RBSE Solutions for Class 11 Physical Geography Chapter 9 अनाच्छादन

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Rajasthan Board RBSE Class 11 Physical Geography Chapter 9 अनाच्छादन

RBSE Class 11 Physical Geography Chapter 9 पाठ्य पुस्तक के अभ्यास प्रश्न

RBSE Class 11 Physical Geography Chapter 9 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
शैलों का स्थैतिक विघटन व वियोजन कहलाता है
(अ) अनाच्छादन
(ब) अपरदन
(स) अपक्षय
(द) घोलन
उत्तर:
(स) अपक्षय

प्रश्न 2.
अनाच्छादन किसे कहते हैं?
(अ) अपरदन व परिवहन
(ब) अपरदन व निक्षेपण
(स) अपरदन व अपक्षय एवं सामूहिक स्थानान्तरण
(द) अपरदन व घोलन
उत्तर:
(स) अपरदन व अपक्षय एवं सामूहिक स्थानान्तरण

प्रश्न 3.
अपशल्कन की क्रिया सामान्यतः वैसे प्रदेशों में होती है, जहाँ-
(अ) वार्षिक तापान्तर अधिक हो
(ब) तापमान ऊँचा हो
(स) तापमान नीचा हो
(द) दैनिक तापान्तर अधिक हो
उत्तर:
(द) दैनिक तापान्तर अधिक हो

प्रश्न 4.
किस प्रदेश में रासायनिक अपक्षय की क्रिया अधिक सक्रिय होती है?
(अ) उष्ण एवं शुष्क
(ब) ध्रुवीय प्रदेश
(स) उष्ण एवं आई
(द) शीत एवं आर्द्र
उत्तर:
(स) उष्ण एवं आई

प्रश्न 5.
वृहत शैल मलबे का गुरुत्वाकर्षण बल के द्वारा ढाल के सहारे स्थानान्तरित होना कहलाता है?
(अ) अपक्षय
(ब) अपरदन
(स) सामूहिक स्थानान्तरण
(द) परिवहन
उत्तर:
(स) सामूहिक स्थानान्तरण

RBSE Class 11 Physical Geography Chapter 9 अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 6.
ऑक्सीकरण कौन-सा अपक्षय है?
उत्तर:
ऑक्सीकरण रासायनिक अपक्षय का एक प्रकार है जिसमें वायुमंडलीय ऑक्सीजन जल में घुलकर शैल खनिजों को ऑक्साइड में बदल देती है।

प्रश्न 7.
अपरदन से क्या आशय है?
उत्तर:
अपरदन एक गतिशील प्रक्रिया है, इसमें शैलें गतिशील शक्तियों (हिम, वायु, लहरों, भूमिगत जल व नदी) द्वारा घिसती, कटती व स्थानान्तरित या परिवहित होती रहती हैं, यह प्रक्रिया अपरदन कहलाती है।

प्रश्न 8.
सन्निघर्षण अपक्षय में होता है या अपरदन में।
उत्तर:
सन्निघर्षण की प्रक्रिया अपरदन में होती है। इस प्रक्रिया में हवा, नदी या लहरों के साथ प्रवाहित शैल कण एवं टुकड़े आपस में रगड़ खाकर टूटते रहते हैं।

प्रश्न 9.
पिण्ड विच्छेदन कौन-सा अपक्षय है?
उत्तर:
पिण्ड विच्छेदन भौतिक अपक्षये का एक प्रकार है, जिसमें अत्यधिक दैनिक तापान्तरण के कारण शैलों में दरार पड़ने से चट्टाने टूटती हैं।

प्रश्न 10.
कार्बोनेशन कौन-सा अपक्षय है?
उत्तर:
कार्बोनेशन रासायनिक अपक्षय का एक प्रकार है, जिसमें वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड गैस जल में मिलकर कार्बनिक अम्ल बनाती है।

RBSE Class 11 Physical Geography Chapter 9 लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 11.
अनाच्छादन का संक्षेप में अर्थ बताइए।
उत्तर:
वह क्रिया जिसके द्वारा भूपटल की निम्नस्थ शैलों का आवरण उतरता है, उसे अनावृतिकरण या अनाच्छादन कहते हैं। यह प्रक्रिया अन्तर्जात बलों द्वारा उत्पन्न विभिन्न स्थलाकृतियों का समतलीकरण करती है। इसमें अत्थितं भूखण्ड का विखण्डन होने के पश्चात् उसका स्थानान्तरण, परिवहन, कटाव व घिसाव तथा सामुहिक स्थानान्तरण शामिल होता है। इन प्रक्रियाओं से उत्थित भू-भाग अन्तत: निम्न भू-भाग में बदल जाता है।

प्रश्न 12.
अपक्षय के प्रकार लिखिए।
उत्तर:
अपक्षय एक स्थैतिक प्रक्रिया है, जिसमें शैलें अपने ही स्थान पर विघटित एवं वियोजित होती हैं। अपक्षय के मुख्यत: तीन प्रकार होते हैं-

  1. भौतिक अपक्षय – इसे पुनः पिण्ड विच्छेदन, अपशल्कन, तुषारी अपक्षय व दाब मोचन में बाँटा गया है।
  2. रासायनिक अपक्षय – इस प्रकार के अपक्षय को पुन: ऑक्सीकरण, कार्बोनेशन, सिलिका पृथक्करण, जलयोजन व घोलन में बाँटा गया है।
  3. जैविक अपक्षय – इस प्रकार के अपक्षय को वनस्पति जात अपक्षय, जीव-जन्तु जात अपक्षय एवं मानवजात अपक्षय के रूप में बाँटा गया है।

प्रश्न 13.
उत्पाटन किसे कहते हैं?
उत्तर:
जल हिमानी अपने मार्ग में आने वाले शैल खण्ड उखाड़कर उनका परिवहन अपने साथ रिती है, तो उस क्रिया को उत्पाटन या उत्खनन कहते हैं। उत्पाटन की यह प्रक्रिया हिमजात क्षेत्रों में सम्पन्न होती है।

प्रश्न 14.
संक्षारण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जल की रासायनिक क्रिया द्वारा चट्टानों के खनिजों का जल में घुलकर बह जाना संक्षारण कहलाता है। संक्षारण की प्रक्रिया अपरदन की प्रक्रिया को बढ़ावा देती है।

प्रश्न 15.
भौतिक अपक्षय को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भौतिक अपक्षय-सूर्यातप, तुषार, जल एवं वायु दाब द्वारा चट्टानों में विघटन होने की क्रिया भौतिक अपक्षय कहलाती है। भौतिक अपक्षय की प्रक्रिया को निम्न भागों में बाँटा गया है

  1. पिण्ड विच्छेदन – इस प्रकार की प्रक्रिया अत्यधिक दैनिक तापान्तरण के कारण शैलो में दरार पड़ने व चट्टानों के विखण्डन के रूप में होती है।
  2. अपशल्कन – शैलों की ऊपरी परत के गर्म होने व अन्दर की परत के ठण्डी होने से शैलों का छिलकों के रूप में टूटना।
  3. तुषारी अपक्षय – बहुत ठण्डे क्षेत्रों में निरन्तर रूप से पानी का शैलों की दरारों में जमने व पिघलने से शैलों का टूटना।
  4. दाब मोचन – जब कभी ऊपरी चट्टानों के हटने से निचली चट्टानों पर पड़ने वाला दबाव कम होता है, तो उनमें चटकने पड़ती हैं, यही दाब मोचन कहलाता है।

RBSE Class 11 Physical Geography Chapter 9 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 16.
अपक्षय का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसके प्रमुख प्रकारों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अपक्षय एक स्थैतिक प्रक्रिया है। इसमें शैलें अपने ही स्थान पर विघटन एवं वियोजन द्वारा टूटती-फूटती रहती हैं, इस प्रक्रिया को अपक्षय कहते हैं।

अपक्षय के प्रकार – अपक्षय की प्रक्रिया विविध प्रकार से सम्पन्न होती है। विभिन्न घटकों को आधार मानकर अपक्षय को निम्न भागों में बाँटा गया है-
RBSE Solutions for Class 11 Physical Geography Chapter 9 अनाच्छादन 1
(i) भौतिक अपक्षय – सूर्यातप, तुषार, जल एवं वायु दाब से चट्टानों में विघटन होने की क्रिया भौतिक अपक्षय कहलाती है।
इसके निम्न प्रकार होते हैं-

  • पिण्ड विच्छेदन – गर्म मरुस्थलों में अत्यधिक दैनिक तापान्तर होने से शैलों में दरारें पड़ जाती हैं और कालान्तर में शैल बड़े-बड़े टुकड़ों में बँट जाती है।
  • अपशल्कन – शैलों की ऊपरी परत के गर्म होने व अन्दर की परत के ठण्डी होने से शैलों का छिलकों की तरह टूटना।
  • तुषारी अपक्षय – बहुत ठण्डे क्षेत्रों में निरन्तर रूप से पी का शैलों की दरारों में जमने व पिघलने के परिणामस्वरूप शैलों का टूटना।
  • दाब मोचन – जब कभी ऊपरी चट्टानों के हटने से निचली चट्टानों पर पड़ने वाला दबाव कम होने से चट्टानों का चटकना।।

(ii) रासायनिक अपक्षय – रासायनिक प्रक्रिया द्वारा शैलों का जल व गैस की सहायता से टूटना, घुलना, सड़ना व नए यौगिकों में बदलना रासायनिक अपक्षय होता है। इसे निम्न भागों में बाँटा गया है-

  • ऑक्सीकरण – वायुमंडलीय ऑक्सीजन जल में घुलकर शैल खनिजों को ऑक्साइड में बदल देती है जिससे शैलों का अपघटन होता है।
  • कार्बोनेशन – वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड गैस जल में मिलकर कार्बनिक अम्ल बनाती है जिससे चूनायुक्त शैले घुल जाती हैं।
  • सिलिका पृथक्करण – शैलों से सिलिका के अलग होने की प्रक्रिया।
  • जलयोजन-शैल खनिजों में जल के अवशोषण को जलयोजन कहा जाता है। जल सोखने की प्रक्रिया से शैलों में बिखराव होता है।
  • घोलन – वर्षा जल शैल पदार्थों से अनेक प्रकार के अम्लों एवं कार्बनिक तत्वों को घेल लेता है एवं नया रासायनिक मिश्रण बनाता है। यह प्रक्रिया हाइड्रोलिसिस कहलाती है।

(iii) जैविक अपक्षय – भूपटल पर जीव-जन्तुओं और वनस्पति से अपक्षय होना जैविक अपक्षय कहलाता है, इसके निम्न प्रकार हैं-

  • वनस्पति जात अपक्षय – वृक्षों की जड़ों का शैलों में प्रवेश कर उनहें विखंडित कर देना।
  • जीव-जन्तु जात अपक्षय – केचुएँ, दीमक, चूहों के द्वारा चट्टानी विखण्डन होना।।
  • मानव जात अपक्षय – मनुष्य की कृषि, खनन वे निर्माण क्रियाओं से होने वाला अपक्षय।

प्रश्न 17.
अनाच्छादन को समझाइए एवं उसके प्रकारों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वह क्रिया जिसके द्वारा भूपटल की निम्नस्थ शैलों का आवरण उतरता है, उसे अनावृतिकरण या अनाच्छादन कहते हैं। अनाच्छादन की यह प्रक्रिया बहिर्जात शक्तियों के माध्यम से समतलीकरण की प्रक्रिया को सम्पन्न करती है। अनाच्छादन को अपक्षये, अपरदन एवं सामुहिक स्थानान्तरण का संयुक्त परिणाम माना जाता है, इसी आधार पर इसे निम्न भागों में बाँटा गया है-
RBSE Solutions for Class 11 Physical Geography Chapter 9 अनाच्छादन 2

अपक्षय – अपक्षय एक स्थैतिक प्रक्रिया है जिसमें शैले अपने ही स्थान पर विघटन एवं वियोजन द्वारा टूटती-फूटती रहती हैं। अपक्षय की प्रक्रिया मुख्यत: भौतिक, रासायनिक एवं जैविक अपक्षय के रूप में सम्पन्न होती है। अपक्षय की इस प्रक्रिया को शैल संरचना एवं संगठन, भूमि के ढाल, जलवायु में भिन्नता और वनस्पति के द्वारा प्रभावित किया जाता है। इसमें सूर्यातप की स्थिति, हिम के स्वरूप, चट्टानों की संरचना व उन पर पड़ने वाले जल व गैसों के प्रभाव को शामिल किया जाता है।

अपरदन – अपरदन शब्द लैटिन भाषा के Erodere शब्द से बना है, जिसका तात्पर्य घिसना या कुंतरना है। अपरदन एक गतिशील प्रक्रिया है जिसमें शैले हिमानी, भूमिगत जल, लहरों, वायु व नदियों द्वारा घिसती, कटती एवं स्थानान्तरित या परिवहित होकर निक्षेपित होती रहती हैं। नदी, भूमिगत जल, हिमानी, हवा व तरंगों से अपरदन के लिए अपघर्षण, सन्निघर्षण, जलदाब क्रिया, संक्षारण, अपवाहन, गुहिकायन व उत्पाटन की प्रक्रियाओं द्वारा होता है। अपरदित पदार्थों के परिवहन की प्रक्रिया मुख्यत: घुलकर, निलम्बन व लुढ़ककर सम्पन्न होती है।

सामूहिक स्थानान्तरण – वृहत मात्रा में शैल मलबे के गुरुत्वाकर्षण बल के द्वारा ढाल के सहारे संचलित व स्थानान्तरित होना सामूहिक स्थानान्तरण कहलाता है। असंगठित शैल मलबे के लुढ़कने में गुरुत्वाकर्षण शक्ति उत्तरदायी होती है। ढ़ालों से खिसककर शैल कणों का तलहटी में ढेर लग जाता है। चट्टान चूर्ण के इसी ढ़ेर को टालस कहते हैं। असंगठित ढ़ीले पदार्थ के लुढ़कने या सरकने की मात्रा के आधार पर सामुहिक स्थानान्तरण को मन्दवाह, तीव्रवाह व अत्यधिक तीव्रवाह के रूप में बाँटा गया है।

प्रशन 18.
अपरदन चक्र की संकल्पना का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अमेरिकन भूगोलविद् विलियम मोरिस डेविस ने 1899 में अपरदन चक्र की संकल्पना प्रकट की। इन्होंने बताया कि अपरदन चक्र की अवधि के दौरान उत्थित भू-भाग अपरदित होकर आकृति विहिन समप्राय मैदान में रूपान्तरित हो जाता है।” डेविस ने अपने अपरदन चक्र के प्रतिपादन के लिए तीन तथ्यों संरचना, प्रक्रम व समय को महत्वपूर्ण माना था। इन तीनों को डेविस के त्रिकूट के नाम से जाना जाता है। इन सभी को संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है-

  1. संरचना – किसी भू-भाग पर पहले शैल संरचना विकसित होती है, उसके बाद वहाँ विविध भूदृश्यों का निर्माण होता है।
  2. प्रक्रम – भूदृश्यों या स्थलाकृतियों के विकास में नदी, हवा, लहरें, हिमनद, भूमिगत जल आदि परिवर्तनकारी प्रक्रमों में से किसी न किसी प्रक्रम की अहम भूमिका रहती हैं।
  3. समय (अवस्था) – मानव जीवन की भाँति भू-दृश्यों की विकास की निश्चित समय अवधि होती है।

डेविस ने अपने अपरदन चक्र में उत्थान व अपरदन दोनों में प्रत्यक्ष सम्बन्ध माना था। इनके अनुसार उत्थान व अपरदन दोनों में से एक प्रक्रिया ही एक समय सम्पन्न होती है। जब उत्थान हो रहा होता है तो अपरदन नहीं होता और जब अपरदन होता है तो उत्थान नहीं होता है। उत्थान के समाप्त हो जाने पर ही अपरदन प्रारम्भ होता है। डेविस के अपरदन चक्र को निम्न तीन अवस्थाओं में विभाजित किया गया है

  1. युवावस्था,
  2. प्रौढ़ावस्था,
  3. वृद्धावस्था।

1. युवावस्था – इस अवस्था में उत्थान की समाप्ति के पश्चात् अपरदन प्रारम्भ होता है। इस अवस्था में नदी तीव्र गति से बहती है जिसके कारण घाटी गर्तन की प्रक्रिया से घाटी गहरी होती जाती है। इसी अवस्था के अन्दर V आकार की घाटियों को निर्माण होता है।

2.  प्रौढावस्था – इस अवस्था के अन्दर पााश्विक अपरदन प्रारम्भ हो जाता है जिसमें घाटियाँ गहरा होने के बजाय चौड़ा होना प्रारम्भ कर देती हैं। इस अवस्था में मंद ढ़ाल के कारण नदियों का वेग कम हो जाने से उनकी परिवहन क्षमता कम हो जाती है। अधिकांश सरिताएँ अपरदन के आधार तेल के अनुरूप प्रवणित हो जाती हैं।

3. वृद्धावस्था – इस अवस्था में भूपटलीय विषमंताएँ घट जाती हैं। सम्पूर्ण क्षेत्र एक समप्राय मैदान में परिवर्तित हो जाता है। निरपेक्ष तथा सापेक्ष उच्चावच दोनों न्यूनतम हो जाते हैं। घटियाँ उथली एवं अत्यधिक चौड़ी हो जाती हैं, जिनका पार्श्व ढाल अवतल होता है।
डेविस के इस अपरदन चक्र को निम्न रेखाचित्र के द्वारा दर्शाया गया है-
RBSE Solutions for Class 11 Physical Geography Chapter 9 अनाच्छादन 3

RBSE Class 11 Physical Geography Chapter 9 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 11 Physical Geography Chapter 9 वनुनिष्ठ

प्रश्न 1.
अपक्षय है।
(अ) स्थैतिक प्रक्रिया
(ब) गतिशील प्रक्रिया
(स) संचलन की प्रक्रिया
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) स्थैतिक प्रक्रिया

प्रश्न 2.
चट्टानों का छिलकों के रूप में अलग होना कहलाता है।
(अ) पिण्ड विच्छेदन
(ब) अपशल्कन
(स) दाब मोचन
(द) तुषारी अपक्षय
उत्तर:
(ब) अपशल्कन

प्रश्न 3.
ऑक्सीकरण की प्रक्रिया सर्वाधिक कहाँ होती है।
(अ) शुष्क भागों में
(ब) उष्णआर्द्र भागों में
(स) शीत भागों में
(द) शीतोष्ण भागों में
उत्तर:
(ब) उष्णआर्द्र भागों में

प्रश्न 4.
कार्बनिक अम्ल किस प्रक्रिया में बनता है?
(अ) ऑक्सीकरण में
(ब) कार्बोनेशन में
(स) जलयोजन में
(द) घोलन में
उत्तर:
(ब) कार्बोनेशन में

प्रश्न 5.
प्रवाहित शैल कण व टुकड़ों को आपस में टकराना कहलाता है
(अ) सन्निघर्षण
(ब) संक्षारण
(स) उत्पाटन
(द) गुहिकायन
उत्तर:
(अ) सन्निघर्षण

प्रश्न 6.
उत्पाटन की प्रक्रिया कहाँ होती है?
(अ) मरुस्थलों में
(ब) मैदानों में
(स) हिमानी जात क्षेत्रों में
(द) पर्वतों में
उत्तर:
(स) हिमानी जात क्षेत्रों में

प्रश्न 7.
मन्दप्रवाह में जो शामिल नहीं है, वह है-
(अ) भूमि सर्पण
(ब) शैल सर्पण
(स) मृदा सर्पण
(द) अवपातन
उत्तर:
(द) अवपातन

प्रश्न 8.
डेविस ने अपरदन चक्र की संकल्पना कब प्रतिपादित की थी?
(अ) 1869 में
(ब) 1899 में
(स) 1919 में
(द) 1939 में
उत्तर:
(ब) 1899 में

प्रश्न 9.
डेविस ने किस अवस्था में घाटी को गहरा होना माना है?
(अ) युवावस्था में
(ब) प्रौढ़ावस्था में
(स) वृद्धावस्था में
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) युवावस्था में

प्रश्न 10.
पेंक ने किस अवस्था (समयावधि) में उत्थान को अपरदन से अधिक माना है?
(अ) प्रथम अवस्था में
(ब) द्वितीय अवस्था में
(स) तृतीय अवस्था में
(द) चतुर्थ अवस्था में
उत्तर:
(अ) प्रथम अवस्था में

सुमेलन सम्बन्धी प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न में स्तम्भ अ को स्तम्भ ब से सुमेलित कीजिए
(क)

स्तम्भ (अ)
(अपक्षय का प्रकार)
स्तम्भ (ब)
(अपक्षय का सम्बन्ध)
(i) पिण्ड विच्छेदन(अ) उष्ण-आर्द्र क्षेत्रों में
(ii) तुषारी अपक्षय(ब) चूना प्रदेशों में
(iii) ऑक्सीकरण(स) बहुत ठंडे क्षेत्रों में
(iv) कार्बोनेशन(द) खनन वाले क्षेत्रों में
(v) मानवजात अपक्षय(य) मरुस्थलीय क्षेत्रों में

उत्तर:
(i) य, (ii) स, (ii) अ, (iv) ब, (v) द।

(ख)

स्तम्भ (अ)
(क्रिया)
स्तम्भ ()
(
सम्बन्ध)
(i) टाल सर्पण(अ) अत्यधिक तीव्रवा
(ii) चादन वाह(ब) रासायनिक अपक्षय
(iii) मलबापात(स) तीव्रवाह
(iv) घोलन(द) हिमानी द्वारा
(v) उत्पाटन(य) मन्दवाह

उत्तर:
(i) य, (ii) स, (ii) अ, (iv) ब, (v) द।

RBSE Class 11 Physical Geography Chapter 9 अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अन्तर्जात शक्तियाँ किसे कहते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी के आन्तरिक भाग में उत्पन्न होने वाली शक्तियों को अन्तर्जात शक्तियाँ कहते हैं। इन शक्तियों के द्वारा धरातल पर अक्सर नवीन भू-भागों का निर्माण किया जाता है।

प्रश्न 2.
बहिर्जात शक्तियाँ किसे कहते हैं?
उत्तर:
धरातलीय सतह के ऊपर उत्पन्न मिलने वाली शक्तियाँ बहिर्जात शक्तियाँ कहलाती हैं। इन शक्तियों के द्वारा मुख्यतः समतलीकरण की प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है।

प्रश्न 3.
अनाच्छादन किसका सामुहिक रूप है?
उत्तर:
अनाच्छादन अपक्षय, अपरदन एवं सामुहिक स्थानान्तरण का सामूहिक प्रक्रिया है।

प्रश्न 4.
अपक्षय को प्रभावित करने वाले कारक कौन-से हैं?
अथवा
अपक्षय के नियंत्रक कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
अपक्षय को प्रभावित करने वाले कारकों में शैलों की संरचना एवं संगठन, भूमि का ढ़ाल, जलवायु की भिन्नता एवं वनस्पति का प्रभाव शामिल है।

प्रश्न 5.
भौतिक अपक्षय किसे कहते हैं?
अथवा
यांत्रिक अपक्षय का क्या भावार्थ होता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भौतिक दशाओं; यथा- सूर्यातप, तुषार, जल एवं वायुदाब के द्वारा चट्टानों में होने वाले विघटन को भौतिक अपक्षय कहते हैं।

प्रश्न 6.
विघटन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
संघठित चट्टानों का विखंडन होने से उनके टुकड़ों में विभक्त होने या टूटने की क्रिया को विघटन कहते हैं।

प्रश्न 7.
वियोजन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
संघटक खनिजों के संक्षारण के परिणामस्वरूप शैलों में होने वाले अलगाव या विखंडन को वियोजन कहते हैं।

प्रश्न 8.
अपराल्कन किसे कहते हैं?
अथवा
प्याज अपक्षय से क्या तात्पर्य होता है?
उत्तर:
शैलों की ऊपरी परत के गर्म होने व अन्दर की परत के ठण्डी होने से शैलों का छिलकों की तरह टूटना अपशल्कम या प्याज अपक्षय कहलाता है।

प्रश्न 9.
तुषारी अपक्षय क्यों होता है?
उत्तर:
बहुत ठण्डे क्षेत्रों में निरन्तर रूप से पानी के शैलों की दरारों में जमने वे पिघलने के परिणामस्वरूप शैलों के संघटन में कमी आने से तुषारी अपक्षय होता है।

प्रश्न 10.
दाब मोचन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जब कभी ऊपरी चट्टानों के हटने से निचली चट्टानों पर पड़ने वाले दबाव में कमी आती है तो नीचे की चट्टानों के फलने से चटकने पड़ने लगती हैं। चट्टानों के दाब से मुक्त होने की यह प्रक्रिया दाब मोचन कहलाती है।

प्रश्न 11.
रासायनिक अपक्षय किसे कहते हैं?
उत्तर:
रासायनिक प्रक्रिया द्वारा शैलों का जल व गैस की सहायता से टूटना, घुलनाङ सड़ना व नए यौगिकों में बदलना रासायनिक अपक्षय कहलाता है।

प्रश्न 12.
रासायनिक अपक्षय कितने प्रकार का होता है?
उत्तर:
रासायनिक अपक्षय को मुख्यत: पाँच भागों-ऑक्सीकरण, कार्बोनेशन, सिलिका पृथक्करण, जलयोजन एवं घोलन में बाँटा गया है।

प्रश्न 13.
ऑक्सीकरण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
वायुमण्डलीय ऑक्सीजन जब जल में घुलकर शैल खनिजों को ऑक्साइड में बदल देती है, ऐसी प्रक्रिया ऑक्सीकरण कहलाती है।

प्रश्न 14.
कार्बोनेशन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जब वायुमण्डलीय कार्बन डाइऑक्साइड गैस जल में मिलकर कार्बनिक अम्ल बनाती है, तो इसके सम्पर्क में आकर चूनायुक्त शैले तीव्रता से घुल जाती हैं, यह प्रक्रिया कार्बोनेशन कहलाती है।

प्रश्न 15.
जलयोजन किसे कहते हैं?
अथवा
हाइड्रोजन क्या होता है?
उत्तर:
शैल खनिजों में जल के अवशोषण को जलयोजने या हाइड्रेशन कहते हैं।

प्रश्न 16.
हाइड्रोलिसिस से क्या तात्पर्य है? अथवी घोलन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
वर्षा जल शैल पदार्थों से अनेक प्रकार के अम्लों एवं कार्बनिक तत्त्वों को घेल लेता है एवं नया रासायनिक मिश्रण बना लेता है इसी अभिक्रिया को हाइड्रोलिसिस कहते हैं।

प्रशन 17.
जैविक अपक्षय से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
भूपटल पर मिलने वाले जैविक समुदाय (वनस्पति, जीव-जन्तु एवं मानव) के द्वारा होने वाले चट्टानी विखण्डन को जैविक अपक्षय कहते हैं।

प्रश्न 18.
अपरदन हेतु उत्तरदायी कारक कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
अपरदन हेतु उत्तरदायी कारकों में हिमानी, भूमिगत जल, सागरीय लहरों, वायु एवं प्रवाहित जल को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 19.
अपरदन किन विधियों से होता है?
अथवा
अपरदन हेतु उत्तरदायी विधियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
अपरदन की प्रक्रिया मुख्यतः अपघर्षण, सन्निघर्षण, जलदााब क्रिया, संक्षारण, अपवाहन, गुहिकायन एवं उत्पाटने जैसी विधियों के कारण होती है।

प्रश्न 20.
अपघर्षण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जब अपरदनकारी कारक अपने साथ चट्टानी मलबे व चूर्ण को बहाकर ले जा रहे होते हैं तो ये पदार्थ धरातलीय शैलों को घर्षण करते जाते हैं, यही प्रक्रिया अपघर्षण कहलाती है।

प्रश्न 21.
सन्निघर्षण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
हवा, नदी या लहरों के साथ प्रवाहित शैल कण एवं टुकड़े आपस में रगड़ खाकर टूटते रहते हैं। इस प्रक्रिया को ही सन्निघर्षण कहते हैं।

प्रश्न 22.
जलदाब क्रिया से क्या आशय है?
उत्तर:
नदी जल के भारी दबाव से या जल भंवर के दबाव से चट्टानों के अपरदन की क्रिया को जलदाब क्रिया कहते हैं।

प्रशन 23.
अपवाहन किसे कहते हैं?
उत्तर:
हवा द्वारा बालू मिट्टी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर अपने साथ उड़ाकर ले जाना अपवाहन कहलाता है।

प्रश्न 24.
अवनमन कुण्ड क्या होता है?
उत्तर:
नदी प्रवाहित जल में जल-प्रपात की स्थिति के दौरान जल जल अधिक ऊँचाई से नीचे गिरता है, तो निम्नवर्ती भाग (जहाँ जल गिरता है) पर एक गढ्डा (गर्त) बन जाता है। जलयुक्त इस गढ्डे (गर्त) को ही अवनमन कुण्ड कहा जाता है।

प्रश्न 25.
सामुहिक स्थानान्तरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
वृहत् मात्रा में शैल मलबे के गुरुत्वाकर्षण बल के द्वारा ढाल के सहारे संचलित व स्थानान्तरित होने की प्रक्रिया सामूहिक स्थानान्तरण कहलाती है।

प्रश्न 26.
टालस से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
ढालों से खिसककर शैल कणों का तलहटी में जो ढेर लग जाता है, चट्टान चूर्ण से निर्मित इस ढेर को ही टालस कहते हैं।

प्रश्न 27.
सामुहिक स्थानान्तरण को कितने भागों में बाँटा गया है?
उत्तर:
सामुहिक स्थानान्तरण को तीन भागों-मन्दगति सामूहिक स्थानान्तरण, तीव्रगति सामूहिक स्थानान्तरण एवं अत्यधिक तीव्रगति वाले सामुहिक स्थानान्तरण में बाँटा गया है।

प्रश्न 28.
मन्दवाह की प्रक्रिया अधिक कहाँ सम्पन्न होती है?
उत्तर:
मन्दवाह की प्रक्रिया उपध्रुवीय शीत प्रदेशों में अधिक सम्पन्न होती है।

प्रश्न 29.
अत्यधिक तीव्रवाह को किन प्रारूपों में देखा जाता है?
उत्तर:
अत्यधिक तीव्रवाह को मुख्यत: भूमिस्खलन, शैल स्खलन, शैल पात, मलबा स्खलन, मलबापात व अवपातन के रूप में देखा जाता है।

प्रश्न 30.
डेविस के त्रिकूट किसे कहा जाता है?
उत्तर:
संरचना, प्रक्रम व समय (अवस्था) को डेविस के त्रिकूटों के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 31.
पेनीप्लेन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
डेविस ने वृद्धावस्था के दौरान सम्पूर्ण स्थलखण्डों को विषमताओं से विहिन होने पर निर्मित समतल मैदानी को पेनीप्लेन की संज्ञा दी थी।

प्रश्न 32.
पेंक ने अपरदन चक्र को किसका योग बताया है?
उत्तर:
पेंक ने अपरदन चक्र को भूदृश्यों के विकास की अवस्था, उनके उत्थान की दर तथा उनके निम्नीकरण के पारस्परिक सम्बन्धों को योग बताया है।

प्रश्न 33.
पेंक के अनुसार घाटियों के गहरा एवं चौड़ा होने का क्या कारण है?
उत्तर:
पेंक के अनुसार द्वितीय अवस्था में उत्थान व अपरदन समान रूप से सक्रिय रहते हैं जिसके कारण घाटियाँ गहरी वे चौड़ी होती हैं।

प्रश्न 34.
पेंक का अपरदन चक्र किन अवस्थाओं से गुजरता है?
उत्तर:
पेंक का अपरदन चक्र पाँच अवस्थाओं–प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ एवं पंचम अवस्था से गुजरता है।

प्रश्न 35.
पेंक ने अपरदन चक्र की कौन-सी गतियों का उल्लेख किया है?
उत्तर:
पेंक के अनुसार आफस्तीजिण्डे इट्विकलुंग, ग्लीखफार्मिंगे, इविकलुंग व आबस्तीजिण्डे इट्विंकलुंग नामक गतियाँ होती हैं।

RBSE Class 11 Physical Geography Chapter 9 लघुत्तरात्मक प्रश्न Type I

प्रश्न 1.
अनावृत्तिकरण में शामिल प्रक्रियाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अनावृत्तिकरण निम्न प्रक्रियाओं को शामिल स्वरूप है-

  1. अपक्षय,
  2. अपरदन,
  3. सामूहिक स्थानान्तरण।

1. अपक्षय – यह एक स्थैतिक प्रक्रिया है, इसमें शैले अपने ही स्थान पर विघटन (Disinitegration) एवं वियोजन द्वाराः टूटती-फूटती रहती हैं, इस प्रक्रिया को अपक्षय कहते हैं।
2. अपरदन – यह एक गतिशील प्रक्रिया है, इसमें शैले गतिशील शक्तियों (हिम, वायु, लहरों, भूमिगत जल व नदी) द्वारा घिसती, कटती व स्थानान्तरित या परिवहित होती रहती हैं, इस प्रक्रिया को अपरदन कहते हैं।
3. सामूहिक स्थानान्तरण – अपक्षयित शैल पदार्थों को गुरुत्वाकर्षण बल के द्वारा ढ़ाल के सहारे संचलित होना सामूहिक स्थानान्तरण कहलाता है।

प्रश्न 2.
पिण्ड विच्छेदन व तुषारी अपक्षय में क्या अन्तर है?
उत्तर:
पिण्ड विच्छेदन व तुषारी अपक्षों में निम्न अन्तर मिलते हैं-

पिण्ड विच्छेदनतुषारी अपक्षय
1. अपक्षय की यह प्रक्रिया मरुस्थलीय क्षेत्रों में सम्पन्न होती हैं।1. अपक्षय की यह प्रक्रिया ध्रुवीय व उप-ध्रुवीय क्षेत्रों में सम्पन्न होती है।
2. यह प्रक्रिया अधिक ताप के कारण सम्पन्न होती है।2. यह प्रक्रिया न्यून ताप की स्थिति के परिणामस्वरूप सम्पन्न होती है।
3. इस प्रकार के अपक्षय में तापान्तर के कारण शैलों का विघटन होता है।3. इस प्रकार के अपक्षय में पानी के ठोस व तरल रूप में बदलने के कारण शैलों का विघटन होता है।

प्रश्न 3.
ऑक्सीकरण एवं कार्बोनेशन में क्या अन्तर है?
उत्तर:
ऑक्सीकरण एवं कार्बोनेशन की प्रक्रियाओं में निम्न अन्तर मिलते हैं-

ऑक्सीकरणकार्बोनेशन
1. इस प्रक्रिया में वायुमंडलीय ऑक्सीजन का जल में घुलाव होता है।1. इस प्रक्रिया में वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड का जल में घुलाव होता है।
2.  इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन द्वारा शैल खनिजों को ऑक्साइड में बदला जाता है।2. इस प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड जल में मिलकर कार्बनिक अम्ल का निर्माण करती है।
3.  ऑक्सीकरण से लोहे में जंग लगने की प्रक्रिया सम्पन्न होती है।3.  कार्बोनेशन से चूने के विखंडित होने की प्रक्रिया सम्पन्न होती है।
4.  यह प्रक्रिया सर्वाधिक मात्रा में उष्ण-आर्द्र क्षेत्रों में होती है।4. यह प्रक्रिया सर्वाधिक मात्रा में चूना प्रदेशों में सम्पन्न होती है।

प्रश्न 4.
जैविक अपक्षय के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जैविक अपक्षय को इसके कारकों के आधार पर निम्नानुसार वर्णित किया गया है-

  1. वनस्पति जात अपक्षय – विभिन्न प्रकार के वृक्षों की जड़े शैलों में प्रवेश कर उनके कणों को ढीला कर देती हैं, जिससे शैलों में विघटन होता है। इसे वनस्पति जात अपक्षय कहते हैं।
  2. जीव-जन्तु जात अपक्षय – विभिन्न जीवों व जन्तुओं; यथा – केचुएँ, दीमक, चूहें व पशुओं के द्वारा चट्टानों को असंगठित करने से यह अपक्षय होता है।
  3. मानवजात अपक्षय – मानव की विविध प्रकार की क्रियाओं; यथा – खनन, कृषि, निर्माण, आणविक विस्फोट से शैलों का असंगठित होना इस श्रेणी में शामिल किया जाता है।

प्रश्न 5.
अपक्षय के महत्व को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
अपक्षय के महत्व को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया गया है-

  1. अपक्षय में चट्टानें छोटे-छोटे टुकड़ों में बँट जाती हैं। इससे मृदा निर्माण में सुविधा होती है।
  2. अपक्षय, अपरदन एवं वृहद् संचलन के लिए उत्तरदायी है।
  3. अपक्षयित पदार्थों की गहराई के आधार पर वनस्पति-जैव विविधता एवं जैव मात्रा का निर्धारण होता है।
  4. अपक्षय वृहत् क्षरण, अपरदन तथा उच्चावच के निम्नीकरण में सहायक होता है।
  5. स्थलाकृतियाँ अपक्षय एवं अपरदन का परिणाम हैं।
  6. शैलों के अपक्षय एवं निक्षेपण द्वारा मूल्यवान खनिजों; जैसे-लोहा, मैंगनीज, एल्यूमीनियम, ताँबा आदि का संकेन्द्रण होता है। जिससे उनका दोहन, प्रक्रमण तथा शोधन आसान हो जाती है।
  7. अपक्षय मृदा निर्माण की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।

प्रश्न 6.
अपक्षय पृथ्वी पर जैव-विविधता के लिए उत्तरदायी है, कैसे?
उत्तर:
जैव विविधता (Bio-diversity) धरातल पर किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले विविध जैविक तत्त्वों की उपस्थिति को प्रदर्शित .. करती है। जैव विविधता पर अपक्षय का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। जैव मात्रा एवं जैव विविधता वनस्पति द्वारा पूर्णतया प्रभावित होती है। अपक्षय द्वारा चट्टानों एवं खनिजों का स्थानान्तरण होता है तथा नई सतहों का निर्माण होता है। इससे रासायनिक प्रक्रिया, द्वारा सतह में नमी एवं वायु प्रवेश में सहायता मिलती है। इसके द्वारा मिट्टी में ह्यूमस, कार्बनिक एवं अम्लीय पदार्थों का प्रवेश होता है। जिससे जैव विविधता प्रभावित होती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि अपक्षय धरातल पर जैव विविधता के लिए उत्तरदायी है।

प्रश्न 7.
अपघर्षण एवं उत्पाटन में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अपघर्षण एवं उत्पादन में निम्न अन्तर मिलते हैं-

अपघर्षणउत्पाटन
1. यह प्रक्रिया मुचयत: प्रवाहित जल के द्वारा होती है।1. उत्पाटन की प्रक्रिया हिमानी के द्वारा होती है।
2. यह प्रक्रिया मैदानी, पर्वतीय वे मरुस्थलीय क्षेत्रों में दृष्टिगत होती है।2. यह प्रक्रिया हिमाच्छादित ध्रुवीय व उपध्रुवीय क्षेत्रों में मुख्य रूप से दृष्टिगत होती है।
3.  इस प्रक्रिया में पानी के बहाव से उत्पन्न दबाव से शैलों में अपघर्षण की प्रक्रिया होती है।3. इस प्रक्रिया में हिमानी के बहाव व गुरुत्वाकर्षण के कारण उसके लुढ़काव से शैलों से घर्षण की प्रक्रिया होती है।

प्रश्न 8.
अपरदित पदार्थों का प्रवाहन किन रूपों में होता है?
उत्तर:
अपरदित पदार्थों का प्रवाहन मुख्यतः तीन रूपों में होता है-

  1. घुलकर,
  2. निलम्बन,
  3. लुढ़ककर।

1. घुलकर – जल में अनेक पदार्थ घुलकर उसके साथ प्रवाहित होते हैं।
2. निलम्बन – अपरदनकारी कारकों (जल या पवन) के साथ तैरते हुए या लटकते हुए पदार्थ प्रवाहित होते हैं।
3. लुढ़ककर – चट्टानों के बड़े-बड़े टुकड़े घिसटते हुए और लुढ़कते हुए नदी तल पर प्रवाहित होने को कर्षण या घसीटना कहा जाता है।

प्रश्न 9.
अपरदन व सामूहिक स्थानान्तरण में क्या अन्तर है?
उत्तर:
अपरदन व सामूहिक स्थानान्तरण में निम्न अन्तर मिलते हैं-

अपरदनसामूहिक स्थानान्तरण
1. अपरदन में प्रवाहित जेल, हिमानी, वायु, भूमिगत जल व लहरों तथा धाराओं का प्रमुख योगदान होता है।1. सामुहिक स्थानान्तरण की प्रक्रिया मुख्यतः गुरुत्वाकर्षण के कारण सम्पन्न होती है।
2.  अपरदन एक निरन्तर प्रक्रिया है।2. सामुहिक स्थानान्तरण एक निरन्तर प्रक्रिया नहीं है।
3. अपरदन का क्षेत्र व्यापक होता है।3. सामुहिक स्थानान्तरण का क्षेत्र अपरदन की तुलना में सीमित होता है।
4.  अपरदने से निम्नीकरण होता है।4. सामुहिक स्थानान्तरण से निम्नीकरण हो यह आवश्यक नहीं हैं।

प्रश्न 10.
डेविस के द्वारा वर्णित अपरदन चक्र की अवस्थाओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
डेविस ने अपने अपरदन चक्र को तीन प्रमुख अवस्थाओं में विभाजित किया है-

  1. युवावस्था,
  2. प्रौढ़ावस्था,
  3. वृद्धावस्था।

1. युवावस्था – इस अवस्था में नदी निम्नवर्ती कटाव से घाटी को गहरा करती है। इस अवस्था में नदी का वेग सर्वाधिक होने के घाटी गर्तन की प्रक्रिया के कारण V आकार की घाटियाँ बनती हैं।
2. प्रौढावस्था – इस अवस्था में नदी पार्श्ववर्ती कटाव के द्वारा अपनी घाटी को चौड़ा करती हैं। इस अवस्था में पाश्विक अपरदन से तलीय कटाव होता है। जिससे V आकार की घाटियाँ प्राय: U आकार के समान लगने लगती हैं।
3. वृद्धावस्था – इस अवस्था में भूपटलीय विषमताएँ घट जाती हैं तथा सम्पूर्ण क्षेत्र एक समप्रायः मैदान में परिवर्तित हो जाता है। इस अवस्था में ढ़ाल लगभग समाप्त हो जाता है तथा जल चारों ओर फैल जाता है।

प्रश्न 11.
पेंक के अपरदन से सम्बन्धित चक्र की तीन कमियाँ लिखिए।
उत्तर:
पेंक के अपरदन से सम्बन्धित सिद्धान्त में निम्न कमियाँ रही-

  1. पेंक ने अपना अपरदन सम्बन्धी सिद्धान्त जर्मन भाषा में प्रतिपादित किया था। जब जर्मन भाषा से अन्य भाषाओं (मुख्यतः अंग्रेजी भाषा में) में इसका रूपान्तरण हुआ तो अर्थ का अनर्थ हो गया।
  2. इनका सिद्धान्त अत्यधिक दुरूह होने के कारण अरुचिपूर्ण बन गया।
  3. पेंक द्वारा प्रस्तुत ढ़ालों के समानान्तर निवर्तन एवं भूपटल में सतत् संचलन की संकल्पना पर विद्वान सहमत नहीं हैं।

RBSE Class 11 Physical Geography Chapter 9 लघुत्तरात्मक प्रश्न Type II

प्रश्न 1.
अपक्षय को प्रभावित करने वाले कारकों को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
अपक्षय को नियंत्रित करने वाले घटक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
अपक्षय एक स्थैतिक प्रक्रिया है जिसमें शैलों का अपने स्थान पर ही विघटन होता है, किन्तु इस प्रक्रिया के दौरान अनेक घटक/कारक इसे नियंत्रित करते हैं। इन नियंत्रित करने वाले कारकों में मुख्यत: शेलों की संरचना व संगठन, भूमि के ढ़ाल, जलवायु सम्बन्धी भिन्नता एवं वनस्पति के प्रभाव को शामिल किया जाता है। इन सभी घटकों/कारकों का संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है-

  1. शैल संरचना एवं संगठन – रंध्रपूर्ण व घुलनशील खनिजों वाली शैलों से रासायनिक अपक्षय अधिक होता है। ऊर्ध्वाधर परतों वाली चट्टानों में यांत्रिक अपक्षय व क्षैतिज परतों वाली चट्टानों में रासायनिक अपक्षय अधिक होता है।
  2. भूमि का ढ़ोल – मंद एवं न्यून ढाल वाली भूमि पर, तीव्र ढाल वाली भूमि की तुलना में अपक्षय कम रहता है।
  3. जलवायु में भिन्नता – उष्ण आर्दै प्रदेशों में रासायनिक अपक्षय जबकि उष्ण व शुष्क प्रदेशों में यान्त्रिक अपक्षय अधिक सक्रिय होता है।
  4. वनस्पति का प्रभाव – वनस्पतियाँ आंशिक रूप से अपक्षय के कारक भी हैं और आंशिक रूप से उसके लिए अवरोधक भी हैं। वनस्पति विहीन उष्ण प्रदेशों में सूर्याताप की अधिकता के कारण अपक्षय की मात्रा भी अधिक रहती है।

प्रश्न 2.
क्या भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं? यदि नहीं तो क्यों? सोदाहरण व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अपक्षय चट्टानों के टूट-फूट की वह प्रक्रिया है जिसमें चट्टानें विघटन एवं वियोजन द्वारा कमजोर होकर विदीर्ण होने लगती हैं। अपक्षय के अन्तर्गत चट्टानों के कमजोर होने का कार्य दो प्रकार से होता है-(1) यांत्रिक विखण्डन द्वारा, (2) रासायनिक वियोजन द्वारा। भौतिक कारकों – तापक्रम, वर्षा, दबाव आदि के द्वारा चट्टानों के कमजोर पड़ने की प्रक्रिया को विघटन कहते हैं। इस प्रकार के अपक्षय को भौतिक अपक्षय कहा जाता है। रासायनिक प्रक्रियाएँ-ऑकसीकरण, कार्बोनेशन, जलयोजन आदि द्वारा चट्टानों के कमजोर होने की प्रक्रिया को रासायनिक वियोजन कहते हैं। इस प्रकार के अपक्षय को रासायनिक अपक्षय भी कहा जाता है।

भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय की प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से अलग हैं किन्तु दोनों प्रकार के अपक्षय एक-दूसरे से स्वतन्त्र नहीं हैं। भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय में भाग लेने वाले कारकों के प्रभावों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, तापमान जो भौतिक अपक्षय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जिसके कारण चट्टानों का विस्तारण एवं संकुचन होता है और चट्टान कमजोर होती जाती है। चट्टानों की रासायनिक संरचना द्वारा अपक्षय पूर्णतया प्रभावित होता है। रासायनिक संरचना के आधार पर चट्टानों में ताप ग्रहण करने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इसी प्रकार जल किसी चट्टान से तब तक अभिक्रिया नहीं करेगा, जब तक कि उसे ताप या दाब के कारण ऊष्मा की प्राप्ति नहीं होती। रासायनिक अपक्षय की क्रियाएँ सभी तापमण्डलों में एक समान नहीं होतीं। उष्ण कटिबंधीय जलवायु प्रदेशों में जहाँ वर्षभर तापमान अधिक होता है वहाँ रासायनिक अपक्षय ज्यादा क्रियाशील होता है।
अत: स्पष्ट हो जाता है कि भौतिक एवं रासायकिन अपक्षय एक-दूसरे से स्वतंत्र न होकर वायुमण्डलीय दशाओं से नियंत्रित मिलते हैं।

प्रश्न 3.
वृहत् संचलन क्या है? इसके विविध स्वरूपों को चित्र के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वृहत् संचलन में उन सभी संचलनों को सम्मिलित किया जाता है जिसके अन्तर्ग शैलों का वृहत् मलबा गुरुत्वाकर्षण के कारण ढाल के अनुरूप विस्थापित होने लगता है। वृहत् संचलन में चट्टानों से प्राप्त मलवे का विसर्पण, बहाव, स्खलन एवं अवपातन (Fall) होता है। यद्यपि वृहत् संचलन में अपक्षय आवश्यक नहीं होता क्योंकि इसमें अपक्षयित पदार्थों के साथ-साथ मूल चट्टानों का अवपातन भी ढाल के अनुरूप होने लगता है। वृहत् संचलन गुरुत्वाकर्षण के कारण भी होता हैं इसमें अपरदन के कारकों को सीधा सम्बन्ध नहीं होता। ढाल पर पदार्थ अपना प्रतिरोध प्रस्तुत करते हैं। किन्तु गुरुत्वाकर्षण बल के कारण सामान्य स्थितियों में वे सफल नहीं होते। कमजोर पदार्थ, पतले संस्तर वाली चट्टानें, भ्रंश, खड़े भृगु व तीव्र ढाल, पर्याप्त तथा वनस्पति का अभाव आदि वृहत् संचलन के महत्त्वपूर्ण सहायक कारक हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Physical Geography Chapter 9 अनाच्छादन 4

प्रश्न 4.
वृहत् संचलन की सक्रियता के प्रमुख कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
वृहत् संचलन की सक्रियता के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं-
वृहत संचलन की सक्रियता के महत्त्वपूर्ण कारक- वृहत् संचलन को सक्रियता प्रदान करने वाले महत्त्वपूर्ण कारक निम्नलिखित हैं

  1. प्राकृतिक एवं कृत्रिम साधनों द्वारा ऊपर के पदार्थों के टिकने के आधार का हटना।
  2. ढालों की तीव्रता एवं ऊँचाई में वृद्धि का होना।
  3. पदार्थों में भार का होना।
  4. अत्यधिक वर्षा, संतृप्ति एवं ढाल के पदार्थों के स्नेहन द्वारा उत्पन्न अतिभार का होना।
  5. मूल ढाल की सतह से पदार्थ या भागर का हटना।
  6. भूकम्प।
  7. विस्फोटक या मशीनों के द्वारा कम्पन होना।
  8. प्राकृतिक रिवास की अधिकता का होना।
  9. नदी, झील एवं अन्य जलाशयों से जल का अधिक विदोहन एवं ढालों तथा नदी तटों के नीचे से जल का मन्द प्रवाह।
  10. वनस्पतियों का अन्धाधुन्ध शोषण होना।

प्रश्न 5.
पेंक के द्वारा वर्णित अपरदन की संकल्पना का सचित्र वर्णन कीजिए।
अथवा
पेंक ने अपरदन को किन अवस्थाओं में विभाजित किया था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जर्मन विद्वान पेंक ने अपनी अपरदन से सम्बन्धित संकल्पना को किन अवस्थाओं में बाँटा था-

  1. प्रथम अवस्था – इस अवस्था में पेंक के अनुसार उत्थान व अपरदन की क्रिया दोनों साथ-साथ चलती है। किन्तु अपरदन की अपेक्षा उत्थान अधिक होता है।
  2. द्वितीय अवस्था – इस अवस्था में उत्थान व अपरदन समानरूप से सक्रिय रहते हैं। परिणामस्वरूप घाटियाँ चौड़ी और गहरी होने लगती हैं।
  3. तृतीय अवस्था – इस अवस्था में उत्थान व अपरदन क्रिया की प्रतिस्पर्धात्मक दर के कारण ऊपरी तथा निचले वक्र का पृष्ठीय अन्तर समान रहता है।
  4. चतुर्थ अवस्था – इस अवस्था में उत्थान की दर शिथिल व क्षीण हो जाती है और अपरदन उसी गति से प्रभावी रहता है। परिणामस्वरूप घाटियाँ गहरी व दोआब नीचे होने लगते हैं।
  5. पंचम अवस्था – इस अवस्था में उत्थान के साथ-साथ अपरदन की दर भी शिथिल वे क्षीण हो जाती है। दोनों वक्रों का पृष्ठीय अन्तर घट जाता है।

पेंक की अपरदन सम्बन्धी संकल्पना को निम्न चित्र से दर्शाया गया है-
RBSE Solutions for Class 11 Physical Geography Chapter 9 अनाच्छादन 5

प्रश्न 6.
“हमारी पृथ्वी भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के दो विरोधात्मक वर्गों के खेल का मैदान है”- विवेचना कीजिए।
उत्तर:
धरातल पर अन्तर्जात एवं बहिर्जात बेलों द्वारा भौतिक दबाव एवं रासायनिक प्रक्रियाओं के कारण भूतल के विन्यास में परिवर्तन को भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ कहते हैं। धरातल के निर्माण में दो प्रकार की शक्तियाँ कार्य करती हैं- (1) अन्तर्जनित शक्तियाँ तथा (2) बहिर्जनित शक्तियाँ। अन्तर्जनित शक्तियाँ धरातल के नीचे गहराई से उत्पन्न होती हैं और बहुत ही मन्द गति से कार्य करती हैं। इनसे पर्वत निर्माण होता है तथा धरातल पर विषमताओं का सृजन होता है। कुछ अन्तर्जा बलों द्वारा आकस्मिक घटनाएँ भी घटित होती हैं; जैसे – ज्वालामुखी उद्गार, भूकम्प आदि।

बहिर्जनित शक्तियाँ धरातल के ऊपर उत्पन्न होती हैं और अन्तर्जात बलों को ठीक विपरीत कार्य करती हैं अर्थात् उच्चावच को कम करने का प्रयास करती हैं। इस प्रक्रिया में कहीं-कहीं वे अपरदन करती हैं। और कहीं-कहीं जमाव का कार्य करती हैं। इस प्रकार बाह्य शक्तियों द्वारा धरातल की विषमताएँ कम होती हैं। अत: इन शक्तियों को समतल स्थापक बल’ भी कहा जाता है। दोनों शक्तियों के ये विपरीत कार्य तब तक बने रहते हैं जब तक कि अन्तर्जात एवं बहिर्जात बलों के विरोधात्मक कार्य चलते रहते हैं। इस प्रकार कहा जाता है कि पृथ्वी भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के दो विरोधात्मक वर्गों के खेल का मैदान है।

RBSE Class 11 Physical Geography Chapter 9 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
रासायनिक अपक्षय को परिभाषित करते हुए इसके प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
रासायनिक अपक्षय के विविध प्रारूपों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रासायनिक प्रक्रिया द्वारा शैलों का जल व गैस की सहायता से टूटना, घुलना, सड़ना, व नये यौगिकों में बदलना रासायनिक अपक्षय कहलाता है। इस प्रकार के अपक्षय में कई प्रकार की प्रक्रियाएँ होती हैं, जो निम्नानुसार हैं-

(i) आक्सीकरण – वायुमण्डलीय ऑक्सीजन जल में घुलकर शैल खनिजों को ऑक्साइड में बदल देती हैं जिसे ऑक्सीकरण कहते है, इससे शैलो का शीघ्र अपघटन होता है। इसक सबसे अधिक प्रभाव लोहे के खनिजों पर होता है। इस प्रक्रिया में लोहे के जंग लग जाती है जिसके कारण चट्टानें ढीली पड़ जाती है व उनका वियोजन होता है। भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में इसी प्रक्रिया
के कारण लाल पीले भूरे रंग की मिट्टियाँ बनती है।

(ii) कार्बोनेशन – वायुमण्डलीय कार्बन डाइऑक्साइड गैस जल में मिलकर कार्बनिक अम्ल बनाती है। इसके सम्पर्क में आकर चूनायुक्त शैलें तीव्रता से घुल जाती हैं। इस प्रकार अपक्षय की प्रक्रिया सामान्यतः आई शीतोष्ण प्रदेशों में होती है। चूने का पत्थर कार्बोनिक अम्लों के प्रभाव से ही शीघ्र घुल जाता है तथा यह कैल्सियम कार्बोनेट में बदल जाता है। कार्बनीकरण की यह प्रक्रिया गर्म व आर्दै प्रदेशों में अधिक होती है जबकि शुष्कं मानूसनी प्रदेशों में कम होती है।

(iii) सिलिका पृथक्करण – शैलों से सिलिका के अलग होने को डिसिलिकेशन कहते हैं। आर्दै प्रदेशों में आग्नेय शैलों पर जल क्रिया से सिलिका पृथक हो जाती है और उनका अपक्षय हो जाता है। जब किसी शैल से सिलिका अलग हो जाती है तो वह कमजोर चट्टान बन जाती है। इस प्रक्रिया से कालान्तर में उसका अपघटन होता है। परतदार शैलों में सिलिका पृथक्करण की
प्रक्रिया आसानी से होती है जिसके कारण इनका अपक्षय आसानी से हो जाता है।

(iv) जलयोजन – शैल खनिजों में जल के अवशोषण को हाइड्रेशन कहते है। बॉक्साइट, फेल्सपार आदि शैलें जल्दी जल सोखती हैं, जिससे उनका भार बढ़ जाता है और वे बिखर जाती हैं। यह क्रिया प्राय: सभी स्थानों पर देखने को मिलती है। जल के द्वारा चट्टानों के संतृप्त होने पर उनके आयतन में वृद्धि होती है। खनिजों के आयतन में वृद्धि होने से उनके कणों व खनिजों में तनाव उत्पन्न हो जाता है जिससे चट्टान पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। दबाव से चट्टान अपघटित हो जाती है।

(v) घोलन – वर्षा जल शैल पदार्थों से अनेक प्रकार के अम्लों एवं कार्बनिक तत्त्वों को घोल लेता है एवं नया रासायनिक मिश्रण बना लेती है। इसी अभिक्रिया को हाइड्रोलिसिस कहते हैं।

प्रश्न 2.
अपरदन को परिभाषित करते हुए इसके लिए उत्तरदायी कारकों की विधियों का वर्णन कीजिए।
अथवा
अपरदन की विधियों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अपरदन शब्द लैटिन भाषा के Erodere’ शब्द से बना है, जिसका तात्पर्य घिसनां या कुतरना है। अपरदन एक गतिशील प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में शैलें हिमानी, भूमिगत जल, लहरों, वायु व नदियों द्वारा घिसती, कटती व स्थानान्तरित या परिवहित होकर निक्षेपित होती रहती हैं। इस प्रक्रिया के द्वारा उच्च भू-भाग अन्ततः निम्न भू-भाग में परिवर्तित हो जाता है। अपरदन की प्रक्रिया के लिए निम्न विधियों को उत्तरदायी माना जाता है-

  1. अपघर्षण,
  2. सन्निघर्षण,
  3. जलदाब क्रिया,
  4. संक्षारण,
  5. अपवाहन,
  6. (vi) गुहिकायन,
  7. (vii) उत्पाटन।

1. अपघर्षण – जब अपरदरकारी कारक अपने साथ चट्टानी मलबे व चूर्ण को बहाकर ले जा रहे होते हैं तो ये पदार्थ – धरातलीय शैलों का घर्षण करते जाते हैं, जिसे अपघर्षण कहते हैं।
2. सन्निघर्षण – हवा, नदी या लहरों के साथ प्रवाहित शैल कण एवं टुकड़े आपस में रगड़ खाकर टूटते रहते हैं जिसे सन्निघर्षण कहते हैं।
3. जलदाब क्रिया – नदी जल के भारी दबाव से या जल भंवर के दबाव से चट्टानों के अपरदन की क्रिया को जलदाब क्रिया कहते हैं।
4. संक्षारंण – जल की रासायनिक क्रिया द्वारा चट्टानों के खनिजों का जल में घुलकर बह जाना संक्षारण कहलाता है।
5. अपवाहन – हवा द्वारा बालू मिट्टी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर उड़ाकर ले जाना अपवाहन कहलाता है।
6. गुहिकायन – नदी में उत्पन्न भंवर से उठने वाली तरंगें नदी के तल में अनेक प्रकार के छिद्रों का निर्माण करती हैं।

जल गर्तिकाएँ तथा अवनमित कुण्ड ऐसे छिद्रों के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

  1. घुलकर-जल में अनेक पदार्थ घुलकर उसके साथ प्रवाहित होते हैं।
  2. निलम्बन–अपरदनकारी कारकों के साथ तैरते हुए या लटकते हुए पदार्थ प्रवाहित होते हैं।
  3. लुढ़ककर-चट्टानों के बड़े-बड़े टुकड़े घिसटते हुए और लुढ़कते हुए नदी तल पर प्रवाहित होने को कर्षण या घसीटना कहते हैं।

प्रश्न 3.
सामूहिक स्थानान्तरण से क्या तात्पर्य है? इसके प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
सामूहिक स्थानान्तरण के प्रारूपों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वृहत मात्रा में शैल मलबे के गुरुत्वाकर्षण बल के द्वारा ढाल के सहारे संचलित व स्थानान्तरित होना सामूहिक स्थानान्तरण कहलाता है। असंगठित शैल मलबे के लुढ़कने में गुरूत्वाकर्षण शक्ति उत्तरदायी होती है। ढालों से खिसककर शैल कणों का तलहटी में ढेर लग जाता है। चट्टान चूर्ण का यह ढेर टालस कहलाता है। ढीली चट्टानों के शंकुनुमा ढेर को टालस शंकु कहते हैं। असंगठित ढीले पदार्थ के लुढ़कने या सरकने की मात्रा व गति के अनुसार सामूहिक स्थानान्तरण को तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है।

(i) मन्द गति सामूहिक स्थानान्तरण – जल की नमी कम मात्रा में होने के कारण भग्न चट्टान चूर्ण धीमी गति से सरकता है। उपध्रुवीय शीत प्रदेशों में मंद बहाव की क्रिया अधिक होती है। मन्द वाह क्रिया के अन्तर्गत भूमि सर्पण, शैल सर्पण, टालस सर्पण एवं मृदा सर्पण शामिल किये जाते हैं।

(ii) तीव्र गति सामूहिक स्थानान्तरण – जल की प्रचुरता से शैल चूर्ण संतृप्त होकर तीव्रता से खिसकता है। तीव्र वाह के अन्तर्गत भूमिवाह, पंकवाह एवं चादर वांह को शामिल किया जाता है। नदी घाटियों की दीवारों पर खिसकते पंकवाह को देखा जा सकता है।

(iii) अत्यधिक तीव्रता सामूहिक स्थानान्तरण-अति तीव्र वाह के लिए जल की नमी का होना आवश्यक नहीं है। बड़े शिलाखण्ड गुरुत्व बल से अचानक गिरने लगते हैं। इसके अन्तर्गत भूमि स्खलन, शैल स्खलन, शैल पात, मलबा स्खलन, मलबापात तथा अवपातन की प्रक्रिया शामिल की जाती है। सामूहिक स्थानान्तरण के इन विविध प्रारूपों को निम्न तालिका के द्वारा दर्शाया है।
RBSE Solutions for Class 11 Physical Geography Chapter 9 अनाच्छादन 6

प्रश्न 4.
डेविस व बैंक के विचारों की तुलना कीजिए।
अथवा
डेविस के विचार पेंक से किस प्रकार भिन्न थे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
डेविस व पेंक के विचारों की तुलना निम्नानुसार है-
RBSE Solutions for Class 11 Physical Geography Chapter 9 अनाच्छादन 7

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