भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध – Problem Of Unemployment In India Essay In Hindi

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भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध – Essay On Problem Of Unemployment In India In Hindi

रूपरेखा–

  • प्रस्तावना,
  • समस्या की व्यापकता,
  • समस्या के कारण,
  • वर्तमान शिक्षा प्रणाली,
  • समस्या का समाधान,
  • उपसंहार।।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध – Bhaarat Mein Berojagaaree Kee Samasya Par Nibandh

तड़प रही है भूखी जनता, विकल मनुजता सारी।
भटक रहे नवयुवक देश के, लिए उपाधियाँ भारी॥
काम नहीं, हो रहे निकम्मे, भारत के नर–नारी।
हो कैसे उद्धार देश का, फैल रही बेकारी॥

भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध – Bhaarat Mein Berojagaaree Kee Samasya Par Nibandh

प्रस्तावना–
हजारों वर्षों की परतन्त्रता के बाद सन् 1947 में भारत स्वतन्त्रता हुआ। गुलामी के इस लम्बे समय में विदेशियों ने देश को चूस लिया था और जनता प्राय: निष्प्राण और पीड़ित थी। हम आजाद हुए परन्तु अनेक भयानक समस्याएँ हमारे सामने मुँह बाये खड़ी थीं जिनमें से एक भीषणतम समस्या थी–’बेकारी की समस्या’।

देश की आधे से अधिक जनता बेकार थी। काम न मिलने की दशा में खाद्य समस्या और विकराल होती जा रही थी। स्वतन्त्र भारत की सरकार ने इस समस्या को हल करने का प्रयत्न किया परन्तु आज भी यह समस्या इस देश के लिए अभिशाप बनी हुई है।

समस्या की व्यापकता–
बेकारी की समस्या केवल भारत में ही नहीं है, अन्य देशों में भी यह समस्या व्याप्त है। मशीनों के आविष्कार ने मनुष्यों को बेकार और पंगु बना डाला है। एक मशीन हजारों आदमियों को बेकार कर बैठती है। श्रमिकों से भी बढ़कर यह समस्या शिक्षित वर्ग के लिए भयानक हो रही है। श्रमिक की आवश्यकता सीमित होती है, उसका जीवन–स्तर नीचा होता है, कोई भी अच्छा या बुरा काम करने में उसे शर्म नहीं आती।

श्रमिक तो किसी न किसी तरह जीवन निर्वाह कर लेता है परन्तु मध्यम श्रेणी के लोग इस समस्या से अधिक पिस रहे हैं। मध्यम श्रेणी के लोग शारीरिक परिश्रम नहीं कर पाते हैं, छोटा काम करने में उन्हें शर्म आती है और अपने अनुकूल काम उन्हें मिलता नहीं। समस्याएँ पूँजीपतियों और मजदूरों की भी हैं, पर इन दोनों के बीच में जो वर्ग है वह नितान्त पीड़ित और बेकार है।

बेकारी ने भारत को दरिद्र बना दिया है। देशवासियों का जीवन दु:खी और भुखमरी से पूर्ण है। इस समस्या के कारण ही भिक्षुओं और भुखमरी की समस्या उत्पन्न हो गयी है, लूटमार और चोरी की भावना बढ़ती जा रही है, नैतिक पतन हो रहा है और सामाजिक जीवन अस्त–व्यस्त होता जा रहा है। रोजगार दिलाने वाले दफ्तरों के सामने बेकारों की भीड़ बढ़ती जा रही है। जब तक इस समस्या का समाधान नहीं होता तब तक देश सुखी और सम्पन्न नहीं हो सकता।

समस्या के कारण–
देश की दिनों दिन बढ़ती हुई जनसंख्या, निर्धनता तथा हजारों वर्ष की गुलामी इस समस्या के बढ़ने में सहायक हुई है। विदेशियों ने भारत के उद्योगों को समाप्त कर दिया था जिससे इस देश में बेकारी फैलना स्वाभाविक ही था। जाति–पाँति के भेद–भाव ने भी बहुत से लोगों को बेकार कर दिया है। ऊँची जाति के लोग बेकार रहना भले ही स्वीकार करें किन्तु छोटी–छोटी जातियों वाले रोजगार करना वे पसन्द नहीं करते हैं। छोटे–छोटे उद्योग ठप्प हो गये हैं।

बड़ी–बड़ी मशीनों और कारखानों को तो इस समस्या का मूल कारण ही कह सकते हैं। बड़ी–बड़ी मशीनों ने जहाँ एक ओर उत्पादन बढ़ाया तथा श्रम की बचत की, वहीं दूसरी ओर हजारों भारतीयों को भूखों मरने के लिए विवश कर दिया है। इसलिए मशीनों का विरोध करते हुए गांधी जी ने कहा था “Men go on saving labour till thousands are without work and thrown on the open streets to die of starvation.”

वर्तमान शिक्षा प्रणाली–
भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली भी बेकारी की समस्या का एक प्रमुख कारण है। यह शिक्षा प्रणाली विदेशियों की देन है जिसका उद्देश्य क्लर्क बनाना था। आज की शिक्षा नवयुवकों को आत्मनिर्भर न बनाकर उनमें श्रम के प्रति अवज्ञा और नौकरी की भावना पैदा करती है। यही कारण है कि देश में जैसे–तैसे शिक्षा का प्रचार हो रहा है, बेकारी की समस्या और विकराल रूप धारण करती जा रही है। नारी शिक्षा का प्रचार होने पर अब स्त्रियाँ भी नौकरी के लिए निकल पड़ी हैं। इससे समस्या और भी जटिल हो गयी है।

आज के विद्यार्थी व्यावहारिक ज्ञान से शून्य तथा परिश्रम करने में असमर्थ होकर. समाज में प्रवेश करते हैं। नौकरशाही भारत से चली गयी परन्तु नौकरशाही की भावना उत्पन्न करने वाली शिक्षा प्रणाली आज भी देश में विद्यमान है। आज का विद्यार्थी केवल एक भावना लेकर कालेज से निकलता है कि वह कहीं नौकरी करेगा।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ‘भारत–भारती’ में इस शिक्षा प्रणाली से खिन्न होकर कहा था “शिक्षे, तुम्हारा नाश हो, जो नौकरी के हित बनी’ आज के शिक्षित नौजवान बड़ी–बड़ी उपाधियाँ लेकर काम दिलाऊ दफ्तरों के चक्कर काटते हैं या समाचार–पत्रों के ‘आवश्यकता’ कालम पर मक्खियों की तरह मँडराते दिखाई पड़ते हैं।

समस्या का समाधान–
इस जटिल समस्या को सुलझाने के लिए इसके कारणों को मिटाना होगा। सबसे पहले हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि मशीनों का बढ़ता हुआ प्रभाव किस प्रकार रोका जाये। मशीनों को होना चाहिए किन्तु मनुष्य का दास–उसे स्वामी नहीं बनना चाहिए। कुटीर उद्योगों का विकास होना चाहिए। छोटे–छोटे उद्योग जैसे बान बँटना, टोकरी बनाना आदि विकसित हों।

महात्मा गांधी के अनुसार सूत कातने, कपड़ा बुनने का काम यदि घर–घर में होने लगे तो उससे एक ओर तो बेकारी की समस्या हल होगी और उसके साथ ही दूसरी ओर गरीबी और भूखमरी की समस्या भी हल हो जायेगी। इसके अतिरिक्त शिक्षा प्रणाली में सुधार करना होगा। शिक्षा केवल किताबी न होकर व्यावहारिक होना चाहिए।

कालिजों में पढ़कर नवयुवक केवल क्लर्क होकर ही नहीं निकलने चाहिए बल्कि अच्छे दस्तकार, कलाकार तथा श्रेष्ठ किसान होकर निकलने चाहिए। हमारा देश कृषि–प्रधान है किन्तु देश के पढ़े–लिखे लोग खेती से घृणा करते हैं। शिक्षा में कृषि और श्रम के प्रति आदर और महत्त्व की भावना पैदा करने की क्षमता होनी चाहिए। . समाज में देश को वही प्राचीन भावना जगानी होगी “उत्तम खेती मध्यम बान, निषिध चाकरी भीख–निदान।”

उपसंहार–
हमारे देश की राष्ट्रीय सरकार इस समस्या को सुलझाने के लिए निरन्तर प्रयत्न कर रही है किन्तु समस्या सुलझने के बजाय उलझती जा रही है। वास्तव में समस्या का मूल शिक्षा में है। जब तक शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन न होगा तब तक समस्या का समाधान होना कठिन है। सरकार और जनता, दोनों को ही इस ओर ध्यान देना चाहिए।

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