महात्मा गांधी पर निबंध – Mahatma Gandhi Essay In Hindi

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महात्मा गांधी पर छोटे तथा बड़े निबंध (Essay On Mahatma Gandhi in Hindi)

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रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • जीवन-वृत्त,
  • देश-सेवा,
  • विचारधारा,
  • उपसंहार।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

प्रस्तावना-
जब-जब मानवता हिंसा, स्पर्द्धा और शोषण से त्रस्त होती है, अहंकारी शासकों के क्रूर दमन से कराहने लगती है तो परमपिता की करुणा कभी कृष्ण, कभी राम, कभी गौतम और कभी गांधी बनकर इस धरती पर अवतरित होती है और घायल मानवता के घावों को अपनी स्नेह-संजीवनी का मरहम लगाती है।

जीवन-वृत्त-
मेरे आदर्श जननायक महामानव गांधी ने 2 अक्टूबर, 1869 ई. को जन्म लेकर गुजरात में पोरबंदर, काठियावाड़ की धरती को पवित्र किया था। ऐसा लगता था मानो सृष्टि सरोवर में मानवता का शतदल कमल खिल उठा हो; मानो पीड़ित, उपेक्षित, दासताबद्ध जन-जन की निराशा आशा का सम्बल पा गयी हो।

महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गांधी है। उनके पिता करमचन्द गांधी एक रियासत के दीवान थे। गाँधीजी ने प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही प्राप्त की। तत्पश्चात् वे पाठशाला में प्रविष्ट हुए और हाईस्कूल की परीक्षा पास की। हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् वे इंग्लैण्ड गये। वहाँ से बैरिस्ट्री की शिक्षा प्राप्त कर वे भारत लौट आये। भारत में आकर गाँधीजी ने बैरिस्टर के रूप में जीवन आरम्भ किया।

इसी सिलसिले में उन्हें दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। वहाँ पर भारतीयों की दुर्दशा देखकर उनका हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतवासियों के साथ होने वाले अत्याचारों का विरोध किया। गांधीजी के सतत् प्रयत्नों के कारण दक्षिण अफ्रीका के मजदूरों और भारतीयों की दशा में बहुत सुधार हुआ।

देश-सेवा-
दक्षिण अफ्रीका में सफलता पाकर गांधीजी ने स्वदेश-सेवा के क्षेत्र में पदार्पण किया। उन्होंने भारत में अंग्रेजी शासन से पीड़ित भारतीय जनता के उद्धार का व्रत ग्रहण किया। यद्यपि भारत के अनेक स्वदेशप्रेमी इसी प्रयास में लगे हुए थे, किन्तु गांधीजी एक अपूर्व संघर्ष-पद्धति को लेकर स्वतन्त्रता संग्राम में अवतरित हुए-

ले ढाल अहिंसा की कर में, तलवार प्रेम की लिए हुए।
आये वह सत्य समर करने, ललकार क्षेम की लिए हुए।

इस अद्भुत रणपद्धति के सम्मुख हिंसा और असत्य की शक्तियाँ नहीं टिक सकी। अंग्रेजी शासन का सारा बल गांधीजी के विरुद्ध सक्रिय हो गया। दमन-चक्र आरम्भ हो गया। जेलें भर गयीं, किन्तु जनता ने अपनी शक्ति को और अपने मार्गदर्शक को पहचान लिया था। तभी तो-

चल पड़े जिधर दो डग’ मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर।
उठ गयी जिधर भी ‘एक दृष्टि’ उठ गये कोटि दूग उसी ओर।।

गांधीजी द्वारा प्रदर्शित यह मार्ग देश को स्वतन्त्रता की मंजिल तक ले पहुँचा। जिसके राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता था, वह ब्रिटिश सत्ता गांधी के चरणों में नत हो गई। गांधीजी के नेतृत्व में भारत ने 15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्रता का अमूल्य उपहार प्राप्त किया।

विचारधारा-गांधीजी ने यद्यपि कोई सर्वथा नयी विचारधारा संसार के सम्मुख प्रस्तुत नहीं की, किन्तु एक महान विचारधारा को आचरण में परिणत करके दिखाया। सत्य, अहिंसा और प्रेम भारतीय संस्कृति की सनातन विचार-पद्धतियाँ हैं। शास्त्रों में, धर्मग्रन्थों में और उपदेशों में उनकी महानता बहुत गायी गयी थी, किन्तु गांधीजी ने इनका प्रयोग जीवन में करके दिखाया।

महाकवि पंत ने गांधीजी के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा है-

जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर चेतना, अहिंसा, नम्र ओज,
पशुता का पंकज बना दिया, तुमने मानवता का सरोज।

गांधीजी का मनुष्य की महानता में विश्वास था। वह अपराधी के नहीं, अपराध के विरोधी थे। हृदय-परिवर्तन द्वारा समाज का सुधार करने में उनका पूर्ण विश्वास था।

वे छुआछूत, ऊँच-नीच, धार्मिक भेदभाव और हर प्रकार के शोषण के विरोधी थे। हरिजनों के उद्धार में उनकी विशेष रुचि थी।

उपसंहार-
30 जनवरी, 1948 ई. को प्रार्थना सभा में प्रवचनरत, गांधीजी के वक्ष में एक पागल ने गोलियाँ उतार दी। लगा कि गोलियाँ गांधीजी के नहीं अपितु मानवता के ही वक्ष में मारी गई हैं। इस प्रकार संसार के दीन-दु:खी और शोषित मानवों की आशाओं का दीपक बुझ गया। भले ही आज गांधीजी तन से उपस्थित नहीं हैं, किन्तु वह मुझ जैसे कोटि-कोटि भारतवासियों के मन में विराज रहे हैं। फूल झर गया, किन्तु उसकी संजीवनी सुगन्ध अब भी मानवता की साँसों को महका रही है।

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Remark:

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