RBSE Class 10 Physical Education Chapter 1 शारीरिक शिक्षा: अर्थ एवं इतिहास

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Rajasthan Board RBSE Class 10 Physical Education Chapter 1 शारीरिक शिक्षा: अर्थ एवं इतिहास

RBSE Class 10 Physical Education Chapter 1 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 10 Physical Education Chapter 1 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शारीरिक शिक्षा से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा का अर्थ शरीर के सर्वांगीण विकास की शिक्षा से है जो शारीरिक विकास से प्रारम्भ होकर सम्पूर्ण शरीर को उत्तम रखने हेतु प्रदान की जाती है। जिसकी बदौलत उत्तम स्वास्थ्य रखने की शारीरिक रूप से बलिष्ठ बनाने की व मानसिक रूप से शारीरिक शिक्षा सक्षमता प्राप्त कराने की शिक्षा है। शारीरिक शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक मानसिक और भावात्मक रूप से तन्दुरुस्ती प्रदान करने वाली शिक्षा है।

प्रश्न 2.
शारीरिक शिक्षा को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा की परिभाषाएँ – सुभाष चंद्र के अनुसार ”शारीरिक शिक्षा वह शिक्षा है। जिससे व्यक्ति मन वचन कर्म से अपनी आयु के अनुसार बिना थके अपने कार्य को लम्बे समय तक सुचारु रूप से कर सके।”

अर्जुन सिंह सोलंकी के अनुसार ”शारीरिक शिक्षा बच्चों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को प्रकाशित करने की रोशनी है।” हेमलता रावल के अनुसार ”शरीर से सम्बन्धित विभिन्न गतिविधियों व उसे करने की सही तकनीकों के विषय में ज्ञान व जागरूकता उत्पन्न करना शारीरिक शिक्षा है।”

मोहन राजपुरोहित के अनुसार ”मानव शरीर के सर्वांगीण विकास एवं उत्तम स्वास्थ्य प्राप्ति का आधार शारीरिक शिक्षा है।” भारतीय शारीरिक शिक्षा एवं मनोरंजन के केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड के अनुसार शारीरिक शिक्षा शिक्षा ही है। यह वह शिक्षा है जो बच्चों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व तथा उसकी शारीरिक प्रक्रियाओं द्वारा उसके शरीर, मन एवं आत्मा की पूर्णरूपेण विकास हेतु दी जाती है।”

प्रश्न 3.
अखिल भारतीय खेल परिषद का गठन कब किया गया ?
उत्तर:
अखिल भारतीय खेल परिषद का गठन सन् 1954 में किया गया।

प्रश्न 4.
धनुर्विद्या क्या है ?
उत्तर:
धनुष-बाण चलाने को ही धनुर्विद्या कहते हैं।

प्रश्न 5.
महाभारत में गदा विद्या के प्रमुख खिलाड़ी कौन-कौन थे ?
उत्तर:
महाभारत काल में भीम तथा दुर्योधन गदा विद्या के प्रमुख खिलाड़ी थे।

RBSE Class 10 Physical Education Chapter 1 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शारीरिक शिक्षा का अर्थ बताइये और वैदिक काल में शारीरिक शिक्षा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा शब्द का प्रयोग शारीरिक क्रियाओं के लिए किया जाता है। शारीरिक शिक्षा मनुष्यों के लिए परमात्मा की सर्वोत्तम रचना है।
शारीरिक शिक्षा का अर्थ-शारीरिक शिक्षा का अर्थ शरीर के सर्वांगीण विकास की शिक्षा से है जो शारीरिक विकास से आरम्भ होकर सम्पूर्ण शरीर को उत्तम बनाये रखने के लिए दी जाती है। शारीरिक शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और भावात्मक रूप से तन्दुरुस्ती प्रदान करने वाली शिक्षा है। वैदिक काल में शारीरिक शिक्षा-वैदिक काल के ग्रन्थों, वेदों, उपनिषदों में शारीरिक शिक्षा के ज्ञान की बदौलत शरीर बल से व शारीरिक क्रियाओं से परमात्मा प्राप्ति तक के ज्ञान का उल्लेख है।

सूक्ष्म से विराट स्वरूप प्राप्ति तक का देवी-देवताओं को उल्लेख है। ऋषियों ने आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का सामर्थ्य प्राप्त किया है। सामान्य इंसान भी इस शिक्षा के बूते बलिष्ठ बनने का भी उल्लेख है। इस काल में यह शिक्षा आसन व मल्लयुद्ध के माध्यम से प्राप्त की जाती थी। मल्लयुद्ध की शिक्षा द्वारा योद्धाओं और शूरवीरों का विकास किया जाता था। शारीरिक शिक्षा का ज्ञान लोगों को था इसकी पुष्टि देवताओं और राक्षसों के कई युद्धों से होती है। पुराणों में भी शारीरिक शिक्षा का वर्णन आता है। लोग शारीरिक शिक्षा की क्रियाओं पर विशेष ध्यान देते थे।

प्रश्न 2.
भारत के स्वतंत्रता पूर्व के शारीरिक शिक्षा के इतिहास की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारत में 1858 से 14 अगस्त, 1947 तक ब्रिटेन का शासन रहा। अंग्रेजों ने भारत की सारी सुरक्षा को अपने अधीन किया तथा भारतीयों के शस्त्र रखने पर प्रतिबंध लगा दिया। गुरुकुल प्रथा को समाप्त करने का कार्य प्रारम्भ किया गया। 1860 में लार्ड मैकाले द्वारा बताई शिक्षा पद्धति को आरम्भ किया। इस शिक्षा पद्धति के द्वारा भारतवासियों के मन मस्तिष्क में यह स्थापित करने का प्रयास किया गया कि शारीरिक शिक्षा का कोई विशेष महत्त्व नहीं है और किताबी ज्ञान महत्त्वपूर्ण है।

इसके परिणामस्वरूप शारीरिक शिक्षा के प्रति रुझान कम हुआ। 1882 में प्रथम शिक्षा आयोग की सिफारिश से शारीरिक शिक्षा की प्रगति के लिये प्रयत्न किये गये। इस प्रकार युवकों के लिये खेल, जिम्नास्टिक, ड्रिल एवं अन्य व्यायाम अपनाये गये 1894 ३ में शारीरिक शिक्षा को अनिवार्य विषय बनाने के बारे में सोचा गया परन्तु इसे अनिवार्य विषय नहीं बनाया गया। इस काल में सेना से सेवानिवृत्त हुये सैनिक स्कूलों में शारीरिक शिक्षा का कार्य देखते थे। इस काल में शारीरिक शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दिया।

प्रश्न 3.
स्वतंत्रता प्राप्ति के शारीरिक शिक्षा के इतिहास की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शारीरिक शिक्षा की ओर ध्यान दिया गया तथा शारीरिक शिक्षा के लिये अनेक कदम उठाये गये। शारीरिक शिक्षा और खेलों के विकास के लिये भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने सन् 1950 में शारीरिक शिक्षा मनोरंजन के केन्द्रीय परामर्श बोर्ड एवं 1954 में अखिल भारत खेल सलाहकार बोर्ड की स्थापना की। शारीरिक शिक्षा मनोरंजन केन्द्रीय परामर्श बोर्ड में दस सदस्यों को मनोनीत किया गया तथा डॉ. ताराचन्द की अध्यक्षता में बोर्ड की प्रथम बैठक 19 मार्च 1950 को आयोजित की गई। बोर्ड का उद्देश्य शारीरिक शिक्षा का विकास करना था। शारीरिक शिक्षा को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल कराना था। खेलों का विकास करना था एवं उस दिशा में कार्य प्रारम्भ हुये। शारीरिक शिक्षा के विकास एवं खेलकूद के स्तर को ऊपर उठाने के लिये संस्थानों का गठन हुआ। अखिल भारतीय खेल परिषद का गठन 1954 में किया गया। परिषद का गठन 1954 में किया गया।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस राष्ट्रीय खेल संस्थान की स्थापना मार्च, 1961 में पटियाला (पंजाब) में की गई। इस खेल संस्थान में अनेक खेलों जैसे हॉकी, फुटबॉल, वॉलीबॉल, कुश्ती, जिम्नास्टिक, एथलेक्टिस, बॉस्केटबॉल, टेनिस में एक वषीर्य डिप्लोमा कोर्स शुरू किया गया। इसके बाद अन्य खेलों के लिए भी कोचिंग देने की व्यवस्था की गई। अब इस संस्थान ने खेलों में अधिस्नातक की उपाधि भी देना शुरू कर दिया है। भारतीय खेल प्राधिकरण की स्थापना 16 मार्च, 1984 को की गई। भारतीय खेल प्राधिकरण की स्थापना का उद्देश्य छोटी उम्र में प्रतिभा की खोज एवं पोषण प्रशिक्षण देकर उत्कृष्ट खिलाड़ी के रूप में तैयार करना है। खिलाड़ियों को आवश्यक सुविधाएँ छात्रवृत्ति प्रदान करना प्रमुख है।

प्रश्न 4.
शारीरिक शिक्षा मनुष्य के सर्वांगीण विकास में सहायक है, व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा सामान्य शिक्षा का एक अभिन्न अंग है। उत्तम स्वास्थ्य के लिए मनुष्य के लिए अत्यावश्यक है। शारीरिक शिक्षा केवले शरीर की शिक्षा ही नहीं अपितु सम्पूर्ण शरीर का ज्ञान है। वास्तव में शारीरिक शिक्षा बालक की वृद्धि एवं विकास में सहायक है। जिसके पालन से उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है तथा स्वस्थ एवं खुशहाल जीवन व्यतीत हो सकता है। अतः निष्कर्ष रूप में हम यह कह सकते हैं कि शारीरिक सामाजिक और संवेगात्मक विकास में सहायक है एवं उत्तम स्वास्थ्य प्राप्ति का आधार है।

RBSE Class 10 Physical Education Chapter 1 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 10 Physical Education Chapter 1 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
शारीरिक शिक्षा वह शिक्षा है जिससे विकास होता है-
(अ) शरीर का
(ब) बुद्धि का
(स) शरीर व बुद्धि दोनों का
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) शरीर व बुद्धि दोनों का

प्रश्न 2.
कोचिंग में डिप्लोमा को कार्यक्रम सर्वप्रथम किस शहर में प्रारम्भ हुआ ?
(अ) पटियाला
(ब) गाँधी नगर
(स) कोलकाता
(द) बैंगलोर
उत्तर:
(अ) पटियाला

RBSE Class 10 Physical Education Chapter 1 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय खेल प्राधिकरण की स्थापना कब की गई ?
उत्तर:
भारतीय खेल प्राधिकरण की स्थापना 16 मार्च, 1984 को की गई।

प्रश्न 2.
‘शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्’ का अर्थ यह है कि यह शरीर ही धर्म का श्रेष्ठ साधन है।

RBSE Class 10 Physical Education Chapter 1 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय खेल प्राधिकरण की स्थापना के उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारतीय खेल प्राधिकरण की स्थापना का उद्देश्य छोटी उम्र में प्रतिभा की खोज एवं पोषण प्रशिक्षण देकर उत्कृष्ट खिलाड़ी के रूप में तैयार करना है। खिलाड़ियों को आवश्यक सुविधाएँ छात्रवृत्ति प्रदान करना प्रमुख है।

प्रश्न 2.
प्राचीन काल में आश्रमों तथा गुरुकुलों में कौन-कौन सी क्रियाएँ होती थीं ?
उत्तर:
प्राचीन काल में आश्रमों तथा गुरुकुलों में अखाड़ों एवं व्यायाम शालाओं में विद्यार्थी एवं संन्यासी व्यायाम का अभ्यास करते थे। इन व्यायामों में दण्ड-बैठक, मुगदर, गदा, नाल, धनुर्विद्या, मुष्ठी, वज्रमुष्ठी आसन, प्राणायाम, सूर्य नमस्कर, नवली, नैति, धोती बस्ती सहित अनेक क्रियाएँ होती थीं।

RBSE Class 10 Physical Education Chapter 1 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में शारीरिक शिक्षा के संक्षिप्त इतिहास की जानकारी दीजिए।
उत्तर:
भारतवर्ष में शारीरिक शिक्षा का इतिहास अति काया को पहला सुख माना गया शारीरिक शिक्षा के इतिहास के अध्ययन को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है।

(1) वैदिककाल – वैदिकयुग में आर्य लोग हृष्ट-पुष्ट तथा ऊँचे कद के होते थे। वे सदैव शारीरिक बल को महत्त्व देते थे। आर्य लोगों के व्यायाम और मनोरंजन के साधनों में मृगया, अश्वारोहण, नृत्य, उल्टे-सीधे कूदना और कलैया मारने के व्यायाम मुख्य थे।

(2) रामायणकाल – भारतवर्ष में सर्वत्र ही व्यायाम प्रेमी लोग हनुमानजी को अपना आराध्य देव मानते हैं। रामायण में हनुमानजी के कार्यों द्वारा उनके असाधारण बल का प्रत्यक्ष बोध होता है। समुद्र को लाँघते समय महेन्द्र पर्वत से उड़ान भरने से हनुमानजी की शारीरिक शक्ति की कल्पना की जा सकती है और यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वे कूदने की क्रीड़ा से परिचित थे। वे अवयवों का संकोचन और प्रसारण करने की विधि का पूर्ण ज्ञान रखते थे। बाली की दिनचर्या सुग्रीव ने रामचन्द्रजी को सुनाई थी।

उससे उनकी शक्ति का बोध होता है। उसके व्यायाम की भले ही कोई विशेष पद्धति न हो किन्तु वर्णन से यही अनुमान होता है कि वह नियमित रूप से पर्याप्त व्यायाम किया करता था। धनुष तोड़ने की परम्परा शारीरिक प्रतियोगिता का ही प्रमाण इस युग में तीरंदाजी, मृगया, मुक्की के व्यायाम, भाला क्षेपण, खड्ग द्वन्द्व, मुगदर द्वन्द्व, मल्लयुद्ध, अश्वारोहण, रथदौड़ आदि का व्यापक उल्लेख रामायण में मिलता है। उस समय शारीरिक शिक्षा के लिए अलग से विद्यालय नहीं थे। सामान्य शिक्षण ही अस्त्र-शस्त्रों के कौशल शिक्षण के साथ स्वास्थ्यता की भी विधियाँ उपयोग में लाता था।

(3) महाभारतकाल – महाभारतकाल में अर्थात् ई. सन् पूर्व तीन हजार से तीन सौ वर्ष तक भारतवर्ष में व्यायाम द्वारा शरीर को सुदृढ़ और प्रचण्ड शक्तिशाली बनाने का सर्वत्र सबै नगरों में प्रचार था। इस काल में कुश्ती और गदा संचालन का बड़ा प्रचार था। कुश्ती में अनेक प्रकार के दाव-पेंच थे। जैसे – आकर्षणम्, बाहूनामूलम्, ग्रीवा विकर्षणम्, पर्यासन, पादप्रहार, महीव्याजनम्, भुजबंध आदि। इन सब दाव-पेंचों की शिक्षा प्रत्येक क्षत्रिय कुमारों के लिए अनिवार्य थी। चक्र द्वारा व्यायाम करने की भी प्रथा थी। परशु, मूसल, हल, लाठी, गदा आदि आयुधों का इस युग में उपयोग किया जाता था। इन सबका अभ्यास ब्रह्मचर्य में किया जाता था। समाज में शक्ति सम्पन्न पुरुष की बड़ी प्रतिष्ठा हुआ करती थी।

(4) नालन्दा काल – नालन्दा उस समय का प्रसिद्ध शिक्षण केन्द्र था। जहाँ पर 6000 के लगभग विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते थे। धार्मिक, वैज्ञानिक, पौराणिक तथा बौद्धिक पाठ्यचर्चाओं
के साथ स्वास्थ्यवर्धन के लिए शारीरिक शिक्षा कार्यक्रमों पर व्यापक बल दिया जाता था। प्राणायाम तथा ‘सूर्य नमस्कार’ की क्रियाएँ निरंतर करवाई जाती थीं। पैदल चलना अत्यन्त गुणकारी क्रिया मानी जाती थी। योगाभ्यास, अश्वारोहण, खड्ग संचालन, कुश्ती तथा अन्य व्यक्तिगत श्रेष्ठता वाली गतिविधियों की प्रतिस्पर्धाएँ बहुधा हुआ करती थीं।

(5) राजपूत काल – इस काल में हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान हुआ। इसे शौर्यकाल का भी नाम दिया जाता है। राजपूत अत्यन्त गर्जीले तथा हठी स्वभाव के थे। 13वीं शताब्दी तक उनका सिक्का भारत में खूब चला। तलवार के एक ही वार से किसी पशु का सिर धड़ से अलग कर देने का कौशल राजपूत बालकों को आरम्भ से ही सिखाया जाता था। अश्वारोहण, भालाक्षेपण, तीरंदाजी, कुश्ती, आखेट, गदा युद्ध आदि राजपूत लोगों के प्रिय खेल तथा व्यायाम के माध्यम थे। बिना काठी घुड़सवारी राजपूत बालिकाओं को भी सिखाई जाती थी। संगीत तथा नृत्य राजपूत जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं। धार्मिक मेलों में इन गतिविधियों को साक्षात् उदाहरण स्वरूप देखा जा सकता है। शतरंज भी राजपूतों का अत्यन्त मनोरंजक खेल रहा है।

(6) मुगलकाल – इस काल में कुश्ती को सदैव राजकीय संरक्षण मिला। अनेक नामवर पहलवानों तथा अखाड़ों का नाम इस काल में मिलता है। गाँवों में कुश्ती स्वस्थ रहने को सुन्दर माध्यम था। दंगल खूब होते थे जिसमें लोगों का मनोरंजन भी होता था एवं स्वास्थ्य भी बैठता था। चौगान उस समय का प्रचलित खेल माना जाता था। कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु भी चौगान खेलने के कारण हुई। इस खेल से व्यक्ति के शरीर में हृष्ट-पुष्ट तथा चंचलता आती थी। मुक्केबाजी राजकीय संरक्षण में थी; परन्तु इसके लिए अच्छे मुक्केबाज ईरान से लाये जाते थे। तैराकी, आखेट, पशु भिड़न्त, व्यक्तिगत प्रतिस्पद्धएँ, शतरंज, चौपड़, पच्चीसी भी उसे समय प्रचलित खेल हुआ करते थे।

(7) ब्रिटिशकाल – ब्रिटिशकाल में लोगों का ध्यान केवल किताबी ज्ञान की ओर हो गया। वे शारीरिक शिक्षा की ओर से उदासीन होते गये। कुछ अर्से बाद कुछ विवेकशील व्यक्तियों ने देश की इस अत्यन्त शोचनीय दशा का अनुभव किया और जनसाधारण में शारीरिक शिक्षा के प्रति रुचि उत्पन्न करने का प्रयत्न किया जाने लगा। अनेक स्थानों पर व्यायामशालाएँ स्थापित की गईं। लोगों का ध्यान इस ओर धीरे-धीरे आकर्षित होने लगा। जनता की इसे बढ़ती हुई रुचि को देखकर अंग्रेज सरकार ने बाध्य होकर सन् 1880 में पाठशालाओं में व्यायाम शिक्षकों की नियुक्ति की। गुरु बालमभट्ट, दादा दिओदार, गुरु दामोदर, श्रीनारायण गुरु उस समय के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री थे। लठ्ठ चलाना, लेजिम, दण्ड बैठक और दो व्यक्तियों में होने वाले खेलों को ब्रिटिशकाल में विकसित किया गया।

(8) आधुनिक काल – आधुनिक काल में शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक प्रगति हुई। नये शिक्षक प्रशिक्षण के द्वार खुलने लगे तथा खेलों और स्वास्थ्य के विकास के लिए नई-नई योजनाएँ। बनीं। शारीरिक शिक्षा और क्रीड़ा के विकास की दृष्टि से भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने सन् 1950 ई. में शारीरिक शिक्षा मनोरंजन के केन्द्रीय परामर्श बोर्ड तथा 1954 में अखिल भारत खेल सलाहकार समिति की स्थापना की। इन दोनों का उद्देश्य शारीरिक शिक्षा तथा खेलों के विकास को बढ़ावा देने की नई रूपरेखा प्रस्तुत करना था। इन समितियों का मुख्य कार्य एवं योजना यह रही कि इन्होंने शारीरिक शिक्षा विषय के डिप्लोमा व सर्टिफिकेट कोर्सी के लिए आदर्श पाठ्यक्रम और स्कूल छात्रों के लिए पाठ्यक्रम तथा शारीरिक शिक्षा में प्रशिक्षण विधि को सरकार के सामने रख करके उनमें संशोधन करने व देश में खेलों के स्तर को उन्नत करने हेतु विभिन्न प्रकार के सुझाव दिये।

16 मार्च, 1984 को भारत में समस्त नियंत्रण हेतु एवं इन खेलों के विकास व सुव्यवस्थित संचालन हेतु भारतीय खेल प्राधिकरण जिसे साई कहते हैं, की स्थापना मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा की गई। यह स्वशासी संस्थान है। और यह सरकारी खेल नीतियों को निर्धारण करना, खेलों को सभी प्रकार की आर्थिक सहायता प्रदान करना, खिलाड़ियों को मिलने वाली छात्रवृत्तियाँ प्रदान करना तथा पटियाला राष्ट्रीय खेल संस्थान का संचालन करना जैसे अहम् कार्यों को सम्पन्न करता है।

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