जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय

जयशंकर प्रसाद आजतक के हिंदी साहित्य के महानतम कवियों एवं लेखकों में से एक माने जाते हैं. जयशंकर प्रसाद एक प्रसिद्द हिन्दी कवि, नाटककार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे। ये हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों (सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पन्त एवं जयशंकर प्रसाद) में से एक थे।  

संक्षिप्त जीवन परिचय :

  1. पूरा नाम: महाकवि जयशंकर प्रसाद
  2. जन्म: 30 जनवरी, 1889 ई.
  3. जन्म भूमि: वाराणसी, उत्तर प्रदेश
  4. मृत्यु: 15 नवम्बर, सन् 1937 (आयु- 48 वर्ष)
  5. मृत्यु स्थान: वाराणसी, उत्तर प्रदेश
  6. पिता: देवीप्रसाद साहू 
  7. कर्म भूमि: वाराणसी
  8. कार्यक्षेत्र: उपन्यासकार, नाटककार, कवि, कहानीकार
  9. मुख्य रचनाएँ: चित्राधार, कामायनी, आँसू, लहर, झरना, एक घूँट, विशाख, अजातशत्रु, आकाशदीप, आँधी, ध्रुवस्वामिनी, तितली और कंकाल
  10. विषय: कविता, उपन्यास, नाटक, कहानी और निबन्ध
  11. भाषा: हिंदी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली
  12. नागरिकता: भारतीय
  13. लेखन शैली: वर्णनात्मक, भावात्मक, आलंकारिक, सूक्तिपरक, प्रतीकात्मक

जीवन परिचय:

जयशंकर प्रसाद जी का जन्म 30 जनवरी 1889 ई० (माघ शुक्ल दशमी, संवत् 1946 वि.) को गुरुवार के दिन काशी के सरायगोवर्धन में हुआ था। इनके पितामह शिवरतन साहू वाराणसी के अत्यन्त प्रतिष्ठित नागरिक थे और एक विशेष प्रकार की सुरती (तम्बाकू) बनाने के कारण सुँघनी साहू’ के नाम से विख्यात थे। उनकी दानशीलता सर्वविदित थी और उनके यहाँ विद्वानों तथा कलाकारों का सम्मान होता था। जयशंकर प्रसाद के पिता देवीप्रसाद साहू  ने भी अपने पूर्वजों की परम्परा का पालन किया। इनके परिवार की गणना वाराणसी के अतिशय समृद्ध घरानों में थी और धन-वैभव का कोई अभाव न था।

जयशंकर प्रसाद का कुटुम्ब शिव का उपासक था। इनके माता-पिता ने इनके जन्म के लिए भगवान शिव से बड़ी प्रार्थना की थी। झारखण्ड के वैद्यनाथ धाम के से लेकर उज्जयिनी के महाकाल की आराधना के फलस्वरूप उनके यहाँ पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी. बचपन में जयशंकर प्रसाद को ‘झारखण्डी’ कहकर पुकारा जाता था और इनका नामकरण संस्कार भी वैद्यनाथ धाम में ही हुआ।

शिक्षा:

जयशंकर प्रसाद की शिक्षा घर पर ही आरम्भ हुई। संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी, और उर्दू के लिए शिक्षक नियुक्त थे। इनमें रसमय सिद्ध प्रमुख थे। प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों के लिए दीनबन्धु ब्रह्मचारी शिक्षक थे। कुछ समय के बाद स्थानीय क्वीन्स कॉलेज में जयशंकर प्रसाद का नाम लिखा दिया गया, पर यहाँ पर वे आठवीं कक्षा तक ही पढ़ सके। जयशंकर प्रसाद एक अध्यवसायी व्यक्ति थे और नियमित रूप से अध्ययन करते थे।

पारिवारिक विपत्तियाँ :

जयशंकर प्रसाद के पितामह (बाबा) बाबू शिवरतन साहू दान देने में प्रसिद्ध थे और इनके पिता बाबू देवीप्रसाद जी कलाकारों का आदर करने के लिये विख्यात थे। इनका काशी में बड़ा सम्मान था और काशी की जनता काशीनरेश के बाद हर हर महादेव से बाबू देवीप्रसाद का ही स्वागत करती थी लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था जब जयशंकर प्रसाद की उम्र मात्र 12 वर्ष की थी, तभी उनके पिता का देहान्त हो गया।

इसी के बाद परिवार में गृहक्लेश आरम्भ हुआ और पैतृक व्यवसाय को इतनी क्षति पहुँची कि वही ‘सुँघनीसाहु का परिवार, जो वैभव में लोटता था, ऋण के भार से दब गया। पिता की मृत्यु के दो-तीन वर्षों के भीतर ही प्रसाद की माता का भी देहान्त हो गया और सबसे दुर्भाग्य का दिन तब आया, जब उनके ज्येष्ठ भ्राता शम्भूरतन चल बसे. मात्र सत्रह वर्ष की अवस्था में ही प्रसाद को एक भारी उत्तरदायित्व सम्भालना पड़ा।

किशोरावस्था के पूर्व ही माता और
बड़े भाई का देहावसान हो जाने के कारण 17 वर्ष की उम्र में ही जयशंकर प्रसाद पर
आपदाओं का पहाड़ टूट पड़ा। कच्ची गृहस्थी, घर
में सहारे के रूप में केवल विधवा भाभी, कुटुबिंयों, परिवार से संबद्ध अन्य लोगों का संपत्ति हड़पने का षड्यंत्र, इन सबका सामना उन्होंने धीरता और गंभीरता के साथ किया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी:

जयशंकर प्रसाद जी का जन्म उस समय हुआ जब खड़ी बोली और आधुनिक हिन्दी साहित्य किशोरावस्था में पदार्पण कर रहे थे.

शुरू से ही जयशंकर प्रसाद के घर में
साहित्य और कला का माहौल था. घर के वातावरण के कारण साहित्य और कला के प्रति उनमें
प्रारंभ से ही रुचि थी. कहा जाता है कि मात्र नौ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने कलाधर
नाम से व्रजभाषा में एक सवैया लिखकर अपने गुरु रसमय सिद्ध को दिखाया था।

जयशंकर प्रसाद जी ने वेद, इतिहास, पुराण तथा साहित्य शास्त्र का अत्यंत गंभीर अध्ययन किया था। वे बाग-बगीचे बागवानी तथा भोजन बनाने के भी बहुत शौकीन थे. वे शतरंज के खिलाड़ी भी थे। वे नियमित व्यायाम करनेवाले, सात्विक खान पान एवं गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे। वे नागरीप्रचारिणी सभा के उपाध्यक्ष भी थे। लेकिन इतना नियमित दिनचर्या का पालन करने के बाद भी दुःख और बिपत्तिओं के कारण वे क्षय रोग से पीड़ित हो गए और 15 नवम्बर, 1937 (दिन-सोमवार) को प्रातःकाल केवल 47 साल की उम्र में काशी में उनका देहांत हो गया।

जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्द कृतियाँ

काव्य

जयशंकर प्रसाद की काव्य रचनाएँ दो वर्गो में विभक्त है : काव्यपथ अनुसंधान की रचनाएँ और रससिद्ध रचनाएँ। आँसू, लहर तथा कामायनी दूसरे वर्ग की रचनाएँ हैं। उन्होंने काव्यरचना ब्रजभाषा में आरम्भ की और धीर-धीरे खड़ी बोली को अपनाते हुए उस विशा में इतने निपुण हो गए कि खड़ी बोली के मूर्धन्य कवियों में उनकी गणना की जाने लगी और अंतत: वे युगवर्तक कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उनके लिखे निम्नलिखित काव्यग्रंथ बहुत प्रसिद्द हुए.

  1. कानन कुसुम
  2. महाराणा का महत्व
  3. झरना(1918)
  4. आंसू
  5. लहर
  6. कामायनी (1935)
  7. प्रेम पथिक

उन्होंने हिंदी काव्य में छायावाद
की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा
प्रवाहित हुई और वह काव्य की सिद्ध भाषा बन गई। उनकी सर्वप्रथम छायावादी रचना ‘खोलो द्वार’ 1914 ई. में इंदु में प्रकाशित हुई।

वे छायावाद के प्रतिष्ठापक ही नहीं अपितु छायावादी पद्धति पर सरस संगीतमय गीतों के
लिखनेवाले श्रेष्ठ कवि भी हैं। उन्होंने हिंदी में ‘करुणालय’
द्वारा गीत नाट्य का भी आरंभ किया। उन्होंने भिन्न तुकांत काव्य
लिखने के लिये मौलिक छंदचयन किया और अनेक छंद का संभवत: उन्होंने सबसे पहले प्रयोग
किया। उन्होंने नाटकीय ढंग पर काव्य-कथा-शैली का मनोवैज्ञानिक पथ पर विकास किया।
साथ ही कहानी कला की नई तकनीक का संयोग काव्यकथा से कराया।

काव्यक्षेत्र में जयशंकर प्रसाद की कीर्ति का मूलाधार ‘कामायनी’ है। खड़ी बोली का यह अद्वितीय महाकव्य मनु और श्रद्धा को आधार बनाकर रचित मानवता को विजयिनी बनाने का संदेश देता है। यह रूपक कथाकाव्य भी है जिसमें मन, श्रद्धा और इड़ा (बुद्धि) के योग से अखंड आनंद की उपलब्धि का रूपक प्रत्यभिज्ञा दर्शन के आधार पर संयोजित किया गया है। उनकी यह कृति छायावाद और खड़ी बोली की काव्यगरिमा का ज्वलंत उदाहरण है। सुमित्रानंदन पंत इसे ‘हिंदी में ताजमहल के समान’ मानते हैं। शिल्पविधि, भाषासौष्ठव एवं भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से इसकी तुलना खड़ी बोली के किसी भी काव्य से नहीं की जा सकती है।

कहानी:

कथा-कहानी के क्षेत्र में जयशंकर
प्रसाद आधुनिक ढंग की कहानियों के आरम्भकर्ता के तौर पर जाने जाते हैं। सन 1912 ई.
में ‘इंदु’ में उनकी पहली कहानी ‘ग्राम’
प्रकाशित हुई।

उन्होंने कुल 72 कहानियाँ लिखी हैं।

कहानी संग्रह

  1. छाया
  2. प्रतिध्वनि
  3. आकाशदीप
  4. आंधी
  5. इन्द्रजाल

उनकी अधिकतर कहानियों में भावना की
प्रधानता है किंतु उन्होंने यथार्थ की दृष्टि से भी कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ लिखी
हैं। उनकी वातावरणप्रधान कहानियाँ अत्यंत सफल हुई हैं। उन्होंने ऐतिहासिक,
प्रागैतिहासिक एवं पौराणिक कथानकों पर मौलिक एवं कलात्मक कहानियाँ
लिखी हैं। भावना-प्रधान प्रेमकथाएँ, समस्यामूलक कहानियाँ
लिखी हैं। भावना प्रधान प्रेमकथाएँ, समस्यामूलक कहानियाँ,
रहस्यवादी, प्रतीकात्मक और आदर्शोन्मुख
यथार्थवादी उत्तम कहानियाँ, भी उन्होंने लिखी हैं। ये
कहानियाँ भावनाओं की मिठास तथा कवित्व से पूर्ण हैं।

जयशंकर प्रसाद जी भारत के उन्नत अतीत का जीवित वातावरण प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त थे। उनकी कितनी ही कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें आदि से अंत तक भारतीय संस्कृति एवं आदर्शो की रक्षा का सफल प्रयास किया गया है। उनकी कुछ श्रेष्ठ कहानियों के नाम हैं : आकाशदीप, गुंडा, पुरस्कार, सालवती, स्वर्ग के खंडहर में आँधी, इंद्रजाल, छोटा जादूगर, बिसाती, मधुआ, विरामचिह्न, समुद्रसंतरण; अपनी कहानियों में जिन अमर चरित्रों की उन्होंने सृष्टि की है, उनमें से कुछ हैं चंपा, मधुलिका, लैला, इरावती, सालवती और मधुआ का शराबी, गुंडा का नन्हकूसिंह और घीसू जो अपने अमिट प्रभाव छोड़ जाते हैं।

उपन्यास :

जयशंकर प्रसाद (Jaishankar Prasad) ने तीन उपन्यास लिखे हैं। ‘कंकाल’, में नागरिक सभ्यता का अंतर यथार्थ उद्घाटित किया गया है। ‘तितली’ में ग्रामीण जीवन के सुधार के संकेत हैं। प्रथम यथार्थवादी उन्यास हैं; दूसरे में आदर्शोन्मुख यथार्थ है। इन उपन्यासों के द्वारा प्रसाद जी हिंदी में यथार्थवादी उपन्यास लेखन के क्षेत्र में अपनी गरिमा स्थापित करते हैं। ‘इरावती’ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया इनका अधूरा उपन्यास है जो रोमांस के कारण ऐतिहासिक रोमांस के उपन्यासों में विशेष आदर का पात्र है। इन्होंने अपने उपन्यासों में ग्राम, नगर, प्रकृति और जीवन का मार्मिक चित्रण किया है जो भावुकता और कवित्व से पूर्ण होते हुए भी प्रौढ़ लोगों की शैल्पिक जिज्ञासा का समाधान करता है।

नाटक

प्रसाद ने आठ ऐतिहासिक,
तीन पौराणिक और दो भावात्मक, कुल 13 नाटकों की
सर्जना की। ‘कामना’ और ‘एक घूँट’ को छोड़कर ये नाटक मूलत: इतिहास पर आधृत
हैं। इनमें महाभारत से लेकर हर्ष के समय तक के इतिहास से सामग्री ली गई है। वे
हिंदी के सर्वश्रेष्ठ नाटककार हैं। उनके नाटकों में सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना
इतिहास की भित्ति पर संस्थित है।

  1. स्कंदगुप्त
  2. चंद्रगुप्त
  3. ध्रुवस्वामिनी
  4. जन्मेजय का नाग
    यज्ञ
  5. राज्यश्री
  6. कामना
  7. एक घूंट

जयशंकर प्रसाद (Jaishankar Prasad) ने अपने दौर के पारसी रंगमंच की परंपरा को अस्वीकारते हुए भारत के गौरवमय अतीत के अनमोल चरित्रों को सामने लाते हुए अविस्मरनीय नाटकों की रचना की। उनके नाटक स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त आदि में स्वर्णिम अतीत को सामने रखकर मानों एक सोये हुए देश को जागने की प्रेरणा दी जा रही थी। उनके नाटकों में देशप्रेम का स्वर अत्यंत दर्शनीय है और इन नाटकों में कई अत्यंत सुंदर और प्रसिद्ध गीत मिलते हैं। ‘हिमाद्रि तुंग शृंग से’, ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ जैसे उनके नाटकों के गीत सुप्रसिद्ध रहे हैं।

इनके नाटकों पर अभिनेय न होने का
आरोप है। आक्षेप लगता रहा है कि वे रंगमंच के हिसाब से नहीं लिखे गए है जिसका कारण
यह बताया जाता है कि इनमें काव्यतत्व की प्रधानता, स्वगत कथनों का विस्तार, गायन का बीच बीच में प्रयोग
तथा दृश्यों का त्रुटिपूर्ण संयोजन है। किंतु उनके अनेक नाटक सफलतापूर्वक अभिनीत
हो चुके हैं। उनके नाटकों में प्राचीन वस्तुविन्यास और रसवादी भारतीय परंपरा तो है
ही, साथ ही पारसी नाटक कंपनियों, बँगला
तथा भारतेंदुयुगीन नाटकों एवं शेक्सपियर की नाटकीय शिल्पविधि के योग से उन्होंने
नवीन मार्ग ग्रहण किया है। उनके नाटकों के आरंभ और अंत में उनका अपना मौलिक शिल्प
है जो अत्यंत कलात्मक है। उनके नायक और प्रतिनायक दोनों चारित्रिक दृष्टि के गठन
से अपनी विशेषता से मंडित हैं। इनकी नायिकाएँ भी नारीसुलभ गुणों से, प्रेम, त्याग, उत्सर्ग,
भावुक उदारता से पूर्ण हैं।

उन्होंने अपने नाटकों में जहाँ राजा,आचार्य, सैनिक, वीर और
कूटनीतिज्ञ का चित्रण किया है वहीं ओजस्वी, महिमाशाली
स्त्रियों और विलासिनी, वासनामयी तथा उग्र नायिकाओं का भी
चित्रण किया है। चरित्रचित्रण उनके अत्यंत सफल हैं। चरित्रचित्रण की दृष्टि से
उन्होंने नाटकों में राजश्री एवं चाणक्य को अमर कर दिया है। नाटकों में इतिहास के
आधार पर वर्तमान समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रस्तुत करते हुए वे मिलते हैं।
किंतु गंभीर चिंतन के साथ स्वच्छंद काव्यात्मक दृष्टि उनके समाधान के मूल में है।
कथोपकथन स्वाभाविक है किंतु उनकी भाषा संस्कृतगर्भित है। नाटकों में दार्शनिक
गंभीतरता का बाहुल्य है पर वह गद्यात्मक न होकर सरस है। उन्होंने कुछ नाटकों में
स्वगत का भी प्रयोग किया है किंतु ऐसे नाटक केवल चार हैं। भारतीय नाट्य परंपरा में
विश्वास करने के कारण उन्होंने नाट्यरूपक ‘कामना’ के रूप में प्रस्तुत किया। ये नाटक प्रभाव की एकता लाने में पूर्ण सफल
हैं। अपनी कुछ त्रुटियों के बावजूद प्रसाद जी नाटककार के रूप में हिंदी में
अप्रतिम हैं।

निबंध:

प्रसाद ने प्रारंभ में समय समय पर ‘इंदु’ में विविध विषयों पर सामान्य निबंध लिखे। बाद
में उन्होंने शोधपरक ऐतिहासिक निबंध, यथा: सम्राट्
चंद्रगुप्त मौर्य, प्राचीन आर्यवर्त और उसका प्रथम सम्राट्
आदि: भी लिखे हैं। ये उनकी साहित्यिक मान्यताओं की विश्लेषणात्मक वैज्ञानिक भूमिका
प्रस्तुत करते हैं। विचारों की गहराई, भावों की प्रबलता तथा
चिंतन और मनन की गंभीरता के ये जाज्वल्य प्रमाण हैं।

पुरस्कार

जयशंकर प्रसाद को ‘कामायनी’ की रचना के लिए मंगलाप्रसाद पारितोषिक
प्राप्त हुआ था।

जयशंकर प्रसाद के लेखन का दूरगामी प्रभाव

हिन्दी काव्य में एक तरह से छायावाद
की स्थापना का श्रेय जयशंकर प्रसाद को जाता है. इनके द्वारा रचित खड़ी बोली के
काव्य में न केवल कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई,
बल्कि जीवन के सूक्ष्म एवं व्यापक आयामों के चित्रण की शक्ति भी
संचित हुई और कामायनी तक पहुँचकर वह काव्य प्रेरक शक्तिकाव्य के रूप में भी
प्रतिष्ठित हो गया। जयशंकर प्रसाद के बाद के कई प्रगतिशील एवं नई कविता दोनों
धाराओं के प्रमुख आलोचकों ने उसकी लेखनी को खूब सराहा है। इनकी वजह से ही बाद में
खड़ीबोली हिन्दी काव्य की निर्विवाद सिद्ध भाषा बन गयी।

आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास
में जयशंकर प्रसाद के कृतित्व का गौरव अक्षुण्ण है। ये एक युगप्रवर्तक लेखक थे
जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास आदि क्षेत्रों में शानदार लेखन किया है। कवि के रूप में
ये निराला, पन्त, महादेवी के साथ
छायावाद के प्रमुख स्तम्भ के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं, नाटक लेखन में भारतेन्दु
के बाद ये एक अलग धारा बहाने वाले युगप्रवर्तक नाटककार रहे. पाठक जयशंकर प्रसाद के
नाटक आज भी न केवल चाव से पढ़ते हैं, बल्कि उनकी अर्थगर्भिता
तथा रंगमंचीय प्रासंगिकता भी दिनानुदिन बढ़ती ही चली गयी है। इस दृष्टि से उनकी
महत्ता पहचानने एवं स्थापित करने में वीरेन्द्र नारायण, शांता
गाँधी, सत्येन्द्र तनेजा एवं अब कई दृष्टियों से सबसे बढ़कर


महेश आनन्द का प्रशंसनीय ऐतिहासिक योगदान रहा है। इसके अलावा कहानी और उपन्यास के
क्षेत्र में भी इन्होंने कई यादगार कृतियाँ दीं हैं। इन्होने विविध रचनाओं के
माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन
किया है।

Remark:

दोस्तों अगर आपको इस Topic के समझने में कही भी कोई परेशांनी हो रही हो तो आप Comment करके हमे बता सकते है | इस टॉपिक के expert हमारे टीम मेंबर आपको जरूर solution प्रदान करेंगे|


यदि आपको https://hindilearning.in वेबसाइट में दी गयी जानकारी से लाभ मिला हो तो आप अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कर सकते है |

हम आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *