Jati Udbhavan Kya Hai | जाति उद्भव | जाति उद्भव का कारण | उपार्जित लक्षण | आनुवंशिक लक्षण 

उपार्जित लक्षण किसे कहते हैं:

वह लक्षण जो की जीव अपने पुरे जीवनकाल में प्राप्त करते है उपार्जित लक्षण कहलाते है। उदाहरण = भृंगों के शरीर के भार में कमी।

उपार्जित लक्षण के गुण:

1. उपार्जित लक्षण जीव अपने पुरे जीवनकाल में प्राप्त करते है।

2. उपार्जित लक्षण जनन कोशिकाओं के डी-एन-ए- के संगठन पर कोई प्रभाव नहीं डालता है और अगली पीढ़ी को वंशानुगत नही होते है।

3. उपार्जित लक्षण जैव विकास में सहायक नहीं है।

अनुवांशिक लक्षण किसे कहते हैं:

वह लक्षण जो की कोई जीव अपने जनक से प्राप्त करते है आनुवंशिक लक्षण कहलाता है। उदाहरण मानव के बालो का रंग।

आनुवंशिक लक्षण के गुण

1.आनुवंशिक लक्षण जीवो में वंशानुगत होते है।

2.आनुवंशिक लक्षण जैव विकास में सहायक है।

3.आनुवंशिक लक्षण जनन कोशिकाओं के डी-एन-ए- के संगठन पर प्रभाव डालते है और अगली पीढ़ी को वंशानुगत होते है।

जाति उद्भव क्या है species Incubation in hindi:

पूर्व स्पीशीज से नयी स्पीशीज का निर्माण ही जाति उद्भव कहलाता है। वर्त्तमान स्पीशीज का परिवर्तनशील पर्यावरण में जीवित रहना आवश्यक है क्योकि यह नयी स्पीशीज का उद्भव करते है।

इन स्पीशीज के सदस्यों को जीवित रहने के लिए कुछ बाहरी लक्षण में परिवर्तन करना पड़ता है। वर्त्तमान पीढ़ी के सदस्यों के शारीरिक लक्षण में परिवर्तन दिखाई देते है तथा यह परिवर्तन जनन प्रक्रिया के दवारा आने वाली पीढ़ी में जाते है। इस प्रकार नयी पीढ़ी का उद्भव होता है।

जाति उद्भवन का कारण :

1. अनुवांशिक विचलन = किसी एक स्पीशीज की उतरोतर पीढियों में सापेक्ष जीन्स की बारम्बारता में अचानक परीवर्तन का होना ही अनुवांशिक विचलन कहलाता है उतरोतर पीढियों में सापेक्ष जीन्स की बारम्बारता में अचानक परीवर्तन का कारण गुणसुत्रो की संख्या में परिवर्तन , डी-एन-ए में परिवर्तन के कारण होता है।

2. प्राकृतिक वरण = कोई जीव अपने पर्यावरण के प्रति बहुत अच्छे तरीके से अनुकुलित होते है। यह जीव बहुत अधिक संतान को उत्पन्न करते है और अपनी उतरजिविता को बनाए रखते है प्राकृतिक वरण के दवारा उत्पन्न संतति में विभिन्ताए होती है और यदि यह विभिन्ताए अपनी मूल गुणों से बहुत अधिक हो तो जीव जींस में बहुत अधिक परिवर्तन होता है और जीव जो उत्त्पन्न होता है वह बहुत अधिक भिन्न होता है और नयी जाति का उद्भव होता है।

यदि गुणसुत्रो की संख्या में परिवर्तन बहुत अधिक हो तो डी-एन-ए में परिवर्तन भी पर्याप्त होता है और उन दोनों स्पीशीज के सद्स्यो की जनन कोशिकाए संलयन करने में असमर्थ होती है जिसके कारण नयी जाति का उद्भव होता है।

3. भोगोलिक पथक्करण = भोगोलिक आकृति जैसे जी नदी ,पहाड़ आदि जो की एक स्पीशीज के सद्स्यो के बीच जींस के प्रवाह को रोकते है जिसके कारण किसी एक स्पीशीज के जीव अलग अलग होकर दो स्पीशीज का निर्माण करते है इस प्रकम को भोगोलिक पथक्करण कहते है। लैगिक जनन करने वाले जीवो में भोगोलिक पथक्करण के कारण ही जाति उद्भव होता है।

स्थानीय समष्टि में विभिन्नता: 

जब कोई उपसमष्टि भोगोलिक पथक्करण के कारण एक स्थान से दुसरे स्थान में चला जाता है अर्थात् अप्रवास करता है वह नए स्थान को अपना आवास बना लेता है और उस निवास की किसी उपसमष्टि के साथ जनन करता है जिसके कारण जीन का प्रवाह होता है और इससे उत्पन्न जीव में विभिन्नता आ जाती है।

विकास एवं वर्गीकरण :

जीन किसी प्राणी में लक्षण के लिए जिम्मेदार होते है। अलग अलग जीवों के मध्य समानताएँ इन जीवों को एक समूह में रखने और उनके अध्ययन का अवसर देती हैं।

अभिलक्षण किसे कहते हैं:

बाह्य आकृति अथवा व्यवहार का विवरण अभिलक्षण कहलाता है। दूसरे शब्दों में विशेष स्वरूप अथवा विशेष प्रकार्य अभिलक्षण कहलाता है। उदाहरण = हमारे चार पाद होते हैं यह एक अभिलक्षण है। पौधों में प्रकाशसंश्लेषण की प्रक्रिया भी एक अभिलक्षण है।

अधिकतर जीवों में कुछ आधारभूत अभिलक्षण समान होते है। सभी जीवो में कोशिका जो की आधारभूत इकाई है यह भी एक अभिलक्षण है। सभी जीवो का वर्गीकरण उन जीवो के अभिलक्षण पर निर्भर करता है। सभी जीवो का वर्गीकरण करने पर कुछ जीवो के अगले स्तर पर अभिलक्षण समान होता है परंतु सभी जीवों में नहीं।

जीवो का वर्गीकरण कोशिका के अभिकल्प के आधारभूत अभिलक्षण के आधार पर किया जाता है। जैसे की कोशिका में केंद्रक का होना या न होना है जो विभिन्न जीवों में भिन्न हो सकता है। जीवाणु की कोशिका में केंद्रक नहीं पाया जाता है जबकि अधिकतर दूसरे जीवों की कोशिकाओं में केंद्रक पाया जाता है।

केंद्रक पाई जाने वाली कोशिका वाले जीवों के एक-कोशिक अथवा बहुकोशिक होने का गुण ही इन जीवो के शारीरिक अभिकल्प में एक आधारभूत अंतर को दर्शाता है जो की कोशिकाओं एवं ऊतकों के विशिष्टीकरण के कारण होता है।

बहुकोशिक जीवों में प्रकाशसंश्लेषण का होना या न होना भी वर्गीकरण का प्रमुख कारण है। वह बहुकोशिक जीवों जिनमें प्रकाशसंश्लेषण नहीं होता है ऐसे कुछ जीवो जिनमें अंतःकंकाल होता है तथा कुछ में बाह्य-कंकाल होता है इस प्रकार का अभिलक्षण एक अन्य प्रकार का आधारभूत अभिकल्प अंतर को दर्शाता है।

किन्ही दो स्पीशीज के मध्य संबंध अभिलक्षण के दवारा ही निधार्रित होते है। जितने अधिक अभिलक्षण समान होंते है दो स्पीशीज के मध्य संबंध भी उतना निकट का होता है। जितने अधिक अभिलक्षण समान होंते है उनका उद्भव भी निकट अतीत में समान पूर्वजों से ही हुआ होता है।

उदाहरण एक भाई एवं बहन उस बहन के चचेरे/ममेरे भाई की तुलना में अति निकट होता हैं क्योकि भाई एवं बहन की पहली पीढ़ी में उनके पूर्वज समान थे जबकि लड़की के चचेरे/ममेरे भाई-बहन के दादा-दादी जो उनसे दो पीढ़ी पहले के हैं वह सामान थे , न कि एक पीढ़ी पहले के। अत: जीवों का वर्गीकरण उनके विकास के संबंधों का प्रतिबिंब होता है।

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