संत रैदास या रविदास भगत की जीवनी

संत रैदास (Raidas)
अथवा संत रविदास (Ravidas) भारत के उन चुनिंदा
महापुरुषों में से एक हैं जिन्होंने अपने रूहानी वचनों से सारे संसार को एकता और
भाईचारे का पथ पढ़ाया. संत रविदास कबीर के समसामयिक कहे जाते हैं. मध्ययुगीन संतों
में रैदास का महत्त्वपूर्ण स्थान है. संत रविदास का जन्म समय सन 1398 से 1518 ई.
के आस पास का माना जाता है. साक्ष्य के आधार पर रैदास या संत रविदास चर्मकार जाति
कके माने जाते हैं.

जीवन परिचय

संत गुरू रविदास (रैदास) का जन्म
काशी में माघ पूर्णिमा दिन रविवार को संवत 1433 को हुआ था. इनके जन्म के बारे में
एक दोहा प्रचलित है:

चौदह से तैंतीस कि माघ सुदी पन्दरास ।

दुखियों के कल्याण हित प्रगटे स्री रविदास।

रैदास का जन्म काशी में चर्मकार कुल में हुआ था. उनके पिता का नाम ‘रग्घु’ और माता का नाम ‘घुरविनिया’ बताया जाता है। कई जगह इनके पिता का नाम राहू तथा माता का नाम करमा बताया गया है. इनकी पत्नी का नाम लोना बताया जाता है. जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया।  रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था. ये जूते बनाने का काम किया करते थे. ये अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे.

संत रैदास काशी के रहने वाले थे. इन्हें रामानन्द का शिष्य माना जाता है. लेकिन ये रामानंद के शिष्य थे या नहीं इसका कोई मौलिक साक्ष्य नहीं है. जनश्रुतियों के अनुसार ये भी माना जाता है कि इनकी कबीर से भी भेंट हुयी थी और इसकी अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं परंतु इसकी प्रामाणिकता भी सन्दिग्ध है।

नाभादास कृत ‘भक्तमाल’ में रैदास के स्वभाव और उनकी चारित्रिक उच्चता का प्रतिपादन मिलता है. प्रियादास कृत ‘भक्तमाल’ की टीका के अनुसार चित्तौड़ की ‘झालारानी’ उनकी शिष्या थीं, जो महाराणा सांगा की पत्नी थीं. इस दृष्टि से रैदास का समय सन् 1482-1527 ई. (सं. 1539-1584 वि.) अर्थात विक्रम की सोलहवीं शती के अंत तक चला जाता है. कुछ लोगों का अनुमान कि यह चित्तौड़ की रानी मीराबाई ही थीं जिन्होंने रैदास का शिष्यत्व ग्रहण किया था. मीरा ने अपने अनेक पदों में रैदास का गुरु रूप में स्मरण किया है:

‘गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुरसे कलम भिड़ी।

सत गुरु सैन दई जब आके जोत रली।’

रैदास ने अपने भजनों और दोहों में पूर्ववर्ती और समसामायिक भक्तों के सम्बन्ध में लिखा है. इस आधार पर यह ज्ञात होता है कि कबीर की मृत्यु उनके सामने ही हो गयी थी. रैदास की अवस्था 120 वर्ष की मानी
जाती है.

संत रैदास की समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे. प्रारम्भ से ही संत रैदास या रविदास जी बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की
सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था. साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था. वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे. उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे और कुछ समय बाद उन्होंने रविदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से भगा दिया। रविदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग इमारत बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे.

संत रैदास या संत रविदास का व्यक्तित्व

रैदास के समय में स्वामी रामानन्द काशी के बहुत प्रसिद्ध प्रतिष्ठित सन्त थे। रैदास उनकी शिष्य-मण्डली के महत्त्वपूर्ण सदस्य थे। प्रारम्भ में ही रैदास बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता
करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष सुख का अनुभव होता था। वह उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रैदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से अलग कर दिया। रैदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग झोपड़ी बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे। कहते हैं, ये अनपढ़ थे, किंतु संत-साहित्य के ग्रंथों और गुरु-ग्रंथ साहब में इनके पद पाए जाते हैं।

वचनबद्धता

उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से समय तथा वचन के पालन सम्बन्धी उनके गुणों का ज्ञान मिलता है। एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, ‘गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को आज ही जूते बनाकर देने का मैंने वचन दे रखा है। यदि आज मैं जूते नहीं दे सका तो वचन भंग होगा। गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा? मन जो काम
करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है। मन सही है तो इस कठौती के
जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है।’ कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि – ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’

संत रैदास की शिक्षा दीक्षा

संत रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबकोपरस्पर मिल जुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया. वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे. उनका विश्वास था कि
राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं. वेद, क़ुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है।

‘कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।

वेद कतेब क़ुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।’

संत रैदास का विश्वास था कि ईश्वर
की भक्ति के लिए सदाचार, परहित भावना तथा
सदव्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है. अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ अच्छा
व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल
दिया. अपने एक भजन में उन्होंने कहा है –

‘कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।

तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।’

उनके विचारों का आशय यही है कि
ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है. अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला
व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में
असमर्थ रहता है, जबकि लघु शरीर की ‘पिपीलिका’ इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है. इसी
प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य
ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।

संत रैदास की सत्संग भावना

संत रैदास की शैशवावस्था से ही
सत्संग के प्रति तीव्र अभिरुचि थी. ये बचपन में रामजानकी की मूर्ति बनाकर उनकी पूजा
किया करते थे। पिता ने किसी कारणवश उन्हें अपने से अलग कर दिया तो वे घर के
पिछवाड़े छप्पर डालकर रहने लगे इससे पता चलता है कि वो कितने संतोषी और उदार
व्यक्ति थे. वे अपने बनाये हुये जूते बहुधा साधु-सन्तो में बांट दिया करते थे।
इनकी विरक्ति के सम्बन्ध में एक प्रसंग मिलता है कि एक बार किसी महात्मा ने उन्हे ‘पारस’ पत्थर दिया जिसका उपयोग भी उसने बता दिया।


पहले तो सन्त रैदास ने उसे लेना ही अस्वीकार कर दिया किन्तु बार-बार आग्रह करने पर
उन्होंने ग्रहण कर लिया और अपने छप्पर में खोंस देने के लिये कहा. तेरह दिन के बाद
लौटकर उक्त साधु ने जब पारस पत्थर के बारे में पूछा तो संत रैदास का उत्तर था कि
जहां रखा होगा, वहीं से उठा लो और सचमुच वह पारस पत्थर वहीं
पड़ा मिला।

संत रैदास की सत्यनिष्ठा

सन्त रैदास ने सत्य को अनुपम और
अनिवर्चनीय कहा है. उन्होंने कहा कि सत्य सर्वत्र एक रस है. जिस प्रकार जल में
तरंगे है, उसी प्रकार सारा विश्व उसमें लक्षित होता है. वह नित्य,
निराकार तथा सबके भीतर विद्यमान है. सत्य का अनुभव करने के लिये
साधक को संसार के प्रति अनासक्त होना पड़ेगा. संत रैदास के अनुसार प्रेममूलक भक्ति
के लिये अहंकार की निवृत्ति आवश्यक है. भक्ति और अहंकार एक साथ संभव नहीं है. जब
तक साधक अपने साध्य के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पण नहीं करता तब तक उसे लक्ष्य
की सिद्धि नहीं हो सकती.

संत रैदास की साधना

सन्त रैदास मध्ययुगीन इतिहास के
संक्रमण काल में पैदा हुए थे। उस समय ब्राह्मणों की पैशाविक मनोवृत्ति से दलित और
उपेक्षित पशुवत जीवन व्यतीत करने के लिये बाध्य थे. सन्त रैदास यह सब देख कर बहुत
विचलित होते थे उनकी समन्वयवादी चेतना इसी का परिणाम है. उनकी स्वानुभूतिमयी चेतना
ने भारतीय समाज में जागृति का संचार किया और उनके मौलिक चिन्तन ने शोषित और
उपेक्षित शूद्रो में आत्मविश्वास का संचार किया. परिणामत: वह ब्राह्मणवाद की
प्रभुता के सामने साहसपूर्वक अपने अस्तित्व की घोषणा करने में सक्षम हो गये. संत
रैदास ने मानवता की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया. उनके मन में इस्लाम के
लिए भी आस्था का समान भाव था. कबीर की वाणी में जहाँ आक्रोश की अभिव्यक्ति है,
वहीं दूसरी ओर संत रैदास की रचनात्मक दृष्टि दोनो धर्मो को समान भाव
से मानवता के मंच पर लाती है.

धर्म

संत रैदास वस्तुत: मानव धर्म के संस्थापक थे. उन्होंने कुल और जाति की श्रेष्ठता को मिथ्या बताया.

जन्म जात मत पूछिये , का जात अरू पात।

रविदास पूत सभ प्रभ के कोउ नहि जात कुजात॥

संत रैदास का समाज पर प्रभाव

रैदास की वाणी, भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत विचारधारा और शिक्षा का श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा. उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों को ऐसी शिक्षा मिलती थी जिससे उनकी शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान हो जाता था और लोग स्वत: उनके अनुयायी बन जाते थे. उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके प्रति श्रद्धालु बन गये. कहा जाता है कि मीराबाई उनकी भक्ति-भावना से बहुत प्रभावित हुईं
और उनकी शिष्या बन गयी थीं.

‘वर्णाश्र अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।

सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।’

संत रैदास की रचनाएँ

रैदास अनपढ़ कहे जाते हैं। संत-मत के विभिन्न संग्रहों में उनकी रचनाएँ संकलित मिलती हैं। राजस्थान में हस्तलिखित ग्रंथों में रूप में भी उनकी रचनाएँ मिलती हैं। रैदास की रचनाओं का एक संग्रह ‘बेलवेडियर प्रेस’, प्रयाग से प्रकाशित हो चुका है। इसके अतिरिक्त इनके बहुत से पद ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में भी संकलित मिलते हैं। यद्यपि दोनों प्रकार के पदों की भाषा में बहुत अंतर है तथापि प्राचीनता के कारण ‘गुरु ग्रंथ साहब’ में संग्रहीत पदों को प्रमाणिक मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। रैदास के कुछ पदों पर अरबी और फ़ारसी का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। रैदास के अनपढ़ और विदेशी भाषाओं से अनभिज्ञ होने के कारण ऐसे पदों की प्रामाणिकता में सन्देह होने लगता है। अत: रैदास के पदों पर अरबी-फ़ारसी के प्रभाव का अधिक संभाव्य कारण उनका लोकप्रचलित होना ही प्रतीत होता है।

संत रैदास का महत्व

आज भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सदव्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं।

इन्हीं गुणों के कारण सन्त रैदास को अपने समय के समाज में अत्याधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं। संत कवि रैदास उन महान सन्तों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग रहा है जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है।

मधुर एवं सहज संत रैदास की वाणी
ज्ञानाश्रयी होते हुए भी ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह
है। गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी रैदास उच्च-कोटि के विरक्त संत थे। उन्होंने
ज्ञान-भक्ति का ऊंचा पद प्राप्त किया था। उन्होंने समता और सदाचार पर बहुत बल
दिया। वे खंडन-मंडन में विश्वास नहीं करते थे। सत्य को शुद्ध रूप में प्रस्तुत
करना ही उनका ध्येय था। रैदास का प्रभाव आज भी भारत में दूर-दूर तक फैला हुआ है।
इस मत के अनुयायी रैदासी या रविदासी कहलाते हैं।

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