RBSE Solutions for Class 12 Geography Chapter 15 संसाधनों का वर्गीकरण, संरक्षण एवं पोषणीय विकास

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Rajasthan Board RBSE Class 12 Geography Chapter 15 संसाधनों का वर्गीकरण, संरक्षण एवं पोषणीय विकास

RBSE Class 12 Geography Chapter 15 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Geography Chapter 15 बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न में से जैविक संसाधन कौन-सा है?
(अ) खनिज
(ब) पशु
(स) पेट्रोल
(द) हवा

प्रश्न 2.
अजैविक संसाधन का उदाहरण है?
(अ) कोयला
(ब) वन
(स) मनुष्य
(द) समुद्री जीव

प्रश्न 3.
निम्न में ऊर्जा का परम्परागत संसाधन कौन-सा है?
(अ) भूतापीय ऊर्जा
(ब) पवन ऊर्जा
(स) सौर ऊर्जा
(द) पेट्रोलियम

प्रश्न 4.
ऊर्जा का गैर परम्परागत संसाधन कौन-सा है?
(अ) सौर ऊर्जा
(ब) कोयला
(स) प्राकृतिक गैस
(द) डीजल

प्रश्न 5.
संसाधन संरक्षण में बाधक तत्व है –
(अ) धरातल का ऊबड़-खाबड़ होना
(ब) तीव्र औद्योगिक एवं नगरीयकरण
(स) अल्प विकास की दर होना
(द) सतत विकास को अपनाना

प्रश्न 6.
पोषणीय विकास से आशय है –
(अ) संसाधनों का दुरुपयोग
(ब) संसाधनों का अत्यधिक उपयोग
(स) संसाधनों का सतत् उपयोग
(द) संसाधनों के उपयोग को रोकना

उत्तरमाला:
1. (ब), 2. (अ), 3. (द), 4. (अ), 5. (ब), 6. (स)

RBSE Class 12 Geography Chapter 15 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 7.
संसाधन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
वे पदार्थ जिनका उपयोग कर मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, संसाधन कहलाते हैं।

प्रश्न 8.
मानव को संसाधन का जनक क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
मानव संसाधनों का निर्माण करता है इसलिये मानव संसाधनों, का जनक कहलाता है। दूसरों शब्दों में मानव की उपयोगिता के सन्दर्भ में ही कोई भौतिक पदार्थ संसाधन बनता है, अतएव मानव को संसाधनों का जनक कहा जाता है।

प्रश्न 9.
संसाधन संरक्षण क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
संसाधनों के उपयोग की निरन्तरता को बनाये रखने के लिए संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है।

प्रश्न 10.
संसाधन संरक्षण में बाधक चार कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. जनसंख्या विस्फोट के कारण बढ़ती मानवीय आवश्यकताएं।
  2. वैज्ञानिक अविष्कारों से औद्योगीकरण, नगरीकरण एवं परिवहन में द्रुत गति से वृद्धि।
  3. पश्चिमी उपभोगवादी संस्कृति के व्यापक प्रसार से संसाधनों के अधिकतम उपभोग की प्रवृत्ति।
  4. अधिकतम विकास की प्रवृत्ति।

प्रश्न 11.
जैविक संसाधनों के चार उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
मानव, जीव-जन्तु, चारागाह तथा प्राकृतिक वनस्पति जैविक संसाधनों के चार उदाहरण है।

प्रश्न 12.
पुनर्चक्रण विधि द्वारा किस प्रकार संसाधन संरक्षण किया जा सकता है।
उत्तर:
पुनर्चक्रण विधि द्वारा किसी धातु की स्क्रेप, कतरन या उसके खराब होने पर उसे गलाकर कई बार पुनः उपयोग किया जा सकता है। इससे उस धातु को भविष्य के लिए संरक्षित करने में सहायता मिलती है।

RBSE Class 12 Geography Chapter 15 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 13.
संसाधन संरक्षण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
संसाधनों का नियोजित, विवेकपूर्ण, मितव्ययतापूर्ण, पुनर्भरण क्षमतानुसार, विनाश रहित उपयोग संसाधन संरक्षण कहलाता है। संसाधन संरक्षण का सम्बन्ध संसाधनों का बिल्कुल ही उपयोग नहीं करने अथवा उसके कंजूसीपूर्ण उपयोग से कदापि नहीं है। विश्व के सभी संसाधनों का उपयोग वर्तमान में इस प्रकार करना चाहिए जिससे उनसे वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की आपूर्ति तो हो ही, के साथ ही उन्हें भावी पीढ़ी के लिए भी सुरक्षित रखा जा सके।

प्रश्न 14.
संसाधनों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
संसाधनों को उनके उपयोग की सततता के आधार पर, उत्पत्ति के आधार पर तथा उद्देश्य के आधार पर अग्र रेखाचित्र के अनुसार वर्गीकृत किया जा सकता है
RBSE Solutions for Class 12 Geography Chapter 15 संसाधनों का वर्गीकरण, संरक्षण एवं पोषणीय विकास img-1
प्रश्न 15.
जैविक व अजैविक संसाधनों में अन्तर कीजिए।
उत्तर:
जैविक व अजैविक संसाधनों में निम्नलिखित अन्तर हैं –

  1. सभी जैविक संसाधन अपनी प्रजनन क्षमता से वंश वृद्धि कर नव्यकरणीय होने के कारण असमाप्य होते हैं। जबकि सभी अजैविक संसाधन प्रजनन क्षमता न रखने के कारण अनव्यकरणीय होने के कारण समाप्य होने वाले होते हैं। वे एक बार उपयोग करने के बाद सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं।
  2. जैविक संसाधन गतिशील व अचल दोनों हो सकते हैं जबकि अजैविक संसाधन केवल अचल रूप में मिलते हैं।

प्रश्न 16.
पोषणीय विकास किसे कहते हैं?
उत्तर:
पोषणीय विकास से आशय पर्यावरण के साथ संसाधनों के सन्तुलित, विवेकपूर्ण, मितव्ययतापूर्ण, पुनर्भरण क्षमतानुसार, विनाश रहित उपयोग से होता है। जिससे वर्तमान और भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति सतत् विकास के साथ की जा सके।

प्रश्न 17.
नव्यकरणीय और अनव्यकरणीय संसाधनों में अन्तर कीजिए।
उत्तर:
नव्यकरणीय और अनव्यकरणीय संसाधनों में अन्तर –

1. नव्यकरणीय संसाधनों का एक बार उपयोग करने के बाद उन्हें मानव या प्रकृति द्वारा पुनस्र्थापन या नवीनीकरण किया जा सकता है। जबकि अनव्यकरणीय संसाधनों का एक बार उपयोग करने के बाद उनका पुनस्र्थापन या नवीनीकरण नहीं किया जा सकता इसी कारण इन्हें सीमित संसाधन भी कहते हैं।

2. नव्यकरणीय संसाधनों का पुनस्र्थापन किए जाने के कारण इनके भण्डार कभी समाप्त नहीं होते हैं; जैसे-मानव, पशु, वन व जल के अलावा पवन, सौर, भूतापीय एवं ज्वारीय ऊर्जा। जबकि अनव्यकरणीय संसाधनों के लगातार उपयोग करने तथा उनके पुनस्र्थापन न होने के कारण इनके समाप्त होने की सम्भावना बनी रहती है; जैसे-लोहा, कोयला तथा पेट्रोलियम आदि।

RBSE Class 12 Geography Chapter 15 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 18.
संसाधन अर्थ, संरक्षण की आवश्यकता, समस्या और प्रकारों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संसाधन का अर्थ-वे समस्त प्राकृतिक तथा मानवीय घटक जिनका उपयोग मानव अपनी आश्यकताओं की पूर्ति के लिए करता है, संसाधन कहलाते हैं। स्पष्ट है कि कोई भी प्राकृतिक वस्तु तभी संसाधन बनती है, जब मानव उसका उपयोग अपने हित में करने लगता है। इसलिए कहा जाता है ‘संसाधन होते नहीं, बनाये जाते हैं।” जिम्मरमैन के अनुसार, “संसाधन का अर्थ किसी उद्देश्य की प्राप्ति करना है। यह उद्देश्य व्यक्ति की आवश्यकताओं तथा सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ति करता है।” किसी वस्तु के संसाधन की श्रेणी में आने के लिए निम्नलिखित दशाओं का होना आवश्यक है –

  1. वस्तु का मानवीय आवश्यकताओं के लिए उपयोग सम्भव हो।
  2. ऐसी वस्तुएं जिनका रूपान्तरण अधिक मूल्यवान तथा उपयोगी वस्तु के रूप में किया जा सके।
  3. ऐसी वस्तुएं जिनमें निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति की क्षमता हो।
  4. इन वस्तुओं के दोहन की योग्यता रखने वाला मानव संसाधन सम्पन्न हो।
  5. संसाधनों के रूप में पोषणीय विकास करने के लिए आवश्यक पूँजी हो। चूंकि मानव ही संसाधनों का निर्माण करता है इसी कारण मानव को संसाधनों का जनक कहा जाता है।

संसाधन संरक्षण की आवश्यकता: वर्तमान समय में संसाधन संरक्षण की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से हैं –

1. मानव के सतत विकास तथा संसाधनों के दीर्घकालीन उपयोग करने के लिए संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है।

2. आर्थिक विकास के लिए संसाधनों का विनाशपूर्वक उपभोग जिस तीव्र गति से किया जा रहा है उससे उनके समाप्त होने का संकट उत्पन्न हो गया है। हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों की उपलब्धता को कायम रखने के लिए उनका समुचित संरक्षण आवश्यक है।

3. जनसंख्या की तीव्र वृद्धि, बढ़ता नगरीकरण व औद्योगीकरण तथा वृहद स्तर पर किए जाने वाले वनोन्मूलन से एक ओर संसाधन तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर पारिस्थितिकी असंतुलन तथा पर्यावरण प्रदूषण की गम्भीर समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। इन समस्याओं के निवारण, सतत विकास को कायम रखने तथा पर्यावरण की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता है।

संसाधन संरक्षण की समस्या:
मानव द्वारा किए जाने वाले तीव्र आर्थिक विकास ने संसाधनों के शोषण की दर में तेजी से वृद्धि की है। एक ओर नव्यकरणीय संसाधनों को एक सीमा तक ही पुनस्र्थापित किया जा सकता है वहीं दूसरी ओर अनव्यकरणीय संसाधनों के नवीनीकरण की गति अति धीमी होने के कारण निकट भविष्य में उनके समाप्त होने का संकट उत्पन्न हो गया है। संसाधनों के अभाव में आगे आने वाली मानवीय पीढ़ियाँ अपेक्षित विकास से वंचित रह जाएंगी। संसाधन संरक्षण की समस्या को उत्पन्न करने वाले चार कारक संयुक्त रूप से उत्तरदायी हैं –

  1. जनसंख्या विस्फोट के कारण बढ़ती मानवीय आवश्यकताएँ।
  2. वैज्ञानिक आविष्कारों से औद्योगीकरण, नगरीयकरण एवं परिवहन में द्रुत वृद्धि।
  3. पश्चिमी उपभोगवादी संस्कृति के व्यापक प्रसार से संसाधनों के अधिकतम उपभोग की प्रवृत्ति।
  4. अधिकतम विकास की प्रवृत्ति।

संसाधनों के प्रकार: संसाधनों का वर्गीकरण निम्नलिखित चार आधारों पर किया गया है –
1. उत्पाद के आधार पर संसाधनों के निम्नलिखित 2 वर्ग होते हैं –

  • जैविक संसाधन
  • अजैगिक संसाधन

2. उद्देश्य के आधार पर संसाधनों के निम्नलिखित 2 प्रकार होते हैं –

  • ऊर्जा संसाधन-इसके दो परम्परागत तथा गैर-परम्परागत संसाधन नामक उप वर्ग हैं।
  • गैर ऊर्जा संसाधन।

3. उपयोग की सततता के आधार पर संसाधनों के निम्नलिखित 2 वर्ग होते हैं –

  • अनव्यकरणीय या समाप्य संसाधन
  • नव्यकरणीय या असमाप्य संसाधन

4. स्वामित्व के आधार पर संसाधनों के निम्नलिखित 3 वर्ग होते हैं –

  • व्यक्तिगत संसाधन
  • राष्ट्रीय संसाधन
  • अन्तर्राष्ट्रीय या विश्व संसाधन

प्रश्न 19.
संसाधन संरक्षण की विधियों पर एक लेख लिखिये।
उत्तर:
संसाधन संरक्षण के लिए प्रमुख रूप से निम्नलिखित 10 विधियाँ महत्वपूर्ण हैं –
1. जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावी नियन्त्रण:
संसाधनों की उपलब्धता की तुलना में जब जनसंख्या में अधिक वृद्धि हो जाती है तब संसाधनों के शोषण की गति बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में अनव्यकरणीय संसाधनों का अति विदोहन होने से अनव्यकरणीय संसाधन शीघ्र ही समाप्त होने लगते हैं। अत: किसी देश में संसाधन संरक्षण के लिए जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावी नियन्त्रण अति आवश्यक होता है।

2. नियोजन में समग्र दृष्टिकोण:
पर्यावरण के विभिन्न घटकों का समुचित उपयोग व संरक्षण नियोजन में समग्र दृष्टिकोण कहलाता है। पर्यावरण के विभिन्न घटक अन्तर्सम्बन्धित होते हैं। पर्यावरण के एक घटक में कमी या क्षरण से सम्पूर्ण पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। अतः देश की विकास योजनाएँ बनाने तथा उनके क्रियान्वयन में पर्यावरण की इस समग्रता को दृष्टिगत रखना आवश्यक है। ऐसा करने से एक ओर पर्यावरण संतुलन को कायम रखने में सहायता मिलती है वहीं दूसरी ओर संसाधन संरक्षण में भी योगदान होता है।

3. जैविक सन्तुलन बनाए रखना:
मानव अस्तित्व के लिए जल, वायु, वनस्पति तथा जीव-जन्तु प्रमुख आधारभूत जैविक आधार माने जाते हैं अत: मानव के सतत विकास तथा संसाधनों के संरक्षण के लिए जैविक सन्तुलन को दृष्टिगत रखकर आर्थिक नियोजन कार्यक्रमों का क्रियान्वयन आवश्यक है। जैविक असन्तुलन, पर्यावरण प्रदूषण तथा पारिस्थितिकी असन्तुलन की समस्याएँ उत्पन्न करता है जिसमें मानव के आर्थिक विकास के स्थान पर विनाश की सम्भावनाएँ बलवती हो जाती हैं।

4. ऊर्जा के गैर-पारम्परिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग:
संसाधनों के संरक्षण के लिए सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा तथा तापीय ऊर्जा जैसे नव्यकरणीय एवं गैर-पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग आवश्यक है। इससे पेट्रोलियम, कोयला तथा परमाणु खनिजों का संरक्षण तो होता ही है साथ ही पर्यावरण प्रदूषण की समस्या को न्यूनतम किया जा सकता है।

5. वैकल्पिक संसाधनों की खोज:
विश्व में अनुव्यकरणीय संसाधनों के सीमित भण्डार है अत: ऐसे संसाधनों के विकल्पों की खोज़ कर उनका उपयोग करना आवश्यक है जिससे अनव्यकरणीय संसाधनों की उपलब्धता आने वाली पीढ़ियों को प्राप्त होती रहे। उदाहरण के लिए ऊर्जा के गैर परम्परागत स्रोतों को विकसित कर कोयला तथा पेट्रोलियम संसाधनों की उपलब्धता अवधि को बढ़ाया जा सकता है।

6. प्राथमिकता के आधार पर उपयोग:
प्रकृति में सीमित तथा समाप्य संसाधनों को अति आवश्यक होने पर तथा राष्ट्रीय महत्व के कार्यों में ही उपयोग करना चाहिए साथ ही ऐसे संसाधनों के विकल्पों का अधिकाधिक उपयोग करना आवश्यक है।

7. पुनर्चक्रण:
इस विधि में किसी धातु का एक बार उपयोग करने के बाद उसके खराब होने पर गलाकर पुन: उपयोग किया जाता है। यह संसाधन संरक्षण की एक उपयोगी व महत्त्वपूर्ण विधि है।

8. कृत्रिम वस्तुओं का उपयोग:
प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के स्थान पर वैकल्पिक रूप में कृत्रिम पदार्थों के उपयोग को बढ़ावा देने से प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता को लम्बे समय तक कायम रखा जा सकता है। उदाहरण के लिए। लकड़ी के सामान के स्थान पर प्लास्टिक सामान का उपयोग।

9. उन्नत एवं परिष्कृत तकनीक का उपयोग:
प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते समय यदि उन्नत व परिष्कृत तकनीक का उपयोग किया जाता है तो उससे ऊर्जा एवं अन्य संसाधनों की बचत की जा सकती है। उदाहरण के लिए बहुमंजिली इमारतों के निर्माण से भूमि संसाधनों की बचत।

10. संसाधनों का बहुउद्देशीय उपयोग:
एक ही परियोजना के क्रियान्वयन से जब कई उद्देश्यों की आपूर्ति होती है तो ऐसी परियोजनाएँ बहुउद्देशीय परियोजनाएँ कहलाती हैं। ऐसी परियोजना से संसाधनों के संरक्षण में सहायता मिलती है। उदाहरण के लिए नदियों पर बाँध निर्माण से सिंचाई, पेयजल, विद्युत उत्पादन, मत्स्यपालन, बाढ़ नियन्त्रण, वन विकास, मृदा संरक्षण, भूमिगत जलस्तर में वृद्धि तथा जल परिवहन जैसे अनेक उद्देश्य पूरे होते हैं।

प्रश्न 20.
संसाधनों के पोषणीय विकास पर आपके विचार लिखिये।
उत्तर:
पोषणीय विकास से आशय:
पर्यावरण के साथ सन्तुलित, विवेकपूर्ण, मितव्ययतापूर्ण, पुनर्भरण तथा क्षमतानुसार विनाशरहित उपभोग पोषणीय विकास कहलाता है। पोषणीय विकास के माध्यम से किए जाने वाले सतत विकास से मानव की वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। पोषणीय विकास में संसाधनों के मितव्ययतापूर्ण व पुनर्भरण क्षमतानुसार उपयोग एवं संरक्षण को विशेष बल प्रदान किया जाता है।

मानव के आर्थिक विकास ने संसाधनों का अविवेकपूर्ण ढंग से अति विदोहन किया गया है जिससे पर्यावरण के प्राकृतिक तथा जैविक अन्तर्सम्बन्धों के मध्य असंतुलन की स्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं तथा पर्यावरण प्रदूषण की गम्भीर समस्याओं ने मानव के अस्तित्व के लिए गम्भीर संकट खड़ा कर दिया है।

पर्यावरण असंतुलन तथा प्रदूषण की गम्भीर होती दशाओं के साथ-साथ संसाधनों के अति विदोहन के चलते विकास की सतत गति को कायम रखना कठिन हो गया है। अतः भविष्य में अस्थायी विकास के स्थान पर सतत विकास के मार्ग का अनुसरण आवश्यक है ताकि पर्यावरणीय दुष्परिणामों से बचा जा सके। निरन्तर विकास की विचारधारण के कारण ही पोषणीय विकास को सतत विकास कहा जाता है।

जनंसख्या वृद्धि तथा पोषणीय विकास:
विकास क्रा सीधा सम्बन्ध प्रति व्यक्ति आय, औद्योगिक व कृषि उत्पादन में वृद्धि, उन्नत परिवहन व्यवस्था व सूचना प्रौद्योगिकी, शुद्ध वायु, स्वच्छ पेयजल, आरामदायक आवास, आवश्यक वस्त्र, पौष्टिक भोजन, आधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ तथा मनोरंजन साधनों की पर्याप्त स्तर पर उपलब्धता से होता है। विश्व के मानव विकास सूचकांक में नार्वे (0.944), आस्ट्रेलिया (0.935) तथा स्विट्जरलैण्ड देशों का क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान है जबकि भारत का 0.609 मानव विकास सूचकांक के साथ 130वाँ स्थान है।

वस्तुत: विश्व के उच्च मानव विकास सूचकांक रखने वाले देशों ने अपने यहाँ के प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों का विवेकपूर्ण ढंग से विदोहन तो किया ही है साथ ही राष्ट्रीय सम्पत्ति में वृद्धि कर अपने यहाँ के नागरिकों का जीवन सुहावना एवं सम्पन्न बनाया है। जनसंख्या वृद्धि का आर्थिक विकास से सामंजस्य बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि उन्नत तकनीक से सुसज्जित मध्यम आकार की स्थानीय कच्चे मालों पर आधारित औद्योगिक इकाइयों द्वारा स्थानीय स्तर पर उत्पादन किया जाये जिससे स्थानीय रूप से कच्चे मालों के उपयोग से स्थानीय व्यक्तियों के लिए रोजगार के अवसर सृजित होंगे, उत्पादन लागत कम आयेगी तथा समाज तथा राष्ट्र आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ेगा।

विश्व के विकासशील राष्ट्रों में जनाधिक्य तथा निर्यात व्यापार में कमी होने से निम्न जीवन स्तर मिलता है तथा वहाँ की एक बड़ी जनसंख्या गरीबी तथा भुखमरी ग्रस्त मिलती है। इन देशों के पास वृहद् स्तरीय उद्योगों की स्थापना के लिए आवश्यक उन्नत तकनीक का अभाव एवं पूँजी की कमी मिलती है, अतः इन देशों में मध्यम आकार की औद्योगिक इकाइयों की स्थापना उपयोगी होती है। भारत जैसे प्रचुर मानव शक्ति रखने वाले देश में श्रम आधारित औद्योगिक इकाइयों की स्थापना लाभप्रद होगी। । दूसरी ओर विश्व के विकसित देशों में कम जनसंख्या तथा निर्यात व्यापार में होने वाली वृद्धि से वहाँ उन्नति व समृद्धि देखने को मिलती है जिससे इन देशों में उच्च जीवन स्तर देखने को मिलता है।

RBSE Class 12 Geography Chapter 15 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Geography Chapter 15 बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन एक अजैविक संसाधन नहीं है?
(अ) खनिज
(ब) मिट्टी
(स) चारागाह
(द) जल

प्रश्न 2.
अजैविक संसाधनों के संदर्भ में कौन-सा एक कथन सत्य नहीं है?
(अ) अजैविक संसाधनों में प्रजनन क्षमता का अभाव नहीं है।
(ब) इनके निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत धीमी होती है।
(स) इनका शीघ्र ही नवीनीकरण किया जा सकता है।
(द) ये संसाधन निश्चित मात्रा में निश्चित स्थानों पर ही उपलब्ध होते हैं।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन एक परम्परागत संसाधन नहीं है?
(अ) सौर ऊर्जा
(ब) कोयला
(स) पेट्रोलियम
(द) प्राकृतिक गैस

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन एक अनवीनीकरण संसाधन नहीं है?
(अ) वन
(ब) लोहा
(स) कोयला
(द) पेट्रोलियम

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन एक व्यक्तिगत संसाधन नहीं है?
(अ) मकान
(ब) भूमि
(स) शारीरिक-मानसिक क्षमता
(द) खनिज

प्रश्न 6.
संसाधनों के संरक्षण से अभिप्राय है, संसाधनों का –
(अ) कंजूसी से उपयोग
(ब) आवश्यकतानुसार उपयोग
(स) अत्यधिक उपयोग
(द) विवेकपूर्ण ढंग से दीर्घकालीन उपयोग

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन एल संसाधन संरक्षण का उपाय नहीं है?
(अ) परम्परागत ऊर्जा संसाधनों का अधिक उपयोग
(ब) पुनर्चक्रण
(स) जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण
(द) उन्नत व परिष्कृत तकनीक

उत्तरमाला:
1. (स), 2. (स), 3. (अ), 4. (अ), 5. (द), 6. (द), 7. (अ)

सुमलेन सम्बन्धी प्रश्न

निम्न में स्तम्भ अ को स्तम्भ ब से सुमेलित कीजिए –

स्तम्भ (अ)
(संसाधन)
स्तम्भ (ब)
(प्रकार)
(i) मानव(अ) अजैविक संसाधन
(ii) मिट्टी(ब) नव्यकरणीय संसाधन
(iii) पवन ऊर्जा(स) अनव्यकरणीय संसाधन
(iv) पेट्रोलियम(द) जैविक संसाधन

उत्तरमाला:
(i) द (ii) अ (iii) ब (iv) स

RBSE Class 12 Geography Chapter 15 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जिम्मरमेन ने संसाधनों की क्या परिभाषा दी है?
उत्तर:
संसाधन का अर्थ किसी उद्देश्य की प्राप्ति करना है, यह उद्देश्य व्यक्तिगत आवश्यकताओं व सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ति करता है।

प्रश्न 2.
“संसाधन होते नहीं, बनाए जाते हैं। इस कथन का क्या आशय है?
उत्तर:
मानव अपने श्रम तथा तकनीकी ज्ञान के द्वारा, किसी पदार्थ को मानव उपयोगी बनाता है इसीलिए कहा जाता है कि संसाधन होते नहीं, बनाए जाते हैं।

प्रश्न 3.
उत्पाद के आधार पर संसाधनों को कितने भागों में बांटा गया है?
उत्तर:
उत्पाद के आधार पर संसाधनों को दो भागों-जैविक एवं अजैविक संसाधनों में बांटा गया है।

प्रश्न 4.
जैविक संसाधन असमाप्य क्यों होते हैं?
उत्तर:
क्योंकि जैविक संसाधनों में प्रजनन द्वारा अपनी वंश वृद्धि की क्षमता होती है।

प्रश्न 5.
चल जैविक संसाधन कौन से होते हैं?
उत्तर:
मानव तथा समस्त जीव-जन्तु गतिशील होने के कारण चल जैविक संसाधन की श्रेणी में आते हैं।

प्रश्न 6.
अजैविक संसाधन किसे कहते हैं?
उत्तर:
सभी प्रकार के जड़ तथा निजीव घटकों से सम्बन्धित संसाधन अजैविक संसाधन कहलाते हैं।

प्रश्न 7.
अजैविक संसाधन अनव्यकरणीय क्यों होते हैं?
उत्तर:
क्योंकि ये प्रजनन क्षमता न होने कारण एक बार प्रयोग करने के बाद समाप्त हो जाते हैं अत: ये संसाधन अनव्यकरणीय होते हैं।

प्रश्न 8.
अनव्यकरणीय संसाधनों के तीन उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
कोयला, पेट्रोलियम तथा लोहा।

प्रश्न 9.
नव्यकरणीय संसाधनों के तीन उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
वन, भूमिगत जल तथा मानव।

प्रश्न 10.
उद्देश्य के आधार पर संसाधनों को किन भागों में बाँटा गया है?
उत्तर:
उद्देश्य के आधार पर संसाधनों को दो भागोंऊर्जा शक्ति के संसाधन व गैर ऊर्जा संसाधनों में बाँटा गया है।

प्रश्न 11.
परम्परागत संसाधन किसे कहते हैं ?
उत्तर:
जिन संसाधनों का प्राचीन काल से उपयोग किया जा रहा है, उन्हें परम्परागत संसाधन कहते हैं।

प्रश्न 12.
गैर परम्परागत संसाधनों से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जिन संसाधनों का उपयोग अभी-अभी किया जाने लगा है उन्हें गैर-परम्परागत संसाधन कहते हैं।

प्रश्न 13.
गैर ऊर्जा संसाधन किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिन संसाधनों का उपयोग कच्चे माल और निर्माण उद्योगों में किया जाता है, उन्हें गैर ऊर्जा संसाधन कहते हैं।

प्रश्न 14.
उपयोग की सततता के आधार पर – संसाधनों को कितने भागों में बांटा गया है?
उत्तर:
उपयोग की सततता के आधार पर संसाधनों के दो भागों-अनव्यकरणीय या समाप्य संसाधन व नव्यकरणीय या असमाप्य संसाधन में बांटा गया है।

प्रश्न 15.
अनव्यकरणीय संसाधन किस कहते हैं?
अथवा
सीमित संसाधनों से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जिन संसाधनों का एक बारे उपयोग होने के बाद पुनस्र्थापन नहीं किया जा सकता, उन्हें सीमित संसाधन कहते हैं। इन संसाधनों का लगातार उपयोग होने से ये शीघ्र समाप्त हो जाने वे पुनस्र्थापन नहीं होने के कारण अनव्यकरणीय या समाप्त संसाधन भी कहलाते हैं।

प्रश्न 16.
नव्यकरणीय संसाधन क्या होते हैं?
अथवा
असमाप्य संसाधन किसे कहते हैं?
अथवा
असीमित संसाधन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जिन संसाधनों का एक बार उपयोग होने के बाद मानव या प्रकृति द्वारा पुनस्र्थापन या नवीनीकरण किया जा सकता है, उन्हें असीमित संसाधन कहते हैं। पुनस्र्थापन होने के कारण इनके भंडार कभी समाप्त नहीं होंगे। इसलिए इन्हें नव्यकरणीय या असमाप्य संसाधन भी कहते हैं।

प्रश्न 17.
स्वामित्व के आधार पर संसाधनों का किन-किन भागों में बाँटा गया है?
उत्तर:
स्वामित्व के आधार पर संसाधनों को तीन भागों- व्यक्तिगत संसाधन, राष्ट्रीय संसाधन व अन्र्तराष्ट्रीय या विश्व संसाधनों में बाँटा गया है।

प्रश्न 18.
व्यक्तिगत संसाधन किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिन संसाधनों पर किसी व्यक्ति, परिवार या संस्था का अधिकार होता है उन्हें व्यक्तिगत संसाधन कहते हैं। यथा-मकान, भूमि, नकदी आदि।

प्रश्न 19.
राष्ट्रीय संसाधन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जिन संसाधनों पर पूरे राष्ट्र का अधिकार होता है, उन्हें राष्ट्रीय संसाधन कहते है; यथा-जनसंख्या, खनिज, वन आदि।

प्रश्न 20.
अन्तर्राष्ट्रीय संसाधन किसे कहते हैं?
अथवा
विश्व संसाधन किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिन संसाधनों पर पूरे विश्व का अधिकार रहता है उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय संसाधन कहते हैं।

प्रश्न 21.
संसाधन संरक्षण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
सभी संसाधनों का नियोजित, विवेकपूर्ण, मितव्ययतापूर्ण, विनाशरहित तथा जनसंख्या की आवश्यकतानुसार दीर्घकालीन उपयोग संसाधन संरक्षण है।

प्रश्न 22.
संसाधन संरक्षण की समस्या क्यों उत्पन्न हुई है?
उत्तर:
जनसंख्या विस्फोट, वैज्ञानिक आविष्कारों से औद्योगीकरण, नगरीकरण एवं परिवहन क्षेत्र में हुई तीव्र वृद्धि, पश्चिमी उपभोगवादी संस्कृति के कारण संसाधनों के अधिकतम उपभोग की प्रवृत्ति तथा अधिकतम आर्थिक विकास की प्रवृत्ति के कारण संसाधन संरक्षण की समस्या उत्पन्न हुई है।

प्रश्न 23.
संसाधनों के बहुउद्देशीय संरक्षण उपयोग के प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:

  1. सिंचाई के लिए जल, पेय जल तथा विद्युत उत्पादन।
  2. बाढ़ नियन्त्रण, मत्स्यपालन, वन विकास, मृदा अपरदन नियन्त्रण।
  3. भूमिगत जल स्तर बझना तथा जल परिवहन।

प्रश्न 24.
पेट्रोलियम के बहुउद्देशीय उपयोग के उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
पेट्रोल व डीजल पेट्रोलियम के दो प्रमुख ऊर्जा उत्पाद हैं जबकि मिट्टी का तेल, ग्रीस, ऑयल, वेसलीन, सिन्थेटिक पदार्थ, मोम तथा कोलतार इसके अन्य गौण उत्पाद हैं।

प्रश्न 25.
विकास से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
विकास से तात्पर्य प्रति व्यक्ति आय, औद्योगिक एवं कृषि उत्पादन में वृद्धि, समृद्ध परिवहन, स्वच्छ पेयजल, शुद्ध वायु, आधुनिक चिकित्सा, शिक्षा की प्रकार मात्रा में उपलब्धता से है।

RBSE Class 12 Geography Chapter 15 लघूत्तरात्मक प्रश्न (SA-I)

प्रश्न 1.
पृथ्वी पर कोई भी वस्तु संसाधन कब बन सकती है?
अथवा
संसाधन बनने हेतु आवश्यक दशाएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर:
पृथ्वी पर किसी भी वस्तु के संसाधन बनने हेतु निम्न दशाएँ आवश्यक हैं –

  1. वस्तु का उपयोग सम्भव हो।
  2. इसका रूपान्तरण अधिक मूल्यवान तथा उपयोगी वस्तु के रूप में किया जा सके।
  3. जिससे निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति की क्षमता हो।
  4. इन वस्तुओं के दोहन की योग्यता रखने वाला मानव संसाधन उपलब्ध हो।
  5. संसाधनों के रूप में पोषणीय विकास करने के लिए आवश्यक पूँजी हो।

प्रश्न 2.
उत्पाद के आधार पर संसाधनों को वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर:
उत्पाद के आधार पर संसाधनों के निम्नलिखित 2 वर्ग हैं –
1. जैविक संसाधन:
इन संसाधनों में सभी प्रकार के जैविक घटकों से सम्बन्धित संसाधन सम्मिलित होते हैं; जैसे-मानव, पशु, पक्षी, जीव-जन्तु तथा प्राकृतिक वनस्पति। जैविक संसाधनों में प्रजनन क्षमता रखने के कारण अपनी वंश वृद्धि करने में सक्षम होते हैं, इसी कारण इन्हें नवीनीकरण तथा समाप्त न होने वाले संसाधन भी कहा जाता है।

2. अजैविक संसाधन:
इस वर्ग में वे सभी प्रकार के जड़ तथा निर्जीव घटकों से सम्बंन्धित संसाधन सम्मिलित होते हैं; जैसे-सभी खनिजे, भूमि, मिट्टी आदि। प्रजनन क्षमता न होने के कारण ये संसाधन अनवीनीकरण तथा समाप्त होने वाले होते हैं तथा एक बार प्रयोग करने के बाद सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं।

प्रश्न 3.
स्वामित्व के आधार पर संसाधनों को वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर:
स्वामित्व के आधार पर संसाधनों के अग्रलिखित 3 वर्ग होते हैं –

1. व्यक्तिगत संसाधन:
ऐसे संसाधन जिन पर किसी व्यक्ति या परिवार का आधिपत्य होता है वे व्यक्तिगत संसाधन कहलाते हैं; जैसे-मकान, भूमि, नगदी, स्वर्णाभूषण आदि।

2. राष्ट्रीय संसाधन:
ऐसे संसाधन जिन पर पूरे राष्ट्र का अधिकार होता है, उन्हें राष्ट्रीय संसाधन कहा जाता है; जैसे-वन, जल, सौर ऊर्जा, तकनीकी ज्ञान आदि।

3. अन्तर्राष्ट्रीय या विश्व संसाधन:
ऐसे संसाधन जिन पर समस्त विश्व का अधिकार होता है, उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय संसाधन कहा जाता है। यह संसाधन मानव की सम्पन्नता तथा कल्याण से सम्बन्धित होते हैं। जैसे-विश्व के समस्त भौतिक व जैविक संसाधन।

प्रश्न 4.
संसाधन संरक्षण के लिए आवश्यक प्रमुख विधियों के नाम बताइए।
उत्तर:
संसाधनों के संरक्षण की निम्न विधियाँ हैं –

  1. जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावी नियन्त्रण
  2. नियोजन में समग्र दृष्टिकोण
  3. जैविक सन्तुलन कायम रखना
  4. ऊर्जा के गैर पारम्परिक संसाधनों का अधिक उपयोग
  5. वैकल्पिक संसाधनों की खोज
  6. प्राथमिकता के आधार पर उपयोग
  7. पुनर्चक्रण
  8. कृत्रिम/वैकल्पिक वस्तुओं का उपयोग
  9. उन्नत व परिष्कृत तकनीक का उपयोग
  10. संसाधनों को बहु उद्देशीय उपयोग

प्रश्न 5.
संसाधन संरक्षण वर्तमान में विश्व की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। क्यों?
उत्तर:
वर्तमान में विश्व में संसाधन संरक्षण की महती आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से है –
1. जनसंख्या में हो रही तीव्र वृद्धि, तकनीकी विकास ने विश्व के संसाधनों के शोषण की गति अति तीव्र कर दी है जिससे विश्व के अनेक प्राकृतिक संसाधनों विशेष रूप से अनव्यकरणीय संसाधन समाप्त होने के कगार पर हैं। इसी कारण ऐसे संसाधनों को मानव की भावी पीढ़ी के लिए बचाए रखने के लिए संरंक्षण प्रदान करने की महती आवश्यकता है।

2. बढ़ते नगरीकरण, औद्योगीकरण तथा वनोन्मूलन से एक ओर जहाँ महत्त्वपूर्ण संसाधन तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इससे पर्यावरण प्रदूषण तथा पर्यावरणीय असंतुलन की गम्भीर समस्या भी उत्पन्न हो गई है। मानवीय अस्तित्व को कायम रखने तथा मानव को स्वच्छ पर्यावरण प्रदान करने के लिए संसाधन संरक्षण की महती आवश्यकता है।

प्रश्न 6.
जनसंख्या वृद्धि तथा आर्थिक विकास के स्तर को कायम रखने के प्रमुख उपायों को लिखिए।
उत्तर:
जनसंख्या वृद्धि तथा आर्थिक विकास के स्तर को कायम रखने के लिए निम्नलिखित उपायों की। आवश्यकता है –

  1. उन्नत प्रौद्योगिकी का उपयोग तथा स्थानीय कच्चे मालों का उपभोग कर रोजगार के अवसरों में वृद्धि करना।
  2. मानव श्रम’आधिक्य वाले क्षेत्रों में श्रम आधारित प्रौद्योगिकी का उपयोग।
  3. संसाधनों के उपयोग के लिए बहुउद्देशीय योजनाओं का क्रियान्वयन।
  4. जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावी नियन्त्रण तथा नियोजन में समग्र दृष्टिकोण।
  5. नवीनीकरण संसाधनों का अधिकतम उपभोग तथा वैकल्पिक संसाधनों की खोज।
  6. वैकल्पिक संसाधनों की खोज तथा संसाधनों का प्राथमिकता के आधार पर उपयोग।
  7. संसाधनों के अधिकतम विकास के स्थान पर आवश्यक विकास पर बल देना।

RBSE Class 12 Geography Chapter 15 लघूत्तरात्मक प्रश्न (SA-II)

प्रश्न 1.
संसाधन संकल्पना की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
संसाधन एक ऐसी प्राकृतिक और मानवीय सम्पदा है, जिसका उपयोग हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में करते हैं। मानव जीवन की प्रगति, विकास तथा अस्तित्व संसाधनों पर निर्भर करता है। प्रत्येक प्राकृतिक संसाधन मानव जीवन के लिए उपयोगी है, किन्तु इसका उपयोग उपयुक्त तकनीकी विकास द्वारा ही सम्भव है। इसी संदर्भ में जिम्मरमेन नामक विद्वान ने लिखा था कि संसाधन का अर्थ किसी उद्देश्य की प्राप्ति करना है, यह उद्देश्य व्यक्तिगत आवश्यकताओं तथा सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ति करता है। संसाधन का उपयोगी होने के साथ-साथ उसका रूपान्तरण योग्य, पूर्ति क्षमता योग्य वे पोषणीय विकास योग्य होना आवश्यक है।

प्रश्न 2.
जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावी नियंत्रण संसाधन संरक्षण में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर:
जनंसख्या किसी देश या राष्ट्र का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व आवश्यक संसाधन होती है। मानव आर्थिक विकास व अपने जीवन को उच्च से उच्चतर बनाने के लिये संसाधनों का प्रयोग करता है। संसाधनों के अनुपात में जनसंख्या की। अनुकूलतम अवस्था के बिना किसी अवरोध के आर्थिक विकास होता रहेगा। किन्तु संसाधनों की तुलना में जनसंख्या जैसे ही बढ़ती है वैसे ही संसाधनों का शोषण प्रारम्भ हो जाता हैं। इस प्रक्रिया से अनव्यकरणीय संसाधन शीघ्र समाप्त हो जाते हैं। तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संसाधनों की अधिक आवश्यकता पड़ती है। अतः यदि संसाधनों का समुचित संरक्षण करना है तो जनसंख्या पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है नहीं तो असंतुलन व विदोहन की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।

प्रश्न 3.
जैविक संतुलन बनाये रखना क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
औद्योगिक एवं आर्थिक विकास का उद्देश्य मानव जीवन को उन्नत व सुविधाजनक बनाना है। मानव के अस्तित्व के लिये जल, वायु, मृदा, वनस्पति, जीव-जन्तु आदि प्रमुख जैविक आधार हैं। अतः जैविक संतुलन को ध्यान में रखकर आर्थिक नियोजन से मानव पर्यावरण संतुलन व संसाधनों की उपलब्धता बनी रहेगी और मानव उत्तरोत्तर प्रगति करेगा। इसी कारण जैविक संतुलन बनाये रखना आवश्यक है।

प्रश्न 4.
सतत विकास का मार्ग क्यों आवश्यक हो गया है?
उत्तर:
मानव ने प्राचीन काल में आखेट युग से वर्तमान उन्नत औद्योगिक युग तक की विकास यात्रा में संसाधनों का अत्यधिक उपयोग किया है। संसाधनों के अत्यधिक विदोहन से पर्यावरण के प्राकृतिक व जैविक अन्तः सम्बन्धों के मध्य संतुलन पर प्रभाव पड़ा है। पर्यावरण व विकास के मध्य असंतुलन के कारण पर्यावरण प्रदूषण के दुष्परिणाम स्वरूप आज जीव-जगत के सामने खतरा उत्पन्न हो गया है। पर्यावरण को हानि पहुँचाने तथा संसाधनों के लगातार समाप्ति की ओर बढ़ने से विकास की सतत् गति बनाये रखना आवश्यक है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भविष्य में पर्यावरणीय दुष्परिणामों से बेचने के लिए अस्थाई विकास की विचारधारा के स्थान पर सतत विकास का मार्ग आवश्यक हो गया है।

RBSE Class 12 Geography Chapter 15 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उद्देश्य के आधार पर तथा उपयोग की सततता के आधार पर संसाधनों को वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर:
उद्देश्य के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण-उद्देश्य के आधार पर संसाधनों के निम्नलिखित 2 वर्ग हैं –

  1. ऊर्जा संसाधन
  2. गैर ऊर्जा संसाधन
    RBSE Solutions for Class 12 Geography Chapter 15 संसाधनों का वर्गीकरण, संरक्षण एवं पोषणीय विकास img-2

1. ऊर्जा संसाधन:
इस वर्ग में वे संसाधन सम्मिलित होते हैं जिनसे ऊर्जा या शक्ति प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए पेट्रोलियम, कोयला, परमाणु ऊर्जा, सौर ऊर्जा, मानव शक्ति तथा पशु शक्ति आदि। ऊर्जा संसाधनों को सामान्यतया निम्नलिखित 2 वर्गों में रखा जाता है –

(i) परम्परागत ऊर्जा संसाधन:
परम्परागत ऊर्जा संसाधनों में प्राचीन काल से प्रयुक्त किए जा रहे ऊर्जा संसाधनों को सम्मिलित किया जाता है; जैसे-कोयला, पेट्रोलियम, जल विद्युत तथा परमाणु ऊर्जा आदि।

(ii) गैर-परम्परागत ऊर्जा संसाधन:
जिन ऊर्जा संसाधनों का विकास तथा उपयोग मानव ने कुछ समय पूर्व या वर्तमान युग में किया है, उन्हें गैर-परम्परागत ऊर्जा संसाधन कहा जाता है। उदाहरण के लिए परमाणु ऊर्जा, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा तथा ज्वारीय ऊर्जा आदि।

2. गैर ऊर्जा संसाधन:
इस वर्ग में ऐसे संसाधन सम्मिलित हैं जिनका उपयोग मानव द्वारा कच्चे माल के रूप में या निर्माण उद्योगों में किया जाता है उन्हें गैर ऊर्जा संसाधन या खनिज संसाधन कहा जाता है। उदाहरण के लिए लोहा, सोना, चाँदी, जस्ता, ताँबा तथा एल्युमिनियम आदि।

उपयोग की सततता के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण: उपयोग की संततता के आधार पर संसाधनों को निम्नलिखित 2 वर्गों में रखा जाता है –

  • अनव्यकरणीय या समाप्य संसाधन
  • नव्यकरणीय या असमाप्य संसाधन

अनव्यकरणीय या समाप्य संसाधन:
इन्हें सीमित संसाधन भी कहा जाता है क्योंकि इन संसाधनों की पृथ्वी पर एक निश्चित मात्र उपलब्ध है जो प्रयोग करने के साथ-साथ कम होती जाती है। इन संसाधनों का एक बार उपयोग हो जाने के बाद इनकी पुनस्र्थापना नहीं की जा सकती। पुनस्र्थापन न होने के कारण इनके शीघ्र समाप्त होने की सम्भावना बनी रहती है इसी कारण इन्हें अनव्यकरणीय या समाप्य संसाधन भी कहा जाता है। जैसे-कोयला, पेट्रोलियम व लोहा आदि।

नव्यकरणीय या असमाप्य संसाधन:
इस वर्ग में सम्मिलित संसाधनों का एक बार उपयोग होने के बाद प्रकृति या मानव द्वारा इनका पुनस्र्थापन या नवीनीकरण किया जा सकता है। पुनस्र्थापन होने के कारण इनके भण्डार कभी समाप्त नहीं होते हैं। इसी कारण इन संसाधनों या नव्यकरणीय या असमाप्य या असीमित संसाधन कहा जाता है। उदाहरण के लिए वन, जल, वायु, मानव व पशु के अलावा पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा तथा ज्वारीय ऊर्जा संसाधन आदि।

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