RBSE Solutions for Class 9 Science Chapter 15 प्राकृतिक सम्पदा एवं कृषि

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BoardRBSE
TextbookSIERT, Rajasthan
ClassClass 9
SubjectScience
ChapterChapter 15
Chapter Nameप्राकृतिक सम्पदा एवं कृषि
Number of Questions Solved85
CategoryRBSE Solutions

Rajasthan Board RBSE Class 9 Science Chapter 15 प्राकृतिक सम्पदा एवं कृषि

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

वस्तुनिष्ठ

प्रश्न 1.
किसी खेत में नियोजित कार्यक्रम के अनुसार फसलों को बदल-बदल कर बोना कहलाता है-
(अ) मिश्रित फसल
(ब) मिश्रित कृषि
(स) फसल चक्र
(द) अन्तराफसल।
उत्तर:
(स) फसल चक्र

प्रश्न 2.
वायुमण्डल में आयतन के अनुसार कार्बन डाइ ऑक्साइड पायी जाती है-
(अ) 0-03%
(ब) 0-003%
(स) 0-0003%
(द) 0-3%.
उत्तर:
(अ) 0-03%

प्रश्न 3.
अम्लीय वर्षा निम्न में से किसका परिणाम है-
(अ) वायु प्रदूषण
(ब) जल प्रदूषण
(स) मृदा प्रदूषण
(द) ध्वनि प्रदूषण।
उत्तर:
(द) ध्वनि प्रदूषण।

प्रश्न 4.
निम्न में से पौधे को मृदा से प्राप्त होने वाला पोषक तत्व
(अ) कार्बन
(ब) हाइड्रोजन
(स) आक्सीजन
(द) नाइट्रोजन ।
उत्तर:
(द) नाइट्रोजन ।

प्रश्न 5.
निम्न में से खरीफ की फसल है-
(अ) सोयाबीन
(ब) गेहूँ
(स) चना
(द) मटर।
उत्तर:
(अ) सोयाबीन

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 6.
वायु की गति मापने वाले उपकरण का नाम लिखो।
उत्तर:
एनिमोमीटर

प्रश्न 7.
प्रदूषण किसे कहते हैं ?
उत्तर:
वायु, मृदा व जल के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में किसी भी प्रकार का अवांछनीय परिवर्तन प्रदूषण कहलाता है।

प्रश्न 8.
प्राकृतिक संसाधन किसे कहते हैं ?
उत्तर:
प्राकृतिक संसाधन हमारे जलमण्डल, वायुमण्डल व स्थलमण्डल के वह घटक हैं जो जीवन को आधार प्रदान करते हैं, अर्थात् जीव जिन्हें उपयोग करते हैं, जैसे-ऊर्जा, जल, मृदा, खनिज, जन्तु व पादप।

प्रश्न 9.
शैवाल ब्लूम क्या हैं ?
उत्तर:
जलाशयों में पोषक पदार्थों की वृद्धि के कारण तैरने वाली शैवालों की हानिकारक अतिशय वृद्धि, जो दुर्गन्धकारी होती है, व जल में ऑक्सीजन की कमी कर देती है, कभी-कभी विषाक्तता भी उत्पन्न करती है। यह जल को विशिष्ट रंग भी प्रदान कर देते हैं, शैवाल ब्लूम कहलाता है।

प्रश्न 10.
ध्वनि बूम क्या है ?
उत्तर:
ध्वनि की गति से भी तेज चलने वाले सुपर सोनिक जेट अपने पीछे ध्वनि तरंगों को छोड़ता जाता है, इन्हें ही ध्वनि बूम (Sonic boom) कहते हैं।

प्रश्न 11.
मिश्रित कृषि किसे कहते हैं ?
उत्तर:
फसलों को उगाने के साथ-साथ पशुपालन, मधुमक्खी पालन आदि भी करना मिश्रित कृषि कहलाता है।

प्रश्न 12.
वायुमण्डल में सबसे अधिक पायी जाने वाली गैस का क्या नाम है ?
उत्तर:
नाइट्रोजन (78% से भी कुछ अधिक)

प्रश्न 13.
पादप श्वसन क्रिया में किस गैस का उपयोग करते हैं ?
उत्तर:
आक्सीजन का।

प्रश्न 14.
वायु की गति का क्या कारण है ?
उत्तर:
पृथ्वी के धरातल पर वायु दाब में अन्तर के कारण वायु में गति उत्पन्न होती है।

प्रश्न 15.
सबसे अधिक अण्डे देने वाली मुर्गी की नस्ल का नाम लिखो।
उत्तर:
व्हाइट लैगहॉर्न ।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ह्यूमस क्या है ? ह्युमस से क्या लाभ है ?
उत्तर:
मृत पादप अवशेष, जैसे–पत्तियाँ, छल, फूल, सूखे फल व मृत जन्तु अवशेष उनके मल पर सूक्ष्म जीवों की प्रक्रिया से मृदा में एक गहरे रंग का रवाहीन अर्थात् (Amorphous) पदार्थ एकत्रित होता है। यही ह्यूमस (humus) कहलाता है। ह्ययुमस के निम्न लाभ हैं-

  1. स्वभाव में कोलाइडी होने के कारण यह पोषक पदार्थों के भण्डार (reservior) की तरह कार्य करता है तथा धीरे-धीरे इन पोषक तत्वों को मृदा में मुक्त करता रहता है। अतः खनिजों का उत्तम स्रोत है।
  2. यह मृदा की बनावट (texture) में सुधार करता है व उसकी उपजाऊ क्षमता बढ़ाता है।
  3. यह मृदा की जलधारण क्षमता बढ़ाता है।
  4. यह सूक्ष्मजीवी क्रियाओं के प्रति प्रतिरोधी होता है।

प्रश्न 2.
अम्लीय वर्षा कैसे होती है ? अम्लीय वर्षा के दुष्प्रभाव लिखो।
उत्तर:
वायु प्रदूषण के लिए उत्तरदायी गैसें, जैसे-नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO2), सल्फरडाई ऑक्साइड (SO2) जल वाष्प से क्रियाकर क्रमशः HNO3 व H2SO4 अम्ल बना देती हैं। ये अम्ल अन्तत: स्वत: या वर्षा के जल के साथ पृथ्वी पर आ जाते हैं। यही अम्लीय वर्षा (Acid rain) कहलाती है।
अम्लीय वर्षा के दुष्प्रभाव –

  1. अम्लीय वर्षा मार्बल, धातु व पत्थरों की कलाकृतियों/ऐतिहासिक इमारतों का क्षरण कर देती है।
  2. अम्लों का जमाव फसल को भी प्रभावित करता है। जिससे मृदा की अम्लीयता बढ़ जाती है।
  3. अनेक देशों में वनों व झीलों को अम्लीय वर्षा से काफी नुकसान हुआ है। इन क्षेत्रों में वन समाप्त हो रहे हैं व झीलों में मछली उत्पादन बन्द हो गया है।

प्रश्न 3.
जैव रासायनिक आवश्यक ऑक्सीजन माँग क्या है ?
उत्तर:
जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग (Biochemi-cal 0xygen Demand) – ऑक्सीजन की वह मात्रा जो एक लिटर जल में उपस्थित कार्बनिक पदार्थ के विघटन के लिए निर्धारित समय में सूक्ष्मजीवों द्वारा प्रयोग की जाती है, बीओडी (BOD) कहलाती है।
जल की अधिक बीओडी होना जल में अधिक मात्रा में कार्बनिक पदार्थों की उपस्थिति, अर्थात् अधिक प्रदूषित जल की परिचायक है। जल में बीओडी कम होने पर उसमें घुलित आक्सीजन अधिक होती है। बहुत अधिक बीओडी होने का अर्थ है जल में घुलित आक्सीजन का अभाव।

प्रश्न 4.
वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव (III Effects of Air Pollution)-वायु प्रदूषण मनुष्य सहित सभी जीव-जन्तुओं, पेड़-पौधों,फसलों के साथ-साथ, ऐतिहासिक इमारतों, कलाकृतियों, वनों व झीलों पर घातक दुष्प्रभाव डालता है। इसके प्रमुख दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं-

  1. ईंधन के अपूर्ण दहन से मुक्त कार्बन मोनो आक्साइड अत्यंत विषाक्त गैस है। यह रक्त के हीमोग्लोबिन से संयोजित होकर हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन परिवहन क्षमता को समाप्त कर देती है। CO की हीमोग्लोबिन से संयोजन की दर हीमोग्लोबिन के ऑक्सीजन से संयोजन की दर से कई गुना अधिक है। अत: CO का प्रदूषण मनुष्य पर प्राणघातक असर डाल सकता है।
  2. वायु प्रदूषकों NO2 व SO2) के जल वाष्प से क्रिया करने के कारण बने नाइट्रिक व सल्फ्यूरिक अम्ल अम्लीय वर्षा उत्पन्न करते हैं। यह मृदा, झीलों, मार्बल, इमारतों, के साथ-साथ पेड़-पौधों पर दुष्प्रभाव डालती है।
  3. कणिकामय प्रदूषक जैसे कालिख (Soot), धूल कण व टार मनुष्य व अन्य जन्तुओं के श्वसन मार्ग में पहुँचकर श्वसन तंत्र के रोग पैदा कर देते हैं। यह त्वचा व आँखों को भी प्रभावित करते हैं। साथ ही यह दृश्यता (Visibility) को कम कर देते हैं।
  4. हाइड्रोकार्बन्स के अपूर्ण दहन से बनने वाला बेल्जिपाइरिन फुफ्फुस कैंसर का कारण है। नाइट्रोजन व सल्फर के ऑक्साइड, आँखों में जलन, नाक व श्वसन तंत्र में शोथ (inflammation) पैदा कर देते हैं।
  5. CO2, CH4, CFC आदि ग्रीन हाउस गैसें हैं जो ग्लोबल वार्मिंग (global warming) के लिए उत्तरदायी हैं। CFC हमें सूर्य की पराबैंगनी किरणों से बचाने वाली ओजोन परत का क्षरण करता है।
  6. SO2 पर्ण हरित को विघटित कर देती है।

प्रश्न 5.
जैविक आवर्धन क्या है ? समझाइए।
उत्तर:
जैव आवर्धन (Biomagnification) – जैव आवर्धन वह प्रक्रिया है जिसमें किसी विषाक्त अजैव अपघटनीय (non biodegradable) पदार्थ का सान्द्रण खाद्य श्रृंखला के प्रत्येक अगले पोषण स्तर में बढ़ता रहता है।
डीडीटी व मरकरी के जैव आवर्धन के अनेक उदाहरणों का वैज्ञानिक अध्ययन कर चुके हैं। जैव आवर्धन इसलिए होता है क्योंकि एक जीवधारी द्वारा एकत्रित किया विषाक्त पदार्थ उसके द्वारा उपापचयित नहीं होता। न ही जीव इस पदार्थ को उत्सर्जन द्वारा बाहर निकाल पाता है। प्रत्येक पोषण स्तर के जीव में एकत्रित यह विषाक्त पदार्थ अगले पोषण स्तर के जीव में स्थानान्तरित हो जाता है।

प्रश्न 6.
ध्वनि प्रदूषण क्या है ? ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभाव समझाइये।
उत्तर:
ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution)- ध्वनि का अवांछित ऊँचा स्तर शोर (noise) है। इसका अर्थ है कि तेज असुविधाकारी, अप्रिय ध्वनि ही शोर है व इससे होने वाला प्रदूषण ध्वनि प्रदूषण कहलाता है। दूसरे शब्दों में, जब ध्वनि की प्रबलता या तीवता इतनी बढ़ जाती है कि यह हमें असुविधाकारी लगने लगे तो ऐसे शोर को ध्वनि प्रदूषण कहते हैं। 80 db (डेसीबल) से अधिक की किसी भी ध्वनि को प्रदूषक माना जाता है।

ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभाव (III Effects of Noise Pollution)-

  1. अधिक तीव्रता की या लम्बे समय तक अपेक्षाकृत अधिक तीव्रता की ध्वनि हमारी श्रवण क्षमता के लिए हानिकारक है, व बहरापन (deafness) उत्पन्न कर सकती है।
  2. यह नींद न आना, नींद में गड़बड़ी, हृदय दर की अनियमिता उत्पन्न कर सकता है। अन्य समस्याएँ हैं उच्च रक्त चाप, अपच, थकान।
  3. 100 dB से अधिक का लम्बी अवधि का शोर हमें विचलित व बैचेन कर देता है 120dB से अधिक का शोर सिर में पीड़ा उत्पन्न कर देता है।
  4. रोगियों, बुजुर्गों व बच्चों के लिए विशेष रूप से कष्टदायी होता है।
  5. अधिक शोर से नेत्र पुतलियाँ फैल जाती हैं तथा त्वचा पीली पड़ जाती है, एड्रीनल हार्मोन का स्राव तीव्र हो जाता है। तंत्रिका-पेशीय तनाव बढ़ जाता है जिससे खिन्नता, चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है।

प्रश्न 7.
मृदा प्रदूषण के कोई चार कारण लिखिए।
उत्तर:
मृदा प्रदूषण के कारण या स्रोत- भूमि की ऊपरी उपजाऊ पर्त जो पौधों की वृद्धि हेतु उत्तरदायी होती है मृदा (Soil) कहलाती है। अनेक उद्योग, खनन, घरेलू कचरा, कृषि रसायन, रेडयिोधर्मी पदार्थ, आदि मृदा के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में परिवर्तन कर देते हैं अर्थात उसे प्रदूषित कर देते हैं। इनमें से प्रमुख हैं|

  1. खनन (Mining)-पत्थर, चूना पत्थर, कोयला या अन्य वस्तुओं की प्राप्ति हेतु किया गया खनन मृदा की उपजाऊ ऊपरी परत (topsoil) व अवमृदा को प्रदूषित कर देता है इससे धरातलीय प्रदूषण के साथ पृथ्वी की सतह में खड्ड हो जाते हैं। अत्याधिक खनन से आस-पास की मृदा कृषि योग्य नहीं रह पाती।
  2. उद्योग (Industry)-अनेक उद्योगों, जैसे-तेल शोधन, धातु गलाने, विभिन्न प्रकार के रसायनों के निर्माण, ईंट-भट्टा आदि से मृदा प्रदूषित हो जाती है। इन उद्योगों के अपशिष्ट पदार्थ, जल में मिलाकर आसपास की मृदा में मुक्त कर दिये जाते हैं। इनकी राख व ग्रीस जैसे पदार्थ मृदा को प्रदूषित कर देते हैं।
  3. कृषि (Agriculture)-कृषि के गलत तरीके व कृषि रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग भी मृदा प्रदूषण के लिए उत्तरदायी है। अत्यधिक उर्वरकों का प्रयोग मृदा को अम्लीय अथवा क्षारीय बना देता है। पीड़कनाशियों, जैसे-कीटनाशी कवकनाशी, कृमिनाशी, शाकनाशी आदि का गैर जिम्मेदाराना प्रयोग मृदा को प्रदूषित करता है। कुछ कीटनाशी तो जैव अपघटनीय भी नहीं होते।
  4. नगरीय कचरा (Municiple waste)-घरेलू कूड़े कचरे, प्लास्टिक, एल्यूमीनियम, रबर, काँच की बोतलें आदि के ढेर भी मृदा प्रदूषण के कारण हैं। अस्पतालों का अपशिष्ट, कुछ रसायन तो वर्षा जल के साथ भूमि में गहराई तक पहुँच जाते हैं। घरेलू कचरा मृदा प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत है।

प्रश्न 8.
वायु प्रदूषण की रोकथाम के कोई चार उपाय लिखिए।
उत्तर:
वायु प्रदूषण की रोकथाम के उपाय-

  1. ऐसे स्वचालित वाहनों को प्रोत्साहित करना जो पेट्रोल व डीजल से न चलते हों। CNG को बढ़ावा देना। साथ ही बैटरी अथवा सौर ऊर्जा से चलने वाले वाहनों को बढ़वा देना। ईंधन के नये पर्यावरण मित्र स्रोतों पर शोध को बल देना।
  2. पेट्रोल, डीजल से चलने वाले वाहनों में प्रदूषण रोधी युक्तियों का लगाना अनिवार्य करना। इनमें कैटेलिटिक कन्वर्टर, प्रतिधूम्र, कुहरा सयंत्र आदि लगाना। ट्रैफिक को अधिक प्रभावी बनाना।
  3. कारखानों/उद्योगों की चिमनियों में वायु प्रदूषकों को रोकने वाली विभिन्न युक्तियों, जैसे-मार्जक (Scrubber), चक्रावात पृथक्कारी (Cyclone Separator), स्थिर वैद्युत अवक्षेपित्र (Electrostatic Precipitator) लगाना।
  4. लोगों को जीवाश्म ईंधन के कम से कम प्रयोग करने हेतु प्रेरित करना। परिवहन के लिए निजी की बजाय सार्वजनिक वाहन का प्रयोग, कार-पूल करना, साइकिल का अधिकाधिक प्रयोग। खेतों में कृषि अपशिष्ट के जलाने पर सख्ती से रोक लगाना।

प्रश्न 9.
खाद व उर्वरक में क्या अन्तर हैं ?
उत्तर:
खाद व उर्वरक में अन्तर
(Differences between manure and fertilizer)

खाद (Manures)उर्वरक (Fertilizer)
(i) जैव आधारित कार्बनिक पदार्थ, जैसे- कृषि अपशिष्ट, पशु मल-गोबर या हरी खाद।(i) व्यावसायिक रूप से उत्पादित पादप पोषक तत्व।  
(ii) पोषकों की मात्रा कम्, लेकिन दीर्घावधि तक आपूर्ति ।(ii) पोषक की मात्रा अधिक, मृदा को पोषकों की त्वरित आपूर्ति ।
(iii) पोषक विशिष्ट नहीं सभी पोषकों की अल्प मात्रा में आपूर्ति |(iii) पोषक विशिष्ट (Nutrient specific) अर्थात मृदा को किसी विशिष्ट पोषक तत्व की आपूर्ति करते हैं।
(iv) मृदा के रसायन (Chemistry) व बनावट (Texture) में सुधार करते हैं। जलधारण क्षमता बढ़ाते हैं। दीर्घावधि में उर्वरता बढ़ाते हैं |(iv) मृदा के रसायन व बनावट को खराब करते हैं। अधिक प्रयोग मृदा को अम्लीय या क्षारीय बना देता है। जल धारण क्षमता कम करते हैं। दीर्घावधि में उर्वरकता कम करते हैं |
(v) अधिक आयतन वाले (Bulky) अत: परिवहन आसान नहीं।(v) पोषकों के सान्द्रित स्रोत, परिवहन बहुत आसान |
(vi) पर्यावरण मित्र (Eco- Friendly)(vi) पर्यावरण मित्र नहीं।

प्रश्न 10.
वर्मी कम्पोस्ट खाद कैसे बनाई जाती है ?
उत्तर:
वर्मी कम्पोस्ट (Vermicompost) – कृषि अपशिष्ट, पशुओं का मूलमूत्र, सब्जियों के छिलके, खरपतवार आदि को गड्ढों में डालकर ऊपर से मिट्टी से ढक दिया जाता है जिसे सूक्ष्मजीवों की क्रिया द्वारा कम्पोस्ट खाद में बदल | दिया जाता है। यह प्रक्रिया कम्पोस्टीकरण कहलाती है।वर्मी कम्पोस्ट बनाने में जैव उत्पत्ति के कार्बनिक पदार्थ को | गड्ढों में डालने पर उनके साथ केंचुए (Earth worms) भी डाले जाते हैं। केंचुए अपरदहारी (Detritivore) कहलाते हैं। केंचुए कार्बनिक पदार्थ खाकर उसे आधा पचाकर कृमिमल (worm cast) के रूप में बाहर निकाल देते हैं। यह कार्बनिक पदार्थ का विखण्डीभवन कर देते हैं जिससे सूक्ष्मजीवों की क्रिया तेज हो जाती है तथा कम्पोस्ट जल्दी बन जाती है। केंचुए अर्थात वर्ल्स की मदद से बनी कम्पोस्ट न सिर्फ जल्दी बनती है अपितु अधिक पोषक तत्वयुक्त होती है।

प्रश्न 11.
कार्बनिक कृषि क्या है ? समझाइए।
उत्तर:
कार्बनिक कृषि (Organic Farming)- कार्बनिक कृषि खेती करने की वह पद्धति है जिसमें संश्लेषित रासायनिक उर्वरक, पीड़कनाशी, शाकनाशी रसायनों का उपयोग नगण्य रूप से अथवा बिल्कुल नहीं होता। पूर्ण जैविक खेती में निम्न तथ्यों को दृष्टिगत रखा जाता है –

  1. स्थानीय पर्यावरण के लिए अनुकूलित स्थानीय देश किस्मों का प्रयोग।
  2. शस्यावर्तन (Crop rotation), मिश्रित फसल, आन्तर खेती
  3. रासायनिक उर्वरक के स्थान पर प्राकृतिक खाद का प्रयोग। साथ में पशुपालन व पशुपालन के अपशिष्ट, जैसे-गोबर, खेती में प्रयोग होते रहें। इसे पशुधन अपशिष्ट का पुनर्चक्रण कह सकते है।
  4. जैव उर्वरक, जैसे-नीलहरित शैवाल व लाभकारी जीवाणुओं का प्रयोग
  5. संश्लेषित रासायनिक पीड़कनाशियों के स्थान पर जैवपीड़क नाशियों, जैसे-नीम की पत्तियों, निबोरी, हल्दी आदि से बने जैव पीड़कनाशियों का प्रयोग। जैविक खेती पर्यावरण मित्र (Ecofriendly), सुलभ व वहनीय (Sustainable) है।

प्रश्न 12.
कृत्रिम मधुमक्खी पालन कैसे किया जाता है ?
उत्तर:
कृत्रिम मधुमक्खी पालन (Apiculture)- मधुमक्खी पालन एक सरल प्रक्रिया है जिसे थोड़े से प्रशिक्षण के बाद किसी भी ऐसे स्थान जहाँ पर्याप्त फलों के बगीचे, जंगली झाड़ियाँ, फलदार फसल या चरागाह हो, प्रारम्भ किया जा सकता है।
इस हेतु लकड़ी के बन्द बक्सों के आकार के कृत्रिम छत्ते बनाये जाते हैं। कृत्रिम छत्तों में बड़े अण्ड कक्ष तथा धातु या प्लास्टिक की प्लेटें होती हैं। प्लेटों पर मोम की परत होती है। यह छत्ते के निर्माण के लिए आधार का कार्य करते हैं। मधुमक्खियों के आवागमन हेतु इनमें कई छिद्र होते हैं।
मधुमक्खियाँ फूलों से मकरन्द प्राप्त कर उससे शहद बनाती हैं। शहद छत्ते के कोष्ठकों में एकत्रित होने पर छत्ते से प्लेटों को निकालकर शहद प्राप्त कर लिया जाता है।
सफल मधुमक्खी पालन हेतु निम्न बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक होता है-

  • मधुमक्खी की प्रकृति के स्वभाव
  • मक्खी के छत्ते के लिए उपयुक्त स्थान का चयन
  • विभिन्न मौसमों में छत्ते का प्रबन्धन
  • मक्खियों के दल का पकड़ना व छत्ते में रखना
  • शहद व मोम का एकत्रीकरण।

प्रमुख रूप से मधुमक्खी प्रजाति एपिस मैलीफरा का पालन किया जाता है।

प्रश्न 13.
गाय व भैंस की अधिक दूध देने वाली नस्लों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. गाय की अधिक दूध देने वाली नस्लें ।
    • देशी नस्लें-साहीवाल, देवली, गिर, सिन्ध, हरियाणवी आदि।
    • विदेशी नस्लें-जर्सी, हॉल्सटीन, ब्राउन स्विस। विकसित उन्नत नस्लें-करन स्विस, सुनन्दिनी।
  2. भैंस की अधिक दूध देने वाली नस्लें – मुर्रा, जाफरावादी, सुरती ।

प्रश्न 14.
पशुओं में होने वाले रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पशुओं में होने वाले रोग-पशुओं में अनेक प्रकार के विषाणु जन्य (Viral), जीवाणु जन्य (Bacterial) कवकजन्य (Fungal) व कृमिजन्य (Helminth) रोग हो जाते हैं। इनमें से प्रमुख हैं-

  1. खुरपका-मुँहपका (Foot and Mouth disease) गम्भीर विषाणुजन्य
  2. गलघोंटू
  3. गिल्टी रोग
  4. तपेदिक (T. B.)
  5. चेचक

प्रश्न 15.
मिश्रित फसल क्या है ? इससे क्या-क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
मिश्रित फसल (Mixed Cropping) – किसी एक खेत में एक ही समय पर दो या दो से अधिक फसलों का उगाना मिश्रित, फसल कहलाता है।
एक विशिष्ट प्रकार की मिश्रित खेती अन्तराफसल (intercropping) है जिसमें दो या अधिक फसलों को निश्चित लाइनों में उगाया जाता है। उदाहरण के लिए गेहूँ + सरसों, या मूंगफली + सूरजमुखी

मिश्रित फसल के लाभ

  1. यह नुकसान के खतरे की संभावना को कम करती है तथा किसी एक फसल के खराब होने पर दूसरी फसल से कुछ राहत मिल जाती है।
  2. यह मृदा में पोषकों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करती है।
  3. पीड़क व रोग के सभी पौधों तक प्रसार को कम करती है।

मिश्रित फसल के लिए फसलों का चुनाव करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए –

  1. एक फसल लम्बी अवधि की व दूसरी छोटी अवधि की होनी चाहिए।
  2. एक फसल गहरी जड़ों वाली व दूसरी सतही जड़ों वाली होनी चाहिए।
  3. एक फसल लम्बी व दूसरी बौनी होनी चाहिए अथवा उनकी ऊँचाई में अन्तर होना चाहिए।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
दीर्घकालीन कृषि क्या है ? दीर्घकालीन कृषि की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दीर्घकालीन कृषि
दीर्घकालीन कृषि, कार्बनिक कृषि (Organic farming) है। जिसमें संश्लेषित कृषि रसायनों जैसे-उर्वरकों व पीड़कनाशियों का प्रयोग नगण्य रूप में या बिल्कुल नहीं किया जाता। इसमें पुरानी परम्परागत कृषि के अन्य तरीकों जैसे फसल चक्रण या शस्यावर्तन (Crop rotation), मिश्रित कृषि आदि पर बल दिया जाता है। संश्लेषित रसायनों के स्थान पर जैव उर्वरक, जैसे-नीले, हरे शैवाल, राइजोबियम आदि का प्रयोग किया जाता है। पीड़कों को समाप्त करने के लिए नीम, हल्दी, तम्बाकू आदि से प्राप्त जैवपीड़कनाशियों का प्रयोग किया जाता है।

दीर्घकालीन कृषि की विधियाँ

  1. मिश्रित कृषि (Mixed Farming)-खेती के साथ-साथ पशुपालन, मधुमक्खी पालन, तालाब में मछली पालन करने से आय में वृद्धि होती है, भूमि की क्षमता का पूर्ण उपयोग होता है तथा पशुधन अपशिष्ट का पुनर्चक्रण होता है। एक ही भूमि पर खेती के साथ पशुपालन करना ही मिश्रित कृषि है।
  2. मिश्रित फसल (Mixed Cropping)-किसी एक खेत में एक ही समय पर दो या अधिक फसलों का उगाना मिश्रित फसल कहलाता है। यह सुरक्षा के साथ कुछ लाभ सुनिश्चित करता है, जैसे- गेहूँ + सरसों
  3. फसल चक्रण (Crop Rotation)-एक ही भूमि से अधिक उत्पादन बनाये रखने के लिए फसल चक्र को अपनाया जाता है। भूमि के किसी भाग पर योजनाबद्ध रूप से बदल-बदल कर फसल प्राप्त करना फसल चक्र कहलाता है। इसमें प्रायः अनाज फसलों का चक्रण फलीदार फसलों से किया जाता है, ताकि मृदा में नाइट्रोजन की पर्याप्त मात्रा बनी रहे। इसके अतिरिक्त दीर्घावधि कृषि में निम्न तथ्यों पर भी ध्यान दिया जाता है-
    • स्थानीय देशी किस्मों का चयन
    • समन्वित पीड़क प्रबन्धन।

प्रश्न 2.
मत्स्य पालन के उत्पादों के नाम लिखो तथा मत्स्य पालन के पदों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मत्स्य पालन के उत्पाद

  1. मछली जन्तु प्रोटीन का एक उत्कृष्ट व सस्ता साधन है। अत: इसे प्रमुख रूप से खाद्य पदार्थ के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
  2. कॉड लिवर ऑयल व शार्क लिवर ऑयल विटमिन A व D का सर्वोतम स्रोत माने जाते हैं |
  3. इसके अतिरिक्त वसा, फिन, शल्क, त्वचा आदि मछली से प्राप्त होने वाले द्वितीयक उत्पाद हैं।
  4. मत्स्य पालन देश के करोड़ों लोगों को आजीविका, व आय के अवसर उपलब्ध कराता है।

मत्स्य पालन के पद

  1. आवास-मत्स्य पालन प्राकृतिक जल स्रोतों, जैसे| समुद्र, तालाब, झील व नदियों के अतिरिक्त कृत्रिम जलाशयों में भी किया जाता है।
  2. मछली की जातियाँ-अलवणीय जल (fresh water) में रोहू, कतला, मृगाल, कालबसु आदि देशी मछलियों का पालन किया जाता है। सिल्वर कॉर्प व कॉमन कॉर्प मछलियों की प्रमुख विदेशी जातियाँ हैं। खारे या लवणीय जल की प्रमुख मछलियाँ हैं-हिल्सा, सारडीन, बाम्बेडक पोम्फ्रेट, टूना आदि।
    • कतला
    • सिल्वर कार्प
    • रोहू
    • ग्रास कार्प
    • मृगाल
    • कॉमन कार्प
  3. मछलियों का भोजन-प्राकृतिक जलाशयों में मछलियाँ, शैवाल, पादप व सूक्ष्म जन्तुओं का भक्षण करती है। कृत्रिम जलाशयों में रेडीमेड मछली के खाने के अतिरिक्त अनाज के टुकड़े, सोयाबीन, बादाम का खली, चावल व गेहूँ की भुसी आदि दी जाती हैं।
  4. मत्स्य उत्पादन-नदियों में स्थित मछलियों के प्रजनन स्थल से जाल की सहायता से इनके बीज एकत्रित किये जाते हैं। बीजों से अण्डे उत्पन्न होते हैं। अण्डों से निकली छोटी मछली को जीरा या फ्राई (fry) कहते है जो वृद्धि के बाद अंगुलिकाओं या फिंगरलिंग में बदल जाती है। अंगुलिका वह अवस्था है जिसे मछली पालन हेतु जलाशयों में स्थानान्तरित किया जाता है। अंगुलिकाओं से संक्रमणकारी जीवाणुओं को नष्ट करने के लिए इन्हें जीवाणुनाशक पदार्थों से उपचारित किया जाता है।
  5. मछली संग्रहण-मछलियों में पर्याप्त वृद्धि हो जाने के बाद इन्हें विभिन्न विधियों द्वारा पकड़ लिया जाता है। इन विधियों में जाल व विद्युत प्रवाह प्रमुख हैं।
  6. मछली का परिरक्षण-मछली एक शीघ्र खराब हो जाने वाला उत्पाद है अत: इसका परिरक्षण (Preservation) आवश्यक होता है। सड़ने से बचाने के लिए इन्हें बर्फ में दबाकर परिरक्षित किया जाता है। कुछ छोटी प्रजातियाँ,सुखाकर, लवण द्वारा या ध्रूम उपचार से परिरक्षित की जाती हैं।

प्रश्न 3.
सिंचाई किसे कहते हैं ? सिंचाई की आधुनिक विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सिंचाई (Irrigation)
सभी जीवधारियों की तरह पौधों को भी जल की परमावश्यकता होती है। पेड़-पौधों को विविध अंतराल पर जल उपलब्ध कराना सिंचाई कहलाता है। सिंचाई का समय एवं आवृत्ति, मिट्टी, ऋतु व पौधों की किस्म के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है। स्वस्थ फसल के लिए खेत में फसल की आवश्यकतानुसार नियमित रूप से जल देना आवश्यक होता है।
भारत में लगभग आधे कृषि क्षेत्र सिंचाई के लिए वर्षा जल पर ही निर्भर रहते हैं। अन्य क्षेत्रों में कुओं, नलकूपों, मोट (घिरनी) रहट, चैन पम्प, ढेकली, नहर आदि जैसे सिंचाई के परम्परागत तरीकों की मदद ली जाती है।

सिंचाई की आधुनिक विधियाँ
जल संरक्षण व जल का मितव्ययता से प्रयोग करने के लिए सिंचाई की आधुनिक पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है। इसमें जल विशिष्ट रूप से पौधों को ही प्राप्त होता है तथा उसका अपव्यय नहीं होता | ये विधियाँ निम्न हैं-

(a) छिड़काव तंत्र (Sprinkler System) – असमतल भूमि के लिए जहाँ परम्परागत सिंचाई में पानी, नीचे के स्थानों पर एकत्रित हो जाता है, यह विधि विशिष्ट रूप से उपयोगी है। इस विधि में ऊर्ध्वाधर रूप से खड़े पाइपों के ऊपरी सिरों पर घूमने वाले नोजल लगे होते हैं। यह सभी पाइप निश्चित दूरी पर मुख्य पाइप से जुड़े होते हैं। पाइप में पानी की आपूर्ति होने पर ऊर्ध्वाधर पाइप के सिरे पर लगा नोजल घूमता है जिससे जल घूमघूम कर चारों तरफ गिरता है। इसका छिड़काव इस तरह का होता है जैसे वर्षा हो रही हो। इस प्रकार की सिंचाई से पौधों के स्वास्थ्य पर अनुकूल असर होता है।

(b) ड्रिप तंत्र (Drip System)-जैसा नाम से स्पष्ट है इस विधि में जल बूंद-बूंद करके पौधों की जड़ों में गिरता है, इसीलिए यह ड्रिप तंत्र कहलाता है। बूंद-बूंद करके गिरने के कारण जल सीधे पौधे की जड़ को प्राप्त होता है, भूमि में गहराई तक पहुँच जाता है व व्यर्थ नहीं जाता। फलदार पौधों व बागीचों में पानी देने का यह सर्वोत्तम तरीका है। जल की कमी वाले क्षेत्रों के लिए यह विधि वरदान है।

प्रश्न 4.
फसली पादपों की किस्मों में सुधार के उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फसली पादपों की किस्मों में सुधार निम्न उद्देश्यों को दृष्टिगत रखते हुए किया जाता है-
(a) उच्च उत्पादन (High Yield)-उच्च उत्पादन अर्थात् प्रति क्षेत्रफल से अधिक पैदावार प्राप्त करना किस्म सुधार का प्रथम उद्देश्य है।

(b) उन्नत किस्में (Improved varieties or Better quality) – उपलब्ध फसल की गुणवत्ता में सुधार अर्थात् उसके पोषण मान अथवा अन्य वांछित गुण में सुधार।

(c) जैविक तथा अजैविक प्रतिरोधकता (Resistance to Biotic and Abiotic Stresses)-

  1. रोग व कीटों के प्रकोप के कारण उत्पादकता कम हो जाती है अत: रोग व कीट प्रतिरोधी किस्मों का विकास, फसली पादपों की किस्म सुधार का उद्देश्य है।
  2. अजैविक कारक, जैसे-सूखा, जल भराव (water logging), गरमी, अत्यधिक निम्न ताप व पाला, क्षारीयता पौधे की वृद्धि को प्रभावित कर फसल उत्पादन कम कर देते हैं। अतः ऐसी किस्में बनाई जाती हैं जो इन पर्यावरणीय तनावों/दवाबों के प्रति अधिक सहनशील व प्रतिरोधी हों।

(d) परिपक्वन काल में परिवर्तन (Change in time of Maturity)-फसल के बोने से लेकर कटाई तक में, कम से कम समय लगना किसान के लिए आर्थिक दृष्टि से | अच्छा होता है क्योंकि बचे समय में अन्य फसल या अतिरिक्त धंधा किया जा सकता है। वर्ष में उगाई जाने वाली फसलों की संख्या में वृद्धि होने से आमदनी बढ़ जाती है। कम समय में फसल पकने के कारण खर्चा भी कम होता है। समान परिपक्वन से कटाई के दौरान होने वाली फसल की हानि भी कम हो जाती है।

(e) व्यापक अनुकूलता (Wider adaptability)-ऐसी किस्मों का विकास करना जो विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों | अर्थात् देश के विभिन्न भागों में उगाई जा सके। एक ही किस्म को विभिन्न जलवायुगत परिस्थितियों में उगाया जा सकता है। (अभी अधिकांश फसलों की किस्में ऐसी हैं जो केवल किसी क्षेत्र विशेष में ही उगाई जा सकती हैं) अत: यह किस्म सुधार का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

(f) ऐच्छिक शस्य विज्ञान गुण (Desirable agronomic traits)- अलग-अलग फसलों के वांछित शस्य विज्ञान गुण अलग-अलग होते हैं। चारे वाली फसलों के लिए लम्बी तथा सघन शाखाएँ ऐच्छिक गुण हैं। गेहूँ या अनाज की फसलों के लिए बौनापन (dwarfmess) अच्छा गुण है ताकि कम पोषक तत्वों में बेहतर गुणवत्ता प्राप्त हो सके।

प्रश्न 5.
जल प्रदूषण क्या है ? जल प्रदूषण के कारणों व दुष्प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जल प्रदूषण (Water Pollution)
जल के भौतिक, रासायनिक व जैविक गुणों में किसी भी प्रकार का अवांछनीय परिवर्तन जल प्रदूषण कहलाता है। जल प्रदूषण आज के समय का एक प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दा है।

जल प्रदूषण के कारण
(a) वाहित मल (Sewage)-घरेलू व म्यूनिसपिल अपशिष्ट जल जिसमें प्रमुख रूप से मानव मलमूत्र उपस्थित होते हैं, वाहित मल कहलाता है। कार्बनिक पदार्थों से समृद्ध होने के कारण इसकी BOD बहुत अधिक होती है। नदियों में बिना उपचार के सीधे ही विसर्जित कर दिये जाने से यह नदियों में गम्भीर प्रदूषण कर देता है। औद्योगिक अपशिष्टों के साथ-साथ गंगा व यमुना नदियों में प्रदूषण का एक प्रमुख कारण वाहित मल है।

(b) औद्योगिक इकाइयाँ (Industrial Units)-विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के द्रव अपशिष्ट का नदी में प्रवाहित कर दिया जाना अल प्रदूषण का एक बड़ा कारण है। इसमें प्रमुख हैं-पेट्रो रसायन, संरक, तेल शोधन कारखाने, औषधि, रबर प्लास्टिक, छपाई आदि।

(c) रासायनिक उर्वरक (Chemical fertilizers)- नाइट्रोजन व फास्फोरस अंरक की अतिरिक्त मात्रा खेत से वर्षा जल के साथ जलाशयों में पहुँचकर शैवाल ब्लूम बनाती है।

(d) पीड़कनाशी (Pesticides)-विभिन्न प्रकार व वर्गों के पड़कनाशी विशेष रूप से वह जो जैव अपघटनीय (biodegradable) नहीं है जैसे – DDT।

(e) जैविक प्रदूषक (Biological Pollutents)- जैसे विभिन्न प्रकार के रोगाणु (विषाणु, जीवाणु, हेल्मिंथ अण्डे, प्रोटोजोआ आदि।)

जल प्रदूषण के दुष्प्रभाव
(III Effects of water Pollution)

  1. जैविक प्रदूषण विभिन्न प्रकार के संक्रामक रोग, जैसे-टायफाइड, हैजा व पीलिया फैलाते हैं।
  2. भारी धातुएँ, जैसे- मरकरी, कैडमियम, लैड मानव स्वास्थ्य पर अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।
  3. नाइट्रेट व फास्फोरस का प्रदूषण मुपपीकरण (Entrophication) पैदा करता है। इससे शैवाल ब्लूम बनने के कारण जलाशयों का जल प्रदूषित हो जाता है उसमें ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, मछलियाँ मर जाती हैं।
  4. जैव अविघटनीय प्रदूषक जैसे DDT जैविक आवर्धन का कारण बनते हैं। इससे उच्चतर पोषण स्तरों में इनकी सांद्रता लगातार बढ़ती रहती है।
  5. मनुष्य के स्वास्थय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उनके उत्तर

वस्तुनिष्ठ

प्रश्न 1.
वायुमण्डल में आयतन के अनुसार ऑक्सीजन का अनुपात है-
(अ) 78.09%
(ब) 20.95%
(स) 0.03%
(द) 0.0006%.
उत्तर:
(ब) 20.95%

प्रश्न 2.
पृथ्वी का लगभग कितना भाग जल निमग्न है –
(अ) 10%
(ब) 30%
(स) 70%
(द) 85%.
उत्तर:
(स) 70%

प्रश्न 3.
वायु सामान्यत: बहती है-
(अ) ध्रुवों से विषुवत रेखा की ओर
(ब) विषुवत रेखा से ध्रुवों को और
(स) जापान से संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर
(द) संयुक्त राज्य अमेरिका से जापान को और।
उत्तर:
(अ) ध्रुवों से विषुवत रेखा की ओर

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सा पीड़कनाशी (Pesticide) है ?
(अ) कीटनाशी
(ब) शाकनाशी
(स) कवकनाशी
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 5.
जल की BOD का अधिक होना दर्शाता है कि
(अ) जल प्रदूषण रहित है
(ब) प्रदूषित है।
(स) जल में घुलित 02 अधिक है।
(द) जल पीने योग्य है।
उत्तर:
(ब) प्रदूषित है।

प्रश्न 6.
निम्न में से कौन-सा प्रदूषक जैविक आवर्धन प्रदर्शित कर सकता है ?
(अ) DDT
(ब) गाय का गोबर
(स) कृषि अपशिष्ट
(द) नाइट्रेट व फास्फेट लवण ।
उत्तर:
(अ) DDT

प्रश्न 7.
किस तीव्रता से अधिक की वनि को प्रदूषक माना जाता हैं –
(अ) 10 dB से कम
(ब) 30 dB से कम
(स) 50 dB से अधिक
(द) 80 dB से अधिक।
उत्तर:
(द) 80 dB से अधिक।

प्रश्न 8.
निम्न में से कौन-सा एक सक्षम पोषक तत्व है ?
(अ) N
(ब) P
(स) K
(द) Zn.
उत्तर:
(द) Zn.

प्रश्न 9.
धान, मक्का, सोयाबीन, मूंगफली किस प्रकार की फसल हैं –
(अ) रबी
(ब) खरीफ
(स) सद
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(ब) खरीफ

प्रश्न 10.
मुर्रा व जाफराबादी किस जन्तु की उन्नत नस्लें हैं|
(अ) भेड़
(ब) गाय
(स) बकरी
(द) भैंस।
उत्तर:
(द) भैंस

प्रश्न 11.
असील, चटगाँव आदि किस जन्तु की देशी नस्लें हैं-
(अ) ऊँट
(ब) मुर्गी
(स) गाय
(द) भैंस
उत्तर:
(ब) मुर्गी

प्रश्न 12.
निम्न में से कौन-सा मुर्गों का एक प्रमुख रोग है –
(अ) खुरपका-मुँहपको
(ब) गलघोंटू
(स) रानीखेत
(द) एड्स
उत्तर
(स) रानीखेत

सुमेलन सम्बन्धी प्रशन
नीचे दिये गए स्तम्भ व के मदों का मिलान कीजिए –

RBSE Solutions for Class 9 Science Chapter 15 प्राकृतिक सम्पदा एवं कृषि 2 (3)

उत्तर:
(i)  b
(ii) f
(iii) a
(iv) c
(v) d
(vi) e

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दीर्घ पोषक तत्वों के नाम लिखिए।
उत्तर
नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम, सल्फर, मैग्नीशियम, कैल्शियम्।

प्रश्न 2.
किन्हीं दो विदेशी स्वच्छ जलीय मछलियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कॉमन कॉर्प, सिल्वर कॉर्प।

प्रश्न 3.
मधुमोम का क्या उपयोग हैं ?
उत्तर:
मधुमोम का उपयोग कास्मेटिक क्रीम, बूट पालिश व मूर्तिकला आदि में किया जाता है।

प्रश्न 4.
खीस या कोलोस्ट्रम किसे कहते हैं ?
उत्तर:
दूध देने वाले पशुओं के स्तनें से शिशु जन्म के बाद निकलने वाला गाय अत्यंत पौषक दूध सीस कहलाता है।

प्रश्न 5.
बकरी की किन्हीं दो नस्लों के नाम लिखिए।
उत्तर:
जमानापारी, बारबरी।

प्रश्न 6.
रेड्डेन व हॉल्सटीन किस पशु की विदेशी नस्लें हैं ?
उत्तर:
गाय की।

प्रश्न 7.
फसलों के रोग नियंत्रण हेतु कोई दो उपाय लिखिए।
उत्तर:

  1. रोग प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग
  2. पीड़कनाशियों का संतुलित प्रयोग।

प्रश्न 8.
पृथ्वी का वायुमण्डल कितनी ऊँचाई तक फैला हुआ है ?
उत्तर:
पृथ्वी की सतह से लगभग 300 किमी. ऊँचाई तक।

प्रश्न 9.
पृथ्वी के औसत तापमान को निश्चित बनाये रखने का कार्य कौन करता है ?
उत्तर:
पृथ्वी का वायुमण्डल।

प्रश्न 10.
पवन की गति किन कारकों पर निर्भर करती है ?
उत्तर:
पवन की गति स्थानानुसार अनेक कारकों, जैसेभौगोलिक स्थिति, स्थलाकृति (topography), ऊँचाई, समुद्र किनारे से दूरी तथा वनस्पति आदि पर निर्भर करती है।

प्रश्न 11.
सल्फर डाईऑक्साइड का मानव स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है ?
उत्तर:
SO2, आँख तथा नाक व गले की श्लेष्मिक झिल्ली में शौथ पैदा कर अनेक रोग पैदा कर देती है।

प्रश्न 12.
स्मोग क्या है ?
उत्तर:
धुआँ (Smoke) व कोहरे (Fog) का मिश्रण स्मोग (Smog) कहलाता है।

प्रश्न 13.
BOD का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर:
बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग)।

प्रश्न 14.
सुपोषी जलाशय क्या है ?
उत्तर:
ऐसे जलाशय जिनमें अधिक मात्रा में पोषक तत्व (N, P) हैं, या वाहित मल का प्रदूषण हैं तथा जिनमें शैवालों को तेज़ी से वृद्धि होती है।

प्रश्न 15.
किन्हीं दो जैव अविघटनीय प्रदूषकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
DDT तथा पारा या मरकरी।

प्रश्न 16.
प्रदूषित जल के कारण होने वाले दो जीवाणुजन्य रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
टॉयफाइड व हैजा।

प्रश्न 17.
दो ऐसी धातुओं के नाम लिखिए जो खाद्य श्रृंखला द्वारा एक जीव से दूसरे जीव में स्थानांतरित होते हैं?
उत्तर:
पारा व सीसा।

प्रश्न 18.
मृदा के पाँच घटकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
खनिज पदार्थ, कार्बनिक पदार्थ, मृदाजल, मृदा वायु व सूक्ष्मजीव।

प्रश्न 19.
पीड़कनाशी किन्हें कहते हैं ?
उत्तर:
पीक (जैसे कीट, रोडेन्ट, फजाई, कृमि, खरपतवार) के नाश के लिए प्रयोग किये जाने वाले रसायन पीड़कनाशी कहलाते हैं। यह कीटनाशी, रोडेंटनाशी, कवकनाशी, शाकनाशी आदि प्रकार के हो सकते हैं।

प्रश्न 20.
दृश्य प्रकाश के दोनों ओर पाये जाने वाले सौर विकिरण का नाम लिखिए।
उत्तर:
पराबैंगनी विकिरा (ultra-violet) व अवरक्त विकिरण (Infra-red)।

प्रश्न 21.
पौधों के लिए आवश्यक 7 सुक्ष्म पोषक तत्वों के नाम लिखिए।
उत्तर:
आयरन, मैंगनीज, बोरॉन, जिंक, कॉपर, मालीब्डेनम, क्लोरीन।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीवधारियों के लिए जाने का क्या महत्व है ?
उत्तर:
जीवधारियों के लिए जल का महत्व –

  1. जल जीवित कोशिकाओं के जीव द्रव्य का एक परमावश्यक घटक हैं।
  2. जल एक सार्वत्रिक विलायक है जिसमें पोषक तत्व दुलकर जीवों के शरीर में आसानी से प्रवेश कर पाते हैं।
  3. कोशिका में होने वाली समस्त उपापचयी क्रियाएँ द्रव माध्यम में ही सम्पन्न होती हैं।
  4. जीवों की वृद्धि, निम्न वर्ग के जौवों में ब्राह्म निषेचन आदि के लिए जल आवश्यक है।
  5. जल, प्रकाश संश्लेषण में प्रमुख कच्चा पदार्थ है।
  6. जल, अनेक जटिल अणुओं को संरचनात्मक स्थायित्व प्रदान करता है।

प्रश्न 2.
वायुमण्डल में ऑक्सीजन व कार्बन डाईआक्साइड जैसी गैसों की मात्रा लगभग नियत कैसे बनी रहती है ?
उत्तर:
वायुमण्डल में उपस्थित यह गैसें पादपों व जन्तुओं के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। प्रकृति में अक्सिीजन, नाइट्रोजन व कार्बन डाईऑक्साइड का चक्र वायुमण्डल और मृदा व सजीर्षों के बीच चलता रहता है जिससे प्रकृति में संतुलन बना रहता है। प्रत्येक जीवधारी श्वसन क्रिया में वायुमण्डल की ऑक्सीजन का उपयोग तथा वायुमण्डल में CO2 मुक्त करता है। हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में CO2 का प्रयोग कच्चे माल के रूप में कर, वायुमण्डल में ऑक्सीजन मुक्त करते हैं। अत: वायुमण्डल में इन गैसों का संतुलन बना रहता है।

प्रश्न 3.
वायुमण्डल में SO2 (सल्फर डाईऑक्साइड़) से होने वाले प्रदूषण के दुष्प्रभाव लिखिए।
उत्तर:
वायु में SO2 प्रदूषण के दुष्प्रभाव

  1. सल्फर डाई ऑक्साइड एक हानिकारक प्रदूषक है। यह नेत्र, नाक, फुफ्फुस व गले की श्लेष्मिका (mucous membrane) में जलन व रोग पैदा कर देती है।
  2. SO2 पौधों में रन्ध्रों द्वारा प्रवेश कर जल के साथ H2SO4, बनाता है। यह अम्ल पर्णहरित को विघटित करता है।
  3. लाइकेन SO2 प्रदूषण से अतिशीघ्र प्रभावित होते हैं। इसीलिए इन्हें वायु प्रदूषण का सूचक (Indicator) कहा जाता है।
  4. SO2 वायुमण्डल में जलवाष्प के साथ क्रियाकर H2SO4 बनाती है जो वर्षा के जल में मिलकर अम्लीय वर्षा की कारण बनता है।
  5. अम्लीय वर्षा का H2SO4, मार्बल से बनी इमारतों, कलाकृतियों के संक्षारण के लिए उत्तरदायी है। यह वनों व झीलों पर भी दुष्प्रभाव डालता है।

प्रश्न 4.
स्वचालित वाहून रेचन से होने वाले प्रदूषण पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
वायु के 60 प्रतिशत प्रदूषण के लिए स्वचालित वाहन रेचन (automobile exhaust) उत्तरदायी हैं। जीवाश्म इंधन जैसे पेट्रोल व डीजल के जलने से कार्बन मोनोक्साइड, कार्बन डाईऑक्साइड, सल्फर डाईऑक्साइड, नाइट्रोजन हाईऑक्साइड, कार्बनिक बाष्प, वे दोस कार्बन कण आदि जैसे प्रदूषक निकलते हैं।
हाइड्रोकार्बन के अपूर्ण दहन से बनने वाला 3-4 बेन्जिपाइरन, फेफड़ों के कैंसर का कारण हैं। नाइट्रोजन के ऑक्साइड आँखों में जलन व श्वसन तंत्र के रोग उत्पन्न करते हैं।
वाहनों में प्रदूषण नियंत्रण युक्तियाँ लगाकर इस प्रकार के प्रदूषण को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
वालि पल के प्रदूषण से नदियों के जल पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
वाहित मल में मानव अपशिष्ट जैसे कार्बनिक पदार्थ होते हैं। नदी के जल में अधिक मात्रा में वाहित मल का विसर्जन करने से निम्न दुष्परिणाम होंगे-

  1. कार्बनिक पदार्थों की अधिक मात्रा के कारण सूक्ष्म जीवों की आबादी भी बहुत बढ़ जायेगी। यह श्वसन क्रिया में ऑक्सीजन का प्रयोग करेंगे जिससे जल में घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) की कमी हो जायेगी।
  2. इस जल की BOD बहुत बढ़ जायेगी जो प्रदूषण की सूचक हैं।
  3. धुलित ऑक्सीजन के अभाव में मछलियों व अन्य जलीय जीव मर जायेंगे।
  4. वाहित मल में टायफाइड, हैजा के जीवाणु व पोलियो के विषाणु होते हैं अत: इन संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ जायेगा।
  5. अन्त में नदी एक बदबूदार नाले के रुप में परिवर्तित हो जायेगी।
  6. शैवाल ब्लूम बनने से नदी उथली होती चली जायेगी।

प्रश्न 6.
कृषि रसायनों से होने वाले प्रदूषण पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
कृषि में रसायनों के रूप में विभिन्न प्रकार के संश्लेषित उर्वरकों, जैसे-यूरिया, डीएपी, तथा संश्लेषित पीड़कनाशियों जैसे कीटनाशी, कवकनाशी, कृमिनाशी आदि का प्रयोग किया जाता है। इनके अविवेकपूर्ण प्रयोग से निम्न दुष्प्रभाव होते हैं-

  1. उर्वरकों के अधिक प्रयोग से मृदा अम्लीय अथवा क्षारीय हो जाती है, उसकी उर्वरकता कम हो जाती है तथा जल धारण क्षमता घट जाती है।
  2. खेतों से वर्षा जल के साथ बह कर जलाशयों में पहुँचे पोषक तत्व विशेष रूप से नाइट्रोजन व फास्फोरस, सुपोषीकरण (Eutropication) के लिए उत्तरदायी होते हैं जिससे शैवाल ब्लूम बनते हैं व जल में घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है।
  3. पीड़कना जल व वायु को प्रदूषित करते हैं। अनके जैविक रूप से अपघटित न होने वाले पीड़कनाशी, जैसे-DDT जैविक आवर्धन (Biomagnification) पैदा कर मनुष्य के लिए खतरा उत्पन्न करते हैं।
  4. कृषि वहनीय (Sustainable) नहीं रहती। पीड़कनाशी लाभदायक सूक्ष्मजीवों को भी नष्ट कर देते हैं। इनके प्रभाव से पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया भी मन्द पड़ जातो है।

प्रश्न 7.
ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण के चार उपाय लिखिए।
उत्तर:
ध्वनि प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय

  1. स्वचालित वाहनों द्वारा होने का अनावश्यक उपयोग नहीं करना धारिए। स्कूल, अस्पताल जैसे क्षेत्रों में हार्न का प्रयोग पूर्णतः प्रतिबन्धित होना चाहिए।
  2. ध्वनि प्रबलता को बढ़ाने वाले व उसे दूर तक प्रसारित करने वाले संयंत्रों को प्रतिबंधित करना चाहिए। लाउडस्पीकर के मनमाने प्रयोग पर रोक लगनी चाहिए। तेज आवाज के बम पटाखें प्रतिबन्धित होने चाहिए।
  3. सभागारों में वन अवशोषक लगाने चाहिए। वृक्षों की कतारें ध्वनि अवशोषक की तरह कार्य करती हैं अत: अधिकाधिक वृक्ष लगाने चाहिए।
  4. कल-कारखाने आबादी क्षेत्र से दूर स्थित होने चाहिए तथा इनमें कार्य करने वाले श्रमिकों को कर्ण प्लग का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 8.
प्रकाश का पौधों के लिए क्या महत्व है ?
उत्तर:
पौधों के लिए प्रकाश का महत्त्व

  1. हरे पौधों द्वारा किये जाने वाले प्रकाश संश्लेषण के लिए प्रकाश परमावश्यक है।
  2. पादप गति व वाष्पोत्सर्जन जैसी क्रियाओं में प्रकाश सहायक है।
  3. जल को अवशोषण, वृद्धि, पादप हार्मोन संश्लेषण अंकुरण व श्वसन, जैसी- क्रियाएँ प्रकाश द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होती हैं।
  4. जातीय संगठन (Species Composition) तथा वनस्पति के वितरण (Distribution of Vegetation) व विस्तार को नियंत्रित करने में प्रकाश को अहम् भूमिका होती है।

प्रश्न 9.
पादपों के पोषक तत्वों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
पादप पोषक तत्व (Plant Nutrients)-सभी जीवधारियों की तरह पेड़-पौधों को भी वृद्धि, विकास, प्रजनन व जीवित रहने के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। पौधों को पोषक पदार्थ वायु, जल व मृदा से प्राप्त होते हैं। पौधों को कुल 16 पौषक तत्वों की आवश्यकता होती है।

  • पादपों को वायु से प्राप्त होने वाले तत्व-कार्बन, ऑक्सीजन।
  • जल से प्राप्त होने वाले तत्व-हाइड्रोजन, जल की ऑक्सीजन प्रकाश संश्लेषण में मुक्त हो जाती है। अत: O2 नहीं मिलती शेष 13 तत्व मृदा से प्राप्त होते हैं। यह निम्न प्रकार के हैं।

(A) वृहद पोषक तत्व (Micro Nutrients)- इनकी अपेक्षाकृत अधिक मात्रा को आवश्यकता होती है। इनकी संख्या 6 है-
प्राथमिक पौषक तत्व – NPK नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटैशियम्।
द्वितीयक पोषक तत्व – Ca, S, Mg कैल्शियम, सल्फर, मैग्नीशियम्।

(B) सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients)-इन तत्वों की अत्यल्प मात्रा में आवश्यकता होती है। यह विभिन्न शारीरिक प्रक्रियाओं, जनन, वृद्धि आदि हेतु आवश्यक होते हैं। आयरन (Fe), मैंगनौज (Mn), बोरान (B), जिंक (Zn), कॉपर, (Cu), मालीब्डेनम (Mo), क्लोरीन (Cl)

प्रश्न 10.
हरी खाद किसे कहते हैं ?
उत्तर:
हरी खाद एक विशिष्ट प्रकार की उपयोगी खाद (manure) है जो भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ाती है। भूमि में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाकर उसकी जल धारण क्षमता में वृद्धि करती है। यह पोधकों को धीरे-धीरे मृदा में मुक्त करती रहती है। हरी खाद बनाने के लिए फसल उगाने से पहले खेतों में कुछ फलदार पौधे (Leguminons plants) जैसे-सनई, हुँचा, ग्वार आदि उगा देते हैं। यह तेजी से बढ़ते हैं। इनकी उचित वृद्धि के बाद भूमि पर पाटा या हल चलाकर उन्हें मिट्टी में मिला दिया जाता है। मिट्टी में यह हरी खाद में परिवर्तित हो जाते हैं यह मृदा को नाइट्रोजन व फास्फोरस की आपूर्ति करते हैं।

प्रश्न 11.
फसल की किस्मों में सुधार किस प्रकार किया जाता है ?
उत्तर:
फसल की किस्मों में सुधार की विधियाँ फसल की किस्मों में सुधार निम्न प्रकार से किया जा सकता है-

  1. संकरण (Hybridization)-इस विधि में सबसे पहले वांछित जनकों का चुनाव किया जाता है जिनमें विभिन्न वांछित गुण हों। द्वितीय पद में ऐच्छिक गुणों वाले जनकों का आपस में संकरण कराया जाता है। इस विधि से संतति में दोनों जनकों के ऐच्छिक गुजों के आने की सम्भावना बन जाती है जिनका चयन कर लिया जाता है।
  2. फसल सुधार की दूसरी विधि है ऐच्छिक अधांत वांछित गुणों वाले जोन का स्थानान्तरण करना। यह आनुवंशिक इंजीनियरिंग की मदद से किया जाता है। इस विधि से आनुवंशिक रूपान्तरित (Genetically modified) किस्म प्राप्त होती है।
  3. घरेलू करण, चयन, उत्परिवर्तन आदि फसलों की किस्मों में सुधार की अन्य विधियाँ हैं।

प्रश्न 12.
फसल चक्र किसे कहते हैं ?
उत्तर:
फसल चक्र (Crop Rotation)-एक ही खेत या भू-भाग में लगातार एक ही प्रकार की फसल बोने से भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो जाती हैं। एक फसल प्रायः एक ही प्रकार के पोषक तत्वों का भूमि से अवशोषण करती हैं। अत: मृदा में उस पोषक तत्व की कमी हो जाती है। फलस्वरूप, फसल अपादन भी कम हो जाता है। इस कमी को संश्लेषित रासायनिक उर्वरक का प्रयोग किये बिना फसल चक्र द्वारा पूरा किया जा सकता है। भूमि वे किसी एक भाग पर योजनाबद्ध रूप से बदल-बदल कर फसल प्राप्त करना फसल चक्र कहलाता है।
फसल चक्र में अनाज फसलों (Cereals) का चक्रण फलीदार फसली (Leguminous crops) से किया जाता है। फलीदार फसलों की ग्रन्थिल जड़ों में उपस्थित सहजीवी जीवाणु राइजोबियम मृदा को नाइट्रोजन से समृद्ध कर देते हैं जिससे फसल काट लेने के बाद भी मृदा में पोषक तत्व प्रचुरता से पड़े रहते हैं।

प्रश्न 13.
खरपतवार क्या है ? इनसे क्या हानि है ?
उत्तर:
फसली पौधों के साथ उगै अवांछित या अनावश्यक पौधे खरपतवार (weeds) कहलाते हैं। दूब, मोथा (साइप्रस रौटेंडस), गाजर घास (पार्थेनियम) विलायती गोखरु, हिरनखुरी, एमेरेन्थस आदि सामान्य खरपतवार हैं। यह पौधे फसली पौधों से प्रकाश, खनिज लवण, जल व स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं जिससे फसल उत्पादन कम हो जाता है |

प्रश्न 14.
पशु आहार पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
पशु आहार (Animal Feed)-दुधारू पशुओं से उच्च गुणवत्ता का दूध प्राप्त करने के लिए उन्हें उच्च गुणवत्ता वाले आहार की आवश्यकता होती है। गर्भधारणकाल व दूध देने वाले समय में विशिष्ट पोषक पदार्थों की आवश्यकता होती है। पशुओं के आहार के दो प्रमुख भाग होते हैं|
(a) पादप रेशे वाला भाग (Roughages) – इनका पोषक मान कम होता है। पशु चारे या रैश वाले भाग से भी पोषक प्राप्त कर लेते हैं। प्रश को दो तिहाई भाग सूखा चारा व एक तिहाई भाग हरा चारा देना चाहिए।

(b) सान्द्रित पोषक (Concentrates)-सान्द्रित पोषकों के रूप में पशुओं को 40% अनाज, 40% खली (oil extract) व 20% चोकर दिया जाता है। इससे अतिरिक्त पशु को प्रतिदिन कुछ नमक व खनिज चूर्ण भी दिये जाते हैं। मात्रा के साथ गुणवत्ता में सफाई पर भी ध्यान देना आवश्यक होता हैं। पशुओं को पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध कराना भी आवश्यक होता है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मधुमक्खी पालन किस प्रकार लाभदायी है ? सामाजिक कीट मधुमक्खी का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मधुमक्खी पालन के लाभ

  1. मधुमक्खी पालन से शहद प्राप्त होता है जो एक उच्च पोषक मान व ऊर्जा प्रदान करने वाला खाद्य पदार्थ हैं। शहद से ग्लुकोज, फ्रक्टोज, अनेक खनिज लवण प्राप्त होते हैं। शहद का प्रयोग औषधि के रूप में भी किया जाता है।
  2. मधुमक्खी के छत्ते से मोम (Bees wax) प्राप्त होता है। जिसका प्रयोग कास्मेटिक क्रीम, बुट पालिश, अन्य पालिशों व मूर्तिकला में किया जाता है।
  3. सरसों जैसी फूल वाली फसल या फलों के बगीचों में मधुमक्खी पालन करने से पैदावार में बढ़त हो जाती हैं। क्योंकि मधुमक्खियाँ फूलों में परागण सुनिश्चित कर देती हैं। अतः फल का बनना सुनिश्चित हो जाता है।
  4. मधुमक्खी पालन मिश्रित कृषि का भाग है अत: किसानों को अतिरिक्त आय का साधन हैं।
  5. मधुमक्खी पालन के लिए अधिक श्रम की आवश्यकता नहीं होती।

सामाजिक कीट मधुमक्खी
मधुमक्खी का वैज्ञानिक नाम एपिस इन्डिका हैं। मधुमक्खी आर्थोपोड़ा संघ के कीट वर्ग (Insecta) का जंतु है। इसका शरीर सिर, वक्ष, उदर तीन भागों में विभक्त रहता है। वक्ष भाग से जुड़े पंख पाये जाते हैं। इनमें तीन जोड़ी पैर होते हैं। मधुमक्खी के छत्ते में तीन प्रकार की मधुमक्खि पायी जाती है-
रानी (Queen), नर (Drone) और श्रमिक (Worker) इन सभी के रूप, आकार व कार्य में भिन्नता पायी जाती है। रानी मक्खी का उदर बड़ा होता है जबकि नर में आँखें बड़ी-बड़ी होती हैं। छत्ते में रानी मक्खी का दबदबा रहता है। रानी गन्ध युक्त पदार्थ के सावण के द्वारा छरों का नियंत्रण करती हैं। रानी मक्खी हमेशा छत्ते में ही रहती हैं। यह आकार में भी सबसे बड़ी होती हैं।

RBSE Solutions for Class 9 Science Chapter 15 प्राकृतिक सम्पदा एवं कृषि 2

नर मक्खी, रानी के साथ मैथुनी उड़ान भरकर उसे उसके पूरे जीवनकाल तक के लिए शुक्राणु दे देती है। इसके बाद या तो नर मक्खी मर जाती हैं या उन्हें छत्ते के बाहर कर दिया जाता है। रानी मखी के निषेचित अण्डों में श्रमिक या रानी का बनना पोषण के अन्तर पर निर्भर करता है। जिन लार्वा को रॉयल जैली नामक पोषक पदार्थ खिलाया जाता है वह रानी मक्खी में परिवर्धित हो जाते हैं। सर्वप्रथम बनने वाली रानी मक्खी अन्य रानी मक्खियों को समाप्त कर देती है। शेष निषेचित अण्डों से श्रमिक मक्खीं बनती हैं। एक छत्ते में केवल एक रानी मक्खी होती हैं। श्रमिक मक्खियों का कार्य छत्ते की सुरक्षा, निर्माण व शहद् एकत्रित करना है। अनिषेचित अण्डों से नर का विकास होता है। अतः स्पष्ट है मधुमक्खीं एक सामाजिक कीट हैं।

प्रश्न 2.
आधुनिक कृषि के विभिन्न चरणों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
आधुनिक कृषि के विभिन्न चरण
आधुनिक कृषि कला, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का एक समन्वित प्रयास है।
आधुनिक कृषि के निम्न चरण हैं-

  1. खेत की अच्छी जुताई – अच्छी जुताई अच्छी पैदावार का आधार बनाती है।
  2. उन्नत बीज – रोग प्रतिरोधक, उच्च गुणवत्ता वाले स्वस्थ बीजों का चुनाव उत्तम पैदावार हेतु प्रथम आवश्यकता है। बीज परिपक्वता समय में एकरूपता रखते हैं।
  3. उर्वरक/खाद का प्रयोग – भूमि में पोषक पदार्थों का स्तर पता करने के लिए मृदा परीक्षण किया जाता है। इसी के परिणाम के आधार पर मृदा में विभिन्न प्रकार के उर्वरक व खाद का विवेकपूर्ण प्रयोग किया जाता है। गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, जैव उर्वरकों व हरी खाद को वरीयता दी जाती है। सीमित मात्रा में ही ए, पी, यूरिया व पोटाश का प्रयोग किया जा सकता है।
  4. सिंचाई – खेत में फसल की आवश्यकतानुसार विभिन्न अन्तराल पर पानी देना आवश्यक होता है। उन्नत किस्मों को जल व उर्वरक की माँग भी अधिक होती है।
  5. खरपतवार ज्वलन् – फसली पौधों के बीच उग आये खरपतवारों को जल्दी से जल्दी उन्मूलन आवश्यक होता है। क्योंकि यह फसली पौधों के साथ स्थान, प्रकाश, जल च खनिजों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
  6. पीड़क प्रबन्धन – आधुनिक कृषि में पीड़कों व रोगों से बचने के लिए समन्वित पीड़क प्रबन्धन (Integrated Pest Management) तरीका अपनाया जाता है। इसमें रासायनिक पीड़कनाशियों के स्थान पर उनके जैविक नियंत्रण पर बल दिया जाता है। कृषि के पारंपरिक तरीकों से भी इनके उन्मूलन में मदद मिलती है। यह वहनीय या दीर्घकालीन कृषि का भाग है।
  7. उचित भण्डारण – फसल की सही समय पर कटाई, सफाई के बाद उसका उचित भण्डारण भी आवश्यक होता है। सही भण्डारण परिस्थितियाँ न होने पर फसल का बड़ा भाग सड़कर नष्ट हो जाता है। अत: पैदावार को भण्डारण के समय अजैविक कारक (नमी, अधिक ताप) तथा जैविक कारकों (रोडेन्ट, जीवाणु व कवकों) से बचाना होता है।

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