RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 वाष्पोत्सर्जन व बिन्दुस्राव

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Rajasthan Board RBSE Class 12 Biology Chapter 7 वाष्पोत्सर्जन व बिन्दुस्राव

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न किस अंग से वाष्पोत्सर्जन नहीं होता है?
(अ) पत्ती
(ब) तना
(स) जड़
(द) कच्चे फल

प्रश्न 2.
सर्वाधिक मात्रा में वाष्पोत्सर्जन होता है –
(अ) रंध्रों से
(ब) वातरंध्रों से
(स) जलरंध्रों से
(द) सभी से

प्रश्न 3.
जलरंध्र पाये जाते हैं –
(अ) पर्ण तट पर
(ब) पत्ती की ऊपरी सतह पर
(स) पत्ती की निचली सतह पर
(द) छाल में

प्रश्न 4.
पौधों में बिन्दुस्राव की क्रिया में निकलने वाला द्रव होता है –
(अ) शुद्ध जल
(ब) केवल उत्सर्जी पदार्थ
(स) जल व CO2
(द) जल के साथ कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थ।
उत्तरमाला
1. (स)
2. (अ)
3. (अ)
4. (द)

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वाष्पोत्सर्जन कितने प्रकार का होता है? नाम लिखिए।
उत्तर
वाष्पोत्सर्जन तीन प्रकार का होता है –

  • रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Stomatal transpiration)
  • उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन (Cuticular transpiration)
  • वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Lenticular transpiration)

प्रश्न 2.
सर्वाधिक वाष्पोत्सर्जन किस क्रिया से कितनी होती है?
उत्तर
सर्वाधिक वाष्पोत्सर्जन रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Stomotal transpiration) द्वारा होता है। इस विधि द्वारा वाष्पोत्सर्जन की कुल मात्रा का 50-97% भाग वाष्पोत्सर्जित होता है।

प्रश्न 3.
द्वार कोशिकाओं की आकृति कैसी होती है?
उत्तर
द्वार कोशिकाओं की आकृति वृक्काकार (Kidney shaped) होती है।

प्रश्न 4.
सक्रिय K+ आयन सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया?
उत्तर
सक्रिय K+ आयन सिद्धान्त जापानी वैज्ञानिक इमामुरा तथा फ्जूजीनों ने 1959 में प्रतिपादित किया तथा लेविट (1974) ने रूपान्तरित किया था।

प्रश्न 5.
वाष्पोत्सर्जन का कोई एक लाभ बताइए।
उत्तर
वाष्पोत्सर्जन द्वारा खनिज लवणों वे जल को अवशोषण तथा स्थानान्तरण होता है।

प्रश्न 6.
स्टोमेटा के खुलने के समय द्वार कोशिकाओं की स्थिति क्या होती है?
उत्तर
स्टोमेटा के खुलने के समय द्वार कोशिकाएँ स्फीति अवस्था (Turgid condition) में होती हैं।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वाष्पोत्सर्जन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) – “जीवित पादपों के वायवीय भागों (Aerial parts) द्वारा जल का वाष्पित होना वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) कहलाता है। यह तीन प्रकार का होता है –

  • रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Stomatal transpiration)
  • उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन (Cuticular transpiration)
  • वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Lenticular transpiration)

प्रश्न 2.
बिन्दुस्राव की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
बिन्दुस्राव (Guttation) – पत्तियों के उपान्तों (Margins) से जल का छोटी-छोटी बूंदों के रूप में स्राव (Secretion) बिन्दुस्राव (Guttation) कहलाता है। आलू, अरबी, ब्रायोफिल्लम, कुछ घासों आदि अनेक पौधों की पत्तियों में सुबह के समय बिन्दुस्राव स्पष्ट दिखायी देता है।

प्रश्न 3.
रन्ध्र उपकरण का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर

प्रश्न 4.
वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले एक बाह्य कारक को वर्णन कीजिए
उत्तर

  1. प्रकाश (Light) – प्रकाश वाष्पोत्सर्जन को प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में प्रभावित करता है। प्रकाश की उपस्थिति में रन्ध्र खुलते हैं व अप्रत्यक्ष रूप में ताप वृद्धि से वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।
  2. वायु (Wind) – वायु के तीव्र प्रवाह से पत्ती के आसपास की नमी विस्थापित हो जाती है। तथा शुष्क वायु उसके सम्पर्क में आती है। इसके परिणामस्वरूप तीव्र वायु में वाष्पोत्सर्जन की गति बढ़ जाती है।
  3. प्राप्य मृदा जल (Available soil water) – वाष्पोत्सर्जन की दर मृदा में उपस्थित प्राप्य जल की मात्रा पर निर्भर करती है। मृदा में प्राप्य जल की कम उपलब्धता होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर घट जाती है।
  4. तापमान (Temperature) – तापमान वृद्धि से वायुमण्डल की आपेक्षिक आर्द्रता घट जाती है जिसके परिणामस्वरूप वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वाष्पोत्सर्जन के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
वाष्पोत्सर्जन की क्रिया पादप के सभी वायवीय भागों से होती है। वाष्पोत्सर्जन मुख्यत: तीन प्रकार का होता है –

  1. रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Stomatal Transpiration) – पत्तियों की सतह पर उपस्थित रन्ध्रों द्वारा होने वाला वाष्पोत्सर्जन रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Stomatal transpiration) कहलाता है। वाष्पोत्सर्जन की कुल मात्रा का 50-97% भाग इसी विधि द्वारा होता है।
  2. उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन (Cuticular transpiration) – अधिकांश मरुभिद् (Xerophytes) पौधों की पत्तियाँ उपत्वचा (Cuticle) से ढकी रहती हैं। क्यूटिकिल सामान्यतः जल के प्रति अपारगम्य होती है। यह कुछ स्थानों पर बहुत पतली अथवा टूटी हुयी होती है जहाँ से जल वाष्प की अल्पमात्रा की हानि होती है। इस प्रकार होने वाले वाष्पोत्सर्जन को उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन (Cuticular transpiration) कहते हैं। इस विधि से वाष्पोत्सर्जन की कुल मात्रा को 3-10% वाष्पोत्सर्जन होता है।
  3. वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Lenticular transpiration) – काष्ठीय स्तम्भों व कुछ फलों की सतह पर छोटे-छोटे छिद्र पाए जाते हैं जिन्हें वातरन्ध्र (Lenticels) कहते हैं। कुछ वातावरणीय दशाओं में वातरन्ध्रों से जल की वाष्प के रूप में हानि होती है। इसे वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Lenticular transpiration) कहते हैं। यह कुल वाष्पोत्सर्जन का केवल 0.1% होता है।

प्रश्न 2.
स्टोमेटा के खुलने एवं बन्द होने की क्रियाविधि समझाइए।
उत्तर
अधिकांश पादपों में रन्ध्र दो वृक्काकार कोशिकाओं से बना होता है। जिन्हें द्वार कोशिकाएँ (Guard cells) कहते हैं। द्वार कोशिकाएँ इस प्रकार व्यवस्थित होती हैं कि इनके बीच एक छिद्र बनता है जिसे रन्ध्रीय छिद्र (Stomotal pore) कहते हैं। द्वार कोशिकाओं की भीतरी भित्तियाँ जो रन्ध्रीय छिद्र की ओर होती है मोटी तथा बाहर की भित्तियाँ पतली होती हैं जिसके परिणामस्वरूप जब द्वार कोशिकाएँ स्फीति दशा में होती हैं या फूली हुयी (Turgid) होती हैं तो रन्ध्र खुल जाते हैं तथा श्लथ या पिचकी (Flaccid) होने पर रन्ध्र बन्द हो जाते हैं। स्फीति दशा में द्वार कोशिकाओं की बाह्य पतली भित्ति फूलकर बाहर की ओर काफी खिंच जाती है। इससे भीतरी मोटी भित्ति भी थोड़ी बाहर खिंचकर रन्ध्र को खोल देती है। स्लथ स्थिति में द्वार कोशिकाएँ पूर्ववत होकर रन्ध्र को बन्द कर देती हैं।
द्वार कोशिकाओं के चारों ओर स्थित कोशिकाएँ बाह्यत्वचा की अन्य कोशिकाओं से भिन्न होती हैं। इन्हें सहायक कोशिकाएँ (Subsidiary cells) कहते हैं। पत्तियों में रन्ध्रों की संख्या प्रति वर्ग सेमी 100 से 60,000 तक होती है।

प्रश्न 3.
रन्ध्र गति से सम्बन्धित मान्य सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।
उत्तर
रन्ध्र गति से सम्बन्धित सर्वाधिक मान्य सिद्धान्त सक्रिय पोटैशियम आयने स्थानान्तरण सिद्धान्त है।
अधिकांश पादपों में रन्ध्र दो वृक्काकार कोशिकाओं से बना होता है। जिन्हें द्वार कोशिकाएँ (Guard cells) कहते हैं। द्वार कोशिकाएँ इस प्रकार व्यवस्थित होती हैं कि इनके बीच एक छिद्र बनता है जिसे रन्ध्रीय छिद्र (Stomotal pore) कहते हैं। द्वार कोशिकाओं की भीतरी भित्तियाँ जो रन्ध्रीय छिद्र की ओर होती है मोटी तथा बाहर की भित्तियाँ पतली होती हैं जिसके परिणामस्वरूप जब द्वार कोशिकाएँ स्फीति दशा में होती हैं या फूली हुयी (Turgid) होती हैं तो रन्ध्र खुल जाते हैं तथा श्लथ या पिचकी (Flaccid) होने पर रन्ध्र बन्द हो जाते हैं। स्फीति दशा में द्वार कोशिकाओं की बाह्य पतली भित्ति फूलकर बाहर की ओर काफी खिंच जाती है। इससे भीतरी मोटी भित्ति भी थोड़ी बाहर खिंचकर रन्ध्र को खोल देती है। स्लथ स्थिति में द्वार कोशिकाएँ पूर्ववत होकर रन्ध्र को बन्द कर देती हैं।
द्वार कोशिकाओं के चारों ओर स्थित कोशिकाएँ बाह्यत्वचा की अन्य कोशिकाओं से भिन्न होती हैं। इन्हें सहायक कोशिकाएँ (Subsidiary cells) कहते हैं। पत्तियों में रन्ध्रों की संख्या प्रति वर्ग सेमी 100 से 60,000 तक होती है।

प्रश्न 4.
‘वाष्पोत्सर्जन एक आवश्यक बुराई है।’ इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
वैज्ञानिकों के विचार से वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया एक आवश्यक बुराई (Necessary evil) है।
वाष्पोत्सर्जन से पौधों को निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. पौधों में रसारोहण (Ascent of sap) की क्रिया वाष्पोत्सर्जन अपकर्षण पर निर्भर करती है।
  2. पौधों में वाष्पोत्सर्जन द्वारा जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण तथा स्थानान्तरण होता है।
  3. वाष्पोत्सर्जन पत्ती के तापमान को कम रखता है।
  4. वाष्पोत्सर्जन द्वारा पौधे से अतिरिक्त जल का निष्कासन होता है।
  5. वाष्पोत्सर्जन द्वारा फलों में शर्करा की वृद्धि होती है।

वाष्पोत्सर्जन से पौधों को निम्नलिखित हानियाँ हैं –

  1. वाष्पोत्सर्जन द्वारा पौधे द्वारा अवशोषित जल का 98% भाग जलवाष्प के रूप में उड़ जाता है।
  2. वाष्पोत्सर्जन से कभी-कभी मृदा में जल की कमी हो जाती है।
  3. जल की कमी की स्थिति में एब्सिसिके अम्ल (ABA) का उत्पादन होता है जिसके प्रभाव से पादप की पत्तियाँ, फल व फूल समय से पहले गिरने लगते हैं।

अतः वाष्पोत्सर्जन पौधों के लिए एक आवश्यक बुराई (Necessary evil) है।

प्रश्न 5.
वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
वाष्पोत्सर्जन क्रिया अनेक कारकों से प्रभावित होती है। इन कारकों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है –
I. बाह्य कारक (External factors)
II. आन्तरिक कारक (Internal factors)
I. बाह्य कारक (External factors)

  1. प्रकाश (Light) – प्रकाश वाष्पोत्सर्जन को प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में प्रभावित करता है। प्रकाश की उपस्थिति में रन्ध्र खुलते हैं व अप्रत्यक्ष रूप में ताप वृद्धि से वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।
  2. वायु (Wind) – वायु के तीव्र प्रवाह से पत्ती के आसपास की नमी विस्थापित हो जाती है। तथा शुष्क वायु उसके सम्पर्क में आती है। इसके परिणामस्वरूप तीव्र वायु में वाष्पोत्सर्जन की गति बढ़ जाती है।
  3. प्राप्य मृदा जल (Available soil water) – वाष्पोत्सर्जन की दर मृदा में उपस्थित प्राप्य जल की मात्रा पर निर्भर करती है। मृदा में प्राप्य जल की कम उपलब्धता होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर घट जाती है।
  4. तापमान (Temperature) – तापमान वृद्धि से वायुमण्डल की आपेक्षिक आर्द्रता घट जाती है जिसके परिणामस्वरूप वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।

II. आन्तरिक कारक (Internal factors)

  1. पत्ती की संरचना (Leaf structure) – पत्ती की संरचना वाष्पोत्सर्जन की दर को प्रभावित करती है। शुष्क जलवायु में उगने वाले पौधों की पत्तियों की बाह्य त्वचा उपचर्म (Cuticle), मोम (Wax) या रोमों (Hairs) से हँकी रहती है तथा रन्ध्र निमग्न (Sunken stomata) होते हैं। ये लक्षण वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करते हैं। पत्ती के प्रति इकाई क्षेत्र में रन्ध्रों की संख्या या आवृत्ति (Fregneucy) से
    वाष्पोत्सर्जन की दर प्रभावित होती हैं।
  2. मूल प्ररोह अनुपात (Root shoot ratio) – मूल-प्ररोह अनुपात में वृद्धि से पौधों में वाष्पोत्सर्जन की दर में भी वृद्धि होती है।
  3. पत्ती का अभिविन्यास (Leaf orientation) – यदि पत्तियों का अभिविन्यास आपतित विकिरण (Incident radiation) के समकोण पर स्थित हो तो उन पर सूर्य की किरणों का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। तथा वाष्पोत्सर्जन की दर अधिक होती है परन्तु यदि पत्तियों का अभिविन्यास आपतित विकिरण के समान्तर हो तो वाष्पोत्सर्जन की दर कम होती है।

प्रश्न 6.
बिन्दुस्राव पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
मूलदाब (Root pressure) के प्रभाव से कुछ पादपों की पत्तियों के किनारों तथा शीर्ष से जल की बूंदें स्रावित होती हैं। इस क्रिया को बिन्दु स्राव (Guttation) कहते हैं। इसका अध्ययन बर्गरस्टीन (Burgerstein, 1887) ने किया था। आलू, अरबी, ब्रायोफिल्लम, कुछ घासों आदि अनेक पौधों की पत्तियों पर सुबह के समय बिन्दु स्राव स्पष्ट दिखायी देता है।

जल की यह क्षति पत्तियों के शिराओं के अन्त (Veins endings) पर स्थित छोटे-छोटे छिद्रों से होती है जिन्हें जलरन्ध्र (Hydathodes) कहते हैं। प्रत्येक जलरन्ध्र के शीर्ष पर एक छिद्र पाया जाता है जिसे जलछिद्र (Water pore) कहते हैं। इस छिद्र के चारों ओर स्थित कोशिकाओं में कोई गति नहीं होती है। अतः ये सदैव खुले रहते हैं। जल रन्ध्र से अन्दर की ओर मृदूतक (Parenchyma) कोशिकाओं का समूह होता है जो ऐपिथेम (Epithem) ऊतक कहलाता है। एपिथेम अन्दर की ओर पत्ती की शिराओं की जाइलम वाहिकाओं से सम्पर्क में होता है।
जड़ द्वारा जल का अवशोषण अधिक परन्तु वाष्पोत्सर्जन की दर कम होने पर जाइलम वाहिकाओं में मूलदाब (Root pressure) उत्पन्न हो जाता है जिससे जल जाइलम वाहिकाओं से निकलकर ऐपिथेम की कोशिकाओं में स्थानान्तरित हो जाता है। इन कोशिकाओं के संतृप्त होने पर जल जलछिद्रों से बूंदों के रूप में बाहर आ जाता है। अतः मूलदाब के परिणामस्वरूप बिन्दुस्राव (Guttation) की क्रिया होती है।
बिन्दुस्राव से निकलने वाला जल शुद्ध नहीं होता है वरन् इसमें कुछ कार्बनिक पदार्थ तथा अकार्बनिक लवण घुले होते हैं।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
रक्षक कोशिका या द्वार कोशिका कहाँ पायी जाती है?
उत्तर
रेक्षक कोशिका रन्ध्र छिद्र के दोनों ओर एक-एक पायी जाती है। यह गुर्दे या सेम के बीज के आकार की होती है।

प्रश्न 2.
रन्ध्रों के खुलने तथा बन्द होने के लिए कौन-से तत्व भाग लेते है?
उत्तर
रन्ध्रों के खुलने तथा बन्द होने की क्रियाविधि में K+ तथा H+ तथा OH आयन भाग लेते हैं।

प्रश्न 3.
वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले वातावरणीय कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर
वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले वातावरणीय कारक प्रकाश, तापमान, वायुमण्डलीय आर्द्रता, मृदा जल तथा वायुमण्डलीय दाब है।

प्रश्न 4.
ऐसे दो प्रतिवाष्पोत्सर्जकों के नाम लिखिए जो पादपों में वाष्पोत्सर्जन की देर कम कर देते हैं।
उत्तर

  • फेनिल मरक्यूरिक ऐसीटेट
  • एब्सिसिक अम्ल

प्रश्न 6.
वाष्पोत्सर्जन की दर को मापने वाला यन्त्र कौन-सा है?
उत्तर
वाष्पोत्सर्जनमापी (Potometer)।

प्रश्न 6.
अवशोषित जल की मात्रा से अधिक वाष्पोत्सर्जन होने का पादप पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
अवशोषित जल की मात्रा से अधिक वाष्पोत्सर्जन होने पर पादप मुरझा जायेगा। यह क्रिया म्लानि (Witting) कहलाती है।

प्रश्न 7.
जलरन्ध्रों द्वारा होने वाली पादप शारीरिक क्रिया को नाम लिखिए।
उत्तर
बिन्दुस्रावण (Gutation)

प्रश्न 8.
किन्हीं दो परिस्थितियों के नाम लिखिए जिनमें बिन्दुस्राव होता है।
उत्तर

  • उच्च मूल दाब
  • निम्न वाष्पोत्सर्जन।

प्रश्न 9.
पत्तियों में रन्ध्रों के खुलने एवं बन्द होने की क्रिया का नियमन किन आयनों द्वारा होता है?
उत्तर
पोटैशियम आयन (K+)

प्रश्न 10.
पादप से जल हानि किन विधियों द्वारा होती है?
उत्तर
पादप से जल हानि वाष्पोत्सर्जन, बिन्दुस्राव तथा रसस्राव आदि प्रक्रियाओं द्वारा होती है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन किसे कहते हैं? समझाइए।
उत्तर
रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Stomatal transpiration) – पत्तियाँ वाष्पोत्सर्जन के प्रमुख अंग हैं। पत्तियों की सतह पर रन्ध्र (Stomata) उपस्थित होते हैं, जिनसे रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन होता है। वाष्पोत्सर्जन की कुल मात्रा का 50-97% भाग इसी विधि द्वारा होता है।

प्रश्न 2.
उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन क्या है? समझाइए।
उत्तर
उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन (Cuticular transpiration) – अधिकांश मरुभिद् पौधों का पर्ण उपत्वचा या क्यूटिकल (Cuticle) से ढका होता है। क्यूटिकल सामान्यत: जल के प्रति अपारगम्य होती है। कुछ स्थानों पर यह बहुत पतली अथवा टूटी हुई होती है। जहाँ से जल की वाष्प के रूप में थोड़ी मात्रा में हानि होती है। इस प्रकार होने वाले वाष्पोत्सर्जन को क्यूहिक्यूलर वाष्पोत्सर्जन भी कहते हैं। वाष्पोत्सर्जन की कुल मात्रा का 3-10% इस विधि से होता है।

प्रश्न 3.
वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन क्या है? समझाइए।
उत्तर
वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Lenticular transpiration) – काष्ठीय स्तम्भों व कुछ फलों की सतह पर छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। जिन्हें वातरन्ध्र (Lenticels) कहते हैं। कुछ वातावरणीय दशाओं में वातरन्ध्रों से भी जलवाष्प निकलती है जिसे वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन कहते हैं। यह कुल वाष्पोत्सर्जन का केवल 0.1% होता है।

प्रश्न 4.
रन्यों की उपस्थिति के आधार पर पत्तियाँ कितने प्रकार की होती हैं? समझाइए।
उत्तर
रन्ध्रों की उपस्थिति के आधार पर पत्तियाँ तीन प्रकार की होती हैं –

  1. अधोरन्ध्री पत्ती (Hypostomatic leaf) – रन्ध्र जब पत्ती की केवल निचली सतह तक सीमित रहते हैं तो ऐसी पत्तियाँ अधोरन्ध्री कहलाती हैं। उदाहरण – सेब, सन्तरा की पत्तियाँ। इस प्रकार को सेब प्रकार (Apple type) भी कहते हैं। अधिकांश द्विबीजपत्री पादपों की पत्तियाँ अधोरन्ध्री होती हैं।
  2. उभयरन्ध्री पत्ती (Amphistomatic leaf) – जब रन्ध्र पत्ती की दोनों सतहों पर उपस्थित होते हैं तो ऐसी पत्तियाँ उभयरन्ध्री कहलाती हैं। उदाहरण-मक्का, जई व अन्य सभी घासे। इसे जई प्रकार भी कहते हैं। अधिकांश एकबीजपत्री पादपों की पत्तियाँ उभयरन्ध्री होती हैं। इनमें दोनों सतहों पर रन्ध्रों की संख्या लगभग समान होती है।
  3. अधिरन्ध्री पत्ती (Epistomatic leaf) – जब रन्ध्र पत्तियों की केवल ऊपरी अधिचर्म पर होते हैं तो ऐसी पत्तियाँ अधिरन्ध्री कहलाती हैं। उदाहरण- वाटर लिली तथा अन्य प्लावी पौधे। इसे कुमुदिनी प्रकार भी कहते हैं अधिकांश उत्प्लावी जलोभिद् पादपों (Floating hydrophytes) में पत्तियाँ अधिरन्ध्री होती हैं।

प्रश्न 5.
वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले आन्तरिक कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
वाष्पोत्सर्जन को निम्नलिखित आन्तरिक कारक प्रभावित करते हैं –

  1. पत्ती की संरचना (leaf structure) – वाष्पोत्सर्जन की दर पत्ती की संरचना से प्रभावित होती है। शुष्क जलवायु में उगने वाले पौधों की पत्तियों की बाह्यत्वचा क्यूटिकल, मोम अथवा रोम से ढकी होती है व रन्ध्र निमग्न (Sunken stomata) होते हैं। ये लक्षण वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करते हैं। पत्ती के प्रति इकाई क्षेत्र में रन्ध्रों की संख्या भी एक महत्वपूर्ण कारक है।
  2. मूल प्ररोह अनुपात (Root shoot ratio) – मूल प्ररोह अनुपात में वृद्धि से पौधों में वाष्पोत्सर्जन में भी वृद्धि होती है।
  3. पत्ती का अभिविन्यास (Leaf orientation) – यदि पत्तियों का अभिविन्यास आपतित विकिरण (Incident radiation) के समकोण पर हो तो उन पर सूर्य की किरणों का सबसे अधिक प्रभाव होता है व वाष्पोत्सर्जन दर अधिक होती है परन्तु यदि पत्तियों का अभिविन्यास आपतित विकिरण के समानान्तर हो तो वाष्पोत्सर्जन दर कम होती है।

प्रश्न 6.
रसस्राव क्या है? समझाइए।
उत्तर
रसस्राव (Bleeding) – पौधे के कटे या क्षतिग्रस्त भाग से रस (Sap) का बाहर आना रसस्राव कहलाता है। पौधों की जाइलम वाहिकाओं में रस मूल दाब के कारण धनात्मक तनाव में रहता है। जाइलम वाहिकाओं के कटने अथवा क्षतिग्रस्त होने पर इसका रिसाव बाहर होने लगता है। रबर के वृक्ष से इस प्रकार के रिसाव को लैटेक्स (Latex) भी कहते हैं, जिससे रबर बनता है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
स्टोमेटा (रन्ध्र) की संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर
रन्ध्र (Stomata) की संरचना – अधिकांश पौधों में प्रत्येक रन्ध्र दो वृक्काकार कोशिकाओं से बना होता है जिन्हें द्वार कोशिकाएँ (Guard cells) कहते हैं। द्वार कोशिकाएँ इस प्रकार व्यवस्थित होती हैं कि इनके बीच एक छिद्र बनता है जिसे रन्ध्रीय छिद्र (Stomatal pore) कहते हैं। द्वार कोशिकाओं की भीतरी भित्ति जो रन्ध्रीय छिद्र की ओर होती है मोटी तथा बाहर की भित्तियाँ पतली होती हैं, जिसके कारण द्वार कोशिकाएँ जब स्फीत या फूली हुई (Turgid) होती हैं तो रन्ध्र खुल जाते हैं व श्लथ अथवा पिचकी (Flaccid) होती हैं तो रन्ध्र बद हो जाते हैं। स्फीत स्थिति में द्वार कोशिकाओं की बाह्य पतली भित्ति फूलकर बाहर की ओर काफी खिंच जाती है। इससे भीतरी मोटी भित्ति भी थोड़ी बाहर खिच कर रन्ध्र को खोल देती है। श्लथ स्थिति में द्वार कोशिकाएँ पूर्ववत होकर रन्ध्र को बन्द कर देती हैं।

प्रश्न 2.
रन्ध्रों के खुलने एवं बन्द होने से सम्बन्धित सक्रिय K+ स्थानान्तरण क्रियाविधि सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।
उत्तर
रन्ध्रों की खुलने एवं बन्द होने की क्रिया रन्ध्र गति (Stomatal movement) कहलाती है। इनकी खुलने एवं बन्द होने की क्रियाविधि स्पष्ट करने के लिए निम्न परिकल्पनाएँ प्रस्तुत की गयी हैं –
1. मांड-शर्करी परिकल्पना (Starch-Sugar Hypothesis) – ईस परिकल्पना का प्रतिपादन जे.डी. सायरे (J.D. Sayre, 1923) ने किया था। इसके अनुसार दिन में (प्रकाश में) रक्षक कोशिकाओं (Guard cells) में CO2 की मात्रा कम होने के कारण pH मान बढ़ जाता है। उच्च pH मान पर इन कोशिकाओं में फॉस्फोराइलेज एन्जाइम की सक्रियता बढ़ जाती है। इसके परिणामस्वरूप स्टार्च का ग्लूकोस-1 फॉस्फेट में परिवर्तन हो जाता है, जिसके द्वारा कोशिकाओं की विसरण दाब न्यूनता (DPD) बढ़ जाती है तथा ये स्फीति हो जाती हैं और रन्ध्र खुल जाते हैं। अंधेरे में (रात में) द्वार कोशिकाओं में CO2 की वृद्धि से इनका pH घट जाता है तथा ग्लूकोस-1 फॉस्फेट पुनः स्टॉर्च में परिवर्तित हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप द्वार कोशिकाएँ स्लथ हो जाती हैं तथा रन्ध्र बन्द हो जाते हैं। सायरे से पूर्व लायड (Lyed, 1908) ने बताया था कि द्वार कोशिकाओं में स्टार्च उपस्थित होता है।

2. स्टीवार्ड की परिकल्पना (Steward’s Hypothesis) – इस परिकल्पना के अनुसार उच्च pH में स्टार्च को ग्लूकोस-1-फॉस्फेट में आगे की ओर विश्लेषण होता है जिससे ग्लूकोस-6-फॉस्फेट तथा अन्त में ग्लूकोस बनता है। ग्लूकोस-6-फॉस्फेट वे ग्लूकोस जल में ग्लूकोस-1-फॉस्फेट से अधिक घुलनशील है। अतः इनसे द्वार कोशिकाओं के कोशिका रस की सान्द्रता काफी बढ़ जाती है। जो रंध्रों के खुलने के लिए पर्याप्त होती है। अधिक pH पर रन्ध्रों का खुलना निम्नवत् क्रियाओं पर आधारित है –
रन्ध्रों का बन्द होना कम pH पर निर्भर करता है तथा ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

3. सक्रिय पोटैशियम आयन स्थानान्तरण सिद्धान्त (Active Potassium Ion Transport Theory) – इस सिद्धान्त का प्रतिपादन जापानी वैज्ञानिक इमामुरा तथा फ्यूजीनो ने 1959 में किया था तथा लेविट (1974) ने रूपान्तरित किया जो वर्तमान में सर्वमान्य सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार प्रकाश की उपस्थिति में (दिन में) द्वार कोशिकाओं में मैलिक अम्ल का निर्माण होता है जो कि मैलेट आयन तथा हाइड्रोजन आयन (H+) में वियोजित हो जाता है। समीपवर्ती कोशिकाओं से पौटेशियम आयन (K+) द्वार कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं जिससे पोटैशियम मैलेट का निर्माण होता है जिससे द्वार कोशिकाओं की परासरण सान्द्रता बढ़ जाती है। अत: जल का प्रवेश द्वार कोशिकाओं में होता है जिससे वे स्फीत हो जाती हैं तथा रन्ध्र खुल जाते हैं।

रात्रि में (अन्धकार में) प्रकाश संश्लेषण नहीं होता है। अतः द्वार कोशिकाओं में CO2 की सान्द्रता में वृद्धि होती है। मैलिक अम्ल का स्टॉर्च में परिवर्तन हो जाता है जिससे द्वार कोशिकाओं की परासरण सान्द्रता में कमी आ जाती है और बहि:परासरण के कारण द्वार कोशिकाओं से जल बाहर निकल जाता है एवं द्वार कोशिकाएँ स्लथ अवस्था में आ जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप रन्ध्र बन्द हो जाते हैं।
दिन में
द्वार कोशिकाओं में मैलिक अम्ल का निर्माण

मैलिक अम्ल का वियोजन

मैलेट + H+

सहायक कोशिकाओं से K+ आयनों का सक्रिय संवहन के द्वारा रक्षक कोशिकाओं में प्रवेश व H+ आयनों का बाहर निकलना

पोटैशियम मैलेट

द्वार कोशिकाओं की परासरण सान्द्रता

अंतः परासरण द्वारा द्वार कोशिकाओं का स्फीत होना

रन्ध्रों का खुलना
रात्रि में
प्रकाश संश्लेषण के बन्द हो जाने पर उपरन्ध्रीय गुहा में CO2 की सान्द्रता में वृद्धि

CO2 की उपस्थिति में एब्सिसिक अम्ल (हार्मोन) का सक्रिय होना

द्वार कोशिकाओं से K का बहिर्गमन

द्वार कोशिकाओं की परासरण सान्द्रता में कमी, बहि:परासण

द्वार कोशिकाओं का श्लथ हो जाना

रन्ध्रों का बंद होना

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