भारतीय राजनीति में जातिवाद पर निबंध – Caste And Politics In India Essay In Hindi

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भारतीय राजनीति में जातिवाद पर निबंध – (Essay On Caste And Politics In Hindi)

भारतीय राजनीति में जातिवाद और धर्म – Casteism and Religion in Indian Politics

रूपरेखा–

  • प्रस्तावना,
  • सिद्धान्त और राजनीति और जनतन्त्र,
  • राजनीति का दूषण और नेता,
  • जातिवाद को बढ़ावा,
  • नियंत्रण की जरूरत,
  • उपसंहार।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

भारतीय राजनीति में जातिवाद पर निबंध – Bhaarateey Raajaneeti Mein Jaativaad Par Nibandh

प्रस्तावना–
किसी देश के संचालन के लिए राज्य नामक संस्था का होना आवश्यक है। राज्य के प्रबंधन के लिए राजनीति की आवश्यकता भी होती है। राजनीति यदि स्वच्छ और पवित्र होती है तो जनता का उसमें विश्वास बढ़ता है और देश की प्रगति भी तेजी से होती है।

सिद्धान्त और राजनीति और जनतन्त्र राजनीति के कुछ सिद्धान्त होते हैं। इनमें सबसे प्रमुख सिद्धान्त है जनहित और जनता की सेवा। प्रशासन और न्याय में निष्पक्षता भी स्वच्छ राजनीति का गुण होता है। भारत विश्व का एक प्रमुख जनतंत्र है। जनतंत्र में राजनीति की कार्यशैली और उसका स्वरूप जनवादी होना बहुत जरूरी है।

येन–केन–प्रकारेण
चुनाव जीतकर सत्ता पर अधिकार कर लेना राजनीति का सिद्धान्त नहीं होता। देश में दो या अधिक राजनैतिक दल होते हैं। इनके अपने सिद्धान्त और विचारधाराएँ होती हैं। चुनाव के समय ये दल उनको अपने चुनाव घोषणा पत्र में जनता के सामने रखते हैं। जनता आशा करती है जिनको वह चुन रही है, वे अपने सिद्धान्तों पर अडिग रहेंगे।

राजनीति का दूषण और नेता–
भारत का दुर्भाग्य यह है कि भारतीय राजनीति का रूप आज बहुत दूषित हो चुका है। राजनीति में शिक्षित, ईमानदार और दृढ़ चरित्र वाले लोगों की संख्या घटती जा रही है। राजनीति में अपराधियों की संख्या बढ़ रही है। योग्य और चरित्रवान लोग राजनीति को काजल की कोठरी मानकर उससे दूर ही रहता है।

आज राजनीति और राजनेताओं का स्वरूप वह नहीं है जो ऊपर से दिखाई देता है। उनके सफेद वस्त्रों के नीचे उनका मन काला हो चुका है। नेता किसी प्रकार सत्ता पाना चाहते हैं और सिद्धान्तों से चिपके रहना मूर्खता समझा जाता है।

जातिवाद और धर्म को बढ़ावा–
यों कहने को तो प्रत्येक दल और नेता सिद्धान्तों की दुहाई देता है, जनहित की बात करता है और जाति धर्म से अप्रभावित स्वच्छ राजनीति का दम भरता है। सभी नेता देश के विकास के नाम पर पर वोट माँगते हैं, परन्तु चुनाव में प्रत्याशी तय करने से लेकर चुनाव और उसके बाद तक जाति और धर्म का खेल खेला जाता है।

वोट देना व्यक्तिगत निर्णय का विषय है, किन्तु भारत के अधिकांशः वोटर जाति–धर्म के आधार पर वोट देते हैं। जाति के चौधरी और सम्प्रदायों के गुरु लोगों को प्रेरित करते हैं। इस प्रकार राजनीति का रूप अपवित्र हो जाता है और वह सर्व समाज के हित में काम नहीं कर पाती। इससे समाज में तनाव बढ़ता है और दंगे होते हैं।

नियंत्रण की आवश्यकता–
राजनीति में जातिवाद और धर्म के नाम पर चलती साम्प्रदायिकता देश की एकता के लिए भयंकर खतरा है। राजनेता चुनाव जीतने के लिए इनको संरक्षण तथा बढ़ावा देते हैं। इन बातों पर कठोर नियंत्रण आवश्यक है।

चुनाव आयोग ऐसे राजनैतिक दलों और राजनेताओं पर नियंत्रण रख सकता है। स्वयं मतदाता को भी जाति और सम्प्रदाय के आधार पर वोट नहीं देना चाहिए।

उपसंहार–
स्वतंत्रता मिलने से पूर्व भारतीय नेता जाति और सम्प्रदायविहीन समाज की रचना करना चाहते थे किन्तु स्वतंत्रता मिलने के बाद के राजनेताओं की सोच बिल्कुल उल्टी है। जातिवाद के आधार पर मिलने वाला आरक्षण इस दोष को पैदा करने वाला प्रमुख कारण है।

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