संचार के साधन पर निबंध – Means Of Communication Essay In Hindi

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संचार के साधन पर निबंध – (Essay On Means Of Communication In Hindi)

बढ़ते संचार के साधन : सिमटता संसार – Means Of Increasing Communication: The Shrinking World

रूपरेखा–

  • प्रस्तावना
  • सामाजिकता क्या है
  • सामाजिकता और संसार.
  • सामाजिकता का घटना,
  • संचार साधनों का विस्तार,
  • संचार साधनों का सामाजिकता पर प्रभाव,
  • उपसंहार।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

संचार के साधन पर निबंध – Sanchaar Ke Saadhan Par Nibandh

प्रस्तावना–
यह कहना कठिन है कि मनुष्य ने कब समाज में रहना आरम्भ किया। आज जो सामाजिक जीवन हमारे लिए अपरिहार्य बन गया है उसका आरम्भ कब और कैसे हुआ होगा, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। निश्चय ही पहले परिवार अस्तित्व में आए और फिर सामूहिकता या सामाजिकता के लाभ देख और अनुभव करके परिवारों के समूह समाज में बदल गए।

परिवार को समाज या सामाजिकता की प्रथम पाठशाला कहा जाता है। परिवार में ही बालक को प्रेम, सहानुभूति, सहयोग और अनुशासन की शिक्षा मिलती है। इस सहज प्रशिक्षण का वह बड़े परिवार अर्थात् समाज में प्रयोग करता है? व्यक्ति की सुरक्षा, सम्मान और आकांक्षाएँ समाज में रहकर ही सम्भव और परिपूर्ण होती हैं।

सामाजिकता क्या है? – What is Sociality?

समाज की रीति–
नीति, परम्परा और आस्थाओं का पालन करते हुए, समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए, एक सभ्य नागरिक की तरह समाज में रहना ही सामाजिकता है। जो व्यक्ति सामाजिक सम्बन्धों के प्रति संवेदनशील नहीं होता, अपने आप में या अपने परिवार तक ही सीमित रहता है उसे असामाजिक कहा जाता है। मनुष्य को कदम–कदम पर समाज की आवश्यकता होती है।

जन्म, मृत्यु, विवाह, उत्सव, संकट के समय सामाजिकता का महत्त्व समझ में आता है। सामाजिकता रहित व्यक्ति स्वयं को एकाकी और असुरक्षित अनुभव करता है। सामाजिकता ही मनुष्य को सम्मान और लोकप्रियता दिलाती है। मिलनसार व्यक्ति के कठिन कार्य और समस्याएँ भी सामाजिकता के कारण सरल हो जाते हैं।

सामाजिकता और संसार–
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कथन है कि मनुष्य अपना संसार स्वयं बनाता है, उसके मित्र, सम्बन्धी और परिचित ही उसका संसार होते हैं। इनसे ही वह मिलना और बातचीत करना चाहता है। इस तरह समाज का व्यापक और विस्तृत रूप ही संसार है।

संचार साधनों ने हमारे परिचय क्षेत्र का विस्तार किया है, परन्तु इन साधनों के कारण हमारे निजी और प्रत्यक्ष सम्पर्क भी घटे हैं। इन साधनों ने मनुष्य को अपने आकर्षण के जाल में इतना उलझा लिया है कि उसका सम्पर्क क्षेत्र सीमित हो गया है। वह आत्मकेन्द्रित हो गया है।

सामाजिकता का घटना–
आजकल सामाजिकता की भावना निरन्तर घटती जा रही है। इसको ही संसार का सिमटना कह सकते हैं। सामाजिकता घटने के अनेक कारण हैं। इनमें अहंकार, व्यस्तता, श्रेष्ठता की भावना, सम्पन्नता, नगर–सभ्यता का प्रभाव, समूह–भावना की कमी आदि प्रमुख हैं। पारस्परिक औपचारिक सम्बन्धों की वृद्धि के कारण लोगों में घुलने–मिलने की प्रवृत्ति कम हो गई हैं महानगरों में एक ही भवन में रहने वाले एक–दूसरे से अपरिचित बने रहते हैं।

पहले पूरे मोहल्ले में लोग एक–दूसरे को जानते–पहचानते थे, एक–दूसरे के यहाँ आते–जाते थे। अब व्यवसाय और नौकरी की बाध्यता के कारण भी लोग सुबह से शाम तक व्यस्त रहते हैं।

संचार साधनों का विस्तार–
पहले संचार साधनों की अत्यन्त कमी थी इसलिए व्यक्ति से व्यक्ति के मिलने के अवसर काफी कम होते थे। दूर रहने वाले लोगों से पत्रों के माध्यम से समाचारों का आदान–प्रदान होता था। आज व्यक्ति को संचार के अनेक साधन उपलब्ध हैं। टेलीफोन है, मोबाइल फोन है, फैक्स है, इन्टरनेट है।

आने–जाने, प्रत्यक्ष भेंट करने की आवश्यकता नहीं, घर बैठे उसके सारे काम हो जाते हैं। पहले त्योहारों पर लोग एक–दूसरे के घर जाते थे, शुभकामनाएँ देते थे। अब तो एस. एम.एस से ही काम चल जाता है। टेलीकान्फ्रेंस के द्वारा साक्षात्कार और बैठक सम्पन्न हो जाती है।

संचार साधनों का सामाजिकता पर प्रभाव–
संचार साधनों की विविधता और सुलभता. ने मनुष्य के सामाजिक सम्बन्धों को गहराई से प्रभावित किया है। वह आत्मकेन्द्रित होता जा रहा है उसकी एक निजी दुनिया बन गई है। संचार उपकरण ही उसके संगी–साथी हैं। मोबाइल हर समय आपके साथ और हाथ में है। उठते, बैठते, चलते, यात्रा में, बाजार में नगर में, जंगल में, हर समय मोबाइल आपको सम्पर्क की सुविधा देता है।

फिर आपको समाज के बीच जाने की क्या आवश्यकता है। अब निबन्ध मनोरंजन के लिए मित्रों के बीच जाने या उन्हें बुलाने की आवश्यकता नहीं। अकेला टी.वी आपके पूरे परिवार का मनोरंजन कर सकता है। इन्टरनेट से हर सुविधा घर बैठे हाजिर है। पुस्तकालय में जाने का कष्ट क्यों किया जाय।

एक क्लिक पर पुस्तकें आपके कम्प्यूटर स्क्रीन पर उपस्थित हैं। नौकरी, विवाह, व्यवसाय हर समस्या का हल नेट कर सकता है। संचार–साधनों ने व्यक्ति की सामाजिक गतिविधियों को अत्यन्त सीमित कर दिया है।

उपसंहार–
आज मनुष्य संचार–साधनों की चकाचौंध से घिरकर समाज से कटता जा रहा है। मोबाइल, नेट और टी.वी. जा रहा है। सामाजिकता की निरन्तर हो रही कमी ने व्यक्ति के अनेक मौलिक गणों को निस्तेज कर दिया है।

इस नशे से सावधान न हुए तो नई–पीढ़ी धीरे–धीरे अवसाद, मोटापे, मन्द–दृष्टि आदि रोगों की शिकार हो जाएगी। लोग ‘मैं’ तक ही केन्द्रित हो जायेंगे ‘हम’ के रूप में सोचना भूल जाएँगे। अतः संचार–साधनों का सीमित और आवश्यक उपयोग ही समाज में होना चाहिए।

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Remark:

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