RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 1 जीवविज्ञान: परिचय

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Rajasthan Board RBSE Class 11 Biology Chapter 1 जीवविज्ञान: परिचय

RBSE Class 11 Biology Chapter 1 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 1 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
आधुनिक वर्गीकरण विज्ञान के जनक के रूप में जाने जाते हैं –
(अ) केरोलस लिनीयस
(ब) अरस्तू
(स) महर्षि चरक
(द) चार्ल्स डार्विन

प्रश्न 2.
प्लास्टिक सर्जरी के आविष्कारक थे –
(अ) चरक,
(ब) सुश्रुत
(स) जे.सी. बोस
(द) धनवन्तरी

प्रश्न 3.
भारत में हरित क्रान्ति के जनक के रूप में निम्नलिखित में से कौनसा वैज्ञानिक जाना जाता है –
(अ) एम.एस. स्वामीनाथन
(ब) के.सी. मेहता
(स) पंचानन माहेश्वरी
(द) बीरबल साहनी

प्रश्न 4.
विज्ञान की वह शाखा जिसके अन्तर्गत झीलों या शुद्ध पानी में उपस्थित जीवों का अध्ययन किया जाता है कहलाती है –
(अ) मृदा विज्ञान
(ब) पारिस्थितिकी
(स) सरोवर विज्ञान
(द) फाइकोलोजी
उत्तरमाला:
1. (अ) 2. (ब) 3. (अ) 4. (स)

RBSE Class 11 Biology Chapter 1 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
एक भारतीय पुरावनस्पति वैज्ञानिक का नाम लिखिए।
उत्तर:
प्रो. बीरबल साहनी।

प्रश्नं 2.
मैदानी क्षेत्रों में गेहूँ के किट्ट रोग के प्रभाव को कम करने के लिए के.सी. मेहता ने क्या सुझाव दिया ?
उत्तर:
उनका सुझाव था कि कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में कुछ वर्षों तक गेहूं की खेती न करके मैदानी क्षेत्रों में किट्ट रोग के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
भारत को कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने वाले वैज्ञानिक कौन हैं ?
उत्तर:
डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन।

प्रश्न 4.
आनुवंशिक अभियांत्रिकी क्या है ?
उत्तर:
कृत्रिम जीनों का निर्माण व अन्य जीवों में स्थानान्तरण के अध्ययन को आनुवंशिक अभियांत्रिकी कहते हैं।

RBSE Class 11 Biology Chapter 1 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जीवविज्ञान के इतिहास पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
जीवविज्ञान शब्द का उपयोग ट्विीरेनस (Traviranus) द्वारा जीवों के अध्ययन के लिये किया गया। अरस्तू ने इस विज्ञान के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, अतः इन्हें जीवविज्ञान का जनक कहते हैं। थियोफ्रेस्ट्स (Theophrastus) को वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य करने के कारण वनस्पतिविज्ञान का जनक कहते हैं। ल्यूवेनहॉक द्वारा माइक्रोस्कोप के सुधार के कारण जीवविज्ञान के क्षेत्र में अधिक प्रगति हुई। आधुनिक वर्गीकरण के जनक केरोलस लिनीयस ने सजीवों की द्विपदनाम पद्धति तथा पादपों का लैंगिक वर्गीकरण दिया।
19वीं शताब्दी में श्लीडन व श्वान ने कोशिका सिद्धान्त प्रतिपादित किया। सिद्धान्त के अनुसार –

  1. कोशिका जीवों की आधारभूत इकाई है।
  2. प्रत्येक कोशिका में एक जीव से सम्बन्धित सभी लक्षण होते हैं।
  3. प्रत्येक नई कोशिका पुरानी कोशिका के विभाजन से बनती है।

विकासवाद के सम्बन्ध में जे.बी. लैमार्क ने उपार्जित लक्षणों की वंशागति या ससंजन विकासवाद सिद्धान्त प्रतिपादित किया। किन्तु बाद में इसे अस्वीकार कर दिया गया। चार्ल्स डार्विन ने प्राकृतिक वरण का सिद्धान्त बताया, इसे सर्वाधिक मान्यता मिली। ग्रेगर मेंडल ने मटर पर संकरण प्रयोग कर आनुवंशिकता के नियम दिये। क्रिक ने DNA का द्विकुण्डलित मॉडल प्रस्तुत किया। सन् 1967 में जॉन गॉर्डन ने नाभिकीय ट्रांसप्लांटेशन का उपयोग करके मेंढक का क्लोन बनाया जो कशेरुकधारियों का प्रथम क्लोन था।

प्रश्न 2.
चिकित्सा के क्षेत्र में महर्षि चरक के योगदान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
महर्षि चरक आयुर्वेद के प्रणेता थे व इन्हें चिकित्सा का जनक कहते हैं। ये पहले चिकित्सक थे जिन्होंने पाचन, उपापचय व मानव शरीर प्रतिरक्षा की अवधारणा दुनिया के समक्ष रखी। उनके अनुसार मानव शरीर में तीन प्रकार के स्थायी दोष-पित्त, कफ व वायु होती है। जब तक ये तीनों दोष संतुलित अवस्था में रहते हैं, तब तक व्यक्ति स्वस्थ रहता है किन्तु इनका संतुलन बिगड़ते ही व्यक्ति रोगी हो जाता है। चरक ने बताया कि मानव शरीर में दाँतों सहित 360 हड्डियाँ होती हैं व हृदय शरीर का नियंत्रित केन्द्र है। हृदय 13 स्रोतों (Channels) से सम्पूर्ण शरीर से जुड़ा रहता है।
चरक ने चरक सिद्धान्त’ ग्रंथ का सम्पादन किया व यह आयुर्वेद का प्राचीनतम ग्रंथ है। यह ग्रंथ संस्कृत भाषा में है इसमें अनेक पादपों के औषधीय गुणों, रोग निरोधक व रोगनाशक दवाओं, सोना, चाँदी, लोहे की भस्म बनाने की विधियों व उपयोग का वर्णन है।

प्रश्न 3.
सजीवता के प्रमुख लक्षण लिखिये।
उत्तर:
सजीवता के लक्षण (Characteristics of livingness):
जिसमें जीवन होता है वे जीव सजीव होते हैं। जीवों में कुछ स्पष्ट लक्षण मिलते हैं जैसे वृद्धि, जनन, पर्यावरण के प्रति संवेदना, उपापचय क्रियायें तथा स्वयं को सुसंगठित करने व प्रतिक्रिया करने की क्षमता होती है। निर्जीवों में इस क्षमता व लक्षणों का अभाव होता है। सजीवों में मुख्य रूप से निम्न लक्षण पाये जाते हैं।

(i) गति (Movement):
लगभग सभी जीवधारी गति दिखाते हैं। प्राणी एक स्थान से अन्य स्थान पर गमन करते हैं। परन्तु कुछ एककोशिकीय पौधों को छोड़कर अन्य पौधे इस प्रकार की गति नहीं दर्शाते हैं क्योंकि पौधे भूमि में स्थिर रहते हैं। फिर भी पौधे अपने ही स्थान पर रहते हुये, गुरुत्व (gravity), प्रकाश, नमी इत्यादि प्रभावों के कारण मुड़ने की क्रिया दर्शाते हैं, जैसे पर्यों व पुष्पों का खुलना व बन्द होना, इन्हें भी गति कहा जाता है।

(ii) वृद्धि (Growth):
जीवधारियों की आकृति, आयतन और शुष्क भार के अपरिवर्तनीय (irreversible) बढ़त को वृद्धि कहते हैं। यह उपापचयी क्रियाओं के परिणामस्वरूप होती है। पौधों में यह वृद्धि जीवनपर्यन्त कोशिका विभाजन के कारण होती रहती है जबकि प्राणियों में, यह वृद्धि कुछ आयु तक होती है। कोशिका विभाजन विशिष्ट ऊतकों में होता है।
कभी – कभी जीव के भार में वृद्धि होने को भी वृद्धि समझा जाता है। यदि भार को वृद्धि मानें तो निर्जीवों के भार में भी वृद्धि होती है, जैसे-पर्वत, रेत के टीले भी वृद्धि करते हैं। किन्तु निर्जीवों में इस प्रकार की वृद्धि उनकी सतह पर पदार्थों के एकत्र होने के कारण होती है अर्थात् बाह्य कारकों के कारण होती है। जीवों में यह वृद्धि अन्दर की ओर से होती है।

(iii) आकार व आकृति (Size and Shape):
सजीवों में अपनीअपनी किस्मों तथा जातियों के अनुसार अपना एक विशिष्ट आकार व आकृति होती है। इनके आकार व आकृति में सदैव निश्चितता होती है।

(iv) कोशिकीय संरचना (Cellular structure):
सभी जीवों का शरीर एक या एक से अधिक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है। कोशिका जीवों की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक (structural and functional urmit) इकाई है।

(v) जीवदव्य (Protoplasm):
सजीवों में जीवद्रव्य (protoplasm) पाया जाता है। यह जीवन का भौतिक आधार है जिसमें जैविक क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। जीवद्रव्य विभिन्न रासायनिक पदार्थों का सम्मिश्र तथा जटिल व विस्कासी तरल होता है।

(vi) उपापचय (Metabolism):
सजीवों के शरीर में होने वाली जैव-रासायनिक क्रियाओं को उपापचय (Metabolism) कहते हैं। उपापचयी क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं-उपचय (Anabolism) तथा अपचयी (Catabolism)। उपचय क्रियाओं में सरल घटकों के संयोजन। फलस्वरूप जटिल घटकों का निर्माण होता है। उदाहरण-प्रकाश-संश्लेषण क्रिया। अपचयी क्रिया विघटनात्मक क्रिया होती है, इसमें जटिल घटकों का अपघटन होकर सरल घटकों का निर्माण होता है, उदाहरण-श्वसन क्रिया। यही कारण है कि सजीव कोशिका को लघुरासायनिक उद्योगशाला (Miniature chemical factory) की उपमा दी जाती है।

(vii) श्वसन (Respiration):
श्वसन जीवों का मुख्य लक्षण है। इस क्रिया में जीव वायुमण्डल से ऑक्सीजन लेते हैं तथा कार्बनडाइऑक्साइड बाहर निकालते हैं। इस क्रिया में कार्बोहाइड्रेट, वसा एवं प्रोटीन का ऑक्सीकरण होता है व ऊर्जा मुक्त होती है। इस मुक्त ऊर्जा से ही जीवधारियों की समस्त जैविक-क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं।

(viii) प्रजनन (Reproduction):
सभी जीव जनन की क्रिया द्वारा अपने जैसे जीव उत्पन्न करने की क्षमता रखते हैं।

(ix) पोषण (Nutrition):
जीवधारियों की वृद्धि एवं विकास तथा जीवद्रव्य निर्माण हेतु भोजन अर्थात् ऊर्जा की आवश्यकता होती है। पेड़-पौधे इस ऊर्जा को सूर्य के प्रकाश से प्राप्त कर प्रकाश-संश्लेषण द्वारा। भोजन के रूप में संचित करते हैं जबकि प्राणी इस ऊर्जा के लिए पेड़पौधों पर आश्रित रहते हैं।

(x) संवेदनशीलता तथा अनुकूलन (Sensitivity and adaptability):
जीव जहाँ पर भी रहते हैं अपने वातावरण में निरन्तर होने वाले परिवर्तनों का अनुभव करते हैं। इस गुण को संवेदनशीलता (sensitivity) कहते हैं। होने वाले इन परिवर्तनों के अनुसार जीव अपनी संरचना और क्रियाओं में भी परिवर्तन करते हैं, इसे अनुकूलन (adaptability) कहते हैं।

(xi) उत्सर्जन (Excretion):
सभी जीवों में उपापचयी क्रियाओं के कारण अनावश्यक एवं हानिकारक पदार्थ बनते हैं। जीवधारी इन पदार्थों को निरन्तर अपने शरीर से बाहर निकालते रहते हैं।

(xii) साम्यावस्था (Homeostasis) :
सभी जीवों में परिवर्तन के प्रति प्रतिरोध करने एवं सन्तुलित अवस्था में रहने की प्रवृत्ति पाई जाती है। इसे साम्यावस्था कहते हैं।

(xiii) सजीवों में आनुवंशिक पदार्थ पाये जाते हैं जो लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानान्तरित करते हैं।

(xiv) जीवनचक्र (Life-cycle):
सभी जीव जन्म, वृद्धि, जनन, वृद्धावस्था एवं मृत्यु के रूप में विविध क्रियाएँ प्रदर्शित करते हैं, जिसे जीवनचक्र कहते हैं।

प्रश्न 4.
पादप व जन्तुओं में प्रमुख अन्तर बताइये।
उत्तर:
पादप तथा जन्तुओं में अन्तर (Differences between Plants and Animals):
प्रायः निम्नश्रेणी के पादप व जन्तुओं में बहुत ही कम अन्तर पाया जाता है, जैसे-यूग्लीना व पेरामिशियमं को कुछ वनस्पतिशास्त्री इन्हें वनस्पति विज्ञान में वर्गीकृत करते हैं किन्तु कुछ जन्तु वैज्ञानिक इन्हें जन्तुविज्ञान में मानते हैं, परन्तु उच्च श्रेणी के पादप व जन्तुओं में स्पष्ट अन्तर देखने को मिलते हैं। ये अन्तर निम्न प्रकार से हैं –

लक्षण (Characters)पादप (Plants)जन्तु (Animals)
1. कोशिका भित्ति (Cell wall)कोशिका झिल्ली के बाहर सेल्यूलोज से बनी एक निर्जीव कोशिका भित्ति पाई जाती है।कोशिका भित्ति का अभाव होता है।
2. पर्णहरित (Chlorophyll)पौधे स्वपोषित अर्थात् अपना भोजन स्वयं बनाने में सक्षम होते हैं क्योंकि उनमें पर्णहरित पाया जाता है।पर्णहरित का अभाव होता है, इस कारण ये परपोषित होते हैं।
3. प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis)हरे पौधे सूर्य प्रकाश की उपस्थिति में जल व कार्बन डाइ ऑक्साइड का उपयोग कर भोजन बनाते हैं, इस क्रिया को प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं।प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया नहीं होती, अतः ये भोजन के लिए पौधों पर आश्रित होते हैं।
4. गति (Movement)पौधे जड़ों की सहायता से भूमि में स्थिर रहते हैं, किन्तु इनके कुछ अंग (तना, पत्ती, पुष्प) अपने स्थान पर गति दर्शाते हैं।ये एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन करते हैं।
5. वृद्धि (Growth)पौधों में वृद्धि कुछ विशेष स्थानों पर विभज्योतक ऊतक (Meristematic tissue) के द्वारा होती है। यह विभज्योतक प्ररोह एवं मूल के शीर्ष भाग पर पाई जाती है। मूल व स्तम्भ की मोटाई पाश्र्वीय विभज्योतक (lateral meristem) के कारण होती है। अतः वृद्धि स्थानीकृत (localised) | होती है। यह वृद्धि सम्पूर्ण जीवन काल तक होती रहती है।जन्तुओं में वृद्धि सभी स्थानों पर होती है। अतः वृद्धि क विसरित (diffuse) होती है। इनमें वृद्धि मृत्यु से काफी समय पूर्व रुक जाती है।
6. खनिजों का अवशोषण (Absorption of Minerals)पौधे खनिजों का अवशोषण भूमि में उपलब्ध जल में घुलित अवस्था में प्राप्त करते हैं।ये अपना भोजन ठोस रूप में लेते हैं।
7. तारककाय (Centrosome)अनुपस्थित होते हैं।उपस्थित होते हैं, कोशिका विभाजन के समय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
8. रसधानी (Vacuole)पूर्ण विकसित पादप कोशिका में एक बड़ी रसधानी उपस्थित होती है।प्रायः रसधानी का अभाव होता है।
9. लाइसोसोम (Lysosome)कुछ अपवादों को छोड़कर पादपों में लाइसोसोम के समकक्ष अन्य रचनायें पाई जाती हैं।लाइसोसोम केवल जन्तु कोशिकाओं में ही पाये जाते हैं।
10. अंग तंत्र (Organ system)स्पष्ट अंग तंत्र का अभाव होता है। इनमें मूल, स्तम्भ, पत्तियाँ व पुष्प जैसे अंगों का विभेदन होता है।स्पष्ट अंग तंत्र होते हैं।
11. उत्सर्जन तंत्र (Excretory system)इनमें विशेष उत्सर्जन तंत्र नहीं होता। किन्तु पौधे इन अपशिष्ट पदार्थों को छाल व पत्तियों के द्वारा बाहर निकालते हैं।इनमें विशेष उत्सर्जन तंत्र पाये जाते हैं जिनके द्वारा अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालते हैं।
12. कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis)कोशिका द्रव्य का विभाजन कोशिका पट्ट निर्माण द्वारा होता है।इनमें कोशिका द्रव्य का विभाजन पुत्री केन्द्रकों के बीच अन्तर्वलन विधि द्वारा होता है।

RBSE Class 11 Biology Chapter 1 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आचार्य जगदीश चन्द्र बोस विज्ञान के अनन्य पथिक थे। स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
आचार्य जगदीश चन्द्र बोस (Professor Jagdish Chandra Bose):
आचार्य जगदीश चन्द्र बोस का जन्म 30 नवम्बर, 1858 को ग्राम ररौली में हुआ था। अब यह गाँव बांग्लादेश में है। बाल्यकाल में बोस को कीड़ेमकोड़े, मछलियाँ व जल में रहने वाले साँपों को पकड़ने का शौक था। बोस अध्ययन करने के लिए कलकत्ता के सेंट जेवियर्स कॉलेज गये। बोस ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक तथा कैम्ब्रिज के मिल्टन कॉलेज से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। 1896 में लंदन विश्वविद्यालय से विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। 1920 में रॉयल सोसाइटी के फेलो चुने गये। बोस ने भौतिकी तथा जीवविज्ञान के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किये।

बोस के समकालीनों में रवीन्द्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानन्द तथा राजा राममोहन राय जैसे महान लोग थे। बोस की कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कॉलेज में भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति हुई। अपने अध्ययन के दौरान बोस सेंट जेवियर्स कॉलेज के फादर लैंफो से अधिक प्रभावित हुए थे क्योंकि वे भौतिक विज्ञान के बहुत अच्छे व्याख्यान देते थे। यही कारण था कि बोस ने भौतिक विज्ञान को अपने शोध का केन्द्र बिन्दु बनाया। परन्तु बोस का प्रारम्भ से जीवों से अधिक लगाव था। बोस ने शोध करते हुए यह अनुभव किया कि अक्रिय पदार्थों और सजीवों के व्यवहारों में निश्चित रूप से कोई न कोई सम्बन्ध है।

आगे जाकर बोस की रुचि विद्युत चुम्बकीय तरंगों से हटकर जीवन के भौतिक पहलुओं की ओर बढ़ने लगी जिसे आज जैवभौतिकी (Biophysics) कहते हैं।अग्रिम तीस वर्षों तक उन्होंने पादप कोशिकाओं पर विद्युत संकेतों के प्रभाव का अध्ययन किया। प्रयोगों के दौरान उन्होंने यह अनुभव किया कि सभी पादप कोशिकाओं में उत्तेजित होने की क्षमता होती है। पौधों में ठण्ड, गर्मी, काटे जाने, स्पर्श एवं विद्युतीय उद्दीपन, बाह्य नमी के कारण स्थितिज क्रिया उत्पन्न होती है। इसे जानने के लिए उन्होंने संवेदनशील यंत्र भी बनाये।
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बोस ने 1901 में छुई-मुई या लाजवन्ती (Mimosa ptudica)। तथा शालपर्णी या भारतीय टेलीग्राफ पादप (Desmoditu gyrans) पर विद्युत संकेतों के प्रभाव का अध्ययन किया। छुई-मुई पौधे की पत्तियों को जैसे ही स्पर्श करते हैं वे मुरझा जाती हैं या एक-दूसरे पर झुकने लगती हैं, इसे तकनीकी भाषा में कम्पानुकुंचन (Seismonasty) कहते हैं। बोस ने स्पंदन रिकार्डर की सहायता से यह निष्कर्ष निकाला कि इस प्रकार की प्रतिक्रिया क्रिया – विभव के फलस्वरूप होती है। जब स्पर्श करने पर छुई-मुई की पत्तियाँ मुरझा जाती हैं तो इसका विद्युतीय प्रभाव तनों तक पहुँच जाता है और ये विद्युतीय संकेत ऊपर और नीचे की दिशाओं में भी चलते हैं जिसके कारण पौधे की अन्य पत्तियाँ भी मुरझा जाती हैं।

शालपर्णी या इंडियन टेलीग्राफ पादप (Desnloditu gyrans) पर कार्य कर बोस ने बताया कि इस पौधे में विद्युत दोलन एवं स्वत: गति, का मिलाप होता है। इसके कारण इसकी दो पाश्र्व छोटी पत्तियाँ ऊपर से नीचे घूमती हैं। बोस ने इस पौधे के विद्युत स्पंदन को जीवों के हृदय गति से तुलना करने के लिए स्पंदन रिकॉर्डर का उपयोग किया। बोस ने अत्यन्त धीमी गति की वृद्धि को मापने के लिए आरोहीमापी या क्रेस्कोग्राफ (Crescograph) यंत्र बनाया। यह यंत्र धीमी गति की वृद्धि को स्वतः दस हजार गुना बढ़ाकर रिकार्ड करने की क्षमता रखता है। पौधों के वृद्धि एवं अन्य जैविक क्रियाओं पर समय के प्रभाव का अध्ययन जिसकी बुनियाद बोस ने डाली थी, आज वह क्रोनो बायोलॉजी (Chronobiology) के नाम से जाना जाता है।

यही नहीं बोस ने पौधों पर तापमान और प्रकाश के अध्ययन हेतु भी उपकरण तैयार किये। उन्होंने पौधे की वृद्धि में विष व विद्युत प्रवाह का प्रभाव भी देखा तथा इस उपकरण का प्रदर्शन उन्होंने सन् 1914 में पूरी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया। प्रेसीडेन्सी कॉलेज से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपने घर पर प्रयोगशाला को स्थानान्तरित किया। 30 नवम्बर, 1917 में बोस इंस्टीट्यूट की स्थापना हुई तथा बोस इस संस्था के अन्तिम समय तक निदेशक रहे। सन् 1937 में उनकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वैज्ञानिकों का विज्ञान के क्षेत्र में उनका योगदान लिखिये
(अ) के.सी. मेहता
(ब) पंचानन माहेश्वरी
उत्तर:
(अ) प्रोफेसर करम चन्द मेहता (Prof. Karam Chand Mehta):
प्रो. मेहता का जन्म 20 जून, 1892 को अमृतसर (पंजाब) में हुआ था। इन्होंने स्नातकोत्तर परीक्षा लाहौर के राजकीय महाविद्यालय से वनस्पति विज्ञान में प्राप्त की तथा विशेष योग्यता हेतु इनको आरनॉल्ड पदक प्राप्त हुआ। प्रो. मेहता भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. शिवराम कश्यप के विद्यार्थी थे। 1915 में उनकी नियुक्ति प्रवक्ता पद पर आगरा कॉलेज में हुई तथा सम्पूर्ण जीवन इसी संस्था में कार्यरत रहे।
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मेहता ने 1920 से 1922 तक इंग्लैण्ड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रो. एफ.टी. ब्रुक्स के निर्देशन में धान्य फसलों के किट्ट रोग (Rust disease प्रो. के.सी. मेहता of cereals) पर शोध किया व डॉक्टर ऑफ फिलोसोफी (Ph.D.) की उपाधि प्राप्त की। मेहता ने गेहूं व जौ में किट्ट रोग की समस्या पर कार्य किया व भारत में इस रोग के नियंत्रण की तकनीकों को खोजने का प्रयास करते रहे। इसके लिए प्रो. मेहता ने शिमला, अल्मोड़ा, मुक्तेश्वर व नारकुण्ड में प्रयोगशालाएँ स्थापित कीं।

शोध के आधार पर उन्होंने बताया कि ग्रीष्म ऋतु के दौरान रोगजनक बीजाणु उप-हिमालयी क्षेत्रों में जीवनक्षम रहते हैं। किट्ट रोग प्रत्यावर्तन सम्बन्ध में पाया कि कुछ घासों जैसे ब्रेकाइपोडियम सिल्वेटिकम (Braclhypodium sylvaticum) व ब्रोमस पेटुलम (Bromus pattttis) में पक्स्सीनिया ग्रेमिनिस ट्रिटिसाई (Puccinia graminis tritict) का संक्रमण रहता है। अतः उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि ग्रीष्म ऋतु में पक्सीनिया के यूरिडोबीजाणु (Uredospores) 1450 मीटर की ऊँचाई पर इन सम्पार्श्विक परपोषी (Colletral host) यानि इन घासों में रहते हैं। पहाड़ों पर गेहूं की फसल इन यूरिडोबीजाणु द्वारा नवम्बर माह में संक्रमित होती है। इस आधार पर उन्होंने बताया कि मैदानी भागों में प्रति वर्ष किट्ट रोग का प्राथमिक संक्रमण पहाड़ी क्षेत्रों से यूरिडोबीजाणु द्वारा होता है। उनको सुझाव था कि कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में कुछ वर्षों तक गेहूँ की खेती न करके मैदानी क्षेत्रों में किट्ट रोग के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

प्रो. मेहता को सबसे अधिक ख्याति भारत के किट्ट रोग के नियंत्रण विषय पर किये गये अनुसंधान पर मिली। उनका यह शोध कार्य 1940 में प्रकाशित हुआ । उक्त कार्य के फलस्वरूप कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने उन्हें 1943 में डी.एस.सी. की उपाधि से सम्मानित किया।
प्रो. मेहता नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज इन इण्डिया के संस्थापक सदस्य रहे। वे नेशनल एकेडेमी ऑफ साइंसेज तथा इण्डियन ऐकेडेमी
ऑफ साइंसेज, बैंगलोर के भी सदस्य रहे। वे आगरा विश्वविद्यालय में विज्ञान संकाय के डीन भी रहे। अधिक व्यस्तता के कारण इनके स्वास्थ्य
पर कुप्रभाव पड़ा। 8 अप्रैल, 1950 को 58 वर्ष की आयु में प्रयोगशाला में कार्य करते हुए इनकी मृत्यु हो गई। यह इनके कार्य के प्रति समर्पण को दर्शाता है। प्रो. मेहता परिश्रमी व अनुशासनप्रिय वैज्ञानिक थे।

(ब) प्रो. पंचानन माहेश्वरी (Prof. Panchanan Maheshawari):
प्रो. माहेश्वरी का जन्म 9 नवम्बर, 1904 में जयपुर (राजस्थान) में हुआ था। इन्होंने स्नातक की उपाधि इविंग क्रिश्चयन कॉलेज (इलाहाबाद) से की थी। इसी दौरान ये अमेरिका के प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री विनफील्ड स्कॉट डूडगॉन के सम्पर्क में आये तथा विज्ञान में स्नातकोत्तर व डॉक्टर ऑफ साइंस डुडगॉन के मार्गदर्शन में की। उन्होंने पुष्पीय पादपों की आकारिकी, आंतरिकी एवं भौणिकी का अध्ययन किया। 1931 में आपकी आगरा कॉलेज में नियुक्ति हुई तथा यहाँ पादप भौणिकी का स्कूल स्थापित किया। सन् 1939 में प्रो. माहेश्वरी ने ढाका विश्वविद्यालय में जीव विज्ञान का नया विभाग स्थापित किया। सन् 1949 में उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय ने आमंत्रित किया। दिल्ली में रहते हुए उन्होंने पादप भौणिकी पर उल्लेखनीय कार्य किये।
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इसी कारण इन्हें भारतीय भौणिकी का जनक (Father of Indian Embryology) कहा जाता है। यही नहीं उन्होंने पुष्पीय पादपों के परखनली में निषेचन कराने की तकनीकी की खोज की। यही तकनीकी बाद में बीजों के सुसुप्ति काल को कम करने में सहायक सिद्ध हुई। माहेश्वरी ने ‘ए इन्ट्रोडक्शन टु द एम्ब्रियोलॉजी ऑफ एन्जियोस्पर्म’ नामक पुस्तक लिखी जिसका अनेक भाषाओं में अनुवाद किया गया। इसका प्रकाशन मेकग्रो हिल्स बुक कम्पनी न्यूयॉर्क द्वारा 1950 में किया गया था। प्रो. माहेश्वरी द्वितीय भारतीय वनस्पतिज्ञ थे जिन्हें FRS (Fellow of Royal Society) की उपाधि प्राप्त हुई।

सन् 1951 में इन्होंने प्लाण्ट मॉरफोलोजिस्ट (Plant morphologist) नामक एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था की स्थापना की। इस संस्था की ओर से फाइटोमॉरफोलोजी नामक शोध पत्रिका आज भी दिल्ली से निकलती है। इन्होंने ही दिल्ली विश्वविद्यालय बोटेनीकल सोसायटी की ओर से एक और शोध पत्रिका बोटेनिका (Botanica) का प्रकाशन आरम्भ किया। सन् 1934 में इन्हें इण्डियन अकेडेमी ऑफ साइंसेज का फेलो चुना गया। 1958 में इण्डियन बोटेनीकल सोसायटी ने इन्हें बीरबल साहनी मेडल प्रदान किया।
इनके शिष्यों ने उनके मरणोपरांत अनेक नये खोजे गये पादपों का नाम माहेश्वरी के नाम पर रखकर सम्मान किया जैसे पंचानेनिया जयपुरेन्सिस व आइसोटिज पंचानेनिया आदि। इनमें से एक कवक है तथा दूसरा टेरिडोफाइट है। प्रो. माहेश्वरी का निधन 18 मई, 1966 को हो गया था।

प्रश्न 3.
सजीवता के लक्षण क्या हैं? इसकी विस्तृत विवेचना कीजिए।
उत्तर:
सजीवता के लक्षण (Characteristics of livingness):
जिसमें जीवन होता है वे जीव सजीव होते हैं। जीवों में कुछ स्पष्ट लक्षण मिलते हैं जैसे वृद्धि, जनन, पर्यावरण के प्रति संवेदना, उपापचय क्रियायें तथा स्वयं को सुसंगठित करने व प्रतिक्रिया करने की क्षमता होती है। निर्जीवों में इस क्षमता व लक्षणों का अभाव होता है। सजीवों में मुख्य रूप से निम्न लक्षण पाये जाते हैं।

(i) गति (Movement):
लगभग सभी जीवधारी गति दिखाते हैं। प्राणी एक स्थान से अन्य स्थान पर गमन करते हैं। परन्तु कुछ एककोशिकीय पौधों को छोड़कर अन्य पौधे इस प्रकार की गति नहीं दर्शाते हैं क्योंकि पौधे भूमि में स्थिर रहते हैं। फिर भी पौधे अपने ही स्थान पर रहते हुये, गुरुत्व (gravity), प्रकाश, नमी इत्यादि प्रभावों के कारण मुड़ने की क्रिया दर्शाते हैं, जैसे पर्यों व पुष्पों का खुलना व बन्द होना, इन्हें भी गति कहा जाता है।

(ii) वृद्धि (Growth):
जीवधारियों की आकृति, आयतन और शुष्क भार के अपरिवर्तनीय (irreversible) बढ़त को वृद्धि कहते हैं। यह उपापचयी क्रियाओं के परिणामस्वरूप होती है। पौधों में यह वृद्धि जीवनपर्यन्त कोशिका विभाजन के कारण होती रहती है जबकि प्राणियों में, यह वृद्धि कुछ आयु तक होती है। कोशिका विभाजन विशिष्ट ऊतकों में होता है।
कभी-कभी जीव के भार में वृद्धि होने को भी वृद्धि समझा जाता है। यदि भार को वृद्धि मानें तो निर्जीवों के भार में भी वृद्धि होती है, जैसे-पर्वत, रेत के टीले भी वृद्धि करते हैं। किन्तु निर्जीवों में इस प्रकार की वृद्धि उनकी सतह पर पदार्थों के एकत्र होने के कारण होती है अर्थात् बाह्य कारकों के कारण होती है। जीवों में यह वृद्धि अन्दर की ओर से होती है।

(iii) आकार व आकृति (Size and Shape):
सजीवों में अपनीअपनी किस्मों तथा जातियों के अनुसार अपना एक विशिष्ट आकार व आकृति होती है। इनके आकार व आकृति में सदैव निश्चितता होती है।

(iv) कोशिकीय संरचना (Cellular structure):
सभी जीवों का शरीर एक या एक से अधिक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है। कोशिका जीवों की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक (structural and functional urmit) इकाई है।

(v) जीवदव्य (Protoplasm):
सजीवों में जीवद्रव्य (protoplasm) पाया जाता है। यह जीवन का भौतिक आधार है जिसमें जैविक क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। जीवद्रव्य विभिन्न रासायनिक पदार्थों का सम्मिश्र तथा जटिल व विस्कासी तरल होता है।

(vi) उपापचय (Metabolism):
सजीवों के शरीर में होने वाली जैव-रासायनिक क्रियाओं को उपापचय (Metabolism) कहते हैं। उपापचयी क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं-उपचय (Anabolism) तथा अपचयी (Catabolism)। उपचय क्रियाओं में सरल घटकों के संयोजन। फलस्वरूप जटिल घटकों का निर्माण होता है। उदाहरण-प्रकाश-संश्लेषण क्रिया। अपचयी क्रिया विघटनात्मक क्रिया होती है, इसमें जटिल घटकों का अपघटन होकर सरल घटकों का निर्माण होता है, उदाहरण-श्वसन क्रिया। यही कारण है कि सजीव कोशिका को लघुरासायनिक उद्योगशाला (Miniature chemical factory) की उपमा दी जाती है।

(vii) श्वसन (Respiration):
श्वसन जीवों का मुख्य लक्षण है। इस क्रिया में जीव वायुमण्डल से ऑक्सीजन लेते हैं तथा कार्बनडाइऑक्साइड बाहर निकालते हैं। इस क्रिया में कार्बोहाइड्रेट, वसा एवं प्रोटीन का ऑक्सीकरण होता है व ऊर्जा मुक्त होती है। इस मुक्त ऊर्जा से ही जीवधारियों की समस्त जैविक-क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं।

(viii) प्रजनन (Reproduction):
सभी जीव जनन की क्रिया द्वारा अपने जैसे जीव उत्पन्न करने की क्षमता रखते हैं।

(ix) पोषण (Nutrition):
जीवधारियों की वृद्धि एवं विकास तथा जीवद्रव्य निर्माण हेतु भोजन अर्थात् ऊर्जा की आवश्यकता होती है। पेड़-पौधे इस ऊर्जा को सूर्य के प्रकाश से प्राप्त कर प्रकाश-संश्लेषण द्वारा। भोजन के रूप में संचित करते हैं जबकि प्राणी इस ऊर्जा के लिए पेड़पौधों पर आश्रित रहते हैं।

(x) संवेदनशीलता तथा अनुकूलन (Sensitivity and adaptability):
जीव जहाँ पर भी रहते हैं अपने वातावरण में निरन्तर होने वाले परिवर्तनों का अनुभव करते हैं। इस गुण को संवेदनशीलता (sensitivity) कहते हैं। होने वाले इन परिवर्तनों के अनुसार जीव अपनी संरचना और क्रियाओं में भी परिवर्तन करते हैं, इसे अनुकूलन (adaptability) कहते हैं।

(xi) उत्सर्जन (Excretion):
सभी जीवों में उपापचयी क्रियाओं के कारण अनावश्यक एवं हानिकारक पदार्थ बनते हैं। जीवधारी इन। पदार्थों को निरन्तर अपने शरीर से बाहर निकालते रहते हैं।

(xii) साम्यावस्था (Homeostasis) :
सभी जीवों में परिवर्तन के प्रति प्रतिरोध करने एवं सन्तुलित अवस्था में रहने की प्रवृत्ति पाई जाती है। इसे साम्यावस्था कहते हैं।

(xiii) सजीवों में आनुवंशिक पदार्थ पाये जाते हैं जो लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानान्तरित करते हैं।

(xiv) जीवनचक्र (Life-cycle):
सभी जीव जन्म, वृद्धि, जनन, वृद्धावस्था एवं मृत्यु के रूप में विविध क्रियाएँ प्रदर्शित करते हैं, जिसे जीवनचक्र कहते हैं।

प्रश्न 4.
पादपों व जन्तुओं में अन्तर स्पष्ट करने वाले लक्षणों की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
पादप तथा जन्तुओं में अन्तर (Differences between Plants and Animals):
प्रायः निम्नश्रेणी के पादप व जन्तुओं में बहुत ही कम अन्तर पाया जाता है, जैसे-यूग्लीना व पेरामिशियमं को कुछ वनस्पतिशास्त्री इन्हें वनस्पति विज्ञान में वर्गीकृत करते हैं किन्तु कुछ जन्तु वैज्ञानिक इन्हें जन्तुविज्ञान में मानते हैं, परन्तु उच्च श्रेणी के पादप व जन्तुओं में स्पष्ट अन्तर देखने को मिलते हैं। ये अन्तर निम्न प्रकार से हैं –

लक्षण (Characters)पादप (Plants)जन्तु (Animals)
1. कोशिका भित्ति (Cell wall)कोशिका झिल्ली के बाहर सेल्यूलोज से बनी एक निर्जीव कोशिका भित्ति पाई जाती है।कोशिका भित्ति का अभाव होता है।
2. पर्णहरित (Chlorophyll)पौधे स्वपोषित अर्थात् अपना भोजन स्वयं बनाने में सक्षम होते हैं क्योंकि उनमें पर्णहरित पाया जाता है।पर्णहरित का अभाव होता है, इस कारण ये परपोषित होते हैं।
3. प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis)हरे पौधे सूर्य प्रकाश की उपस्थिति में जल व कार्बन डाइ ऑक्साइड का उपयोग कर भोजन बनाते हैं, इस क्रिया को प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं।प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया नहीं होती, अतः ये भोजन के लिए पौधों पर आश्रित होते हैं।
4. गति (Movement)पौधे जड़ों की सहायता से भूमि में स्थिर रहते हैं, किन्तु इनके कुछ अंग (तना, पत्ती, पुष्प) अपने स्थान पर गति दर्शाते हैं।ये एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन करते हैं।
5. वृद्धि (Growth)पौधों में वृद्धि कुछ विशेष स्थानों पर विभज्योतक ऊतक (Meristematic tissue) के द्वारा होती है। यह विभज्योतक प्ररोह एवं मूल के शीर्ष भाग पर पाई जाती है। मूल व स्तम्भ की मोटाई पाश्र्वीय विभज्योतक (lateral meristem) के कारण होती है। अतः वृद्धि स्थानीकृत (localised) | होती है। यह वृद्धि सम्पूर्ण जीवन काल तक होती रहती है।जन्तुओं में वृद्धि सभी स्थानों पर होती है। अतः वृद्धि क विसरित (diffuse) होती है। इनमें वृद्धि मृत्यु से काफी समय पूर्व रुक जाती है।
6. खनिजों का अवशोषण (Absorption of Minerals)पौधे खनिजों का अवशोषण भूमि में उपलब्ध जल में घुलित अवस्था में प्राप्त करते हैं।ये अपना भोजन ठोस रूप में लेते हैं।
7. तारककाय (Centrosome)अनुपस्थित होते हैं।उपस्थित होते हैं, कोशिका विभाजन के समय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
8. रसधानी (Vacuole)पूर्ण विकसित पादप कोशिका में एक बड़ी रसधानी उपस्थित होती है।प्रायः रसधानी का अभाव होता है।
9. लाइसोसोम (Lysosome)कुछ अपवादों को छोड़कर पादपों में लाइसोसोम के समकक्ष अन्य रचनायें पाई जाती हैं।लाइसोसोम केवल जन्तु कोशिकाओं में ही पाये जाते हैं।
10. अंग तंत्र (Organ system)स्पष्ट अंग तंत्र का अभाव होता है। इनमें मूल, स्तम्भ, पत्तियाँ व पुष्प जैसे अंगों का विभेदन होता है।स्पष्ट अंग तंत्र होते हैं।
11. उत्सर्जन तंत्र (Excretory system)इनमें विशेष उत्सर्जन तंत्र नहीं होता। किन्तु पौधे इन अपशिष्ट पदार्थों को छाल व पत्तियों के द्वारा बाहर निकालते हैं।इनमें विशेष उत्सर्जन तंत्र पाये जाते हैं जिनके द्वारा अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालते हैं।
12. कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis)कोशिका द्रव्य का विभाजन कोशिका पट्ट निर्माण द्वारा होता है।इनमें कोशिका द्रव्य का विभाजन पुत्री केन्द्रकों के बीच अन्तर्वलन विधि द्वारा होता है।

RBSE Class 11 Biology Chapter 1 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 1 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
वनस्पति विज्ञान का जनक है –
(अ) हिप्पोक्रेट्स
(ब) ट्विीरेनस
(स) केरोलस लिनियस
(द) थियोफ्रेस्ट्स

प्रश्न 2.
कोशिका सिद्धान्त के प्रतिपादक थे –
(अ) वॉन ल्यूवेनहॉक
(ब) कार्ल लिनियस
(स) श्लीडन व श्वान
(द) जॉन गार्डर

प्रश्न 3.
सुश्रुत संहिता ग्रंथ में कुल अध्याय हैं –
(अ) 120
(ब) 186
(स) 300
(द) 360

प्रश्न 4.
पौधों के वृद्धि एवं अन्य जैविक क्रियाओं पर समय के प्रभाव का अध्ययन कहलाता है –
(अ) इकोलॉजी
(ब) पोमोलॉजी
(स) क्रोनोबायोलॉजी
(द) माइक्रोबायोलॉजी

प्रश्न 5.
जैव अणुओं, की जटिल अन्त:क्रियाओं एवं उनके प्रभावों का अध्ययन कहलाता है –
(अ) माइक्रोबायोलॉजी
(ब) मोलीक्यूलर बायोलॉजी
(स) बायोटेक्नोलॉजी
(द) डेन्ड्रोक्रोनोलॉजी

प्रश्न 6.
सजीवों के अध्ययन हेतु जीव विज्ञान’ शब्द किसने दिया था ?
(अ) पुरकिंजे तथा वॉन मोल
(ब) एरिस्टोटल
(स) लेमार्क तथा ट्रेविरेनस
(द) हक्सले

प्रश्न 7.
वास्तविक केन्द्रक का अभाव होता है –
(अ) हरे शैवालों में
(ब) जीवाणुओं में ।
(स) कवकों में
(द) लाल शैवालों में
उत्तरमाला:
1. (द) 2. (स) 3. (ब) 4. (स) 5. (ब) 6 (स) 7. (ब)

RBSE Class 11 Biology Chapter 1 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘Enquiry into plants’ पुस्तक के लेखक कौन थे ?
उत्तर:
थियोफ्रेस्ट्स।

प्रश्न 2.
लिनियस के दो महत्त्वपूर्ण योगदान बताइये।
उत्तर:
(i) सजीवों की द्वि पदनाम पद्धति (Binomial nomenclature)।
(ii) पादपों का लैंगिक वर्गीकरण (Sexual classification)।

प्रश्न 3.
किस वैज्ञानिक ने मेंढक का क्लोन बनाया था ?
उत्तर:
जॉन गार्डन।

प्रश्न 4.
पादपों में अत्यन्त धीमी गति की वृद्धि को नापने के लिए बोस ने कौनसा यंत्र बनाया था ?
उत्तर:
क्रेस्कोग्राफ (Crescograph)।

प्रश्न 5.
भारतीय जीवविज्ञान का जनक किन्हें कहते हैं ?
उत्तर:
शिवराम कश्यप (वनस्पति शास्त्री)।

RBSE Class 11 Biology Chapter 1 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कोशिका सिद्धान्त के मुख्य बिन्दु बताइये।
उत्तर:
श्लीडन व श्वान ने कोशिका सिद्धान्त को प्रतिपादित किया था, उनके अनुसार

  1. कोशिका जीवों की आधारभूत इकाई है।
  2. प्रत्येक कोशिका में एक जीव से सम्बन्धित सभी लक्षण होते।
  3. प्रत्येक नई कोशिका पुरानी कोशिका के विभाजन से बनती।

प्रश्न 2.
डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के नेतृत्व में किन नई किस्मों को तैयार किया गया ?
उत्तर:
डॉ. स्वामीनाथन पूसा संस्थान के निदेशक रहे। इस दौरान उन्होंने गेहूं की अधिक उपज देने वाली बौनी किस्म तैयार की। इन्होंने बाजरा, मक्का, ज्वार, चावल आदि की नई किस्मों का विकास किया। अलसी की नई किस्म अरुणा, ज्वार की दोगली व कपास की सुजाता किस्म का विकास किया। इन्हीं के नेतृत्व में जौ की नई किस्म का विकास हुआ जिससे शर्बत बनता है। इसके अतिरिक्त पटसन की दो नई किस्में विकसित की।

प्रश्न 3.
चिकित्सा के क्षेत्र में सुश्रुत के योगदान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
सुश्रुत :
प्लास्टिक सर्जरी के आविष्कारक (Susruta : Discoverer of Plastic Surgery):
सुश्रुत विश्वामित्र के वंशज थे तथा काशी में इनका जन्म हुआ था। इन्होंने काशी के दिवोदास धन्वन्तरि आश्रम में शिक्षा ग्रहण की थी। ये शल्य क्रिया में दक्ष थे तथा इन्हें प्लास्टिक सर्जरी का जनक (Father of surgery) कहा जाता है। सुश्रुत शल्य क्रिया के अतिरिक्त टूटी हड़ियों। को जोड़ने, मूत्र नलिका से पथरी निकालने, शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराने एवं मोतियाबिंद की शल्य चिकित्सा में दक्ष थे। शल्य क्रिया करने से पूर्व उपकरणों को गर्म करते थे, जिससे उपकरणों में लगे कीटाणु नष्ट हो जाएँ। व रोगी को किसी प्रकार का आपूति (asepsis) दोष न हो। वे शल्य। क्रिया से पूर्व रोगी को विशेष प्रकार की औषधियाँ व मद्यपान करवाते थे। इस क्रिया को संज्ञाहरण (anaesthesia) के नाम से जाना जाता था। इससे शल्य क्रिया के दौरान रोगी को किसी प्रकार का दर्द नहीं होता था। शरीर में होने वाली पीड़ा के लिए शल्य शब्द का उपयोग
किया जाता है। तथा उपकरणों व यंत्रों का उपयोग कर उस पीड़ा को दूर करने की प्रक्रिया को शल्य चिकित्सा कहा जाता है।

सुश्रुत ने संस्कृत भाषा में सुश्रुत संहिता की रचना की जिसमें मानव शल्य चिकित्सा को 8 श्रेणियों में विभक्त किया गया है, इसमें 120 से अधिक उपकरणों का विवरण है तथा शल्य चिकित्सा की 300 प्रक्रियाओं का वर्णन है। यह ग्रंथ शल्य चिकित्सा का प्राचीन ग्रंथ है जिसमें धन्वन्तरी के उपदेशों का संग्रह है। यह ग्रंथ संस्कृत भाषा में है। इस ग्रंथ के पाँच खण्ड हैं। प्रथम खण्ड में 46, द्वितीय में 16, तृतीय में 10, चतुर्थ में 40 एवं पंचम खण्ड में 8 अध्याय हैं। ग्रंथ में कुल 120 अध्याय हैं। इन अध्यायों के अतिरिक्त इसमें एक परिशिष्ट खण्ड है जिसे उत्तर तंत्र खण्ड कहा जाता है, इसमें 66 अध्यायों में काय – चिकित्सा का वर्णन है। इस प्रकार सुश्रुत संहिता में 186 अध्याय हैं।
RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 1 जीवविज्ञान: परिचय img-4
सुश्रुत शल्य चिकित्सक होने के साथ-साथ एक योग्य आचार्य एवं शिक्षक भी थे। अपने शिष्यों को तैयार करने के लिए सुश्रुत शव विच्छेदन का सहारा लेते थे। सुश्रुत वैद्य को माता-पिता के समान मानते थे। उनका मानना था कि जिस प्रकार माता-पिता नि:स्वार्थ भाव से अपनी संतान का पालन करते हैं, उसी प्रकार वैद्य को भी नि:स्वार्थ भाव से रोगी की सेवा करनी चाहिए। सुश्रुत संहिता का सर्वप्रथम प्रथम अनुवाद आठवीं शताब्दी में अरबी भाषा में हुआ तथा यह पुस्तक ‘किताब-ए-सुसरन्द’ के नाम से। काफी लोकप्रिय हुई।

प्रश्न 4.
क्या आचार्य चरक चरक संहिता के रचनाकार थे ? स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
वास्तविक रूप से चरक चरक संहिता’ के रचनाकार नहीं थे। आचार्य अग्निवेश ने इस विषय से सम्बन्धित एक ग्रंथ लिखा था जिसका नाम अग्निवेश तंत्र था। आचार्य चरक ने इसी अग्निवेश तंत्र का सम्पादन करने के बाद इसमें कुछ अध्याय जोड़कर इसे नया रूप दिया था। अग्निवेश तंत्र का यह संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण ही बाद में ‘चरक संहिता’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 5.
सूची I को सूची II से संतुलित करके उत्तर का चयन कीजिये
सूची I                                                       सूची II
(A) The causes of plants                                (i) लखनऊ।
(B) ससंजन विकासवाद सिद्धान्त                          (ii) क्रेस्कोग्राफ
(C) स्पर्श करने पर पत्तियों का मुरझा जाना            (iii) सुजाता।
(D) धीमी गति की वृद्धि को मापन                        (iv) फोरेन्सिक विज्ञान
(E) बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ।                     (v) पी. माहेश्वरी पैलियोबोटेनी।
(F) ए इन्ट्रोडक्शन टु द एम्ब्रियोलॉजी                     (vi) थियोफ्रेस्ट्स ऑफ एन्जियोस्पर्म
(G) किट्ट रोग प्रत्यावर्तन                                     (vii) जे.बी. लैमार्क
(H) कपास की नई किस्म                                   (viii) कम्पानुकुंचन
(I) फिंगर प्रिंटिंग                                               (ix) के.सी. मेहता
उत्तर:
A. (vi), B. (vii), C. (viii), D. (ii), E. (i), F. (V), G. (ix), H. (iii), I. (iv)

RBSE Class 11 Biology Chapter 1 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
डॉ. बीरबल साहनी एक महान पुरावनस्पति वैज्ञानिक थे, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
डॉ. बीरबल साहनी (Dr. Birbal Sahni):
डॉ. साहनी का जन्म 14 नवम्बर, 1891 में शाहपुर जिले (वर्तमान में पाकिस्तान में है) के भेडा नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम प्रो. रुचिराम साहनी था। इनका गाँव नमक की चट्टानों व पहाड़ियों से घिरा हुआ था। इन्हें बचपन से ही जीवाश्म देखने का शौक था। इनकी। प्रारम्भिक शिक्षा लाहौर के सेंट्रल मॉडल स्कूल में हुई। उच्च शिक्षा राजकीय कॉलेज लाहौर व पंजाब विश्वविद्यालय से की। उन्होंने वनस्पति शास्त्र का अध्ययन प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री शिवराम कश्यप (भारतीय ब्रायोलॉजी के जनक) की देखरेख में किया तथा 1919 में लंदन विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ साइन्स की उपाधि प्राप्त की।
RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 1 जीवविज्ञान: परिचय img-5
शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् म्युनिख के प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री प्रो. के, गोनल के निर्देशन में शोध कार्य किया। साहनी का प्रथम शोध पत्र न्यूफाइटोलोजी पत्रिका में प्रकाशित हुआ। दूसरे शोध पत्र में एक विशेष किस्म की फर्न के विषय में बताया। प्रो. साहनी ने विस्तृत रूप से वनस्पति जीवाश्मों पर शोध किया, इसी कारण प्रो. साहनी को भारतीय पुरावनस्पति विज्ञान का जनक (Father of paleobotany) कहते हैं। उन्होंने जीवाश्मों (fossils), बजरहों और जीरा दानों पर शोध किया, जिसे पूर्व में जेरियत के नाम से जाना जाता था। शोध के आधार पर उन्होंने बताया कि असम मृत वनस्पतियों से प्रचुर थी।

प्रो. साहनी ने भारत में विद्यमान जीवाश्म बजरहों के वर्गीकरण की समस्या का समाधान किया। वे भारत में जीवाश्म बजरहों तथा जीरा दानों का अग्रणी भण्डार स्थापित करना चाहते थे, ताकि जीवाश्मों के तुलनात्मक अध्ययन से शोध कार्य आगे बढ़ा सके। उन्होंने भारत में कोयले के भण्डारों में सम्बन्ध स्थापित करने के लिए कोयले के जीवाश्मों व जीरा दानों के लिए एक तंत्र स्थापित किया। प्रो. साहनी ने राजमहल-बिहार के ऊपरी गोडावनी क्यारियों पर शोध करके अनेक अजीबो-गरीब व दिलचस्प जीवाश्मी पादपों के विषय में दुनिया के समक्ष जानकारी दी।

यही नहीं प्रो. साहनी ने हड़प्पा, मोहनजोदड़ो एवं सिन्धु घाटी की सभ्यता के विषय में अनेक निष्कर्ष निकाले। एक बार रोहतक टीले के एक भाग से अवशेष प्राप्त कर बताया कि यहाँ जो जाति पूर्व में रहती थी। वह विशेष प्रकार के सिक्कों को ढालना जानती थी। उन्होंने वहाँ से सिक्के ढालने वाले साँचे भी प्राप्त किये। प्रो. साहनी में यह विशेष बात थी कि वे पुरावनस्पति वैज्ञानिक होने के साथ-साथ भूवैज्ञानिक भी थे तथा उन्हें पुरातत्त्व में अधिक रुचि थी। उन्होंने लखनऊ में बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोबोटेनी की स्थापना की। यह संस्थान त्रिकोणीय पच्चिकारी का अद्वितीय नमूना है। इस भवन की दीवारों पर खुदाई से प्राप्त जानवरों की हड्डियों को नगों की भाँति जड़ा गया है।
साहनी नेशनल अकेडमी ऑफ साइंसेज के अध्यक्ष व इंटरनेशनल बोटनीकल कांग्रेस, स्टाकहोम के मानद अध्यक्ष भी रहे। सन् 1949 में प्रो. साहनी का निधन हो गया था।

प्रश्न 2.
डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन भारतीय हरितक्रान्ति के जनक थे ? इसकी विस्तृत विवेचना कीजिए।
उत्तर:
एम.एस. स्वामीनाथन (M.S. Swaminathan):
इनका जन्म 7 अगस्त 1925 में तमिलनाडु राज्य के कुंभकोणम जिले में हुआ था। इनके पिता चिकित्सक थे। इनका पूरा नाम मोनकोम्बू सम्बाशिवन स्वामीनाथन (Monkombu Sambasivan Swaminathan) था। 1949 में स्वामीनाथन को भारतीय कृषि अनुसंधान के आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग में एसोसिएटशिप का कार्य मिला। 1952 में कैम्ब्रिज कृषि स्कूल में आलू पर शोध कर डॉक्टर ऑफ फिलोसोफी (Ph.D) की उपाधि प्राप्त की। स्वामीनाथन ने 1954 से 1972 तक कटक व पूसा स्थित कृषि संस्थानों में उत्कृष्ट कार्य किया, फलस्वरूप भारत सरकार ने 1972 में उन्हें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का महानिदेशक नियुक्त किया।
RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 1 जीवविज्ञान: परिचय img-6
उन दिनों भारत कृषि प्रधान देश होते हुए भी कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं था। 1962 में राव फ्लेअर फाउण्डेशन के पूसा कृषि संस्थान से गेहूं की बौनी किस्म मंगाई गई व डॉ. बोरलॉग (Borlaug) का मार्गदर्शन लिया। कठोर परिश्रम कर इन्होंने गेहूँ। की पैदावार बढ़ाने में सफलता प्राप्त की। स्वामीनाथन 1965 से 1971 तक पूसा संस्थान के निदेशक रहे। अधिक उत्पादन देने वाली गेहूं की बौनी किस्म तैयार करने के कारण इनकी विशेष ख्याति पूरे विश्व में फैल गई। बौनी किस्म के बीज अनेक राज्यों में किसानों को वितरित किये गये तथा | अपने नेतृत्व में दिल्ली के आस-पास के कई गाँवों के किसानों को तैयार किया जो केवल बीज तैयार करने का ही कार्य करते थे।

महत्त्वपूर्ण तथ्य:
डॉ. नारमेन बोरलॉग (Dr. Norman Borlaug) ने गेहूँ की बौनी किस्म विकसित करके, गेहूँ उत्पादन को बढ़ाया। इन्हें 1968 में नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ। बोरलॉग हरित क्रान्ति के जनक (Father of green revolution) हैं।

स्वामीनाथन ने गेहूं के उत्पादन को बढ़ाने के अतिरिक्त बाजरा, मक्का, ज्वार, चावल, मूंग, लोबिया, अलेसी कि किस्म अरुणा, ज्वार की दोगली व कपास की सुजाता नई किस्में तैयार कीं। आपके ही नेतृत्व में जौ की नई किस्म का विकास हुआ जिससे शर्बत तैयार किया जाता है। यही नहीं इन्होंने पटसन की दो नई किस्में विकसित कीं।

डॉ. स्वामीनाथन के नेतृत्व में कृषि के क्षेत्र में क्रांतिकारी अनुसंधान से हमारा देश अनाज के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना। इस क्रांति को हरित क्रांति कहा गया तथा स्वामीनाथन को भारतीय हरित क्रांति का जनक (IFather of Indian green revolution) कहते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इन्दिरा गाँधी ने इन पर डाक टिकिट भी जारी किया। खाद्य समस्या निवारण हेतु आपको अन्तर्राष्ट्रीय स्तर को रमन मेग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

प्रश्न 3.
जीव विज्ञान के भविष्य एवं अवसर को समझाइये।
उत्तर:
जीवविज्ञान का भविष्य एवं अवसर (Careers and scope of Biology):
जीवविज्ञान विषय जीवन के रूपों को वृहद् रूप से समझने की जागृति उत्पन्न करता है जिसको कि प्रायः अनदेखा किया जाता है। जीवविज्ञान विषय का अध्ययन उज्ज्वल भविष्य एवं अवसर को अग्रसर करता है। इस विज्ञान का मुख्य क्षेत्र चिकित्सा विज्ञान का है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित क्षेत्रों में अध्ययन कर अच्छे भविष्य का निर्माण किया जा सकता है –

(i) कृषि विज्ञान के क्षेत्र में (In the field of Agriculture Science):
कृषि के क्षेत्र में जीवविज्ञान के विद्यार्थी डिप्लोमा, स्नातक व स्नातकोत्तर की उपाधि निम्न क्षेत्रों में कर सकते हैं, जैसे-मुर्गीपालन, कृषि विधि, कृषि आर्थिक एवं प्रबन्धन, कृषि सांख्यिकी, कृषि मार्केटिंग, डेयरी विज्ञान, कृषि मौसम विज्ञान, शस्य विज्ञान, कृषि जैव प्रौद्योगिकी, कृषि फसल कार्यिकी, कृषि कीट विज्ञान, कृषि जैव रसायन, कृषि रसायन विज्ञान, मृदा विज्ञान आदि।

(ii) फोरेन्सिक विज्ञान के क्षेत्र में (In the field of forensic science):
यह विज्ञान अपराधों से सम्बन्धित है, प्रयोगशाला में जाँच के उपरान्त अपराधी की पुष्टि की जाती है। जीव विज्ञान के विद्यार्थी अपने सुनहरे भविष्य हेतु फिंगर प्रिन्टिंग, साइबर क्राइम व फोरेन्सिक कम्प्यूटर विज्ञान में डिप्लोमा प्राप्त कर सकते हैं। क्रिमनोलॉजी विषय में स्नातक की डिग्री अर्जित कर सकते हैं।

(iii) सूक्ष्म जीवविज्ञान के क्षेत्र में (In the field of microbiology):
जीवविज्ञान के विद्यार्थियों के लिए सूक्ष्म जीवविज्ञान के क्षेत्र में विशेष अवसर हैं। रोगों की रोगथाम, रोगजनकों की पहचान तथा प्रतिजैविक बनाने में इस विज्ञान का महत्त्वपूर्ण योगदान है। इस क्षेत्र में विद्यार्थियों को अनेक प्रकार के अवसर प्राप्त होते हैं। चिकित्सा महाविद्यालयों व चिकित्सालयों में सूक्ष्म जीवविज्ञानी के अनेक पद होते हैं। इस विज्ञान के अन्तर्गत विद्यार्थी सूक्ष्म जीवविज्ञान में पासकोर्स व ऑनर्स तथा औद्योगिकी सूक्ष्म जीवविज्ञान में स्नातक तथा स्नातकोत्तर की। डिग्री प्राप्त कर सकते हैं।

(iv) जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में (In the field of Biotechnology):
यह विज्ञान नवीनतम है। इसमें विद्यार्थी अच्छा भविष्य बना सकते हैं। इस क्षेत्र में विद्यार्थी जैव प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी एवं जैव सूचना विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त कर सकते हैं तथा जैव प्रौद्योगिकी में बी.ई. व जैव रसायन में बी.टेक कर सकते हैं।

(v) खाद्य एवं तकनीकी विज्ञान के क्षेत्र में (In the field of food & technology science):
वर्तमान में अनेक खाद्य पदार्थ सामग्रियों को विशेष प्रसंस्करण एवं परिरक्षण की विधि द्वारा लम्बे समय तक सुरक्षित रख सकते हैं। यात्रा के दौरान व परिवहन की दृष्टि से इन्हें सुलभता से पैकिंग करके अन्य स्थान पर ले जाया जा सकता है। इसके अन्तर्गत विद्यार्थी खाद्य प्रसंस्करण एवं परिरक्षण; खाद्य प्रसंस्करण; खाद्य प्रसंस्करण एवं तकनीकी; खाद्य संग्रहण, परिरक्षण एवं खाद्य तकनीकी में स्नातक डिग्री प्राप्त कर सकते हैं तथा शर्करा तकनीकी, मछली प्रसंस्करण एवं तकनीक में डिप्लोमा कर सकते हैं।

(vi) भूगर्भ विज्ञान के क्षेत्र में (In the field of Geology):
विद्यार्थी भूगर्भ विज्ञान के अन्तर्गत वातावरणीय भूगर्भ विज्ञान, इंजीनियरिंग भूगर्भ विज्ञान एवं भूजल विज्ञान में स्नातक व स्नातकोत्तर डिप्लोमा व। स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त कर अच्छा भविष्य बना सकते हैं।

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Remark:

हम उम्मीद रखते है कि यह RBSE Class 11 biology Solutions in Hindi आपकी स्टडी में उपयोगी साबित हुए होंगे | अगर आप लोगो को इससे रिलेटेड कोई भी किसी भी प्रकार का डॉउट हो तो कमेंट बॉक्स में कमेंट करके पूंछ सकते है |

यदि इन solutions से आपको हेल्प मिली हो तो आप इन्हे अपने Classmates & Friends के साथ शेयर कर सकते है और HindiLearning.in को सोशल मीडिया में शेयर कर सकते है, जिससे हमारा मोटिवेशन बढ़ेगा और हम आप लोगो के लिए ऐसे ही और मैटेरियल अपलोड कर पाएंगे |

आपके भविष्य के लिए शुभकामनाएं!!

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