RBSE Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 16 त्रिविम रसायन

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Rajasthan Board RBSE Class 12 Chemistry Chapter 16 त्रिविम रसायन

RBSE Class 12 Chemistry Chapter 16 अभ्यास प्रश्न

RBSE Class 12 Chemistry Chapter 16 बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न में से कौनसा त्रिविम समावयवता की श्रेणी में नहीं आता है?
(a) ज्यामितीय समावयवता
(b) संरूपण समावयवती
(c) क्रियात्मक समूह समावयवता
(d) प्रकाशित समावयवता

प्रश्न 2.
निम्न में से कौनसा यौगिक ज्यामितीय समावयवता प्रदर्शित नहीं करता है?
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प्रश्न 3.
प्रकाशित समावयवता के संदर्भ में कौनसा कथन सत्य
(a) अणु में सममिति अक्ष उपस्थित हो।
(b) अणु में सममिति जल उपस्थित हो।
(c) अणु में सममिति केन्द्र उपस्थित हो।
(d) उक्त में से कोई नहीं।

प्रश्न 4.
मीसो टार्टरिक अम्ल धुवण घूर्णकता प्रदर्शित नहीं करता है क्योंकि
(a) उसमें दो किरेल केन्द्र उपस्थित है।
(b) उसमें बाह्य प्रतिकार हो जाता है।
(c) उसमें सममिति तल विद्यमान है।
(d) उसमें एरिथ्रो रूप उपस्थित है।

प्रश्न 5.
निम्न में से कौनसा यौगिक प्रकाशित समावयवती प्रदर्शित नहीं करता है?
(a) ऐथिल ऐल्कोहॉल
(b) 2-ब्युटेनॉल
(c) 2-क्लोरो प्रोपेन
(d) लेक्टिक अम्ल

प्रश्न 6.
फिशर प्रक्षेपण सूत्र लिखने के लिए कौनसा कथन सत्य नहीं है?
(a) परस्पर काटती हुई दो लम्बवत रेखायें खींची जाती है।
(b) प्रथम क्रमांक वाला कार्बन बांयी ओर रखा जाता है।
(c) क्षैतिज तल के दोनों समूह ऊपर की ओर प्रक्षेपित होते हैं।
(d) अणु के तल को 180° से घुमाया जा सकता है।

प्रश्न 7.
सापेक्ष विन्यास के लिए संदर्भ के रूप में से किसे आधार बनाया गया?
(a) लेक्टिक अम्ल
(b) टार्टरिक अम्ल
(c) ग्लिसरेल्डिहाइड
(d) सोडियम पोटैशियम टार्टरेट को

प्रश्न 8.
रैसिमिक मिश्रण के वियोजन में निम्न में से कौनसी विधि प्रयुक्त नहीं की जा सकती है।
(a) जैव रासायनिक विधि
(b) यांत्रिक विधि
(c) प्रभाजी आसवन विधि
(d) कॉलम क्रोमेटोग्राफी विधि

प्रश्न 9.
संरूपण समावयवता के संदर्भ में कौनसा कथन सत्य नहीं
(a) न्यूमैन एवं सॉहार्स प्रक्षेपण सूत्रों से प्रदर्शित किये जा सकते है।
(b) संरूपीय समावयवियों की संख्या अनन्त होती है।
(c) ग्रसित संरूप सर्वाधिक स्थायी होता है।
(d) वलय तंत्रों में भी संरूपण समावयवता पायी जाती है।

प्रश्न 10.
विवरिम समावयवियों के संदर्भ में कौनसा कथन सत्य नहीं है।
(a) ये प्रकाशित ध्रुवण घूर्णकता प्रदर्शित करते हैं।
(b) इन समावयवियों के भौतिक गुणों में भिन्नता पायी जाती है।
(c) इनमें आन्तरिक प्रतिकार होता है।
(d) ये समतल ध्रुवित प्रकाश को प्रणित कर देते हैं।

उत्तरमाला:

1. (c)
2. (d)
3. (d)
4. (c)
5. (a)
6. (b)
7. (c)
8. (c)
9. (c)
10. (d)

RBSE Class 12 Chemistry Chapter 16 अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
समावयवता को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
समावयवता (Isomerism): वे यौगिक जिनके अणुसूत्र तो समान हों, लेकिन भौतिक व रासायनिक गुण भिन्न-भिन्न होते हैं। समावयवी कहलाते हैं तथा यह परिघटना समावयवता कहलाती है।

प्रश्न 2.
त्रिविम समावयवता से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
त्रिवित समावयवता (Sterio isomerism): वे यौगिक जिनमें विभिन्न परमाणुओं एवं समूहों की व्यवस्था तो समान हो, परन्तु उनकी आकाशीय व्यवस्थाएँ भिन्न-भिन्न हो, तो वे त्रिविम समावयव कहलाते हैं एवं ये परिघटना त्रिविम समावयवता कहलाती है।

प्रश्न 3.
प्रकाशिक सक्रियता क्या है?
उत्तर:
प्रकाशिक सक्रियता (Optical Activity): वे कार्बनिक यौगिक जो समतल धुव्रित प्रकाश के तल को बांयी तरफ या दांयी तरफ घुमा सकते हैं, प्रकाश सक्रिय यौगिक कहलाते हैं एवं यौगिक का यह गुण प्रकाशिक सक्रियता कहलाती है।

प्रश्न 4.
प्रकाशिक समावयवता के लिए क्या आवश्यक शर्ते हैं?
उत्तर:
प्रकाशिक सक्रिय यौगिकों के लिए निम्न आवश्यक शर्ते

  1. यौगिक में असममित कार्बन परमाणु अवश्य उपस्थित होना चाहिए। अर्थात् यौगिक में कार्बन से जुड़ने वाले सभी चारों परमाणु या समूह भिन्न-भिन्न होने चाहिए।
  2. अणु में किरेल अक्ष अवश्य उपस्थित होना चाहिए।
  3. अणु में किरेल तल की उपस्थिति भी अनिवार्य है।
  4. अणु में किसी भी प्रकार के सममिति के तत्व उपस्थित नहीं होने चाहिए।

प्रश्न 5.
सममिति के तत्व बताइये।
उत्तर:
सममिति के निम्न तत्व है

  1. सममिति तल
  2. सममिति अक्ष
  3. सममिति केन्द्र

प्रश्न 6.
मीसो रूप प्रकाशिक सक्रिय नहीं होता है, क्यों?
उत्तर:
मीसो यौगिकों में सममित तल होने के कारण ऊपरी व निचले हिस्सों के घूर्णन बराबर व विपरीत दिशा वाले होते हैं जिससे अन्तः संतुलन हो जाता है और यौगिक प्रकाशिक अघूर्णक हो जाता है। इस गुण को आन्तरिक प्रतिकार (Internal Compensation) कहते हैं।

प्रश्न 7.
रेसिमिकरण क्या है?
उत्तर:
दो प्रतिबिम्ब रूपों (d तथा l) के समान अनुपात में मिश्रण का ध्रुवण घूर्णन शून्य होगा, क्योंकि एक समावयवी के द्वारा उत्पन्न घूर्णन दूसरे के घूर्णन को निरस्त कर देगा। अतः इस प्रकार का मिश्रण रेसिमिक मिश्रण कहलाता है तथा प्रकाशिक यौगिक के d या l प्रतिबिम्ब समावयवियों को उनके प्रकाशिक अक्रिय रेसेमिक मिश्रण में परिवर्तित होने की परिघटना रेसिमिकरण कहलाती है।

RBSE Class 12 Chemistry Chapter 16 लघुउत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ध्रुवण घूर्णकता की परिभाषा लिखिए। उदाहरण सहित बताइये कि यह कैसे अणुओं से मिलती है?
उत्तर:
धुवण घूर्णकता-वे यौगिक जो कि समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को बांयी या दांयी तरफ घूर्णित कर देते हैं, ध्रुवण घूर्णक यौगिक कहलाते हैं तथा यौगिकों की चूर्णित करने की प्रवृत्ति ध्रुवण घूर्णकता कहलाती है। ध्रुवण घूर्णकता उन यौगिकों में पायी जाती है जिनमें असममित कार्बन परमाणु उपस्थित हो तथा उसमें किसी भी प्रकार का सममित तत्व उपस्थित न हो।
उदाहरणार्थ:
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प्रश्न 2.
1-ब्यूटेनॉल प्रकाशिक समावयवता नहीं दिखाता जबकि 2-ब्यूटेनॉल प्रदर्शित करता है, क्यों?
उत्तर:
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हम जानते हैं कि प्रकाशिक समावयवता केवल उन यौगिकों में पायी जाती है जिनमें असममित कार्बन परमाणु उपस्थित होता है। चूँकि 1-ब्यूटेनॉल में कोई भी असममित कार्बन परमाणु उपस्थित नहीं अतः यह प्रकाशिक समावयवता प्रदर्शित नहीं करता है। जबकि 2-ब्यूटेनॉल में एक असममित कार्बन परमाणु उपस्थित है। अतः यह प्रकाशिक समावयवता को प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 3.
प्रकाश सक्रियता के लिए आवश्यक शर्ते क्या है? प्रकाश सक्रिय अणुओं के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
प्रकाशिक सक्रिय यौगिकों के लिए निम्न आवश्यक शर्ते

  1. यौगिक में असममित कार्बन परमाणु अवश्य उपस्थित होना चाहिए। अर्थात् यौगिक में कार्बन से जुड़ने वाले सभी चारों परमाणु या समूह भिन्न-भिन्न होने चाहिए।
  2. अणु में किरेल अक्ष अवश्य उपस्थित होना चाहिए।
  3. अणु में किरेल तल की उपस्थिति भी अनिवार्य है।
  4. अणु में किसी भी प्रकार के सममिति के तत्व उपस्थित नहीं होने चाहिए।

प्रकाश सक्रिय यौगिकों के उदाहरण
(i) लेक्टिक अम्ल
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(ii) 2-ब्यूटेनॉल
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(iii) ग्लिसरेल्डिहाइड
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(iv) 2-ब्रोमो ब्यूटेन
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प्रश्न 4.
लेक्टिक अम्ल के दो प्रकाशिक समावयवेयों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
लेक्टिक अम्ल के दो प्रकाशिक समावयव-
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d-लैक्टिक अम्ल समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को दांयी तरफ घुमाता है जबकि l-लैक्टिक अम्ल समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को बांयी ओर घुमा देता है।

प्रश्न 5.
उपयुक्त उदाहरण देकर रेसिमिकरण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जब वाम ध्रुवण घूर्णक (l) या (-) तथा दक्षिण ध्रुवण घूर्णक (d) या (+) को समान अनुपात में मिलाते हैं, तो प्राप्त मिश्रण रेसिमिक मिश्रण कहलाता है तथा यह परिघटना रेसिमिकरण कहलाती है। रेसिमिकरण को निम्न तीन तरीकों से प्राप्त कर सकते हैं-

(i) गर्म करने से (By Simple Heating): इसको थर्मल रेसिमिकरण (Thermal Racemisation) कहते हैं। टार्टरिक अम्ल, लेक्टिक अम्ल आदि का रेसिमिक मिश्रण निम्न विधि के द्वारा प्राप्त हो जाता है।

(ii) स्वः रेसिमिकरण (Auto Racemisation): कमरे के ताप पर कुछ यौगिकों का स्वत: रेसेमिकरण हो जाता है, इसे स्वः रेसिमिकरण कहते हैं।
उदाहरणार्थ:
डाई मेथिल सक्सिनेट को कमरे के ताप पर स्वत: रेसिमिकरण हो जाता है।

(iii) रासायनिक रेसिमिकरण Chemical Racemisation): किसी रसायन के मिलाने पर जब रेसिमिक मिश्रण प्राप्त हो तो इसे रासायनिक रेसिमिकरण कहते हैं।
उदाहरणार्थ:
2-ब्यूटिलफेनिल कीटोन में जब अम्ल मिलाते हैं तो इसका रेसिमिक मिश्रण प्राप्त होता है। लैक्टिक अम्ल के थर्मल रेसिमिकरण को हम निम्न प्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं।
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प्रश्न 6.
उपयुक्त उदाहरण लेकर एरिथ्रो एवं थियो युग्म को समझइये।
उत्तर:
टार्टरिक अम्ल:
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जब दोनों किरेल कार्बन पर उपस्थित समान समूह (जैसे – OH) परस्पर विपरीत दिशाओं में उपस्थित हो तो ये थियो (Threo) रूप कहलाते हैं।
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जब दोनों किरेल कार्बन पर उपस्थित समान समूह (जैसे – OH) एक ही ओर उपस्थित हो तो ऐसे समावयव ऐरिथ्रो (Erythro) रूप कहलाते हैं।

प्रश्न 7.
निरपेक्ष विन्यास से आप क्या समझते हो?
उत्तर:
1950 में जब X-किरण क्रिस्टलोग्राफी तकनीक विकसित हुयी तब बिजवोयट ने यह पाया कि ग्लिसरेल्डिहाइड के जिस रूप को रोजेनॉफ द्वारा स्वेच्छा से D-विन्यास माना था वो वास्तव में ही D-विन्यास ही था। अन्य शब्दों में जिस विन्यास को अन्य यौगिकों की तुलना करने के लिए सापेक्ष विन्यास के रूप में मानक माना गया था वहीं उसका वास्तविक अर्थात् निरपेक्ष विन्यास था।
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प्रश्न 8.
संरूपण और विन्यास में अन्तर समझाइये।
उत्तर:
विन्यासी समावयवता (Configurational Isomerism): विन्यासी समावयवियों को एक दूसरे में परिवर्तित करने हेतु उच्च ऊर्जा की आवश्यकता होती हैं। क्योंकि इस प्रकार के प्ररिवर्तन में पुराने बन्ध टूटते हैं और फिर नये बन्ध बनते हैं। इसके लिए आवश्यक ऊर्जा का मान लगभग 100 k J mol-1 से अधिक होता है। विन्यासी समावयव कमरे के ताप पर एक दूसरे में परिवर्तित नहीं हो पाते हैं।

संरूपण समावयवता (Conformational Isomerism): संरूपण समावयवियों को एक दूसरे में परिवर्तन करने हेतु बहुत कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। क्योंकि ये समावयव कार्बन-कार्बन बन्ध के मुक्त घूर्णन के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं। यहाँ ऊर्जा का मान लगभग 3-15 k J mol-1 होता है। जो कि कमरे के ताप पर स्वतः उपलब्ध हो जाती है। यही कारण है ये समावयव कमरे के ताप पर आसानी से रूपान्तरित हो जाते हैं।

प्रश्न 9.
ज्यामितीय समावयवता से क्या तात्पर्य है? ज्यामितीय समावयवता की आवश्यक शर्ते लिखिये।
उत्तर:
ज्यामितीय समावयवता (Geometrical Isomerism): ऐसे यौगिक जिनमें प्रतिबन्धित घूर्णन के कारण भिन्न-भिन्न परमाणुओं या समूहों के त्रिविम में दो भिन्न-भिन्न विन्यास प्राप्त होते हैं। ज्यामितीय समावयव कहलाते हैं। तथा यह परिघटना ज्यामितीय समावयवता कहलाती है। जब दो समान समूह निबन्ध के एक ही दिशा में रहते हैं तो इसे समपक्ष समावयवी (cis-isomer) कहते हैं। जब दो समान समूह द्विबन्ध के दिशा में रहते हैं। तो इसे विपक्ष समावयवी (trans-isomer) कहते हैं।
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ज्यामितीय समावयवती प्रदर्शित करने की मुख्य शर्ते

(i) इनमें द्विबन्ध अर्थात् प्रतिबन्धित घूर्णन युक्त बन्ध की उपस्थिति अनिवार्य है।
(ii) प्रतिबन्धित घूर्णन युक्त बन्ध के दोनों ओर भिन्न-भिन्न प्रतिस्थापी होने चाहिए। यदि प्रतिस्थापी समान होगें तो ज्यामितीय समावयवता नहीं पायी जायेगी।
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ज्यामितीय समावयवंता नहीं पायी जायेगी। क्योंकि प्रतिस्थापियों की स्थितियों बदलने पर भी त्रिविम में वही विन्यास प्राप्त होता है, जो मूल यौगिक में है।

प्रश्न 10.
ऑक्सिम द्वारा प्रदर्शित त्रिविम-समावयवती का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ऑक्सीमो में ज्यामितीय समावयवता (Geometrical Isomerism in Oximes): ऐल्डिहाइड एवं कीटोन की क्रिया जब हॉइड्रॉक्सिलेमीन के साथ करवाते हैं तो क्रमशः ऐल्डोक्सिम एवं कीटोक्सिम प्राप्त होते हैं।
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यदि R1 = H तो ऐल्डिहाइड
चूँकि C = N बन्ध में C तथा N दोनों ही sp2 संकरित है एवं C व N के मध्य द्विबन्ध उपस्थित है तो मुक्त घूर्णन सम्भव नहीं है।
यहाँ ऑक्सी में, यदि N परमाणु पर उपस्थित -OH समूह यदि कार्बन पर स्थित हाइड्रोजन या झेटे समूह की ओर स्थित हो तो यह स्थिति ‘सिन (syn)’ कहलाती है। यदि यह स्थिति विपरीत हो तो यह स्थिति ‘एन्टी (anty)’ कहलाती है।

उदाहरण:
(a) एसीटेल्डॉक्सिम (CH3CH=NOH)
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(b) बेन्जेल्डॉक्सिम (C6H5CH=NOH)
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(c) ऐसीटोफीनोन ऑक्सिम [(CH6(CH3)C=NOH]
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प्रश्न 11.
संरूपण क्या है? ऐथेन के विभिन्न संरूपणों के न्यूमैन प्रक्षेप बनाइये।
उत्तर:
ऐथेन के संरूपण (Conformers of Ethane): ऐथेन में दस sp3 संकरित कार्बन परस्पर σ बन्ध से बन्धित होते हैं जोकि मुक्त घूर्णन से विभिन्न संरूपण व्यवस्थाएँ प्राप्त होती है। इनके असंख्य संरूपण बनते हैं। परन्तु मुख्य निम्न हैं-

(i) ग्रसित संरूपण (Eclipsed Conformation): यदि ऐथेन के संरूपण का उदाहरण लें तो ग्रसित संरूपण में कार्बन के तीनों हाइड्रोजन परमाणु दूसरे कार्बन के तीनों हाइड्रोजन परमाणुओं को ग्रसित करते हैं अर्थात् इसमें द्वितल कोण 0° होता है। संरूपण का यह रूप कम स्थाई होता है।

(ii) सांतरित संरूपण (Staggered Conformation): सांतरित संरूपण में एक कार्बन का हाइड्रोजन परमाणु दूसरे कार्बन के दो हाइड्रोजन परमाणुओं के मध्य वाली सीध में स्थित रहता है। ऐसे सांतरित संरूपणों में दोनों कार्बन परमाणुओं के हाइड्रोजन के मध्य ग्रसित संरूपण की तुलना में अधिक दूरी रहती है।

इसके अतिरिक्त कोई भी मध्यवर्ती संरूपण विषमतलीय (Skew) संरूपण कहलाता है। सभी संरूपणों में कोण तथा लम्बाई समान होती है। इन्हें सॉहार्स तथा न्यूमैन प्रक्षेपण द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

ऐथेन का न्यूमैन प्रक्षेपण सूत्र (Newman Projection Formula of Ethane): इसमें अणु को सामने से देखा जाता है। आँख के पास वाले कार्बन को एक बिन्दु द्वारा दिखाया जाता है और उससे जुड़े तीन हाइड्रोजन परमाणुओं को 120° कोण पर खींची तीन रेखाओं के सिरों पर लिखकर प्रदर्शित करते हैं। पीछे वाला अर्थात् आँख से दूर वाले कार्बन को वृत्त द्वारा दिखाते हैं तथा आबन्धित हाइड्रोजन परमाणुओं को वृत्त की परिधि से परस्पर 120° के कोण पर स्थित तीन छोटी रेखाओं से जुड़े हुए दिखाया जाता है।
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प्रश्न 12.
प्रतिबिम्न रूपों के वियोजन की लवण निर्माण विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रासायनिक विधियाँ (Chemical Methods): रेसिमिक मिश्रण के वियोजन के लिए सबसे अधिक प्रयुक्त होने वाली विधि यही है। यह इस सिद्धान्त पर आधारित है कि प्रतिबिम्ब समावयवियों (Enentiomers) के भौतिक गुण पूर्णतः समान, परन्तु विवरिम समावयवियों या अप्रतिबिम्ब समावयव (Distereoisomers) के भौतिक गुण भिन्न-भिन्न होते हैं। अतः हम उन्हें सरलतापूर्वक प्रथक् कर सकते हैं।

इस विधि में रेसेमिक अम्ल को ध्रुवण घूर्णक वेस के साथ मिलाकर लवण बनाते हैं जो प्रतिबिम्ब समावयवियों को परस्पर विवरिम समावयवियों में रूपान्तरित कर देते हैं। प्राप्त विवरिम समावयवियों को भौतिक विधियों जैसे प्रभावी क्रिस्टलीय, आसवन, विलेयता के द्वारा पृथक् कर लिया जाता है। इनमें से मूल प्रतिबिम्ब समावयवों को जल अपघटन के द्वारा पुनः प्राप्त कर लिया जाता हैं।
पृथककरण की विधि निम्न प्रकार से हैं-
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RBSE Class 12 Chemistry Chapter 16 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
टार्टरिक अम्ल के प्रकाशिक समावयवता की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
टार्टरिक अम्ल में दो किरैल कार्बन पाये जाते हैं। इसके समावयव निम्न प्रकार हैं।
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आन्तरिक प्रतिकार (Internal Compensation): टार्टरिक अम्ल के ऐरिथ्रो युग्म (III) व (IV) को मेसो टार्टरिक अम्ल (Meso Tartric Acid) कहते हैं। इसमें आधा भाग वामध्रुवण घूर्णक (dextrorotatory) ‘d’ और शेष आधा भाग विक्षण ध्रुवण घूर्णक (laeveorotatory) ‘l’ होता है। इस कारण समतल ध्रुवित प्रकाश (Monochromatic light) तल में परिणामी विस्थापन शून्य हो जाता है, क्योंकि मेसो टार्टरिक अम्ल का ‘d’ भाग प्रकाश के तल को जितनी दायीं ओर घुमाता है, पुनः इसका भाग प्रकाश के तल को उतना ही बायीं ओर घुमा देता है। फलस्वरूप प्रकाश का तल अपरिवर्तित हो जाता है। यह प्रक्रिया ‘आन्तरिक प्रतिकार (Internal Compensation)’ कहलाती है। इसमें यौगिक का एक काइरल केन्द्र दूसरे काइरल केन्द्र के घूर्णन कोण को पूर्णत: समायोजित कर देता है, जिससे स्पष्ट होता है कि ऐसे अणु में काइरल केन्द्र होते हुए भी प्रकाशिक सक्रियता उपस्थित नहीं होती है।
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आणविक किरेलता (Molecular Chirality): कुछ अणु ऐसे भी होते हैं जिनमें काइरल केन्द्र उपस्थित नहीं होता है फिर भी वे प्रकाशिक सक्रियता प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरणार्थ:

  1. ऐलीन्स (Allenes)
  2. वाइफेनिल्स (Biphenyls) इत्यादि।

इन यौगिकों का प्रकाशिक सक्रियता प्रदर्शित करने का मुख्य कारण इनमें किसी भी प्रकार के सममिति तत्त्व का उपस्थित न होना है। चूंकि इनमें कोई भी समिमिति तत्त्व उपस्थित नहीं होते हैं तो इन अणुओं के दर्पण प्रतिबिम्ब परस्पर अध्यारोपित नहीं हो पाते हैं और आणविक किरेलता को प्रदर्शित करते है।

प्रश्न 2.
दर्पण अप्रतिबिम्ब विवरिम समावयवता को उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
वे प्रकाशिक समावयी यौगिक जो कि एक दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब नहीं होते हैं, अप्रतिबिम्ब समावयवी कहलाते हैं। इनको विविरम समावयवी भी कहा जाता है। यह परिघटना विवरिम समावयवता कहलाती है।
इनके गुण निम्न प्रकार से है।

  1. ये एक-दूसरे पर अध्यारोपित नहीं किये जा सकते हैं।
  2. विवरिम समावयवता केवल यौगिकों में ही पायी जाती हैं जिनमें कम से कम दो किरैल कार्बन केन्द्र उपस्थित हो।
  3. किसी भी योगिकों के अप्रतिबिम्ब या विवरिम समावयवियों के भौतिक गुणधर्म जैसे गलनांक, क्वथनांक, विलेयता, विशिष्ट घूर्णन इत्यादि भिन्न-भिन्न होते हैं।

अतः इन्हें आसानी से प्रभाजी आसवन, प्रभाजी क्रिस्टलन तथा क्रोमेटोग्राफिक विधियों के द्वारा पृथक किया जा सकता है।
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यहाँ पर (I) और (II), (I) और (IV), (II) और (II) और (III) तथा (II) और (IV) आपस में विवरिम समावयव है। यहाँ इनके भोतिक गुणों में भिन्नता है।

प्रश्न 3.
त्रिविम समावयवता को समझाइये? टार्टरिक अम्ल की त्रिविध समावयवता की विवेचना कीजिए तथा उसके सभी संरचना सूत्र, लिखिए। समझाइये कि टार्टरिक अम्ल जब भी संश्लेषित किया जाता है। जी ही धुवा अधूर्णक होता है।
उत्तर:
त्रिविम समावयवता (Stereo Isomerism)
जब समावयवी यौगिकों की संरचना समान होती है, परन्तु उनमें विद्यमान समूहों या परमाणुओं की आकाशी व्यवस्था (Spacial Arrangement) भिन्न-भिन्न होती है तो ऐसे यौगिक एक-दूसरे के त्रिविम समावयवी यौगिक कहलाते हैं और उनके इस गुण को त्रिविम समावयवता कहते हैं; अत: त्रिविम समावयवियों के अणुसूत्र तथा संरचना सूत्र समान होते हैं, परन्तु उनके विन्यास भिन्न-भिन्न होते हैं। शिविम समावयवता मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है।
(1) विन्यासी समावयवता (Configurational Isormerism)
(2) संपीय समावयवता (Conformational Isomerism)

(1) विन्यासी समावयवता (Configurational Isomerism)
विन्यासी समावयवता का प्रमुख गुण यह है कि विन्यासी समावयवियों को एक-दूसरे में परिवर्तित करने के लिए अति उच्च रासायनिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है क्योंकि इस स्थिति में परिवर्तन के दौरान पुराने बन्ध टूटते हैं जबकि नये बन्धों का निर्माण होता है। इसके लिए आवश्यक ऊर्जा का मान लगभग 100 kJ / mol से अधिक होता है।

(2) संपीय समावयवता (Conformational Isomerism)
संरूपीय समावयवियों को एक-दूसरे में परिवर्तित करने के लिए अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती है। ये कमरे के ताप पर ही एक-दूसरे में रूपान्तरित हो जाते हैं अर्थात् परिवर्तन के लिए आवश्यक ऊर्जा वातावरण में ही उपलब्ध हो जाती है। इसी कारण कमरे के ताप पर हम संरूपीय समावयवियों को विलगित नहीं कर सकते हैं।

टार्टरिक अम्ल में दो किरैल कार्बन पाये जाते हैं। इसके समावयव निम्न प्रकार हैं।
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आन्तरिक प्रतिकार (Internal Compensation): टार्टरिक अम्ल के ऐरिथ्रो युग्म (III) व (IV) को मेसो टार्टरिक अम्ल (Meso Tartric Acid) कहते हैं। इसमें आधा भाग वामध्रुवण घूर्णक (dextrorotatory) ‘d’ और शेष आधा भाग विक्षण ध्रुवण घूर्णक (laeveorotatory) ‘l’ होता है। इस कारण समतल ध्रुवित प्रकाश (Monochromatic light) तल में परिणामी विस्थापन शून्य हो जाता है, क्योंकि मेसो टार्टरिक अम्ल का ‘d’ भाग प्रकाश के तल को जितनी दायीं ओर घुमाता है, पुनः इसका भाग प्रकाश के तल को उतना ही बायीं ओर घुमा देता है। फलस्वरूप प्रकाश का तल अपरिवर्तित हो जाता है। यह प्रक्रिया ‘आन्तरिक प्रतिकार (Internal Compensation)’ कहलाती है। इसमें यौगिक का एक काइरल केन्द्र दूसरे काइरल केन्द्र के घूर्णन कोण को पूर्णत: समायोजित कर देता है, जिससे स्पष्ट होता है कि ऐसे अणु में काइरल केन्द्र होते हुए भी प्रकाशिक सक्रियता उपस्थित नहीं होती है।
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प्रश्न 4.
प्रकाशिक समावयवता से आप क्या समझते हैं? दो सममित कार्बन परमाणु वाले यौगिकों में प्रकाशिक समावयवता की विवेचना कीजिए?
उत्तर:
प्रकाशिक समावयवता (Optical Isomerism)
प्रकाशिक समावयवता की संकल्पना सर्वप्रथम 1848 में लुई पॉश्चर (Lauis Pasteur) ने की थी। इन्होंने पाया कि सोडियम अमोनियम टार्टरेट दो प्रकार के क्रिस्टलें में पाया जाता है। दोनों एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब (Mirror Image) स्वरूप दिखाई देते हैं।
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लुई पॉश्चर ने क्रिस्टलों को चुन-चुनकर अलग किया और बाद में X-किरण विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि ये क्रिस्टल एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब थे, जो परस्पर आध्यारोपित (Super-impose) नहीं किए जा सकते हैं। ऐसे यौगिक समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को घूर्णित कर देते हैं। अतः इन्हें प्रकाशीय समावयव कहते हैं तथा इस गुण को प्रकाशीय समावयवता (Optical Isomerism) कहते हैं। ऐसे यौगिक जो समतल ध्रुवित प्रकाश के तल घूर्णित कर देते हैं, ध्रुवण घूर्णक यौगिक कहलाते हैं और घूर्णित करने की इस प्रवृत्ति को ध्रुवणघूर्णकता कहते हैं।

एक समावयव समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को दायीं ओर घड़ी की सुई की दिशा में घूर्णित कर देता है, उसे दक्षिणावर्ती समावयव (Dextro-rotatory Isomer) कहते हैं। इसके विपरीत जो समावयव तल को बार्थी ओर घूर्णित कर देता है उसे वामध्रुवण घूर्णक (laevo-rotatory) कहते हैं। दक्षिण ध्रुवण धूर्णक को α (Dextro rotatory) या (+) से प्रदर्शित करते हैं, जबकि वामध्रुवण घूर्णक को l (Laevo-rotatory) या (-) से प्रदर्शित किया जाता है।
उदाहरणार्थ:
d-लैक्टिक एसिड एवं -लैक्टिक एसिड।
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यह समावयवता उन कार्बनिक यौगिकों में पायी जाती है, जिनमें असममित (Asymmetric) कार्बन परमाणु विद्यमान हों। लैक्टिक अम्ल के अतिरिक्त टार्टरिक अम्ल जैसे यौगिकों में भी यह गुण विद्यमान होता है।

दो काइरल केन्द्र युक्त यौगिक (Compounds with Two Stereogenic Centres)
जब किसी यौगिक में दो काइरल केन्द्र उपस्थित होते हैं तो उनमें दो परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है। ये परिस्थितियाँ निम्न हैं-
(a) दोनों काइरल केन्द्रों पर असमान समूह या परमाणु हो।
(b) दोनों काइरल केन्द्रों पर समान समूह या परमाणु हो।

(a) जब दोनों काइरल केन्द्रों पर असमान समूह या परमाणु हो
यदि इस प्रकार के यौगिकों में n काइरल केन्द्र उपस्थित होते हैं तो उनमें उपस्थित प्रकाशिक समावयवियों कीसंख्या 2n होती है।
उदाहरणार्थ:
2, 3-डाइक्लोरो-ब्यूटेनोइक अम्ल में दो काइरल केन्द्र उपस्थित होते हैं। इन पर असमान समूह होते हैं। यहाँ पर प्रकाशिक समावयवियों की कुल संख्या (2)n = (2)2 = 4 होती है। इन समावयवियों को निम्न प्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं
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उपरोक्त दिए गए चित्र में संरचना I व II परस्पर व संरचना III व IV परस्पर दर्पण प्रतिबिम्ब है। अतः ये आपस में प्रतिबिम्ब समावयवी (Enentiomers) कहलाते हैं। वहीं दूसरी मोर I संरचना III व IV में से किसी का भी दर्पण प्रतिबिम्ब नहीं है। इसी प्रकार II संरचना भी III व IV में से किसी का भी दर्पण प्रतिबिम्ब नहीं है।

अत: किसी यौगिक के वे प्रकाशिक समावयव जो परस्पर दर्पण प्रतिबिम्ब नहीं हो विवरिम समावयव कहलाते हैं। हब लानते हैं कि किसी भी थौगिक के प्रकाशिक समावयवियों के भौतिक एवं रासायनिक गुणधर्म पूर्णरूप से समान होते हैं, परन्तु किसी यौगिक के विवरिम समावयवियों के साथनिक गुणधर्म तो समान होते हैं, परन्तु भौतिक गुणधर्मों में भिन्नता पायी जाती है जिससे उनका वियोजन आसान हो जाता है।

(b) दोनों काइरल केन्द्रों पर समान समूह या परमाणु हो
इस प्रकार के उदाहरण के भी (2)= (22) = 4 प्रकाशिक समावयव हुने चाहिए। यहाँ इसका उदाहरण टार्टरिक अम्ल है।
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टार्टरिक अम्ल में दो किरैल कार्बन पाये जाते हैं। इसके समावयव निम्न प्रकार हैं।
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प्रश्न 5.
टार्टरिक अम्ल में त्रिविम समावयवा को समझाइये। टार्टरिक अम्ल के कितने प्रकाशिक समावयव सम्भव है? मेसो रेसिमिक टार्टरिक अम्ल में क्या अन्तर है।
उत्तर:
टार्टरिक अम्ल: इसमें दो असममित C* परमाणु होते हैं। इसके चार समावयव होते हैं।

(i) d (+) टार्टरिक अम्ल: दोनों ही असममित C-परमाणु धूषित प्रकाश के तल को दक्षिण की ओर घुमा देते हैं।
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(ii) l (-) टार्टरिक अम्ल: दोनों असममित कार्बन परमाणु धुवित प्रकाश को बार्गी ओर घुमा देते हैं।
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(iii) रेसेमिक टार्टरिक अम्ल या (dl) टार्टरिक अम्ल: इसमें d तथा l अम्लों की समान मात्राएँ होती है। अतः आन्तरिक प्रतिकार (Internal Compensation) से अचूर्णक होने के कारण इन्हें d तथा l में विभाजित नहीं कर सकते हैं।
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(iv) मीसो टार्टरिक अम्ल: इसमें एक असममित C-परमाणु ध्रुवित प्रकाश को तल के बायीं ओर घुमाता है तथा दूसरा असममित C-परमाणु ध्रुवित प्रकाश के तल को दार्थी ओर घुमाता हैं। अतः पूर्ण अणु ध्रुवण अघूर्णक बन जाता है। इसे भी d (+) तथा l (-) में वियोजित नहीं किया जा सकता है।
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टार्टरिक अम्ल के कुल दो प्रकाशिक समावयव ही पाये जाते हैं।
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मेसो टार्टरिक अम्ल व रेसेमिक टार्टरिक अम्ल प्रकाशिक अक्रिय होते हैं।
मेसो टार्टरिक अम्ल:
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मेसो टार्टरिक अम्ल मेसो टार्टरिक अम्ल में सममिति तल की उपस्थिति इसे प्रकाशिक अक्रिया बना देती है। क्योंकि यौगिक का आधा भाग समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को बांयी तरफ घुमा देता है जिस कारण यौगिक प्रकाशिक अक्रिय हो जाता है। इस प्रकार को आन्तरिक प्रतिकार (Internal Compensation) कहते हैं।
रेसेमिक टार्टरिक अम्ल:
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रेसेमिक टार्टरिक अम्ल में 50% d-टार्टरिक अम्ल तथा 50% l-टार्टरिक अम्ल अपस्थित होता है। ये भी प्रकाशिक अक्रिय होता है। क्योंकि आधा भाग प्रकाश के तल को जितना घूर्णित करता है। उतना ही शेष आधा भाग पुनः विपरीत दिशा में घूर्णित कर देता है। इस प्रकार आधा भागश शेष आधे भाग के द्वारा समायोजित होकर ध्रुवण अघूर्णक बन जाता है। यह वाह्य प्रतिकार (External compensation) कहलाता है।
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प्रश्न 6.
ज्यामितीय यौगिकों के भौतिक गुण भिन्न-भिन्न होते हैं। किन्तु प्रकोशिक समावयवों के भौतिक गुण एक से होते हैं कारण सहित समड़ाइये।
उत्तर:
ज्यामितीय यौगिकों के भौतिक गुण भिन्न-भिन्न होते हैं। जबकि प्रकाशिक समावयवों के भौतक गुण एक समान होते हैं। इसके निम्न कारण है।

  1. ज्यामितीय समावयवियों अर्थात् इसके समपक्ष व विपक्ष रूपों के द्विध्रुव आघूर्ण के मान भिन्न-भिन्न होते हैं जबकि प्रकाशिक समावयवियों के द्विध्रुव आघूर्गों के मान समान होते हैं।
  2. ज्यामिति समावयवियों के विपक्ष समावयव, समपक्ष समावयवियों की तुलना में अधिक स्थायी होते हैं। जबकि प्रकाशिक समावयवियों का स्थायित्व समान होता है।
  3. ज्यामितीय समावयवियों के गलनांक वे क्वथगंक के मान द्विध्रुव आघूर्गों के मान में मिलता होने के कारण भिन्न-भिन्न होते हैं। जबकि प्रकाशिक समावयवियों में ये मान समान द्विध्रुव आघूर्ण होने के कारण समान होते हैं।

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