UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 19 Motivation and Education

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BoardUP Board
TextbookNCERT
ClassClass 12
SubjectPedagogy
ChapterChapter 19
Chapter NameMotivation and Education (प्रेरणा एवं शिक्षा)
CategoryUP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 19 Motivation and Education (प्रेरणा एवं शिक्षा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्रेरणा का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। प्रेरणा के मुख्य स्रोतों का भी उल्लेख कीजिए।
या
अभिप्रेरणा से आप क्या समझते हैं? [2011, 13, 14]
उत्तर :
प्रेरणा का अर्थ एवं परिभाषा
रेरणा या अभिप्रेरणा वह मानसिक क्रिया है, जो किसी प्रकार के व्यवहार को प्रेरित करती है। दूसरे शब्दों में, प्रेरणा मानसिक तत्परता की वह स्थिति है, जो व्यक्ति को कार्य में नियोजित करती है और किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अग्रसर करती है। इस प्रकार मनोवैज्ञानिक अर्थ में प्रेरणा एक प्रकार की आन्तरिक उत्तेजना है,

जिस पर हमारा व्यवहार आधारित रहता है अथवा जो हमें कार्य करने के लिए प्रेरित करती है और लक्ष्य प्राप्ति तक चलती रहती है। कोई व्यक्ति कार्य क्यों करता है ? भोजन क्यों करता है ? प्रेम या घृणा क्यों करता है ? आदि प्रश्नों का सम्बन्ध प्रेरणा से है। इस प्रकार प्रेरणा एक प्रकार की आन्तरिक शक्ति है, जो हमें कार्य करने के लिए प्रेरित को बाध्य करती है।

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने प्रेरणा की परिभाषा इस प्रकार दी है

1. गिलफोर्ड :
(Guilford) के अनुसार, “प्रेरणा एक कोई भी विशेष आन्तरिक कारक अथवा दशा है, जो क्रिया को प्रारम्भ करने अथवा बनाये रखने को प्रवृत्त होती है।”

2. वुडवर्थ :
(woodworth) के अनुसार, “प्रेरणा व्यक्तियों की दशा का वह समूह है, जो किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए निश्चित व्यवहार स्पष्ट करती है।”

3. मैक्डूगल :
मैक्डूगल के अनुसार, “प्रेरणा वे शारीरिक तथा मानसिक दशाएँ हैं, जो किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती हैं।”

4. जॉनसन :
जॉनसन के अनुसार, “प्रेरणा सामान्य क्रियाकलापों का प्रभाव है, जो मानव के व्यवहार को उचित मार्ग पर ले जाती हैं।”

5. बर्नार्ड :
(Bernard) के अनुसार, “प्रेरणा द्वारा उन विधियों का विकास किया जाता है, जो व्यवहार के पहलुओं को प्रमाणित करती हैं।”

6. थॉमसन :
थॉमसन के अनुसार, “प्रेरणा प्रारम्भ से लेकर अन्त तक मानव व्यवहार के प्रत्येक प्रतिकारक को प्रभावित करती है।”

7.शेफर :
(Shaffar) व अन्य के अनुसार, “प्रेरणा क्रिया की एक ऐसी प्रवृत्ति है जो कि चालक द्वारा उत्पन्न होती है एवं समायोजन द्वारा समाप्त होती है।”

इन परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर निम्नांकित तथ्यों का ज्ञान होता है

  1. प्रेरणा साध्य नहीं साधन है। यह साध्य तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करती है।
  2. प्रेरणा व्यक्ति के व्यवहार को स्पष्ट करती है।
  3. प्रेरणा से क्रियाशीलता व्यक्त होती है।
  4. प्रेरणा पर शारीरिक तथा मानसिक और बाह्य एवं आन्तरिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है।
  5. प्रेरणा सीखने का प्रमुख अंग न होकर सहायक अंग है।

प्रेरणा के स्रोत
मनोवैज्ञानिकों ने प्रेरणा के निम्नांकित स्रोतों का उल्लेख किया है

1. आवश्यकताएँ :
अपने जीवन को बनाये रखने के लिए मनुष्य की कुर्छ अनिवार्य आवश्यकताएँ होती हैं; जैसे वायु, जल और भोजन आदि। जब मनुष्य की इन आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती तो शारीरिक तनाव उत्पन्न हो जाता है और वह उनकी प्राप्ति के लिए किसी-न-किसी रूप में क्रियाशील हो जाता है। उदाहरण के लिए, ज़ब किसी व्यक्ति को प्यास लगती है, तो वह पानी की खोज के लिए तत्पर हो जाता है और जब तक उसे पानी प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक उसका शारीरिक तनाव बना रहता है।

प्राप्त हो जाने पर उसका शारीरिक तनाव भी समाप्त हो जाता है। इस सम्बन्ध में बोरिंग और लैंगफील्ड (Boring and Langfield) ने लिखा है-“आवश्यकता शरीर की अनिवार्यता या अभाव है, जिसके परिणामस्वरूप शारीरिक अस्थिरता या तनाव उत्पन्न हो जाता है। इस तनाव में ऐसा व्यवहार करने की प्रवृत्ति होती है, जिससे आवश्यकता के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाला तनाव समाप्त हो जाता है।”

2. चालक :
चालक (Driver) की उत्पत्ति आवश्यकताओं के द्वारा होती है। उदाहरण के लिए, पानी व्यक्ति की आवश्यकता है। यह पानी की आवश्यकता ही ‘प्यास चालक को जन्म देती है। इस प्रकार चालक प्राणियों को एक निश्चित प्रकार की क्रियाएँ या व्यवहार के लिए प्रेरित करते हैं।

3. उद्दीपन :
उद्दीपन वे वस्तुएँ हैं, जिनके द्वारा चालकों की सन्तुष्टि होती। है। उदाहरण के लिए, प्यास चालक की सन्तुष्टि पानी के द्वारा होती है। अत: यहाँ पानी उद्दीपन (Incentives) कहलाएगा। इसी प्रकार काम चालक’ का उद्दीपन विपरीत लिंगीय प्राणी होगा। बोरिंग व लैंगफील्ड के अनुसार, “उद्दीप्त को उस वस्तुस्थिति या क्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो व्यवहार को उद्दीप्त और निर्देशित करता है।”

इस प्रकार स्पष्ट है कि आवश्यकता, चालक एवं उद्दीपन का घनिष्ठ सम्बन्ध है। हिलगार्ड (Hilgard) के शब्दों में, “आवश्यकता से चालक का जन्म होता है। चालक बढ़े हुए तनाव की स्थिति है, जो कार्य और आरम्भिक व्यवहार की ओर अग्रसर रहता है। उद्दीपन बाह्य वातावरण की कोई वस्तु होती है, जिससे आवश्यकता की सन्तुष्टि की प्रक्रिया द्वारा चालक की गति मन्द कर देती है।”

4. प्रेरक :
प्रेरक के अन्तर्गत उद्दीपन चालक, आवश्यकता तथा तनाव आदि सभी आ जाते हैं। प्रेरकों (Motives) के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों के विभिन्न मत हैं। कुछ मनोवैज्ञानिक प्रेरकों को जन्मजात शक्तियों मानते हैं तो कुछ इन्हें मुक्ति की शारीरिक या मनोवैज्ञानिक स्थिति मानते हैं। परन्तु अधिकांश मनोवैज्ञानिक प्रेरक को वह शक्ति मानते हैं, जो व्यक्ति को कार्य करने के लिए उत्तेजित करती है। दूसरे शब्दों में, प्रेरक व्यक्ति के व्यवहार की दिशाओं को निर्धारित करते हैं। विभिन्न विद्वानों ने प्रेरकों की परिभाषा निम्नलिखित शब्दों में दी है

  • ब्लेयर, जेम्स व शिसन के अनुसार, “प्रेरक हमारी मौलिक आवश्यकता से उत्पन्न होने वाली वे शक्तियाँ हैं, जो व्यवहार को दिशा और प्रयोजन प्रदान करती हैं।”
  • शेफर तथा अन्य के अनुसार, “प्रेरक क्रिया की एक ऐसी प्रवृत्ति है, जो कि चालक द्वारा उत्पन्न होती है और समायोजन द्वारा समाप्त होती है।”

प्रश्न 2
सीखने में प्रेरणा के स्थान एवं महत्त्व का उल्लेख कीजिए। या प्रेरणा क्या है ? सीखने के लिए प्रेरणा आवश्यक है। इस कथन की पुष्टि कीजिए। [2007, 08]
या
प्रेरणा की उपयुक्त परिभाषा दीजिए। सीखने में प्रेरणा का क्या योगदान है? [2007, 08]
या
प्रेरणा सीखने के लिए अनिवार्य है।” इस कथन की विवेचना कीजिए। [2009, 10]
उत्तर :
[संकेत : प्रेरणा की परिभाषा का अध्ययन उपर्युक्त प्रश्न संख्या 1 के उत्तर के अन्तर्गत करें।]

सीखने में प्रेरणा का स्थान (महत्त्व)
सीखने में प्रेरणा का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। बिना प्रेरणा के हम कुछ सीख ही नहीं सकते। थॉमसन के अनुसार, “बालक की मानसिक क्रिया के बिना विद्यालय में सीखना बहुत कम होता है। सर्वश्रेष्ठ सीखना उस समय होता है, जबकि मानसिक क्रिया सर्वाधिक होती है। अधिकतम मानसिक क्रिया प्रबल प्रेरणा के फलस्वरूप होती है।”

डॉ० सीताराम जायसवाल के अनुसार, “व्यक्ति के अन्दर कुछ ऐसे तत्त्व होते हैं, जिनके कारण व्यक्ति प्रक्रिया करता है। वातावरण के साथ क्रिया किसी विशेष प्रेरक द्वारा प्रेरित होती है। इसी क्रिया के फलस्वरूप सीखना होता है। इस प्रकार सीखने के लिए अभिप्रेरणा अनिवार्य है।”

वास्तव में सीखने में प्रेरणा की प्रमुख भूमिका रहती है। प्रेरणा सीखने में किस प्रकार सहायक हो सकती है, यह निम्नांकित शीर्षकों से स्पष्ट हो जाएगा

1. ध्यान का केन्द्रीकरण :
सीखने में ध्यान का केन्द्रित होना अत्यन्त आवश्यक है। अध्यापक बालकों को विभिन्न ढंग से प्रेरित करके उन्हें अपने पाठ पर ध्यान केन्द्रित करने में सहायता दे सकता है। इसलिए कैली ने लिखा है कि, “सीखने की प्रक्रिया में प्रेरणा का एक केन्द्रीय स्थान है।”

2. रुचि का विकास :
बालक बिना रुचि के अध्ययन नहीं करते। जब बालक में रुचि जाग्रत हो। जाती है, तो वह किसी विषय या तथ्य को तुरन्त समझ जाता है। ध्यान की एकाग्रता और रुचि में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। ऐसी दशा में अध्यापक का कर्तव्य है कि वह प्रेरणा का उचित प्रयोग करके बालकों में अध्ययन के प्रति रुचि जाग्रत करे। थॉमसन के कवि अनुसार, प्रेरणा छात्रों में रुचि जाग्रत करने की कला हैं।”

3. सीखने की इच्छा का विकास :
प्रेरणा से बालकों में सीखने की इच्छा को बलवली बनाया जा सकता है। इसके लिए अध्यापक को छात्रों की समस्या की जानकारी करा देनी चाहिए तथा उनके लक्ष्य का महत्त्व बता देना चाहिए और साथ-ही-साथ उसमें आत्मविश्वास की भावना जाग्रत करनी चाहिए।

4. लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक :
यदि बालकों को लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित किया जाए तो वे अपने कार्य में विशेष लगन और श्रम से जुट जाते हैं। वास्तव में किसी लक्ष्य को प्राप्त करने में प्रेरणा का विशेष हाथ रहता है। अतः अध्यापक को इस दिशा में विशेष ध्यान देना चाहिए।

5. अच्छी आदतों के विकास में सहायक :
अच्छी आदतें नवीन ज्ञान को विकसित करने में सहायक होती हैं। यदि अध्यापक बालकों को श्रेष्ठ आदतें डालने के लिए प्रेरित करें तो उन्हें अनेक लाभ होंगे। यदि उनमें सीखने तथा पढ़ने की आदतों का निर्माण कर दिया जाए तो स्वयं अध्ययन में ध्यान लगाएँगे।

6. ज्ञान की प्राप्ति में सहायक :
प्रेरणा द्वारा बालकों को अधिक ज्ञानार्जन के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। अध्यापकों को चाहिए कि वह प्रभावशाली शिक्षण विधियों का प्रयोग करके बालकों को तीव्र गति से ज्ञानार्जन के लिए प्रेरित करे। इसके लिए वे प्रतियोगिता का सहारा ले सकते हैं।

7. अभिवृत्ति के विकास में सहायक :
प्रेरणा बालकों में अभिवृत्ति का विकास करने में सहायक होती है। अध्यापक उचित ढंग से प्रेरित करके बालकों में श्रेष्ठ अभिवृत्तियों का विकास कर सक अभिवृत्तियों का विकास हो जाने से बालक सरलता से कार्य को सीख जाते हैं।

8. सामाजिक गुणों का विकास :
यदि अध्यापक बालकों को सामुदायिक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रेरित करता है तो उनमें सामाजिकता तथा सामुदायिकता का विकास सरलता से किया जा सकता है। विभिन्न सामाजिक प्रेरकों के द्वारा बालकों को सामाजिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

9. चरित्र के निर्माण में सहायक :
शिक्षा की दृष्टि से चरित्र-निर्माण का विशेष महत्त्व है। एक आदर्श चरित्र वाले व्यक्ति की संकल्पशक्ति तथा चित्त को एकाग्र करने की शक्ति अत्यन्त दृढ़ होती है।  प्रेरणा द्वारा बालकों में विभिन्न सद्गुण उत्पन्न किये जा सकते हैं तथा उनकी इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाया जा सकता है।

10. अनुशासन स्थापना में सहायक :
अनुशासनहीन बालक पढ़ने-लिखने के प्रति लापरवाह होते हैं। प्रेरणा के माध्यम से बालकों में अनुशासन की भावना विकसित की जा सकती है। अध्यापक उन्हें सकार्यों के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रेरणा सीखने तथा शिक्षण प्रक्रिया का मुख्य आधार है।

प्रेरणा का प्रभावशाली प्रयोग करके अध्यापक बालकों को उनके लक्ष्य तक पहुँचा सकता है तथा उनमें सद्गुणों का विकास कर चारित्रिक दृढ़ता उत्पन्न कर सकता है। हैरिस के अनुसार, “प्रेरणा की समस्या शिक्षा मनोविज्ञान और कक्षा-भवन की प्रक्रिया, दोनों के लिए केन्द्रीय महत्त्व की है।”

प्रश्न 3
बालकों को प्रेरित करने की मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
या
शिक्षा में प्रेरणा प्रदान करने की विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
बालक को प्रेरित करने की विधियाँ
सीखने में प्रेरणा का विशेष योगदान रहता है। बालकों को सिखाने में प्रेरणा को एक साधन के रूप में प्रयोग करना प्रत्येक अध्यापक का कर्तव्य है। उसका कर्तव्य है कि बालकों को नवीन ज्ञान प्राप्त करने के लिए अधिक-से-अधिक प्रेरित करे। यहाँ पर हम कुछ ऐसी विधियों का उल्लेख करेंगे, जिनके द्वारा छात्रों को समुचित तरीके से प्रेरित किया जा सकता है

1. आवश्यकताओं का ज्ञान :
प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के वशीभूत होकर कार्य करता है। अध्यापक का कर्तव्य है कि बालकों को पाठ्य-सामग्री की आवश्यकता का ज्ञान कराये। वह बताये कि अमुक विषय का अध्ययन किस आवश्यकता की पूर्ति करता है।

2. संवेगात्मक स्थिति का ध्यान :
अध्यापक को बालकों की संवेगात्मक स्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए। यदि अध्यापक सिखाये जाने वाले विषय का सम्बन्ध बालकों के संवेगों से स्थापित कर देता है। तो उन्हें प्रेरित करने में उसे पूर्ण सफलता मिलेगी। इसके अतिरिक्त प्रत्येक तथ्य का प्रतिपादन इस ढंग से किया जाना चाहिए कि बालक उससे घृणी न करके प्रेम करे।

3. रुचि :
प्रेरणा प्रदान करने के लिए पाठक में रुचि उत्पन्न करना अत्यन्त आवश्यक है। रुचि से सम्बन्धित करके यदि पाठ पढ़ाया। जाएगा तो बालकों को इच्छानुसार प्रेरित करने में सुगमता होगी।

4. खेल – विधि का प्रयोग :
छोटे बालक खेल में विशेष रुचि लेते हैं। यदि बालकों को खेल के माध्यम से ज्ञान प्रदान किया जाएगा तो वे अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित होंगे। छोटे-बालकों के यथासम्भव खेल-विधि द्वारा ही ज्ञान प्रदान किया जाए।

5. कक्षा का वातावरण :
कक्षा का वातावरण भी प्रेरणामय होना चाहिए। प्रत्येक कक्षा का वातावरण विषय और शिक्षण के अनुकूल होना चाहिए। यदि विज्ञान-कक्षा विभिन्न वैज्ञानिक उपकरणों तथा यन्त्रों से सुसज्जित है तो छात्र वैज्ञानिक अध्ययन के लिए सरलता से प्रेरित हो जाएँगे।

6. विद्यालय का वातावरण :
कक्षा के समान सम्पूर्ण विद्यालय का वातावरण भी प्रेरणामय होना चाहिए। विद्यालय में स्थान-स्थान पर विभिन्न विषयों सम्बन्धी सूचनात्मक घट तथा महापुरुषों के चित्र लगे हों, छात्रों को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के अध्ययन की सुविधाएँ प्राप्त हो, विद्यालय में सुन्दर .. पुस्तकालय हो तथा अध्यापक बालकों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करते हों और उन्हें हर प्रकार की सूचना देने में आनन्द का अनुभव करते हों, तो ऐसे विद्यालय के छात्र शीघ्रता से प्रेरणा प्राप्त करेंगे।

7. प्रगति का ज्ञान :
जब बालक को यह ज्ञात हो जाता है कि वह अपने कार्य में पर्याप्त प्रगति कर ‘ रहा है तो वह आगे कार्य करने की प्रेरणा ग्रहण करता है। अतः अध्यापक को चाहिए कि वे बालकों को उनकी प्रगति का भी ज्ञान कराते रहें।

8. सफलता :
जब बालक अपने किसी कार्य में सफलता प्राप्त कर लेता है, तो उसे आगे कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। फ्रेण्डसन (Frandson) के अनुसार, “सीखने के सफल अनुभव अधिक सीखने की प्रेरणाएँ प्रदान करते हैं। ऐसी दशा में अध्यापक को अपना शिक्षण इस ढंग से करना चाहिए, जिससे कि बालक अपने कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकें।

9. परिणाम का ज्ञान :
वुडवर्थ (Wood worth) के अनुसार, “प्रेरणा परिणामों की तात्कालिक जानकारी से प्राप्त होती है। अतः अध्यापक को चाहिए कि वह बालकों को पाठ्य-विषयं की जानकारी भली प्रकार करा दे और शिक्षण प्रारम्भ करने के पूर्व ही उन्हें यह बता दे कि अमुक पाठ्य-विषय के अध्ययन से उन्हें क्या लाभ होगा?

10. विचार गोष्ठी:
विचार गोष्ठियों द्वारा बालकों को प्रभावशाली तरीके से प्रेरित किया जा सकता है। अतः कक्षा में अध्यापक को समय-समय पर विचार गोष्ठियों (Seminars) का आयोजन करना चाहिए।

11. प्रतियोगिता :
बालकों में स्वभावतः प्रतियोगिता एवं प्रतिस्पर्धा की भावनाएँ पायी जाती हैं। इस भावना का प्रयोग करके बालकों को प्रभावशाली ढंग से प्रेरित किया जा सकता है। अतः विद्यालय में प्रतिस्पर्धा की क्रियाओं को पर्याप्त संख्या में आयोजित किया जाए, जिससे कि समस्त छात्र किसी-न-किसी रूप में सफलता प्राप्त कर सकें। इन प्रतियोगिताओं में असफल छात्रों को डॉटा-फटकारा भी न जाए; परन्तु प्रतियोगिता को इतना अधिक महत्त्व न दिया जाए कि विद्यालय की सामूहिकता की भावनां नष्ट हो जाएं।

12. सामाजिक तथा सामुदायिक कार्यों में भाग लेना :
बालकों को सामाजिक तथा सामुदायिक कार्यों में भाग लेने के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए। इन कार्यों में भाग लेने से उनके अहम् की सन्तुष्टि होती है और वे आत्म-सम्मान तथा आत्म-प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए प्रेरित होते हैं।

13. प्रशंसा :
हरलॉक के अनुसार, प्रशंसां एक प्रभावशाली प्रेरक है। अच्छे कार्य की प्रशंसा करके बालकों को प्रेरित किया जा सकता है। अतः अध्यापक को बालकों की समय-समय पर अच्छे कार्यों के लिए प्रशंसा करनी चाहिए।

14. पुरस्कार :
पुरस्कार द्वारा भी बालकों को प्रोत्साहित तथा प्रेरित किया जा सकता है। पुरस्कार पाकर बालक प्रफुल्लित होते हैं और वे कार्य करने के लिए प्रेरित होते हैं। पुरस्कार बालकों के मनोबल को भी ऊँचा उठाते हैं। इसमें बालकों में प्रतिस्पर्धा की भावना का भी विकास होता है और वे अधिक लगन तथा उत्साह से कार्य करते हैं। इसके साथ-ही-साथ पुरस्कार बालकों के अहम् की भी सन्तुष्टि करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्रेरकों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
विभिन्न विद्वानों ने प्रेरकों का वर्गीकरण निम्नवत् किया है
1. थॉमसन (Thomson) के अनुसार

  • स्वाभाविक प्रेरक तथा
  • कृत्रिम प्रेरक

2. गैरेट के अनुसार

  • जैविक व मनोवैज्ञानिक प्रेरक तथा
  • सामाजिक प्रेरक

3. मैस्लो (Maslow) के अनुसार

  • जन्मजात प्रेरक तथा
  • अर्जित प्रेरका

प्रेरकों के मुख्य प्रकारों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित हैं

1. जन्मजात प्रेरक :
ये प्रेरक जन्मजात होते हैं। इसके अन्तर्गत भूख, प्यास, सुरक्षा, यौन आदि प्रेरक आते हैं।

2. अर्जित प्रेरक :
ये प्रेरक वातावरण से प्राप्त होते हैं और इनको अर्जित किया जाता है। आदत्, रुचि, सामुदायिकता आदि अर्जित प्रेरकों के स्वरूप हैं।

3. सामाजिक प्रेरक :
इनका व्यक्तियों के व्यवहार पर विशेष प्रभाव पड़ता है। ये मुख्य रूप से सामाजिक आदर्शो, स्थितियों तथा परम्पराओं के कारण उत्पन्न होते हैं। आत्म-प्रदर्शन, आत्म-सुरक्षा, जिज्ञासा तथा रचनात्मकता सामाजिक प्रेरक हैं।

4. मनोवैज्ञानिक प्रेरक :
इनका जन्म प्रबल मनोवैज्ञानिक दशाओं के कारण होता है। इन प्रेरकों में प्रेम, दुःख, भय, क्रोध तथा आनन्द आते हैं।

5. स्वाभाविक प्रेरक :
स्वाभाविक प्रेरक व्यक्ति के स्वभाव में ही पाये जाते हैं। खेल, सुझाव, अनुकरण, सुख प्राप्ति और प्रतिष्ठा आदि ऐसे ही प्रेरक हैं।

6. कृत्रिम प्रेरक :
कृत्रिम प्रेरक मुख्यतया स्वभाविक प्रेरकों के पूरक के रूप में कार्य करते हैं। सहयोग, व्यक्तिगत तथा सामूहिक कार्य, पुरस्कार, दण्ड व प्रशंसा आदि इन प्रेरकों के रूप हैं। ये व्यक्ति के कार्य तथा व्यवहार को नियन्त्रित तथा प्रोत्साहित करते हैं।

प्रश्न 2
जन्मजात तथा अर्जित प्रेरकों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
जन्मजात एवं अर्जित दोनों ही प्रकार के प्रेरक मनुष्य की आन्तरिक स्थिति से सम्बन्ध रखते हुए उसमें ऐसी क्रियाशीलता पैदा करते हैं जो लक्ष्य की प्राप्ति तक चलती रहती है। इस मौलिक समानता के बावजूद इनके मध्य निम्नलिखित अन्तर दृष्टिगोचर होते हैं
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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सकारात्मक प्रेरणा तथा नकारात्मक प्रेरणा से क्या आशय है ?
उत्तर :
प्रेरणा मुख्यतः दो प्रकार की होती है सकारात्मक प्रेरणा तथा नकारात्मक प्रेरणा, इन दोनों प्रकार की प्रेरणाओं का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है

1. सकारात्मक प्रेरणा :
इसे आन्तरिक प्रेरणा भी कहते हैं। इस प्रेरणा में व्यक्ति किसी कार्य को अपनी इच्छा से करता है।

2. नकारात्मक प्रेरणा :
इसमें व्यक्ति किसी कार्य को स्वयं अपनी इच्छा से न करके अन्य व्यक्तियों की इच्छा या बाह्य प्रभाव के कारण करता है। यह बाह्य प्रेरणा भी कहलाती है। अध्यापक पुरस्कार, प्रशंसा, निन्दा आदि का प्रयोग करके अपने छात्रों को नकारात्मक प्रेरणा प्रदान करता है।

शिक्षक को चाहिए कि वह यथासम्भव सकारात्मक प्रेरणा का प्रयोग करके बालकों को अच्छे कार्यों में लगाये। परन्तु जब सकारात्मक प्रेरणा से प्रयोजन सिद्ध न हो सके, तभी उसे नकारात्मक प्रेरणा का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 2
प्रेरणायुक्त व्यवहार के मुख्य लक्षण क्या हैं ?
उत्तर :
प्रेरणायुक्त व्यवहार के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं

1. अधिक शक्ति का संचालन :
प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति के शरीर में शक्ति को अधिक संचालन हो जाता है। ऐसे में व्यक्ति के समस्त कार्य भी कर सकता है जो सामान्य दशा में उनके लिए कठिन होते हैं।

2. परिवर्तनशीलता :
प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति करने के लिए किये  जाने वाले प्रयासों में बार-बार परिवर्तन भी करता है।

3. निरन्तरता :
प्रबल प्रेरणा की दशा में जब तक लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक व्यक्ति निरन्तर प्रयास करता रहता है।

4. लक्ष्य प्राप्त करने की व्याकुलता :
प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति को लक्ष्य को प्राप्त करने की व्याकुलता रहती है।

5. लक्ष्य-प्राप्ति :
जब लक्ष्य-प्राप्ति हो जाती है तब व्यक्ति की व्याकुलता समाप्त हो जाती है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
किसी कार्य को करने के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक को क्या कहते हैं ?
उत्तर :
किसी कार्य को करने के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक को प्रेरणा कहते हैं।

प्रश्न 2
प्रेरणा के नितान्त अभाव का व्यक्ति के कार्यों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
प्रेरणा के नितान्त अभाव में व्यक्ति द्वारा कोई कार्य सम्पन्न हो ही नहीं सकता।

प्रश्न 3
प्रेरणा की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
“प्रेरणा वे शारीरिक तथा मानसिक दशाएँ हैं, जो किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती हैं।” [मैक्डूगल]

प्रश्न 4
“अभिप्रेरणा किसी कार्य को प्रारम्भ करने, जारी रखने और नियन्त्रित करने की प्रक्रिया है।” यह कथन किसका है? [2007]
उत्तर :
अभिप्रेरणा सम्बन्धी प्रस्तुत कथन गुड (Good) का है।

प्रश्न 5
प्रेरणायुक्त व्यवहार का मुख्य लक्षण क्या होता है?
उत्तर :
प्रेरणायुक्त व्यवहार का मुख्य लक्षण है अतिरिक्त शक्ति का संचालन।

प्रश्न 6
अभिप्रेरणा (प्रेरणा) का कोई एक वर्गीकरण बताइए।
उत्तर :
अभिप्रेरणा के एक वर्गीकरण के अन्तर्गत प्रेरणा को दो वर्गों में बाँटा जाता है

  1. जन्मजात प्रेरक तथा
  2. अर्जित प्रेरक

प्रश्न 7
मुख्य जन्मजात प्रेरक कौन-कौन-से हैं?
उत्तर :
मुख्य जन्मजात प्रेरक हैं-भूख, प्यास, निद्रा तथा काम।

प्रश्न 8
प्रशंसा एवं निन्दा किस प्रकार के प्रेरक है?
उत्तर :
प्रशंसा एवं निन्दा सामान्य अर्जित प्रेरक हैं।

प्रश्न 9
अभिप्रेरणा का सीखने पर क्या प्रभाव पड़ता है ? [2008]
उत्तर :
अभिप्रेरणा की दशा में सीखने की प्रक्रिया सुचारु तथा अच्छे रूप में सम्पन्न होती है।

प्रग 10
प्रेरणा के प्रारम्भ के लिए कौन उत्तरदायी होता है?
उत्तर :
प्रेरणा के प्रारम्भ के लिए आवश्यकता की अनुभूति उत्तरदायी होती है।

न 11
प्रेरणा की उत्पत्ति का स्वाभाविक कारण क्या है ? [2011]
उत्तर :
प्रेरणा की उत्पत्ति का स्वाभाविक कारण है-आवश्यकताओं को अनुभव करना एवं आदत।

प्रश्न 12
भूख कैसा प्रेरक है? [2015]
उत्तर :
भूख एक प्रमुख जन्मजात प्रेरक है।

प्रश्न 13
“अभिप्रेरणा सीखने के लिए राजमार्ग है।” किसने कहा है? [2011, 13, 14, 16]
उत्तर :
स्किनर (Skinner) ने।

प्रश्न 14
अभिप्रेरणा से क्या आशय है? [2016]
उत्तर :
अभिप्रेरणा वह मानसिक क्रिया है, जो किसी प्रकार के व्यवहार को प्रेरित करती है।

प्रश्न 15
निम्नलिखित कथन सत्य हैं
या
असत्य

  1. व्यक्ति के समस्त व्यवहार के पीछे निहित मुख्य कारक प्रेरणा ही है।
  2. प्रेरणाओं के नितान्त अभाव में व्यक्ति पूर्ण रूप से निष्क्रिय हो जाता है।
  3. भूख एवं प्यास मुख्य अर्जित प्रेरक हैं।
  4. शिक्षा के क्षेत्र में प्रेरणा का विशेष महत्त्व है।
  5. जीवन में सूफलता प्राप्ति के लिए प्रेरणाओं का विशेष योगदान होता है।

उत्तर :

  1. सत्य
  2. संय
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
किसी भी व्यवहार के सम्पन्न होने के लिए अनिवार्य कारक है
(क) चिन्तन
(ख) लाभ प्राप्ति की आशा
(ग) प्रेरणा
(घ) संवेग
उत्तर :
(ग) प्रेरणा

प्रश्न 2
“अभिप्रेरणा एक ऐसी मनोदैहिक प्रक्रिया है, जो किसी आवश्यकता की उपस्थिति में  उत्पन्न होती है। वह ऐसी प्रक्रिया की ओर गतिशील होती है, जो आवश्यकता को सन्तुष्ट करती है। यह परिभाषा किसकी है?
(क) लावेल की
(ख) वुडवर्थ की
(ग) गिलफोर्ड की
(घ) शेफर की
उत्तर :
(क) लावेल की

प्रश्न 3
“प्रेरक कोई एक विशेष आन्तरिक कारक यो दशा है, जिसमें किसी क्रिया को आरम्भ करने और बनाये रखने की प्रवृत्ति होती है।” यह परिभाषा किसने दी है ?
(क) मैक्डूगल ने
(ख) वुडवर्थ ने
(ग) गिलफोर्ड ने।
(घ) हिलगार्ड ने
उत्तर :
(ग) गिलफोर्ड ने

प्रश्न 4
प्रेरणा का स्वाभाविक कारण है [2015]
(क) आदत
(ख) संस्कार
(ग) रुचि
(घ) संवेग
उत्तर :
(घ) संवेग

प्रश्न 5
प्रेरणा की उत्पत्ति को अर्जित कारण है
(क) आत्मरक्षा की भावना
(ख) मूल-प्रवृत्तियाँ
(ग) अचेतन मन
(घ) रुचि
उत्तर :
(घ) रुचि

प्रश्न 6
भूख और प्यास कैसे प्रेरक हैं ? [2013]
(क) व्यक्तिगत
(ख) सामाजिक
(ग) जन्मजात
(घ) अर्जित
उत्तर :
(ग) जन्मजात

प्रश्न 7
प्रेरणा छात्र में रुचि उत्पन्न करने की कला है।” यह किसका मत है ?
(क) गेट्स का
(ख) वुडवर्थ का
(ग) थॉमसने का
(घ) जे० एस० रॉस का
उत्तर :
(ग) थॉमसन का ।

प्रश्न 8
प्रेरणा परिणामों के तत्कालिक ज्ञान से प्राप्त होती है।” यह कथन किसका है?
(क) वुडवर्थ का
(ख) मैक्डूगल को
(ग) हिलगार्ड का
(घ) कोहलर का
उत्तर :
(क) वुडवर्थ को

प्रश्न 9
शिक्षा के प्रति प्रेरित बालक के लक्षण हैं
(क) अनुशासन के प्रति ईमानदार
(ख) अध्ययन में एकाग्रता
(ग) सद्गुणों तथा अच्छी आदतों से युक्त
(घ) ये सभी लक्षण
उत्तर :
(घ) ये सभी लक्षणे

प्रश्न 10
व्यक्ति की जन्मजात प्रेरणा है [2012, 14]
(क) आदत
(ख) मनोरंजन
(ग) भूख
(घ) महत्त्वाकांक्षा का स्तर
उत्तर :
(ग) भूख

प्रश्न 11
गैरेट के अनुसार प्रेरणा के कितने प्रकार हैं? [2016]
(क) 5
(ख) 3
(ग) 8
(घ) 6
उत्तर :
(ख) 3

प्रश्न 12
‘प्यास किस प्रकार का प्रेरक है? [2016]
(क) अजित
(ख) जन्मजात
(ग) सामाजिक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) जन्मजात

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