RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 3 बाह्य आक्रमण एवं आत्मसातीकरण

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Rajasthan Board RBSE Class 12 History Chapter 3 बाह्य आक्रमण एवं आत्मसातीकरण

RBSE Class 12 History Chapter 3 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 History Chapter 3 बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन इतिहासकार कल्हण की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम है।
(अ) इण्डिका
(ब) सूर्य – अलंकार
(स) राजतरंगिणी
(द) दिव्यावदान।

प्रश्न 2.
चरक संहिता के रचयिता महर्षि चरक किस शासक के दरबार की शोभा बढ़ाते थे।
(अ) कनिष्क
(ब) रुद्रदमन
(स) सिकन्दर
(द) चन्द्रगुप्त।

प्रश्न 3.
शकों के प्रसिद्ध शासक का नाम निम्नलिखित में से था।
(अ) यशोवर्मन
(ब) रुद्रदमन
(स) हर्षवर्द्धन
(द) अशोक।

प्रश्न 4.
त्रिपिटक सम्बन्धित है।
(अ) बौद्ध धर्म से
(ब) जैन धर्म से
(स) ईसाई धर्म से
(द) मुस्लिम धर्म से।

प्रश्न 5.
जूनागढ़ अभिलेख किसकी जानकारी उपलब्ध करवाता है?
(अ) चीनी शासक की
(ब) कुषाण शासक की
(स) यूनानी शासक की
(द) शक शासक की।

प्रश्न 6.
बौद्ध धर्म का विभाजन किसके काल में हुआ था?
(अ) पृथ्वीराज
(ब) रुद्रदमन
(स) उदयराज
(द) कनिष्क।

प्रश्न 7.
बौद्ध धर्म की चतुर्थ संगीति का स्थान था।
(अ) पेशावर
(ब) कुण्डलवन (कश्मीर)
(स) उज्जैन
(द) मथुरा।

प्रश्न 8.
हूणों का सर्वाधिक संघर्ष निम्न में किसके साथ हुआ था?
(अ) चन्द्रगुप्त
(ब) घटोत्कच
(स) स्कन्दगुप्त
(द) समुद्र गुप्त।

उत्तरमाला:
1. (स)
2. (अ)
3. (ब)
4. (अ)
5. (द)
6. (द)
7. (ब)
8. (द)।

RBSE Class 12 History Chapter 3 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मेगस्थनीज की पुस्तक का नाम बताइए।
उत्तर:
मेगस्थनीज की पुस्तक का नाम ‘इण्डिका’ है।

प्रश्न 2.
शून्यवाद के प्रवर्तक कौन थे?
उत्तर:
शून्यवाद के प्रवर्तक कनिष्क के दरबार के प्रसिद्ध वैज्ञानिक नागार्जुन थे।

प्रश्न 3.
सिकन्दर कहाँ का शासक था?
उत्तर:
सिकन्दर मकदुनिया का शासक था।

प्रश्न 4.
हिन्दू राजा पोरस ने किससे मुकाबला किया था?
उत्तर:
हिन्दू राजा पोरस ने सिकन्दर से मुकाबला किया था।

प्रश्न 5.
‘मिलिन्दपन्ह’ पुस्तक किस शासक को समर्पित है?
उत्तर:
मिलिन्दपन्ह पुस्तक इण्डो यूनानी राजा मेनाण्डर को समर्पित है।

प्रश्न 6.
भारतीय व यूनानी मिश्रण से किस शैली की मूर्तिकला का विकास हुआ था?
उत्तर:
भारतीय व यूनानी मिश्रण से गान्धार शैली का विकास हुआ था।

प्रश्न 7.
शकों को किस चीन जाति ने परास्त किया था?
उत्तर:
शकों को चीन की यू-ची जाति ने परास्त किया था।

प्रश्न 8.
पराक्रम व साहस के लिए इस काल के शासक किस उपाधि को धारण करते थे?
उत्तर:
पराक्रम व साहस के लिए इस काल के शासक ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण करते थे।

प्रश्न 9.
सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार करवाने वाले शासक का क्या नाम था?
उत्तर:
सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त के सौराष्ट्र प्रान्त के गवर्नर सु-विशाख द्वारा सम्पन्न कराया गया था।

प्रश्न 10.
संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने वाला शासक कौन था?
उत्तर:
संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने वाला शासक रुद्रदमन प्रथम था।

प्रश्न 11.
कुषाण वंश का संस्थापक कौन था?
उत्तर:
कुषाण वंश का संस्थापक कजुलकेडफिसिज था।

प्रश्न 12.
‘आक्सस नदी से पूर्व में गंगा नदी तक मध्य एशिया में खुरासन से लेकर उत्तर प्रदेश में वाराणसी तक’ कौन शासक राज्य करता था?
उत्तर:
कुषाण वंश के महान शासक कनिष्क का साम्राज्य आक्सस नदी से पूर्व में गंगा नदी तक, मध्य एशिया में खुरासन से लेकर उत्तर प्रदेश में वाराणसी तक फैला था।

प्रश्न 13.
बौद्ध धर्म किन दो शाखाओं में विभक्त हो गया था?
उत्तर:
बौद्ध धर्म हीनयान और महायान नामक दो शाखाओं में विभक्त हो गया था।

प्रश्न 14.
प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान वसुमित्र ने किस सभा (संगीति) की अध्यक्षता की थी?
उत्तर:
प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान वसुमित्र ने कश्मीर के कुण्डलवन नामक विहार में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति की अध्यक्षता की थी।

प्रश्न 15.
विदेशी व्यापार की समृद्धि को प्रदर्शित करने वाले चीन से रोम तक फैले मार्ग को किस नाम से जाना जाता था?
उत्तर:
विदेशी व्यापार की समृद्धि को प्रदर्शित करने वाले चीन से रोम तक फैले मार्ग को रेशम मार्ग के नाम से जाना जाता था।

प्रश्न 16.
किस विद्वान को भारतीय आइन्सटीन कहा जाता है?
उत्तर:
कनिष्क के दरबार के प्रसिद्ध दार्शनिक एवं वैज्ञानिक नागार्जुन को भारतीय आइन्सटीन कहा जाता है।

प्रश्न 17.
पाटलिपुत्र का सम्बन्ध दक्षिण में किस बन्दरगाह से था?
उत्तर:
पाटलिपुत्र का सम्बन्ध दक्षिण में ताम्रलिप्ति बन्दरगाह से था।

RBSE Class 12 History Chapter 3 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
हूण शासक तोरमाण से किन भारतीय शासकों ने मुकाबला किया?
उत्तर:
हूण शासक तोरमाण से स्थानीय शासकों यशोवर्मन तथा बालदित्य ने मिलकर मुकाबला किया। 528 ई. में यशोवर्मन के आक्रमण से हूण परास्त हो गए थे परन्तु वे अपने मूल स्थान मध्य एशिया नहीं गए बल्कि हिन्दू धर्म व संस्कृति को आत्मसात करके इसके अभिन्न अंग बन गए और इसी में विलीन हो गए।

प्रश्न 2.
विदेशी आक्रान्तकारी वंशों का नाम क्रमशः लिखिए।
उत्तर:
मौर्यों के पतन के साथ जहाँ एक ओर अनेक भारतीय राजवंशों ने अपनी स्वतन्त्र सत्ता के लिए संघर्ष आरम्भ किया वहीं दूसरी ओर विदेशी राजवंशों ने भारत पर निरन्तर आक्रमण किये। मौर्योत्तर काल में भारत के उत्तर-पश्चिम सीमा से आक्रमण करने वाले विदेशी आक्रान्तकारी क्रमशः यूनानी, शक, हूण तथा कुषाण थे।

प्रश्न 3.
बाह्य आक्रमणों की जानकारी देने वाले स्रोतों के बारे में संक्षेप में जानकारी दीजिए।
उत्तर:
बाह्य आक्रमणों की जानकारी देने वाले प्रमुख स्रोत तत्कालीन समय में रचे गये ग्रन्थ हैं। इनमें प्रमुख हैं-अश्वघोष का बुद्धचरित, सौंदरानन्द महाकाव्य, सूर्यालंकार, सारीपुत्र प्रकरण, चरक संहिता, ह्वेनसांग का यात्रा विवरण, बौद्ध साहित्य का त्रिपिटक तथा मिलिन्दपन्ह इनके अतिरिक्त शक शासक रुद्रदमन प्रथम के जूनागढ़ अभिलेख से भी इनके सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

प्रश्न 4.
महान कवि अश्वघोष की रचनाओं का नाम लिखिए।
उत्तर:
अश्वघोष कुषाण वंश के शासक कनिष्क का दरबारी कवि था जिसने संस्कृत में बुद्धचरित, सौंदरानन्द महाकाव्य व सारीपुत्र प्रकरण की रचना की।

प्रश्न 5.
यूनानी आक्रमण के समय भारत की राजनैतिक स्थिति को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
यूनानी आक्रमण के समय उत्तरी-पश्चिमी भारत कई छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था। काबुल के उत्तर में गांधार, झेलम और चिनाब के बीच में पौरव, रावलपिण्डी और पेशावर के हिस्से में ‘तक्षशिला, कश्मीर के पश्चिम में रावी और व्यास नदियों के बीच का भाग कठ, उसके निकट क्षुद्रक, इन नदियों के संगम स्थल के भाग में मालव, मूसक, सम्बोस और ऐसे ही अन्य राज्यों को मिलाकर उस काल में भारत का उत्तरी पश्चिमी भाग कुल 25 राज्यों में बँटा था। इनमें से कुछ गणतंत्र थे और कुछ राज्य राजतंत्रात्मक शासन पद्धति से शासित थे। राजतंत्र के शासक गणतंत्रों से विरोध रखते थे। इनमें आपस में संघर्ष होता रहता था। ऐसी राजनैतिक परिस्थितियों में मकदूनिया के शासक सिकन्दर ने ईसा पूर्व 327 में भारत की ओर प्रस्थान किया।

प्रश्न 6.
“राजा पुरु अथवा पोरस का प्रतिरोध पराक्रम व साहस से परिपूर्ण था।” इस वाक्य को स्पष्ट करें।
उत्तर:
सिकन्दर ने अपने विजय अभियान के अन्तर्गत झेलम और चिनाब नदियों के मध्य स्थित पौरव राज्य पर अधिकार करने का निश्चय किया तथा वहाँ के शासक पुरु या पोरस को आत्मसमर्पण कर उसकी अधीनता स्वीकार करने का संदेश भेजा। देशभक्ति से ओत-प्रोत, पराक्रमी एवं वीर राजा पोरस ने सिकन्दर को युद्ध के लिए ललकारा तथा मातृभूमि की रक्षा के लिए वीरता से लड़ा परन्तु सिकन्दर की सेना विजयी रही तथा उसे युद्ध में बन्दी बना लिया गया। सिकन्दर के यह पूछने पर कि उसके साथ क्या बर्ताव किया जाए राजा पोरस ने कहा, “जैसा एक राजा को दूसरे राजा के साथ करना चाहिए।” सिकन्दर राजा पोरस की इस निर्भीकता से प्रसन्न हुआ एवं उसने उसका राज्याधिकार लौटा दिया। इस वक्तव्य से स्पष्ट होता है कि राजा पुरु पोरस का प्रतिरोध पराक्रम व साहस से परिपूर्ण था।

प्रश्न 7.
सिकन्दर की मृत्यु के बाद किस यूनानी शासक ने आक्रमण का दूसरा चरण शुरू किया व उसका क्या परिणाम हुआ?
उत्तर:
सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् उसके सेनानायक सेल्यूकस निकेटर के उत्तराधिकारी के रूप में शासक एण्ट्रयोकस तृतीय ने 306 ई. पू. में आक्रमण का दूसरा चरण शुरू किया। इसने हिन्दकुश पर्वत, काबुल घाटी पार करके राजा सुभागसेन को पराजित कर भारत में बैक्ट्रियान यूनान राज्य की शुरूआत की। बैक्ट्रिया का क्षेत्र पश्चिमोत्तर क्षेत्र था जो अत्यन्त उपजाऊ था तथा एण्ट्रयोकस के अधिकार में था। उसके इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि यूनानियों की बैक्ट्रियन शाखा जिसने भारत के पश्चिमोत्तर को आधार बनाकर प्रवेश किया अन्त में भारतीय समाज में घुल – मिलकर भारतीय यूनानी या इण्डोग्रीक के नाम से जाने गए।

प्रश्न 8.
राजा मेनाण्डर पर 15 पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर:
मेनाण्डर इण्डो-यूनानी राजाओं में सबसे महान था। उसका जन्म कलसी गाँव में हुआ था जो मेनाण्डर की राजधानी शाकल से 200 योजन दूर स्थित अलासण्ड द्वीप पर था। ‘मिलिन्दपन्ह’ ग्रन्थ में मेनाण्डर को एक राजवंश से सम्बन्धित बताया गया है। मेनाण्डर के सिक्कों के अध्ययन से पता चलता है कि उसने डेमेट्रियस की पुत्री अगैथीक्लीया से विवाह किया। मेनाण्डर एक महान विजेता भी था उसने सिकन्दर से भी अधिक राष्ट्रों पर विजय पाई। मेनाण्डर के सिक्कों के प्राप्ति स्थानों से यह निष्कर्ष निकलता है कि वह कई राज्यों का शासक था।

वजीर जातीय प्रदेश से प्राप्त खरोष्ठी अभिलेखों में से एक में मेनाण्डर के राज्य का उल्लेख किया गया है। पेशावर प्रदेश और सम्भवतः ऊपरी काबुल घाटी पर मेनाण्डर के अधिकार के संकेत भी इन अभिलेखों से मिलते हैं। ‘मिलिन्दपन्ह’ के अनुसार मेनाण्डर ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया था। मेनाण्डर एक कट्टर बौद्ध था। उसने अनेक बौद्ध भिक्षुओं को आश्रय दिया था। मेनाण्डर ने बौद्ध विद्वान भिक्षु नागसेन से बौद्ध अध्यात्म शास्त्र और दर्शन के विषय में कई प्रश्न पूछे तथा संतोषजनक उत्तर प्राप्त होने पर वह बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया।

विद्वान मेनाण्डर का शासन काल डेमेट्रियस की मृत्यु के पश्चात् मानते हैं। ‘मिलिन्दपन्ह’ में कहा गया है कि मेनाण्डर ‘परिनिर्वाण’ के 500 वर्ष पश्चात् तक जीवित रहा। वह एक न्यायप्रिय शासक था उसके न्यायप्रिय होने का प्रमाण अन्य देशों में रचे गये विवरणों से भी मिलता है। रैप्सन के अनुसार मेनाण्डर ने एक विजेता के रूप में ही नहीं वरन् उपनिषदों में वर्णित कुरुवंशी जनमेजय और विदेह शासक जनक की भाँति एक दार्शनिक के रूप में भी ख्याति प्राप्त की। इस प्रकार स्पष्ट रूप से कहा जा सकता। है कि मेनाण्डर ने हिन्द यवनं साम्राज्य के बैक्ट्रियन शाखा के अच्छे शासक के रूप में सफलता अर्जित की।

प्रश्न 9.
मुद्रा (सिक्के) के क्षेत्र में यूनानी मुद्रा की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
भारतीय बैक्ट्रियनों के शासन का भारत में महत्वपूर्ण प्रभाव मुद्रा पर पड़ा। पहले के सिक्के तकनीकी रूप से कम श्रेष्ठ होते थे तथा इन पर किसी शासक का नाम, उपाधि तथा तिथि अंकित नहीं होती थी। भारतीय यूनानी शासकों ने जो मुद्राएँ (सिक्के) चलायीं उनकी विशेषताएँ निम्नलिखित र्थी-

  1. भारतीय यूनानी शासकों ने सोने के सिक्के चलाए जिन पर राजा का नाम, उपाधि और तिथि अंकित होती थी।
  2. निर्माण कला की दृष्टि से भारतीय यूनानी शासकों द्वारा चलाए गए सिक्के पहले के सिक्कों की तुलना में श्रेष्ठ थे।
  3. भास्तीय यूनानी शासकों ने भारतीय मौद्रिक तकनीकी को भी मुद्रा क्षेत्र में अपनाया।
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प्रश्न 10.
“शक शासक रुद्रदमन को जनकल्याण के लिए स्मरण किया जाएगा।” इसके पक्ष में अपने तर्क संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
शक शासकों के वंशजों में जयदमन के पुत्र रुद्रदमन प्रथम (130 – 150 ई.) उज्जैन के शक शासकों में सबसे प्रख्यात था। 150 ई. में रुद्रदमन प्रथम द्वारा जारी किये गये जूनागढ़ अभिलेख में रुद्रदमन के व्यक्तित्व के बारे में जानकारी मिलती है। इस लेख में उसके व्यक्तित्व का जो पक्ष सर्वाधिक उभरा वह है जनकल्याण की भावना। उसने प्रजा के लिए अपने मंत्रियों के विरोध के बावजूद अपने निजी कोष से भारी धन व्यय करके सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण करवाया था।

उसने बाँध के लिए प्रजा से कोई अतिरिक्त या अनुचित कर नहीं लिया। वह उच्च आदर्शों का पालन करने वाला प्रजावत्सल राजा था। वह सदैव शरणागत की रक्षा करने वाला और युद्ध के अतिरिक्त किसी का भी वध न करने की प्रतिज्ञा लेने वाला दयालु व्यक्ति था। उसने अपने प्रजाजनों को डाकुओं, जंगली पशुओं व रोगों से भयमुक्त किया। इस प्रकार के लोक कल्याणकारी कार्यों के लिए रुद्रदमन प्रथम को सदैव स्मरण किया जाएगा।

प्रश्न 11.
बौद्ध धर्म के उत्थान हेतु अशोक के बाद सर्वाधिक रूप से कुषाण शासक कनिष्क को श्रेय जाता है। समझाइए।
उत्तर:
बौद्ध धर्म के उत्थान हेतु अशोक के पश्चात् सर्वाधिक श्रेय कुषाण शासक कनिष्क को जाता है क्योंकि

  1. बौद्ध साहित्य में कनिष्क का उल्लेख दूसरे अशोक के रूप में किया गया है जिसके प्रोत्साहन एवं संरक्षण के कारण बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार – प्रसार हुआ।
  2. कनिष्क ने बौद्ध धर्म को राज्याश्रय प्रदान कर कनिष्कपुर, पुरुषपुर, मथुरा व तक्षशिला में स्तूप और विहार बनवाए।
  3. उसने विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए बौद्ध भिक्षुओं को मध्य एशिया, चीन, तिब्बत, जापान आदि देशों में भेजा।
  4. कनिष्क द्वारा चतुर्थ संगीति का आयोजन इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि कनिष्क बौद्ध था और महायान शाखा के प्रसार के लिए उसने प्रयत्न किए।
  5. कनिष्क ने महायान को राजधर्म घोषित किया तथा मध्य एशिया में बौद्ध धर्म की इस शाखा को बहुत अधिक विकसित किया।

प्रश्न 12.
कुषाण शासक कनिष्क किन विद्वानों, साहित्यकारों व दार्शनिकों का आश्रयदाता था?
उत्तर:
कनिष्क प्राचीन भारत के महानतम शासकों में से एक था। वह एक महान योद्धा साम्राज्य निर्माता, कलाकारों तथा विद्वानों का आश्रयदाता था। उसका दरबार सम्राट विक्रमादित्य के समान विद्वानों से अलंकृत था। उसके काल में साहित्य की विविध विधाओं का सर्वांगीण विकास हुआ। अश्वघोष, भास और शुद्रक साहित्य विधा के महान साहित्यकार थे। संस्कृत भाषा और उसकी उन्नति के साथ ही पाली व प्राकृत भाषा में भी इस युग में उत्कृष्ट रचनाएँ लिखी गईं।

बौद्ध सम्प्रदाय की प्रगति के फलस्वरूप दिव्यावदान जैसे ग्रन्थ की रचना भी इसी काल में हुई। चरक और सुश्रुत इस काल के महान चिकित्सक एवं आयुर्वेदाचार्य थे। नागार्जुन जिसने सापेक्षवाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया, कनिष्क के काल का प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। इस युग में भारतीय ज्योतिष में नवीन सिद्धान्तों की स्थापना हुई और खगोल विद्या की वैज्ञानिक प्रामाणिकता बढ़ी।

प्रश्न 13.
विदेशी व्यापार की उन्नति का काल किसे कहेंगे वे क्यों?
उत्तर:
कुषाणों के काल को विदेशी व्यापार की उन्नति का काल कहा कहा जा सकता है क्योंकि:
इस काल में स्थल मार्गों एवं नदी मार्गों के विकास ने जहाँ आन्तरिक व्यापार में वृद्धि की वहीं समुद्री मार्गों ने विदेशी व्यापार को सुदृढ़ता प्रदान की। कुषाणों ने रेशम मार्ग पर नियंत्रण कर लिया जो चीन से चलकर मध्य एशिया होते हुए रोमन साम्राज्य तक पहुँचता था। भारतीय व्यापारियों ने चीनी सिल्क व्यापार में मध्यस्थ के रूप में भाग लेना शुरू कर दिया। वे चीन से रेशम खरीदकर रोमन साम्राज्य के व्यापारियों तक पहुँचाकर लाभ कमाते थे।

भारत में हाथी दाँत का सामान, काली मिर्च, लौंग, मसाले, सुगन्धित पदार्थ और औषधियों तथा सूती व रेशमी कपड़े बड़ी मात्रा में रोम निर्यात किये जाते थे। भारत का बारीक मलमल रोम में बहुत लोकप्रिय था। चीन व रोम के अतिरिक्त इस काल में भारत का व्यापार बर्मा, जावा, सुमात्रा, चम्पा आदि दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों के साथ भी था। इण्डो-ग्रीक शासकों व कुषाण शासकों ने बड़ी संख्या में सोने के सिक्के भी चलाए। मुद्रा एवं व्यापार के कारण देश में कई नगरों का विकास हुआ। इस प्रकार नगरीय संस्कृति, मुद्रा व व्यापार के प्रसार ने कुषाणों के काल में विदेशी व्यापार को विकसित किया।

प्रश्न 14.
‘गान्धार कला’ भारतीय मूर्तिकला का नवीन रूप था। इसकी विशेषताओं को समझाइए।
उत्तर:
गान्धार कला को ग्रीको रोमन, ग्रीको बुद्धिष्ट, हिन्द यूनानी आदि नामों से जाना जाता है। इस शैली का विकास भारतीयों ने किया। भारत के गान्धार प्रदेश में विकसित होने के कारण ही इसे गंधार शैली कहा गया। गांधार में भारतीय शिल्पकारों का एशियाई, यूनानी व रोमन शिल्पियों के सम्पर्क में आने पर इस शैली का उद्भव हुआ। इसमें बुद्ध की प्रतिमाएँ यूनान व रोम मिश्रित शैली में बनायी गयीं। इस शैली की विशेषताएँ निम्नलिखित थी-

  1. गांधार कला में बनायी गयी बुद्ध की मूर्तियाँ यूनानी ढंग से बनने लग जो यूनानियों के पवित्र देवता अपोलो की भाँति लगती हैं।
  2. गांधार कला की विषयवस्तु भारतीय थी केवल निर्माता यूनानी थे।
  3. इस शैली में बनाई गई मूर्तियों में यूनानी श्रृंगार तथा अलंकार की प्रधानता थी। ये भूरे तथा स्लेटी रंग के पत्थरों से बनती थीं बाद में चूने व प्लास्टर का प्रयोग होने लगा।
  4. इस शैली में बनायी गयी मूर्तियों में भारी ओष्ठ, खिंची हुई आँखें, धुंघराले बाल, लम्बी पूँछे, बोझिल, हट युक्त वस्त्रों से ढकी मूर्तियों में बुद्ध की आकृति को यथार्थ के निकट जाने का प्रयास किया गया है।
  5. यह शैली कुषाण शासक कनिष्क के शासनकाल की एक बड़ी देन थी।

प्रश्न 15.
कनिष्क के सैनिक अभियानों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कनिष्क कुषाण वंश का सबसे प्रतापी शासक था। कनिष्क ने कुषाण सत्ता को अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया। जब वह सिंहासनारूढ़ हुआ तब उत्तराधिकार में उसे एक छोटा-सा राज्य मिला था। अपनी योग्यता के बल पर उसने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। उसके प्रमुख सैन्य अभियान निम्नलिखित थे-

  1. कनिष्क ने पार्थियनों के राजा खुसरो को हराकर पार्थिया को कुषाण राज्य का अंग बनाया।
  2. कनिष्क ने पाटलिपुत्र के राजा को हराकर उससे दण्डात्मक कर की माँग की तथा मगध राज्य से सातवाहनों के शासन का अन्त किया।
  3. राजतरंगिणी के अनुसार कनिष्क कश्मीर का शासक था। यहीं उसने चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन किया।
  4. कनिष्क ने शक क्षत्रप चष्टन को परास्त कर उज्जैन पर विजय प्राप्त की।
  5. लगभग 90 ई. में कनिष्क ने मध्य एशिया में सैनिक अभियान किया जिसके फलस्वरूप चीनी तुर्किस्तान के काशगर, यारकन्द एवं खोतान पर कनिष्क का अधिकार हो गया।
  6. ह्वेनसांग के विवरण से ज्ञात होता है कि कनिष्क ने पामीर के उत्तर में अपने साम्राज्य विस्तार के लिए एक शक्तिशाली सेना भेजकर चीन पर आक्रमण किया था तथा सुंगलिन पर्वत के पूर्व खोतान, काशगर, यारकन्द तक अपना साम्राज्य विस्तृत किया।
  7. कनिष्क ने अपने साम्राज्य के केन्द्रवर्ती स्थान पेशावर पर अधिकार कर उसे अपनी राजधानी बनाया।

प्रश्न 16.
यूनानी आक्रमण के प्रभाव को रेखांकित कीजिए।
उत्तर:
यूनानी शासकों ने लगभग दो शताब्दियों तक भारत के उत्तर-पश्चिम सीमान्त प्रदेशों पर शासन किया। इस काल में भारतीयों तथा यूनानियों में पर्याप्त सांस्कृतिक सम्बन्ध रहे और दोनों की एक-दूसरे पर प्रतिक्रिया हुई। यूनानी सभ्यता को प्रभाव भारतीय मुद्रा, मूर्तिकला, व्यापार तथा वाणिज्य के क्षेत्र में विशेष रूप से पड़ा। भारतीयों की कई धार्मिक धारणाओं और आदर्शों को यूनानी शासकों ने अपनाया। असंख्य यूनानी भारतीय धर्मों के अनुयायी बन गए तथा अन्त में यूनानी विशेषताएँ भारत में ही आत्मसात होकर भारतीय समाज व संस्कृति की मुख्य धारा में विलीन हो गईं।

RBSE Class 12 History Chapter 3 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
“भारतीय समाज की धारा में विदेशियों का समावेश” विषय पर विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
मौर्यों के पतन से गुप्त साम्राज्य के आविर्भाव तक के काल को मौर्योत्तर काल कहा जाता है। इस काल में कोई बड़ा साम्राज्य तो स्थापित नहीं हुआ परन्तु यह युग ऐतिहासिक दृष्टिकोण से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस युग में मध्य एशिया से सांस्कृतिक सम्बन्ध स्थापित हुए और विदेशी तत्वों का भारतीय संस्कृति में समावेश हुआ। मौर्योत्तर काल में किसी एक राजवंश का सम्पूर्ण भारत पर नियंत्रण नहीं था बल्कि अनेक क्षेत्रीय व स्थानीय राजवंशों को अलग – अलग क्षेत्र में शासन था। मौर्योत्तर काल में शासन करने वाले शासक विदेशी तथा भारतीय थे। यह वह समय था जब एक ओर मौर्यों की केन्द्रीयकृत शासन व्यवस्था बिखर रही थी और विदेशी राजबंश भारत पर निरन्तर आक्रमण कर रहे थे।

वहीं दूसरी ओर कई भारतीय राजवंश अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत थे। इस समय भारत की उत्तर – पश्चिम सीमा से यूनानी, शक, हूण व कुषाण जैसी विदेशी जातियों ने भारत में प्रवेश किया। समय के साथ ये विदेशी जैसे भारतीय भूमि की उपज ही बन गए और अन्त में उनकी संस्कृतियाँ भारत में ही आत्मसात होकर मुख्यधारा में विलीन हो गयीं। विदेशियों व भारतीयों के मध्य इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने दोनों को एक-दूसरे की संस्कृतियों से अवगत कराया तथा अन्त में ये विदेशी भारतीय संस्कृति के रीति – रिवाजों को अपनाकर सदा के लिए भारतीय बन गए और इनके धर्म व संस्कृति भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बन गए।

प्रश्न 2.
कुषाण राजा कनिष्क का एक महान शासक के रूप में मूल्यांकन करते हुए उसके कार्यकाल की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कनिष्क कुषाण वंश का सबसे प्रतापी शासक था। कनिष्क के समय में कुषाण सत्ता अपने शिखर पर पहुँच गई थी। कनिष्क एक महान विजेता, कुशल प्रशासक एवं कला प्रेमी शासक था। कनिष्क जब सिंहासनारूढ़ हुआ तब उत्तराधिकार में उसे छोटा – सा राज्य मिला था। अपने पराक्रम के बल पर उसने अपना साम्राज्य पश्चिम में आक्सस नदी से पूर्व में गंगा नदी तक मध्य एशिया में खुरासन से लेकर उत्तर प्रदेश में वाराणसी तक विस्तृत कर लिया था।

एक महान योद्धा व साम्राज्य निर्माता होने के साथ-साथ कनिष्क कलाकारों तथा विद्वानों को आश्रयदाता था। हर्ष व अशोक की भाँति वह बौद्ध धर्म का प्रचारक एवं पोषक था। बौद्ध होते हुए भी कनिष्क ने अन्य धर्मों का आदर किया और धार्मिक सहिष्णुता की नीति का पालन किया। उसके कार्यकाल के समय कुषाण काल अपने चरमोत्कर्ष पर था। उसके शासन काल की प्रमुख विशेषताएँ अग्रलिखित थीं

  1. कनिष्क का शासन शकों की भाँति क्षेत्रप प्रणाली पर आधारित था। प्रत्येक प्रान्त क्षत्रप द्वारा शासित होता था।
  2. दण्डनायक और महादण्डनायक पद कुषाण प्रशासकीय मशीनरी के महत्वपूर्ण भाग थे।
  3. कनिष्क ने कनिष्कपुर, पुरुषपुर, सिरमुख अरदि नगरों की स्थापना की तथा अनेक स्तूपों, विहारों का निर्माण कराया।
  4. कनिष्क ने महायान धर्म को राजाश्रय प्रदान किया तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए बौद्ध भिक्षुओं को मध्य एशिया, चीन, तिब्बत, जापान आदि देशों में भेजा।
  5. कनिष्क ने कश्मीर के कुण्डलवन नामक विहार में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन किया जिसका अध्यक्ष वसुमित्र था।
  6. कनिष्क के काल में हुई चतुर्थ बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म हीनयान तथा महायान दो शाखाओं में विभाजित हो गया।
  7. कनिष्क के काल में स्थल मार्गों एवं नदी मार्गों के विकास ने जहाँ आन्तरिक व्यापार में वृद्धि की वहीं समुद्री मार्गों ने विदेशी व्यापार को सुदृढ़ता प्रदान की।
  8. कनिष्क के काल में भारत का व्यापार रोम, चीन, बर्मा, जावा, सुमात्रा, चम्पा आदि दक्षिणी-पूर्वी एशिया के देशों के साथ भी था।
  9. कनिष्क ने बड़ी संख्या में सोने के सिक्के चलाए। मुद्रा एवं व्यापार के कारण देश में कई नगरों का विकास हुआ।
  10. कनिष्क के काल में साहित्य, विज्ञान तथा कला के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई।
  11. कनिष्क के शासनकाल में मूर्तिकला की तीन प्रमुख शैलियों का विकास हुआ – मथुरा, अमरावती एवं गान्धार।
  12. कनिष्क के काल में भारतीय ज्योतिष में नवीन सिद्धान्तों की स्थापना हुई और खगोल विद्या की वैज्ञानिक प्रामाणिकता बढ़ी।
  13. कनिष्क ने 78 ई. में एक नया संवत् आरम्भ किया जो शक संवत् कहलाता है।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि कनिष्क केवल एक महान विजेता ही नहीं वरन् एक कुशल प्रशासक भी था जिसके काल में प्रत्येक क्षेत्र (कला, विज्ञान, तकनीकी, साहित्य, धर्म) में सराहनीय विकास हुआ।

प्रश्न 3.
भारतीय यूनानी राजा मेनाण्डर की उपलब्धियाँ बताइए।
उत्तर:
मेनाण्डर यूनानी राजाओं में सबसे महान शासक था। वह यूनानियों की बैक्ट्रियन शाखा से सम्बन्धित था जिसे इण्डो ग्रीक कहा जाता था। मेनाण्डर के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी प्रसिद्ध ग्रन्थ मिलिन्दपन्ह से मिलती है। मिलिन्दपन्ह के अनुसार मेनाण्डर कलसी गाँव में उत्पन्न हुआ था तथा एक राजवंश से सम्बन्धित था। उसने डेमेट्रियस की पुत्री अर्गेथीक्लीया तथा अन्यों से विवाह किया था। मेनाण्डर की उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं।

  1. मेनाण्डर एक महान विजेता था उसने सिकन्दर से भी अधिक राष्ट्रों पर विजय पाई।
  2. मेनाण्डर के सिक्कों के प्राप्ति स्थानों की विविधता से यह निष्कर्ष निकलता है कि वह कई राज्यों को शासक था।
  3. उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिले तथा काठियावाड़ से प्राप्त मेनाण्डर के सिक्के इन क्षेत्रों में उसके अधिकार की सूचना देते हैं।
  4. वजीर जातीय प्रदेश से प्राप्त खरोष्ठी अभिलेखों में से एक में मेनाण्डर के राज्य का उल्लेख किया गया है।
  5. पेशावर प्रदेश और सम्भवत: ऊपरी काबुल घाटी पर मेनाण्डर के अधिकार के संकेत भी इन अभिलेखों से मिलते हैं।
  6. मिलिन्दपन्ह के अनुसार मेनाण्डर ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया था।
  7. मेनाण्डर की राजधानी शाकल पुष्यमित्र शुंग द्वारा सताये गये बौद्ध भिक्षुओं की आश्रयस्थली थी।
  8. वह एक न्यायप्रिय शासक था। उसके न्यायप्रिय होने का प्रमाण अन्य देशों में रचे गये विवरणों से मिलता है।
  9. मेनाण्डर ने एक दार्शनिक के रूप में भी ख्याति प्राप्त की।
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प्रश्न 4.
कुषाणकालीन समाज, धर्म व वाणिज्य व्यापार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. कुषाणकालीन समाज:
कुषाणकालीन समाज समृद्ध था। महिलाओं को पर्याप्त स्वतंत्रता थी। घर में उनके पृथक् कक्ष होते थे। पोशाक में एकरूपता नहीं थी। गान्धार क्षेत्र के लोग सामान्यतया धोती बाँधते थे। कमर में फेंटा लगाते थे और सिर पर रूमाल या साफा बाँधते थे। समाज समृद्धि, विविधताओं तथा अनेक गतिविधियों से परिपूर्ण था। मथुरा के शिलालेखों से स्पष्ट होता है कि सामाजिक जीवन में कई गतिविधियाँ प्रचलित थीं। तत्कालीन साहित्य में नाचने-गाने, वाद्य यन्त्रों के उपयोग, नाटकों, जादू – टोने का उल्लेख मिलता है।

2. धर्म:
कुषाणों के काल में राजत्व का सिद्धान्त प्रचलित था। कुषाण शासकों ने अपनी तुलना देवताओं से की। उन्होंने देवपुत्र की उपाधि धारण की। इस काल में राजा को देवतुल्य माना जाता था। सामाजिक स्वीकृति हेतु यह धार्मिक वैधता आवश्यक थी।

3. वाणिज्य एवं व्यापार:
व्यापारिक दृष्टि से भारत कुषाणों के काल में आर्थिक रूप से सम्पन्न राष्ट्र बन गया था। इस काल में स्थल मार्गों एवं नदी मार्गों के विकास ने जहाँ आन्तरिक व्यापार में वृद्धि की, वहीं समद्री मार्गों ने विदेशी व्यापार को सुदृढ़ता प्रदान की। कुषाणों ने चीन से चलकर मध्य एशिया होते हुए रोम को जाने वाले रेशम मार्ग पर नियंत्रण कर लिया। भारत के व्यापारी चीन से रेशम खरीदकर रोमन साम्राज्य के व्यापारियों तक पहुँचाते थे जिससे उन्हें बड़ा लाभ मिलता था।

भारत में हाथी दाँत का सामान, मसाले, सुगन्धित पदार्थ, औषधियाँ, सूती व रेशमी वस्त्र आदि बड़ी मात्रा में रोम निर्यात किये जाते थे। चीन व रोम के अलावा भारत का व्यापार बर्मा, जावा, सुमात्रा, चम्पा आदि दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों के साथ भी था। मुद्रा एवं व्यापार के कारण देश में कई नगरों का विकास भी हुआ जिससे आन्तरिक व्यापार को बढ़ावा मिला।

प्रश्न 5.
“शक राजा रुद्रदमन एक महान शासक था।” समझाइए।
उत्तर:
शक शासकों के वंशजों में जयदमन का पुत्र रुद्रदमन प्रथम उज्जैन के शक शासकों में सबसे विख्यात था। उसने 130 ई. से 150 ई. तक शासन किया। रुद्रदमन प्रथम ने 150 ई. में जूनागढ़ अभिलेख जारी किया जिससे उसके विषय में सर्वाधिक जानकारी प्राप्त होती है। इस अभिलेख को विशुद्ध संस्कृत भाषा में लिखा गया था जिससे स्पष्ट होता है कि रुद्रदमन ने संस्कृत को बढ़ावा दिया। रुद्रदमन के जूनागढ़ अभिलेख से उसके सम्बन्ध में निम्नलिखित जानकारी मिलती है।

  1. जूनागढ़ अभिलेख से रुद्रदमन प्रथम के व्यक्तित्व की जो पक्ष सर्वाधिक उभरी वह जनकल्याण की भावना है।
  2. अपने मंत्रियों के विरोध के बावजूद रुद्रदमन ने अपनी प्रजा के लिए अपने निजी कोष में से भारी धन व्यय करके सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण करवाया था।
  3. रुद्रदमन ने बाँध के लिए प्रजा से कोई अनुचित कर नहीं लिया।
  4. वह उच्च आदर्शों का पालन करने वाला प्रजावत्सल राजा था।
  5. वह सदैव शरणागत की रक्षा करने वाला और युद्ध के अतिरिक्त किसी का भी वध न करने की प्रतिज्ञा लेने वाला दयालु व्यक्ति था।
  6. रुद्रदमन ने अपने प्रजाजनों को डाकुओं, जंगली पशुओं व रोगों से भयमुक्त किया।
  7. वह एक कुशल सेनानायक और योद्धा था।
  8. वह शस्त्र व शास्त्र दोनों विधाओं में पारंगत था। वह संगीत वे शास्त्रों का ज्ञाता, संस्कृत व संस्कृति का संरक्षक, काव्यशास्त्र का मर्मज्ञ, शब्दार्थ (व्याकरण), तर्कशास्त्र का ज्ञाता तथा हाथी, घोड़े, रथादि के संचालन एवं तलवार ढाल आदि के युद्ध में प्रवीण था।
  9. इन गुणों के साथ-साथ वह अद्भुत शारीरिक सौन्दर्य का स्वामी भी था।
  10. रुद्रदमन ने महाक्षत्रप की उपाधि धारण की। उपर्युक्त बिन्दुओं से यह स्पष्ट होता है कि निस्सन्देह शक शासक रुद्रदमन एक महान शासक था।
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RBSE Class 12 History Chapter 3 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 History Chapter 3 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
मौर्य वंश का अंतिम सम्राट कौन था?
(क) पुष्यमित्र शुंग
(ख) वृहद्रथ
(ग) चन्द्रगुप्त मौर्य
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से किन्हें विदेशी शासकों के अन्तर्गत नहीं रखा जा सकता है?
(क) शक
(ख) कुषाण
(ग) हूण
(घ) सातवाहन।

प्रश्न 3.
हर्षचरित किसकी रचना है?
(क) ह्वेनसांग
(ख) कल्हण
(ख) कल्हण
(ग) बाणभट्ट
(घ) पतंजलि।

प्रश्न 4.
सापेक्षवाद का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया?
(क) नागार्जुन
(ख) पतंजलि
(ग) अश्वघोष
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 5.
सिकन्दर को भारत में आगमन कब हुआ?
(क) 315 ई. पू.
(ख) 327 ई. पू.
(ग) 298 ई. पू.
(घ) 302 ई. पू.।

प्रश्न 6.
सिकन्दर के आक्रमण के समय तक्षशिला का शासक कौन था?
(क) अष्टक
(ख) आंभी
(ग) पोरस
(घ) शशिगुप्त।

प्रश्न 7.
भारत की उत्तरी – पश्चिमी सीमा पर सिकन्दर का सामना सबसे पहले किससे हुआ?
(क) शकों से
(ख) पौरव से
(ग) अश्मकों से
(घ) क्षुद्रकों से।

प्रश्न 8.
सिकन्दर की मृत्यु कब हुई?
(क) 320 ई. पू.
(ख) 323 ई. पू.
(ग) 330 ई. पू.
(घ) 323 ई. पू.।

प्रश्न 9.
इण्डो – ग्रीक नाम से जाने गए यूनानी शासक किस शाखा से सम्बन्धित थे?
(क) पार्थियन
(ख) बैक्ट्रियन
(ग) क्षत्रप
(घ) शक।

प्रश्न 10.
हिन्द – यूनानी शासकों में सबसे महान शासक कौन था?
(क) डेमेट्रियस
(ख) एण्ट्रयोकस
(ग) प्लूटार्क
(घ) मेनाण्डर।

प्रश्न 11.
मिलिन्दपन्ह किस भाषा से लिखी गई पुस्तक है?
(क) संस्कृत
(ख) पाली
(ग) हिन्दी
(घ) ग्रीक।

प्रश्न 12.
शक मूल रूप से कहाँ के निवासी थे?
(क) काबुल
(ख) यूरोप
(ग) मध्य एशिया
(घ) अफगानिस्तान।

प्रश्न 13.
भारत के दक्कन में अपना राज्य स्थापित करने वाली शको की प्रमुख शाखा थी
(क) दूसरी
(ख) पाँच
(ग) तीसरी
(घ) चौथी।

प्रश्न 14.
उज्जैन के शक शासकों में सबसे प्रख्यात कौन था?
(क) चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य
(ख) स्कन्दगुप्त
(ग) रुद्रदमन प्रथम
(घ) महाक्षत्रप।

प्रश्न 15.
दक्कन में राज्य करने वाली शक शाखा की राजधानी क्या थी?
(क) उज्जैन
(ख) कपिशा
(ग) तक्षशिला
(घ) नासिक।

प्रश्न 16.
यूनानियों के बाद भारत में मध्य एशिया से आने वाली दूसरी विदेशी जाति कौन – सी थी?
(क) हूण
(ख) शक
(ग) कुषाण
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 17.
शक शासक रुद्रदमन की उपलब्धियों का उल्लेख किस अभिलेख में मिलता है?
(क) नासिक अभिलेख
(ख) महरौली स्तम्भ लेख
(ग) जूनागढ़ अभिलेख
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 18.
महाक्षत्रप की उपाधि किसने धारण की?
(क) पुष्यमित्र शुंग
(ख) रुद्रदमन प्रथम
(ग) तोरमाण
(घ) कनिष्क।

प्रश्न 19.
विक्रम संवत् की शुरूआत कब हुई?
(क) 56 ई. पू.
(ख) 50 ई. पू.
(ग) 57 ई. पू.
(घ) 52 ई. पू.।

प्रश्न 20.
शक शासक रुद्रदमन ने किस भाषा को बढ़ावा दिया?
(क) पालि
(ख) संस्कृत
(ग) प्राकृत
(घ) स्थानीय।

प्रश्न 21.
चतुर्थ बौद्ध संगीति का उपाध्यक्ष कौन था?
(क) अश्वघोष
(ख) वसुमित्र
(ग) कनिष्क
(घ) इनमें से कोई नहीं।

उत्तरमाला:
1. (ख), 2. (घ), 3. (ग), 4. (क), 5. (ख), 6. (ख), 7. (ग), 8. (ख), 9. (ख), 10. (घ), 11. (ख), 12. (ग), 13. (ख), 14. (ग), 15. (घ), 16. (ख), 17. (ग), 18. (ख), 19. (ग), 20. (घ), 21. (क)।

मिलान कीजिए
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उत्तरमाला:
(i) 1. (ख), 2. (ग), 3. (घ), 4. (ङ), 5. (क)।
(ii) 1. (ख), 2. (ग), 3. (ङ), 4. (क), 5. (घ)।

RBSE Class 12 History Chapter 3 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मौर्य साम्राज्य का अन्त कब और किसने किया?
उत्तर:
185 ई. पू. में अंतिम मौर्य सम्राट वृहद्रथ की हत्या करके पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य साम्राज्य का अन्त कर दिया।

प्रश्न 2.
मौर्योत्तर काल में किन विदेशी राजवंशों ने भारत के भू-भाग पर शासन किया?
उत्तर:
मौर्योत्तर काल में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शासन करने वाले विदेशी राजवंश यूनानी, शक, कुषाण व हूण थे।

प्रश्न 3.
नागार्जुन कौन थे?
उत्तर:
नागार्जुन कुषाण शासक कनिष्क के काल के प्रसिद्ध वैज्ञानिक व दार्शनिक थे जिन्होंने शून्यवाद, सापेक्षवाद व माध्यमिक सूत्र की प्रतिपादन किया।

प्रश्न 4.
सिकन्दर कहाँ का शासक था? उसने भारत की ओर कब प्रस्थान किया?
उत्तर:
सिकन्दर मकदूनिया का शासक था उसने ईरान के शासक को अराबेला के युद्ध में परास्त कर 327 ई. पू. में भारत की तरफ प्रस्थान किया।

प्रश्न 5.
राजा पुरु का राज्य कहाँ स्थित था?
उत्तर:
राजा पुरु का राज्य झेलम और चिनाब नदियों के मध्य स्थित था।

प्रश्न 6.
सिकन्दर राजा पोरस के किस गुण से प्रसन्न हुआ?
उत्तर:
सिकन्दर राजा पोरस की निर्भीकता से प्रसन्न हुआ।

प्रश्न 7.
सिकन्दर भारत से वापस कब लौटा?
उत्तर:
सिकन्दर 325 ई. पू. में भारत से वापस लौट गया।

प्रश्न 8.
सिकन्दर की मृत्यु कहाँ, कब व किस कारण से हुई?
उत्तर:
सिकन्दर की मृत्यु ईरान में 323 ई. पू. में तीव्र ज्वर के कारण हुई।

प्रश्न 9.
शकों की दो शाखाएँ कौन – सी थीं?
उत्तर:
शकों की दो शाखाएँ – पार्थियन व बैक्ट्रियन थीं।

प्रश्न 10.
भारत में बैक्ट्रियन राज्य का आरम्भ कब से माना जाता है?
उत्तर:
306 ई. पू. में सेल्यूकस के उत्तराधिकारी एण्ट्रयोकस तृतीय ने भारत की ओर एक सैन्य अभियान किया तथा काबुल घाटी पार करके यहाँ के उपजाऊ क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। तभी से भारत में बैक्ट्रियन राज्य का आरम्भ माना जाता है।

प्रश्न 11.
यूनानी राजाओं में सबसे महान शासक का नाम बताइए।
उत्तर:
मेनाण्डर।

प्रश्न 12.
मेनाण्डर के सम्बन्ध में किस ग्रन्थ से महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है?
उत्तर:
मेनाण्डर के सम्बन्ध में जानकारी प्रदान करने वाला महत्वपूर्ण ग्रन्थ पालि भाषा में रचित मिलिन्दपन्ह है।

प्रश्न 13.
मेनाण्डर किस धर्म का अनुयायी था?
उत्तर:
मेनाण्डर बौद्ध धर्म का अनुयायी था।

प्रश्न 14.
यूनानी सभ्यता का प्रभाव भारतीय संस्कृति के किन क्षेत्रों पर विशेष रूप से पड़ा?
उत्तर:
यूनानी सभ्यता का प्रभाव भारत की मुद्रा, कला, मूर्तिकला, व्यापार तथा वाणिज्य के क्षेत्र पर विशेष रूप से पड़ा।

प्रश्न 15.
सांस्कृतिक सम्बन्धों के सन्दर्भ में भारतीय यूनानी शासकों की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है?
उत्तर:
भारतीय यूनानी शासकों ने उत्तर – पश्चिम भारत को हेलेनिस्टिक कला से परिचित कराया जिसने बाद में गंधार कला शैली का रूप लिया। इसलिये इनकी भूमिका सांस्कृतिक सम्बन्धों के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जाती है।

प्रश्न 16.
गान्धार कला शैली किन शैलियों का मिश्रण है?
उत्तर:
गान्धार कला शैली भारतीय एवं यूनानी शैलियों का मिश्रण है।

प्रश्न 17.
भारतीय यूनानी तकनीक कारीगरी का सबसे अच्छा उदाहरण क्या है?
उत्तर:
भारतीय यूनानी तकनीक कारीगरी का सबसे अच्छा उदाहरण चाँदी के सिक्कों को ढालने की कला है।

प्रश्न 18.
शक कहाँ के निवासी थे?
उत्तर:
शक मध्य एशिया के निवासी थे।

प्रश्न 19.
विक्रमादित्य की उपाधि किस शासक ने धारण की?
उत्तर:
प्रतिष्ठा, पराक्रम के महान प्रतीक के रूप में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।

प्रश्न 20.
नहपान किस विदेशी जाति से सम्बन्धित था?
उत्तर:
नहपान शक जाति से सम्बन्धित था।

प्रश्न 21.
शक शासकों में सर्वाधिक प्रतापी शासक कौन था?
उत्तर:
शक शासकों में सर्वाधिक प्रतापी शासक रुद्रदमन प्रथम था।

प्रश्न 22.
राजा विक्रमादित्य द्वारा विक्रम संवत किस वर्ष से आरम्भ हुआ?
उत्तर:
राजा विक्रमादित्य द्वारा विक्रम संवत 57 ई. पूर्व में आरम्भ हुआ।

प्रश्न 23.
सुदर्शन झील के जीर्णोद्धार का कार्य किसके द्वारा सम्पन्न कराया गया?
उत्तर:
सुदर्शन झील के जीर्णोद्धार का कार्य सौराष्ट्र प्रान्त के गवर्नर सु-विशाल द्वारा सम्पन्न कराया गया।

प्रश्न 24.
रुद्रदमन प्रथम का जूनागढ़ अभिलेख किस वर्ष लिखा गया?
उत्तर:
रुद्रदमन प्रथम का जूनागढ़ अभिलेख 150 ई. में लिखा गया था।

प्रश्न 25.
रुद्रदमन के साम्राज्य में कौन – कौन से प्रदेश सम्मिलित थे?
उत्तर:
रुद्रदमन के साम्राज्य में सिन्धु – सौवीर (मुल्तान सिन्धु नदी के मुहाने तक का प्रदेश), मालवा, गुजरात, काठियावाड़, उत्तरी कोंकण, पश्चिमी राजस्थान और सिंध के प्रदेश सम्मिलित थे।

प्रश्न 26.
सुदर्शन झील का निर्माण किसने करवाया?
उत्तर:
मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के गवर्नर पुष्यमित्र ने गिरनार के समीप सुदर्शन झील का निर्माण करवाया था।

प्रश्न 27.
रुद्रदमन प्रथम ने कौन – सी उपाधि धारण की?
उत्तर:
रुद्रदमन प्रथम ने महाक्षत्रप की उपाधि धारण की।

प्रश्न 28.
रुद्रदमन की शासन व्यवस्था एवं कर प्रणाली किस पर आधारित थी?
उत्तर:
रुद्रदमन की शासन व्यवस्था एवं कर प्रणाली धर्म पर आधारित थी।

प्रश्न 29.
कुषाण चीन की किस जाति से सम्बन्धित थे?
उत्तर:
कुषाण चीन की यू-ची जाति से सम्बन्धित थे।

प्रश्न 30.
यू-ची जाति को उनकी मातृभूमि से कब और किसने खदेड़ा?
उत्तर:
यू-ची जाति को उनकी मातृभूमि से लगभग 165 ई. पू. में हूणों ने खदेड़ा।

प्रश्न 31.
यू-ची जाति की पाँच शाखाओं में सर्वाधिक शक्तिशाली शाखा कौन – सी थी?
उत्तर:
यू-ची जाति की पाँच शाखाओं में सर्वाधिक शक्तिशाली कुषाण शाखा थी।

प्रश्न 32.
महाराज की उपाधि धारण करने वाले कुषाण वंश के शासक का नाम बताइए।
उत्तर:
विम कडफिस।

प्रश्न 33.
कनिष्क का राज्याभिषेक कब हुआ?
उत्तर:
कनिष्क का राज्याभिषेक 78 ई. में हुआ।

प्रश्न 34.
कनिष्क का साम्राज्य विस्तार कहाँ से कहाँ तक था?
उत्तर:
कनिष्क को साम्राज्य पश्चिम में आक्सस नदी से पूर्व में गंगा नदी तक मध्य एशिया में खुरासन से लेकर उत्तर प्रदेश में वाराणसी तक फैला था।

प्रश्न 35.
कनिष्क ने अपनी राजधानी कहाँ स्थापित की?
उत्तर:
कनिष्क ने अपनी राजधानी पुरुषपुर या वर्तमान पेशावर में स्थापित की।

प्रश्न 36.
कनिष्क ने कश्मीर में किस नगर की स्थापना की?
उत्तर:
कनिष्क ने कश्मीर में कनिष्कपुर नगर की स्थापना की।

प्रश्न 37.
किस शक शासक को कनिष्क ने परास्त किया था?
उत्तर:
शक शासक क्षेत्रप चष्टन को कनिष्क ने परास्त किया था।

प्रश्न 38.
कनिष्क ने मध्य एशिया के किन क्षेत्रों पर अधिकार किया?
उत्तर:
कनिष्क ने मध्य एशिया के चीनी तुर्किस्तान के काशगर, योरकन्द एवं खोतान पर अधिकार किया।

प्रश्न 39.
कनिष्क ने किस बौद्ध संगीति का आयोजन किया?
उत्तर:
कनिष्क ने चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन किया।

प्रश्न 40.
चतुर्थ बौद्ध संगीति का अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का नाम बताइए।
उत्तर:
चतुर्थ बौद्ध संगीति का अध्यक्ष वसुमित्र व उपाध्यक्ष अश्वघोष था।

प्रश्न 41.
बौद्ध धर्म किन दो शाखाओं में विभक्त हुआ?
उत्तर:
बौद्ध धर्म हीनयान व महायान दो शाखाओं में विभक्त हुआ।

प्रश्न 42.
कनिष्क ने बौद्ध धर्म की किस शाखा को राजधर्म के रूप में मान्यता दी?
उत्तर:
कनिष्क ने बौद्ध धर्म की महायान शाखा को राजधर्म के रूप में मान्यता दी।

प्रश्न 43.
कनिष्क के शासनकाल में मूर्ति निर्माण और स्थापत्य की दृष्टि से कितनी शैलियों का विकास हुआ?
उत्तर:
कनिष्क के शासन काल में मूर्ति निर्माण और स्थापत्य की दृष्टि से तीन प्रमुख शैलियों का विकास हुआ- मथुरा, अमरावती और गान्धार।

प्रश्न 44.
कनिष्क के दरबार के दो राजवैद्यों के नाम बताइए।
उत्तर:
कनिष्क के दरबार के दो प्रसिद्ध राजवैद्य महर्षि चरक और सुश्रुत थे।

प्रश्न 45.
‘बुद्धचरित’ नामक महाकाव्य के रचयिता कौन थे?
उत्तर:
बुद्धचरित नामक महाकाव्य के रचयिता अश्वघोष थे।

प्रश्न 46.
शक संवत् की शुरूआत कब और किसने की?
उत्तर:
शक संवत् की शुरूआत कनिष्क ने 78 ई. में की।

प्रश्न 47.
हूण कौन थे?
उत्तर:
हूण भारत पर आक्रमण करने वाले मध्य एशिया की एक खानाबदोश व बर्बर जाति के लोग थे।

प्रश्न 48.
भारत में हूणों का काल बताइए।
उत्तर:
भारत में हूणों का काल लगभग 450 ई. माना जाता है।

प्रश्न 49.
हुणों का सबसे प्रतापी शासक कौन था?
उत्तर:
हूणों का सबसे प्रतापी शासक राजा तोरमाण था।

प्रश्न 50.
हूणों का सामना किन भारतीय शासकों को करना पड़ा?
उत्तर:
हूणों का सामना गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त, यशोवर्मन और बालदित्य आदि को करना पड़ा।

RBSE Class 12 History Chapter 3 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मौर्योत्तर काल में किन राजवंशों का भारत पर प्रभुत्व रहा?
उत्तर:
मौर्योत्तर काल में सम्पूर्ण भारत पर किसी एक राजवंश का नियंत्रण नहीं था वरन् अलग-अलग क्षेत्रों में अनेक स्थानीय एवं क्षेत्रीय राजवंशों का शासन रहा। इन शासक वर्गों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

  1. विदेशी शासक – इनमें यूनानी जिन्हें इण्डो-ग्रीक भी कहा जाता है, शक, कुषाण व हूण प्रमुख थे।
  2. भारतीय शासक – इन शासकों में शुंगवंश, कण्ववंश, चेदिवंश, और सातवाहन वंश के शासक थे।

प्रश्न 2.
मौर्योत्तर काल से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
मौर्योत्तर काल वह काल है जो मौर्य साम्राज्य के पतन से लेकर गुप्त साम्राज्य के उद्भव तक के इतिहास को बताता है। यह वह काल था जब मौर्यों की केन्द्रीयकृत शासन व्यवस्था बिखर रही थी और विदेशी राजवंश भारत पर निरन्तर आक्रमण कर रहे थे तथा कई भारतीय राजवंश भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत थे।

प्रश्न 3.
मौर्योत्तर काल तथा विदेशी आक्रमणकारियों की जानकारी के प्रमुख स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मौर्योत्तर काल के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के प्रमुख स्रोत-गार्गी संहिता, पतंजलि को महाभाष्य, कालिदास का मालविकाग्निमित्रम्, बाणभट्ट का हर्षचरित तथा कल्हण की प्रसिद्ध पुस्तक राजतरंगिणी हैं। कनिष्क के दरबारी कवि अश्वघोष द्वारा रचित बुद्धचरित, सौंदरानन्द महाकाव्य, सूर्यालंकार, सारीपुत्र प्रकरण, शून्यवाद व सापेक्षकद के प्रवर्तक नागर्जुन, चरक संहिता, ह्वेनसांग को यात्रा विवरण, तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के वृत्तान्त, मिलिन्दपन्ह आदि रचनाएँ हमें विदेशी आक्रमणकारियों के सम्बन्ध में जानकारी उपलब्ध कराती है। इनके अतिरिक्त विभिन्न शासकों द्वारा चलाये गये सिक्के भी इनके सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सूचना प्रदान करते हैं।

प्रश्न 4.
सिकन्दर ने भारत में कब और किस प्रकार प्रवेश किया?
उत्तर:
सिकन्दर ने 327 ई. पू. में भारत की ओर प्रस्थान किया। वह सीस्तान और अफगानिस्तान को जीतता हुआ, काबुल घाटी से होकर भारत पर चढ़ आया, उसने हवाली को और पाश को जीता तथा हिन्दुकुश पर्वत को पार किया। यहीं से उसने अपनी सेना के दो भाग किए। सेना के एक हिस्से को अपने सेनापतियों के नेतृत्व में सिन्धु नदी पर पुल बनाने के लिए भेजा और दूसरे भाग का नेतृत्व खुद सम्भाल कर भारत की तरफ बढ़ा। सिकन्दर को तक्षशिला के राजा आंभी का सहयोग मिला जिससे उत्साहित होकर सिकन्दर ने भारत में प्रवेश किया।

प्रश्न 5.
अश्वकायनों पर सिकन्दर ने किस प्रकार विजय प्राप्त की?
उत्तर:
भारत की उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर अश्मकों तथा तत्पश्चात् नीसा वाले गौरियों को विजित करने के बाद सिकन्दर का सामना अश्वकायनों से हुआ। इस समय अश्वकायनों का राजा हस्ति या अष्टक था। अष्टक ने अपने प्राकृतिक रूप से सुरक्षित मस्सग दुर्ग से सिकन्दर का प्रतिरोध किया। प्रारम्भ में सिकन्दर को सफलता नहीं मिली परन्तु एक आक्रमण में तीर लगने के कारण राजा अष्टक की मृत्यु के पश्चात् उसकी रानी क्लियोफिस ने आत्मसमर्पण कर दिया और अश्वकायनों के राज्य पर सिकन्दर का अधिकार हो गया।

प्रश्न 6.
मिलिन्दपन्ह में मेनाण्डर की राजधानी शाकल की किन विशेषताओं का वर्णन किया गया है?
उत्तर:
इण्डो – ग्रीक शासक मेनाण्डर के सम्बन्ध में जानकारी का प्रमुख स्रोत पाली भाषा की पुस्तक मिलिन्दपन्ह है। इस पुस्तक में मेनाण्डर की राजधानी शाकल की निम्नलिखित विशेषताओं का वर्णन किया गया है-

  1. शाकल योणकों के देश में व्यापार का एक बहुत बड़ा केन्द्र था।
  2. यहाँ पहाड़ियाँ, उपवन, बाग, कुंज, झीलें और कुण्ड, नदियाँ तथा जंगल थे जो शाकल की प्राकृतिक सुन्दरता को बढ़ाते थे।
  3. यहाँ जल उपलब्धता की अच्छी सुविधा थी।
  4. इस शहर की सुरक्षा सुदृढ़ थी, कई बड़े-बड़े बुर्ज और दीवारें, अनुपम दरवाजे और प्रवेशद्वार थे और इसके मध्य में सफेद दीवार का राजदुर्ग या जिसके चारों ओर गहरी खाई थी।
  5. इसकी गलियाँ वर्गाकार क्षेत्र, चौराहे तथा मण्डियाँ नियमित ढंग से बनी थीं।
  6. यहाँ कई तरह के शानदार भवन हैं जो हिमालय की चोटियों की तरह ऊँचे थे।
  7. यहाँ की सड़कें हाथियों, घोड़ों, गाड़ियों और पैदल यात्रियों से भरी हैं और हर प्रकार के व्यक्तियों, ब्राह्मणों, सामन्त, शिल्पी, सेवक आदि की वहाँ भीड़ लगी रहती थी।
  8. यहाँ बनारसी मलमल, कोटुम्बर पदार्थों व अन्य कई प्रकार के कपड़ों की बिक्री के लिए दुकानें थीं।

प्रश्न 7.
यूनानी आक्रमण का भारत की कला तथा मूर्तिकला पर प्रभाव की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
यूनानियों का भारत की मूर्तिकला व कला पर प्रभाव विशेष रूप से दृष्टिगोचर होता है। यूनानियों ने भारत को हेलेनिस्टिक कला से परिचित कराया जिसने बाद में गान्धार कला शैली को रूप लिया। भारतीय तथा यूनानी मिश्रण से उत्तर-पश्चिम में कला की प्रसिद्ध गान्धार शैली का विकास हुआ। इस कला में बुद्ध की मूर्तियाँ यूनानी ढंग से बनने लगीं। इसमें यूनानी शृंगार तथा अलंकार की प्रधानता थी। ये मूर्तियाँ भूरे या स्लेटी रंग के पत्थरों से बनती थीं बाद में चूने प्लास्टर का प्रयोग होने लगा। इस कला में बनायी गई बुद्ध की आकृतियों को यथार्थता के निकट लाने का प्रयास किया गया।

प्रश्न 8.
शकों की कितनी शाखाएँ थीं और उन्होंने कहाँ अपना राज्य स्थापित किया?
उत्तर:
इतिहासकारों के अनुसार शक भारत में मध्य एशिया से आने वाली दूसरी विदेशी जाति थी। शकों की पाँच विभिन्न शाखाओं ने भारत में अपना राज्य स्थापित किया। शकों की एक शाखा अफगानिस्तान में थी जिसकी राजधानी कपिशा थी। दूसरी शाखा पंजाब में बसी जिसकी राजधानी तक्षशिला थी। तीसरी शाखा मथुरा में स्थापित हुई जिसने वहाँ दो शताब्दियों तक शासन किया। चौथी शाखा ने पश्चिमी भारत में अपना राज्य स्थापित किया जिसकी राजधानी उज्जैन थी। शकों की पाँचव शाखा ने ऊपरी दक्कन में अपना राज्य स्थापित किया था जिसकी राजधानी नासिक थी। इन पाँच शाखाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण नासिक व उज्जैन शाखा थी।

प्रश्न 9.
सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार किसने और क्यों कराया?
उत्तर:
रुद्रदमन के जूनागढ़ अभिलेख से इस बात की पुष्टि होती है कि मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के गवर्नर पुष्यमित्र ने गिरनार के समीप जनकल्याण हेतु सुदर्शन झील का निर्माण कराया। अनेक शताब्दियों तक यह झील सौराष्ट्र के किसानों के लिए सिंचाई का महत्वपूर्ण स्रोतं थी। रुद्रदमन के शासनकाल में अतिवृष्टि के कारण सुदर्शन झील का बाँध टूट गया तथा दरार आ गई। रुद्रदमन ने प्रजा की भलाई के लिए सचिवों के विरोध के बावजूद अपने निजी कोष से विशाल धनराशि व्यय करके बाँध का पुनर्निर्माण कराया तथा प्रजा पर कोई अतिरिक्त कर नहीं लगाया। इस झील के जीर्णोद्धार का यह कार्य उस समय के सौराष्ट्र प्रान्त के गवर्नर सु-विशाख द्वारा सम्पन्न कराया गया था।

प्रश्न 10.
रुद्रदमन प्रथम के साम्राज्य विस्तार के विषय में समझाइये।
उत्तर:
रुद्रदमन प्रथम शक शासकों में सर्वाधिक ख्याति प्राप्त शासक था। उसके द्वारा जारी किये जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि उसने अकर (पूर्वी मालवा), अवन्ति (पश्चिम मालवा), अनूप (नर्मदा तट प्रदेश), त्रिवृत्त (उत्तरी काठियावाड़ व उसकी राजधानी आनन्दपुर), सुराष्ट्र (दक्षिणी काठियावाड़), मरु (मारवाड़), कच्छ सिन्धु, पूर्वी तट का प्रदेश, कुकुर (पश्चिमी मध्य भारत का प्रदेश), निषाढ (विन्ध्याचल), उत्तरी कोंकण और अरावली पर्वत माला के प्रदेश को जीता था। रुद्रदमन के साम्राज्य में सिन्धु सौवीर (मुल्तान, सिन्धु नदी के मुहाने तक का प्रदेश), मालवा, गुजरात, काठियावाड़, उत्तरी कोंकण, पश्चिमी राजस्थान और सिन्ध के प्रदेश सम्मिलित थे।

प्रश्न 11.
जूनागढ़ अभिलेख के आधार पर रुद्रदमन प्रथम के व्यक्तित्व का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
रुद्रदमन प्रथम के विषय में सर्वाधिक महत्वपूर्ण जानकारी का प्रमुख स्रोत 150 ई. में उसके द्वारा जारी किया गया जूनागढ़ अभिलेख है। यह अभिलेख उसके व्यक्तित्व के अनेक पक्षों को स्पष्ट करता है। इस लेख में उसे जन कल्याणकारी शासक के रूप में दर्शाया गया है। उसने प्रजा के लिए अपने मंत्रियों के विरोध के बावजूद अपने निजी कोष से भारी धन व्यय करके सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण करवाया था। उसने बाँध के लिए प्रजा से कोई अतिरिक्त या अनुचित कर नहीं लिया। वह उच्च आदर्शों का पालन करने वाला प्रजावत्सल राजा था।

वह सदैव शरणागत की रक्षा करने वाला और युद्ध के अतिरिक्त किसी का भी वध न करने की प्रतिज्ञा लेने वाला दयालु व्यक्ति था। उसने अपने प्रजाजनों को डाकुओं, जंगली पशुओं व रोगों से भयमुक्त किया। वह एक कुशल सेनानायक और योद्धा था। वह शस्त्र व शास्त्र दोनों विधाओं से पारंगत था। वह संगीत व शास्त्रों का ज्ञाता, संस्कृत व संस्कृति का संरक्षक, काव्यशास्त्र का मर्मज्ञ, शब्दार्थ (व्याकरण), न्याय (तर्कशास्त्र) का ज्ञाता तथा हाथी, घोड़े, रथादि के संचालन एवं तलवार, ढाल आदि के युद्ध में प्रवीण था। इन गुणों के साथ-साथ वह अद्भुत शारीरिक सौन्दर्य का स्वामी भी था।

प्रश्न 12.
कुषाणों ने अपनी सत्ता किस प्रकार स्थापित की?
उत्तर:
कुषाण पश्चिमी चीन के कान-सू प्रान्त के रहने वाली यू-ची जाति से सम्बन्धित वंश था। लगभग 165 ई. पू. में हूणों द्वारा इस जनजाति को इनकी मातृभूमि से खदेड़ दिए जाने पर यू-ची नये स्थान की खोज में आक्सस नदी घाटी के ताहिया (बैक्ट्रिया) प्रदेश में पहुँचे जहाँ शकों का शासन था। यू-ची जाति ने शकों को परास्त कर बैक्ट्रिया पर अधिकार कर लिया। यहीं पर रहते हुए यू-ची पाँच शाखाओं में विभक्त हो गयी। इन शाखाओं में कुषाण शाखा सर्वाधिक शक्तिशाली थी अतः उसने शेष चारों शाखाओं पर विजय प्राप्त करके उनके राज्यों को भी अपने साम्राज्य में मिला लिया। इसी कारण यू-ची के स्थान पर कु ण शब्द का प्रयोग होने लगा। कुषाण वंश का संस्थापक कजुलकेडफिसिज था जिसका राज्य बैक्ट्रिया वे गान्धार प्रदेश में था।

प्रश्न 13.
पार्थिया के शासक द्वारा कुषाण साम्राज्य पर आक्रमण करने के क्या कारण थे? इसका क्या परिणाम हुआ?
उत्तर:
पार्थिया के शासक द्वारा कुषाण साम्राज्य पर आक्रमण करने के दो कारण थे। प्रथम तो यह कि व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रदेश बैक्ट्रिया पर वह अधिकार करना चाहता था दूसरा कारण यह था कि एरियाना प्रदेश पर पहले पार्थिया का अधिकार था किन्तु बाद में कुषाणों ने इस पर अधिकार कर लिया था अतः पार्थिया का शासक एरियाना प्रदेश पर पुनः अधिकार करना चाहता था। इस युद्ध के फलस्वरूप सम्पूर्ण पार्थिया प्रदेश कुषाण राज्य का अंग बन गया।

प्रश्न 14.
कुषाणों के साम्राज्य विस्तार की पुष्टि किन प्रमाणों के आधार पर की जा सकती है?
उत्तर:
कुषाण वंश कनिष्क के काल में अपने चरमोत्कर्ष पर रहा। कनिष्क ने पार्थियो, पाटलिपुत्र, कश्मीर, उज्जैन, मध्य एशिया व चीन पर अधिकार कर इन्हें कुषाण साम्राज्य का अंग बनाया। उसके साम्राज्य विस्तार की सीमाएँ मुद्रा अभिलेख और साहित्यिक स्रोतों के आधार पर निर्धारित की जा सकती हैं। कौशाम्बी, सारनाथ एवं मथुरा से प्राप्त उसके।

अभिलेख यह संकेत देते हैं कि शासक के रूप में वह मूलतः पूर्वी प्रदेश से सम्बन्धित था तथा सम्पूर्ण उत्तर भारत पर उसका अधिकार था। सिन्ध व पंजाब से प्राप्त उसके लेख वहाँ पर उसके अधिकार की पुष्टि करते हैं। चीनी स्रोत गान्धार प्रदेश पर उसके अधिकार को प्रमाणित करते हैं। मध्य प्रदेश के कुछ स्थानों से भी कनिष्क की मुद्राएँ और मथुरा शैली की मूर्तियाँ मिली हैं। कनिष्क का साम्राज्य पूर्व में बिहार से लेकर पश्चिम में खुरासान तथा उत्तर में पामीर से लेकर दक्षिण में कोंकण प्रदेश तक विस्तृत था।

प्रश्न 15.
कनिष्क की शासन व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कनिष्क का शासन क्षत्रप प्रणाली पर आधारित था। उसका शासन प्रान्तीय क्षत्रपों के द्वारा शासित होता था। एक की राजधानी मथुरा व दूसरे की संभवतः काशी थी। मथुरा में महाक्षत्रप खरपलन और काशी में वनस्पर प्रांतीय शासक थे। इस शासन का स्वरूप बहुत कुछ सैनिक था और इसका संगठन बहुत मजबूत नहीं था। दण्डनायक और महादण्डनायक पद कुषाण शासन में महत्वपूर्ण थे।

प्रश्न 16.
बौद्ध धर्म की हीनयान तथा महायान शाखा में क्या विभिन्नताएँ थीं?
उत्तर:
चतुर्थ बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म हीनयान तथा महायान दो शाखाओं में विभाजित हो गया। इन दोनों शाखाओं में प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं-
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प्रश्न 17.
कुषाणों के काल में बौद्ध धर्म की महायान शाखा का प्रसार तेजी से क्यों हुआ?
उत्तर:
महायान बौद्ध धर्म की नवीन शाखा थी। इसके उदय के कारण बौद्ध धर्म का विकास तेजी से हुआ क्योंकि इसके सिद्धान्त सरल थे जिनका पालन जनसाधारण में एक गृहस्थ व्यक्ति भी सरलतापूर्वक कर सकता था। मूर्ति पूजा का प्रचलन होने से महायान धर्म की लोकप्रियता बढ़ गई। कनिष्क ने महायान को राजधर्म घोषित किया। इससे मध्य एशिया में उसके विशाल साम्राज्य में महायान धर्म के विकास में पर्याप्त सुविधा हुई जिससे महायान शाखा का प्रसार तेजी से हुआ।

प्रश्न 18.
कनिष्क के काल में साहित्य के क्षेत्र में हुई प्रगति का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कनिष्क के दरबार में उच्चकोटि के दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं साहित्यकार थे। उसके काल में साहित्य की विविध विधाओं का सर्वांगीण विकास हुआ। इस काल में पहली बार संस्कृत लेख लिखे गये। अश्वघोष, भास और शूद्रक इस विधा के महान साहित्यकार थे। कनिष्क के दरबार का सबसे महान व्यक्ति प्रसिद्ध कवि अश्वघोष था जिसने संस्कृत में बुद्धचरित नामक महाकाव्य की रचना कर उसे अमर कृति बना दिया। सौदरानन्द महाकाव्य, सूत्रालंकार और सारीपुत्र प्रकरण उसकी अन्य रचनाएँ थीं।

संस्कृत भाषा और उसकी उन्नति के साथ ह्म पालि व प्राकृत भाषा में भी इस युग में उत्कृष्ट रचनाएँ लिखी गईं। बौद्ध सम्प्रदाय की प्रगति के फलस्वरूप अनगिनत अवदानों की रचनाएँ भी हुईं जैसे दिव्यावदान आदि। शून्यवाद एवं सापेक्षवाद का प्रवर्तक नागार्जुन कनिष्क के दरबार की एक अन्य महान विभूति था। वह केवल दार्शनिक ही नहीं वैज्ञानिक भी था। इस प्रकार साहित्य के क्षेत्र में कुषाणों के काल में अभूतपूर्व प्रगति हुई।

प्रश्न 19.
कनिष्क के काल में विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कनिष्क उच्चकोटि का विद्वान एवं कला प्रेमी सम्राट था। कनिष्क का दरबार विद्वानों, दार्शनिकों एवं वैज्ञानिकों का पोषक था। चरक और सुश्रुत महान चिकित्सक एवं आयुर्वेदाचार्य थे। नागार्जुन इस युग के महान वैज्ञानिक थे। जिन्होंने सापेक्षवाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। इस युग में भारतीय ज्योतिष में नवीन सिद्धान्तों की स्थापना हुई और खगोल विद्या की वैज्ञानिक प्रामाणिकता बढ़ी। मध्य एशिया एवं रोमन साम्राज्य के सम्पर्कों के परिणामस्वरूप प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नई तकनीक विकसित हुई जैसे ताँबे के कुषाणकालीन सिक्कों को निर्माण।

प्रश्न 20.
देवत्व का सिद्धान्त क्या है?
उत्तर:
मौर्योत्तर काल में कुषाण राजाओं ने अपनी तुलना देवताओं से की। उन्होंने देवपुत्र की उपाधि धारण की। वे स्वयं को देवताओं का अंश मानते थे। ऐसी पद्धति समकालीन रोमन, यूनानी और ईरानी पद्धति में विद्यमान थी जिसे देवत्व का सिद्धान्त कहा गया। विदेशी शासकों ने सामाजिक स्वीकृति हेतु इस धार्मिक वैधता को आवश्यक माना तथा अपने राज्य में इसका पालन किया।

प्रश्न 21.
कुषाण साम्राज्य का पतन किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
कुषाण साम्राज्य कनिष्क प्रथम के समय में अपने गौरव के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच गया। इस समय में कुषाण साम्राज्य से केवल भारत के ही नहीं बल्कि मध्य एशिया के शासक भी, भय खाते थे किन्तु इतने विशाल साम्राज्य को कनिष्क प्रथम के उत्तराधिकारी अक्षुण्य न रख सके और उनके अधिकांश राज्य भारतीय शासकों के हाथों में आ गए। उनमें मुख्यतः नाग, मालव और कुणिन्द वंश थे। कुषाणों के पतन के अन्य प्रमुख कारण ईरान में सस्सैनियम साम्राज्य का उदय तथा कुषाणों का भारतीय जातियों में घुल-मिले जाना भी माना जाता है जिसके कारण कुषाण साम्राज्य समाप्त हो गया।

प्रश्न 22.
यशोवर्मन ने हूणों का दमन किस प्रकार किया?
उत्तर:
528 ई. में यशोवर्मन ने हूणों का मुकाबला स्थानीय शासक बालदित्य के साथ मिलकर किया। यशोवर्मन के साथ हुए युद्ध में हूण परास्त हो गए परन्तु वे अपने मूल स्थान मध्य एशिया न जाकर हिन्दू धर्म व संस्कृति को आत्मसात करके इसके अभिन्न अंग बन गए और इसी में विलीन हो गए।

प्रश्न 23.
हूणों में प्रतापी शासक कौन था? उसके बारे में लिखिए।
उत्तर:
राजा तोरमाण हूणों में सबसे प्रतापी राजा था। गुप्तकाल की शक्ति क्षीण होने के संधिकाल में राजा तोरमाण ने आर्यावर्त अर्थात् मालवा (मध्य प्रदेश) को विजित करने के बाद भारत में स्थायी निवास बना लिया। उसके पुत्र मिहिरकुल व तोरमाण ने मथुरा व तक्षशिला में संयुक्त रूप से आक्रमण किया और वहाँ बहुत रक्तपात किया तथा पंजाब पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया।

RBSE Class 12 History Chapter 3 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में प्रवेश करने के लिए सिकन्दर के द्वारा किये गये सैनिक अभियानों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सिकन्दर ने 327 ई. पू. में भारत की ओर प्रस्थान किया। वह सम्पूर्ण एशिया पर विजय प्राप्त करना चाहता था। उस समय भारत का उत्तर-पश्चिमी भाग 25 राज्यों में बँटा था। इनमें से कुछ गणतंत्र थे तथा कुछ राज्यों में राजतंत्रात्मक व्यवस्था थी। राजतंत्र के शासक गणतंत्रों से विरोध रखते थे। इस राजनैतिक अस्थिरता के वातावरण में सिकन्दर ने अपने स्वप्न को साकार करने हेतु भारत में प्रवेश करने की योजना बनाई जिसमें उसने निम्नलिखित सैनिक अभियान किये-

1. अश्मकों से मुठभेड़:
भारत की उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर सबसे पहले उसका सामना अश्मकों से हुआ। अश्मकों ने जबरदस्त प्रतिरोध किया। उन्होंने सिकन्दर की सेना के दाँत खट्टे कर दिए लेकिन अन्त में सिकन्दर विजयी रहा। सिकन्दर ने चालीस हजार अश्मकों को बन्दी बनाया।

2. नीसा वाले गौरियों पर आक्रमण:
अश्मकों पर विजय पाने के पश्चात् सिकन्दर ने नीसा वाले गौरियों पर आक्रमण किया। उन्होंने प्रतिरोध किये बिना आत्मसमर्पण कर दिया।

3. अश्वकायनों पर विजय:
अश्वकायनों पर सिकन्दर द्वारा आक्रमण करने पर वहाँ के शासक अष्टक ने अपने अजेय दुर्ग मस्सग से प्रतिरोध करने का निश्चय किया। प्रारम्भ में सिकन्दर को सफलता नहीं मिली परन्तु प्रतिरोध के दौरान राजा की मृत्यु हो जाने पर अश्वकायनों का राज्य सिकन्दर के अधिकार में आ गया।

4. पौरव राज्य पर आक्रमण:
तक्षशिला के राजा आंभी ने सिकन्दर से मित्रता कर उसे पौरव राज्य पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया। सिकन्दर ने पौरव राज्य पर आक्रमण किया। वहाँ के शासक पोरस ने वीरता से सिकन्दर की सेना का मुकाबला किया। प्रारम्भ में सिकन्दर की सेना को विजय नहीं मिली परन्तु अन्त में राजा पोरस को सिकन्दर के सैनिकों ने बन्दी बना लिया। सिकन्दर द्वारा पोरस से यह पूछने पर कि उसके (राजा पोरस के) साथ कैसा व्यवहार किया जाए तो उत्तर में पोरस ने कहा जैसा एक राजा को दूसरे राजा के साथ करना चाहिए। सिकन्दर पोरस की निर्भीकता से प्रसन्न हुआ तथा उसने पोरस से मित्रता कर उसका राज्य वापस लौटा दिया।

5. उत्तरी-पूर्वी पंजाब पर विजय तथा भारत में प्रवेश:
सिकन्दर ने उत्तरी – पूर्वी पंजाब के छोटे – छोटे राज्यों पर अधिकार किया तथा भारत के भीतरी भागों की ओर बढ़ने लगा लेकिन व्यास नदी तक पहुँचकर सिकन्दर की सेना ने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया। उत्साहहीन सैनिकों की मनोदशा के चलते सिकन्दर को मजबूर होकर वापस लौटना पड़ा।

प्रश्न 2.
चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन कहाँ व किसने किया? इसके क्या परिणाम हुए?
उत्तर:
कुषाणों के प्रतापी शासक कनिष्क ने बौद्ध धर्म में विद्यमान विवादास्पद सिद्धान्तों का निर्णय करने के उद्देश्य से चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन कश्मीर के कुण्डलवन नामक विहार में किया। लगभग 500 बौद्ध विद्वानों ने इसमें भाग लिया था। प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान वसुमित्र इसके अध्यक्ष और अश्वघोष उपाध्यक्ष थे।

छ: माह तक चले इस सम्मेलन में सम्पूर्ण बौद्ध साहित्य की सूक्ष्मता से जाँच की गई तथा त्रिपिटकों पर टीका लिखकर उसे सम्पूर्ण रूप से एक ग्रन्थ में संकलित कर लिया गया जिसका नाम महाविभाष रखा गया। महाविभाष को बौद्ध धर्म का विश्व कोष कहा जाता है। इस बौद्ध सभा में बौद्ध धर्म के तत्कालीन 18 स्कूलों के मतभेदों का निवारण किया गया तथा इन्हें धर्म परायण स्वीकार कर लिया गया। इस बौद्ध सभा के निम्नलिखित परिणाम हुए-

  1. इस बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म हीनयान एवं महायान दो शाखाओं में विभक्त हो गया।
  2. जन साधारण में तथा विदेशों में प्रसार के लिए बौद्ध धर्म के नियमों व सिद्धान्तों को व्यावहारिक रूप प्रदान किया। गया।
  3. इस बौद्ध संगीति में मूर्ति पूजा, स्वर्ग, धार्मिक क्रियाओं आदि को स्वीकार कर लिया गया।
  4. बौद्ध धर्म की एक नवीन शाखा का जन्म हुआ जिसे महायान कहा गया।
  5. कनिष्क ने बौद्ध धर्म की महायान शाखा को राजधर्म के रूप में मान्यता दी।
  6. मूर्ति पूजा का प्रचलन होने से महायान धर्म की लोकप्रियता बढ़ गई।
  7. राजधर्म घोषित किये जाने पर मध्य एशिया में महायान के विकास में प्रगति हुई।

प्रश्न 3.
गान्धार कला पर एक निबन्ध लिखिए।
उत्तर:
गान्धार कला का आविर्भाव कुषाणों के शासन काल की एक बड़ी देन थी। इस कला के विकास का समय 50 ई. पू. से 500 ई. तक माना जाता है। मूर्तिकला की गान्धार शैली को ग्रीको रोमन, ग्रीको बुद्धिष्ट, हिन्द यूनानी आदि नामों से भी जाना गया। यद्यपि उस पर यूनानी, रोमन कलाओं का प्रभाव अधिक था किन्तु इसका विकास भारतीयों ने किया था। भारत के गान्धार प्रदेश में विकसित होने के कारण ही इसे गान्धार कला कहा गया।
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गान्धार में भारतीय शिल्पकारों का एशियाई, यूनानी व रोमन शिल्पियों से सम्पर्क हुआ। इससे इस नई शैली का उद्भव हुआ जिसमें बुद्ध की प्रतिमाएँ यूनानी व रोम मिश्रित शैली में बनाई गईं। कनिष्क के काल में महायान धर्म के उदय के कारण एवं विदेशी शासकों द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने से बुद्ध की मूर्तियाँ युनानी ढंग से बनने लगीं जो यूनानियों के पवित्र देवता अपोलो की तरह लगती हैं। गान्धार कला की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार थीं-

  1. गान्धार कला की विषय-वस्तु भारतीय तथा निर्माता यूनानी थे।
  2. इस कला में बनायी गयी मूर्तियों में यूनानी श्रृंगार तथा अलंकार की प्रधानता है।
  3. इस कला में बनी हुई मूर्तियाँ भूरे या सलेटी रंग के पत्थरों से बनती थीं बाद में चूना प्लास्टर का प्रयोग होने लगा।
  4. इस शैली में भारी ओष्ठ, खिंची हुई आँखें, घंघराले बाल, लम्बी पूँछे, बोझिल, हट युक्त वस्त्रों से ढकी मूर्तियों में बुद्ध की आकृति को यथार्थता के निकट लाने का प्रयास किया गया है।
  5. यूनानी प्रभाव के कारण बुद्ध की मूर्तियों में यूनानी देवताओं का प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगा। इस कारण इस कला को इण्डो ग्रीक अथवा ग्रीको बुद्धिष्ट कला भी कहते हैं।

गान्धार कला में बनायी गयी मूर्तियाँ तथा कलाकृतियाँ आज भी संग्रहालयों में सुरक्षित हैं तथा अपनी विशिष्टता का प्रमाण देती हैं।

प्रश्न 4.
कुषाणों के काल में हुई आर्थिक प्रगति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कुषाणों के काल में व्यापार में अभूतपूर्व वृद्धि के कारण भारत आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न राष्ट्र बन गया था और लोगों ने आर्थिक जीवन में समृद्धि के संकेत दिखने लगे। इस काल में स्थल मार्गों एवं नदी मार्गों के विकास ने जहाँ आन्तरिक व्यापार में वृद्धि की वहीं समुद्री मार्गों ने विदेशी व्यापार को सुदृढ़ता प्रदान की। कुषाणों के काल में हुई आर्थिक प्रगति का अध्ययन हम निम्न बिन्दुओं के आधार पर कर सकते हैं-

  1. कुषाणों के काल में मध्य एशिया व पश्चिम एशिया को जाने वाले विभिन्न मार्गों का विकास हुआ जिससे व्यापार करने में सुविधा हुई।
  2. कुषाणों ने रेशम मार्ग पर नियंत्रण कर लिया जो चीन से चलकर मध्य एशिया होते हुए रोमन साम्राज्य तक पहुँचता था। यह रेशम मार्ग कुषाणों का बहुत बड़ा आय का स्रोत था।
  3. रेशम मार्ग पर नियंत्रण हो जाने से भारत के व्यापारी दक्षिणी अरब और लाल सागर क्षेत्रों से जुड़ गए थे जिसके फलस्वरूप भारत की रोमन साम्राज्य के साथ समृद्धि में वृद्धि हुई।
  4. भारतीय व्यापारी चीन से रेशम खरीदकर रोमन साम्राज्य के व्यापारियों तक पहुँचाते थे जिससे उन्हें लाभ होता था।
  5. भारत से हाथी दाँत का सामान, काली मिर्च, लौंग, मसाले, सुगन्धित पदार्थ और औषधियाँ, सूती व रेशमी वस्त्र बड़ी मात्रा में रोम निर्यात किये जाते थे। रोम से प्रति वर्ष लाखों की स्वर्ण मुद्राएँ भारत आने लगीं।
  6. चीन रोम के अतिरिक्त भारत का व्यापार बर्मा, जावा, सुमात्रा, चम्पां आदि दक्षिण-पूर्वी एशिया देशों के साथ भी था।
  7. कुषाण शासकों ने बड़ी संख्या में सोने के सिक्के चलाए। मुद्रा एवं व्यापार के कारण देश में कई नगरों का विकास
    हुआ।
  8. कनिष्क ने कनिष्कपुर, सिरमुख सहित अनेक नगरों की स्थापना की। पुरुषपुर या पेशावर उसकी प्रथम और मथुरा उसकी द्वितीय राजधानी थी जो कुषाणकालीन समृद्धि का प्रतीक बन गई थी।

इस प्रकार उपर्युक्त गतिविधियों से स्पष्ट होता है कि कुषाण काल में आर्थिक क्षेत्र में सराहनीय प्रगति हुई जिसने इस साम्राज्य को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया।

प्रश्न 5.
कुषाणों के काल में भारत के विदेशी व्यापार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई? इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
कुषाणों के काल में भारत का विदेशी व्यापार उन्नत अवस्था में था। इस काल में स्थल मार्गों तथा समुद्री मार्गों के विकास से अन्य देशों के साथ भारत के व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुए।

1. स्थल मार्गों का विकास:
स्थल मार्गों के विकास ने भारत के आंतरिक व्यापार को सुदृढ़ता प्रदान की। इन स्थल मार्गों से दूसरे देशों की सीमाएँ जुड़ी होने के कारण भारत को अन्य देशों के साथ व्यापार करने में भी सुविधा हुई। एक स्थल मार्ग से तक्षशिला काबुल से तथा दूसरे मार्ग से कंधार ईरान से जुड़ा था। इस प्रकार मध्य एशिया तथा पश्चिम एशिया को जाने वाले मार्गों का विकास हुआ।

2. रेशम मार्ग पर नियंत्रण:
कुषाणों ने रेशम मार्ग पर नियंत्रण स्थापित किया जो चीन से चलकर मध्य एशिया होते हुए रोमन साम्राज्य तक पहुँचता था। यह रेशम मार्ग कुषाणों की आय का बहुत बड़ा स्रोत था। इस प्रकार भारत के व्यापारी दक्षिणी अरब और लाल सागर क्षेत्रों में जुड़ गए थे।

3. रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार:
भारत के व्यापारी चीन से रेशम खरीदकर रोमन साम्राज्य के व्यापारियों तक पहुँचाते थे जिससे उन्हें बड़ा लाभ होता था। भारत में हाथी दाँत का सामान, काली मिर्च, लौंग, मसाले, सुगंधित पदार्थ और औषधियाँ तथा सूती व रेशमी वस्त्र एवं मलमल आदि की रोम में बहुत माँग थी। इस व्यापार का केन्द्र केरल प्रदेश था। इससे व्यापार से प्रतिवर्ष लाखों की स्वर्ण मुद्राएँ रोम से भारत आने लगीं।

4. अन्य देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध:
समुद्री मार्गों ने चीन व रोम के साथ – साथ भारत ने अन्य देशों के साथ व्यापार को भी प्रोत्साहन दिया। चीन व रोम के अलावा भारत का व्यापार बर्मा, जावा, सुमात्रा, चम्पा आदि दक्षिण – पूर्वी एशियाई देशों के साथ भी था। उपर्युक्त बिन्दुओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि कुषाणों के काल में भारत के विदेशी व्यापार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।

प्रश्न 6.
भारत पर हूणों के आक्रमण पर एक निबन्ध लिखिए।
उत्तर:
भारत पर आक्रमण करने वाली विदेशी जातियों में से एक जाति हूण थी। इतिहासकारों के अनुसार हूण मंगोलों की तरह ही मध्य एशिया की एक खानाबदोश व बर्बर जाति थी तथा इसने भारत की धन – सम्पदा को खूब लूटा। कुछ इतिहासकार इन्हें बंजारों व गुर्जरों की उपजाति की संज्ञा देते हैं तो कुछ इन्हें राजपूतों के पूर्वजों के रूप में भी स्वीकार करते हैं। हूणों की उत्पत्ति मूलत: का केशस से मानी जाती है। वहाँ से इन्होंने अपना साम्राज्य मध्य व दक्षिणी एशिया के अन्य देशों में फैलाना शुरू किया। लगभग 450 ई. में इन्होंने भारत पर आक्रमण किया। भारत में इनका प्रवेश पश्चिम से हुआ।

हूणों का भारतीय राजनीति में प्रवेश गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त के काल में हुआ जब इस जाति द्वारा स्कन्दगुप्त को सैकड़ों हमलों के द्वारा ललकारा गया। स्कन्दगुप्त ने हूणों को सफल नहीं होने दिया परन्तु कालान्तर में गुप्तकाल की शक्ति क्षीण होने के कारण सन्धिकाल में हूणों के राजा तोरमाण ने आर्यावर्त अर्थात् मालवा को विजित करने के बाद भारत में स्थायी निवास बना लिया। तोरमाण के बाद उसके पुत्र मिहिरकुल ने पंजाब पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया।

जैन ग्रन्थ कुवलयमाल के अनुसार तोरमाण चन्द्रभागा नदी के किनारे स्थित पवैय्या नगरी से भारत पर शासन करता था। हूणों के अत्याचार का मुकाबला 528 ई. में स्थानीय शासक यशोवर्मन तथा बालदित्य ने मिलकर किया। यशोवर्मन ने हूणों को परास्त किया किन्तु वे अपने मूल स्थान मध्य एशिया नहीं गए बल्कि हिन्दू धर्म व संस्कृति को आत्मसात करके इसके अभिन्न अंग बन गए तथा इसी में विलीन हो गए। हूणों ने मध्य एशिया से नरसंहारक क्रूर व बर्बर जाति के रूप में हमलावर की भाँति भारत पर चढ़ाई की परन्तु अन्त में वे भारतीय संस्कृति के रीति-रिवाजों को अपनाकर सदा के लिए भारतीय बन गए।

RBSE Class 12 History Chapter 3 मानचित्र कार्य प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन भारत में कुषाणों के साम्राज्य को मानचित्र में दर्शाइए।
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 3 image 7

प्रश्न 2.
विश्व के मानचित्र में निम्नलिखित को दर्शाइए(क) शकों का निवास स्थान सीथिया
(ख) पार्थिया
(ग) बैक्ट्रियर
(घ) भारतीय शकों का अधिकार क्षेत्रक
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 12 History Chapter 3 image 8

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