UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 10 मैथिलीशरण गुप्त (काव्य-खण्ड)

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कवि-परिचय

प्रश्न 1.
कवि मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय दीजिए एवं उनकी काव्य-कृतियों (रचनाओं) के नाम लिखिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हिन्दी काव्य-जगत् के अनुपम रत्न हैं। इनका जन्म सन् 1886 ई० में चिरगाँव (झाँसी) में हुआ था। इनके पिता सेठ रामचरण गुप्त बड़े ही धार्मिक, काव्यप्रेमी और निष्ठावान् व्यक्ति थे। पिता के संस्कार पुत्र को पूरी तरह प्राप्त थे। बाल्यावस्था में ही एक छप्पय की रचना कर इन्होंने अपने पिता से सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया था। इनकी शिक्षा का विधिवत् प्रबन्ध घर पर ही किया गया, जहाँ इन्होंने अंग्रेजी, संस्कृत और हिन्दी का अध्ययन किया। इनकी आरम्भिक रचनाएँ कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) से प्रकाशित होने वाले ‘वैश्योपकारक’ पत्र में छपती थीं। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आने के बाद इनकी प्रतिभा प्रस्फुटित हुई और इनकी रचनाएँ। ‘सरस्वती’ में छपने लगीं। ‘साकेत’ महाकाव्य के सृजन पर इनको ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ द्वारा ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ से सम्मानित किया गया। इनकी साहित्यिक उपलब्धियों के कारण ही आगरा तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा इनको डी० लिट्० की मानद उपाधि से विभूषित किया गया था। इनकी साहित्य-सेवा के कारण ही भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया था। ये राज्यसभा के लिए दो बार मनोनीत किये गये। जीवन के अन्तिम समय तक ये साहित्य-सृजन करते रहे। सरस्वती का यह महान् साधक 12 दिसम्बर, 1964 ई० को पंचतत्त्व में विलीन हो गया।

रचनाएँ-गुप्त जी की चालीस मौलिक तथा छः अनूदित पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उनमें से प्रमुख हैं-‘भारत भारती’, ‘रंग में भंग’, ‘जयद्रथ वध’, ‘पंचवटी’, ‘अनघ’, ‘हिन्दू’, ‘गुरुकुल’, ‘अलंकार’, ‘साकेत’, ‘यशोधरा’, ‘मंगल घट’, ‘नहुष’, ‘कुणाल गीत’, ‘द्वापर’, ‘विष्णुप्रिया’, दिवोदास’, ‘मेघनाद वध’, ‘विरहिणी ब्रजांगना’,’जय भारत’, ‘सिद्धराज’, ‘झंकार’,’पृथिवीपुत्र’, ‘प्लासी का युद्ध’ आदि।।

साहित्य में स्थान--मैथिलीशरण गुप्त भारतीय संस्कृति के अमर गायक, उद्भट प्रस्तोता और सामाजिक चेतना के प्रतिनिधि कवि थे। इन्हें राष्ट्रकवि होने का गौरव प्राप्त है। गुप्त जी खड़ीबोली के उन्नायकों में प्रधान हैं। इन्होंने खड़ीबोली को काव्य के अनुकूल भी बनाया और जनरुचि को भी उसकी ओर प्रवृत्त किया। अपनी रचनाओं में गुप्त जी ने खड़ीबोली के शुद्ध, परिष्कृत और तत्सम-बहुल रूप को ही अपनाया है। इनकी भाषा भावों के अनुकूल है तथा काव्य में अलंकारों के सहज-स्वाभाविक प्रयोग हुए हैं। सादृश्यमूलक अलंकार इनके सर्वाधिक प्रिय अलंकार हैं। हिन्दी की आधुनिक युग की समस्त काव्य-धाराओं को गुप्त जी ने अपने साहित्य में अपनाया है। इनके द्वारा प्रयुक्त की गयी प्रमुख शैलियाँ । हैं—विवरणात्मक, प्रबन्धात्मक, उपदेशात्मक, गीति तथा नाट्य। मुक्तक एवं प्रबन्ध दोनों काव्य-शैलियों का इन्होंने सफल प्रयोग किया है। इनकी रचनाओं में छन्दों की विविधता दर्शनीय है। सभी प्रकार के प्रचलित छन्दों; जैसे-हरिगीतिका, वसन्ततिलका, मालिनी, घनाक्षरी, द्रुतविलम्बित आदि में इनकी रचनाएँ उपलब्ध

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में आप “निस्सन्देह हिन्दी-भाषी जनता के प्रतिनिधि कवि कहे जा सकते हैं।’

पद्यांशों की सुन्दर्भ व्याख्या

भारत माता का मंदिर यह
प्रश्न 1.
भारत माता का मंदिर यह
समता का संवाद जहाँ,
सबका शिव कल्याण यहाँ है।
पावें सभी प्रसाद यहाँ।
जाति-धर्म या संप्रदाय का,
नहीं भेद-व्यवधान यहाँ,
सबका स्वागत, सबका आदर
सबका सम सम्मान यहाँ।
राम, रहीम, बुद्ध, ईसा की,
सुलभ एक सा ध्यान यहाँ,
भिन्न-भिन्न भव संस्कृतियों के
गुण गौरव का ज्ञान यहाँ।
उत्तर
[ शिव = मंगलकारी। संप्रदाय = धार्मिक मत या सिद्धान्त। स्वागत = किसी के आगमन पर कुशल-प्रश्न आदि के द्वारा हर्ष प्रकार, अगवानी। भव = संसार।]

सन्दर्भ-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘काव्य-खण्ड’ में संकलित एवं मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘भारत माता का मंदिर यह’ शीर्षक से उधृत है।

[विशेष—इस शीर्षक के अन्तर्गत आने वाले सभी पद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने समस्त भारतभूमि को भारत माता का मंदिर (पवित्र स्थल) बताते हुए उसकी विशेषताओं का वर्णन किया है।

व्याख्या-इन पंक्तियों में कवि अपने देश (भारतभूमि) को भारत माता का मंदिर बताते हुए कहता है कि भारत माता का यह ऐसा मंदिर है जिसमें समानता की ही चर्चा होती है। यहाँ पर सभी के कल्याण की वास्तविक कामना की जाती है और यहीं पर सभी को परम सुख रूपी प्रसाद की प्राप्ति होती है।

इस मंदिर की यह विशेषता है कि यहाँ पर जाति-धर्म या संप्रदाय वाद का कोई भेदभाव नहीं है यानि इस मंदिर में ऐसा कोई व्यवधान या समस्या नहीं है कि कौन किस वर्ग का है। सभी समान हैं। सभी का स्वागत है और सभी को बराबर सम्मान है। कोई किसी भी सम्प्रदाय को मानने वाला हो; चाहे वह हिन्दुओं के इष्टदेव राम हों, मुस्लिमों के इष्ट रहीम हों, चाहे बौद्धों के इष्ट बुद्ध हों या चाहे ईसाइयों के इष्ट ईसामसीह हों यानि इस मंदिर में सभी को बराबर सम्मान है, सभी के स्वरूप का बराबर-बराबर चिन्तन किया जाता है। सभी की ही बराबर पूजा की जाती है। ।

अलग-अलग संस्कृतियों के जो गुण हैं, जिनके द्वारा सम्पूर्ण संसार के मर्म को अलग-अलग रूपों में संचित किया गया है वे सभी इस भारत माता के मंदिर में एकत्र हैं अर्थात् भारत माता के इस पावन मंदिर में सम्पूर्ण संस्कृतियों का समावेश है।

कहने का तात्पर्य यह है कि चाहे कोई भी देश हो सभी के अपने-अपने अलग-अलग धर्म, अलगअलग सम्प्रदाय, अलग-अलग सिद्धान्त तथा अलग-अलग पवित्र स्थल होते हैं किन्तु हमारा भारत देश एक ऐसी पवित्र तीर्थ स्थल है जहाँ निवास करने वाला प्रत्येक प्राणी सभी धर्मों को मानने वाला तथा सबको सम. भाव से समझने वाला है। हमारा देश अनेकता में एकता का देश है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ इसकी भावना है। |

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. अनेकता में एकता का अद्वितीय चित्रण किया गया है।
  2. राष्ट्रप्रेम और स्वदेशाभिमान की भावना को प्रेरित किया गया है।
  3. भाषा–खड़ी बोली।
  4. गुण–प्रसाद।
  5. अलंकार-रूपक, अनुप्रास।
  6. छन्द-गेय।
  7. शैली-मुक्तक।
  8. भावसाम्य-वियोगी हरि द्वारा रचित ‘विश्व मंदिर’।

प्रश्न 2.
नहीं चाहिए बुद्ध बैर की ।
भला प्रेम का उन्माद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है,
पावें । सभी प्रसाद यहाँ।
सब तीर्थों का एक तीर्थ यह.
हृदय पवित्र बना : लें हम
आओ यहाँ अजातशत्रु बन,
सबको मित्र बना लें हम।।
उत्तर
[ उन्माद = अत्यधिक अनुराग। अजातशत्रु = जिसका कोई शत्रु न हो।]

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि ने लोगों से भारत माता मंदिर के गुणों को अपने जीवन-चरित्र में उतारने की बात कही है।

व्याख्या-उक्त पंक्तियों में कवि कह रहा है कि हमें ऐसी उन्नति कदापि प्रिय नहीं है जो ईष्र्या से युक्त हो। इस भारत माता के मंदिर में सबके कल्याण और प्रेम का अत्यधिक अनुराग भरा पड़ा है। यहाँ पर सभी का मंगल कल्याण है और यहीं पर सभी को परम सुखरूपी प्रसाद की प्राप्ति होती है।

यह भारत माता का मंदिर सभी तीर्थों में उत्तम तीर्थ है क्योंकि यह किसी एक संप्रदाय या किसी धर्म से जुड़ा तीर्थ नहीं है। यद्यपि इसमें सभी तीर्थों का समावेश है, इसलिए इस तीर्थ का तीर्थाटन करके अपने हृदय को हम पवित्र बना लें। यह ऐसा पवित्र व उत्तम स्थान है जहाँ पर कोई किसी का शत्रु नहीं है इसलिए यहाँ बसकर हम सबको अपना मित्र बना लें। यहाँ पर रेखाओं के रूप में कल्याणकारी व मंगलकारी कामनाओं (इच्छाओं) के चित्रों को उकेरकर उनको साकार रूप देकर हम अपने मनोभावों को पूर्ण कर लें। अर्थात् यह भारत माता का मंदिर ऐसा पवित्र स्थल है जहाँ ईष्र्या-द्वेष लेश मात्र भी नहीं है। ऐसे पावन मंदिर में बसकर हम अपने जीवन को धन्य बना सकने में और अपनी मानवता को साकार रूप दे पाने में सफल हो पाएँगे।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. भारत माता के मंदिर के रूप में मानवता की साकार मूर्ति का चित्रांकन।
  2. कवि की शब्द-शक्ति के द्वारा प्रेम से परिपूर्ण दुनिया का निर्माण करना।
  3. भाषा-खड़ी बोली।
  4. गुण–प्रसाद।
  5. छन्द-गेय।
  6. शैली मुक्तक
  7. अलंकार-रूपक।
  8. भाव-साम्यवियोगी हरि द्वारा रचित ‘विश्व मंदिर।। |

प्रश्न 3.
बैठो माता के आँगन में
नाता भाई-बहन का।
समझे उसकी प्रसव वेदना
वही लाल है माई का
एक साथ मिल बाँट लो।
अपनी हर्ष विषाद यह है ।
सबका शिव कल्याण यह है,
पावें सभी प्रसाद यहाँ।
उत्तर
[आँगन = घर। लाल = पुत्र। विषाद = कष्ट।]

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि ने भारत माता के इस पवित्र सदन में निवास करने वाले सभी लोगों के बीच वास्तविक रिश्ते को उजागर किया है। |

व्याख्या-प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि यहाँ (भारत में) निवास करने वाले लोगों से कहता है। कि आइए माँ के इस पवित्र सदन में बैठिए। हम सबका यहाँ पर भाई-बहन का रिश्ता है अर्थात् एक घर (भारत) में निवास करने वाले हम सभी आपस में भाई-बहन के समान हैं और हमारा कर्तव्य है कि हम सब अपनी माँ (भारत माता) के कष्टों को महसूस करें; क्योंकि सच्चा पुत्र वही होता है जो अपनी माता के कष्टों को समझता है तथा उसके लिए हर क्षण समर्पण की भावना अपने मन में रखता है। हम सभी भाई-बहनों का यह उद्देश्य होना चाहिए कि किसी-को-किसी प्रकार का कष्ट न हो। सभी एक-दूसरे के सहयोग के लिए तैयार रहें। क्योंकि यह भारत माता का मंदिर है इसलिए यहीं पर हम सबका मंगल कल्याण है और यहीं पर सभी को परम सुख रूपी प्रसाद भी प्राप्त है। कहने का तात्पर्य यह है कि हम सब भारतवासी एक माँ (भारत माता) की सन्तानें हैं और आपस में सभी भाई-बहन के समान हैं। हमें आपस में मिल-जुलकर रहना चाहिए। और एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. समस्त भारतवासियों का भाई-बहन के रूप में वास्तविक चित्रण किया गया है।
  2. सम्पूर्ण भारत देश का एक सदन के सदृश सुन्दर चित्रण हुआ है।
  3. भाषा-खड़ी बोली।
  4. शैली-मुक्तक।
  5. अलंकार-रूपक
  6. भावसाम्य-महान संत तिरुवल्लुवर ने भी अपने एक कुरले. (दोहे) के माध्यम से ऐसे ही भाव प्रकट किए हैं—

कपट, क्रोध, छल, लोभ से रहित प्रेम-व्यवहार।
सबसे मिल-जुलकर रहो, सकल विश्व परिवार॥

प्रश्न 4.
मिला सेव्य का हमें पुजारी
सकल काम उस न्यायी का
मुक्ति लाभ कर्त्तव्य यहाँ है।
एक-एक अनुयायी का
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
उठे एक जयनाद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ।
उत्तर
[सेव्य = सेवा करने वाला। अनुयायी = किसी मत का अनुसरण करने वाला। जयनाद = जयघोष।]

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने भारतवासियों को भारतभूमि में जन्म लेने पर धन्य होने की बात । कही है।

व्याख्या—इन पंक्तियों के माध्यम से कवि मैथिलीशरण गुप्त जी कह रहे हैं कि हमारा परम सौभाग्य है जो हमें इस पावन भूमि (भारत) में जन्म मिला और भारत माता की सेवा करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। यह ईश्वर की हमारे ऊपर बहुत बड़ी कृपा है। यहाँ के प्रत्येक अनुयायी का यह कर्तव्य बनता है कि वह इस मौके का सम्पूर्ण लाभ उठाकर मुक्ति प्राप्त करें। भारत माता के इस पावन मंदिर में करोड़ों स्वर एक साथ मिलकर जयघोष करते हैं अर्थात् यहाँ निवास करने वाले सभी लोग एक स्वर में जय-जयकार करते हैं। भारत माता के इस पावन मंदिर में सबके मंगलकारी कल्याण की कामना की जाती है और सभी को यहाँ परमसुख रूपी प्रसाद की प्राप्ति होती है। कहने का तात्पर्य है कि जिसने भारत में जन्म लिया है उसका यह सौभाग्य है कि उसने मोक्ष के मार्ग को खोज लिया है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. प्रस्तुत पंक्तियों में देशभक्ति का सच्चा अनुराग दर्शाया गया है।
  2. भाषा-सरल, सहज एवं प्रवाहयुक्त खड़ी बोली।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. अलंकार–रूपक।
  5. भाव-साम्य-ऐसी ही भाव-व्यंजना सुभद्राकुमारी चौहान ने अपनी इन पंक्तियों के द्वारा व्यक्त की है

सुनूंगी माता की आवाज,
रहूंगी मरने को तैयार,
कभी भी उस वेदी पर देव,
न होने देंगी अत्याचार।
न होने देंगी अत्याचार,
चलो मैं हो जाऊं बलिदान,
मातृ-मन्दिर में हुई पुकार,
चढ़ा दो मुझको हे भगवान!

काव्य-सौदर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है
(क) सबका स्वागत, सबको आदर
सबको सर्म सम्मान यहाँ।
(ख) बैठो माता के आँगने में
नाता भाई-बहन का
समझे उसकी प्रसव वेदना
वही लाल है. माई का।
उत्तर
(क) अनुप्रास अलंकार।
(ख) रूपक अलंकार।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पदों में प्रत्ययों को मूल शब्द से अलग करके लिखिए-
समता, संस्कृति, पुजारी
उत्तर
समता = सम् + ता।
संस्कृति = संस्कृत + इ।
पुजारी = पूजा + आरी।।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पदों का सनाम सन्धि-विच्छेद कीजिए-
संवाद, सम्मान, पवित्र
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 10 मैथिलीशरण गुप्त (काव्य-खण्ड) 1

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