फांसी सुबह ही क्यों दी जाती है?

भारत (India) में फांसी (Capital Punishment) लंबे समय से सूर्योदय से पहले (तड़के) ही क्यों दी जाती है. अंग्रेजों के जमाने में भी फांसी की सजा जेल में सुबह सूरज की पहली किरण से पहले ही दी जाती थी. वैसा ही अब भी हो रहा है. भारत में आखिरी फांसी 1993 के मुम्बई में हुए बम धमाकों के आरोपी याकूब मेनन को 2015 में हुई थी। ये भी भोर में ही दी गई थी.

केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में जहां कहीं भी फांसी देने का रिवाज अभी जारी है, वहां फांसी भोर में ही दी जाती है. हालांकि भारत के जेल मैन्यूल में फांसी के समय के बारे में स्पष्ट दिशा निर्देश हैं. जेल मैन्युअल कहता है कि फांसी सुबह तड़के ही दी जानी चाहिए, ये हमेशा सूरज की पहली किरण से पहले संपन्न हो जाए.

हालांकि हर मौसम के हिसाब से फांसी का समय सुबह बदल जाता है लेकिन ये समय भी तय करने का काम केंद्र और राज्य सरकारें ही करती हैं. फांसी को सुबह तड़के शांत बेला में देने की तीन वजहें भी हैं, जो प्रशासनिक, व्यावहारिक और सामाजिक पहलुओं से जुड़ी हैं.

आमतौर पर फांसी एक खास घटनाक्रम होता है. अगर ये दिन के दौरान होंगी तो जेल का सारा फोकस इसी पर टिक जाएगा. इससे बचने की कोशिश की जाती है ताकि जेल की दिनभर की अन्य गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़े. सारी गतिविधियां सुचारू तौर पर काम करती रहें. फांसी होने के बाद मेडिकल परीक्षण होता है और उसके बाद कई तरह की कागजी कार्यवाहियां. इन सबमें भी समय लगता है.

ऐसा माना जाता है की अपराधी को दिन भर का इंतज़ार नहीं करना चाहिए. नहीं तो उसके दिमाग पर बहुत हीं गहरा असर पड़ता है. इसलिए अपराधी को सुबह उठाकर नित्य क्रिया से नीवृत होकर फांसी के लिए ले जाया जाता है और दूसरी वजह ये भी है की सुबह होते हीं सभी लोग अपने काम में लग जाते हैं. चुकी उसी तरह जेल में भी लोग सुबह अपने कामों में लग जाते हैं, इसलिए भी फांसी की सजा सूर्योदय से पहले दे दी जाती है, जिससे दूसरों पर भी इसका बुरा प्रभाव ना पड़े.

ये माना जाता है कि जिस फांसी दी जा रही है, उसका मन सुबह भोर के समय में ज्यादा शांत रहता है. सोकर उठने के बाद फांसी देने पर वो ज्यादा शारीरिक तनाव और दबाव का शिकार नहीं होता. अगर फांसी दिन में हो तो सजायाफ्ता का तनाव और मानसिक स्थिति बिगड़ सकती है.

जिसे फांसी होती है, उसे सुबह तीन बजे ही उठना होता है ताकि वो अपने सारे काम फांसी से पहले निपटा ले, जिसमें प्रार्थना और अकेले में कुछ समय के लिए अपने बारे में सोच-विचार करना आदि भी शामिल है. सबसे बड़ी बात है कि फांसी के बाद उसके परिजनों को शव सौंप दिया जाए, ताकि वो उसे लेकर अपने गंतव्य तक जा सकें और दिन में ही अंतिम संस्कार कर लें.

सामाजिक पहलू यानि हंगामा नहीं हो.

फांसी का तीसरा पक्ष सामाजिक है. चूंकि ये खास घटना होती है लिहाजा बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान आकर्षित करती है. इसके चलते जेल के बाहर बड़े पैमाने पर तमाशबीन इकट्ठा होने और हंगामा होने के भी आसार होते हैं. लिहाजा कोशिश होती है कि जब तक लोग सोकर उठें तब तक फांसी हो जाये |

Remark:

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