RBSE Solutions for Class 12 Political Science Chapter 25 क्षेत्रवाद एवं भाषावाद

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Rajasthan Board RBSE Class 12 Political Science Chapter 25 क्षेत्रवाद एवं भाषावाद

RBSE Class 12 Political Science Chapter 25 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 12 Political Science Chapter 25 बहुंचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
इनमें से कौन-सा कथन क्षेत्रवाद का परिचायक है?
(1) राज्यों के पुनर्गठन की माँग
(2) नवीन राज्य निर्माण
(3) भारतीय संघ में स्वायत्तता
(4) स्वयं के राज्य का बड़े राज्य में विलय सही कथन है
(अ) 1,2,3,4
(ब) 1,2,4
(स) 1, 2, 3
(द) 2, 3, 4 2.

प्रश्न 2.
‘भूमिपुत्र’ की अवधारणा का तात्पर्य है–
(अ) क्षेत्र विशेष में स्वयंभू नेता का उदय
(ब), भूमि नाम की स्त्री की संतानें
(स) भूमि पर काम करने वाले मछुआरे
(द) जागीरदारी प्रथा का एक रूप

प्रश्न 3.
पिछड़े क्षेत्रों के विकास हेतु भारत सरकार द्वारा चलाए जाने वाले कार्यक्रमों की सूची में कौनसा बेमेल है?
(अ) जनजाति क्षेत्र विकास कार्यक्रम
(ब) पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम
(स) मरु विकास कार्यक्रम
(द) धर्मस्थल विकास कार्यक्रम

प्रश्न 4.
त्रिभाषा फॉर्मूले का कौनसा/से युग्म सही है?
(अ) हिन्दी, अंग्रेजी, कन्नड़,
(ब) अंग्रेजी, पंजाबी, रूसी
(स) हिन्दी, भोजपुरी, देवनागरी
(द) हिन्दी, मलयालम, राजस्थानी

उत्तर:
1. (स), 2 (अ), 3. (द), 4. (अ)।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 25 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
क्षेत्रवाद पनपने का एक प्रमुख कारण बताइए।
उत्तर:
क्षेत्रवाद पनपने का एक प्रमुख कारण व्यक्तियों के द्वारा अपने संकीर्ण क्षेत्रीय स्वार्थों की पूर्ति करना।

प्रश्न 2.
भाषावाद का अर्थ क्या है?
उत्तर:
किसी समाज या राज्य में व्यक्तियों के द्वारा अपनी भाषा को प्राथमिकता देते हुए अन्य भाषाओं को गौण समझने की प्रवृत्ति को ही भाषावाद की संज्ञा दी जाती है।

प्रश्न 3.
क्षेत्रवाद के दो दुष्परिणाम लिखिए।
उत्तर:

  1. देश की अखण्डता को चुनौती,
  2. नए राज्यों की माँग।

प्रश्न 4.
भाषावाद राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती नहीं बने, इसका एक उपाय सुझाएँ।
उत्तर:
राजनीतिक संकीर्णताएँ समाप्त कर राष्ट्रीय हित में भाषावाद की समस्या का हल ढूँढ़ा जाए तो, इस समस्या का हल हो सकता है।

प्रश्न 5.
भारत संघ की राजभाषा का दर्जा किसे दिया गया है?
उत्तर:
भारत संघ की राजभाषा का दर्जा हिंदी भाषा को दिया गया है।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 25 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भूमिपुत्र की अवधारणा क्या है?
उत्तर:
भूमिपुत्र की अवधारणा-क्षेत्रीयवाद की एक अन्य प्रवृत्ति ‘ भूमिपुत्र की धारणा’ के रूप में देखी गयी है। ‘भूमि पुत्र’ की धारणा का आशय यह है कि किसी राज्य अथवा क्षेत्र के निवासियों द्वारा उस राज्य में बसने और रोजगार प्राप्त करने आदि के संबंध में विशेष संरक्षण की मांग की जाए।” इस मांग के साथ यह बात जुड़ी है कि जब तक उस राज्य या क्षेत्र के सभी मूल निवासियों को रोजगार प्राप्त न हो जाए, तब तक उस राज्य या क्षेत्र में बाहरी व्यक्तियों को रोजगार की सुविधा नहीं दी जानी चाहिए।

‘भूमि पुत्र’ की धारणा का उदय इस सदी के छठे दशक में ही हो गया था जब शिवसेना जैसे संगठन के द्वारा इसे महाराष्ट्र में अपनाया गया था, लेकिन समय-समय पर इस प्रवृत्ति को बहुत अधिक प्रबल होते देखा गया। 2004 ई. के उत्तरार्द्ध में असम और मुंबई में रेलवे की भर्ती’ को लेकर बिहार के लोगों के साथ जो घटनाएँ हुईं, वे ‘ भूमि-पुत्र’ की धारणा का ही परिणाम थीं।

प्रश्न 2.
क्षेत्रवाद का अर्थ बताइए।
उत्तर:
क्षेत्रवाद का अर्थ – क्षेत्र’ शब्द के बहुत अर्थ हैं। मूल रूप से किसी क्षेत्र को जोड़ने वाली कड़ी ‘सांस्कृतिक समानता’ है। किसी भौगोलिक प्रदेश को भी क्षेत्र के आधार पर संबोधित किया जा सकता है। भारतीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में क्षेत्रीवाद से अभिप्राय है-“राष्ट्र की तुलना में किसी क्षेत्र विशेष अथवा राज्य या प्रांत की अपेक्षा एक छोटे क्षेत्र से लगाव, उसके प्रति भक्ति या विशेष आकर्षण दिखाना।” इस दृष्टि से क्षेत्रवाद राष्ट्रीयता की वृहत् भावना का विलोम है और इसका ध्येय संकुचित क्षेत्रीय स्वार्थों की पूर्ति होता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो स्थानीय निवासियों द्वारा संघ या राज्य की तुलना में किसी क्षेत्र विशेष या प्रांत से लागत व उनकी प्रोन्नति के प्रयास क्षेत्रवाद कहलाता है। क्षेत्रवाद का उद्देश्य अपनी संकीर्ण क्षेत्रीय स्वार्थों की पूर्ति है। यह एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसमें क्षेत्र विशेष के लोग आर्थिक सामाजिक एवं राजनीतिक व्यक्तियों की आय से अधिक माँग करते हैं। भारतीय राजनीति के संदर्भ में यह ऐसी धारणा है, जो भाषा, धर्म, क्षेत्र आदि पर आधारित है तथा जो विघटनकारी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देती है। क्षेत्रवाद की भावना सम्पूर्ण देश में व्याप्त है, जो प्राय: सुनियोजित एवं सुव्यवस्थित आंदोलनों तथा अभियानों के रूप में प्रकट होती है।

प्रश्न 3.
त्रिभाषा फॉर्मूला क्या है?
उत्तर:
त्रिभाषा फॉर्मूला – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि भारत संघ की। राजभाषा हिंदी होगी। हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग व क्षेत्रीय भाषाओं की स्थिति पर सुझाव देने हेतु राष्ट्रपति द्वारा आयोग के गठन का भी प्रावधान है। इसके साथ ही भाषायी अल्पसंख्यकों की पूर्ण रक्षा के भी स्पष्ट प्रावधान हैं।

संविधान में इन्हीं व्यवस्थाओं को क्रियान्वित करने हेतु 1955 में पहला राजभाषा आयोग प्रो. बी.जी.खरे की अध्यक्षता में गठित किया गया। 1967 में राजभाषा संशोधन अधिनियम द्वारा ‘त्रिभाषा फॉर्मूला’ लागू करने का सुझाव आया। इसके तहत सरकारी सेवाओं में पत्राचार के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाएँ हिंदी, अंग्रेजी व अन्य प्रादेशिक भाषा में ली जाएँगी। हिंदी का निरंतर विकास भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा होगा।

प्रश्न 4.
भारत सरकार द्वारा जो विशेष विकास कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, उनमें से किन्हीं चार के नाम लिखें।
उत्तर:
भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे विशेष विकास कार्यक्रम के नाम निम्न प्रकार हैं

  1. सूखा संभाव्य क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP)
  2. मरु विकास कार्यक्रम (DDP)
  3. पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (AADP)
  4. जनजाति क्षेत्र विकास कार्यक्रम (TADP) आदि योजनाएँ या कार्यक्रम सरकार के द्वारा क्षेत्रीय असंतुलन को कम करने के लिए चलाए जा रहे हैं।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 25 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
क्षेत्रवाद क्या है? इसके पनपने के कारण व रोकने के उपाय सुझाइए।
उत्तर:
क्षेत्रवाद का तात्पर्य – क्षेत्रवाद से तात्पर्य एक देश में या देश के किसी भाग में उस छोटे से क्षेत्र से है, जो आर्थिक, भौगोलिक तथा सामाजिक आदि कारणों से अपने पृथक् अस्तित्व के लिए प्रयत्नशील है। इस प्रकार क्षेत्रवाद से आशय है, राज्य की तुलना में किस क्षेत्र विशेष अथवा राज्य या प्रान्त से लगाव। यह एक ऐसी प्रवृत्ति है जिनमें क्षेत्र विशेष, के लोग अपने लिए आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक शक्तियों की आय से अधिक माँग करते हैं। क्षेत्रवाद के पनपने के कारण: क्षेत्रवाद के पनपने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

(i) प्रकृति प्रदत्त भिन्नताएँ – भारत में प्रकृति प्रदत्त असमानताएँ भारी मात्रा में देखने को मिलती हैं। एक ओर पर्वतीय प्रदेश हैं तो दूसरी ओर मरुस्थल है। इसके अतिरिक्त भारत में पठारी, मैदानी व समुद्री भाग भी दिखाई देता है। इन सबका प्रभाव जीवन के प्रत्येक पक्ष पर पड़ा है। एक क्षेत्र के सामाजिक-धार्मिक रीतिरिवाज, भाषा, संस्कृति, परम्पराएँ, पोशाक, आभूषण, खान – पान, रहन – सहन आदि दूसरे क्षेत्रों से भिन्न रहे हैं। पृथक्-पृथक् क्षेत्रों की विशिष्ट समस्याएँ उत्पन्न हुई ओर क्षेत्रों में परस्पर असंतुलन उत्पन्न हो गया जिसने क्षेत्रवाद की प्रवृत्ति को पनपाया।

(ii) प्रशासनिक भेदभाव – प्रशासनिक भेदभाव के कारण विभिन्न राज्यों की प्रगति में अंतर रहा है। प्रशासन द्वारा समस्त राज्यों में संसाधनों का समान वितरण नहीं किया गया। फलस्वरूप उनके विकास में अंतर उत्पन्न होने व क्षेत्रवाद की भावना को बल मिला।

(iii) आर्थिक असंतुलन – आर्थिक असंतुलन ने क्षेत्रीय भावनाओं को जगाया है। क्षेत्र विशेष के लोगों में यह धारणा है कि पिछड़ेपन के कारण उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है तथा उनके आर्थिक विकास की उपेक्षा की जा रही है। यह क्षेत्रवाद की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है।

(iv) भाषायी विविधता – भारत के विभिन्न राज्यों व क्षेत्रों की अपनी – अपनी भाषाएँ हैं। राज्य सरकारों की भौगोलिक सीमाओं का निर्णय भाषा के आधार पर किया गया। प्रादेशिक भाषा बोलने वालों का अपनी भाषा से भावनात्मक लगाव होता है। अपनी भाषा को वे अधिक श्रेष्ठ मानकर अन्य भाषाओं को हीन मान लेते हैं। इससे क्षेत्रवाद को बढ़ावा मिलता है।

(v) सांस्कृतिक विविधताएँ – संस्कृति में जितनी अधिक भिन्नता तथा विशिष्टता होती, क्षेत्रीय असंतुलन उतना ही अधिक होगा। भारत विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं तथा परम्पराओं का देश है। यहाँ पर अनेक उप सांस्कृतिक समूह होने के कारण उनमें परस्पर सामाजिक व सांस्कृतिक विभिन्नताएँ हैं। इन भिन्नताओं के कारण लोग अपने क्षेत्र को दूसरे से श्रेष्ठ समझने लगते हैं और अपने लिए एक अलग क्षेत्र की माँग करने लगते हैं। फलस्वरूप क्षेत्रवाद को बढ़ावा मिलता है।

(vi) ऐतिहासिक वे राजनीतिक कारण – भारत प्राचीनकाल से ही विशाल प्रादेशिक राज्यों वाला देश रहा है। यहाँ केन्द्रीय शासन अधिक समय तक नहीं चला। राज्य के अधीनस्थ प्रदेशों वे सामंतों ने केन्द्र सरकार के कमजोर होते ही स्वतंत्रता की घोषणा कर दी और अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया। वहीं अंग्रेजी शासन के दौरान कुछ क्षेत्रों का अधिक विकास हुआ तो कुछ क्षेत्र अविकसित रह गये। राजनैतिक कारणों से यह स्थिति आज भी चली आ रही है। इस असमानता की स्थिति ने भी क्षेत्रवाद को बढ़ावा दिया। क्षेत्रवाद को रोकने के उपाय

  1.  केन्द्र सरकार का उत्तरदायित्व है कि वह सभी क्षेत्रों के समान विकास हेतु नीति निर्माण के समय राजनीतिक भेदभाव किए बिना संतुलित व समदर्शी नीति का निर्माण करे।।
  2. छोटे व संसाधनों की दृष्टि से अपेक्षाकृत कमजोर क्षेत्रों / राज्यों के विकास को भी समान प्राथमिकता दें तो धीरे – धीरे वहाँ के निवासियों में विश्वास पैदा होता जाएगा तथा क्षेत्रवाद का उग्र स्वरूप शांत होगा।
  3. क्षेत्रीय भिन्नताओं में कमी लाने के लिए पिछड़े व अविकसित क्षेत्रों में सिंचाई, बिजली, यातायात व संचार के आधारभूत साधनों के विकास को प्राथमिकता देनी होगी, जिसके दूरगामी सकारात्मक परिणाम सामने आएँगे।
  4. छोटे – छोटे राज्यों से प्रांतीय सरकारों द्वारा स्थानीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम सफलतापूर्वक चलाए जा सकते हैं।

प्रश्न 2.
भारत में क्षेत्रवाद के दुष्परिणामों पर अपनी समीक्षा प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
भारत में क्षेत्रवाद के दुष्परिणाम – भारत में क्षेत्रवाद के दुष्परिणाम निम्न प्रकार से हैं
1. विभिन्न क्षेत्रों के बीच संघर्ष और तनाव – संकीर्ण क्षेत्रवाद का जो प्रथम दुष्परिणाम हमें भारत में देखने को मिलता है, वह यह है कि इसके कारण विभिन्न क्षेत्रों के बीच आर्थिक, राजनीतिक यहाँ तक कि मनोवैज्ञानिक संघर्ष और तनाव दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक क्षेत्र अपने स्वार्थों या हितों को सर्वोच्च स्थान दे बैठता है और उसे यह चिंता नहीं होती है कि उससे दूसरे क्षेत्रों को कितना नुकसान होगा।

2. राष्ट्रीय एकता को चुनौती – संकीर्ण क्षेत्रीयता राष्ट्रीय एकता के लिए एक चुनौती बन जाती है। क्षेत्रीयता के फलस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों के बीच जो तनाव और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है वह राष्ट्रीय एकता की समस्त धारणाओं और भावनाओं पर कुठाराघात करती है, क्योंकि क्षेत्रीयता के फलस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों के लोगों में कभी क्षेत्रीय स्वार्थ या राजनीतिक स्वशासन आदि को लेकर विवाद उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे राष्ट्र की एकता में बाधा उत्पन्न होती है।

3.स्वार्थी नेतृत्व व संगठन का विकास – क्षेत्रीयता का एक दुष्परिणाम यह होता है कि इसके फलस्वरूप अलग-अलग क्षेत्र में इस प्रकार के नेतृत्व व संगठनों को उभारकर अपने संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति करना चाहते हैं। इस प्रकार के नेताओं को क्षेत्रीय व राष्ट्रीय हितों को बिल्कुल भी ध्यान नहीं रहता है वे केवल अपने ही स्वार्थों की पूर्ति में लगे रहते हैं।

4. राज्य तथा केन्द्रीय सरकार के बीच संबंधों का विकृत होना – भारत में क्षेत्रीयता के कारण केन्द्रीय सरकार तथा राज्य के बीच का संबंध कभी-कभी अत्यन्त कटु रूप धारण कर लेता है। प्रत्येक क्षेत्र के हित समूह, क्षेत्रीय नेतागण, बड़े-बड़े उद्योगपति या राजनीतिक अपने-अपने क्षेत्र के स्वार्थों को प्राथमिकता देते हैं तथा केन्द्रीय सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न करते हैं। केन्द्रीय सरकार जिसकी तरफ भी थोड़ा-सा झुक गयी वही विवाद का विषय बन जाता है, और केन्द्र तथा राज्य सरकारों का पारस्परिक संबंध सौहार्दपूर्ण नहीं रह पाता है।

प्रश्न 3.
भाषावाद क्या है? इसके उग्र स्वरूप को शांतिपूर्ण सद्भाविकता में बदलने के उपायों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भाषावाद से आशय एवं इसके उग्र स्वरूप को शांतिपूर्ण सद्भाविकता में बदलने के उपाय-भाषावाद एक ऐसी अवधारणा है जिसके अंतर्गत व्यक्ति सिर्फ अपनी ही भाषा को प्राथमिकता देते हैं तथा अन्य भाषा को गौण मानते हैं। भारत एक बहुभाषी देश है जिसमें विभिन्न प्रान्तों में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिन्दी भारत की राज्यभाषा होगी। राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करने के लिए देश की प्रभुत्व भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित किया गया।

हिन्दी को राजभाषा के रूप में समस्त देश ने नहीं स्वीकारा। हिन्दी भाषा का विरोध दक्षिण भारत में सबसे अधिक हुआ। उन लोगों के भय है कि यदि हिन्दी भारत की राजभाषा बन गई तो सरकारी नौकरियों में हिन्दी भाषी क्षेत्रों के लोगों का वर्चस्व हो जाएगा और वे पिछड़ जाएँगे इसलिए वे अंग्रेजी का समर्थन करते हैं और हिन्दी के साथ – साथ अंग्रेजी को भी राजभाषा बनाए रखने में समर्थक हैं। भाषा के आधार पर राजनीतिक दलों ने स्थानीता की संकीर्ण मनोवृति को बढ़ावा दिया जिससे तमिलनाडू संहित देश ने कई राज्यों में उग्र आन्दोलन उठ खड़े हुए। भाषा के आधार पर आन्दोलनों के उग्र स्थल को शांतिपूर्ण सद्भाविकता में बदलने के लिए निम्न उपायों का सहारा लिया जा सकता है

  1. हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार-भाषावाद की समस्या को हल करने के लिए यह आवश्यक है कि भारतीय संघ के संपूर्ण राज्यों में हिंदी भाषा का प्रचार सुनियोजित पूर्ण तरीके से संपन्न किया जाना चाहिए, जिससे इस समस्या का निदान हो सके।
  2. लोगों में जागरूकता पैदा करना-लोगों को भाषा के विषय में जागरूक बनाने के लिए अनेक अभियानों व शिविर का आयोजन किया जाना चाहिए, जिससे लोगों को उचित जानकारी उपलब्ध हो सके।
  3. राजनीतिक संकीर्णताएँ समाप्त करना – भाषावाद की समस्या को सुलझाने के लिए यह जरूरी है कि राजनीतिक संकीर्णताओं को समाप्त किया जाना चाहिए, ताकि राजनीतिक नेता अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए जनता के हितों के साथ खिलवाड़ न कर सकें।
  4. आंग्ल भाषा का सीमित प्रयोग – प्रशासनिक कार्यों में तथा अन्य राजनीतिक कार्यों में आंग्ल भाषा का प्रयोग अनुवाद के रूप तक ही सीमित होना चाहिए।
  5. सांस्कृतिक व शैक्षणिक गतिविधियों का विस्तार-भाषायी आदान – प्रदान के लिए तथा लोगों में मेल – जोल में वृद्धि करने के लिए यह जरूरी है कि सांस्कृतिक व शैक्षणिक गतिविधियों का विस्तार किया जाना चाहिए।
  6. त्रिभाषा सूत्र का प्रयोग-हिंदी, अंग्रेजी व अन्य भाषाओं में सभी सदस्यों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में इन भाषाओं के प्रयोग पर बल दिया जाना चाहिए।
  7. उचित कार्यवाही – भाषावाद की समस्या को खत्म करने के लिए यह जरूरी है कि जो भी व्यक्ति भाषा को आधार बनाकर गलत गतिविधियों को करता है, उसके खिलाफ कठोर कार्यवाही की जानी चाहिए।
  8. पर्यटन को बढ़ावा – राज्यों में पर्यटन को बढ़ावा देकर हिंदी की आवश्यकता को व्यावहारिक बनाया जाए, तो भी इस समस्या का निदान हो सकता है।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Political Science Chapter 25 बहुंचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न में से क्षेत्रवाद का कारण नहीं है
(अ) प्रशासनिक भेदभाव
(ब) सांस्कृतिक विविधताएँ
(स) प्राकृतिक भिन्नताएँ
(द) संतुलित राष्ट्रीय नीति निर्माण

प्रश्न 2.
क्षेत्रवाद ने किसको जन्म दिया?
(अ) धर्म को
(ब) पृथकतावाद को
(स) क्षेत्रीय विकास को
(द) आपसी सौहार्द्र को

प्रश्न 3.
क्षेत्रवाद की भावना कहाँ पर व्याप्त है?
(अ) संपूर्ण देश में
(ब) राज्यों में
(स) क्षेत्रों में
(द) कहीं भी नहीं

प्रश्न 4.
भूमिपुत्र की अवधारणा का सम्बन्ध निम्न में से किसका है?
(अ) जातिवाद
(ब) भाषावाद
(स) क्षेत्रवाद
(द) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 5.
क्षेत्रवाद को रोकने का उपाय है–
(अ) संतुलित राष्ट्रीय नीति निर्माण
(ब) छोटे राज्यों का गठन
(स) भाषायी विविधता का अभाव।
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 6.
निम्न में से भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद में उल्लेख है कि भारत संघ की राजभाषा हिन्दी होगी
(अ) अनुच्छेद 110
(ब) अनुच्छेद 51
(स) अनुच्छेद 343
(द) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 7.
संविधान में किस भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया है?
(अ)) हिंदी
(ब) अंग्रेजी
(स) संस्कृत
(द) उर्दू

प्रश्न 8.
प्रथम राजभाषा आयोग का गठन किया गया|
(अ) 1955.
(ब) 1956
(स) 1967
(द) 1990

प्रश्न 9.
प्रथम राजभाषा आयोग के अध्यक्ष थे–
(अ) प्रो. बी. जी. खरे
(ब) के. एन. मेनन
(स) जयप्रकाश नारायण
(द) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 10.
भाषा आयोग का गठन कर सकता है
(अ) प्रधानमंत्री
(ब) मुख्यमंत्री
(स) राष्ट्रपति
(द) संसद

उत्तर:
1. (द) 2. (ब) 3. (अ) 4. (स) 5. (द) 6. (स) 7. (अ) 8. (अ) 9. (अ) 10. (स)।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 25 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आजादी के समय भारत आर्थिक दृष्टि से सक्षम राष्ट्र क्यों नहीं था?
उत्तर:
विदेशी शासकों द्वारा हमारी अर्थव्यवस्था का अत्यधिक दोहन व प्रांतों का असंतुलित विकास इसका प्रमुख कारण था।

प्रश्न 2.
राज्यों की पुनर्गठन की प्रक्रिया को किसने प्रभावित किया?
उत्तर:
जाति, धर्म, संप्रदाय तथा व्यक्ति विशेष की अग्रणी छवि ने राज्यों की पुनर्गठन की प्रक्रिया को प्रभावित किया।

प्रश्न 3.
राज्यों में क्षेत्रीय असंतुलन किन कारणों से विद्यमान रहा है?
उत्तर:
आर्थिक विकास का स्तर तथा नौकरशाही की राजनीति प्रतिबद्धता जैसे आदि कारणों से राज्यों में क्षेत्रीय असंतुलन विद्यमान रहा है।

प्रश्न 4.
क्षेत्रवाद को प्रोत्साहन देने वाली दो प्रमुख माँगों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. नए राज्यों की माँग,
  2. पुराने राज्यों के पुनर्गठन की माँग।

प्रश्न 5.
प्रांतों की किन मांगों ने क्षेत्रवाद की भावनाओं को बलवती किया?
उत्तर:
प्रांतों की मांगें:

  1. राज्यों के पुनर्गठन की मांग
  2. नवीन राज्य निर्माण की मांग
  3. अधिकाधिक राजनीतिक सहभागिता का दावा।

प्रश्न 6.
क्षेत्रवाद से क्या आशय है?
उत्तर:
क्षेत्रवाद से अभिप्राय है – राज्य की तुलना में किसी क्षेत्र विशेष या प्रान्त से लगाव।

प्रश्न 7.
किसी क्षेत्र विशेष, राज्य या प्रांत के लगाव को आप क्या कहेंगे?
उत्तर:
क्षेत्रवाद।

प्रश्न 8.
क्षेत्रवाद का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
अपने निजी एवं संकीर्ण क्षेत्रीय स्वार्थों की पूर्ति करना क्षेत्रवाद का प्रमुख उद्देश्य है।

प्रश्न 9.
क्षेत्रवाद किस प्रकार की प्रवृत्ति है?
उत्तर:
क्षेत्रवाद एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसमें क्षेत्र विशेष के लोग आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक शक्तियों की अन्य से अधिक मांग करते हैं।

प्रश्न 10.
‘भूमिपुत्र’ की धारणा भारतीय लोकतन्त्र के सम्मुख जिस चुनौती एवं समस्या को उत्पन्न करती है, वह है।
उत्तर:
क्षेत्रवाद।

प्रश्न 11.
क्षेत्रवाद रोकने के दो उपाय बताइए।
उत्तर:

  1. सन्तुलित राष्ट्रीय नीति निर्माण
  2. छोटे राज्यों का गठन।

प्रश्न 12.
पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए सरकार द्वारा प्रारंभ किये गए तीन विशेष कार्यक्रमों को लिखिए।
उत्तर:

  1. मरु विकास कार्यक्रम,
  2. पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम,
  3. जनजाति क्षेत्र विकास कार्यक्रम।

प्रश्न 13.
संविधान के किस अनुच्छेद में हिंदी को राजभाषा माना गया है?
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी को राजभाषा माना गया है।

प्रश्न 14.
संविधान में भाषा से संबंधित राज्य विधानमंडलों को क्या अधिकार दिया गया है?
उत्तर:
संविधान राज्य के विधानमंडलों को यह अधिकार प्रदान करता है कि वे उस राज्य में राजकीय प्रयोजन हेतु हिंदी या उस राज्य की क्षेत्रीय भाषा को स्वीकार कर सकेंगे।

प्रश्न 15.
पहला राजभाषा आयोग किसकी अध्यक्षता में गठित किया गया?
उत्तर:
1955 में पहला राजभाषा आयोग प्रो. बी.जी. खरे की अध्यक्षता में गठित किया गया।

प्रश्न 16.
प्रो. बी. जी. खरे की अध्यक्षता में गठित आयोग का नाम क्या है?
उत्तर:
राजभाषा आयोग।

प्रश्न 17.
त्रिभाषा फॉर्मूला को किस वर्ष लागू करने का सुझाव आया?
उत्तर:
1967 में राजभाषा संशोधन अधिनियम द्वारा त्रिभाषा फॉर्मूला लागू करने का सुझाव आया।

प्रश्न 18.
भारत में अपनाए गए त्रिभाषा फॉर्मूला के बारे में बताइए।
उत्तर:
भारत में त्रिभाषा फॉर्मूला अपनाया गया है- राजभाषा हिन्दी, सम्पर्क भाषा अंग्रेजी व एक क्षेत्रीय भाषा जो संविधान की सूची में विद्यमान है।

प्रश्न 19.
कौन – सी भाषाएँ राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं ले सकती हैं?
उत्तर:
पारिवारिक एवं क्षेत्रीय भाषाएँ कभी भी राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं ले सकती हैं।

प्रश्न 20.
भाषा के आधार पर राज्य के गठन की मांग को किसकी संज्ञा दी जाती है?
उत्तर:
भाषावाद को भाषा के आधार पर राज्य के गठन की मांग की संज्ञा दी जाती है।

प्रश्न 21.
भाषावाद क्यों पनपा है?
उत्तर:
क्षेत्रीय भाषा को हिन्दी से श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति से भाषावाद पनपा है।

प्रश्न 22.
भाषावाद की समस्या के समाधान का कोई एक उपाय बताइए।
उत्तर:
हिन्दी का प्रचार-प्रसार सुनियोजित तरीके से सभी को विश्वास में लेकर किया जाए।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 25 लघूत्तरात्मक प्रश

प्रश्न 1.
क्षेत्रवाद की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
क्षेत्रवाद की विशेषताओं का वर्णन निम्नांकित रूप में किया जाता है

  1. इसमें विशेष क्षेत्र के हितों को महत्व दिया जाता है।
  2.  क्षेत्रीयतावाद एक सीखा हुआ व्यवहार है।
  3. क्षेत्रवाद में पक्षपात का समावेश होता है।
  4. इसे एक पृथक् राजनीतिक तथा सामाजिक इकाई के रूप में देखा जाता है।
  5. सांस्कृतिक विरासत में अधिक भिन्नता होने के कारण इसके प्रभाव में वृद्धि होती है।
  6. वर्तमान समय में क्षेत्रीयतावाद का सीधा संबंध राजनीतिक तथा सरकार से प्राप्त प्रतिनिधित्व से है।
  7. क्षेत्रवाद का आधार निर्मूल विश्वास भी है। 8. कभी-कभी क्षेत्रवाद में हिंसक प्रवृत्ति का भी समावेश पाया जाता है।

प्रश्न 2.
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में कौन-कौनसी माँगों ने क्षेत्रवाद की भावनाओं को तीव्र किया है? अथवा भारत में क्षेत्रवाद को प्रोत्साहित करने वाली प्रमुख माँगे कौन – कौन सी हैं?
उत्तर:
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में निम्नलिखित माँगों ने क्षेत्रवाद की भावनाओं को तीव्र किया-

  1. पुराने राज्यों के पुर्नगठन की माँग,
  2. नवीन राज्य निर्माण की माँग,
  3. प्राकृतिक संसाधनों के वितरण सम्बन्धी विवादों का उत्पन्न होना,
  4. भारत संघ में ही अधिक स्वायत्तता की आकांक्षा,
  5. केन्द्र से अधिकाधिक आर्थिक सहायता प्राप्त करना,
  6. अधिकाधिक राजनीतिक सहभागिता का दावा,
  7. नदी जल सम्बन्धी विवाद

प्रश्न 3.
क्षेत्रवाद के कारण बताइए।
उत्तर:
क्षेत्रवाद के कारण – क्षेत्रवाद के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  1. प्रकृति प्रदत्त भिन्नताएँ व असमानताओं का होना।
  2. प्रशासन द्वारा संसाधनों के समान वितरण का अभाव या प्रशासनिक भेदभाव का होना।
  3. केन्द्रीय निवेश व विकास सम्बन्धी भिन्नता का होना।
  4. ऐतिहासिक तथा राजनीतिक कारण।
  5. सांस्कृतिक विविधताओं को पाया जाना।
  6. भाषायी विविधता से क्षेत्रवाद की भावना को बल मिलना।

प्रश्न 4.
क्षेत्रवाद राष्ट्रीय एकता में किस प्रकार बाधक है?
उत्तर:
क्षेत्रवाद की बढ़ती हुई भावना एकता के विकास में एक अवरोधक तत्व है। राजनीति की दृष्टि से क्षेत्रवाद का मुख्य विरोध संघवाद से है। क्षेत्रवाद के पक्षपाती न केवल हर प्रकार के परिचायक विकेन्द्रीकरण और पूर्ण स्व – शासन की मांग करते हैं। अपितु अतिवादी आक्रमण क्षेत्रवाद के कुछ प्रवक्ता तो संघ से भी अलग हो जाना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उन पर केन्द्रीय सरकार का कोई नियंत्रण न रहे और न उनका केन्द्रीय सरकार के प्रति कोई दायित्व।

इस स्थिति का स्वाभाविक फल होता है कि वे मांग करने लगते हैं। क्षेत्रवादी भावना के बलवती होने का दुष्प्रभाव न केवल संघ और राज्य के संबंधों पर पड़ता है अपितु राज्यों के आपसी संबंध भी बिगड़ते हैं। पड़ोसी राज्यों में भाषा, सीमा आदि प्रश्नों को लेकर विवाद उठ खड़े होते हैं तथा विभिन्न राज्यों की जनता के बीच खाई व वैमनस्यता की भावना बढ़ने लगती है।

प्रश्न 5.
क्षेत्रवाद का भारतीय राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा ? बताइए।
उत्तर:
क्षेत्रवाद का भारतीय राजनीति पर प्रभाव क्षेत्रवाद का भारतीय राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा यह विवादास्पद प्रश्न है अर्थात् क्षेत्रवाद का भारतीय राजनीति पर प्रभाव के सम्बन्ध में दो मत प्रचलित हैं। एक मत – ऋणात्मक प्रभाव मानने वालों का है। उनके अनुसार, क्षेत्रीय आन्दोलनों का भारतीय राजनीति पर ऋणात्मक प्रभाव पड़ा है एवं इससे पृथकतावादी आन्दोलनात्मक राजनीति को बढ़ावा मिला है। इस दृष्टिकोण के समर्थकों के अनुसार क्षेत्रीय आन्दोलनों ने अपने निहित स्वार्थों की पूति हेतु धर्म, भाषा, जाति जैसे – विघटनकारी तत्वों की सहायता ली है जिससे भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में नवीन बाधाएँ उत्पन्न हो रही हैं।

इसका क्षेत्रीय आन्दोलनो का भारतीय राजनीति पर धनात्मक प्रभाव पड़ा है, इस दृष्टिकोण के समर्थकों के मतानुसार भारत में क्षेत्रीय आन्दोलन न्यूनाधिक रूप से पृथकतावादी नहीं रहे हैं। क्षेत्रीय आन्दोलनों का लक्ष्य अपने क्षेत्र या समुदाय हेतु अधिक सुविधाएँ प्राप्त करना था विकास की गति को तीव्र करना होता है।

वास्तविक स्थिति इन दोनों दृष्टिकोणों के मध्य में है। भारत में विकास की गति असमान रही है, अतएव क्षेत्रीय धरातल पर विरोध स्वाभाविक है, यदि विकास के अवसरों व उससे प्राप्त लाभों का विभाजन न्यायोचित तरीके से हो सके तो क्षेत्रीय आन्दोलनों से भारत के संघीय ढाँचे पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा।

प्रश्न 6.
क्षेत्रवाद के दुष्परिणाम बताइए।
उत्तर:
क्षेत्रवाद के दुष्परिणाम-क्षेत्रवाद के दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं

  1. देश की एकता व अखण्डता को चुनौती,
  2. विभिन्न क्षेत्रों के मध्य संघर्ष और तनाव,
  3. केन्द्र व राज्यों की सरकारों के मध्य तनाव,
  4. स्वार्थी नेतृत्व व संगठनों का विकास,
  5. राष्ट्रीय प्रगति में बाधक,
  6. पृथकतावाद को प्रोत्साहन,
  7. नए राज्यों की माँग,
  8. भूमिपुत्र की अवधारणा का विकास,
  9. स्वयंभू नेताओं का उदय,
  10. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में देश की साख खराब होना,
  11. राष्ट्रीय कानूनों व आदेशों को चुनौती,
  12. राजनीति में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का अत्यधिक प्रभाव।

प्रश्न 7.
संतुलित राष्ट्रीय नीति निर्माण किस प्रकार क्षेत्रवाद की समस्या का समाधान कर सकता है? बताइए।
उत्तर:
संतुलित राष्ट्रीय नीति निर्माण क्षेत्रवाद की समस्या का काफी हद तक समाधान कर सकता है कि देश के विकास के लिये अनेक योजनाएँ व कार्यक्रम बनाए जाते हैं। लेकिन इनका लाभ सभी राज्यों को समान रूप से नहीं मिल पाता है। केन्द्र सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह देश के सभी क्षेत्रों के समान विकास हेतु नीति निर्माण के समय राजनीतिक भेदभाव किए बिना संतुलित व समदर्शी नीति निर्माण करे। छोटे व संसाधनों की दृष्टि से अपेक्षाकृत कमजोर क्षेत्रों अथवा राज्यों के विकास को भी समान प्राथमिकता दे तो धीरे-धीरे वहाँ के निवासियों में विश्वास पैदा होता जाएगा व क्षेत्रवाद का उग्र स्वरूप शान्त होता चला जाएगा।

प्रश्न 8.
क्षेत्रवाद की समस्या के समाधान हेतु कोई दो उपाय सुझाइए।
उत्तर:
क्षेत्रवाद की समस्या के समाधान हेतु दो उपाय – क्षेत्र की समस्या के समाधान हेतु दो उपाय निम्नलिखित है

  1. आधारभूत ढाँचे का निर्माण करना – सरकार द्वारा पिछड़े व अविकसित क्षेत्रों में सिंचाई, विद्युत, परिवहन एवं संचार के साथ-साथ पेय जल की आपूर्ति आदि का समुचित विकास किया जाना चाहिए। यह क्षेत्रवाद को समाप्त करने के लिए आवश्यक है। आधारभूत ढाँचे का विकास औद्योगिक प्रगति में सहायक होगा।
  2. प्रशासनिक दृष्टि से छोटे राज्यों का गठन करना – सरकार छोटे राज्यों का गठन करके क्षेत्रवाद की समस्या का समाधान कर सकती है। छोटे – छोटे राज्यों से प्रान्तीय सरकारों द्वारा स्थानीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम सफलतापूर्वक चलाए जा सकते हैं। केन्द्रीय करों के वितरण में ही हिस्सेदारी बढ़ती है।

प्रश्न 9.
भाषावाद की समस्या के समाधान हेतु कोई पाँच उपाय बताइए।
उत्तर:
भाषावाद की समस्या के समाधान हेतु पाँच उपाय: भाषावाद की समस्या के समाधान हेतु पाँच उपाय अग्रलिखित हैं

  1. हिन्दी भाषा का प्रचार – प्रसार – भाषावाद की समस्या को हल करने के लिए यह आवश्यक है कि भारतीय संघ के संपूर्ण राज्यों में हिन्दी भाषा का प्रचार सुनियोजित पूर्ण तरीके से संपन्न किया जाना चाहिए जिससे इस समस्या का निदान हो सके।
  2. लोगों में जागरूकता पैदा करना – लोगों को भाषा के विषय में जागरूक बनाने के लिए अनेक अभियानों व शिविर का आयोजन किया जाना चाहिए, जिससे लोगों को उचित जानकारी उपलब्ध हो सके।
  3. राजनीतिक संकीर्णताएँ समाप्त करना – भाषावाद की समस्या को सुलझाने के लिए यह जरूरी है कि राजनीतिक संकीर्णताओं को समाप्त किया जाना चाहिए ताकि राजनीतिक नेता अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए जनता के हितों के साथ खिलवाड़ न कर सकें।
  4. आंग्ल भाषा का सीमित प्रयोग – प्रशसनिक कार्यों में एवं अन्य राजनीतिक कार्यों में आंग्ल भाषा का प्रयोग अनुवाद के रूप तक ही सीमित होना चाहिए।
  5. सांस्कृतिक व शैक्षणिक गतिविधियों का विस्तार – भाषायी आदान – प्रदान के लिए एवं लोगों में मेल – जोल में वृद्धि करने के लिए यह जरूरी है कि सांस्कृतिक व शैक्षणिक गतिविधियों का विस्तार किया जाना चाहिए।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 25 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
क्षेत्रवाद की समस्या के समाधान हेतु उपायों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
क्षेत्रवाद की समस्या के समाधान हेतु उपाय: क्षेत्रवाद की समस्या के समाधान हेतु प्रमुख उपाय निम्नलिखित है
(i) संतुलित राष्ट्रीय नीति का निर्माण करना – केन्द्र सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह देश के सभी क्षेत्रों के समान विकास हेतु नीति निर्माण के समय राजनीतिक भेदभाव किए बिना संतुलित व समदर्शी नीति निर्माण करे। छोटे वे संसाधनों की दृष्टि से अपेक्षाकृत कमजोर क्षेत्रों अथवा राज्यों के विकास को भी समान प्राथमिकता दे तो धीरे – धीरे वहाँ के निवासियों में विश्वास पैदा होता जाएगा व क्षेत्रवाद का उग्र स्वरूप शान्त होता चला जाएगा।

(ii) आधारभूत ढाँचे का विकास करना – सरकार द्वारा पिछड़े व अविकसित क्षेत्रों में सिंचाई, विद्युत, परिवहन व संचार के साथ – साथ पेय जल की आपूर्ति आदि का समुचित विकास किया जाना चाहिए। यह क्षेत्रवाद को समाप्त करने के लिए आवश्यक है। आधारभूत ढाँचे का विकास औद्योगिक प्रगति में सहायक होगा।

(iii) विकास के विशेष कार्यक्रमों का परियोजनाओं के रूप में प्रारम्भ किया जाना – क्षेत्रवाद को समाप्त करने के विकास के विशेष कार्यक्रमों का परियोजनाओं के रूप में प्रारम्भ किया जाना आवश्यक है। इस दिशा में सरकार प्रयत्नशील है। सरकार समय – समय पर पिछड़े क्षेत्रों में विशेष विकास कार्यक्रम लागू कर क्षेत्रीय पिछड़ेपन को दूर करने का प्रयास करती है।

जैसे – सूखा सम्भाव्य क्षेत्र कार्यक्रम, मरु – विकास कार्यक्रम, पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम, जनजाति क्षेत्र विकास कार्यक्रम आदि। इसके अतिरिक्त पिछड़े क्षेत्रों / राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा देने से भी क्षेत्रीय असंतुलन कम किया जा सकता है।

(iv) छोटे राज्यों का गठन किया जाना – बड़े व विशालकाय राज्यों का विभाजन कर छोटे राज्यों की स्थापना करनी चाहिए, यह प्रशासनिक कुशलता के लिए आवश्यक है। छोटे-छोटे राज्यों से प्रान्तीय सरकारों द्वारा स्थानीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम सफलतापूर्वक चलाए जा सकते हैं। केन्द्रीय करों के वितरण में ही हिस्सेदारी बढ़ती है।

(v) सांस्कृतिक एकीकरण के लिए प्रयास करना – प्रचार के विभिन्न साधनों यथा रेडियो, दूरदर्शन, समाचार-पत्रों आदि के मध्य से देश की विभिन्न संस्कृतियों में एकता, समन्वय एवं सौहार्द्र की भावना उत्पन्न करके एकीकरण किया जाये जिससे कि एक क्षेत्र के लोगों में दूसरे क्षेत्र के प्रति अधिक सहनशीलता की भावना पनप सके।

(vi) भाषायी विविधता का सम्मान – हमारा संविधान भी भाषायी विविधता को मान्यता देकर विविधता को स्वीकार कर चुका है। राष्ट्रभाषा के अतिरिक्त क्षेत्रीय भाषाओं का भी विकास एवं सम्मान होना चाहिए। राष्ट्रभाषा, मातृभाषा एवं एक अन्य क्षेत्रीय भाषा का अध्ययन अनिवार्य कर देना चाहिए।

(vii) क्षेत्रवाद को प्रोत्साहन देने वाले राजनीतिक दलों पर प्रतिबन्ध – केन्द्र सरकार द्वारा ऐसे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए जो क्षेत्रवाद की भावना में वृद्धि करते है। ऐसे व्यक्तियों को मंत्री एवं अन्य महत्वपूर्ण पद नहीं देने चाहिए जो क्षेत्रवाद में विश्वास करते है एवं उसे बढ़ावा देते हैं।

(viii) पिछड़े क्षेत्रों का विकास – देश के पिछड़े क्षेत्रों में रोजगार के साधनों के विकास शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं एवं बच्चों के कल्याण के लिए विशेष प्रयास किये जाने चाहिए।

(ix) क्षेत्रीय स्वायत्त परिषदों की स्थापना की जाए – क्षेत्रवाद को समाप्त करने हेतु सभी क्षेत्र के लोगों को समान आर्थिक सुविधाएँ प्रदान करने हेतु क्षेत्रीय स्वायत्त परिषदों की स्थापना की जानी चाहिए उन्हें राजनीतिक स्वायत्तता के साथ ही प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वायत्तता भी प्रदान करनी चाहिए। इससे क्षेत्रीय स्तर पर औद्योगिक विकास के स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों का विस्तार होगा। स्थानीय लोगों को सन्तोष प्राप्त होगा एवं वे आन्दोलन की राजनीति को छोड़ देंगे।

प्रश्न 2.
भारत में भाषावाद पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
भारत में भाषावाद – भारत एक विशाल तथा बहुभाषी देश है। देश की जनसंख्या 1.21 अरब से अधिक है। इसके विभिन्न राज्यों में भिन्न – भिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिन्दी भारत की राजभाषा होगी। राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करने के लिए देश की प्रमुख भाषाओं को संविधान की 8वीं अनुसूची में सम्मिलित किया गया है। राज भाषा आयोग – सन् 1955 में भारत सरकार ने 21 सदस्यों का राजभाषा आयोग गठित किया जिसके अध्यक्ष प्रो. बी. जी. खेर को इसलिए इसे खेर आयोग के नाम से भी जाना जाता है।

इस आयोग का मुख्य उद्देश्य देश की औद्योगिक, सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक उन्नति का एवं लोक सेवाओं के सम्बन्ध में अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के व्यक्तियों की उचित माँगों पर भी विचार करना था। इस आयोग ने हिन्दी भाषा के प्रसार पर बल दिया। आयोग ने यह भी कहा कि चूंकि हिन्दी देश के अधिकतर लोगों द्वारा बोली जाती है अतः हिन्दी को ही जनसंचार की भाषा के रूप में कार्य करना चाहिए।’ राजभाषा संशोधन अधिनियम – सन् 1967 के ‘राजभाषा संशोधन अधिनियम’ को पारित कर भाषायी नीति में परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन किया गया एवं ‘त्रिभाषा सूत्र’ की अनुशंसा की गई।

सरकारी सेवाओं की परीक्षाएँ हिन्दी, अंग्रेजी एवं अन्य प्रादेशिक भाषाओं में लिये जाने एवं हिन्दी के क्रमिक विकास का निर्णय लिया गया। भाषावाद का विकास एवं उससे उत्पन्न समस्याएँ – स्वतन्त्रता के बाद भारत में भाषावाद को बढ़ावा मिला और उससे अनेक समस्या उत्पन्न हुई।  भाषा के आधार पर नये राज्यों के निर्माण के लिए समय – समय पर आंदोलन हुए और सन् 1956 में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया। सन् 1967 में राजभाषा कानून बनाने के पश्चात् हिंसक घटनाएँ घटी एवं राजभाषा समिति के प्रतिवेदन में हिन्दी का विरोध करने वाले सदस्यों के विचारों को ही प्रतिध्वनित किया गया।

भाषा के आधार पर क्षेत्रीय राजनीतिक दलों द्वारा स्थानीयता की संकीर्ण मनोवृत्ति को बढ़ावा दिया गया है। दक्षिण के कुछ राज्यों में हिन्दी के विरोध में आन्दोलन हुए भाषागत राजनीति के कारण भूमिपुत्र की धारणा का प्रचलन हुआ। संसाधनों, रोजगार के अवसरों का प्रादेशिक भाषा-भाषियों के पक्ष में आवंटन एवं अन्य भाषा – भाषियों के प्रति असहिष्णुता की प्रवृत्ति ने भाषागत समुदायों में अन्तर्कलह उत्पन्न किया।

उदाहरणों के लिए महाराष्ट्र में शिवसेना ने भाषा कन्नड़ – भाषी कर्नाटकवासियों का विरोध किया। किसी क्षेत्रीय भाषा का विकास को इसमें अन्य नागरिकों को कोई आपत्ति नहीं हो सकती किन्तु क्षेत्रीय भाषा के विकास में हिन्दी को बाधक मानना व उसका हिंसक तरीकों से विरोध राष्ट्रीय अस्मिता के लिए ठीक नहीं है।

भाषावाद की समस्या के समाधान के लिए उपाय – भाषावाद की समस्या के निवारण हेतु निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं
(i) हिन्दी भाषा का प्रचार – प्रसार – भाषावाद की समस्या को हल करने के लिए यह आवश्यक है कि भारतीय संघ के संपूर्ण राज्यों में हिन्दी भाषा का प्रचार सुनियोजित पूर्ण तरीके से संपन्न किया जाना चाहिए, जिससे इस समस्या का निदान हो सके।

(ii) राजनीतिक संकीर्णताएँ समाप्त करना – भाषावाद की समस्या को सुलझाने के लिए यह जरूरी है कि राजनीतिक संकीर्णताओं को समाप्त किया जाना चाहिए ताकि राजनीतिक नेता अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए जनता के हितों के साथ खिलवाड़ न कर सकें।

(iii) लोगों में जागरूकता पैदा करना – लोगों को भाषा के विषय में जागरूक बनाने के लिए अनेक अभियानों व शिविर का आयोजन किया जाना चहिए जिससे लोगों को उचित जानकारी उपलब्ध हो सके।

(iv) आंग्ल भाषा का सीमित प्रयोग – प्रशासनिक कार्यों में एवं अन्य राजनीतिक कार्यों में आंग्ल भाषा का प्रयोग अनुवाद के रूप तक ही सीमित होना चाहिए।

(v) त्रिभाषा सूत्र का प्रयोग – हिन्दी, अंग्रेजी वे अन्य भाषाओं में सभी सदस्यों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में इन भाषाओं के प्रयोग पर बल दिया जाना चाहिए।

(vi) पर्यटन को बढ़ावा – राज्यों में पर्यटन को बढ़ावा देकर हिन्दी की आवश्यकता को व्यावहारिक बनाया जाए तो भी इस समस्या का निदान हो सकता है।

(vii) उचित कार्यवाही-भाषावाद की समस्या को खत्म करने के लिए यह जरूरी है कि जो भी व्यक्ति भाषा को आधार बनाकर गलत गतिविधियों को करता है, उसके खिलाफ कठोर कार्यवाही की जानी चाहिए।

(viii) सांस्कृतिक व शैक्षणिक गतिविधियों का विस्तार – भाषायी आदान – प्रदान के लिए एवं लोगों में मेल-जोल में वृद्धि करने के लिए यह जरूरी है कि सांस्कृतिक व शैक्षणिक गतिविधियों का विस्तार किया जाना चाहिए।

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