विद्यालय में स्वास्थ्य शिक्षा निबंध – Health Education Essay In Hindi

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विद्यालय में स्वास्थ्य शिक्षा निबंध – Essay On Health Education In Hindi

“शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक (धार्मिक) दृष्टि से सही होने की सन्तुलित सतह का नाम स्वास्थ्य है, न कि बीमारी के न होने का।”

-विश्व स्वास्थ्य संगठन

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विद्यालय में स्वास्थ्य शिक्षा निबंध – Vidyaalay Mein Svaasthy Shiksha Nibandh

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. स्वास्थ्य शिक्षा,
  3. विद्यालयों में स्वास्थ्य शिक्षा का आरम्भ,
  4. विद्यालयों में स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य–
    (क) स्वास्थ्य–विषयक सजगता,
    (ख) स्वास्थ्य–सम्बन्धी आदतों का विकास,
    (ग) प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी प्रदान करना,
    (घ) रोगों के विषय में जानकारी प्रदान करना,
  5. स्वास्थ्य शिक्षा का महत्त्व,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना–
स्वास्थ्य जीवन की आधारशिला है। स्वस्थ मनुष्य ही अपने जीवन में सुख–समृद्धि प्राप्त कर सकता है। इसलिए स्वास्थ्य को जीवन के समस्त सुखों का आधार भी कहा जाता है। रुपया–पैसा हाथ से निकल जाए तो उसे पुनः प्राप्त किया जा सकता है, परन्तु एक बार स्वास्थ्य बिगड़ गया तो उसे पुरानी स्थिति में लाना कठिन हो जाता है। इसलिए समझदार लोग अपने स्वास्थ्य की रक्षा बड़े मनोयोग से करते हैं। हमारे देश में तो धर्म का साधन शरीर को ही माना गया है; अत: कहा गया है–’शरीरमाद्यं खलु धर्म–साधनम्’।

स्वास्थ्य शिक्षा–
लोगों को स्वास्थ्य से सम्बन्धित जानकारी देना, जागरूक करना, शिक्षित करना स्वास्थ्य शिक्षा (Health Education) कहलाती है। स्वास्थ्य शिक्षा एक ऐसा माध्यम है, जिससे कुछ विशेष योग्य एवं शिक्षित व्यक्तियों की सहायता से जनता को स्वास्थ्य–सम्बन्धी ज्ञान और संक्रामक रोगों एवं विशिष्ट व्याधियों से बचने के उपायों का ज्ञान कराया जाता है।

विद्यालयों में स्वास्थ्य शिक्षा का आरम्भ–
जीवन में स्वास्थ्य की महत्ता को देखते हुए वर्ष 1958 ई० में विद्यालय स्वास्थ्य शिक्षा प्रभाग की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य युवा पीढ़ी के लिए स्वास्थ्य शिक्षा–सम्बन्धी कार्यक्रमों को सशक्त करना था। यह प्रभाग शिक्षा मन्त्रालय, एनसीईआरटी और वयस्क शिक्षा निदेशालय के साथ तकनीकी संसाधन केन्द्र के रूप में कार्य करता है तथा औपचारिक और गैर–औपचारिक शिक्षा के लिए स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम को सशक्त बनाने के लिए देश की इन सभी संस्थाओं और राज्य स्वास्थ्य एवं शिक्षा विभागों एवं विश्व–विद्यालयों के साथ मिलकर कार्य करता है।

वर्ष 2005 ई० में स्वास्थ्य शिक्षा सेवा प्रभाग के कार्यों और गतिविधियों का विस्तार किया गया, जिसका कार्य देश में विद्यालयों और किशोरों के लिए स्वास्थ्य शिक्षा की योजना बनाना, उसे सशक्त करना और पुनर्निरीक्षण करना था। इसके लिए विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में स्वास्थ्य शिक्षा को एक अलग विषय के रूप में सम्मिलित किया गया।

स्वास्थ्य शिक्षा प्रभाग द्वारा केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और सीबीएसई बोर्ड के शिक्षकों और राज्य स्वास्थ्य और शिक्षा विभागों के लिए एक जनसंख्या निर्देशिका विकसित की गई। इसके लिए अनेक विवरणिकाएँ तथा पुस्तिकाएँ भी बनाई गईं। शिक्षकों, चिकित्सीय और पराचिकित्सीय अधिकारियों को प्रशिक्षण देना भी इस प्रभाग का एक मुख्य कार्य है। इस प्रभाग का कार्य देश में विद्यालय स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रमों की निगरानी करना भी है।

विद्यालयों में स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य विद्यालयों में स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों में स्वास्थ्यप्रद वातावरण देकर उनमें अच्छे आचरण व अच्छी आदतों का बीजारोपण करना है। सी० ई० टर्नर के अनुसार–”विद्यार्थियों का समुचित विकास, स्वास्थ्य शिक्षा पर निर्भर करता है।”

सामान्य रूप से विद्यालयों में स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य निम्नलिखित है-

(क) स्वास्थ्य विषयक सजगता–विद्यार्थियों को स्वास्थ्य के विषय में सजग करना स्वास्थ्य शिक्षा का – मुख्य उद्देश्य है। विद्यालयों में उन्हें स्वास्थ्य के विषय में उचित ज्ञान कराया जाता है, जिससे वे स्वस्थ नागरिक बनकर देश के उत्थान में अपना बहुमूल्य योगदान कर सकें।

(ख) स्वास्थ्य सम्बन्धी आदतों का विकास–स्वास्थ्य के महत्त्व की जानकारी देने के पश्चात् उनमें स्वास्थ्य सम्बन्धी आदतों का विकास करना भी स्वास्थ्य शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है; क्योंकि किसी भी विषय का ज्ञान उस समय तक व्यर्थ है, जब तक उसे लागू न किया जाए। इसके अन्तर्गत विद्यार्थियों को व्यक्तिगत सफाई एवं स्वच्छता के विषय में पूर्ण जानकारी प्रदान की जाती है।

(ग) प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी प्रदान करना स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी प्रदान कराना भी है। इसके अन्तर्गत विद्यार्थियों को प्राथमिक चिकित्सा सिद्धान्तों के साथ–साथ विभिन्न परिस्थितियों; जैसे–साँप के काटने पर, जलने, हड्डी टूटने आदि दुर्घटनाओं पर प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी दी जाती है।

इस प्रकार की दुर्घटनाएँ कहीं भी, कभी भी तथा किसी के साथ भी घट सकती हैं और व्यक्ति का जीवन खतरे में पड़ सकता है। प्राथमिक चिकित्सा का ज्ञान इस परिस्थिति में पर्याप्त लाभकारी सिद्ध होता है।

(घ) रोगों के विषय में जानकारी प्रदान करना–स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को मुख्य–मुख्य रोगों की जानकारी देना भी है, जिससे वे अपने परिवार और अपने आस–पास के लोगों का स्वास्थ्य बनाए रखने में सहायक बन सकें।

स्वास्थ्य शिक्षा का महत्त्व–
“स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है।” इस उक्ति के अनुसार विद्यार्थियों के लिए स्वस्थ रहना अत्यावश्यक है; क्योंकि एक स्वस्थ विद्यार्थी ही विद्यालय की सभी गतिविधियों में उत्साहपूर्वक रुचि ले सकता है। अस्वस्थ विद्यार्थी न पूरा ज्ञान अर्जन कर सकता है, न ही प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।

स्वास्थ्य शिक्षा विद्यार्थी को स्वास्थ्य से सम्बन्धित उन मौलिक सिद्धान्तों की जानकारी प्रदान करती है, जिनका पालन करके विद्यार्थी स्वस्थ आदतों एवं विचारधारा को अपनाकर सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है।

स्वास्थ्य शिक्षा के अन्य मुख्य महत्त्व निम्नलिखित हैं-

  1. विद्यालयों में शिक्षक स्वास्थ्य शिक्षा विषय के अन्तर्गत विद्यार्थियों को विभिन्न पुस्तकों, चार्टी, चित्रों, मॉडलों, फिल्मों व स्लाइडों द्वारा स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञान की जानकारी देते हैं, जो विद्यार्थियों को बीमारियों से बचाने में सहायक सिद्ध होती है।
  2. विद्यालयों में प्राप्त स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा विद्यार्थियों में स्वस्थ आदतों का विकास होता है; जैसे–प्रातःकाल की सैर करना, स्वास्थ्यप्रद सन्तुलित भोजन करना, हाथ और नाखूनों की सफाई रखना, स्वच्छ वस्त्र पहनना, प्रतिदिन दाँत साफ करना, अपने आस–पास सफाई रखना, कचरे को कचरा–पेटी में डालना आदि।
  3. विद्यालयों में प्राप्त स्वास्थ्य शिक्षा के आधार पर विद्यार्थी स्वयं में तथा अन्य लोगों में शारीरिक विकृति को ढूँढने में सफल हो सकते हैं; जैसे–हकलाना, तुतलाना, आत्मविश्वास में कमी होना, देखने में परेशानी होना आदि। इन विकृतियों को पहचानकर तथा उचित चिकित्सा द्वारा वे उन्हें शीघ्र ही ठीक कराने में भी सहायक होते हैं।
  4. विद्यालयों से प्राप्त स्वास्थ्य शिक्षा विद्यार्थियों को सम्पूर्ण सफाई और स्वच्छ पर्यावरण का ज्ञान कराती है।
  5. स्वास्थ्य शिक्षा अच्छे मानवीय सम्बन्ध स्थापित करने में भी सहायक होती है। शिक्षक विद्यार्थियों को बताते हैं कि वे किस प्रकार अपने मित्रों, पड़ोसियों, सम्बन्धियों व समुदाय के अच्छे स्वास्थ्य के लिए कार्य कर सकते हैं। शिक्षक विद्यार्थियों को यह भी शिक्षा देते हैं कि विद्यालय, घर और समाज के मध्य कैसे समन्वय स्थापित करना है।
  6. विद्यालयों में प्राप्त स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा विद्यार्थी विपरीत परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने और जूझने का साहस प्रदान करती है, जिससे वह संकटकालीन अवस्था में सही प्राथमिक चिकित्सा प्रदान कर किसी का जीवन बचा सकता है।
  7. स्वास्थ्य शिक्षा के आधार पर विद्यार्थी विभिन्न रोगों के विषय में जानकर रोगी के भ्रमात्मक विचार और अन्धविश्वास को दूर कर सकता है और उसे उचित परामर्श और चिकित्सा प्रदान कराने में सहायक हो सकता है।
  8. शिक्षकों की उचित शिक्षा, निर्देश, आत्मबोध और स्वास्थ्य शिक्षा का ज्ञान विद्यार्थी में सेवा–भावना का संचार करता है।

उपसंहार–
इस प्रकार विद्यालयों में स्वास्थ्य शिक्षा की अनिवार्यता विद्यार्थी के न केवल शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक सिद्ध होती है, वरन् उसके मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और सामाजिक स्वास्थ्य को भी सबल बनाती है।

अच्छा स्वास्थ्य केवल रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति ही नहीं, बल्कि एक पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक खुशहाली का भी प्रतीक है। जब देश के लोग स्वस्थ होंगे तो उसकी समृद्धि और विकास में किसी प्रकार के सन्देह की कोई सम्भावना ही नहीं रहेगी।

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