जीवों को आश्रय व भोजन प्रदान करती है।

इस प्रकार के उपयुक्त उदाहरण मैंग्रोव (mangrove) वनस्पति के हैं। यह वनस्पति ज्वारीय क्षेत्रों में अधिक पनपती है। ज्वार आने पर ये तने तक जल में डूब जाती है व भाटा होने पर जल इनकी जड़ों तक रह जाता है। मैंग्रोव पादपों जैसे राइजोफोरा, एवीसीनिया व अन्य की जड़ों में जलीय जीव जैसे सीप, केकड़ा आदि अपना आवास बनाते हैं व पेड़ों की टहनियों पर पक्षीय घोंसला बनाते हैं। इस भूमि को तटीय कृषि विकास उपयोग व जलाने की लकड़ी प्राप्त करने के लिये किये गये कायों द्वारा अधिक हानि हुई है।

(iii) नम भूमि का संरक्षण एवं प्रबंधन (Wetland conservation & Management) –
नम भूमि के संरक्षण के लिए निम्न उपाय किये जा सकते हैं

  • नम भूमि वाले क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट पदार्थों को डालने पर रोक लगानी चाहिए।
  • उपयोगी नम भूमि की पहचान कर उसका संरक्षण करना चाहिए।
  • नम भूमि में स्थित पोषक तत्वों के बहकर न जाने के उपाय करने चाहिए।

प्रश्न 5.
ऊर्जा संसाधन कितने प्रकार के होते हैं? प्रत्येक को विस्तार से समझाइये।
उत्तर-
ऊर्जा संसाधन (Energy Resources)-
जीवन के लिये ऊर्जा अधिक आवश्यक है अर्थात् यह जीवन का संचार है। ऊर्जा को हम अनेक माध्यमों से प्राप्त करते हैं जैसे कोयला, आण्विक ऊर्जा, प्राकृतिक गैसें, पेट्रोलियम इत्यादि । ऊर्जा के माध्यम से कृषि, उद्योग धंधे एवं घरेलू कार्य किये जाते हैं । ऊर्जा संसाधन दो प्रकार के होते हैं

(i) नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable energy)-
इसमें उन स्रोतों को सम्मिलित किया जाता है जो प्रकृति ने हमें असीमित मात्रा में दिये हैं। ये कभी समाप्त नहीं हो सकते व प्रत्येक स्थान पर उपलब्ध हैं? जैसेसौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जैव ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भूगर्भ ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा आदि ।

  • सौर ऊर्जा (Solar energy)-
    सूर्य शाश्वत है, सत्य है तथा मानव सभ्यता की उत्पत्ति से भी पहले से है। सूर्य की ऊर्जा कभी समाप्त नहीं हो सकती। वर्तमान में ऊर्जा की खपत बढ़ने से सौर ऊर्जा को तापीय ऊर्जा में बदलकर उपयोग करना प्रारम्भ किया गया है। इस ऊर्जा को सोलर कुकर, सोलर वाटर हीटर, सौर वायु तापक, सौर हरित गृह, सौर पम्प आदि में काम लिया जा रहा है। सौर ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित कर रेडियो, टेलिविजन एवं अन्य सभी विद्युत उपकरण चलाये जा रहे हैं । विश्व में विशालतम सौर भट्टी लास एंजिल्स (अमेरिका के मोजाक मरुस्थल, लुज में स्थापित) में है। यहां विश्व की 92% सौर विद्युत ऊर्जा का उत्पादन होता है।
  • पवन ऊर्जा (Wind energy)-
    वे स्थान जहां तेज हवायें चलती हैं वहां पवन चक्कियां चलाकर पवन विद्युत ऊर्जा उत्पन्न की जाती है। विश्व का विशालतम पवन शक्ति जेनरेटर (3000 कि. वाट) जर्मनी के फीजियन तट पर स्थापित है।
  • जलीय ऊर्जा (Hydro Energy)-
    जल को ऊँचाई से गिराकर स्थितिज ऊर्जा को गतिज ऊर्जा में बदलकर टरबाइन द्वारा विद्युत का उत्पादन किया जाता है। यह ऊर्जा तापीय विद्युत संयंत्र द्वारा बनाई गई विद्युत से सस्ती होती है। आज अनेक देशों में गिरते हुये पानी से ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है। उदाहरण के लिये नार्वे में 99% विद्युत आपूर्ति जल विद्युत उत्पादन से होती है। इसी प्रकार ब्राजील, न्यूजीलैंड और स्विट्जरलैण्ड में भी दो तिहाई विद्युत, जल शक्ति द्वारा पैदा की जाती है।
  • ज्वारीय ऊर्जा (Tidal energy)-
    समुद्रों में जब जल चढ़ता है तो ज्वार व पानी के नीचे उतरने को निम्न ज्वार कहते हैं। इससे प्राप्त ऊर्जा का उपयोग विद्युत उत्पादन में किया जाता है।
  • भूतापीय ऊर्जा (Geothermal energy)-
    भूमि पर स्थित गर्म जल की धाराओं तथा गर्म जल के झरने से टरबाइन चलाकर विद्युत का उत्पादन किया जाता है।
  • समुद्री तरंगों की ऊर्जा (Sea wave energy)-
    समुद्रों में हवा के द्वारा बनने वाली लहरों या तरंगों में टरबाइन चलाकर बिजली का उत्पादन किया जाता है।

(ii) अनवीकरणीय ऊर्जा (Non-renewable energy)-
ये वे स्रोत हैं जो पृथ्वी पर उपस्थित हैं, लेकिन इनकी मात्रा सीमित है। एक लम्बे समय में प्राकृतिक प्रक्रियाओं से ही ये स्रोत विकसित हुए हैं। इनका दोहन एवं इन्हें उपयोग योग्य बनाने वाली प्रक्रिया के कारण इन्हें व्यावसायिक स्रोतों की श्रेणी में रखा गया है जैसे-कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस। (यह जीवाश्मीय ऊर्जा भी है), परमाणु ऊर्जा आदि।

  • जीवाश्म ईंधन (Fossil fuel)-
    इसमें जीवाश्मों से प्राप्त होने वाले ऊर्जा स्रोत आते हैं। जैसे कोयला, पेट्रोलियम, उत्पाद आदि विश्व में कोयला, पेट्रोलियम के भण्डार सीमित हैं तथा इनकी खपत अधिक है। यदि इनका इसी तरह उपयोग किया जाये. तो एक दिन ये समाप्त हो जाएंगे। इसलिये इनका उपयोग सीमित मात्रा में ही किया जाना चाहिए।
  • परमाणु ऊर्जा (Atomic energy)-
    यूरेनियम, थोरियम आदि ऐसी धातुएँ हैं जिनके परमाणु केन्द्र में ऊर्जा छिपी होती है। इसे परमाणु ऊर्जा कहते हैं। इसका उत्पादन विखण्डन और संगलन क्रियाओं द्वारा किया जाता है। विखण्डन क्रिया में एक बड़ा अणु टूटकर छोटे परमाणुओं में विभाजित होता है। जबकि संगलन में हल्के परमाणु मिलकर एक बड़ा अणु बनाते हैं। इन दोनों क्रियाओं में ऊर्जा उत्पन्न होती है। इसे परमाणु या नाभिकीय ऊर्जा कहते हैं।

(iii) ऊर्जा संसाधन का संरक्षण एवं प्रबंधन (Conservation and management of energy resources)-

  • नवीकरणीय संसाधनों को अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए।
  • पेट्रोल के नए स्रोत व भण्डारों की खोज करनी चाहिए एवं इनका प्रयोग सीमित करना चाहिए।
  • सौर ऊर्जा का अधिक उपयोग किया जाना चाहिए।
  • गैसोलीन में 20 प्रतिशत एथेनाल, मिलाकर उसकी खपत में कमी की जा सकती है।
  • गोबर गैस प्लांट लगाने को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • जैव ईंधन के प्रयोग को प्रोत्साहित करना चाहिये।

प्रश्न 6.
ऊर्जा संसाधन का संरक्षण व प्रबंधीकरण कैसे किया जाता है? समझाइये।
उत्तर-
ऊर्जा संसाधन का संरक्षण एवं प्रबंधन (Conservation and management of energy resources)-

  • नवीकरणीय संसाधनों को अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए।
  • पेट्रोल के नए स्रोत व भण्डारों की खोज करनी चाहिए एवं इनका प्रयोग सीमित करना चाहिए।
  • सौर ऊर्जा का अधिक उपयोग किया जाना चाहिए।
  • गैसोलीन में 20 प्रतिशत एथेनाल, मिलाकर उसकी खपत में कमी की जा सकती है।
  • गोबर गैस प्लांट लगाने को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • जैव ईंधन के प्रयोग को प्रोत्साहित करना चाहिये।

प्रश्न 7.
वनों के उपयोग बताइये।
उत्तर-
वन संसाधन (Forest Resources)-
वन, वृक्षों, झाड़ियों और अन्य काष्ठीय वनस्पति का एक सघन जैविक समुदाय है। वनों के संगठन व सघनता में बड़ी विभिन्नताएं मिलती हैं। हमारी सभ्यता व संस्कृति के वन व वन वृक्ष अभिन्न अंग हैं। अनेक धार्मिक पर्वो पर वृक्षों (पीपल, बरगद) की पूजा की जाती है। आम, पीपल, बरगद, चम्पा, भोजपत्र, कल्पवृक्ष, बेलपत्र के पादप मंदिरों व स्वच्छ जल के स्रोतों के आस-पास लगाना आज भी शुभ माना जाता है। प्राचीनकाल से ही वनों से हमारी आवश्यकताएं पूरी होती थीं, आज भी मानव वनों पर किसी न किसी प्रकार निर्भर है। अनेक आदिम जातियां अभी भी वनों में निवास करती हैं व पूर्ण रूप से वनोत्पाद पर ही निर्भर हैं। वन किसी भी देश की अमूल्य निधि है व अधिकांश विकास योजनाएं व आर्थिक उन्नति वनों पर ही निर्भर करती हैं।

यद्यपि भारत एक कृषि प्रधान देश है फिर भी वनों को आर्थिक व्यवस्था में विशेष महत्व है। वनों से हमें फल, फूल, चारा, इमारती व जलाऊ लकड़ी, कोयला, गोंद तथा कत्था इत्यादि प्राप्त होते हैं। वनों से प्राप्त जड़ी-बूटियों पर आधारित चिकित्सा पद्धतियों का आज भी प्रचलन है। इनमें ऐसे रसायनों का पता लगाया गया है जो सामान्य रोगों से लेकर केंसर व एड्स जैसे भयावह रोगों के उपचार में भी कारगर सिद्ध हुए हैं। वन कई उद्योगों जैसे कागज, लाख, दियासलाई, धागे, वस्त्र, रबर, रंजक इत्यादि में कच्चा माल उपलब्ध करवाते हैं। पशुओं के लिए चरागाह व लोगों को रोजगार भी वनों से प्राप्त होता है।

वन प्राकृतिक संतुलन बनाये रखने में विशेष भूमिका निभाते हैं। जो पर्यावरण की दृष्टि से पृथ्वी पर जीवन को बनाये रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं जैसे

  • वन वायुमण्डल से हानिकारक गैसों जैसे-कार्बनडाइऑक्साइड, सल्फर डाईऑक्साइड व नाइट्रोजन ऑक्साइड का अवशोषण कर वातावरण को स्वच्छ रखते हैं।
  • वायुमण्डल में CO2 व ऑक्सीजन का संतुलन बनाये रखते हैं।
  • भूमिगत जल के वाष्पन को रोकते हैं एवं वायुमण्डलीय आर्द्रता को बनाये रखते हैं।
  • भूमि की उर्वरता को बढ़ाते हैं।
  • मृदा अपरदन (soil erosion) व वर्षा के तेज जल बहाव को रोकते हैं।
  • वन्य जीवों को आवास व भोजन उपलब्ध करवाकर उनका संरक्षण करते हैं।

प्रश्न 8.
वनों के विन्यास के कारण बताइये।
उत्तर-
वन घने होते हैं अतः सूर्य के प्रकाश का वितरण अलगअलग प्रकार के होते हैं। वन समुदाय में यह विन्यास अधिक जटिल होता है। विन्यास के आधार पर वनस्पति के उदग्र स्तर वन बन जाते हैं। इससे वनस्पति में स्पष्ट उदग्र, एक के बाद एक क्रम में स्तर पाये जाते हैं। जैसे किसी वन में यह विन्यास पांच स्तरों में मिलता है-अर्द्धभूमिगत स्तर, वन फर्श, शाक वनस्पति, क्षुप व वृक्ष स्तर आदि। इन स्तरों में प्रकाश, वायु व तापक्रम मुख्य कारक होते हैं।

प्रश्न 9.
वनोन्मूलन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
वनोन्मूलन (Deforestation)-
हमारे देश में बढ़ती हुयी। जनसंख्या तथा घरेलू पशुओं की बढ़ती हुयी आबादी, इमारती काष्ठ व ईंधन की बढ़ती हुई खपत, कृषि उत्पादन के लिये अधिक भूमि की आवश्यकता, घरेलू पशुओं द्वारा अधिक चारण वे चराई वनोन्मूलन के कुछ प्रमुख कारण हैं। घाटी-बाँध योजनाएँ, औद्योगिक प्रसार व पर्वतीय वन क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण ने भी वनों को नष्ट किया है। नई पद्धतियों से भी वनों का क्षेत्र कम हो रहा है। झूम खेती (Jhum cultivation) का प्रचलन उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में बढ़ रहा है। इस प्रकार की खेती में वनों के कुछ क्षेत्र में वृक्षों को काटकर जलाया जाता है, जिससे भूमि की उर्वरता; राख के कारण बढ़ती है। कृषक ऐसे स्थल पर दो या तीन फसल लेने के बाद मृदा की उर्वरता कम होने के कारण उस क्षेत्र को छोड़कर नये वन क्षेत्र में ऐसी ही प्रक्रिया अपनाते हैं इस कारण झूम खेती को स्थानान्तरी खेती (Shifting cultivation) भी कहते हैं। कभी-कभी मानव की असावधानी से या प्राकृतिक कारणों से वनों में भयंकर आग लग जाने के कारण भी वनों का एक बड़ा क्षेत्र नष्ट हो जाता है।

भारत की वर्ष 1952 की राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार मैदानी भूभागों के 33 प्रतिशत भाग में तथा पर्वतीय भागों के 60 प्रतिशत भाग में वन होना, जल व भूमि संरक्षण के लिए आवश्यक है। इतनी स्पष्ट चेतावनी के बाद भी भारत में प्रतिवर्ष 13 लाख हैक्टेयर भू-भाग में वनों। का सफाया कर दिया जाता है।

वनोन्मूलन से मृदा अपरदन, बाढ़ व अकाल प्रकोपों में तेजी से। तीव्र वृद्धि होती जा रही है। हमारे देश में वनस्पति आवरण के नष्ट होने से प्रतिवर्ष 1% भूमि अनावृत्त हो जाती है। वनोन्मूलन के कारण हिमालय क्षेत्र में वार्षिक वर्षा में 3-4% की कमी हो गयी है और बहुमूल्य वन्य . जीवों की कई जातियाँ विलुप्त हो गयी हैं व कई विलुप्त होने की स्थिति में आ गयी हैं।

प्रश्न 10.
वनों के संरक्षण एवं प्रबन्धन का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
वन प्रबंध (Forest Management)-
वनों से प्राप्त अनेकों उत्पादों को उन्नत व अधिक अनुपात में प्राप्त करने के लिये पारिस्थितिकीयसिद्धांतों का वन क्षेत्रों में अनुप्रयोग (application) वन प्रबन्ध कहलाता है।

पारिस्थितिकीय – सिद्धांतों के आधार पर इमारती व औद्योगिक काष्ठ वाले वृक्षों के वनों का स्थायीकरण, उनकी वृद्धि व प्रसारण, आनुप्रयोगिक पारिस्थितिकी की एक विशेष शाखा के अन्तर्गत किया जाता है। इस शाखा को वन-वर्धन (Ci lvi culture) कहते हैं। हमारे देश में कई भागों में वनवर्धन विज्ञानियों ने टीक, साल, चीड़, शीशम, यूकेलिप्टस आदि के कृत्रिम वन लगाये हैं। वर्तमान में कुल वन क्षेत्र का 13% भाग इन कृत्रिम वनों का ही है। वन प्रबन्ध के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  • इमारती काष्ठ या अन्य आर्थिक महत्व के वृक्षों को उन्नत बनाना व वनों में उनकी संख्या में वृद्धि करना।
  • वन में जल चक्र को बनाये रखना।
  • वन क्षेत्रों में खुले स्थलों पर चरागाह विकसित करना ।
  • वन्य जीवों का संरक्षण व उनकी आबादी बढ़ाना।
  • अभिगमन करने वाले पक्षियों के लिये भूमि की सामान्य सतह से निचले भागों को आवास-स्थल में बदलना।
  • वनों की स्वच्छता व सौन्दर्य में वृद्धि।

वन संरक्षण (Forest Conservation)-
तीव्रगति से हो रहे वन विनाश को कम करने के लिये तथा भविष्य में इससे उत्पन्न भयंकर दुष्परिणामों को न होने देने के लिये, योजनाबद्ध प्रक्रियाएँ आवश्यक हैं। वन संरक्षण की कुछ विधियाँ निम्न प्रकार से हैं

  • वर्तमान वन क्षेत्र का लगभग एक-तिहाई क्षेत्र ऐसा है जिसमें ऊँचे व बड़े आकार के वृक्ष नहीं हैं। इन क्षेत्रों में बड़े-वृक्षों का रोपण कर, वन आवरण की सघनता व मोटाई दोनों को बढ़ाना होगा।
  • वह भूमि जो पारिस्थितिक असंतुलन के कारण अब कृषि योग्य नहीं है या उपजाऊपन की दृष्टि से निम्न कोटि की है। उसमें वन वृक्ष लगाने चाहिये। हमारे देश में ऐसी भूमि लगभग 87 मिलियन हैक्टयर है। इसमें से 60% भूमि वनारोपण के लिये उपयुक्त है।
  • संवर्धन की दृष्टि से उपयुक्त लेकिन व्यर्थ भूमि, पड़ती भूमि, जलाक्रांत भूमि, अम्लीय व क्षारीय भूमि में उपयुक्त मृदा सुधार के उपायों का अनुप्रयोग कर, विशिष्ट वृक्षों व झाड़ियों का रोपण करना चाहिये।
  • सड़क मार्गों व रेल मार्गों के दोनों ओर तथा कृषि फार्मों के चारों ओर वृक्षों को पंक्तियों में लगाना चाहिये।
  • गाँवों के आस-पास, विद्यालय प्रांगणों में, प्रशासकीय इमारतों के अहातों में, ईंधन वृक्ष लगाये जा सकते हैं।
  • अवैधानिक व अनियोजित रूप से वृक्षों की कटाई को रोकने के लिये कानूनों व नियमों का कड़ाई से पालन करना होगा। ऐसे उद्योग जो मूल रूप से काष्ठ आधारित हैं (कागज, रेयॉन, फर्नीचर, जहाजरानी आदि) उनके द्वारा उपयोग में लाये गये वृक्षों से 15-20 गुना उसी जाति के वृक्षों को लगाना अनिवार्य कर दिया जावे।
  • ईंधन को बेकार या व्यर्थ में न जलने दिया जाय। ईंधन स्त्रोतों का उपयोग मितव्ययिता से किया जाये। ऊर्जा के अन्य स्त्रोतों जैसे बायोगैस, सौर ऊर्जा, प्राकृतिक गैस (LPG) आदि को पूरक ऊर्जा स्त्रोत के रूप में प्रोत्साहित किया जाये। इन ऊर्जा स्त्रोतों के उपकरणों को सस्ता व सहज उपलब्ध कराया जावे।।
  • जल संभरण (watershed) क्षेत्र वाले वृक्षों को न काटा जाये।
  • वन वृक्षों की कटाई व नवोभिदों (Sapling) के रोपण की दर लगभग समान होनी चाहिये।
  • वन क्षेत्रों को आरक्षित व रोगाणुमुक्त किया जाये, अतिचारण को कम किया जावे तथा एक जाति वृक्ष संवर्धन (Mono culture trees) के स्थान पर मिश्रित वृक्षों को प्राथमिकता दी जाए।
  • आधुनिक वन-प्रबंध की विधियों-जैसे कि समुचित जल व्यवस्था, उर्वरकों का उपयोग, तरुण पादपों के मूलतंत्र क्षेत्र में व मूल में उपयुक्त कवकमूलों (Mycorrhiza) का निवेशन (inoculation), वृक्षों के रोग व पीड़कों का नियंत्रण, उन्नत वृक्षों में प्रजनन व ऊतक-संवर्धन तकनीक का अनुप्रयोग कर, वन वृक्षों को स्वस्थ, उन्नत व अधिक उत्पादकता वाला बनाया जा सकता है।
  • इमारती काष्ठ के वृक्षों की उन जातियों में जिनमें कि पुनरुद्भवन की क्षमता हो, भूमि सतह के स्तर पर न काटा जावे और ने ही इसका समूल उन्मूलन किया जावे। ऐसे वृक्षों के मुख्य स्तम्भ को भूमि से 1 मीटर ऊँचाई पर काटते हैं। मूलतंत्र द्वारा स्थिर कटे भाग से कई शाखाएँ प्रस्फुटित हो जाती हैं। इस विधि को गुल्मवन विधि (Coppice system) कहते
  • वन उन्मूलन की हानियों व वन आरोपण के महत्व को प्रत्येक नागरिक तक पहुँचाने के लिये जन सम्पर्क द्वारा प्रचार करने की आवश्यकता है।
  • वनारोपण में होने वाले व्यय को कम करने के लिए टांग्या विधि” (Taungya System) अपनायी जानी चाहिए। इस विधि में भूमिहीन कृषकों को वन क्षेत्र में कृषि करने की अनुमति दी जाती है। इसके अन्तर्गत वृक्षों के लिए नालियाँ बनाकर मध्य के खाली भाग में फसल बोई जाती हैं।

वनों के संरक्षण एवं विकास हेतु 1988 में वन नीति को संशोधित कर वनों को सुरक्षित वन, राष्ट्रीय वन, ग्राम्य वन एवं वृक्ष वन चार श्रेणियों में बांटा गया है। 1952 में ही वन महोत्सव की परम्परा डालकर नागरिकों को वृक्षारोपण कार्यक्रमों में भागीदारी के लिये प्रोत्साहित किया गया है । वन अनुसंधान के लिये देहरादून (उत्तरांचल) में वन अनुसंधान संस्थान (forest research Institute=FRI) की स्थापना की गई है।

  • सामाजिक वानिकी प्रोग्राम (Social Forestry Programme): यह प्रोग्राम 1976 में प्रारम्भ किया गया था । मृदा व जल संरक्षण के लिये आवश्यक, वर्तमान सघन वनों को बचाने के लिये, इस प्रोग्राम के अन्तर्गत ग्रामीण अंचलों में ग्रामीण उपादेयता की दृष्टि से सार्वजनिक व अन्य स्थानों पर उपलब्ध भूमि पर चारा, ईंधन व लघु काष्ठीय वृक्षों को लगाया जा रहा है। इस प्रोग्राम में ग्रामीण आबादी के लिये बहु-उपादेयता वाले वृक्षों (ईंधन, चारो, फल, कृषि औजारों के लिये उपयुक्त काष्ठ प्रदान करने वाले) को नर्सरी में उगाना, उनका आरोपण व संरक्षण सम्मिलित है। इसके अतिरिक्त कृषि वानिकी प्रोग्राम (Agroforestry programme) तथा नगरीय वानिकी प्रोग्राम (Urban forestry programme) चलाये गये हैं।
  • कृषि में आत्मनिर्भरता व पर्यावरण की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिये हमारे देश की कम से कम एक-तिहाई भूमि पर सघन वनों का होना अति आवश्यक है। अतः यह आवश्यक है कि इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये समाज के सभी (व्यक्तिगत, सामुदायिक व प्रशासनिक) स्तरों पर सघन सक्रिय अभियान चलाये जावे। विगत कुछ वर्षों में वन सम्पदा को संरक्षित रखने की दिशा में कई जन आंदोलन प्रारम्भ हुये हैं। हमारे देश में इस आशय को दृष्टान्त सर्वप्रथम अपने ही राज्य राजस्थान में मिलता है। सन् 1731 में जोधपुर के खेजडी गाँव की विश्नोई महिला अमृता देवी ने खेजड़ी वृक्ष को न काटने देने व सुरक्षा हेतु आंदोलन चलाया। इस आंदोलन में विश्नोई समुदाय के 363 सदस्य शहीद हुए जिसमें स्वयं अमृता देवी भी सम्मिलित थी। इस घटना से तत्कालीन सरकार को खेजड़ी वृक्ष की कटाई पर कठोर प्रतिबंध लगाना पड़ा। इसी भांति वन संरक्षण में चिपको आंदोलन (Chipko movement) को भी विशेष योगदान रहा है। जो वर्तमान में सुन्दरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में चल रहा है। टिहरी व गढ़वाल क्षेत्र की महिलाओं ने एक नारा दिया है जो चिपको नारे के नाम से जाना जाता है

क्या है जंगल के उपचार? मिट्टी पानी और बयार।
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उत्तरांचल राज्य के टिहरी व गढ़वाल क्षेत्रों में इस आंदोलन का। प्रारम्भ 1972 में हुआ। इस आंदोलन का प्रमुख कारण था वहाँ के पर्वतीय क्षेत्रों में राजकीय ठेकों के अन्तर्गत वनों की कटाई हेतु आने वाले ठेकेदारों को वृक्ष काटने से रोकना। इसके लिए वहाँ के ग्रामवासियों ने वृक्षों से चिपक कर कटाई का विरोध किया। आंदोलनकारियों को मत था कि वृक्षों की कटाई से भूस्खलन व बाढ़ के खतरे का अनुभव बहुत ही कम समय में हो जाता है लेकिन वनों के अप्रत्यक्ष महत्व का अनुभव लम्बी अवधि पश्चात् होता है। अतः आंदोलनकारियों ने घोषणा की कि वनों का मुख्य उत्पादन मृदा, जल व ऑक्सीजन है न कि काष्ठ । चिपको आंदोलन के मुख्य उद्देश्य हैं-वनों की अंधाधुंध कटाई को रोकना एवं पारिस्थितिकीय संतुलन बनाये रखने के लिए अत्यधिक वृक्षारोपण करना। कर्नाटक राज्य में भी चिपको आंदोलन की भाँति आप्पिको आंदोलन (Appiko movement) वन संरक्षण के लिए चलाया गया है।

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