RBSE Solutions for Class 11 Political Science Chapter 14 राष्ट्रीय आन्दोलन के उदारवादी, अतिवादी एवं क्रान्तिकारी

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Rajasthan Board RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 राष्ट्रीय आन्दोलन के उदारवादी, अतिवादी एवं क्रान्तिकारी

RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आराम कुर्सी के राजनीतिज्ञ किन्हें समझा जाता था?
उत्तर:
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के उदारवादी नेताओं को ‘आराम कुर्सी के राजनीतिज्ञ’ समझा जाता था।

प्रश्न 2.
गोपाल कृष्ण गोखले का संक्षिप्त जीवन परिचय बताइए।
उत्तर:
उदारवादी नेता गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 1866 ई. में बम्बई राज्य के कोल्हापुर जिले में हुआ था। इन्हें गाँधीजी अपना राजनैतिक गुरु मानते थे। अपनी चारित्रिक श्रेष्ठता, गम्भीर सत्यनिष्ठा और मातृभूमि की अनवरत सेवा से ये भारत व विदेशों में प्रशंसा वे सम्मान के पात्र बन गए।

प्रश्न 3.
गाँधीजी किसे अपना राजनीतिक गुरु मानते थे?
उत्तर:
गोपाल कृष्ण गोखले को।

प्रश्न 4.
गाँधीजी गोखले को किस नाम से पुकारते थे?
उत्तर:
पुण्यात्मा गोखले के नाम से।

प्रश्न 5.
गोखले की मृत्यु पर लार्ड कर्जन ने लार्ड सभा में क्या कहा?
उत्तर:
लॉर्ड कर्जन ने कहा था कि, “उन्हें कभी किसी भी राष्ट्र का ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसमें उनसे ज्यादा संसदीय प्रतिभा हो।”

प्रश्न 6.
गोखले क्रमिक सुधारों में विश्वास क्यों रखते थे?
उत्तर:
क्योंकि स्वराज्य के लक्ष्य की वास्तविक पूर्ति क्रेमिक सुधारों द्वारा ही सम्भव थी।

प्रश्न 7.
गोखले बहिष्कार के समर्थक क्यों नहीं थे?
उत्तर:
क्योंकि बहिष्कार का विचार एक उग्र विचार था, जो अपने आप में ही प्रतिशोध की भावना का सन्देश देता था।

प्रश्न 8.
तिलक के अनुसार राजनीतिक स्वराज्य से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
तिलक के अनुसार राजनीतिक स्वराज्य से तात्पर्य यह है कि अपने देश में अपना ही शासन होना चाहिए अर्थात् प्रत्येक राष्ट्र को राजनीतिक स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए।

प्रश्न 9.
तिलक ने स्वराज्य प्राप्ति के कौन-से चार साधन बताए।
उत्तर:
तिलक ने स्वराज्य प्राति के निम्नलिखित चार साधन बताए-

  1. स्वदेशी
  2. बहिष्कार
  3. निष्क्रिय प्रतिरोध
  4. राष्ट्रीय शिक्षा।

प्रश्न 10.
तिलक के अनुसार स्वदेशी से क्या अभिप्राय था?
उत्तर:
तिलक के अनुसार स्वदेशी से अभिप्राय देश प्रेम के उस प्रतीक से है जो सम्पूर्ण राष्ट्रीय जीवन के पुनरुत्थान का आन्दोलन बन गया है। यही एक मात्र ऐसा प्रभावशाली शासन है जो हमें अंग्रेजों से मुक्ति दिला सकता है।

प्रश्न 11.
तिलक के अनुसार आध्यात्मिक स्वराज्य से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
तिलक के अनुसार आध्यात्मिक स्वराज्य से अभिप्राय उस स्वराज्य से है, जो व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्थान में सहायक हो।

प्रश्न 12.
भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रमुख नायक कौन थे?
उत्तर:

  1. सरदार भगत सिंह
  2. चन्द्रशेखर आजाद
  3. सुभाष चन्द्र बोस। ये भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रमुख नायक थे।

प्रश्न 13.
क्रान्तिकारियों के साधन व साध्य के सम्बन्ध में क्या विचार थे?
उत्तर:
क्रान्तिकारियों का मत था कि यदि साध्य श्रेष्ठ है तो साधन की श्रेष्ठता विचारणीय नहीं है। उन्होंने साधन से अधिक साध्य अथवा लक्ष्य पर बल दिया।

प्रश्न 14.
क्रान्तिकारियों का लक्ष्य क्या था?
उत्तर:
भारतीयों को विदेशी शासन से मुक्त कराना।

प्रश्न 15.
क्रान्तिकारियों के दो कार्यक्रम बताइए।
उत्तर:

  1. भारतीयों के मन में राष्ट्रीयता, स्वतन्त्रता व मातृभूमि के प्रति प्रेम जागृत करना
  2. क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए छापे मारकर धन प्राप्त करना।

RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उदारवादियों की कार्य प्रणाली समझाइए।
उत्तर:
उदारवादियों की कार्य प्रणाली
1. सुस्त सुधारों के लिए आन्दोलन – उदारवादी राजनैतिक क्षेत्र में सुधार चाहते थे। उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार के सहयोग एवं सहायता से भारत का क्रमिक विकास सम्भव है।

2. संवैधानिक सुधारों में विश्वास – उदारवादियों का शान्तिपूर्ण व संवैधानिक साधनों में पूर्ण विश्वास था। वे अपनी माँगों को अंग्रेज सरकार के समक्ष अत्यन्त विनम्र एवं शिष्ट भाषा में प्रार्थना पत्रों, स्मृति पत्रों तथा प्रतिनिधि मण्डलों के माध्यम से सरकार के समक्ष प्रस्तुत करते थे एवं उन्हें स्वीकारने का आग्रह करते थे।

3. ब्रिटिश सरकार की न्यायप्रियता में विश्वास – उदारवादी ब्रिटिश शासन, सभ्यता एवं संस्कृति में विश्वास करते थे। उनका विश्वास था कि ब्रिटिश शासन ने शिक्षा, यातायात एवं संचार के साधनों का भारत में विकास कर भारत को आधुनिक युग में प्रवेश कराया। साथ ही वे ब्रिटिश सरकार की न्यायप्रियता में विश्वास करते थे।

प्रश्न 2.
उदारवादियों का ब्रिटिश शासन प्रणाली के सम्बन्ध में क्या दृष्टिकोण था?
उत्तर:
उदारवादियों का ब्रिटिश शासन प्रणाली के सम्बन्ध में दृष्टिकोण – उदारवादियों का मानना था कि ब्रिटिश शासन भारत के लिए वरदान है। वे मानते थे कि ब्रिटिश सरकार के सहयोग एवं सहायता से भारत का क्रमिक विकास सम्भव है। उदारवादी नेता राष्ट्रवादी होने के साथ – साथ ब्रिटिश शासन के प्रति भी कृतज्ञता का भाव रखते थे। उदारवादियों का यह आचरण उनकी पाश्चात्य शिक्षा का परिणाम था। उदारवादियों का विश्वास था कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध बल प्रयोग कर दबाव बढ़ाने से प्रतिक्रिया होगी और वे लोगों के साथ अधिक निर्दयतापूर्वक व्यवहार करने लगेंगे जिससे जनता के कष्टों में वृद्धि होगी।

उदारवादी ब्रिटिश साम्राज्य से पूरी तरह मुक्त नहीं होना चाहते थे। वे साम्राज्य के अधीन ही एक सम्मानित देश के रूप में भारत का स्थान सुनिश्चित करना चाहते थे। उदारवादी भारत के शासन को भारतीयों द्वारा चलाए जाने के लिए सभी प्रकार के संस्थागत, राजनीतिक एवं आर्थिक सुधारों के प्रबल पक्षधर थे। उनका लक्ष्य पूर्ण स्वराज्य प्राप्ति नहीं वरन् ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन प्राप्त करना था।

प्रश्न 3.
गोखले के जीवन परिचय पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
गोखले का जीवन परिचय – गोपाल कृष्ण गोखले आधुनिक भारत के ऐसे उदारवादी नेता थे, जिन्होंने देश – सेवा के लिए राजनीति को कर्तव्य भावना के साथ अपनाया। इनका जन्म 1866 ई. में तत्कालीन, बम्बई प्राप्त के कोल्हापुर में हुआ था। 20 वर्ष की उम्र में यह एक अंग्रेजी विद्यालय में शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए। यह विद्यालय आगे चलकर फग्र्युसन कॉलेज के रूप में विकसित हुआ।

गोखले इस कॉलेज के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। अपनी इंग्लैण्ड की यात्राओं में गोखले ने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की ब्रिटिश समिति एवं उसके पत्र इण्डिया को सक्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। 1912 ई. में इन्होंने दक्षिण अफ्रीका में गाँधीजी के नेतृत्व में भारतीय सत्याग्रहियों एवं अफ्रीकी सरकार के बीच एक सफल समझौता कराया। गाँधीजी इन्हें अपना राजनैतिक गुरु मानते थे। इन्होंने ब्रिटिश सरकार की नाइटहुड की उपाधि लेने से मना कर दिया।

यह उग्र विचारों और साधनों तथा असंवैधानिक मार्ग को भारत के लिए अहितकर समझते थे। यह भारत के लिए स्वशासन चाहते थे। इन्होंने सत्ता केन्द्रीकरण का विरोध किया। यह एक उदारवादी, राजनैतिक यथार्थवादी एवं राष्ट्रवादी थे। इन्होंने युवकों को नैतिक और आध्यात्मिक कर्त्तव्य के रूप में राष्ट्र सेवा का प्रशिक्षण देने के लिए भारत सेवक संघ का गठन किया।

प्रश्न 4.
गोखले की स्वशासन की धारणा समझाइए।
उत्तर:
गोखले की स्वशासन की धारणा – गोपाल कृष्ण गोखले एक उदारवादी राजनेता थे। ये क्रमिक सुधारों के मार्ग को अपनाने में विश्वास करते थे। इन सुधारों का अन्तिम लक्ष्य भारत के लिए स्वशासन की प्राप्ति था। गोखले का विश्वास था कि अंग्रेजी नौकरशाही से भारत के प्रशासन में जो आर्थिक एवं अन्य दोष आ गये हैं, उनका समाधान स्वशासन के माध्यम से ही हो सकता है।

सन् 1905 में बनारस में हुए काँग्रेस के अधिवेशन में गोखले ने अध्यक्षीय भाषण देते हुए कहा कि “काँग्रेस का लक्ष्य यह है कि भारत, भारतीयों के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रशासित होना चाहिए। एक निश्चित समयावधि में भारत में ऐसी सरकार गठित हो जानी चाहिए। जैसा कि ब्रिटिश साम्राज्य की अन्य स्वशासित उपनिवेशों की सरकारें हैं।” उन्होंने एक से अधिक बार स्पष्ट किया कि भारत को यह स्थिति ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत ही प्राप्त होनी चाहिए। उनका लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत अधिराज्य की स्थिति प्राप्त करना था।

प्रश्न 5.
सत्ता के विकेन्द्रीकरण के सन्दर्भ में गोखले के विचार बताइए।
उत्तर:
गोखले के सत्ता के विकेन्द्रीकरण के सन्दर्भ में विचार – गोपालकृष्ण गोखले सत्ता के केन्द्रीकरण के घोर विरोधी थे। वे सत्ता का विकेन्द्रीकरण चाहते थे। गोखले का मत था कि सत्ता का केन्द्रीकरण प्रशासनिक स्वेच्छाचारिता एवं जनता के कष्टों को बढ़ाता है। अतः भारतीयों को उनके अधिकार तभी प्राप्त हो सकते हैं जब अंग्रेज सरकार सत्ता के विकेन्द्रीकरण की नीति अपनाए। सत्ता के विकेन्द्रीकरण हेतु गोखले ने निम्नलिखित सुझाव दिए

  1. प्रान्तीय विधान परिषदों के आकार और शक्ति में वृद्धि करके प्रान्तीय विकेन्द्रीकरण का मार्ग प्रशस्त किया जाये। प्रान्तीय विधान परिषदों को अधिकार दिया जाये कि वे प्रान्त के बजट पर वाद – विवाद कर सके।
  2. जिला स्तर पर कलेक्टर की स्वेच्छाचारिता. को रोकने के लिए प्रत्येक जिले में जिला स्तरीय परिषदों का निर्माण किया जाये, जो कलेक्टर को प्रशासकीय मामलों में सलाह दे।
  3. हॉब हाउस विकेन्द्रीकरण आयोग के समक्ष गोखले ने सत्ता के विकेन्द्रीकरण के लिए सुझाव दिये कि
    • सत्ता की सबसे अच्छी इकाई पंचायतों के रूप में हैं। प्रशासन के सबसे निम्न स्तर पर ग्राम पंचायतें हों, जिसे शासन सम्बन्धी पर्याप्त अधिकार दिये जायें।
    • प्रशासन के मध्य स्तर पर जिला परिषदों का गठन हो।
    • शिखर पर पुनर्गठित विधान परिषद् हो।

प्रश्न 6.
स्वदेशी व बहिष्कार के सन्दर्भ में गोखले के विचार बताइए।
उत्तर:
गोखले के स्वदेशी व बहिष्कार के सन्दर्भ में विचार-गोपाल कृष्ण गोखले मूल रूप से रचनात्मक राजनीति के पक्षधर थे। स्वदेशी की भावना को गोखले देशभक्ति का प्रतीक मानते थे। उनके लिए स्वदेशी केवल एक आर्थिक शस्त्र मात्र नहीं था बल्कि उसमें जनता की आत्मनिर्भरता की आकांक्षा और आत्म सम्मान की चेतना की। सकारात्मक अभिव्यक्ति निहित थी। वे स्वदेशी के आर्थिक पक्ष से भी सहमत थे।

उनका मत था कि स्वदेशी के माध्यम से ही भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त होगा। साथ ही भारतीयों में ऐसी भावना भी जागृत होगी कि वे एक-दूसरे की आर्थिक समस्याओं का समाधान करने में सहयोग करें। स्वदेशी की भावना का यह मौलिक पक्ष आत्मत्याग के नैतिक आदर्श का ही आर्थिक रूपान्तरण था। गोखले स्वदेशी के रचनात्मक पक्ष से सहमत होते हुए भी उसके नकारात्मक पक्ष ‘बहिष्कार’ से सहमत थे।

बहिष्कार का विचार उनके मत में उग्र विचार था, जो अपने आप में ही प्रतिशोध की भावना का संकेत देता था। गोखले का मत था कि ‘विदेशी’ का परित्याग ‘स्वदेशी’ को अपनाने का एक सहज परिणाम हो सकता है। किन्तु बहिष्कार स्वदेशी के प्रति समर्पण का सहज परिणाम नहीं, बल्कि एक नकारात्मक दृष्टिकोण है। इन्होंने आर्थिक बहिष्कार की तरह सरकारी नौकरियों के बहिष्कार के प्रस्ताव को भी अव्यावहारिक माना।

प्रश्न 7.
अतिवादियों की कार्य प्रणाली समझाइए।
उत्तर:
अतिवादियों की कार्य प्रणाली – अतिवादियों की धारणा थी कि स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु संवैधानिक साधन अपर्याप्त हैं। स्वतन्त्रता के लिए उग्र आन्दोलन आवश्यक है। उन्होंने क्रमिक सुधारों के स्थान पर पूर्ण स्वराज्य की माँग की तथा स्वराज्य को अपना उद्देश्य निश्चित करते हुए अपनी नीतियों को परिभाषित किया। अतिवादी स्वराज्य को अधिकारपूर्वक प्राप्त करना चाहते थे। इसकी प्राप्ति के लिए उन्होंने उग्र पद्धति का प्रयोग किया।

इन्होंने जनता को सीधी राजनीतिक कार्यवाही के लिए प्रेरित किया तथा जागरूकता हेतु नवीन नारों का प्रयोग किया। अतिवादी भारतीयों को अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करना सिखाते थे। उनका विश्वास था कि स्वतन्त्रता दान में प्राप्त नहीं हो सकती इसे ‘शक्ति’ द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। अतिवादी विचारक राजनीतिक भिक्षावृत्ति वाले साधनों में विश्वास नहीं करते थे। वे स्वावलम्बन, निष्क्रिय प्रतिरोध, बहिष्कार, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा आदि के हिमायती थे। इनके द्वारा प्रयोग किए गए साधनों को अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई।

प्रश्न 8.
अतिवादियों के कार्यक्रम को बतलाइए।
उत्तर:
अतिवादियों के कार्यक्रम – स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रमुख अतिवादी नेता बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय एवं विपिन चन्द्र पाल थे। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के काल में 1906 से 1919 तक के काल को अतिवादी काल कहा जाता है। अतिवादी भारत में ब्रिटिश शासन को बनाए रखने के एकदम विरुद्ध थे। वे भारतीयता पर आधारित स्वराज्य तथा ब्रिटेन से यथाशीघ्र सम्बन्ध विच्छेद के पक्ष में थे। अतिवादियों का कार्यक्रम बहिष्कार, स्वदेशी एवं राष्ट्रीय शिक्षा था। ये एक नियोजित पद्धति तथा विशिष्ट साधनों का प्रयोग करते हुए आगे बढ़ना चाहते थे।

अतिवादियों ने राष्ट्रीय शिक्षा तथा सत्याग्रह पर भी बल दिया। उनके द्वारा अपने ही देश में बने माल पर बल देने से भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहन मिला। अतिवादी स्वावलम्बन एवं आत्म – उत्थान का मार्ग अपनाते हुए, ब्रिटिश साम्राज्य का विरोध करना चाहते थे। अतिवादियों ने राष्ट्रीय आन्दोलन का आधार विस्तृत करते हुए अपना सन्देश देश के एक बड़े वर्ग तक पहुँचाया। उन्होंने भारतीयों के मन से अंग्रेज जाति की अजेयता एवं शक्तिशाली होने का मिथ्या भ्रम समाप्त कर दिया।

प्रश्न 9.
तिलक के जीवन परिचय पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय – बाल गंगाधर तिलक भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में अतिवादी विचारधारा के समर्थक व्यक्ति थे। इनका जन्म 23 जुलाई, सन् 1856 को महाराष्ट्र राज्य के कोंकण जिले के रत्नागिरी में हुआ था। इन्होंने छात्र जीवन में ही देश की स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था। इन्होंने अपने राजनैतिक चिन्तन का विषय भारत के लिए स्वराज्य प्राप्ति को बनाया और नारा दिया कि “स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”

स्वराज्य का नया लक्ष्य प्रदान करने वाले ‘केसरी’ और ‘मराठा’ के प्रकाशक, भारतीय राष्ट्रवाद के भगीरथ ऋषि, बाल गंगाधर तिलक का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में अमूल्य योगदान रहा है। तिलक ने भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन को भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान पर खड़ा किया। इसके लिए उन्होंने गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव प्रारम्भ किया।

तिलक ने स्वराज्यं के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और निष्क्रिय प्रतिरोध जैसे साधन राष्ट्र को प्रदान किए। तिलक आधुनिक भारत के प्रथम सर्वाधिक प्रभावशाली एवं लोकप्रिय राष्ट्रीय नेता थे। उन्होंने उग्रवादी साधनों के नए युग का सूत्रपात किया।

प्रश्न 10.
तिलक के व्यक्तिगत स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचार बताइए।
उत्तर:
तिलक के व्यक्तिगत स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचार – बाल गंगाधर तिलक ने व्यक्ति की स्वतन्त्रता के विषय में वेदांत के अनुसार विचार किया। तिलक ने स्वतन्त्रता को आत्मविकास का एक साधने स्वीकार किया। उन्होंने लॉक के समान स्वतन्त्रता को व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार स्वीकार किया इसलिए उन्होंने स्वतन्त्रता को जन्मसिद्ध अधिकार बताया।

तिलक के अनुसार ‘स्व’ का अर्थ है – मानव आत्मा, जो ईश्वर का अंश है। जब व्यक्ति अपने इस मूल रूप के अनुसार स्वयं के जीवन का संचालन, नियमन और नियन्त्रण करता है तो वह अपने आत्मरूप का पूर्ण विकास करने में सफल होता है और ईश्वरीय विवेक व नैतिकता का पालन करते हुए आध्यात्मिक आनन्द की प्राप्ति कर सकता है।

ऐसा व्यक्ति ही अपने वैयक्तिक कल्याण के साथ ही सम्पूर्ण समाज के कल्याण की वृद्धि में सहायक होता है। तिलक ने स्वतन्त्रता को एक भावात्मक साधन के रूप में स्वीकार किया है। उनकी दृष्टि से स्वतन्त्रता व्यक्ति के पूर्ण नैतिक विकास तथा ईश्वर के एकाकार होने के साध्य की प्राप्ति में सहायक अनिवार्य साधन है। इस प्रकार बाल गंगाधर तिलक का स्वतन्त्रता सम्बन्धी दृष्टिकोण मूल रूप से आध्यात्मिक एवं नैतिक था। इनके स्वतन्त्रता सम्बन्धी इन विचारों ने भारतीयों को एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया।

प्रश्न 11.
तिलक की स्वराज्य की अवधारणा समझाइए।
उत्तर:
तिलक की स्वराज्य सम्बन्धी अवधारणा – बाल गंगाधर तिलक के अनुसार स्वराज्य मानव के सर्वांगीण विकास एवं उन्नति में सहायक है। प्रत्येक राष्ट्र को राजनीतिक स्वतन्त्रता ही, बाल गंगाधर तिलक के स्वराज्य का अर्थ है। ब्रिटिश शासन की स्थापना से भारत में जीवन के समस्त क्षेत्रों का निरन्तर पतन हो रहा था।

इस स्थिति से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय, भारतीयों द्वारा पुनः राजनीतिक स्वराज्य प्राप्त करना था इसलिए तिलक ने अपने अडिग संकल्प को दोहराते हुए, ब्रिटिश सरकार को चुनौती के स्वर में कहा, “स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।” तिलक के स्वराज्य सम्बन्धी चिन्तन पर वैदिक स्वराज्य’ एवं ‘शिवाजी के हिन्दू पद पादशाही’ का प्रभाव दिखाई देता है। तिलक का उद्देश्य भारत में ऐसे स्वराज्य की स्थापना करना था, जो भारत को पुनः उसका गौरव दिलाने में समर्थ हो।

उन्होंने स्वराज्य के, आध्यात्मिक एवं राजनीतिक, दो स्वरूप स्वीकार किए हैं:

  1. आध्यात्मिक स्वराज्य
  2. राजनैतिक स्वराज्य।

जहाँ आध्यात्मिक स्वराज्य व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्थान में सहायक है वहीं राजनीतिक स्वराज्य उसके लौकिक । उत्थान में सहायक होता है।

प्रश्न 12.
साधन एवं साध्य के सम्बन्ध में तिलक के विचार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक के साधन एवं साध्य के सम्बन्ध में विचार – तिलक ने अपने राजनीतिक चिन्तन में मुख्यतः साध्य की पवित्रता पर अत्यधिक बल दिया है किन्तु साधन की पवित्रता के बारे में उनका कोई आग्रह नहीं है। उनका मत है कि यदि साध्य पवित्र है, तो साधन कोई भी अपनाया जा सकता है जो इस पवित्र साध्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक हो तिलक की दृष्टि में स्वराज्य की प्राप्ति एक पवित्र साध्य था और भारत की तत्कालीन परिस्थितियों के सन्दर्भ में उन्होंने इसकी प्राप्ति के लिए गरमपंथी राजनीतिक साधन अपनाये, जिन्हें प्राय: ‘खुले राजनीतिक साधन’ भी कहा जाता है।

तिलक ने स्वराज्य की प्राप्ति के साधन के रूप में उदारवादी राष्ट्रीय नेताओं द्वारा अपनाये गये, उदार संवैधानिक साधनों की गम्भीर आलोचना की और उन्हें त्यागने योग्य माना। तिलक ने स्वराज्य के साध्य की प्राप्ति के लिए निष्क्रिय प्रतिरोध, स्वदेशी का प्रचार, बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा आदि साधनों का समर्थन किया। तिलक का विश्वास था कि इनकी मदद से भारतीय जनता में ब्रिटिश शासन के प्रति भय समाप्त किया जा सकता था तथा बलिदान के लिए प्रेरित करके, स्वराज्य प्राप्त किया जा सकता था।

प्रश्न 13.
सरदार भगत सिंह के जीवन परिचय को संक्षेप में बताइये।
उत्तर:
सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय – सरदार भगत सिंह का जन्म पंजाब के जिला लायलपुर के बंगा गाँव में 27 सितम्बर, 1907 को हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह था। वे क्रान्तिकारी थे तथा राष्ट्रीय स्वतन्त्रता। हेतु कई बार ब्रिटिश शासन की प्रताड़ना झेल चुके थे। भगतसिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह एवं उनके दादा अर्जुन सिंह भी बहुत बड़े क्रान्तिकारी एवं स्वतन्त्रता सेनानी थे।

सरदार भगत सिंह बचपन से ही अपने पिता, चाचा एवं दादा की देश प्रेम की भावनाओं से बहुत प्रभावित थे। कालांतर में वे लाला लाजपत राय, नन्द किशोर मेहता आदि स्वतन्त्रता सेनानियों के सम्पर्क में आए। उन्होंने अक्टूबर 1928 में लाहौर के पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या में चन्द्रशेखर आजाद व राजगुरु का साथ दिया। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8.अप्रैल, 1929 को केन्द्रीय असेम्बली हॉल में बम विस्फोट किया।

परिणामस्वरूप इन दोनों को राजगुरु के साथ 23 मार्च, 1931 को फाँसी दे दी गयी। भगत सिंह सृजनात्मक क्षमता के भी धनी थे। उन्होंने कानपुर से प्रकाशित ‘प्रताप’ में ‘बलवन्त’ के नाम से एवं पंजाब से प्रकाशित कीर्ति’ में विद्रोह’ के नाम से लेख लिखना प्रारम्भ कर दिया। इसके अतिरिक्त इलाहाबाद से प्रकाशित ‘चाँद’ नामक पत्रिका के महत्वपूर्ण ‘फाँसी अंक’ में भी उनके लेख प्रकाशित हुए थे। भगत सिंह ने जेल में-

  1. बॉयोग्राफी
  2.  डोर टू डेथ एवं
  3. दि रिवोशनरी मूवमेण्ट इन इण्डिया नामक पुस्तकें लिखीं।

प्रश्न 14.
चन्द्रशेखर आजाद के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
चन्द्रशेखर आजाद का व्यक्तित्व – चन्द्रशेखर आजाद की जन्म 23 जुलाई, 1906 ई. को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के बहोर नामक ग्राम में साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ। सन् 1921 में मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्होंने राष्ट्रभाव से प्रेरित होकर राजकीय संस्कृत कॉलेज में धरना दिया। उन्हें बन्दी बना लिया गया। मुकदमे के दौरान मजिस्ट्रेट ने चन्द्रशेखर आजाद से पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है?” आजाद ने उत्तर दिया, “मेरा नाम आजाद हैं’ मजिस्ट्रेट ने दूसरी प्रश्न किया, “तुम्हारे पिता का क्या नाम है?” आजाद ने उत्तर दिया -“पिता का नाम स्वतन्त्र है।”

मजिस्ट्रेट ने तीसरा प्रश्न किया “कहाँ रहते हो?” आजाद ने उत्तर दिया-“जेलखाने में।” बालक चन्द्रशेखर के राष्ट्रभाव से भरपूर उपर्युक्त उत्तरों से क्रोधित मजिस्ट्रेट ने उसे 15 बेंत मारने की सजा दी। बालक के शरीर पर पुलिस निर्दयतापूर्वक बेंत मार रही थी और प्रत्येक बेंत के साथ उसने मुँह से ‘बन्दे मातरम्’ को उद्घोष किया।

आजाद ने 9 अगस्त, 1925 को काकोरी की ट्रेन डकेती में भाग लिया। 17 दिसम्बर, 1928 को उन्होंने, भगतसिंह एवं राजगुरु ने लाहौर में पुलिस अधिकारी सान्डर्म की हत्या की। अन्तत: 27 फरवरी, 1931 को वे एल्फ्रेड पार्क (इलाहाबाद) में पुलिस की गोलियों से घायल हुए आजाद ने अपनी जीवन लीला स्वयं समाप्त कर ली।

प्रश्न 15.
क्रान्तिकारियों के कार्यक्रम पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
क्रान्तिकारियों के प्रमुख कार्यक्रम – क्रान्तिकारियों के प्रमुख कार्यक्रम निम्नलिखित थे

  1. लेखों, डों और गुप्त प्रचार र शिक्षित भारतीय के मस्तिष्क में विदेशी दासी के प्रति घृणा की भावना उत्पन्न करना।
  2. संगीत, नाटक एवं साहित्य द्वारा बेकारी और भूख से परेशान लोगों को निडर बनाकर उनमें मातृभूमि के प्रति प्रेम और स्वतन्त्रता की भावना भरना।
  3. सरकार को वन्दे मातरम् के जुलूसों, स्वदेशी सम्मेलनों तथा बायकॉट के माध्यम से व्यस्त रखना ताकि राष्ट्रीय स्वाधीनता हेतु किये जाने वाले कार्यों को बिना किसी बाधा के सम्पन्न किया जा सके।
  4. बम बनाना एवं पिस्तौल व बन्दूक आदि गुप्त रूप से मँगवाना और विदेशों से शस्त्र प्राप्त करना।
  5. क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए छापे मारकर धन प्राप्त करना ताकि क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन सुगमतापूर्वक किया जा सके।
  6.  नौजवानों की भर्ती करके उनकी छोटी – छोटी टुकड़ियाँ बनाना। उन्हें शास्त्रों का प्रयोग बताना ताकि उन्हें एक प्रशिक्षित व शक्ति-सम्पन्न सैन्य टुकड़ी के रूप में स्थापित किया जा सके।

RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
तिलक के राजनीतिक दर्शन को समझाइये।
उत्तर:
तिलक का राजनीतिक दर्शन तिलक के राजनीतिक दर्शन का अध्ययन हम निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत कर सकते हैं
1. व्यक्ति का स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचार – तिलक ने व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर वेदान्त के अनुसार विचार किया। तिलक ने स्वतन्त्रता को आत्मविकास के एक भावात्मक साधन के रूप में स्वीकारा। उनकी दृष्टि से स्वतन्त्रता व्यक्ति के पूर्ण नैतिक विकास तथा ईश्वर से एकाकार होने के साध्य की प्राप्ति में सहायक अनिवार्य साधन है। तिलक के अनुसार स्वराज्य मानव के सर्वांगीण विकास एवं उत्थान में सहायक है।

2. व्यक्ति तथा समाज का आधार शाश्वत धर्म (नैतिकता) है – तिलक का मत है कि मानव अपनी मूल प्रकृति से मात्र एक बौद्धिक या भौतिक प्राणी नहीं है, बल्कि मानव मूलत: एक आध्यात्मिक प्राणी (नैतिक प्राणी) है। तिलक ने शाश्वत धर्म अथवा शाश्वत नैतिकता सम्बन्धी अपनी इस हितकारी अवधारणा को अपने राजनीतिक चिन्तन का आधार बनाया।

3. पाश्चात्य राजनीतिक एवं भौतिकवादी दर्शन से असहमति – तिलक ने पश्चिमी जगत के विभिन्न भौतिक सिद्धान्तों से असहमति प्रकट की है। उनका मत है कि ये सभी सिद्धान्त भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक परम्परा के अनुरूप नहीं हैं।

4. साधन सम्बन्धी विचार – तिलक की दृष्टि में स्वराज्य की प्राप्ति एक पवित्र साध्य थी और भारत की तत्कालीन परिस्थितियों के सन्दर्भ में उन्होंने इसकी प्राप्ति के लिए गरमपंथी राजनैतिक साधन अपनाये जिन्हें प्रायः ‘खुले राजनीतिक साधन’ भी कहा जाता है। तिलक ने प्रमुख रूप से चार साधनों को स्वराज्य प्राप्ति के लिए अधिकृत किया – स्वदेशीबहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा एवं निष्क्रिय प्रतिरोध। तिलक का विश्वास था कि इनकी मदद से भारतीय जनता में ब्रिटिश शासन के प्रति भय समाप्त किया जा सकता था और उन्हें बलिदान के लिए प्रेरित करने के साथ – साथ स्वराज्य प्राप्त किया जा सकता था।

5.  प्राचीन भारत के गौरव से प्रभावित राष्ट्रवाद – भारतीय रागद को एक निश्चित व मूर्त अवधारणा बनाने का श्रेय तिलक को दिया जा सकता है। तिलक राष्ट्रवाद को भारतीय परम्पराओं, भावनाओं एवं परिस्थितियों के अनुरूप ही विकसित करना चाहते थे। तिलक ‘स्वदेशी राष्ट्रवाद’ के समर्थक थे।

6. राष्ट्रीयता, एकता एवं साम्प्रदायिक सद्भाव सम्बन्धी विचार – तिलक ने हिन्दू-मुस्लिम एकता तथा साम्प्रदायिक सद्भाव की नीति का समर्थन किया। वे ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ का विकास करना चाहते थे। इस उद्देश्य से तिलक ने भारत के सभी धार्मिक, सांस्कृतिक एवं भाषायी समुदायों के बीच राष्ट्रीय एकता के संस्कार को विकसित करने तथा उसे अटूट बनाने का प्रयत्न किया।

7. स्वराज्य सम्बन्धी विचार – तिलक के अनुसार स्वराज्य मानव के सर्वांगीण विकास एवं उत्थान में सहायक है। तिलक ने स्वराज्य के दो प्रमुख रूपों के बारे में बताया है-आध्यात्मिक स्वराज्य तथा राजनीतिक स्वराज्य। जहाँ आध्यात्मिक स्वराज्य व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्थान में सहायक है वहीं राजनीतिक स्वराज्य उसके लौकिक उत्थान में सहायक होता है।

ब्रिटिश शासन की स्थापना से भारत में जीवन के सभी क्षेत्रों में निरन्तर पतन हो रहा था। इस स्थिति से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय भारतीयों द्वारा पुनः राजनीतिक स्वराज्य प्राप्त करना था। इसलिए तिलक ने अपने अडिग संकल्प को दोहराते हुए, ब्रिटिश सरकार को चुनौती के स्वर में कहा, “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”

प्रश्न 2.
गोखले के विचारों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
गोपाल कृष्ण गोखले के विचार गोपालकृष्ण गोखले को महात्मा गाँधी ने अपना राजनीतिक गुरु माना था। युवकों को नैतिकता और आध्यात्मिक कर्तव्य के रूप में राष्ट्र सेवा का प्रशिक्षण देने के लिए गोखले ने “भारत सेवक समाज’ की स्थापना की थी। गोपालकृष्ण गोखले के प्रमुख विचार निम्नलिखित हैं

1. ब्रिटिश जाति की उदारता एवं न्यायप्रियता में विश्वास – गोपालकृष्ण गोखले ब्रिटिश जाति की उदारता में विश्वास करते थे। गोखले ब्रिटिश राज को भारत के लिए ईश्वरीय वरदान मानते थे। वे मानते थे कि ब्रिटिश शासन के. कारण ही भारत में आधुनिक राष्ट्रीय चेतना एवं लोकतान्त्रिक विचारों का युग आया है। गोखले के अनुसार ब्रिटिश शासन ने ही भारत को राजनीतिक एकता प्रदान की तथा सम्पूर्ण भारत को एक समान विधि एवं न्याय-व्यवस्था भी प्रदान की। यही नहीं अंग्रेजी भाषा, शिक्षा पद्धति एवं संचार साधन भी अंग्रेजों ने ही प्रदान किये हैं।

2. संवैधानिक साधनों में दृढ़ विश्वास – गोखले व्यावहारिक दृष्टि से अंग्रेजी शासन का संगठित शक्ति से मुकाबला करना असम्भव मानते थे। उनका संवैधानिक साधनों में दृढ़ विश्वास था। गोखले के संवैधानिक साधन मूलतः उदारवादी एवं शान्तिपूर्ण, यथा-याचिका, स्मरण-पत्र, प्रार्थना-पत्र, अधिवेशन सभा, प्रतिनिधिमण्डल, समाचार-पत्र, विचार-विमर्श, रचनात्मक आलोचना आदि।

3. सत्ता का विकेन्द्रीकरण – गोखले सत्ता के केन्द्रीकरण में विश्वास नहीं करते थे। उनके अनुसार सत्ता का केन्द्रीकरण प्रशासनिक स्वेच्छाचारिता को बढ़ाकर जनता की परेशानियों में वृद्धि करता है। उनके अनुसार, भारतीयों को उनके अधिकार तभी प्राप्त हो सकते थे जब ब्रिटिश सरकार सत्ता के विकेन्द्रीकरण की नीति अपनाए।

4. स्वशासन की धारणा – गोखले की मान्यता थी कि क्रमिक सुधारों के मार्ग को अपनाया जाए। इनसे ही भारत के लिए स्वशासन की प्राप्ति सम्भव है। उनको विश्वास था कि ब्रिटिश नौकरशाही के फलस्वरूप प्रशासन में जो आर्थिक एवं अन्य दोष प्रवेश कर गए हैं, उनका निकारण, स्वशासन द्वारा ही हो सकता है।

5. क्रमिक सुधार – गोखले का मत था कि स्वराज्य के लक्ष्य की वास्तविक पूर्ति क्रमिक सुधारों द्वारा ही की जा सकती है। क्रमिक सुधार भारत के वर्तमान एवं भावी सुदृढ़ राष्ट्रवाद के लक्ष्य की प्राप्ति का माध्यम हैं। गोखले आदर्शोन्मुख यथार्थवादी थे। उनका राजनीतिक यथार्थवाद उन्हें इस लक्ष्य को आत्मसात करने के लिए प्रेरित करता था कि भारत के स्वराज्य की कामना की पूर्ति तत्कालिक उद्घोषणा द्वारा नहीं बल्कि क्रमिक सुधारों द्वारा ही हो सकती थी।

6. उदारवादी चिन्तन में विश्वास – गोखले उदारवादी चिन्तन में विश्वास करते थे। वे जनता की स्वतन्त्रता व्यक्ति की गरिमा का सम्मान, विधि का शासन, मर्यादित सरकार, समानता और न्याय में गहरी आस्था रखते थे।

7. भारतीय राष्ट्रवाद के समर्थक एवं पोषक – गोखले एक सच्चे राष्ट्रवादी, उदारवादी एवं राजनीतिक यथार्थवादी थे। वे भारतीय जनता के हितों और स्वाभिमान के सच्चे समर्थक एवं प्रवक्ता थे। इन्होंने अपने राष्ट्रवादी विचारों को व्यावहारिक रूप देने के लिए 12 जून, 1905 को भारत सेवक संघ की स्थापना की। इन्होंने भारतीय जनता में राष्ट्रीय चेतना के प्रसार के लिए राष्ट्रवाद को त्याग, तपस्या, आत्मसंयम तथा कर्तव्य-पालन के साथ जोड़ा।

8. स्वदेशी का समर्थन – गोखले स्वदेशी की भावना को देशभक्ति का प्रतीक एवं एक पवित्र विचार मानते थे। उनका मत था कि स्वदेशी के माध्यम से भारत की आर्थिक निर्भरता का मार्ग खुलेगा एवं भारतीयों में ऐसी भावना भी जागृत होगी कि वे एक-दूसरे की आर्थिक समस्याओं का समाधान करने में सहयोग करेंगे।

9. बहिष्कार का विरोध – गोखले स्वदेशी के नकारात्मक पक्ष ‘बहिष्कार’ से सहमत नहीं थे। उनके मतानुसार बहिष्कार का विचार एक उग्र विचार था, जो अपने आप में प्रतिशोध की भावना का संकेत देता था। गोखले का मत था कि ‘विदेशी’ का परित्याग’ ‘स्वदेशी’ को अपनाने का एक सहज परिणाम हो सकता है, किन्तु बहिष्कार स्वदेशी के प्रति सम्पूर्ण का सहज परिणाम नहीं गोखले के अनुसार बहिष्कार एक नकारात्मक दृष्टिकोण था।

गोखले ने आर्थिक बहिष्कार की तरह सरकारी नौकरियों के बहिष्कार के प्रस्ताव को भी अव्यावहारिक माना और कहा कि इससे भारतीयों के हितों की कोई वास्तविक पूर्ति नहीं हो सकती थी। बहिष्कार निश्चित रूप से विरोधी पक्ष के क्रोध को पैदा करेगा तथा देश का कोई भी सच्चा शुभचिन्तक तब तक ऐसे क्रोध को उकसाने का विकल्प नहीं चुनेगा जब तक कि यह अतिआवश्यक न हो जाए।

प्रश्न 3.
क्रान्तिकारियों के लक्ष्य, कार्यक्रम एवं नीतियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
क्रान्तिकारियों के लक्ष्य – क्रान्तिकारियों का मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश शासन को भारत में पूर्णतः समाप्त करना था। उनका उद्देश्य भारत में क्रान्ति लाकर विदेशी शासन का अन्त करके सच्चा लोकतन्त्र स्थापित करना था। उनका उद्देश्य समाज में आतंक का राज्य स्थापित करना नहीं था बल्कि वे तो ब्रिटिश शासकों के मन में अत्याचारों के विरुद्ध आतंक उत्पन्न करना चाहते थे। क्रान्तिकारी नेता केवल ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या करते थे, जो देशभक्तों पर अत्याचार करते थे।

क्रान्तिकारी भारतीय जनता को संघर्ष की प्रेरणा देना एवं अंग्रेजी शासन के मन में डर पैदा करना चाहते थे। स्वतन्त्रता के लिए बलिदान क्रान्तिकारियों की प्रेरणा स्रोत था। भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराना, अपनी मातृभूमि का खोया हुआ गौरव पुनः स्थापित करना एवं समस्त भारतवासियों को स्वतन्त्रता की खुली हवा में मुक्त विचरण का अहसास दिलाना क्रान्तिकारियों के लक्ष्य में सम्मिलित था।

क्रान्तिकारियों के कार्यक्रम क्रान्तिकारियों के प्रमुख कार्यक्रम निम्नलिखित थे:

  1. लेखों, भाषणों और गुप्त प्रचार द्वारा शिक्षित भारतीयों के मस्तिष्क में विदेशी दासता के प्रति घृणा की भावना उत्पन्न करना।
  2. संगीत, नाटक एवं साहित्य द्वारा बेकारी एवं भूख से परेशान लोगों को निडर बनाकर उनमें मातृभूमि के प्रति प्रेम और स्वतन्त्रता की भावना उत्पन्न करना।
  3. सरकार को वन्दे मातरम् जुलूसों एवं स्वदेशी सम्मेलनों तथा बाटॅकॉट के माध्यम से व्यस्त रखना ताकि राष्ट्रीय ‘स्वाधीनता हेतु किये जाने वाले कार्यों को बिना किसी बाधा के सम्पन्न किया जा सके।
  4. बम बनाना, पिस्तौल व बन्दूक आदि गुप्त रूप से मँगवाना और विदेशों से शस्त्र प्राप्त करना।
  5. क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए छापे मारकर धन प्राप्त करना ताकि क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन . सुगमतापूर्वक किया जा सके।
  6. नौजवानों की भर्ती करके उनकी छोटी टुकड़ियाँ बनाना। उन्हें शस्त्रों का प्रयोग करना सिखाना ताकि उन्हें एक प्रशिक्षित व शक्ति-सम्पन्न सैन्य टुकड़ी के रूप में स्थापित किया जा सके।
  7. प्रशिक्षित सैन्य टुकड़ियों के नौजवानों को नियमों एवं आज्ञाओं को पूर्ण पालन करने हेतु शिक्षा प्रदान करना कुशल नेतृत्व के निर्देशन में आगामी रणनीतियों का सफलतापूर्वक संचालन किया जा सके।
  8. आम जनता में राष्ट्रीयता का भाव जागृत करने के लिए संगीत व नाटकों का जनता के सम्मुख प्रस्तुतीकरण । वीरों की जीवनी और स्वतन्त्रता के लिए उनके द्वारा किए गए महान कार्यों की प्रशंसा का प्रसार हो सके।

क्रान्तिकारियों की नीतियाँ। क्रान्तिकारियों की नीति स्पष्ट थी वे किसी भी हालत में ब्रिटिश शासन से भारत को स्वतन्त्र कराना चाहते थे। उन्होंने भारत माँ के मान-सम्मान की रक्षा हेतु तथा उसके गौरव को बनाये रखने के लिए आवश्यक साधन अपनाने पर बल दिया। उनका मानना था कि जो लक्ष्य नैतिक साधनों से प्राप्त नहीं हो सकता उसे हिंसा और बल से प्राप्त किया जाए। क्रान्तिकारियों ने ब्रिटिश शासन को उन्हीं की भाषा में जवाब देते हुए शस्त्रों का प्रयोग भी किया।

उनका सन्देश था “तलवार हाथ में लो एवं सरकार को मिटा दो।” क्रान्तिकारी अंग्रेजों के विरुद्ध शस्त्रों का प्रयोग करना चाहते थे। वे देश में वास्तविक क्रान्ति’ उत्पन्न करना चाहते थे। उन्होंने क्रान्ति के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि, क्रान्ति से हमारा अभिप्राय यह है कि आज की वस्तुस्थिति तथा समाज व्यवस्था जो स्पष्ट रूप से अन्याय पर टिकी हुई है, बदली जाए। क्रान्ति शोषण को समाप्त करने और राष्ट्र के लिए पूर्ण आत्मनिर्णय का अधिकार प्राप्त करने के लिए है।”

प्रश्न 4.
सुभाषचन्द्र बोस के व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
सुभाषचन्द्र बोस का व्यक्तित्व नेताजी की जन उपाधि से विभूषित सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक में उच्च मध्यम वर्गीय बंगाली परिवार में हुआ। इन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा कटक में इंगलिश स्कूल में प्राप्त की। यहाँ पर उन्होंने भारतीय छात्रों के साथ भेदभाव को शैक्षणिक गतिविधियों तथा छात्रवृत्तियों के सम्बन्ध में अनुभव किया।

सन् 1919 में कलकत्ता (कोलकाता) विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधि प्राप्त की। सन् 1920 में भारतीय जनपद सेवा (आईसीएस) की परीक्षा उत्तीर्ण की, परन्तु मई, 1921 में उन्होंने आई.ए.एस. से त्यागपत्र दे दिया। इस प्रकार युवक सुभाष ने चौबीस वर्ष की आयु में ही सांसारिक सुख सुविधा से सम्पन्न आई.ए.एस. के उच्च पद को ठुकराकर ध्येयनिष्ठ जीवन व्यतीत करने का दृढ़ निश्चय किया।

सुभाषचन्द्र बोस के कृतित्व सुभाषचन्द्र बोस के कृतित्व का अध्ययन हम निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत कर सकते हैं
1. काँग्रेस की सदस्यता एवं असहयोग आन्दोलन में सक्रिय भूमिका-भारतीय जनपद सेवा से त्याग-पत्र देने के पश्चात् सुभाषचन्द्र बोस ने भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने हेतु काँग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। इन्होंने असहयोग आन्दोलन के दौरान युवकों को काँग्रेस के आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया।

2. स्वराज्य दल के गठन में सक्रिय भूमिका-सुभाषचन्द्र बोस ने देशबन्धु चितरंजन दास द्वारा स्थापित स्वराज्य, दल के गठन एवं कार्यक्रम का समर्थन किया। उनका विचार था कि अंग्रेजों का विरोध परिषदों के अन्दर भी होना चाहिए।

3. कलकत्ता के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में प्रभावी भूमिका-बंगाल की प्रान्तीय विधान परिषद में 1924 ई. में जब स्वराज्य दल को बहुमत प्राप्त हुआ तो चितरंजन दास महापौर बने, उन्होंने सुभाषचन्द्र बोस को कलकत्ता निगम का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया। यहाँ बोस की कार्यप्रणाली प्रशासन के भारतीयकरण की थी। फलस्वरूप बंगाल सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर माण्डले (म्यांमार) में तीन वर्ष के लिए निर्वासित कर दिया।

4. भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कार्य-सुभाषचन्द्र बोस भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के उदारवादी दल के कट्टर विरोधी थे। उनका लक्ष्य भारत के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त करना था। उन्हें दो बार अखिल भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया।

5. काँग्रेस में फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना-महात्मा गाँधी से मतभेद के कारण सुभाषचन्द्र बोस ने अप्रैल, 1939 में अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया तथा मई, 1939 में काँग्रेस में ही फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। इसका उद्देश्य वामपंथियों को काँग्रेस में संगठित रूप से सक्रिय करना था।

6. गिरफ्तार एवं नजरबन्द तथा भारत से प्रस्थान-सितम्बर, 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो गया। उन्होंने इसे विदेशियों की सहायता द्वारा भारतीय स्वतन्त्रता प्राप्त करने का स्वर्णिम अवसर समझा। उन्हें अपने घर में ही बन्दी बना दिया गया परन्तु सुभाषचन्द्र बोस 17 जनवरी, 1941 में पुलिस की नजरों में धूल झोंककर (भेष बदलकर) बच निकले। वे पेशावर से रूस पहुँचे फिर मार्च 1941 में बर्लिन (जर्मनी) में पहुँच गये। उन्होंने रेडियो से भारत समर्थक तथा अंग्रेज विरोधी भाषण प्रसारित किए। उन्होंने भारतीयों को अंग्रेजी दासता से मुक्ति प्राप्त करने के लिए विद्रोह करने का सुझाव दिया।

7. आजाद हिन्द फौज की स्थापना-सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज का गठन किया जिसमें उन्होंने भारतीय सेना के उन सैनिकों को भर्ती कर लिया जो सिंगापुर एवं मलेशिया से अंग्रेजों के भागने के समय जापान द्वारा युद्ध में बन्दी बना लिए गए थे। मलेशिया में बसे भारतीय समुदाय ने उन्हें परत को अंग्रेजों की दासता से मुक्ति दिलाने के लिए सैनिक सहायता देना स्वीकार कर लिया। बोस ने घोषणा की कि उन्हें इतिहास में कोई भी उदाहरण ऐसा नहीं मिला जिसमें विदेशी सहायता के बिना मुक्ति प्राप्त हुई हो।”

8.  आजाद भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना-नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने 21 अक्टूबर, 1943 को सिंगापुर में आजाद भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की। कुछ ही दिनों बाद आजाद भारत की सरकार को जापान, जर्मनी, इटली, बर्मा (म्यांमार), मंचूरिया राष्ट्रवादी चीन, थाइलैण्ड, फिलीपीन्स आदि राज्यों ने मान्यता प्रदान कर दी। इसके मुख्यालय रंगून एवं सिंगापुर में थे। नवम्बर 1943 में जापान सरकार ने नवविजित अण्डमान एवं निकोबार द्वीपों को इस स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार को सौंप दिया।

9. सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय सेना को भारत की ओर प्रस्थान-भारतीय राष्ट्रीय सेना को सुभाष बाबू ने दिल्ली चलो’ का युद्ध नारा’ दिया। भारतीय राष्ट्रीय सेना में मार्च 1944 में भारत पर आक्रमण आरम्भ कर दिया तथा मई 1944 तक स्वतन्त्र भारतीय भूमि कोहिमा पर ‘तिरंगा’ झण्डा गाड़ दिया परन्तु विश्वयुद्ध में भाग्य ने जापान का साथ नहीं दिया तथा उसे पीछे हटना पड़ा जिससे भारतीय राष्ट्रीय सेना को आगे बढ़ना रुक गया।

10.हवाई दुर्घटना में देहान्त-सुभाषचन्द्र बोस के क्रान्तिकारी जीवन का अन्त एक वायुयानं दुर्घटना में हो गया। कहा जाता है कि सिंगापुर से जापान जाते समय 18 अगस्त, 1945 को एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी। लेकिन नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के देहान्त की स्थिति पर अभी तक प्रश्न चिह्न लगा हुआ है। सुभाषचन्द्र बोस एक कुशल राजनीतिज्ञ, उच्च कोटि के सेनानायक तथा महान देशभक्त थे। उन्होंने स्वतन्त्रता हेतु अपना जीवन बलिदान कर दिया। उनका ‘जयहिन्द’ का नारा आज भी गुंजायमान हो उठता है।

प्रश्न 5.
सरदार भगत सिंह के राष्ट्रीय आन्दोलन में योगदान को समझाइये।
उत्तर:
सरदार भगतसिंह का राष्ट्रीय आन्दोलन में योगदान। सरदार भगतसिंह के राष्ट्रीय आन्दोलन में योगदान का वर्णन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत प्रस्तुत है
1. असहयोग आन्दोलन में भूमिका – सन् 1920 में गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन चलाया तब भगतसिंह नर्वी कक्षा के विद्यार्थी थे। उन्होंने उस आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। किन्तु जब 1922 में गाँधीजी ने अचानक इस आन्दोलन को स्थगित कर दिया तो उन्हें बहुत दु:ख हुआ। कालांतर में उन्होंने काशी विश्वविद्यालय से सम्बद्ध नेशनल कॉलेज में प्रवेश लिया। इस कॉलेज में लाला लाजपत राय ने देशभक्ति पर कई भाषण दिये। इसी समय भगत सिंह इतिहास के प्रोफेसर जयचन्द्र विद्यालंकार की क्रान्तिकारी विचारधारा से बहुत अधिक प्रभावित हुए।

2. एक पत्रकार के रूप में राष्ट्रीय आन्दोलन में योगदान-कानपुर में भगतसिंह ने ‘प्रताप’ के सम्पादक श्री गणेश शंकर विद्यार्थी से पत्रकारिता का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद भगतसिंह ने कानपुर से प्रकाशित ‘प्रताप’ में ‘बलवन्त’ के नाम से एवं पंजाब से प्रकाशित ‘कीर्ति’ में विद्रोह’ के नाम से लेख लिखना प्रारम्भ कर दिया। इसके अतिरिक्त इलाहाबाद से प्रकाशित ‘चाँद’ नामक पत्रिका के महत्वपूर्ण ‘फाँसी अंक’ में उनके लेख प्रकाशित हुए थे। भगत सिंह ने जेल में भी पुस्तकें लिख-

  • बॉयोग्राफी
  • डोर टू डेथ
  • दि रिवोल्यूशनरी मूवमेण्ट इन इण्डिया। इन सबका राष्ट्रीय आन्दोलन पर बहुत व्यापक प्रभाव पड़ा।

3. हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना नामक दल की स्थापना – काकोरी कांड के पश्चात् भगतसिंह, चन्द्रशेखर के सम्पर्क में आए। इसके बाद इन्होंने भारत से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना’ नामक दल की स्थापना की एवं क्रान्ति हेतु हथियार तथा धन एकत्रित करने लगे। भगतसिंह का इस क्रान्तिकारी संस्था में गुप्त नामबलवन्त’ रखा गया।

4. सांडर्स की हत्या – 20 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के बहिष्कार करने वाले जुलूस का नेतृत्व लाला लाजपत राय ने किया था। पुलिस अधीक्षक स्कॉट की लाठियों की चोटों से लाजपत राय घायल हो गए। इसके कारण उनका देहान्त 17 नवम्बर, 1928 को हो गया। राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय पर लाठियों से प्राणघातक हमला करना भारतीय राष्ट्रवाद को कुचलने के समान था।

अतः इस अपमान का बदला लेने के लिए भगतसिंह ने अपने साथियों सहित लाहौर में पुलिस कार्यालय से बाहर आते समय पुलिस अधीक्षक स्कॉट के स्थान पर सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्स की पिस्तौल की गोलियों से हत्या कर दी। भगतसिंह स्कॉट को मारना चाहते थे किन्तु गलती से सांडर्स मारा गया।

5. केन्द्रीय असेम्बली में बम विस्फोट – बरिटिश शासन को चुनौती देने हेतु भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली हॉल में खाली सरकारी बेंचों पर उस समय बम फेंका, जब अध्यक्ष विठ्ठल भाई पटेल ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ पर बोल रहे थे। असेम्बली हॉल में आतंक व्याप्त हो गया।

क्रान्ति पथ के दोनों वीर भागे नहीं, अपितु उन्होंने असेम्बली हॉल में खड़े होकर ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारे लगाए। उन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की ओर से कुछ लाल पर्चे भी बाँटे जिनमें लिखा हुआ था, “बहरे कानों तक अपनी आवाज पहुँचाने के लिए।” भगत सिंह का बम फेंकने का उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं था बल्कि अत्याचारी ब्रिटिश प्रशासन को झकझोरना था।

6. फाँसी की सजा – पुलिस ने केन्द्रीय असेम्बली पर बम विस्फोट के काण्ड में सरदार भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त के अतिरिक्त उनके अन्य साथी को भी हँसा दिया। न्यायाधीश हिल्टन ने इस बम काण्ड में सरदार भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को 7 अक्टूबर, 1930 को फाँसी की सजा सुनाई। सर्वत्र विरोध व प्रदर्शन के बावजूद भी भगतसिंह तथा उनके साथियों को 23 मार्च, 1931 को लाहौर जेल में फाँसी दे दी गयी।

इस घटना से सम्पूर्ण देश में शोक की लहर दौड़ गयी। उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में सरदार भगतसिंह ने एक क्रान्तिकारी के रूप में अदम्य साहस और समाजवादी विचारक के रूप में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उनके कार्यों से सम्पूर्ण भारत में ब्रिटिश सत्ता विरोधी जन चेतना का उद्भव हुआ।

RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म हुआ
(अ) 1866 ई.
(ब) 1867 ई.
(स) 1868 ई.
(द) 1869 ई.
उत्तर:
(अ) 1866 ई.

प्रश्न 2.
गोपाल कृष्ण गोखले के विचारों की प्रमुख प्रवृत्ति है
(अ) उदारवादी
(ब) अतिवादी
(स) क्रान्तिकारी
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) उदारवादी

प्रश्न 3.
तिलक की राजनीतिक पद्धति का साधन नहीं है
(अ) स्वदेशी
(ब) बहिष्कार
(स) निष्क्रिय प्रतिरोध
(द) अनुनय-विनय।
उत्तर:
(द) अनुनय-विनय।

प्रश्न 4.
क्रान्तिकारियों का लक्ष्य नहीं था।
(अ) ब्रिटिश शासन को समाप्त करना
(ब) ब्रिटिश शासन को बनाए रखना
(स) भारतीय जनता को जागरूक करना
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ब) ब्रिटिश शासन को बनाए रखना

RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रारम्भिक चरण किस विचारधारा के आधिपत्य के रूप में जाना जाता है-
(अ) उदारवाद
(ब) अतिवाद
(स) गाँधीवाद
(द) क्रान्तिकारी।
उत्तर:
(अ) उदारवाद

प्रश्न 2.
उदारवादियों की आस्था थी
(अ) धीरे-धीरे सुधारों के लिए आन्दोलन में
(ब) संवैधानिक साधनों के प्रयोग में
(स) अंग्रेजों की न्याय व निष्पक्ष भावना में विश्वास
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 3.
आराम कुर्सी के राजनीतिज्ञ थे
(अ) उदारवादी
(ब) अतिवादी
(स) गाँधीवादी
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(अ) उदारवादी

प्रश्न 4.
“बहुत ही छोटी आयु में उन्होंने अपने आपको देश सेवा के लिए पूर्णतया समर्पित कर दिया और विविध रूपों में देश की अपरिमित सेवा की।” बाल गंगाधर तिलक का यह कथन किसके सम्बन्ध में है
(अ) सुभाषचन्द्र बोस
(ब) भगतसिंह
(स) गोपालकृष्ण गोखले
(द) चन्द्रशेखर आजाद।
उत्तर:
(स) गोपालकृष्ण गोखले

प्रश्न 5.
भारत के किस उदारवादी नेता ने ब्रिटिश सरकार से नाइटहुड उपाधि लेने से इंकार कर दिया था
(अ) लाला लाजपतराय
(ब) गोपालकृष्ण गोखले
(स) दादा भाई नौरोजी
(द) विपिन चन्द्रपाल।
उत्तर:
(ब) गोपालकृष्ण गोखले

प्रश्न 6.
ब्रिटिश जाति की उदारता और न्यायप्रियता में विश्वास करते थे
(अ) गोपालकृष्ण गोखले
(ब) सुभाषचन्द्र बोस
(स) भगतसिंह
(द) बाल गंगाधर तिलक।
उत्तर:
(अ) गोपालकृष्ण गोखले

प्रश्न 7.
गोखले ने अपना सार्वजनिक जीवन प्रारम्भ किया
(अ) डॉक्टर के रूप में
(ब) राजनेता के रूप में
(स) अध्यापक के रूप में
(द) अधिकारी के रूप में।
उत्तर:
(स) अध्यापक के रूप में

प्रश्न 8.
यह कथन किसका है, “स्वराज्य के लक्ष्य की वास्तविक पूर्ति क्रमिक सुधारों द्वारा ही सम्भव है।”
(अ) बाल गंगाधर तिलक का
(ब) गोपालकृष्ण गोखले का
(स) भगतसिंह का
(द) चन्द्रशेखर आजाद का।
उत्तर:
(ब) गोपालकृष्ण गोखले का

प्रश्न 9.
महात्मा गाँधी के राजनीतिक गुरु थे
(अ) गोपाल कृष्ण गोखले
(ब) जवाहर लाल नेहरू
(स) बाल गंगाधर तिलक
(द) दादा भाई नौरोजी।
उत्तर:
(अ) गोपाल कृष्ण गोखले

प्रश्न 10.
“हमारे समय के किसी भी व्यक्ति को जनता पर इतना अधिक प्रभाव नहीं पड़ा, जितना तिलक का। स्वराज्य के सन्देश का किसी ने इतने आग्रह से प्रचार नहीं किया, जितना लोकमान्य ने।” यह कथन है
(अ) सुभाषचन्द्र बोस का
(ब) महात्मा गाँधी को
(स) भगतसिंह का
(द) राजगुरु का।
उत्तर:
(ब) महात्मा गाँधी को

प्रश्न 11.
अतिवादियों को मुख्य उद्देश्य था
(अ) स्वराज्य
(ब) स्वदेशी
(स) बहिष्कार
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 12.
प्रमुख अतिवादी नेता थे
(अ) लाला लाजपत राय
(ब) विपिन चन्द्र पाल
(स) बाल गंगाधर तिलक
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 13.
बाल गंगाधर तिलक का जन्म हुआ?
(अ) 1856 ई. में
(ब) 1866 ई. में
(स) 1867 ई. में
(द) 1869 ई. में।
उत्तर:
(अ) 1856 ई. में

प्रश्न 14.
निम्न में से किस अतिवादी नेता का स्वतन्त्रता सम्बन्धी दृष्टिकोण मूलतः आध्यात्मिक व नैतिक था
(अ) लाला लाजपत राय
(ब) विपिन चन्द्रपाल
(स) बाल गंगाधर तिलक
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(स) बाल गंगाधर तिलक

प्रश्न 15.
भारतीय राष्ट्रवाद को सर्वप्रथम एक सुनिश्चित व मूर्त अवधारणा बनाने का श्रेय किसे दिया जाता है
(अ) स्वामी विवेकानन्द को
(ब) बाल गंगाधर तिलक को।
(स) विपिन चन्द्रपाल को
(द) दादा भाई नौरोजी को।
उत्तर:
(ब) बाल गंगाधर तिलक को।

प्रश्न 16.
निम्न में से किस स्वतन्त्रता सेनानी ने स्वदेशी आन्दोलन के दौरान समर्थ गुरु रामदास के नाम पर अनेक समर्थ विद्यालय खुलवाये
(अ) बाल गंगाधर तिलक
(ब) भगतसिंह
(स) राजगुरु
(द) सावरकर।
उत्तर:
(अ) बाल गंगाधर तिलक

प्रश्न 17.
राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रमुख क्रान्तिकारी थे
(अ) सरदार भगतसिंह
(ब) चन्द्रशेखर आजाद
(स) सुभाषचन्द्र बोस
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 18.
छापे मारकर धन हासिल करते थे
(अ) उदारवादी
(ब) अतिवादी
(स) क्रान्तिकारी
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(स) क्रान्तिकारी

प्रश्न 19.
क्रान्तिकारियों को मुख्य लक्ष्य था
(अ) भारतीयों को विदेशी शासन से मुक्त कराना
(ब) भारत को अधिराज्य बनाना।
(स) असहयोग आन्दोलन चलाना
(द) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(अ) भारतीयों को विदेशी शासन से मुक्त कराना

प्रश्न 20.
सरदार भगतसिंह का जन्म हुआ
(अ) 1866 ई. में
(ब) 1907 ई. में
(स) 1928 ई. में
(द) 1942 ई. में।
उत्तर:
(ब) 1907 ई. में

प्रश्न 21.
निम्न में से भगतसिंह द्वारा लिखित पुस्तक है
(अ) बायोग्राफी
(ब) डोर टू डेथ
(स) दि रिवोल्यूशनरी मूवमेन्ट इन इण्डिया
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 22.
लाहौर के पुलिस अधिकारी साण्डर्स की हत्या में कौन-कौन से क्रान्तिकारी शामिल थे
(अ) भगत सिंह, राजगुरु, आजाद
(ब) भगतसिंह, लाला लाजपत राय
(स) सुभाषचन्द्र बोस, बिस्मिल
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) भगत सिंह, राजगुरु, आजाद

प्रश्न 23.
काकोरी की ट्रेन डकेती में भाग लिया था
(अ) चन्द्रशेखर आजाद ने
(ब) सुभाषचन्द्र बोस ने
(स) मैडम कामा ने
(द) तिलक ने।
उत्तर:
(अ) चन्द्रशेखर आजाद ने

प्रश्न 24.
अल्फ्रेड पार्क का सम्बन्ध निम्न में से किस क्रान्तिकारी से था
(अ) सुभाषचन्द्र बोस
(ब) चन्द्रशेखर आजाद
(स) राजगुरु
(द) भगतसिंह।
उत्तर:
(ब) चन्द्रशेखर आजाद

प्रश्न 25.
निम्न में से किस स्वतन्त्रता सेनानी ने भारतीय जनपद सेवा से त्यागपत्र दे दिया था
(अ) सुभाषचन्द्र बोस
(ब) चितरंजन दास
(स) भगतसिंह
(द) सावरकर
उत्तर:
(अ) सुभाषचन्द्र बोस

प्रश्न 28.
दिल्ली चलो का नारा किस क्रान्तिकारी ने दिया था
(अ) भगतसिंह
(ब) राजगुरु
(स) चन्द्रशेखर
(द) सुभाषचन्द्र बोस
उत्तर:
(द) सुभाषचन्द्र बोस

प्रश्न 27.
आजाद हिन्द की अस्थायी सरकार की स्थापना किसने की
(अ) सुभाषचन्द्र बोस
(ब) रास बिहारी बोस
(स) दादा भाई नौरोजी
(द) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) सुभाषचन्द्र बोस

RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ब्रिटिश सरकार के प्रति उदारवादी नेताओं का क्या दृष्टिकोण था?
उत्तर:
उदारवादी नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश सरकार के सहयोग एवं सहायता से भारत का क्रमिक विकास सम्भव है।

प्रश्न 2.
गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म कब और कहाँ हुआ?
उत्तर:
गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 1866 ई. में बम्बई प्रान्त के कोल्हापुर जिले में हुआ था।

प्रश्न 3.
इंग्लैण्ड की यात्राओं में गोखले ने क्या प्रशंसनीय कार्य किया?
उत्तर:
इंग्लैण्ड की यात्राओं में गोखले ने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की ब्रिटिश समिति एवं उसके पत्र इण्डिया को सक्रिय बनाने का प्रशंसनीय कार्य किया।

प्रश्न 4.
गोपाल कृष्ण गोखले कब व किसके निमन्त्रण पर दक्षिण अफ्रीका गए?
उत्तर:
गोपाल कृष्ण गोखले 1912 ई. में महात्मा गाँधी के निमन्त्रण पर दक्षिण अफ्रीका गए।

प्रश्न 5.
दक्षिण अफ्रीका में गोपाल कृष्ण गोखले ने क्या महत्वपूर्ण कार्य किया?
उत्तर:
गोपाल कृष्ण गोखले ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय सत्याग्रहियों एवं दक्षिण अफ्रीका की सरकार के मध्य समझौती कराया।

प्रश्न 6.
किस भारतीय उदारवादी नेता ने ‘भारत मन्त्री’ की परिषद् की सदस्यता ग्रहण करने से इंकार कर दिया?
उत्तर:
गोपाल कृष्ण गोखले ने।

प्रश्न 7.
गोखले के राजनीतिक दर्शन की कोई दो मुख्य बातें बताइए।
उत्तर:

  1. ब्रिटिश जाति की उदारता एवं न्यायप्रियता में विश्वास
  2. राष्ट्रवाद के समर्थक एवं पोषक।

प्रश्न 8.
भारत सेवक संघ की स्थापना कब और किसने की?
उत्तर:
भारत सेवक संघ की स्थापना 12 जून, 1905 को गोपालकृष्ण गोखले ने की।

प्रश्न 9.
गोखले के अनुसार स्वशासन का क्या अर्थ है?
उत्तर:
गोखले के अनुसार स्वशासन का अर्थ है-“ब्रिटिश प्रशासनिक तन्त्र के स्थान पर भारतीय प्रशासनिक तन्त्र को प्रतिष्ठित करना, विधान परिषदों का विस्तार एवं सुधार करते-करते उन्हें वास्तविक संस्था बना देना और जनता को अपने मामलों का प्रबन्ध स्वयं करने देना।”

प्रश्न 10.
सत्ता के केन्द्रीकरण के सम्बन्ध में गोखले की क्या मान्यता थी?
उत्तर:
गोखले के अनुसार सत्ता का केन्द्रीकरण प्रशासनिक स्वेच्छाचारिता और परिणामतः जनता के कष्टों को बढ़ाता है।

प्रश्न 11.
गोखले ने हाबहाउस विकेन्द्रीकरण आयोग के समक्ष सत्ता के विकेन्द्रीकरण के लिए कौन-कौन से सुझाव दिए ?
उत्तर:
विकेन्द्रीकरण हेतु गोखले ने निम्नलिखित सुझाव दिए

  1. प्रशासन के सबसे निम्न स्तर पर ग्राम पंचायत हों, जिन्हें शासन सम्बन्धी पर्याप्त अधिकार दिए जाए।
  2. प्रशासन के मध्य स्तर पर जिला परिषदों का गठन होना चाहिए।
  3. प्रशासन के शिखर पर पुनर्गठित विधान परिषद् हों।

प्रश्न 12.
गोखले की राजनीतिक विचारधारा का मुख्य लक्ष्य क्या था?
उत्तर:
गोखले की राजनीतिक विचारधारा का मुख्य लक्ष्य था- भारत के शासन में राजनीतिक, प्रशासनिक एवं आर्थिक सुधार करना।

प्रश्न 13.
गोखले ने राष्ट्रवादी विचारों को व्यावहारिक रूप देने के लिए कौन-सी संस्था की स्थापना की?
उत्तर:
भारत सेवक संघ की।

प्रश्न 14.
गोखले के क्रमिक सुधारों का अन्तिम लक्ष्य क्या था?
उत्तर:
गोखले के क्रमिक सुधारों का अन्तिम लक्ष्य था- भारतवर्ष में अंग्रेजी साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन की प्राप्ति।

प्रश्न 15.
गोखले के स्वदेशी के सम्बन्ध में क्या विचार थे?
उत्तर:
गोखले स्वदेशी की भावना को देशभक्ति का प्रतीक व एक पवित्र विचार मानते थे। उनके लिए स्वदेशी केवल एक आर्थिक शस्त्र नहीं था बल्कि उसमें जनता की आत्मनिर्भरता की आकांक्षा और आत्मसम्मान की चेतना की सकारात्मक अभिव्यक्ति निहित थी।

प्रश्न 16.
गोखले स्वदेशी के नकारात्मक पक्ष ‘बहिष्कार’ से सहमत क्यों नहीं थे?
उत्तर:
गोखले के अनुसार बहिष्कार का विचार एक उग्र विचार था, जो अपने आप में प्रतिशोध की भावना का संकेत देता था।

प्रश्न 17.
बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरु किए गए दो उत्सवों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. गणपति पूजा
  2. शिवाजी उत्सव।

प्रश्न 18.
अतिवादी नेताओं ने स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु किस प्रकार के साधन अपनाये जाने का समर्थन किया?
उत्तर:
उग्र साधन अपनाये जाने का।

प्रश्न 19.
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दो अतिवादी नेताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. बाल गंगाधर तिलक
  2. लाला लाजपत राय।

प्रश्न 20.
उदारवादी विचारधारा एवं अतिवादी विचारधारा में कोई एक अन्तर बताइए।
उत्तर:
उदारवादी ब्रिटिश शासन को भारतीयों के लिए वरदान मानते थे, जबकि अतिवादी उसे अभिशाप मानते थे।

प्रश्न 21.
अतिवादियों के कार्यक्रम का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अतिवादियों का कार्यक्रम बहिष्कार, स्वदेशी एवं राष्ट्रीय शिक्षा था।

प्रश्न 22.
अतिवादियों के कार्यक्रम का मूल आधार क्या था?
उत्तर:

  1. विदेशी माल का बहिष्कार करना
  2. स्वदेशी का प्रयोग करना।

प्रश्न 23.
लाल, बाल, पाल के नाम से कौन-कौन-से अतिवादी नेता प्रसिद्ध थे?
उत्तर:
लाल – लाला लाजपत राय, बाल – बाल गंगाधर तिलक एवं पाल – विपिन चन्द्र पाल।

प्रश्न 24.
बाल गंगाधर तिलक का जन्म कब व कहाँ हुआ?
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को कोंकण जिले के रत्नागिरी में हुआ था।

प्रश्न 25.
स्वराज्य, स्वदेशी, बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा का सन्देश किसने दिया?
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक ने।

प्रश्न 26.
“स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा।” यह नारा किस विचारक का है?
उत्तर:
लोकमान्य बालगंगाधर तिलक का।

प्रश्न 27.
तिलक के राजनीतिक दर्शन के कोई दो बिन्दु लिखिए।
उत्तर:

  1. व्यक्ति और समाज का आधार नैतिकता है
  2. स्वतन्त्रता सम्बन्धी दृष्टिकोण मूलत: आध्यात्मिक व नैतिक है।

प्रश्न 28.
तिलक के अनुसार स्वतन्त्रता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
तिलक के अनुसार, स्वतन्त्रता व्यक्ति के नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास का भावनात्मक सामर्थ्य एवं शक्ति है।

प्रश्न 29.
तिलक के अनुसार स्वराज्य के दो प्रमुख रूप कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. आध्यात्मिक स्वराज्य
  2. राजनीतिक स्वराज्य।

प्रश्न 30,
तिलक ने अपने राजनीतिक चिन्तन में किस बात पर अधिक बल दिया है?
उत्तर:
तिलक ने अपने राजनीतिक चिन्तन में मुख्यतः साध्य की पवित्रता पर अधिक बल दिया है।

प्रश्न 31.
तिलक ने स्वराज्य के साध्य की प्राप्ति के लिए किन-किन साधनों का समर्थन किया?
उत्तर:
तिलक ने स्वराज्य के साध्य की प्राप्ति के लिए, निम्नलिखित साधन बताए

  1. निष्क्रिय प्रतिरोध
  2. स्वदेशी को प्रचार
  3. बहिष्कार,
  4. राष्ट्रीय शिक्षा।

प्रश्न 32.
भारतीय राष्ट्रवाद को सर्वप्रथम एक सुनिश्चित व मूर्त अवधारणा बनाने का श्रेय किसको है?
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक को।

प्रश्न 33.
सर्वप्रथम स्वराज्य का विचार देने का श्रेय किसको है?
उत्तर:
स्वामी दयानन्द सरस्वती को।

प्रश्न 34.
स्वदेशी राष्ट्रवाद के समर्थक कौन थे?
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक।

प्रश्न 35.
तिलक ने अपने राजनीतिक चिन्तन का केन्द्र किसे बनाया?
उत्तर:
भारत के लिए स्वराज्य प्राप्ति को।

प्रश्न 36.
तिलक के राष्ट्रवाद को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
हिन्दू पुनरुत्थानवादी राष्ट्रवाद के नाम से।

प्रश्न 37.
तिलक सम्पूर्ण भारत के संदर्भ में किस प्रकार के राष्ट्रवाद का विकास करना चाहते थे?
उत्तर:
भारतीय राष्ट्रवाद का।

प्रश्न 38.
उग्र राष्ट्रीय साधन अथवा गरमपंथी साधन अथवा उग्र राष्ट्रवादी संवैधानिक साधन से क्या आशय है?
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक ने ब्रिटिश शासन की निरंकुशता के विरोध एवं स्वराज्य की प्राप्ति के लिए अपनी राजनीतिक पद्धति व कार्यक्रम को तय किया तथा खुले राजनीतिक साधनों को अपनाया। इन्हें उग्र राष्ट्रीय साधन, गरमपंथी साधन अथवा उग्र राष्ट्रवादी संवैधानिक साधन कहा जाता है।

प्रश्न 39.
तिलक के अनुसार स्वदेशी का विचार क्या था?
उत्तर:
तिलक के अनुसार, स्वदेशी भारत के आध्यात्मिक उत्थान एवं राजनीतिक स्वराज्य की प्राप्ति का प्रमुख आधार है। कालान्तर में यह सम्पूर्ण राष्ट्रीय जीवन के पुनरुत्थान का आन्दोलन बन गया।

प्रश्न 40.
बहिष्कार आन्दोलन का प्रारम्भिक उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
ब्रिटिश शासन के आर्थिक हितों पर दबाव डालकर उसे बंगाल विभाजन के निर्णय को निरस्त करने के लिए बाध्य करना।

प्रश्न 41.
तिलक बहिष्कार को एक प्रभावशाली शस्त्र क्यों मानते थे?
उत्तर:
क्योंकि बहिष्कार के माध्यम से भारत की निहत्थी जनता, बिना किसी हिंसक संघर्ष के ही ब्रिटिश शासन से मुक्ति पा सकती थी।

प्रश्न 42.
दक्षिण शिक्षा समाज संस्था की स्थापना कब वे किसने की?
उत्तर:
1884 ई. में बाल गंगाधर तिलक ने।

प्रश्न 43.
भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन के उदय के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  1. अंग्रेजों द्वारा उदारवादी तथा उग्रवादी आन्दोलन का दमन करना।
  2.  अंग्रेजों की नस्लवादी भेदभाव की नीति।

प्रश्न 44.
स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु क्रान्तिकारियों के कार्यक्रम में सम्मिलित किन्हीं दो उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. भारतीयों के मन में राष्ट्रीयता, स्वतन्त्रता एवं मातृभूमि के प्रति प्रेम जागृत करना।
  2. क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए छापे मारकर धन प्राप्त करना।

प्रश्न 45.
भारतीय क्रान्तिकारियों ने किस देश से प्रेरणा ली?
उत्तर:
आयरलैण्ड से।

प्रश्न 46.
किन्हीं दो क्रान्तिकारी नेताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. सरदार भगतसिंह
  2. चन्द्रशेखर आजाद।

प्रश्न 47.
सरदार भगतसिंह का जन्म कब व कहाँ हुआ?
उत्तर:
सरदार भगतसिंह का जन्म लायलपुर (पंजाब) के बंगा गाँव में 27 सितम्बर, 1907 को हुआ था।

प्रश्न 48.
भगत सिंह को पत्रकारिता का प्रशिक्षण किसने प्रदान किया?
उत्तर:
गणेश शंकर विद्यार्थी ने।

प्रश्न 49.
भगतसिंह द्वारा लिखित किन्हीं दो पुस्तकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. बॉयोग्राफी
  2. डोर टू डेथ।

प्रश्न 50.
‘जेल नोट बुक’ नामक पुस्तक किसने लिखी?
उत्तर:
भगतसिंह ने।

प्रश्न 51.
केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंकने के पश्चात् इन्कलाब जिन्दाबाद, ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारे किसने लगाए।
उत्तर:
भगतसिंह एवं बटुकेश्वर दत्त ने।

प्रश्न 52.
‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ का नारा किसने दिया?
उत्तर:
भगतसिंह ने।

ग्रश्न 53.
केन्द्रीय असेम्बली में बमकाण्ड के दौरान किस विधेयक पर विचार हो रहा था?
उत्तर:
‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ पर।

प्रश्न 54.
चन्द्रशेखर आजाद का जन्म कब व कहाँ हुआ?
उत्तर:
चन्द्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के बहोर नामक ग्राम में हुआ था।

प्रश्न 55.
चन्द्रशेखर आजाद कब भारतीय क्रान्तिकारी दल में सम्मिलित हुए थे?
उत्तर:
सन् 1922 में।

प्रश्न 56.
चन्द्रशेखर आजाद ने किस ट्रेन डकेती में भाग लिया था?
उत्तर:
काकोरी ट्रेन डकेती में।

प्रश्न 57.
पुलिस अधिकारी सान्डर्स की हत्या में कौन – कौन से क्रान्तिकारी सम्मिलित थे?
उत्तर:
सरदार भगतसिंह, राजगुरु एवं चन्द्रशेखर आजाद

प्रश्न 58.
चन्द्रशेखर आजाद ने क्या प्रतिज्ञा की थी?
उत्तर:
चन्द्रशेखर आजाद ने प्रतिज्ञा की थी कि, “दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।”

प्रश्न 59.
सरदार भगतसिंह एवं उनके साथियों को ब्रिटिश शासन में कब फाँसी दी?
उत्तर:
23 मार्च, 1931 को।

प्रश्न 60.
नेताजी के नाम से किस क्रान्तिकारी को जाना जाता है?
उत्तर:
सुभाषचन्द्र बोस को।

प्रश्न 61.
सुभाषचन्द्र बोस का जन्म कब वे कहाँ हुआ?
उत्तर:
23 जनवरी, 1897 को कटक में।

प्रश्न 62.
सुभाषचन्द्र बोस ने राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने के लिए किस पद से त्याग – पत्र दिया था?
उत्तर:
भारतीय जनपद सेवा (आईसीएस) से।

प्रश्न 63.
सुभाषचन्द्र बोस ने काँग्रेस के कौन-कौन से अधिवेशनों की अध्यक्षता की थी?
उत्तर:
हरिपुरा एवं त्रिपुरा अधिवेशनों की।

प्रश्न 64.
फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना कब व किसने की?
उत्तर:
मई, 1939 में सुभाषचन्द्र बोस ने।

प्रश्न 65.
आजाद हिन्द फौज का गठन किसने किया?
उत्तर:
सुभाषचन्द्र बोस ने।

प्रश्न 66.
आजाद भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना कहाँ की गयी?
उत्तर:
सिंगापुर में।

प्रश्न 67.
आजाद भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना कब व किसने की?
उत्तर:
21 अक्टूबर, 1943 को सुभाषचन्द्र बोस ने।

प्रश्न 68.
भारतीय राष्ट्रीय सेना को सुभाषचन्द्र बोस ने क्या नारा दिया था?
उत्तर:
‘दिल्ली चलो’ का युद्ध नारा।

प्रश्न 69.
आजाद भारत की अस्थायी सरकार को कितने देशों ने मान्यता प्रदान की?
उत्तर:
नौ देशों ने।

प्रश्न 70.
जयहिन्द का नारा किसने दिया?
उत्तर:
सुभाषचन्द्र बोस ने।

RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘गोपाल कृष्ण गोखले ब्रिटिश जाति की उदारता एवं न्यायप्रियता में विश्वास करते थे? इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गोपाल कृष्ण गोखले ब्रिटिश जाति की उदारता एवं न्यायप्रियता में विश्वास करते थे। गोखले को मानव स्वभाव की मूलभूत अच्छाई में विश्वास था। उनकी शिक्षा-दीक्षा ने उनमें ब्रिटिश उदारवाद के प्रति गहरी आस्था उत्पन्न कर दी थी। गोखले ब्रिटिश राज को भारत के लिए ईश्वरीय वरदान मानते थे। उनके मतानुसार ब्रिटिश शासन के कारण ही भारत में आधुनिक राष्ट्रीय चेतना तथा लोकतान्त्रिक विचारों का समय आया था। गोखले के अनुसार ब्रिटिश शासन का लक्ष्य इंग्लैण्ड का लाभ नहीं है वरन् भारत का भौतिक कल्याण करना था।

वे केवल शासन ही नहीं करना चाहते थे, वरन्। जनता की सहायता करना चाहते थे। ब्रिटिश शासन ने ही भारत को राजनीतिक एकता एवं सम्पूर्ण भारत को एक समान विधि एवं न्यायव्यवस्था प्रदान की थी, यही नहीं अंग्रेजी भाषा, शिक्षा पद्धति तथा संचार साधन भी प्रदान किया। अपने विचारों के अनुरूप ही वे एक ओर भारतीय जनता को ब्रिटिश राजभक्त होने के लिए प्रेरित करते थे, तो दूसरी ओर शासन को भी उसके राजनीतिक एवं भौतिक, नैतिक दायित्व का स्मरण कराते थे।

प्रश्न 2.
‘गोपाल कृष्ण गोखले संवैधानिक साधनों एवं वैधानिक आन्दोलनों में अडिग विश्वास करते थे’ कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गोखले का संवैधानिक साधनों तथा वैधानिक आन्दोलनों में अडिग विश्वास था। वे उग्र विचारों, साधनों तथा असंवैधानिक मार्ग को भारत के लिए अहितकर समझते थे तथा इसके विरुद्ध थे। वे ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत स्वशासन के लक्ष्य को संवैधानिक तरीकों से ही प्राप्त करना चाहते थे। वे व्यावहारिक दृष्टि से ब्रिटिश शासन की संगठित शक्ति की मुकाबला करना असम्भव मानते थे। गोखले के संवैधानिक साधन मूलत: उदारवादी तथा शान्तिपूर्ण, यथा-याचिका, प्रार्थना – पत्र, स्मरण – पत्र, प्रतिनिधि – मण्डल, समाचार-पत्र, विचार-विमर्श, अधिवेशन, सभा, रचनात्मक आलोचना आदि थे। उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोध की नीति पर आधारित जन आन्दोलनों को भी वैधानिक साधन ही स्वीकार किया।

प्रश्न 3.
‘बाल गंगाधर तिलक का राष्ट्रवाद प्राचीन भारत के गौरव से प्रभावित था-इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रवाद का प्राचीन भारतीय गौरव से प्रभावित होना-भारतीय राष्ट्रवाद को एक निश्चित एवं मूर्त अवधारणा बनाने का श्रेय तिलक को दिया जा सकता है। गोखले के विपरीत तिलक राष्ट्रवाद को भारतीय परम्परओं, भावनाओं तथा परिस्थितियों के अनुरूप ही विकसित करना चाहते थे। तिलक ‘स्वदेशी राष्ट्रवाद’ के समर्थक थे।

तिलक का मत था, “हम अपनी संस्थाओं का अंग्रेजीकरण नहीं करना चाहते।” वे उदारवादियों के इसे मत से सहमत नहीं थे कि भारत की राजनीतिक एकता ब्रिटिश शासन की कृपा का परिणाम है। तिलक ने हिन्दू राष्ट्र’ के विचार को प्रस्तुत किया और हिन्दुओं को संगठित करने के लिए गणेश उत्सव तथा शिवाजी उत्सव को प्रारम्भ किया, किन्तु शीघ्र ही उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता को आधार बनाया एवं समस्त भारतीयों के लिए स्वराज्य की माँग की।

तिलक ने राष्ट्रवाद को ‘राष्ट्रधर्म’ कहा। तिलक का राष्ट्रवाद बहुआयामी था, यह एक साथ ही धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक था। वे राष्ट्रवाद द्वारा भारत के सम्पूर्ण जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन चाहते थे। तिलक प्रथम राजनेता थे जिन्होंने राष्ट्रवाद को उसकी सम्पूर्णता में प्रकट किया। अतः तिलक द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रवाद ‘समग्र राष्ट्रवाद’ कहलाता है।

प्रश्न 4.
स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु अतिवादी आन्दोलन के विशिष्ट पक्षों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु अतिवादी आन्दोलन के विशिष्ट पक्ष – स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु अतिवादी आन्दोलन के विशिष्ट पक्ष निम्नलिखित थे

  1. ब्रिटिश शासन को भारतीयों के लिए कल्याणकारी न मानना तथा विदेशी शासन से असहयोग करना।
  2. ब्रिटिश न्यायप्रियता एवं चारित्रिक उच्चता में विश्वास नहीं करना।
  3. याचना या दया से नहीं वरन् स्वाभिमान तथा स्वावलम्बन से अपने अधिकारों की प्राप्ति की आकांक्षा का होना। जैसा कि तिलक ने कहा, “हमारा आदर्श दया भावना नहीं, आत्मनिर्भरता है।”
  4. जनता को सीधी राजनीतिक कार्यवाही के लिए प्रेरित करना एवं जागरूकता हेतु नवीन नारों को प्रचलन में
    लाना।
  5. अतिवादी स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए संवैधानिक साधनों को अपर्याप्त मानते थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वराज्य दान से नहीं, सामर्थ्य से ही प्राप्त किया जा सकता है।
  6.  अतिवादियों द्वारा भारतीय संस्कृति के प्रति आत्म गौरव की भावना की पद्धति को बढ़ावा दिया गया।

प्रश्न 5.
बाल गंगाधर तिलक के अनुसार स्वदेशी के विचार को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक के स्वदेशी से सम्बन्धित विचार – बाल गंगाधर तिलक ने स्वदेशी को देशप्रेम का प्रतीक बना दिया। वे इसका राजनीतिक महत्व स्पष्ट करते हुए कहते थे कि यही ऐसा प्रभावशाली साधन है जो हमें मुक्ति दिला सकता है। तिलक के लिए स्वदेशी का विचार केवल भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता तक सीमित नहीं था बल्कि वे इसे भारत के आध्यात्मिक उत्थान तथा राजनीतिक स्वराज्य की प्राप्ति का प्रमुख आधार मानते थे। इनका स्वदेशी आन्दोलन सम्पूर्ण राष्ट्रीय जीवन के पुनरुत्थान का आन्दोलन बन गया। स्वदेशी के राजनीतिक महत्व को प्रकट करते हुए तिलक ने कहा, “यदि हम गोरे लोगों की गुलामी में नहीं रहना चाहते हैं तो हमें स्वदेशी के आन्दोलन को पूरी ताकत के साथ चलाना होगा। यही एकमात्र ऐसा प्रभावशाली साधन हैं जो हमें मुक्ति दिला सकता है।”

प्रश्न 6.
बहिष्कार आन्दोलन को स्पष्ट कीजिए। बहिष्कार के सम्बन्ध में बाल गंगाधर तिलक के विचारों को बताइए।
उत्तर:
बहिष्कार आन्दोलन-बाल गंगाधर तिलक ने बहिष्कार अर्थात् बॉयकाट के प्रस्ताव का समर्थन 1905 के काँग्रेस के बनारस अधिवेशन में किया। उदारवादियों के विरोध के बावजूद काँग्रेस ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया। बहिष्कार आन्दोलन का प्रारम्भिक उद्देश्य था – ब्रिटिश शासन के आर्थिक हितों पर दबाव डालकर उसे बंग-भंग के निर्णय को रद्द करने के लिए बाध्य करना।

तिलक ने इस आन्दोलन के द्वारा भारतीयों को ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार उन्होंने भारत में ब्रिटिश व्यापार को नष्ट करने का प्रयास किया। बहिष्कार के सम्बन्ध में बाल गंगाधर तिलक के विचार-तिलक बहिष्कार को ऐसा राजनीतिक शस्त्र मानते थे, जिसकी सहायता से भारत की निहत्थी जनता, बिना किसी हिंसक संघर्ष के ही, ब्रिटिश शासन से मुक्ति पा सकती थी।

तत्कालीन समाचार – पत्र ‘दि इंग्लिश मैन’ के समाचार से बहिष्कार की सफलता स्पष्ट होती है। कई बड़ी-बड़ी यूरोपियन दुकानें बन्द हो गईं हैं तथा उनका व्यापार बहुत घट गया है।” तिलक ने बहिष्कार की भावना को केवल आर्थिक पक्ष तक सीमित नहीं माना। तिलक बहिष्कार को ऐसा प्रभावशाली राजनीतिक शस्त्र मानते थे, जिसकी मदद से भारत की निहत्थी जनता, बिना किसी हिंसक संघर्ष के ही, ब्रिटिश शासन से मुक्ति पा सकती है।

प्रश्न 7.
बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज्य की प्राप्ति के लिए निष्क्रिय प्रतिरोध के साधन को अत्यन्त महत्वपूर्ण साधन माना? क्यों? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज्य की प्राप्ति के लिए निष्क्रिय प्रतिरोध के साधन को इसलिए महत्वपूर्ण माना। क्योंकि उनके निष्क्रिय प्रतिरोध के दर्शन का आधार यह विचार था कि अन्यायपूर्ण कानून का विरोध करना व्यक्ति का कर्तव्य है। तिलक निष्क्रिय प्रतिरोध की पद्धति को मूलतः संवैधानिक भी मानते थे। उनके मतानुसार, यह पद्धति मूलतः कानून, न्याय, नैतिकता एवं लोकमत के अनुकूल थी।

तिलक की निष्क्रिय प्रतिरोध की नीति में हिंसक प्रतिरोध के लिए कोई स्थान नहीं था। वस्तुतः निष्क्रिय प्रतिरोध स्वेच्छा पर आधारित सामूहिक असहयोग की नीति थी। तिलक आर्थिक, वैधानिक, प्रशासनिक, न्यायिक आदि समस्त क्षेत्रों में ब्रिटिश नौकरशाही के प्रति निष्क्रिय प्रतिरोध के रूप में जनता को असहयोग प्राप्त करना चाहते थे।

प्रश्न 8.
‘बाल गंगाधर तिलक ने शिक्षा को अपने राजनीतिक साध्य, स्वराज्य की प्राप्ति के लिए एक आधारभूत साधन के रूप में स्वीकार किया-कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बाल गंगाधार तिलक राष्ट्र के उत्थान में शिक्षा की भूमिका को अत्यन्त महत्व देते थे। तिलक ने शिक्षा को अपने राजनीतिक साध्य स्वराज्य की प्राप्ति के लिए एक आधारभूत साधन के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने ‘न्यू इंग्लिश स्कूल’ ‘दक्षिण शिक्षा समाज’ एवं ‘फग्र्युसन कॉलेज’ की स्थापना की।

बाद में स्वदेशी आन्दोलन के दौरान समर्थ गुरु रामदास के नाम पर उन्होंने अनेक ‘समर्थ विद्यालय’ खुलवाए। वे छात्रों को इस प्रकार शिक्षित किए जाने के पक्ष में थे कि उनमें स्वराज्य प्राप्ति की तीव्र भावना उत्पन्न हो। वे मातृभाषा में शिक्षा के पक्ष में थे। राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं के छात्रों ने राष्ट्रीय आन्दोलनों में सक्रिय भाग लिया तथा जनता में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार किया।

प्रश्न 9.
बाल गंगाधर तिलक के मतानुसार राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली एवं पाठ्यक्रम में कौन-कौन से गुण होने चाहिए?
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक के मतानुसार राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली एवं पाठ्यक्रम में निम्नलिखित गुण होने चाहिए

  1. विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाए।
  2. समस्त भारतीयों के बीच सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकारा जाये तथा इसे राष्ट्रभाषा माना जाए।
  3. भारत की विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के लिए देवनागरी लिपि को अपनाया जाए।
  4. भारत में औद्योगिक विकास के लिए तकनीकी शिक्षा का प्रबन्ध किया जाये। इससे युवकों को रोजगार के नये अवसर प्राप्त होंगे तथा भारत आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर होगा।
  5. विद्यार्थियों को राजनीतिक शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि वे राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों से परिचित हों तथा राष्ट्रोत्थान में सक्रिय भूमिका का निर्वाह कर सके।
  6. विद्यार्थियों को धार्मिक शिक्षा दी जानी चाहिए। यह शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए कि छात्रों में धार्मिक सहिष्णुता की भावना विकसित हो सके।

प्रश्न 10.
क्रान्तिकारी आन्दोलन के उत्थान के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
क्रान्तिकारी आन्दोलन से क्या आशय है? इसके उदय के क्या कारण थे?
उत्तर:
क्रान्तिकारी आन्दोलन से आशय एवं इसके उदय के कारण – उदारवादियों व अतिवादियों द्वारा किए गए अथक प्रयासों के उपरान्त भी उन्हें अधिक सफलता प्राप्त नहीं हुई। ब्रिटिश शासन ने इस ओर ध्यान देने के बजाय भारतीय जनता का दमन तथा अत्याचार करना प्रारम्भ कर दिया। अनेक दमनकारी कानूनों का निर्माण किया स्वतन्त्रता आन्दोलन में लगे हुए बड़े-बड़े नेताओं को जेलों में डालनी प्रारम्भ कर दिया गया। जुलूसों एवं सभाओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया तथा हजारों लोगों को बंगाल विभाजन के विरुद्ध आन्दोलन करने के कारण जेल भेज दिया गया।

जेल में उन पर घोर अत्याचार किए गए। ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति के परिणामस्वरूप भारतीय राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रीय आन्दोलन की एक नई विचारधारा का जन्म हुआ, जिसे क्रान्तिकारी आन्दोलन कहते हैं। इसके समर्थक हिंसात्मक साधनों द्वारा ब्रिटिश शासन को नष्ट करके स्वतन्त्रता प्राप्त करना चाहते थे। प्रमुख क्रान्तिकारी नेताओं में सुभाषचन्द्र बोस, भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, वीर सावरकर आदि सम्मिलित थे।

प्रश्न 11.
क्रान्तिकारियों की प्रमुख नीतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
क्रान्तिकारियों की प्रमुख नीतियाँ – क्रान्तिकारियों की नीति स्पष्ट थी। वे किसी भी हालत में ब्रिटिश शासन से भारत को स्वतन्त्र कराना चाहते थे। उन्होंने भारत माँ के मान-सम्मान की रक्षा हेतु तथा उसके गौरव को बनाये रखने के लिए आवश्यक साधन अपनाने पर बल दिया। उनका मत था कि जो लक्ष्य नैतिक साधनों से प्राप्त नहीं हो सकता, उसे हिंसा एवं बल से प्राप्त किया जाए। क्रान्तिकारियों ने ब्रिटिश शासन को उन्हीं की भाषा में जवाब देते हुए शस्त्रों को प्रयोग भी किया। उनका सन्देश था, “तलवार हाथ में लो तथा सरकार को मिटा दो।”

क्रान्तिकारी अंग्रेजों के विरुद्ध शस्त्रों का प्रयोग करना चाहते थे वे देश में वास्तविक क्रान्ति उत्पन्न करना चाहते थे। उन्होंने क्रान्ति के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि क्रान्ति से हमारा अभिप्राय यह है कि आज की वस्तुस्थिति तथा समाज व्यवस्था जो स्पष्ट रूप से अन्याय पर टिकी हुई है, को बदला जाए। क्रान्ति, शोषण को समाप्त करने तथा राष्ट्र के लिए पूर्ण आत्मनिर्णय का अधिकार प्राप्त करने के लिए है।

प्रश्न 12.
क्रान्तिकारियों के प्रमुख लक्ष्य क्या थे? संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
क्रान्तिकारियों के प्रमुख लक्ष्य – क्रान्तिकारियों का मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश शासन को भारत से पूर्णतः समाप्त करना था। क्रान्तिकारी ब्रिटिश शासकों के मन में अत्याचारों के विरुद्ध आतंक उत्पन्न करना चाहते थे। क्रान्तिकारी नेता केवल उसी ब्रिटिश अधिकारी की हत्या करते थे, जो भारतीय देशभक्तों पर अधिक अत्याचार करते था।

क्रान्तिकारी भारतीय जनता को संघर्ष की प्रेरणा देना तथा अंग्रेजी शासन के मन में डर पैदा करना चाहते थे। स्वतन्त्रता के लिए बलिदान क्रान्तिकारियों को प्रेरणा स्रोत था। भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराना, अपनी मातृभूमि को खोया हुआ गौरव पुनः स्थापित करना एवं समस्त भारतवासियों को स्वतन्त्रता की खुली हवा में मुक्त विचरण का अहसास दिलाना क्रान्तिकारियों के लक्ष्य में सम्मिलित था।

प्रश्न 13.
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रमुख क्रान्तिकारी नेताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रमुख क्रान्तिकारी नेता- भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिकारियों का योगदान अतुलनीय है। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रमुख क्रान्तिकारी नेताओं में सरदार भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु, सुभाषचन्द्र बोस, अजीत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, खुदीराम बोस, रासबिहारी बोस, बटुकेश्वर दत्त, अरविन्द घोष, श्यामजी कृष्ण वर्मा, वीर सावरकर, लाला हरदयाल, राजेन्द्र लाहिड़ी, रोशन सिंह, अशफाक उल्लाह खाँ, मैडम भीखाजी कामा, अवध बिहारी, रवीन्द्रनाथ सान्याल, मदल लाल धींगरा, चापेकर बन्धु, दामोदर व बालकृष्ण, सतीशचन्द्र बोस, हेमचन्द्र कानूनगो, प्रफुल्ल चाकी आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 14.
क्रान्तिकारियों ने लक्ष्य प्राप्ति के लिए कौन-कौन से साधन अपनाये? संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
क्रान्तिकारियों द्वारा लक्ष्य प्राप्ति के लिए अपनाए गए साधन-क्रान्तिकारियों का मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश शासन का अन्त करना था। इसके लिए उन्होंने हिंसी, लूट तथा हत्या जैसे साधन अपनाये। इनको मत था कि जो लक्ष्य नैतिके साधनों से प्राप्त नहीं हो सकता, उसे हिंसा एवं बल से प्राप्त किया जा सकता है। उनका उद्देश्य हत्या तथा लूटमार करना नहीं था, वे तो एक वास्तविक क्रान्ति को जन्म देना चाहते थे।

क्रान्ति से उनका आशय अन्याय पर निर्भर और समाज व्यवस्था को बदलने से था। वे देशव्यापी क्रान्ति करके विदेशी शासन को उखाड़ फेंकना चाहते थे। शासकों से बदला देने के लिए वे उन पर बम फेंकते, गोली चलाते व रेल की पटरियों को उखाड़ते थे। दमनकारी अंग्रेज अधिकारियों की क्रान्तिकारियों द्वारा हत्याएँ की गईं तथा अन्य अनेक प्रकार से ब्रिटिश शासन को आतंकित किया गया, ताकि वे भारतीय जनता पर अत्याचार करना छोड़ दें।

प्रश्न 15.
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिकारियों के योगदान को बताइए।
उत्तर:
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिकारियों का योगदान – भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिकारियों का योगदान अतुलनीय है। क्रान्तिकारियों में देशभक्ति की अटूट भावना थी। वे शन्तिपूर्ण संघर्ष में विश्वास नहीं करते थे। वे . हिंसी एवं आतंक द्वारा शासकों को भयभीत करं विदेशी शासन को पूर्णत: नष्ट करना चाहते थे। वे खून का बदला खून से लेना चाहते थे। क्रान्तिकारियों ने अपनी जान पर खेलकर देश को स्वतन्त्र कराया।

अनेक क्रान्तिकारियों अण्डमान की जेलों में भीषण यातनाओं से मर गये तथा असंख्य क्रान्तिकारी फाँसी के तख्तों परं प्रसन्नतापूर्वक झूल गये। क्रान्तिकारियों ने देश में कभी भी अव्यवस्था फैलाने का प्रयास नहीं किया। उनका उद्देश्य लूटमार व हत्या करना नहीं था, बल्कि विदेशी शासन का अन्त करके सच्चा लोकतन्त्र स्थापित करना था।

उनमें देशभक्ति, त्याग व बलिदान की अटूटे शक्ति थी। इस राष्ट्रीय आन्दोलन में अनेक क्रान्तिकारियों; यथा-चन्द्रशेखर आजाद, सुखदेव, सरदार भगतसिंह, राजगुरु, अजीत सिंह, सुभाषचन्द्र बोस, रामप्रसाद बिस्मिल आदि ने अपनी भूमिका का निर्वाह कर आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया।

प्रश्न 16.
भगतसिंह द्वारा केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंकने की घटना को बताइए।
उत्तर:
केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंकने की घटना-ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने हेतु भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली के केन्द्रीय असेम्बली हॉल में खाली सरकारी बेंचों पर उस समय बम फेंका, जब अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ पर मतदान के दिन बोल रहे थे। बम के धमाके से असेम्बली हॉल में आतंक व्याप्त हो गया।

इसके बाद क्रान्ति के दोनों योद्धाओं ने असेम्बली हॉल में खड़े होकर ‘इंकलाब जिन्दाबाद’, ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारे लगाए। उन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की ओर से कुछ पर्चे भी वितरित किए। इन पर्यों में लिखा हुआ था-“बहरे कानों तक अपनी आवाज पहुँचाने के लिए।” इनका बम फेंकने का उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं था वरन् अत्याचारी ब्रिटिश प्रशासन को झकझोरना था। इसके उपरान्त भगतसिंह व बटुकेश्वर दत्त ने अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया।

प्रश्न 17.
लाहौर के पुलिस अधिकारी साण्डर्स की हत्या किसने और क्यों की? बताइए।
उत्तर:
पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या-30 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के बहिष्कार करने वाले जुलूस के नेता लाला लाजपत राय पर पुलिस अधीक्षक स्कॉट ने लाठियों से प्रहार किया, जिनसे लगी चोटों के कारण अन्ततः उनका देहान्त 17 नवम्बर, 1928 को हो गया। लाला लाजपत राय पर हमला करने के अपमान का बदली लेने के लिए भगतसिंह, राजगुरु तथा चन्द्रशेखर आजाद ने लाहौर में पुलिस कार्यालय से बाहर आते समय पुलिस अधीक्षक स्कॉट के स्थान पर सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्स की पिस्तौल की गोलियों से 17 दिसम्बर, 1928 को हत्या कर दी। सांडर्स की हत्या का समाचार सुनते ही सम्पूर्ण देश में खुशी की लहर दौड़ गयी।

प्रश्न 18.
सरदार भगतसिंह के दर्शन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सरदार भगतसिंह का दर्शन – भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में सरदार भगतसिंह ने एक क्रान्तिकारी के रूप में अदम्य साहस और समाजवादी विचारक के रूप में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उनके कार्यों से सम्पूर्ण भारत में ब्रिटिश सत्ता विरोधी जन चेतना का उत्कर्ष हुआ। वे क्रान्तिकारी दर्शन, समाजवाद तथा दलित चेतना के अग्रदूत एवं ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोधी थे। भगत सिंह ने जेल के अन्दर रहते हुए ‘जेल नोट बुक’ लिखी, जिससे उनके राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, संवैधानिक, साहित्यिक एवं दार्शनिक विचारों का पता चलता है।

सरदार भगतसिंह द्वारा लिखित आलेखों को जानने एवं उनके वक्तव्य के आधार पर निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि सरदार भगतसिंह का दर्शन साम्राज्यवादी विरोधी तथा राष्ट्रवादी था। सरदार भगतसिंह कहीं – कहीं अराजकतावादी भी प्रतीत होते हैं क्योंकि वे तत्कालीन शासन को समाप्त करना।

चाहते थे। वहीं किसान मजदूर तथा कमजोर वर्ग की आवाज बुलन्द करने के कारण समाजवादी भी दृष्टिगत होते हैं। भगत सिंह का दर्शन मूलत: मानवतावादी है जिसमें विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं का सम्मिश्रण दिखाई देता है। भगतसिंह का दर्शन इतना व्यापक है कि किसी एक नजरिये से देखने पर उसका समग्र अवलोकन नहीं हो पाती है।

प्रश्न 19.
काकोरी ट्रेन डकेती एवं सांडर्स हत्याकाण्ड में चन्द्रशेखर आजाद की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
काकोरी ट्रेन डकेती – चन्द्रशेखर आजाद हिन्दुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य थे। इस दल के कार्यकर्ताओं को ब्रिटिश अत्याचारी शासन से मुकाबले हेतु अस्त्र-शस्त्र की आवश्यकता थी। इस कार्य के लिए धन की आवश्यकता थी। अत: योजनाबद्ध तरीके से सितम्बर 1925 में काकोरी में ब्रिटिश शासन के खजाने वाली एक ट्रेन को रोककर खजाने को लूट लिया गया, यद्यपि यह योजना बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्ण तथा चतुराईपूर्ण तरीके से बनायी गई थी, फिर भी ब्रिटिश सरकार को इस बारे में जानकारी प्राप्त हो गयी।

काकोरी काण्ड में सम्मिलित क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर उन पर मुदकमें चलाए गए। इनमें से कुछ को फाँसी दी गई, शेष को लम्बी – लम्बी सजाएँ दी गईं। चन्द्रशेखर आजाद ने भी रामप्रसाद बिस्मिल के साथ इसमें भाग लिया था। परन्तु ब्रिटिश सरकार के अथक प्रयास के बावजूद भी सरकार उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकी। सांडर्स हत्याकण्ड-20 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन का बहिष्कार करने वाले जुलूस का नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे।

इस दौरान पुलिस अधीक्षक स्कॉट की लाठियों की चोटों से लाला लाजपत राय घायल हो गये और अन्तत: उनका देहान्त हो गया। चन्द्रशेखर आजाद सहित उनके साथी भगतसिंह व राजगुरु को यह सहन नहीं हुआ। उन्होंने अंग्रेज सरकार से बदला लेने का निश्चय किया। चन्द्रशेखर ने अपने साथियों के साथ मिलकर पुलिस अधीक्षक स्कॉट के स्थान पर सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्स की 17 दिसम्बर, 1928 को गोली मारकर हत्या कर दी।

प्रश्न 20.
चन्द्रशेखर आजाद के क्रान्तिकारी जीवन का किस प्रकार अन्त हुआ? .
उत्तर:
27 फरवरी, 1931 को चन्द्रशेखर आजाद, यशपाल एवं सुरेन्द्र पाण्डे इलाहाबाद में एकत्रित हुए ताकि रूस जाने की योजना को अन्तिम रूप दिया जा सके। इसी दिन प्रात:काल चन्द्रशेखर आजाद क्रान्तिकारी सुखदेव से इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क पहुँचे। जब आजाद एक पेड़ के नीचे उनसे बातचीत कर रहे थे तभी किसी मुखबिर की सूचना पर पुलिस वहाँ पहुँची। पुलिस कमाण्डर नाटबावर ने उन्हें आत्मसमर्पण करने हेतु कहा, आजाद ने अपने साथी सुखदेव को वहाँ से भगा दिया।

आजाद ने पुलिस फायरिंग का जवाब दिया किन्तु जब उन्हें लगा कि उनकी पिस्तौल में गोलियाँ खत्म हो गयी हैं, केवल एक गोली बची है, तो उन्होंने अंग्रेजों के हाथों मरने की अपेक्षा अपने हाथों ही मृत्यु को गले लगाना उचित समझी और उसी क्षण देश के इस महान क्रान्तिकारी का अन्त हो गया। चन्द्रशेखर आजाद ने प्रतिज्ञा की थी कि, “दुश्मन की गोलियों को हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।” इस प्रकार जीवन के अन्त समय तक आजाद अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहे।

प्रश्न 21.
सुभाषचन्द्र बोस के जीवन परिचय को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
सुभाषचन्द्र बोस का जीवन परिचय-नेताजी की जन उपाधि से विभूषित सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक के उच्च मध्यम वर्गीय बंगाली परिवार में हुआ था। बालक सुभाष ने अपनी प्राथमिक शिक्षा कटक में इंगलिश स्कूल में प्राप्त की। यहाँ पर उन्होंने भारतीय छात्रों के साथ भेदभाव को सह शैक्षणिक गतिविधियों एवं छात्रवृत्तियों के सम्बन्ध में अनुभव किया। सन् 1919 में कलकत्ता (कोलकाता) विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधि प्राप्त की। सन् 1920 में भारतीय ज़नपद सेवा (आईसीएस) की परीक्षा उत्तीर्ण की, परन्तु मई, 1921 में उन्होंने आई.ए.एस. (आई.सी.एस.) से त्यागपत्र दे दिया।

इस प्रकार युवक सुभाष ने चौबीस वर्ष की आयु में ही सांसारिक सुख सुविधा से सम्पन्न आई.सी.एस. के उच्च पद को ठुकराकर ध्येयनिष्ठ जीवन व्यतीत करने का दृढ़ निश्चय किया। वे भारत की पूर्ण स्वतन्त्रता के निर्भीक समर्थक थे। उन्होंने सन् 1928 की कलकत्ता काँग्रेस में औपनिवेशिक या अधिराज्य स्वायत्तता का विरोध करते हुए पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव रखा था।

जनवरी 1941 में बोस गुप्तचर पुलिस की आँखों में धूल झोंकते हुए गुप्त ढंग से कलकत्ता से काबुल होते हुए मार्च, 1941 में बर्लिन पहुँच गए। उन्होंने सिंगापुर में 4 जुलाई 1943 को आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व ग्रहण किया और 21 अक्टूबर, 1943 को सिंगापुर में ही आजाद हिन्द सरकार की स्थापना की।

प्रश्न 22.
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस में सुभाषचन्द्र बोस की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस में सुभाषचन्द्र बोस की भूमिका- भारतीय जनपद सेवा (आई.सी.एस.) से त्याग-पत्र देने के पश्चात् मई 1921 में सुभाषचन्द्र बोस ने भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने हेतु काँग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। असहयोग आन्दोलन के दौरान उन्होंने युवकों को काँग्रेस के आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया।

यह भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के उदारवादी दल’ के कट्टर विरोधी थे। 1928 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के समय उन्होंने ‘विषय समिति’ में नेहरू रिपोर्ट’ द्वारा अनुमोदित प्रादेशिक शासन स्वायत्तता के प्रस्ताव का डटकर विरोध किया। वह पूर्ण स्वतन्त्रता चाहते थे। फरवरी, 1938 में हरिपुर अधिवेशन में सुभाषचन्द्र बोस काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। पुनः जनवरी, 1939 में त्रिपुरा काँग्रेस के अधिवेशन में महात्मा गाँधी के विरोध करने पर भी वह काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गए।

सम्भवतः महात्मा गाँधी की यह सबसे बड़ी हार थी, परन्तु काँग्रेस कार्यकारिणी में महात्मा गाँधी के समर्थकों का बहुमत था अतएव उन्होंने अप्रैल, 1939 में काँग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। मई, 1939 में काँग्रेस में ही ‘फारवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना की। इसका उद्देश्य वामपंथियों को काँग्रेस में संगठित रूप से सक्रिय करना था।

प्रश्न 23.
सुभाषचन्द्र बोस के कार्यों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
सुभाषचन्द्र बोस के कार्यों का मूल्यांकन – भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में सुभाषचन्द्र बोस ने क्रान्तिकारी राष्ट्रवादी के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। औपनिवेशिक स्वतन्त्रता के लक्ष्य का उन्होंने सदैव विरोध किया। वे भारत की पूर्ण स्वतन्त्रता के प्रबल पक्षधर थे। वह गाँधीजी की अहिंसा में विश्वास नहीं करते थे। 1922 में जब गाँधीजी ने अपना असहयोग आन्दोलन वापिस ले लिया, तो इसे उन्होंने देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य माना। इसी तरह गाँधीजी के 1931 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन को भी वापिस लेने पर उन्होंने उसे ‘असफलता की स्वीकृति’ माना। उनके

आलोचक जिनमें पण्डित नेहरू भी थे, उन्हें नाजी तथा फासिस्ट समर्थक मानते थे। वास्तव में वह भारत की स्वतन्त्रता के लिए ‘फासिस्ट शक्तियों का समर्थन लेने को भी उद्यते थे। वह युवकों एवं क्रान्तिकारियों के आदर्श थे। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा है। सुभाषचन्द्र बोस एक कुशल राजनीतिज्ञ, उच्च कोटि के सेनानायक तथा महान देशभक्त थे। उन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता हेतु अपना जीवन बलिदान कर दिया।

RBSE Class 11 Political Science Chapter 14 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
गोपालकृष्ण गोखले का जीवन परिचय देते हुए उनके विचारों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
गोपालकृष्ण गोखले का जीवन – परिचय गोपालकृष्ण गोखले आधुनिक भारत के ऐसे उदारवादी नेता थे, जिन्होंने देश सेवा के लिए राजनीति को कर्तव्य भावना के साथ अपनाया। इनका जम 1866 ई. में तत्कालीन बम्बई प्रान्त के कोल्हापुर में हुआ था। 20 वर्ष की उम्र में यह एक अंग्रेजी विद्यालय में शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए। यह विद्यालय आगे चलकर फग्र्युसन कॉलेज के रूप में विकसित हुआ। गोखले इस कॉलेज के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए।

अपनी इंग्लैण्ड की यात्राओं में गोखले ने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की ‘ब्रिटिश समिति’ तथा उसके पत्र ‘इण्डिया’ को सक्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। गाँधीजी इन्हें अपनी राजनैतिक गुरु मानते थे। इन्होंने ब्रिटिश सरकार की नाइटहुड की उपाधि लेने में मना कर दिया। इन्हें ब्रिटिश जाति की उदारता तथा न्यायप्रियता में विश्वास था।

यह उग्र विचारों एवं साधनों तथा असंवैधानिक मार्ग को भारत के लिए अहितकर समझते थे। इन्होंने सत्ता केन्द्रीकरण का विरोध किया। यह एक उदारवादी, राजनैतिक यथार्थवादी तथा राष्ट्रवादी थे। इन्होंने युवकों को नैतिक तथा अध्यात्मिक कर्तव्य के रूप में राष्ट्र सेवा का प्रशिक्षण देने के लिए ‘भारत सेवक संघ’ का गठन किया। गोखले के विचारों को मूल्यांकन

1.  विचारों में अन्तर्विरोध – गोखले के आलोचकों को उनके विचारों में अन्तर्विरोध दिखाई देता है। आलोचकों के अनुसार गोखले एक साथ राजभक्त तथा देशभक्त दोनों होना चाहते थे, जो असम्भव है। इसी प्रकार गोखले जहाँ स्वदेशी का समर्थन करते हैं, वहीं बहिष्कार के विरोधी हैं।

उग्रवादी उन्हें एक ‘दुर्बल हृदय उदारवादी’ और उनके प्रार्थना – पत्रों, शिष्ट मण्डलों की नीति को ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ की नीति कहते थे, परन्तु उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार उचित नीति ही अपनायी थी। उस समय भारतीय जनमत पूरी तरह जागृत नहीं था और उग्र साधन अपनाने से ब्रिटिश दमन अधिक उग्र हो सकता था। तब जो लाभ हमें मिल रहा था, उससे भी भारतीय वंचित हो जाते।

2. उदारवादी मूल्यों में आस्था – गोपाल कृष्ण गोखले ने व्यक्ति, समाज एवं शासन के क्षेत्र में विकासवादी पद्धति तथा उदारवादी मूल्यों का आश्रय लिया। उन्होंने समय व स्थिति को देखते हुए यह स्वीकार किया कि ब्रिटिश शासन के सहयोग से ही भारत स्वशासन प्राप्त कर सकता है तथा भारत में शान्ति एवं व्यवस्था बनी रह सकती है।

गोखले पक्के राष्ट्रवादी थे। इसलिए ब्रिटिश नौकरशाही ने उन्हें एक छिपा हुआ राजद्रोही’ कही। उनके लिए राष्ट्रवाद’ सभी धर्मों, जातियों, भाषाओं तथा प्रान्तों को एकता के सूत्र में बाँधना था। उनका राष्ट्रवाद जनोत्तेजना एवं भावुकता पर नहीं वरन् बुद्धि, विवेक, आत्मसंयम एवं आत्मनियन्त्रण पर आधारित था।

3. उदारवादी आर्थिक चिन्तन का विकास-गोखले ने उदारवादी आर्थिक चिन्तन का विकास किया। उन्होंने तत्कालीन भारत की आर्थिक दुर्दशा के मूल कारणों पर प्रकाश डाला तथा भारत के आर्थिक विकास पर विचार किया। गोखले के विचार ‘आर्थिक’ राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं।

4. राजनीति में साम्प्रदायिकता का विरोध – गोपाल कृष्ण गोखले ने राजनीति में साम्प्रदायिकता का विरोध किया तथा पंथ निरपेक्षता को बढ़ावा दिया उनका स्पष्ट व दृढ़ मत था कि भारत का तब तक कोई भविष्य नहीं हो सकता जब तक कि हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच पारस्परिक सहयोग की भावना स्थायी रूप नहीं धारण कर लेती।।

5. राजनीति के अध्यात्मीकरण पर बल – राजनीतिक चिन्तन के क्षेत्र में गोखले ऐसे प्रथम व्यक्ति हैं, जिन्होंने राजनीति के अध्यात्मीकरण को रेखांकित किया। उन्होंने साध्य के साथ ही साधनों की पवित्रता को अपने चिन्तन का आधार बनाया। उन्होंने राजनीति को मात्र सत्ता के लिए संघर्ष नहीं, वरन् सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना का पवित्र साधन स्वीकार किया।

इस उद्देश्य से उन्होंने 12 जून, 1905 को ‘भारत सेवक समाज’ की स्थापना की ताकि युवकों को नैतिक तथा आध्यात्मिक कर्तव्य के रूप में राष्ट्र सेवा का प्रशिक्षण मिल सके। राजनीति में गोखले द्वारा नैतिकता के प्रयोग से गाँधी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने गोखले को अपना ‘राजनीतिक गुरु’ बना लिया। रानाडे, गोखले तथा गाँधी की गुरु-शिष्य परम्परा ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को निर्णायक मोड़ पर पहुँचाया।

प्रश्न 2.
बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय देते हुए उनके विचारों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय बाल गंगाधर तिलक भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में अतिवादी विचारधारा के समर्थक थे। इनका जन्म 25 जुलाई, सन् 1856 को महाराष्ट्र राज्य के कोंकण जिले के रई में हुआ था। बाल गंगाधर तिलक अपने राजनैतिक चिन्तन का विषय भारत के लिए स्वराज्य प्राप्ति को बनाया एवं न या कि “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।” स्वराज्य को नया लक्ष्य प्रदान करने वाले ‘केसरी’ तथा ‘मराठा’ के प्रकाशक, भारतीय राष्ट्रवाद के भगीरथ ऋषि बाल गंगाधर तिलक का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में अमूल्य योगदान रहा है।

तिलक ने भारत की राष्ट्रीयता को भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान पर खड़ा किया। इसके लिए उन्होंने ‘गणेश उत्सव’ एवं ‘शिवाजी उत्सव’ प्रारम्भ किए। तिलक ने स्वराज्य के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा तथा निष्क्रिय प्रतिरोध जैसे साधन राष्ट्र को प्रदान किए। तिलक आधुनिक भारत के प्रथम सर्वाधिक प्रभावशाली एवं लोकप्रिय राष्ट्रीय नेता थे। उन्होंने काँग्रेस में गुणात्मक परिवर्तन किया।

तिलक के विचारों का मूल्यांकन:
1. राष्ट्रीय आन्दोलन में अतिवादी युग के जनक – तिलक ने राष्ट्रीय आन्दोलन के एक नए अतिवादी युग को प्रारम्भ किया। उन्होंने राजनीति में यथार्थवादी तथा व्यावहारिक दृष्टिकोण का समर्थन किया। इसीलिए उन्हें ‘आधुनिक कौटिल्य’ भी कहा जाता है।

2. भारतीयों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करना – तिलक ने “स्वराज्य को जन्म सिद्ध अधिकार” बताकर भारतीयों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत किया तथा उनमें शक्ति का संचार किया और उनके सम्मुख एक नया महान लक्ष्य प्रस्तुत किया।

3. आधुनिक राष्ट्रवाद का प्रतिपादन – तिलक ने स्वामी दयानन्द के समान प्राचीन वैदिक चिंतन से प्रेरणा लेकर भारतीयता पर आधारित आधुनिक राष्ट्रवाद का प्रतिपादन किया इसीलिए नेहरू उन्हें, भारतीय राष्ट्रवाद का पिता” कहते थे। राजनीतिक साधनों की दृष्टि से उन्होंने एक नए युग की शुरुआत की।

4. अंग्रेजों के चरित्र में गुणात्मक परिवर्तन करना – तिलक ने काँग्रेस’ के चरित्र में गुणात्मक परिवर्तन कर दिया। उन्होंने एक ब्रिटिश भक्त संस्था को अपने तेजस्वी विचारों और कार्यों से ब्रिटिश शासन से संघर्ष करने वाली संस्था में रूपान्तरित कर दिया। तिलक ने काँग्रेस में आन्दोलन की जिस परम्परा को प्रारम्भ किया, गाँधीजी ने उसे लक्ष्य तक पहुँचाया। वे आधुनिक भारत के प्रथम सर्वाधिक प्रभावशाली एवं लोकप्रिय राष्ट्रीय नेता थे।

5. सभी सम्प्रदायों के प्रति समान भाव – तिलक के आलोचक उन पर गणपति एवं शिवाजी उत्सव के माध्यम से हिन्दुत्व को बढ़ावा देने का आरोप भी लगाते हैं परन्तु उन्होंने कभी किसी सम्प्रदाय के प्रति वैमनस्य का परिचय नहीं दिया। उन्होंने केवल जनसंगठन के लिए उत्सवों का आयोजन किया था, जिसका अपेक्षित परिणाम भी प्राप्त हुआ।

6. स्वराज्य प्राप्ति हेतु हिंसा का सहारा नहीं लेना – वेलेन्टाइन शिरोल तिलक को “भारतीय अशान्ति का जनक” बताते हैं लेकिन यह उचित नहीं है क्योंकि तिलक गरमपंथी अवश्य थे, किन्तु उन्होंने स्वराज्य प्राप्ति लिए हिंसा का सहारा कभी नहीं लिया।

7. महान कर्मयोगी – तिलक महान कर्मयोगी थे, जो अन्तिम सांस तक स्वराज्य के लिए संघर्षरत रहे। यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें जेल में बन्द कर, मिटाने का प्रयास किया, परन्तु वे अपने लक्ष्य की ओर दुगुने जोश से बढ़ते रहे।

प्रश्न 3.
बाल गंगाधर तिलक ने ब्रिटिश राज्य की निरंकुशता का विरोध करने के लिए कौन – कौन से खुले राजनीतिक साधनों को अपनाया? उनका विस्तार से वर्णन कीजिए।
अथवा
तिलक की राजनीतिक पद्धति एवं कार्यक्रम का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक द्वारा ब्रिटिश राज्य की निरंकुशता का विरोध:
करने के लिए अपनाये गए खुले राजनीतिक साधन बाल गंगाधर तिलक को अपनी राजनीतिक पद्धति एवं कार्यक्रमों को निर्धारित करने का अवसर ब्रिटिश शासन की दमनकारी तथा शोषणकारी नीतियों के संदर्भ में प्राप्त हुआ था। तिलक ने ब्रिटिश राज्य की निरंकुशता के विरोध तथा स्वराज्य की प्राप्ति के लिए अपनी राजनीतिक पद्धति एवं कार्यक्रम को तय किया तथा ‘खुले राजनीतिक साधनों को अपनाया, जिन्हें ‘उग्र राष्ट्रीय साधन’ तथा ‘गरमपंथी साधन’ भी कहा जाता है। प्रारम्भ से ही तिलक ने खुले राजनीतिक साधनों की श्रेणी में निम्नलिखित तीन साधनों को स्थान दिया – स्वदेशी, बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा। यद्यपि बाद में उन्होंने इसमें निष्क्रिय प्रतिरोध के साधन तथा विचार को भी सम्मिलित किया।

(1) स्वदेशी – बाल गंगाधर तिलक ने स्वदेशी को देशप्रेम का प्रतीक बना दिया। वे इसका राजनीतिक महत्व स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि यही ऐसा प्रभावशाली साधन है, जो हमें मुक्ति दिला सकता है। तिलक के लिए स्वदेशी का विचार मात्र भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता तक ही सीमित नहीं था बल्कि वे इसे भारत के आध्यात्मिक उत्थान तथा राजनीतिक स्वराज्य की प्राप्ति का प्रमुख आधार भी मानते थे।

इनका स्वदेशी का आन्दोलन सम्पूर्ण राष्ट्रीय जीवन के पुनरुत्थान का आन्दोलन बन गया। स्वदेशी के राजनीतिक महत्व को स्पष्ट करते हुए तिलक ने कहा, “यदि हम गोरे लोगों की गुलामी में नहीं रहना चाहते हैं तो हमें स्वदेशी के आन्दोलन को पूरी ताकत के साथ चलाना होगा। यही एकमात्र ऐसा प्रभावशाली साधन है, जो हमें मुक्ति दिला सकता है।

(2) बहिष्कार – बाल गंगाधर तिलक ने बहिष्कार तथा बॉयकाट के प्रस्ताव का समर्थन 1905 के काँग्रेस के बनारस अधिवेशन में किया। उदारवादियों के विरोध के बावजूद काँग्रेस ने बहिष्कार द्वारा ब्रिटिश सरकार आर्थिक हितों पर दबाव डालकर उसे बंग-भंग के निर्णय को वापस लेने के लिए बाध्य किया। तिलक ने इस आन्दोलन के द्वारा भारतीयों को ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया। तिलक बहिष्कार को ऐसा राजनीतिक अस्त्र मानते थे। जिसकी सहायता से भारत की निहत्थी जनता बिना किसी हिंसक संघर्ष के ब्रिटिश शासन से मुक्ति पा सकती थी।

(3) निष्क्रिय प्रतिरोध – बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज्य की प्राप्ति के लिए निष्क्रिय प्रतिरोध के साधन को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना। उनके निष्क्रिय प्रतिरोध के दर्शन का आधार यह विचार था कि अन्यायपूर्ण कानून का प्रतिरोध करना व्यक्ति का कर्तव्य है। तिलक़ निष्क्रिय प्रतिरोध की पद्धति को मूलतः संवैधानिक भी मानते थे। उनके मतानुसार यह पद्धति कानून, न्याय, नैतिकता एवं लोकमत के अनुकूल थी। तिलक की निष्क्रिय प्रतिरोध की नीति में हिंसक प्रतिरोध के लिए कोई स्थान नहीं था।

(4) राष्ट्रीय शिक्षा – बाल गंगाधर तिलक राष्ट्र के उत्थान में शिक्षा की भूमिका को अत्यन्त महत्त्व देते थे। तिलक ने शिक्षा को अपने राजनीतिक साध्य स्वराज्य की प्राप्ति के लिए एक आधारभूत साधन के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने ‘न्यू इंग्लिश स्कूल’ ‘दक्षिण शिक्षा समाज’ एवं ‘फग्र्युसन कॉलेज’ की स्थापना की। बाद में स्वदेशी आन्दोलन के दौरान समर्थ गुरु रामदास के नाम पर उन्होंने अनेक ‘समर्थ विद्यालय खुलवाये। वे छात्रों को इस प्रकार शिक्षित किए जाने के पक्ष में थे कि उनमें स्वराज्य प्राप्ति की तीव्र आकांक्षा उत्पन्न हो।

प्रश्न 4.
क्रान्तिकारी आन्दोलन से क्या आशय है? क्रान्तिकारियों के प्रमुख कार्यक्रमों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
क्रान्तिकारी आन्दोलन से आशय उदारवादी व अतिवादियों के अथक प्रयासों के उपरान्त भी उन्हें स्वतन्त्रता प्राप्ति में अधिक सफलता प्राप्त नहीं हुई। ब्रिटिश शासन ने इन पर ध्यान देने के बजाय भारतीय जनता का दमन और अत्याचार करना प्रारम्भ कर दिया। अनेक दमनकारी कानूनों का निर्माण किया। स्वतन्त्रता आन्दोलन में लगे हुए बड़े-बड़े नेताओं को जेलों में डालना प्रारम्भ कर दिया।

जुलूसों व सभाओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया तथा हजारों लोगों को बंगाल विभाजन के विरुद्ध आन्दोलन करने के कारण जेल भेज दिया। जेल में उन पर घोर अत्याचार किए गए। ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति के फलस्वरूप भारतीय राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रीय आन्दोलन की एक नई विचारधारा का उदय हुआ।

जिसे क्रान्तिकारी आन्दोलन कहा गया। इसके समर्थक हिंसात्मक साधनों द्वारा ब्रिटिश शासन को नष्ट करके स्वतन्त्रता, प्राप्त करना चाहते थे। प्रमुख क्रान्तिकारी नेताओं में सरदार भगत सिंह, आजाद, सुभाषचन्द्र बोस, राजगुरु, सुखदेव, रामप्रसाद बिस्मिल, वीर सावरकर आदि सम्मिलित थे। क्रान्तिकारियों के कार्यक्रम भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रान्तिकारियों के नेतृत्व ने अपनी गतिविधियों को ठीक प्रकार से सम्पादित करने एवं निश्चित दिशा में सफलता प्राप्त करने हेतु कुछ निश्चित कार्यक्रम एवं गतिविधियों का निर्धारण किया जो निम्नलिखित हैं

  1.  भारत के शिक्षित लोगों में दासता के विरुद्ध घृणा उत्पन्न करने के लिए अखबारों द्वारा प्रबल प्रचार किया जाये।
  2. बेकारी और भुखमरी का भय हिन्दुस्तानियों के मस्तिष्क से निकाला जाये।
  3. भारतीयों के मन में राष्ट्रीयता, स्वतन्त्रती तथा मातृभूमि के प्रति प्रेम जागृत किया जाये।
  4. सरकार को वन्दे मातरम् के जुलूसों और स्वदेशी सम्मेलनों तथा बायकाट के माध्यम से व्यस्त रखा जाये ताकि राष्ट्रीय स्वाधीनता हेतु किये जाने वाले कार्यों को बिना किसी बाधा के पूर्ण किया जा सके।
  5. आम जनता में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने हेतु हृदयस्पर्शी संगीत और नाटकों को रूपान्तरण किया जाये ताकि वीरों की जीवनी और आजादी के लिए उनके द्वारा किये गये महान कार्यों की प्रशंसा व प्रसार हो सके।
  6. नौजवानों की भर्ती करके उनकी छोटी – छोटी टुकड़ियाँ बना दी जाएँ, साथ ही इन नौजवानों को शस्त्रों का प्रयोग बताया जाये ताकि उन्हें एक प्रशिक्षित व शक्ति-सम्पन्न सैन्य टुकड़ी के रूप में स्थापित किया जा सके।
  7. हथियार बनाये जायें एवं विदेशों से खरीदे जायें तथा ब्रिटिश शासन से बचाकर उन्हें हिन्दुस्तान लाया जाये ताकि सैन्य प्रशिक्षित युवाओं को आवश्यक एवं महत्वपूर्ण हथियार उपलब्ध हो सके।
  8.  प्रशिक्षित सैन्य युवाओं को नियमों तथा नेतृत्व की आज्ञाओं की पूरी तरह पालन करने की शिक्षा प्रदान की जाये ताकि कुशल नेतृत्व के निर्देशन में आगामी रणनीतियों का सफलतापूर्वक संचालन किया जा सके।
  9.  क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए छापे मारकर धन प्राप्त किया जाये ताकि क्रान्तिकारियों की गतिविधियों का संचालन सुगमतापूर्वक किया जा सके।

क्रान्तिकारी शीघ्र परिणाम चाहते थे इसलिए उन्होंने अपने उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए गुप्त समितियाँ स्थापित क जिसमें सदस्यों को शस्त्र चलाना एवं बम बनाना सिखाया जाता था। उन्होंने ब्रिटिश शासन को भारत से उखाड़ फेंकने के लिए बम फेंके, गोलियाँ चलाय, रेलों की पटरियाँ उखाड़ तथा दमनकारी अंग्रेज अधिकारियों की हत्याएँ र्की एवं अनेक प्रकार से ब्रिटिश शासन को आतंकित किया जिससे कि वे भारतीय जनता पर अत्याचार करना छोड़ दें। क्रान्तिकारियों की गतिविधियों से डरकर ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को कुछ रियायतें देना प्रारम्भ कर दिया। यद्यपि क्रान्तिकारियों ने देशवासियों में अपूर्व राष्ट्रीय चेतना का संचार किया लेकिन अनेक कारणों से उन्हें अपने उद्देश्य में पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं हो सकी।

प्रश्न 5.
राष्ट्रीय आंदोलन में चन्द्रशेखर आजाद की भूमिका का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चन्द्रशेखर आजाद का राष्ट्रीय आन्दोलन में योगदान:
1. भारतीय क्रान्ति दल में सम्मिलित होना – असहयोग आन्दोलन एक वर्ष बाद स्थगित कर दिया गया जिससे चारों ओर निराशा छा गयी। ऐसे समय में साहसी युवक जोरों से क्रान्तिकारियों के दल में सम्मिलित हो रहे थे। आजाद भी क्रान्तिकारी दल में सम्मिलित हो, गुप्त रूप से क्रान्तिकारी कार्य करने लगे। आजाद के साथ भगतसिंह भी इस दल में सम्मिलित हो गये थे। इस दल को रामप्रसाद बिस्मिल का प्रेरणादायक नेतृत्व मिला हुआ था।

2.  काकोरी ट्रेन डकेती में भूमिका – हिन्दुस्तानी समाजवादी रिपब्लिकन आर्मी के कार्यकर्ताओं को अंग्रेजों के अत्याचारी शासन से मुकाबले हेतु अस्त्र-शस्त्र खरीदने के लिए धन की आवश्कता थी। अतः योजनाबद्ध तरीके से सितम्बर 1925 को काकोरी में ब्रिटिश शासन के खजाने वाली एक ट्रेन को रोककर खजाने को लूट लिया गया। यद्यपि यह योजना बहुत ही बुद्धिमतापूर्ण तथा चतुराईपूर्ण तरीके से बनायी थी, फिर भी ब्रिटिश सरकार को इस बारे में जानकारी प्राप्त हो गयी।

इस काण्ड में सम्मिलित क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमें चलाए गए। इनमें से कुछ को फाँसी दी गयी शेष को लम्बी – लम्बी सजाएँ दी गयौँ। चन्द्रशेखर आजाद ने भी रामप्रसाद बिस्मिल के साथ इसमें भाग लिया था परन्तु ब्रिटिश सरकार अथक प्रयास के बावजूद भी उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकी।

3. सांडर्स की हत्या – 20 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के बहिष्कार करने वाले जुलूस का नेतृत्व लाला लाजपत राय ने किया। पुलिस अधीक्षक स्कॉट की लाठियों की चोटों से लाजपत राय घायल हो गए। अन्ततः उनका देहान्त 17 नवम्बर, 1928 को हो गया। लाला लाजपत राय पर लाठियों से प्राणघातक हमला करना भारतीय राष्ट्रवाद को कुचलने के समान था।

अतः इस अपमान का बदला लेने के लिए चन्द्रशेखर आजाद व उनके सहयोगी भगतसिंह एवं राजगुरु ने लाहौर में पुलिस कार्यालय से बाहर आते समय पुलिस अधीक्षक स्कॉट के स्थान पर सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्स की पिस्तौल की गोलियों से 17 दिसम्बर, 1928 को हत्या कर दी। तीनों क्रान्तिकारी पुलिस की आँखों में धूल झोंकते हुए लाहौर से अन्यत्र चले गए।

4. जेल से बाहर रहकर स्वतन्त्रता आन्दोलन का संचालन – जब दिल्ली के केन्द्रीय एसेम्बली हॉल में भगतसिंह एवं भटुकेश्वर दत्त द्वारा बम फेंका गया तब ये दोनों हिन्दुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य थे। ब्रिटिश सरकार ने 1929 ई. के मध्य तक इस आर्मी के अधिकांश प्रमुख सदस्यों को जेल में डाल दिया। इनमें भगतसिंह व बटुकेश्वर दत्त ने थे। 23 मार्च, 1931 को राजगुरु, भगतसिंह एवं बटुकेश्वर दत्त को फाँसी दे दी गयी। इसके बावजूद आजााद भी सम्मिलित अपने साथियों के साथ मिलकर आन्दोलन को जारी रखा।

5. अन्त तक स्वतन्त्रता हेतु संघर्ष करना – 27 फरवरी, 1931 को चन्द्रशेखर आजाद, यशपाल तथा सुरेन्द्र पाण्डे इलाहाबाद में एकत्रित हुए ताकि रूस जाने की योजना को अन्तिम रूप दिया जा सके। इसी दिन प्रात:काल चन्द्रशेखर आजाद क्रान्तिकारी सुखदेव से मिलने इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क पहुँचे। जब आजाद एक वृक्ष के नीचे उनसे बातचीत कर रहे थे तभी किसी विश्वासघाती की सूचना पर पुलिस वहाँ पहुँची। पुलिस कमाण्डर ‘नाटबावर’ ने उन्हें आत्म – समर्पण करने हेतु चेतावनी दी।

चन्द्रशेखर आजाद ने अपने साथी सुखदेव को वहाँ से भगा दिया। आजाद ने पुलिस फायरिंग का जवाब दिया किन्तु जब उन्हें पता चला कि उनकी पिस्तौल में गोली खत्म हो गई। केवल एक गोली बची है तो उन्होंने अंग्रेजों के हाथ मरने की अपेक्षा अपने हाथों ही मृत्यु को गले लगाना उचित समझा और उसी झूठ देश के इस महान क्रान्तिकारी का अन्त हो गया। चन्द्रशेखर आजाद ने प्रतिज्ञा की थी कि “दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे, आजाद ही रहेंगे।” इस प्रकार अन्त समय तक आजाद अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहे।

प्रश्न 6.
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में सुभाषचन्द्र बोस और आजाद हिन्द फौज (भारतीय राष्ट्रीय सेना) की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम से सुभाषचन्द्र बोस और आजाद हिन्द फौज (भारतीय राष्ट्रीय सेना) की भूमिका असहयोग आन्दोलन से उत्पन्न देशभक्ति के जोश ने सुभाषचन्द्र बोस को भारतीय जनपद सेवा (ICS) ठुकराकर स्वराज्य के लिए किये जा रहे संघर्ष में कूद पड़ने के लिए प्रेरित किया। राजनैतिक जीवन में उनका प्रवेश देशबन्धु चितरंजन दास के नेतृत्व में हुआ।

तैंतीस वर्ष की आयु में वे कोलकाता (कलकत्ता) के मेयर और 1938 ई. में काँग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। पुनः 1939 ई. में महात्मा गाँधी के विरोध के बावजूद काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। परन्तु कुछ समय के बाद कॉग्रेस के अन्य नेताओं के साथ मतभेद होने के कारण वे कॉग्रेस से अलग हो गये और फारवर्ड ब्लॉक नाम की एक राजनैतिक पार्टी का गठन किया।

सुभाषचन्द्र बोस की यह दृढ़ धारणा थी कि बिना युद्ध में परास्त किये अंग्रेज भारत छोड़कर जाने वाले नहीं हैं। उन्होंने सभी हिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों एवं ईसाइयों का मन जीत लिया और देश को आजाद कराने के लिए “दिल्ली चलो” का नारा दिया। उनका मूल मन्त्र था, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।”

इन्होंने महिलाओं की भी एक सैनिक बटालियन झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर संगठित की। आजाद हिन्द फौज मई 1944 में भारत में कोहिमा तक पहुँच गई। दुर्भाग्य से तभी जापानी सेना विजित प्रदेशों से पीछे हटने लगी। ऐसी स्थिति में जापान से सहायता मिलनी तो दूर, उलटे रसद व शस्त्रों की भारी कमी पड़ गयी। मजबूरी की हालत में 3 मई, 1945 को आजाद हिन्द फौज ने  आत्म समर्पण कर दिया।

कहा जाता है कि 18 अगस्त, 1945 को सुभाषचन्द्र बोस की एक हवाई दुर्घटना में जीवन लीला समाप्त हो गयी। जब समस्त विश्व के देश द्वितीय महासमर में अपनी – अपनी स्वार्थ की पूर्ति के लिए एक – दूसरे का सहयोग कर रहे थे उसी दौरान जापान की राजधानी टोकियो में भारतीय प्रवासियों की एक कॉन्फ्रेंस हुई। उन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता लीग’ नामक संस्था का गठन किया। वे भारतीयों को ब्रिटिश शासन की गुलामी से मुक्त करवाने में उनकी सहायता करना चाहते थे। जापान में प्रवासी भारतीय रासबिहारी बोस ने ‘आजाद हिन्द फौज’ के गठन का प्रस्ताव रखा।

अपने देशवासियों को अंग्रेजों के विरुद्ध. शस्त्र उठाने की प्रेरणा देने के लिए नेताजी ने वर्लिन रेडियो का भी प्रयोग किया। नेताजी के विचारों का भारतीयों पर गहरा प्रभाव पड़ा यह बात उनके प्रसिद्ध नारों ‘जय हिन्द’ व ‘दिल्ली चलो’ के प्रति जबरदस्त समर्थन से स्पष्ट होती हैं। भारतीय महिलाओं का उत्साह भी इतना अधिक था कि उनकी एक अलग रेजीमेन्ट बनानी पड़ी। इसकी कमाण्डर केप्टन लक्ष्मी सहगल थीं। इस सैन्य टुकड़ी को ‘रानी – झांसी रेजीमेंट कहा गया।

आजाद हिन्द फौज भारतीय एकता, समर्पण और उच्च कोटि के त्याग का प्रतीक बन गयी। आजाद हिन्द फौज के प्रति ब्रिटिश सरकार का रवैया अत्यन्त द्वेषपूर्ण था। अंग्रेज सत्ताधारी इतने रुष्ट थे कि फौज के तीन सबसे प्रमुख अफसरों गुरुदयाल सिंह ढिल्लो, शाहनवाज खाँ और पी.एम. सहगल पर दिल्ली के लाल किले पर मुकदमा चलाया। इन तीनों को दोषी ठहराने के बावजूद सभी को क्षमा करने के लिए विवश होना पड़ा। इसका प्रमुख कारण उत्तेजित भारतीयों, विशेषकर छात्रों द्वारा मुकदमे के विरोध में व्यापक हड़तालें और प्रदर्शनों का आयोजन करना था।

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